शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023

D.K सप्रू

दया किशन सप्रू 

🎂16 मार्च 1916 - 
⚰️20 अक्टूबर 1979

 एक भारतीय अभिनेता थे जो हिंदी सिनेमा में विभिन्न प्रकार की चरित्र भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध थे , विशेष रूप से अपराध थ्रिलर और नाटकों में खलनायक, न्यायाधीश और अभिजात वर्ग की भूमिकाओं के लिए। उनका सबसे उल्लेखनीय प्रदर्शन 1950 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत के बीच की बॉलीवुड प्रस्तुतियों में था, जिनमें साहिब बीबी और गुलाम , हीर रांझा , पाकीजा , काला पानी , दूज का चांद , तेरे मेरे सपने , हमजोली , ज्वेल थीफ और दीवार शामिल हैं ।

1916 में कश्मीरी पंडित माता-पिता के घर जन्मे सप्रू ने बॉलीवुड में अपनी शुरुआत चाँद (1944) से की, जिसमें एक अन्य कश्मीरी पंडित अभिनेता प्रेम अदीब ने अभिनय किया। 1970 के दशक की शुरुआत तक, सप्रू अपराध थ्रिलरों में एक खलनायक के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे। हालाँकि 1979 में उनकी मृत्यु हो गई, फिर भी वे 1980 के दशक में रिलीज़ हुई कई फिल्मों में दिखाई देते रहे, जिनमें क्रोधी (1981) भी शामिल थी।
उनके चेहरे को देखते हुए और सामान्य परिचय के बाद, वी शांताराम ने अपनी अगली फिल्म राम शास्त्री में एक भूमिका के लिए नीली आंखों वाले दया किशन सप्रू को साइन किया। उनके द्वारा निभाए गए पेशवा के किरदार को लोगों ने खूब सराहा और फिल्म बड़ी हिट साबित हुई। .. उन्हें कंपनी द्वारा 3000/= रुपये के मासिक वेतन पर मुख्य नायक के रूप में अनुबंधित किया गया था, जो उन दिनों के दौरान किसी भी नायक को सबसे अधिक भुगतान किया गया था। यह एक बड़ी रकम थी जिसने उन्हें उन दिनों एक राजसी जीवन जीने में सक्षम बनाया। यह लगभग 1945-46 के आसपास की बात है।

बाद में फिल्मों की झड़ी लग गई। उन्होंने रोमियो एंड जूलियट (नरगिस के साथ) में अभिनय किया। नरगिस की मां जद्दन बाई ने सप्रू की बहुत प्रशंसा की। फिल्म का निर्माण नरगिस के भाई अख्तर हुसैन ने किया था।)झांसीकी रानी, ​​कालापानी, हम हिंदुस्तानी, साहिब बीबी और गुलाम, मुझे जीने दो, लीडर और शहीद। साहिब बीबी और गुलाम में मझले सरकार (चौधरी) के रूप में उनकी भूमिका किसे याद नहीं है। मुझे जीने दो में जमींदार के रूप में फिर से वह काफी लोकप्रिय हो गए। हमने उन्हें नया दौर, प्रेम पुजारी, ज्वेल थीफ़, क्रोधी, कुदरत, धर्म वीर, ड्रीम गर्ल, ज़ंजीर, पाकीज़ा और ऐसी कई फिल्मों में कुछ अद्भुत भूमिकाओं में देखा। यह वह दौर था जब कहानीकार उनके लिए एक चरित्र बनाते थे। कहानी या स्क्रिप्ट. उनकी बाद की अधिकांश फिल्मों में उन्हें या तो जमींदार या पुलिस कमिश्नर या जज के रूप में देखा गया।

उन्होंने कुल मिलाकर 350 से ज्यादा फिल्मों में काम किया होगा और जिनमें से 50 से ज्यादा फिल्मों में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने कुछ गुजराती और पंजाबी फिल्मों में भी मुख्य भूमिकाएँ निभाईं।
📽️

1981 Kudrat
1981 Krodhi 
1980 Jyoti Bane Jwala 
1978 Chor Ke Ghar Chor 
1978 Naya Daur 
(1978 film) Hotel Manager Sapru
1978 Vishwanath 
1978 Phaansi Chhaya's 
1978 Ram Kasam 
1977 Rangaa Aur Raja 
1977 Mukti 
1977 Guru Manio Granth 
1977 Chhaila Babu 
1977 Alibaba 
1977 Dharam Veer 
1977 Dream Girl 
1977 Gayatri Mahima 
1977 Jai Ambe Maa 
1976 Charas 
1976 Adalat 
1975 Faraar Defence 
1975 Pratigya (1975 film) Purohit 
1975 Rafoo Chakkar 
1975 Deewaar 
1975 Lafange 
1974 Majboor 
1974 Benaam 
1974 Haath Ki Safai 
1974 Resham Ki Dori 
1974 Patthar Aur Payal  
1974 5 Rifles 
1974 Kasauti 
1974 Do Chattane 
1974 Imtihaan 
1974 Chowkidaar 
1974 Dukh Bhanjan Tera Naam  
1974 Paise Ki Gudiya 
1974 Prem Shastra 
1974 Shaitan 
1973 Zanjeer 
1972 Bhai Ho To Aisa 
1972 Pakeezah Hakim Saab Sapru
1971 Gambler 
1971 Shri Krishna 
1970 Prem Pujari 
1970 Heer Ranjha Sapru
1969 Sajan 
1969 Satyakam 
1968 Humsaya 
1967 Hare Kanch Ki Chooriyan 
1967 Jewel Thief 
1966 Dil Diya Dard Liya 
1965 Johar-Mehmood in Goa 
1965 Shaheed 
1964 Leader 
1963 Mujhe Jeene Do 
1962 Sahib Bibi Aur Ghulam 
1962 Sangeet Samrat Tansen  
1960 Hum Hindustani 
1958 Kalapani 
1955 Waman Avtar 
1953 Jhansi Ki Rani 
1948 Lal Dupatta 
1947 Romeo And Juliet 
1944 Chand

अजीत खान

अजीत
🎂जन्म 27 जनवरी, 1922
जन्म भूमि गोलकुंडा
⚰️मृत्यु 21 अक्टूबर, 1998
मृत्यु स्थान हैदराबाद, आंध्र प्रदेश
अभिभावक पिता- बशीर अली ख़ान
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'कालीचरण', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'जंजीर', 'यादों की बारात', 'समझौता', 'कहानी किस्मत की', 'जुगनू', 'शिकारी', 'हिमालय की गोद में' और 'सूरज', आदि।
प्रसिद्धि अभिनेता (विशेषत: खलनायक)
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्ध संवाद 'सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है', 'लिली डोंट बी सिली' और 'मोना डार्लिंग'।
अन्य जानकारी अजीत ने अपना मनपसंद और कभी भुलाया नहीं जा सकने वाला किरदार निर्माता-निर्देशक सुभाष घई कि फ़िल्म 'कालीचरण' में निभाया। फ़िल्म 'कालीचरण' में उनका निभाया किरदार 'लॉयन' तो उनके नाम का पर्याय ही बन गया था।

परिचय
हामिद अली ख़ान उर्फ अजीत का जन्म 27 जनवरी, सन 1922 को तत्कालीन हैदराबाद रियासत के गोलकुंडा में हुआ था। अजीत को बचपन से ही अभिनय करने का शौक था। उनके पिता बशीर अली ख़ान हैदराबाद में निज़ाम की सेना में काम करते थे। अजीत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा आंध्र प्रदेश के वारांगल ज़िले से पूरी की। चालीस के दशक में उन्होंने नायक बनने के लिए फ़िल्म इंडस्ट्री का रुख़किया और अपने अभिनय जीवन की शुरूआत वर्ष 1946 में प्रदर्शित फ़िल्म 'शाहे मिस्र' से की।

फ़िल्मी कॅरियर
सन 1946 से 1956 तक अजीत फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। 'शाहे मिस्र' के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली, वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने 'पतंगा', 'जिद', 'सरकार', 'सईयां', 'तरंग', 'मोती महल', 'सम्राट' और 'तीरंदाज' जैसी कई फ़िल्मों मे अभिनय किया; लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई। 1950 में फ़िल्म निर्देशक के. अमरनाथ ने उन्हें सलाह दी कि वह अपना फ़िल्मी नाम छोटा कर लें। इसके बाद उन्होंने अपना फ़िल्मी नाम हामिद अली ख़ान की जगह पर अजीत रखा और अमरनाथ के निर्देशन में बनी फ़िल्म 'बेकसूर' में बतौर नायक काम किया।

सन 1957 में बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्म 'नया दौर' में अजीत ग्रामीण युवक की भूमिका में दिखाई दिए। इस फ़िल्म में उनकी भूमिका ग्रे-शेड्स वाली थी। यह फ़िल्म पूरी तरह अभिनेता दिलीप कुमार पर केन्द्रित थी। फिर भी वह दिलीप कुमार जैसे अभिनेता की उपस्थिति में अपने अभिनय की छाप दर्शकों के बीच छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म के बाद अजीत ने यह निश्चय किया कि वह खलनायकी में ही अपने अभिनय का जलवा दिखाएंगे। इसके बाद वह बतौर खलनायक फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करने लगे। 1960 में प्रदर्शित फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' में एक बार फिर से उनके सामने हिन्दी फ़िल्म जगत् के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, लेकिन अजीत ने अपनी छोटी सी भूमिका के जरिए दर्शकों की वाह-वाही लूट ली।

सफलता
'जिंदगी और ख्वाब', 'शिकारी', 'हिमालय की गोद में', 'सूरज', 'प्रिंस', 'आदमी और इंसान' जैसी फ़िल्मों से मिली कामयाबी के जरिए अजीत दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसे मुकाम पर पहुंच गए, जहां वह फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। 1973 अजीत के सिने कॅरियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। उस वर्ष उनकी 'जंजीर', 'यादों की बारात', 'समझौता', 'कहानी किस्मत की' और 'जुगनू' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुईं, जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद अजीत ने उन ऊंचाइयों को छू लिया, जिसके लिए वह अपने सपनों के शहर मुंबई आए थे।

लोकप्रिय संवाद
अजीत के पसंद के किरदार की बात करें तो उन्होंने सबसे पहले अपना मनपसंद और कभी भुलाया नहीं जा सकने वाला किरदार निर्माता-निर्देशक सुभाष घई की 1976 मे प्रदशित फ़िल्म 'कालीचरण' में निभाया। फ़िल्म 'कालीचरण' में उनका निभाया किरदार 'लॉयन' तो उनके नाम का पर्याय ही बन गया था। फ़िल्म में उनका संवाद सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है आज भी बहुत लोकप्रिय है और गाहे-बगाहे लोग इसे बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा उनके लिली डोंट बी सिली और मोना डार्लिंग जैसे संवाद भी सिने प्रेमियों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुए।

खलनायकी के बादशाह
फ़िल्म 'कालीचरण' की कामयाबी के बाद अजीत के सिने कॅरियर में जबरदस्त बदलाव आया और वह खलनायकी की दुनिया के बेताज बादशाह बन गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने दमदार अभिनय से दर्शकों की वाह-वाही लूटते रहे। खलनायक की प्रतिभा के निखार में नायक की प्रतिभा बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इसी कारण अभिनेता धर्मेन्द्र के साथ अजीत के निभाए किरदार अधिक प्रभावी रहे। उन्होंने धमेन्द्र के साथ 'यादों की बारात', 'जुगनू', 'प्रतिज्ञा', 'चरस', 'आजाद', 'राम बलराम', 'रजिया सुल्तान' और 'राजतिलक' जैसी अनेक कामयाब फ़िल्मों में काम किया।

यह बात जग जाहिर है कि जहां फ़िल्मी पर्दे पर खलनायक बहुत क्रूर हुआ करते हैं, वहीं वास्तविक जीवन में बहुत सज्जन होते हैं। निजी जीवन में अत्यंत कोमल हृदय अजीत ने इस बीच 'हम किसी से कम नहीं' (1977), 'कर्मयोगी', 'देस परदेस' (1978), 'राम बलराम', 'चोरनी' (1981), 'खुदा कसम' (1981), 'मंगल पांडेय' (1982), 'रजिया सुल्तान' (1983) और 'राजतिलक' (1984) जैसी कई सफल फ़िल्मों मे अपना एक अलग समां बांधे रखा।

मृत्यु
90 के दशक में अजीत ने स्वास्थ्य खराब रहने के कारण फ़िल्मों में काम करना कुछ कम कर दिया। इस दौरान उन्होंने 'जिगर' (1992), 'शक्तिमान' (1993), 'आदमी' (1993), 'आतिश', 'आ गले लग जा' और 'बेताज बादशाह' (1994) जैसी कई फ़िल्मों में अपने अभिनय से दर्शकों का मनोरंजन किया। संवाद अदायगी के बेताज बादशाह अजीत ने करीब चार दशक के फ़िल्मी कॅरियर में लगभग 200 फ़िल्मों में अपने अभिनय का जौहर दिखाया और 21 अक्टूबर, 1998 को इस दुनिया से रूखसत हो गए।

यश चोपड़ा

यश चोपड़ा
पूरा नाम यश राज चोपड़ा
अन्य नाम किंग ऑफ़ रोमांस
🎂जन्म 27 सितंबर, 1932
जन्म भूमि लाहौर पाकिस्तान
⚰️मृत्यु 21 अक्टूबर, 2012 
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
पति/पत्नी पामेला चोपड़ा
संतान आदित्य चोपड़ा और उदय चोपड़ा
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक
मुख्य फ़िल्में दीवार, दाग़, कभी कभी, डर, चांदनी, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे, दिल तो पागल है, वीर जारा आदि।
पुरस्कार-उपाधि 11 बार फ़िल्मफेयर पुरस्कार, पद्म भूषण, दादा साहब फालके पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी यश चोपड़ा के पुत्र आदित्य चोपड़ा प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक और दूसरे पुत्र उदय चोपड़ा अभिनेता हैं।
अद्यतन‎ 
20:10, 28 सितम्बर 2012 (IST)
यश राज चोपड़ा (अंग्रेज़ी: Yash Raj Chopra, जन्म: 27 सितम्बर, 1932; मृत्यु: 21 अक्टूबर, 2012) भारतीय हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक एवं फ़िल्म निर्माता हैं। यश चोपड़ा को हिन्दी सिनेमा का “किंग ऑफ रोमांस” कहा जाता है। दीवार, कभी कभी, डर, चांदनी, सिलसिला, दिल तो पागल है, वीर जारा जैसी अनेकों बेहतरीन और रोमांटिक फ़िल्में बनाने वाले यश चोपड़ा ने पर्दे पर रोमांस और प्यार को नए मायने दिए हैं।

जीवन परिचय
यश चोपड़ा का जन्म 27 सितंबर, 1932 को लाहौर में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। स्वतंत्रता के बाद वह भारत आ गए। उनके बड़े भाई बी. आर. चोपड़ा बॉलीवुड के जाने-माने निर्माता निर्देशक थे। बड़े भाई की प्रेरणा पर ही उन्होंने भी फ़िल्मों में हाथ आजमाया और आज यश चोपड़ा का परिवार बॉलीवुड के प्रतिष्ठित बैनरों में से एक है। उनके बेटे आदित्य चोपड़ा और उदय चोपड़ा भी फ़िल्मों से ही जुड़े हुए हैं। यश चोपड़ा ने अपने भाई के साथ सह निर्देशक के तौर पर काम करना शुरू किया। अपने भाई बी. आर चोपड़ा के बैनर तले उन्होंने लगातार पांच फ़िल्में निर्देशित की। इन फ़िल्मों में ‘एक ही रास्ता’, ‘साधना’ और ‘नया दौर’ शामिल हैं।[१]

फ़िल्मी सफर
यश चोपड़ा ने 1959 में पहली बार अपने भाई के बैनर तले ही बनी फ़िल्म ‘धूल का फूल’ का निर्देशन किया। इसके बाद उन्होंने भाई के ही बैनर तले 'धर्म पुत्र' को भी निर्देशित किया। दोनों ही फ़िल्में औसत कामयाब रहीं पर इसमें यश चोपड़ा की मेहनत सबको नजर आई। वर्ष 1965 में आई फ़िल्म ‘वक्त’ यश चोपड़ा की पहली हिट फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म का गीत “ऐ मेरी जोहरा जबीं तुझे मालूम नहीं” दर्शकों को आज भी याद है। फ़िल्म 'इत्तेफाक' उनकी उन चुनिंदा फ़िल्मों में से है जिसमें उन्होंने कॉमेडी और रोमांस के अलावा थ्रिलर पर भी काम किया था।

यश राज बैनर की स्थापना
मुख्य लेख : यश राज फ़िल्म्स
1973 में उन्होंने फ़िल्म निर्माण में कदम रखा और यश राज बैनर की स्थापना की। इसकी शुरूआत राजेश खन्ना अभिनीत ‘दाग’ जैसी सुपरहिट फ़िल्म से की। इस फ़िल्म की कामयाबी ने उन्हें बॉलीवुड में नया नाम दिया। इसके बाद आई 1975 की फ़िल्म 'दीवार' जिसमें अमिताभ बच्चन ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म की सफलता ने यश चोपड़ा को कामयाब निर्देशकों की श्रेणी में ला खड़ा किया। जहां उनकी फ़िल्मों में काम करने के लिए अभिनेता उनके घर के चक्कर लगाने लगे। इसके बाद तो यश चोपड़ा ने 'सिलसिला', ‘कभी-कभी’ जैसी फ़िल्मों में अमिताभ के साथ ही काम किया। हालांकि 80 के दशक की शुरूआत में यश चोपड़ा को असफलता का कड़वा स्वाद भी चखना पड़ा पर 1989 में आई 'चांदनी' ने उन्हें दुबारा एक सफल और हिट निर्देशक बना डाला। 1991 में आई 'लम्हे' भी इसी दौर की एक सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई। इसके बाद उन्होंने 1995 में बतौर निर्माता फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में दांव लगाया। शाहरुख खान और काजोल के अभिनय से सजी यह फ़िल्म बॉलीवुड में नया इतिहास रच गई। इसके बाद 1997 में उन्होंने फ़िल्म ‘दिल तो पागल है’ का निर्देशन किया। कुछ सालों तक वह निर्देशन से दूर रहे और फिर लौटे 2004 की सुपरहिट फ़िल्म 'वीर जारा' को लेकर।

किंग ऑफ़ रोमांस
बॉलीवुड में रोमांस के अलग-अलग स्‍वरूप को परदे पर ढालने वाले यश चोपड़ा ने रोमांस को जितने रंगों में दिखाया उतना बॉलीवुड का कोई निर्देशक नहीं दिखा सका, इसीलिए यश चोपड़ा को बॉलीवुड का रोमांस किंग यानी ‘किंग ऑफ़ रोमांस’ कहा जाता है। यश चोपड़ा ने रोमांस को जुनूनी तौर पर, पागलपन के तौर पर, कुर्बानी के तौर पर, दु:ख-दर्द बांटने के तौर पर, कॉमेडी और थ्रिलर के साथ यानी हर तरह से प्‍यार को दिखाने की कोशिश की। यश चोपड़ा वहीं शख्‍सियत हैं जिन्‍होंने सिल्‍वर स्‍क्रीन पर प्‍यार और रोमांस की नई परिभाषा गढ़ी।
 फ़िल्मी सफ़र 📽️
धूल का फूल (1959)
वक़्त 1965)
दाग़ (1973)
दीवार (1975)
त्रिशूल (1978)
काला पत्थर (1979)
सिलसिला (1981)
चांदनी (1989)
डर (1993)
ये दिल्लगी (1994)
दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995)
दिल तो पागल है (1997)
मोहब्बतें (2000)
मेरे यार की शादी है (2002)
हम तुम (2004)
धूम (2004)
वीर ज़ारा (2004)
बंटी और बबली (2005)
धूम 2 (2006)
चक दे इंडिया (2007)
रब ने बना दी जोड़ी (2008)
मेरे ब्रदर की दुल्हन (2011)
जब तक है जां (2012)
सम्मान और पुरस्कार
यश चोपड़ा को अब तक 11 बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें 1964 में प्रदर्शित फ़िल्म 'वक्त' के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए फ़िल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद वह 1969 में फ़िल्म 'इत्तेफाक' सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, 1973 में 'दाग' सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, 1975 में 'दीवार' सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, 1991 में 'लम्हे' सर्वश्रेष्ठ निर्माता, 1995 में 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' सर्वश्रेष्ठ निर्माता, 2001 में वह फ़िल्म जगह के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फालके पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए। 2005 में उन्हें भारत सरकार द्वारा 'पद्म भूषण' से भी सम्मानित किया गया। फ़िल्म निर्माता यश चोपड़ा को भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए फ्रांस का सर्वोच्च ऑफिसियर डी ला लेजन पुरस्कार भी प्रदान किया गया। स्विस सरकार ने उन्हें “स्विस एंबेसडरर्स अवार्ड 2010” से सम्मानित किया है
रोमांस के बादशाह' यश चोपड़ा का निधन
'रोमांस के बादशाह' फ़िल्म निर्माता यश चोपड़ा का निधन 21 अक्टूबर 2012, रविवार को मुंबई के लीलावती अस्पताल में निधन हो गया

हेलन

हेलन

हेलन रिचर्डसन खान
प्रसिद्ध नाम हेलन
🎂जन्म 21 अक्टूबर, 1939
जन्म भूमि म्यांमार
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेत्री, नर्तकी
पुरस्कार-उपाधि पद्मश्री, सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेत्री के लिए 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार
प्रसिद्धि बॉलीवुड की पहली आइटम गर्ल के तौर पर पहचानी जाने वाली अभिनेत्री हैं।
नागरिकता भारतीय
लोकप्रिय गाने महबूबा महबूबा- शोले (1975), पिया तू अब तो आजा...-कारवां (1971), मेरा नाम चिन चिन चू -हावडा ब्रिज (1958) आदि
अन्य जानकारी हेलन ने अपने पाँच दशक लंबे सिने करियर में लगभग 500 फ़िल्मों में अभिनय किया।

जीवन परिचय

हेलन का वास्तविक नाम हेलन रिचर्डसन खान है। हेलन का जन्म बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में 21 अक्तूबर 1939 को हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हेलन और उनका परिवार मुंबई आ गये। हेलन के पिता एंग्लो-इंडियन था, दूसरे विश्व युद्ध में पिता की मृत्यु हो गई और हेलन की माता का नाम बर्मीज था और वह बतौर नर्स कार्य करती थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण से हेलन ने स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी और परिवार के काम में हाथ बंटाने लगी। उन्होंने मणिपुरी, भरतनाट्यम, कथक आदि शास्त्रीय नृत्यों में भी शिक्षा हासिल की।

पहली सफल कोरस डांसर
हेलन सबसे पहले कोरस डांसर के रूप में 1951 में फ़िल्म "शबिस्तां" और "आवारा" में नजर आई थीं। बॉलीवुड की पहली आइटम गर्ल के तौर पर पहचानी जाने वाली अभिनेत्री हेलन ने बॉलीवुड का उस वक्त आइटम नंबर से परिचय कराया जब वो अपने शुरुआती दौर में था। उनको फ़िल्मों में लाने का श्रेय कुक्कू को जाता है, जो स्वयं उन दिनों फ़िल्मों में नर्तकी के रूप में नजर आती थीं। वर्ष 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म 'हावडा ब्रिज' हेलन के करियर की अहम फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म में उनपर फ़िल्माया यह गीत ‘मेरा नाम चिन-चिन चू’ उन दिनों दर्शकों के बीच काफ़ी मशहूर हुआ।

अभिनेत्री

साठ के दशक में हेलन बतौर अभिनेत्री अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करने लगी। इस दौरान उन्हें अभिनेता संजीव कुमार के साथ फ़िल्म ‘निशान’ में काम करने का मौक़ा मिला, लेकिन दुर्भाग्य से यह फ़िल्म सिनेमा घर में चल नहीं पाई। साठ और सत्तर के दशक मे आशा भोंसले हिन्दी फ़िल्मों की प्रख्यात नर्तक अभिनेत्री हेलन की आवाज़ मानी जाती थी। आशा भोंसले ने हेलन के लिये तीसरी मंज़िल में ‘ओ हसीना जुल्फों वाली’ फ़िल्म कारवां में ‘पिया तू अब तो आजा’ मेरे जीवन साथी में ‘आओ ना गले लगा लो ना’ और डॉन में ‘ये मेरा दिल यार का दीवाना’ गीत गाये।

लोकप्रियता

हेलन ने अपने पाँच दशक लंबे सिने करियर में लगभग 500 फ़िल्मों में अभिनय किया। इतने सालों के बाद भी उनके नृत्य का अंदाज़ भुलाए नहीं भूलता है। वर्ष 1975 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘शोले’ में आर. डी. बर्मन के संगीत निर्देशन में हेलन के ऊपर फ़िल्माया गीत ‘महबूबा महबूबा’ आज भी सिनेप्रेमियों को झूमने पर मजबूर कर देता है। हालांकि सत्तर के दशक में नायिकाओं द्वारा ही खलनायिका का किरदार निभाने और डांस करने के कारण हेलन को फ़िल्मों में काम मिलना काफ़ी हद तक कम हो गया।

वर्ष 1976 में महेश भट्ट के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘लहू के दो रंग’ में अपने दमदार अभिनय के लिए हेलन को सवश्रेष्ठ सहनायिका के फ़िल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ‘हेलन की नृत्य शैली’ से प्रभावित बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री साधना ने एक बार कहा था, "हेलन जैसी नृत्यांगना न तो पहले पैदा हुई है और ना ही बाद में पैदा होगी।"
मेरा नाम चिन चिन चू, रात चांदनी मैं और तू हल्लो मिस्टर हाऊ डू यू डू. . . "- हावडा ब्रिज (1958)
'पिया तू अब तो आजा...'- कारवां (1971)
‘ये मेरा दिल यार का दीवाना’ गीत गाये'- डॉन (1978)
"मूंगडा मूंगडा मैं गुड की ढली, मंगता है तो आजा रसिया नहीं तो मैं ये चली"- इंकार (1978)
"महबूबा महबूबा"-शोले (1975)
उल्लेखनीय फ़िल्में
हेलन के कार्यकाल की कुछ लोकप्रिय फ़िल्में आवारा, मिस कोको कोला, यहूदी, हम हिंदुस्तानी, दिल अपना और प्रीत पराई, गंगा जमुना, वो कौन थी, गुमनाम, ख़ानदान, जाल, ज्वैलथीफ, प्रिस, इंतक़ाम, द ट्रेन, हलचल, हंगामा, उपासना, अपराध, अनामिका, जख्मी, बैराग, ख़ून पसीना, अमर अकबर ऐंथोनी., द ग्रेट गैम्बलर, राम बलराम, शान, कुर्बानी, अकेला, खामोशी, हम दिल दे चुके सनम, मोहब्बते, मैरी गोल्ड आदि हैं।

पुरस्कार

"लहू के दो रंग" (1979)- सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेत्री का फ़िल्मफेयर पुरस्कार।
2006 में जैरी पिंटो ने हेलन के ऊपर एक किताब लिखी थी, जिसका शीर्षक था "द लाइफ एण्ड टाइम्स ऑफ इन एच-बोम्बे", जिसने 2007 का सिनेमा की बेहतरीन पुस्तक का राष्ट्रीय फ़िल्म अवार्ड जीता।
2009 में हेलन को पद्मश्री सम्‍मान से भी नवाजा गया है।

कुलभूषण खरबंदा

कुलभूषण खरबंदा
एक भारतीय अभिनेता हैं जो हिंदी और पंजाबी फिल्मों में काम करते हैं।
 
🎂जन्म 21 अक्टूबर 1944  

उन्हें शान (1980) में प्रतिपक्षी शाकाल के रूप में उनकी भूमिका के लिए जाना जाता है , 1960 के दशक में दिल्ली स्थित थिएटर ग्रुप 'यात्रिक' से शुरुआत करके, उन्होंने सई परांजपे के साथ फिल्मों की ओर रुख किया । 1974 में जादू का शंख। उन्होंने मुख्यधारा की हिंदी फिल्म उद्योग में काम करने से पहले कई समानांतर सिनेमा फिल्मों में काम किया। वह महेश भट्ट की क्लासिक अर्थ (1982), एक चादर मैली सी (1986), वारिस (1988), और दीपा मेहता की एलिमेंट्स त्रयी के तीनों भागों : फायर (1996), अर्थ (1998), और में दिखाई दिए। जल (2005)।लगभग दो दशकों के बाद उन्हें विनय शर्मा द्वारा निर्देशित आत्मकथा के निर्माण में कोलकाता के पदातिक थिएटर में थिएटर मंच पर देखा गया था।

व्यक्तिगत जीवन
खरबंदा की शादी माहेश्वरी नामक महिला से हुई है, जिसकी पहले कोटा के महाराजा से शादी हुई थी। राजस्थान के प्रतापगढ़ के महाराजा राम सिंह द्वितीय की बेटी के रूप में जन्मी माहेश्वरी ने 1965 में खरबंदा से शादी की। 

आजीविका
अपनी पढ़ाई के बाद उन्होंने और उनके कॉलेज के कुछ दोस्तों ने "अभियान" नामक एक थिएटर ग्रुप बनाया, और फिर दिल्ली स्थित "यात्रिक" में शामिल हो गए, जो 1964 में निर्देशक जॉय माइकल द्वारा स्थापित एक द्विभाषी थिएटर रिपर्टरी थी ; वह इसके पहले भुगतान प्राप्त कलाकार बन गए, हालांकि कुछ वर्षों के बाद यात्रिक का पतन हो गया क्योंकि निर्देशक अमेरिकी विश्वविद्यालयों में व्याख्यान दे रहे थे।तभी वह 1972 में कोलकाता चले गए और निर्देशक श्यामानंद जालान के अधीन हिंदी थिएटर करने वाले थिएटर ग्रुप "पदातिक" के साथ काम करना शुरू किया । यहां उन्होंने मुंबई और फिल्मों में जाने से पहले कुछ समय तक काम किया।

उन्हें पहली बार श्याम बेनेगल द्वारा निशांत (1974) में देखा गया , जिसके साथ उन्होंने मंथन (1976), भूमिका: द रोल (1977), जुनून (1978), और कलयुग (1980) सहित कई और फिल्मों में काम किया। जल्द ही वह समानांतर सिनेमा निर्देशकों के नियमित सदस्य बन गए , जैसे बी.वी. कारंत के साथ गोधुली (1977) में ।

रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित शान (1980) में गंजे खलनायक शाकाल की भूमिका निभाते हुए , उन्होंने बॉलीवुड की मुख्यधारा में अपना परिवर्तन देखा। खरबंदा शक्ति (1982), घायल (1990), जो जीता वही सिकंदर (1992) , गुप्त (1997), बॉर्डर (1997), यस बॉस (1997) और रिफ्यूजी (2000) में नजर आए । हालाँकि, उन्होंने स्मिता पाटिल और नसीरुद्दीन शाह के साथ चक्र (1981), शबाना आज़मी के साथ अर्थ (1982), बुद्धदेब दासगुप्ता की पहली हिंदी फिल्म अंधी गली (1984) ,  एक चादर जैसी कला फिल्मों में काम करना जारी रखा। मैली सी (1986), हेमा मालिनी के साथ, उत्सव (1984), गिरीश कर्नाड द्वारा , मंडी (1983), त्रिकाल (1985), सुस्मान (1987), श्याम बेनेगल द्वारा, नसीम (1995), सईद अख्तर मिर्जा द्वारा और मॉनसून वेडिंग (2001) मीरा नायर द्वारा निर्देशित ।

उन्होंने शशि कपूर की फिल्मवाला प्रोडक्शंस की ' कलयुग ' में रीमा लागू के पति और राज बब्बर के भाई की भूमिका निभाई । वह जोधा अकबर और लगान जैसी ऐतिहासिक फिल्मों में भी नजर आ चुके हैं । उनकी सबसे हालिया फिल्में आलू चाट और टीम: द फोर्स हैं । उन्होंने कई पंजाबी फिल्मों में काम किया है। उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म चैन परदेसी (1980) में नायक की भूमिका निभाई और पंजाबी कॉमेडी महौल ठीक है (1999) में अभिनय किया।

उन्होंने दीपा मेहता की छह फिल्मों और उनकी सभी त्रयी फिल्मों: अर्थ , फायर और वॉटर में अभिनय किया है । उन्होंने 2009 में एक जर्मन फिल्म की थी.

उन्होंने शन्नो की शादी और माही वे जैसे टीवी धारावाहिकों में अभिनय किया है ।

उन्हें तीन फरिश्ते , हत्या एक आकार की , बाकी इतिहास , एक शून्य बाजीराव , गिनी पिग , गिरधड़े , सखाराम बाइंडर और हाल ही में आत्मकथा जैसे नाटकों में मंच पर देखा गया है ।

शम्मी कपूर

शमशेर राज कपूर
प्रसिद्ध नाम शम्मी कपूर
🎂जन्म 21 अक्टूबर, 1931
जन्म भूमि मुम्बई, महाराष्ट्र
⚰️मृत्यु 14 अगस्त, 2011
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
अभिभावक पृथ्वीराज कपूर, रामसरनी रमा
पति/पत्नी गीता बाली, नीला देवी
संतान पुत्र- आदित्य राज और पुत्री- कंचन देसाई
कर्म भूमि मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म-क्षेत्र अभिनेता
मुख्य फ़िल्में 'ब्रह्मचारी', 'प्रोफेसर', 'चार दिल चार राहें', 'रात के राही', 'चाइना टाउन', 'दिल तेरा दिवाना', 'कश्मीर की कली' और 'ब्लफमास्टर'
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (ब्रह्मचारी), फ़िल्म फेयर लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, ज़ी सिने लाइफ़ टाइम अचीवमेंट, स्टार स्क्रीन लाइफ़ टाइम अचीवमेंट
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अपनी विशिष्ट याहू शैली के कारण बेहद लोकप्रिय रहे हिंदी फ़िल्मों के पहले सिंगिंग-डांसिग स्टार शम्मी कपूर रंगमंच के जाने-माने अदाकार और फ़िल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के दूसरे बेटे थे।
अद्यतन‎ 
13:13, 14 अगस्त 2013 (IST)
 2011) हिंदी सिनेमा के 1950-60 के दशक में सदाबहार अभिनेता थे। शम्मी का वास्तविक नाम शमशेर राज कपूर था। अपनी विशिष्ट याहू शैली के कारण बेहद लोकप्रिय रहे हिंदी फ़िल्मों के पहले सिंगिंग-डांसिग स्टार शम्मी कपूर रंगमंच के जाने-माने अदाकार और फ़िल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के दूसरे बेटे थे।

जीवन परिचय

वह महान् फ़िल्म अभिनेता और थिएटर कलाकार पृथ्वीराज कपूर और रामसरनी 'रमा' मेहरा के दूसरे पुत्र थे। पृथ्वीराज कपूर के दो और बेटे शशि कपूर और राजकपूर थे। शम्मी कपूर के परिवार में पत्नी नीला देवी, बेटा आदित्य राज और बेटी कंचन देसाई हैं।

अभिनय की शुरुआत
शम्मी कपूर ने वर्ष 1953 में फ़िल्म 'ज्योति जीवन' से अपनी अभिनय पारी की शुरुआत की। वर्ष 1957 में नासिर हुसैन की फ़िल्म 'तुमसा नहीं देखा' में जहां अभिनेत्री अमिता के साथ काम किया वहीं वर्ष 1959 में आई फ़िल्म 'दिल दे के देखो' में आशा पारेख के साथ नजर आए। बॉलीवुड के लिहाज़ से हालांकि वह बहुत सुंदर अभिनेता तो नहीं थे बावजूद इसके शम्मी कपूर अपने अभिनय क्षमता के बल पर सबके चहेते बने। वर्ष 1961 में आई फ़िल्म (जंगली) ने शम्मी कपूर को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। इस फ़िल्म के बाद ही वह सभी प्रकार की फ़िल्मों में एक नृत्य कलाकार के रूप में अपनी छवि बनाने में कामयाब रहे। 'जंगली' फ़िल्म का गीत 'याहू' दर्शकों को खूब पसंद आया। उन्होंने चार फ़िल्मों में आशा पारेख के साथ काम किया जिसमें सबसे सफल फ़िल्म वर्ष 1966 में बनी 'तीसरी आंख' रही। वर्ष 1960 के दशक के मध्य तक शम्मी कपूर 'प्रोफेसर', 'चार दिल चार राहें', 'रात के राही', 'चाइना टाउन', 'दिल तेरा दीवाना', 'कश्मीर की कली' और 'ब्लफमास्टर' जैसी सफल फ़िल्मों में दिखाई दिए। फ़िल्म 'ब्रह्मचारी' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला था।[१]

शुरुआती असफलता के बाद सफलता
'भारत के एल्विस प्रेसली' कहे जाने वाले शम्मी कपूर रुपहले पर्दे पर तब अपने अभिनय की शुरुआत की, जब उनके बड़े भाई राज कपूर के साथ ही देव आनंद और दिलीप कुमार छाए हुए थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद शम्मी का फ़िल्म जगत में प्रवेश 'रेल का डिब्बा' में मधुबाला, 'शमा परवाना' में सुरैया और 'हम सब चोर हैं' में नलिनी जयवंत के साथ अभिनय करने के बावजूद शुरुआत में सफल नहीं रहा। उनकी शुरुआती फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रहीं। उन्होंने पचास के दशक में 'डक-टेल' शैली में अपने बाल कटवाकर 'तुमसा नहीं देखा' के साथ खुद को नए लुक में पेश किया। उसके बाद उन्हें सफलता मिलती गई। 1961 में फ़िल्म 'जंगली' की सफलता के साथ ही पूरा दशक उनकी फ़िल्मों के नाम रहा। दर्शकों के बीच उनकी अपील 'सुकू सुकू', 'ओ हसीना जुल्फों वाली', 'आज कल तेरे-मेरे प्यार के चर्चे' और 'आ जा आ जा मैं हूं प्यार तेरा' जैसे गानों के चलते थी, जिनमें उन्होंने बड़ी ही मस्तमौला शैली में थिरकते हुए अदायगी दी। हालांकि, 'कश्मीर की कली', 'राजकुमार', 'जानवर' और 'एन इवनिंग इन पेरिस' जैसी कुछ फ़िल्मों में उनकी अभिनय क्षमता पर सवाल उठे लेकिन 'जंगली', 'बदतमीज', 'ब्लफ मास्टर', 'पगला कहीं का', 'तीसरी मंजिल' और 'ब्रह्मचारी' की बेहतरीन सफलता के जरिए शम्मी ने अपने आलोचकों के मुंह बंद कर दिए।

रॉकस्टार शम्मी

शम्मी कपूर ने अपनी फ़िल्मों में बग़ावती तेवर और रॉकस्टार वाली छवि से उस दौर के नायकों को कई बंधनों से आज़ाद कर दिया था। हिंदी सिनेमा को ये उनकी बड़ी देन थ। ये बात और है कि उनके जैसे किरदार दूसरा कोई नहीं निभा पाया। शम्मी कपूर बड़े शौकीन मिज़ाज थे। इंटरनेट की दुनिया में आगे रहते थे, तरह-तरह की गाड़ियाँ चलाने का शौक़ वे रखते थे, शाम को गोल्फ़ खेलना, समय के साथ चलना वे बख़ूबी जानते थे। फ़िल्मों में शम्मी कपूर जितने ज़िंदादिल किरदार निभाया करते थे, उतनी ही ज़िंदादिली उनके निजी जीवन में दिखती थी। उनके जीवन में कई मुश्किल दौर भी आए ख़ासकर तब जब 60 के दशक में उनकी पत्नी गीता बाली का निधन हो गया। तब वे अपने करियर के बेहद हसीन मकाम पर थे। शम्मी कपूर के क़दम तब कुछ ठिठके ज़रूर थे पर फ़िल्मी पर्दे के रंगरेज़ शम्मी अपने उसी अंदाज़ में अभिनय से लोगों को मदमस्त करते रहे।[३]

फ़िल्म निर्देशन
बढ़ते मोटापे के कारण शम्मी कपूर को बाद में फ़िल्मों में मुख्य भूमिकाओं से हटना पड़ा, लेकिन वे चरित्र अभिनेता के रूप में फ़िल्मों में काम करते रहे। उन्होंने 'मनोरंजन' और 'बंडलबाज' नामक दो फ़िल्मों का निर्देशन भी किया, लेकिन ये फ़िल्में नहीं चली। चरित्र अभिनेता के रूप में शम्मी कपूर को 1982 में 'विधाता' फ़िल्म के लिए श्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। शम्मी कपूर एक लोकप्रिय अभिनेता ही नहीं हरदिल अजीज इंसान भी थे।

सम्मान और पुरस्कार
सन 1968 में फ़िल्म 'ब्रह्मचारी' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला था।
चरित्र अभिनेता के रूप में शम्मी कपूर को 1982 में 'विधाता' फ़िल्म के लिए श्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला।
1995 में फ़िल्म फेयर लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला।
1999 में ज़ी सिने लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किये गये।
2001 में स्टार स्क्रीन लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाजे गये।
निधन
अपनी ख़ास ‘याहू’ शैली के कारण बेहद लोकप्रिय रहे शम्मी कपूर ने 14 अगस्त, 2011 को मुंबई के ब्रीज कैंडी अस्पताल में सुबह 5:41 बजे अंतिम सांस ली। बॉलीवुड फ़िल्मों में अपने विशिष्ट नृत्य और रोमांटिक अदाओं से अभिनेत्रियों का दिल जीतने वाले दिग्गज कलाकार शम्मी कपूर अपने पीछे ऐसी शैली छोड़ गये हैं, जिसे उनके प्रशंसक हमेशा याद रखेंगे।

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

कुमार शानू_केदारनाथ भट्टाचार्य

केदारनाथ भट्टाचार्य 
कुमार शानू
🎂जन्म 20 अक्टूबर 1957, 

पेशेवर रूप से इनका नाम कुमार शानू है, 
एक भारतीय पार्श्व गायक हैं जो मुख्य रूप से हिंदी फिल्मी गाने गाते हैं। हिंदी के अलावा, उन्होंने बंगाली , मराठी , नेपाली , असमिया , भोजपुरी , गुजराती , मणिपुरी , तेलुगु , मलयालम , कन्नड़ , तमिल , पंजाबी , उड़िया ,  छत्तीसगढ़ी , उर्दू , पाली , अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में भी गाने गाए हैं। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश दोनों में मूल भाषा बांग्ला । उनके पास 1991 से 1995 तक सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के लिए लगातार पांच फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने का रिकॉर्ड है। उनके पास 1993 से एक ही दिन में सबसे अधिक गाने रिकॉर्ड करने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड है।

भारतीय सिनेमा और संगीत में उनके योगदान के लिए उन्हें 2009 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था । उनके कई ट्रैक बीबीसी के "सभी समय के शीर्ष 40 बॉलीवुड साउंडट्रैक" में शामिल हैं।

प्रारंभिक जीवन 
कुमार शानू के पिता, पशुपति भट्टाचार्य, एक गायक और संगीतकार थे, उनका पैतृक घर और जन्म स्थान ढाका के पास विक्रमपुर (अब बांग्लादेश में ) था। वह आजीविका की तलाश में कलकत्ता चले गए और कुमार सानू का जन्म कलकत्ता में हुआ। दोनों और शानू की बड़ी बहन बिश्वनाथ पार्क के पास कलकत्ता (अब कोलकाता) के सिंथी इलाके में रहती थीं। कुमार शानू उत्तरी कोलकाता के सिंथी इलाके में गोपाल बोस लेन में पंचानन ताला में रहते थे।

कैरियर 

मुख्य लेख: कुमार शानू डिस्कोग्राफी और फिल्मोग्राफी
सानू ने अपने पार्श्व करियर की शुरुआत 1983 से सानू भट्टाचार्य के रूप में की। 1986 में, वह शिबली सादिक द्वारा निर्देशित बांग्लादेशी फिल्म तीन कन्या , में थे। उनका पहला प्रमुख बॉलीवुड गाना हीरो हीरालाल (1988) में था।

1989 में, जगजीत सिंह ने सानू को मुंबई के विमल बंगले में कल्याणजी से मिलवाया। उनके सुझाव पर, सानू ने अपना प्रारंभिक नाम "सानू भट्टाचार्य" से बदलकर अपने आदर्श किशोर कुमार के नाम पर "कुमार शानू" कर लिया। इसके बाद सानू मुंबई आ गए , जहां कल्याणजी-आनंदजी ने उन्हें फिल्म जादूगर में गाने का मौका दिया ।

1990 की फिल्म आशिकी के लिए सानू ने एक को छोड़कर सभी गाने गाए। उन्होंने सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक के रूप में अपना पहला रिकॉर्ड लगातार पांच फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। उनका अगला फिल्मफेयर पुरस्कार साजन (1991), दीवाना (1992), बाजीगर (1993)1942: ए लव स्टोरी (1994) फिल्मों के गानों के लिए आया । उन्होंने 1990 से 1994 के बीच गायन के लिए लगातार 5 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते।दो-दो शादी कर चुके हैं कुमार सानू, इस दिलकश हसीना के साथ भी जुड़ा था कुमार सानू ने पहली शादी रीता भट्टाचार्य से की थी. कहा जाता है कि उनकी पहली मुलाकात कोलकाता (तक कलकत्ता) में हुई थी. धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और मुंबई में दोनों ने शादी कर ली.1988 में कुमार सानू के घर बेटे जस्सी का जन्म हुआ. वहीं, कुछ समय बाद दो और बेटे जीको और जान हुए.कुछ समय बाद कुमार सानू की जिंदगी में अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्रि आईं. करीब तीन साल तक दोनों एक-दूसरे को डेट करते रहे. उस दौरान रीता ने कुमार सानू को तलाक दे दिया.जब मीनाक्षी शेषाद्रि और कुमार सानू अलग हो गए. इसके बाद गायक ने बीकानेर की सलोनी भट्टाचार्य से शादी की.अपनी लव लाइफ में भले ही कुमार सानू विवादों में घिरे रहे, लेकिन फिलहाल वह निजी जिंदगी में बेहद खुश हैं.

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...