रविवार, 17 सितंबर 2023

देव कुमार

देव कुमार
Dev Kumar(1930-1990)
देव कुमार का जन्म 1930 में हुआ था। देव कुमार एक अभिनेता और लेखक थे, जो Namak Halaal (1982), Mukti (1977) और Apradhi (1974) के लिए मशहूर थे। उनकी मृत्यु 17 सितंबर 1990 को हुई थी।

🎂जन्म1930 · Bombay, Bombay
 Presidency, British India

⚰️मृत्यु17 सितंबर 1990 · Bombay [now Mumbai], Maharashtra, भारत

उनके तीन बच्चे हैं जो हमारे जीवन में सभी सफल हैं। पहली संतान मनीषा की शादी दक्ष शेट्टी से हुई है। दूसरी बच्ची दिव्या का एक सफल व्यवसाय है। और तीसरे बच्चे रजनी की भी शादी हो चुकी है, उसकी शादी संजीव राजाध्याक्ष से हुई है और उनका एक बच्चा है जो अब 15 साल का उमा राजाध्याक्ष है। रजनी और संजीव दोनों पशु चिकित्सक हैं, उन दोनों का खार में स्मॉल एनिमल क्लिनिक नामक एक क्लिनिक है।
अपने करियर के लिए उनका नाम चमन लाल कोहली से बदलकर देव कुमार कर दिया।
जीवनी
देव कुमार का जन्म 1930 में बॉम्बे, बॉम्बे प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत में हुआ था। वह एक अभिनेता और लेखक थे, जिन्हें नमक हलाल (1982), मुक्ति (1977) और अपराध (1974) के लिए जाना जाता है। 17 सितंबर, 1990 को बॉम्बे [अब मुंबई], महाराष्ट्र, भारत में उनका निधन हो गया।
देव का जन्म 1928 में दामेली जिले के गाँव में हुआ था। झेलम (अब पाकिस्तान में है)।

अभिनेता बनने से पहले सेना, पुलिस बल और सीमा शुल्क एंटी स्मगलिंग में काम किया।

आज उनके पोते (पहली शादी से) की उसी जगह पर एक मेडिकल शॉप है (ऑप खन्ना सिनेमा)।

उनकी पहली पत्नी पहाड़गंज दिल्ली (खन्ना सिनेमा के सामने) रहती थी।

हसरत जय पूरी

प्रसिद्ध गीतकार,शायर हसरत जयपुरी के की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म 15 अप्रैल 1922, जयपुर
⚰️मृत्यु: 17 सितंबर 1999, मुंबई
बहन: कोसर जहां 
इनाम: फिल्म फेयर पुरस्कार _ सर्व श्रेष्ठ गीत कार
जन्म नाम: इकबाल अहमद मसऊदी
कला के क्षेत्र में विरासत मिलना बहुत आम है लेकिन, बड़े कलाकार वही बन पाते हैं जो विरासत को सजाने-संवारने में ठीक वैसी ही मशक्कत करते हैं जैसे कोई नया शागिर्द करे. यह बात गीतकार हसरत जयपुरी के लिए भी कही जा सकती है.

जयपुर में 15 अप्रैल, 1918 को जन्मे इकबाल हुसैन उर्फ़ हसरत जयपुरी को शायरी विरासत में मिली थी. उनके नाना फ़िदा हुसैन फ़िदा मशहूर शायर थे. लेकिन शेरो-शायरी को अपनी महबूबा की तरह अपने साथ टिकाये रखने के लिए हसरत को जो जद्दोजहद करनी पड़ी वह हर एक के लिए मुमकिन न थी. यह अलग बात है कि शायरी तो उनके जीवन में टिकी रही पर महबूबा या महबूबाएं नहीं.

वह 1940 का दौर था. कई अन्य महत्वपूर्ण गीतकारों, संगीतकारों और फिल्मकारों की तरह हसरत जयपुरी का भी आगमन फिल्म जगत में हुआ था. ‘बरसात’ फिल्म के बाद का वह कालखंड हसरत जयपुरी की जिंदगी का स्वर्णिम काल था जब उन्होंने ‘आह’, ‘अराउंड द वर्ल्ड’, ‘श्री 420’ और ‘मेरा नाम जोकर’ के गीतों से धूम मचा दी थी.

एक शायर से लेकर बस कंडक्टर बनने, मिट्टी के खिलौने बेचने वाले से फैक्ट्री में मजदूरी करने और इस मजदूरी से लेकर आरके बैनर तले आने तक का हसरत जयपुरी का सफ़र बड़ा दिलचस्प है

अहसानमंदी और गैरतमंदी हसरत जयपुरी के व्यक्तित्व के दो सबसे मजबूत पक्ष थे. वे राज कपूर से लेकर अपने जयपुर के बालपन के मित्रों तक के ताउम्र आभारी रहे. राजकपूर ने उन्हें फिल्मों में पहला ब्रेक दिया था तो बाकी दोस्तों ने इससे पहले उनके गुरबत के दिनों में मुंबई आने के किराए से लेकर जूते-चप्पल और कपड़ों तक की व्यवस्था की थी. और इस अहसान को उन्होंने एक फ़िल्मी सिचुएशन में ही सही, पर क्या खूब अदा किया -‘अहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तो...’ उनके गैरतमंद होने की बात को कुछ यूं समझा जा सकता है कि राज कपूर की मृत्यु के बाद उनके लिए 5000 रुपये का वजीफा तय किया गया था लेकिन, इसे लेने का उनका मन नहीं हुआ तो नहीं हुआ.

एक शायर से लेकर बस कंडक्टर बनने, मिट्टी के खिलौने बेचने वाले से लेकर फैक्ट्री में मजदूरी करने और इस मजदूरी से लेकर आरके बैनर तले आने तक का हसरत जयपुरी का सफ़र बड़ा दिलचस्प है. हसरत ने जितने मन से गीत और शायरी लिखी, उतनी ही दिलचस्पी से वे अपने हर छोटे-बड़े कामों को भी निभाते रहे.

जयपुर से मुंबई आने के बाद के आठ साल तक चले बस कंडक्टरी के सफ़र को हसरत बड़े ही दिलचस्प ढंग से और मोह से भरकर लगभग हर इंटरव्यू में याद करते थे. इसकी भी एक खास वजह थी. हसरत जयपुरी खूबसूरत चेहरों के कायल थे और हसीन शक्लों के दीदार के लिए बस से बेहतर जगह और कौन सी हो सकती थी! इनमें वे अपनी जयपुर में छूट चुकी खूबसूरत प्रेमिका राधा के अक्स तलाशते फिरते. यहां उनके भीतर के शायर को भरपूर खाद-पानी मिलता रहता. वे दिन भर बस में कंडक्टरी करते और रातों को जागकर उन हसीन चेहरों की याद में गजलें लिखते. सबसे दिलचस्प बात यह कि बस में चढ़ने वाली खूबसूरत सवारियों से उन्होंने कभी किराया नहीं लिया. शायद इसलिए कि उन शक्लों को देखकर उपजने वाले गीत अमूल्य हुआ करते थे.

पृथ्वीराज कपूर ने किसी मुशायरे में हसरत जयपुरी को अपनी कविता ‘मजदूर की लाश’ पढ़ते हुए सुना था. इसी के बाद उन्होंने राज कपूर को उनका नाम सुझाया था

फिल्म गीतकार होने से बहुत पहले हसरत एक मुकम्मल शायर थे. और उनकी यही खूबी उनको प्रतिष्ठित आरके बैनर में शामिल करने का सबब बनी. पृथ्वीराज कपूर ने किसी मुशायरे में उन्हें अपनी कविता ‘मजदूर की लाश’ पढ़ते सुन लिया था. इसे उन्होंने अपने साथ फुटपाथ पर रात बिताने वाले मित्र की मृत्यु पर लिखा था. उन्होंने ही राज कपूर को मशविरा दिया कि हसरत बहुत अच्छा गीत लिखते हैं और वे चाहें तो उन्हें आरके बैनर में शामिल कर सकते हैं. इसके बाद राज कपूर ने उनकी शायरी सुनी. फिर उस लोकगीत पर आधारित धुन शंकर जयकिशन के माध्यम से उन्हें सुनवाई जिसके बोल थे - ‘अमुवा का पेड़ है, वही मुंडेर है. आजा मोरे बालमा तेरा इंतजार है.’ धुन में बंध लिखने की हसरत जयपुरी की यात्रा यहीं से शुरू हुई. इसी तर्ज पर उनका पहला गीत तैयार हुआ - ‘जिया बेकरार है, छाई बहार है, आजा मोरे बालमा तेरा इंतजार है.’

हसरत के लिए फिल्मों में गीत लिखने की यह शुरुआत थी लेकिन गीत-गजल वे इससे पहले भी लिख रहे थे. इन सब में प्रेम के अलग-अलग रंगों को अलग अंदाज में पिरोया गया था. उनके ये सारे गीत-गजल गायकों की पहली पसंद तो बने ही बने फिल्मों में भी उनका प्रयोग धड़ल्ले से होता रहा - ‘ऐ मेरी जाने गजल, चल मेरे साथ ही चल’, ‘जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते’, ‘हम रातों को उठ-उठ के जिनके लिए रोते हैं’ और ‘नजर मुझसे मिलाती हो तो तुम शरमा सी जाती हो’, जैसे खूब प्रसिद्ध हुए गीत-गजल इसका पुख्ता उदाहरण हैं.

खुद उन्होंने भी पहले से अपनी लिखी कविताओं और गीतों का प्रयोग फिल्मों में खूब किया. मुंबई आने से पहले की अपनी कथित प्रेमिका ‘राधा’ के लिए लिखा पहला प्रेम पत्र - ‘ये मेरा प्रेमपत्र पढ़कर…’ जहां संगम फिल्म की जान बना, वहीं तबके नौजवानों के लिए उनके प्रेम का मेनिफेस्टो जैसा कुछ भी. बात यहीं ख़त्म नहीं हुई. इसी फिल्म के दूसरे गाने ‘ मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना का...’ में बाकायदा उस पूरे परिदृश्य और नाम ‘राधा’ का भी इस्तेमाल गया. इन गीतों को सुनें तो ऐसा लगता है मानो हसरत ने अपनी जिंदगी के हर क्षण को करीने से संजोकर रखा था और जब भी मौका मिला तो उसे गीत में बदल दिया. इसका एक और उदाहरण बेटे अख्तर के जन्म के बाद उसके लिए लिखा गया गया प्यारा सा गीत –‘तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को...’ है. विदेश की किसी पार्टी में किसी को देखकर उनके मन में अचानक ही यह खयाल भी आया था - ‘बदन पे सितारे लपेटे हुए’.

हसरत जयपुरी किसी खास तरह के गाने या फिर खाने के लेखक नहीं थे. उनके पास न साहिर वाली तल्खी थी, न फैज या कैफ़ी वाली गहराई. हां दिलकशी और जिंदादिली भरपूर थी. जिंदगी के बहुत कटु और निम्न कहे जाने वाले जीवन अनुभव थे. यहां घोर कलात्मकता नहीं थी पर वह सादादिली और दिलकशी थी जो कड़वे से भी मीठा कुछ निकाल लेती है. रूमानियत उनका सहज स्वभाव थी.

हसरत जयपुरी के शोखी-शरारत भरे चुलबुले शब्द मुकेश की आवाज और राज कपूर की शख्सियत पर कुछ ऐसे फबते थे जैसे परदे पर कोई जादू सा साकार हो रहा हो. इस तिकड़ी में कोई ऐसा तिलिस्म था कि भाव, शब्द आवाज और अदाकारी एक हो जाते थे. उदाहरण के तौर पर - ‘हां मैंने भी प्यार किया...’, ‘ये चांद खिला, ये तारे हंसे…’ जैसे न जाने कितने गीत याद आते हैं.

हसरत साहब की खासियत थी कि उनके एकल गीतों में भी यह जादू खोया नहीं. ‘आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें...’, ‘जाऊं कहां बता ऐ दिल...’, ‘दीवाना मुझ को लोग कहें...’, ‘दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन समाई...’, ‘हम छोड़ चले हैं महफ़िल को..’ ये और ऐसे ही कई गीत हर दर्द और तकलीफ में हमें सहज ही याद आते हैं या इन्हें सुनते हुए हम अपनी तकलीफें याद कर लेते हैं.

किसी भी धारा में बहकर और बटकर न लिखने वाला यह लेखक शब्दों से खेलते हुए किसी कुम्हार की तरह नए-नए प्रयोग रचता रहा. वह चाहे शब्दों में तोड़मोड़ हो या अपनी परंपरा से छूट लेकर किए जाने वाले प्रयोग. पहेलियों और लोक-कथाओं के आधार पर रचा गया ‘मेरा नाम जोकर’ का यह गीत - ‘तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर...’ या फिर ‘ईचक दाना बीचक दाना दाने ऊपर दाना...’ सब इसी नया गढ़ने का कौतुक थे.

फिल्मी दुनिया में हसरत जयपुरी के बारे में एक धारणा बन गई थी वे जिस फिल्म का शीर्षक गीत लिखेंगे उसका बेशुमार सफल होना तय है

यही नहीं जो शब्द अब तक कहीं अस्तित्व ही नहीं रखते थे, उन्हें भी गीतों में पिरोकर हसरत जयपुरी ने न सिर्फ उन्हें नए अर्थ दिए बल्कि उनमें मिठास घोल दी. क्या हममें से कोई, ‘रम्मैया वस्तावैया’ या फिर ‘शाहेखुबा’ या ‘जाने-जनाना’ का कोई मुकम्मल अर्थ जानता है? पर गीतों में ये शब्द सार्थक और सजीव हो जाते हैं. दाग के इस मिसरे - ‘तुम मेरे साथ होते हो, गोया कोई दूसरा नहीं होता’ में जब हसरत ‘शाहे खुबा’ और ‘जाने-जनाना’ का तड़का लगाते हैं तो वह कुछ और ही हुआ जाता है. शायद आम लोगों के हिस्से का कुछ. बाद इसके भी कभी जब कहीं शास्त्रीय रचने की जरूरत हुई तो - ‘अजहूं न आए बालमां, सावन बीता जाए…’ और ‘दाग न लग जाए...’ जैसे कई अविस्मरणीय गीत भी उनके ही खाते में आए

फिल्मों के लिए शीर्षक गीत लिखना सबसे कठिन माना जाता है पर हसरत जयपुरी ने इस मुश्किल को कुछ इस सादगी से अंजाम दिया कि एक धारणा सी बन गई थी कि हसरत जिस फिल्म का शीर्षक गीत लिखेंगे उसका बेशुमार सफल होना तय है. यह बस यूं ही नहीं था.ऐसे गीतों का एक लंबा सिलसिला था जिसमें - दीवाना मुझको लोग कहें (दीवाना), दिल एक मंदिर है (दिल एक मंदिर), रात और दिन दिया जले (रात और दिन), एक घर बनाऊंगा (तेरे घर के सामने), दो जासूस करें महसूस (दो जासूस), एन ईवनिंग इन पेरिस (एन इवनिंग इन पेरिस) जैसे न जाने कितने गीत शामिल थे.

1971 तक आरके बैनर की यह मंडली (राज कपूर, हसरत जयपुरी, शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन) बदस्तूर चलती रही. कहा जाता है कि एक ही म्यान में दो तलवारें कभी नहीं होती. संगीतकारों और फिल्म लेखकों की जोड़ियां बनना तो हमारे यहां परंपरा सरीखा है लेकिन आरके के बैनर की म्यान में दो गीत लेखकों (तलवारों) का साथ होना किसी अजूबे से कम नहीं था. शैलेंद्र और हसरत जयपुरी दोनों ही टक्कर के प्रतिभाशाली थे और हद दर्जे के संवेदनशील भी. राज कपूर की छतरी के अंदर और बाहर भी वे बार-बार आमने-सामने होते रहे. जैसे ‘हरियाली और रास्ता में’- ‘बोल मेरी तकदीर में क्या है... (हसरत)’, इब्तिदाये इश्क में हम… (शैलेन्द्र)’ , ‘अराऊंड दि वर्ल्ड’ में – ‘दुनिया की सैर कर लो… (शैलेन्द्र)’, ‘चले जाना जरा ठहरो…(हसरत)’. ‘संगम’ – ‘हर दिल जो प्यार करेगा…(शैलेन्द्र)’, ‘ये मेरा प्रेमपत्र पढकर… (हसरत)’. ऐसे और भी मौके आए लेकिन इन दोनों के लिए यह गलाकाट प्रतिस्पर्धा नहीं थी. यदि हम इनके गीतों को देखों तो लगता है कि कहीं न कहीं दोनों ने एक दूसरे को और बेहतर लिखने के लिए ही प्रेरित किया होगा. यह रिश्ता किसी भी क्षेत्र के दो प्रतिस्पर्धियों के लिए एक आदर्श कहा जा सकता है.

जो शब्द अब तक कहीं अस्तित्व ही नहीं रखते थे, उन्हें भी गीतों में पिरोकर हसरत जयपुरी ने न सिर्फ उन्हें नए अर्थ दिए बल्कि उनमें मिठास घोल दी, जैसे - रम्मैया वस्तावैया

1971 से इस चौकड़ी में बिखराव शुरू हो गया. शैलेन्द्र ने ‘तीसरी कसम’ बनाई लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली. शैलेंद्र इसी सदमे में चल बसे. फिर एक बीमारी के चलते जयकिशन की भी मौत हो गई. हसरत जयपुरी को इसका सबसे ज्यादा धक्का लगा. अब चुप्पी उन पर हावी होने लगी थी

उधर ‘मेरा नाम जोकर’ की असफलता ने राज कपूर को भी हिलाया था पर वे फिर उठ खड़े हुए थे. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आनंद बक्षी की नई टीम बनाकर वे फिर फिल्मी दुनिया को रंगने लगे थे. मुकेश का जाना भी इसी दरम्यान हुआ.

इस दौर में हसरत के शब्द जैसे चुक गए थे. ‘राम तेरी गंगा मैली’ का शीर्षक गीत उनके हाथ नहीं आया. इसके लिए उन्होंने ‘सुन साहिबा सुन...’ जरूर लिखा था. फिर तकरीबन दस साल के बाद उनके पास शीर्षक गीत लिखने का मौका आया. आरके स्टूडियो की फिल्म हिना के लिए उन्होंने ‘मैं हूं खुशरंग हिना...’ लिखा था. उनके लिखे तमाम शीर्षक गीतों की तरह इस फिल्म और गीत ने फिर कामयाबी का वही इतिहास दुहराया. बाद में भी उन्होंने कुछेक फिल्मों के लिए गाने लिखे लेकिन यह दौर उनका नहीं था. फिर भी जो कुछ वे अपने दौर में फिल्म संगीत के लिए लिख गए वह हमेशा कायम रहने वाला है.

हसरत जयपुरी ने तीन दशक लंबे अपने सिने कैरियर में 300 से अधिक फिल्मों के लिये लगभग 2000 गीत लिखे। अपने गीतों से कई वर्षो तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाला यह शायर और गीतकार 17 सिंतबर 1999 को संगीतप्रेमियों को अपने एक गीत की इन पंक्तियों ...तुम मुझे यूं भूला ना पाओगे...

जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे ..

की स्वर लहरियों में छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

एम एस सुब्बा लक्ष्मी

एम एस सुब्बुलक्ष्मी

जन्म नाम मदुरै शनमुखावदिवु सुब्बुलक्ष्मी
🎂जन्म 16 सितंबर 1916
मदुरै , मद्रास प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत

⚰️मृत 11 दिसंबर 2004
चेन्नई , तमिलनाडु , भारत

शैलियां भारतीय शास्त्रीय संगीत
व्यवसाय शास्त्रीय गायक
आप ने छोटी आयु से संगीत का शिक्षण आरंभ किया और दस साल की उम्र में ही अपना पहला डिस्क रिकॉर्ड किया। इसके बाद आपनी मा शेम्मंगुडी श्रीनिवास अय्यर से कर्णाटक संगीत में, तथा पंडित नारायणराव व्यास से हिंदुस्तानी संगीत में उच्च शिक्षा प्राप्त की। आपने सत्रह साल की आयु में चेन्नई ही विख्यात 'म्यूज़िक अकाडमी' में संगीत कार्यक्रम पेश किया। इसके बाद आपने मलयालम से लेकर पंजाबी तक भारत की अनेक भाषाओं में गीत रिकॉर्ड किये।
अभिनय
श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी ने कई फ़िल्मों में भी अभिनय किया। इनमें सबसे यादगार है १९४५ के मीरा फ़िल्म में आपकी मुख्य भूमिका। यह फ़िल्म तमिल तथा हिन्दी में बनाई गई थी और इसमें आपने कई प्रसिद्ध मीरा भजन गाए।

विजय पाटिल

विजय पाटिल (मूल नाम)
प्रसिद्ध नाम रामलक्ष्मण
🎂जन्म 16 सितंबर, 1942
जन्म भूमि ?
⚰️मृत्यु 22 मई, 2021
मृत्यु स्थान नागपुर, महाराष्ट्र
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'मैंने प्यार किया', 'हम आपके हैं कौन', 'हम साथ साथ हैं', ‘पत्थर के फूल’, ‘100 डेज’, ‘प्रेम शक्ति’, ‘मेघा’ और ‘तराना’ आदि।
विद्यालय भातखंडे शिक्षण संस्थान
प्रसिद्धि संगीतकार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी मराठी फिल्ममेकर और अभिनेता दादा कोंडके ने रामलक्ष्मण को अपनी फिल्म 'पांडु हवलदार' के लिए बतौर संगीतकार साइन किया था। इसके बाद सूरज बड़जात्या की फिल्मों में उन्होंने कई हिट गाने दिए।
आप जगत के प्रसिद्ध संगीतकार थे। राजश्री प्रोडक्शंस की ब्लॉकबस्टर फ़िल्में- 'मैंने प्यार किया', 'हम आपके हैं कौन' और 'हम साथ साथ हैं' में किये गये अपने काम के लिए वह विशेषतौर पर जाने जाते हैं। संगीतकार रामलक्ष्मण का असली नाम 'विजय पाटिल'  था। वह संगीतकार जोड़ी राम-लक्ष्मण में से एक लक्ष्मण थे। जबकि उनके जोड़ीदार राम यानी की राम सुरेंद्र थे। राम सुरेंद्र की मृत्यु के बाद विजय पाटिल यानी लक्ष्मण ने अपने नाम के साथ राम भी जोड़ लिया और इस प्रकार वह रामलक्ष्मण के नाम से भी जाने-पहचाने गये। उन्होंने 70 से अधिक फिल्मों में संगीत दिया। हिंदी फिल्मों के अलावा रामलक्ष्मण ने मराठी और भोजपुरी फिल्मों के लिए भी काम किया था। रामलक्ष्मण की मुख्य फिल्मों में ‘मैंने प्यार किया’, ‘पत्थर के फूल’, ‘100 डेज’, ‘प्रेम शक्ति’, ‘मेघा’, ‘तराना’, ‘हम आपके हैं कौन’ और ‘हम साथ साथ हैं’ सहित अन्य हैं।
उन्होंने 70 से फिल्मों में संगीत दिया। उन्होंने अपने पिता और चाचा से संगीत की शिक्षा ली थी। बाद में उन्होंने 'भातखंडे शिक्षण संस्थान' में संगीत का अध्ययन किया। हिंदी फिल्मों के अलावा रामलक्ष्मण ने मराठी और भोजपुरी फिल्मों के लिए भी काम किया था। रामलक्ष्मण पहले इंडस्ट्री में ‘लक्ष्मण’ के नाम से जाने जाते थे। इस बीच उन्होंने एक अन्य संगीतकार 'राम' के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया। हिंदी सिनेमा जगत में राम-लक्ष्मण मिलकर संगीत देते थे। लेकिन साल 1976 में फिल्म ‘एजेंट विनोद’ (1977) में गाना गाने के बाद अचानक संगीतकार राम का निधन हो गया और इसके बाद संगीतकार लक्ष्मण उर्फ विजय पाटिल ने अपना पूरा नाम रामलक्ष्मण रख लिया।

कॅरियर
रामलक्ष्मण ने करीब 150 फिल्मों में संगीत दिया था, जिसमें हिंदी के अलावा मराठी और भोजपुरी भी शामिल है। मराठी फिल्ममेकर और अभिनेता दादा कोंडके ने उन्हें अपनी फिल्म 'पांडु हवलदार' के लिए बतौर संगीतकार साइन किया था। इसके बाद सूरज बड़जात्या की फिल्मों में उन्होंने कई हिट गाने दिए।  'मैंने प्यार किया' (1989)' के गाने सुपरहिट हुए थे। इसके बाद 'हम आपके हैं कौन (1994)' और 'हम साथ साथ हैं' (1999) में भी उन्होंने संगीत दिया था। इस फिल्म के सारे गाने लोग आज भी बहुत पसंद करते हैं। इसके अलावा उन्होंने 'एजेंट विनोद', 'तराना' और 'अनमोल' जैसी फिल्मों में भी संगीत दिया।

अपने चार दशक से अधिक लंबे कॅरियर में उन्होंने हिंदी, मराठी और भोजपुरी में 150 से अधिक फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया और मनमोहन देसाई, महेश भट्ट, जीपी सिप्पी, अनिल गांगुली और सूरज बड़जात्या जैसे प्रसिद्ध फिल्म निर्देशकों के साथ काम किया।

रामलक्ष्मण के निधन पर 'स्वर कोकिला' लता मंगेशकर ने भी शोक जताया। दिग्गज गायिका ने संगीतकार लक्ष्मण के निधन पर दु:ख जताते हुए लिखा, 'मुझे अभी पता चला कि बहुत गुणी और लोकप्रिय संगीतकार रामलक्ष्मण जी का स्वर्गवास हो गया है। ये सुन के मुझे बहुत दु:ख हुआ। वो बहुत अच्छे इंसान थे। मैंने उनके कई गाने गाए जो बहुत लोकप्रिय हुए। मैं उनको विनम्रतापूर्ण श्रद्धांजलि अर्पण करती हूं।'

प्रसून जोशी कवि

प्रसून जोशी

🎂जन्म 16 सितम्बर, 1968
जन्म भूमि अल्मोड़ा, उत्तराखंड
अभिभावक देवेन्द्र कुमार जोशी और सुषमा जोशी
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र गीतकार, लेखक
शिक्षा एम.एस.सी, एम. बी.ए.
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्म 'तारे ज़मीं पर' के गाने 'मां...' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, शैलेंद्र सम्मान आदि
प्रसिद्धि 'दिल्ली.6’, ‘तारे ज़मीन पर’, ‘रंग दे बस्ती’, ‘हम तुम’ और ‘फना’ जैसी फ़िल्मों में कई सुपरहिट गाने लिखे हैं।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी प्रसून जोशी विज्ञापन जगत् में "विज्ञापन गुरु" के नाम से विख्यात तो हैं ही इसके साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापन कंपनी 'मैकऐन इरिक्सन' में कार्यकारी अध्यक्ष हैं। सिनेमा के प्रसिद्ध गीतकार हैं। प्रसून जोशी विज्ञापन जगत् में 'विज्ञापन गुरु' के नाम से विख्यात तो हैं ही, इसके साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापन कंपनी 'मैकऐन इरिक्सन' में कार्यकारी अध्यक्ष हैं। वे इस कंपनी का एशिया महाद्वीप में सजृनात्मक निदेशक की भूमिका निभा रहे हैं। इन व्यवसायिक गतिविधियों के साथ-साथ वे संवेदनशील लेखक, बॉलीवुड में गीत और गज़लों के रचियताओं में उनका नाम शीर्ष पर है। सुपरहिट फ़िल्म ‘तारे ज़मीन पर’ के गाने ‘मां...’ के लिए उन्हें 'राष्ट्रीय पुरस्कार' भी मिल चुका है।
परिचय
प्रसून जोशी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले में 16 सितम्बर, 1968 को हुआ था। प्रसून जोशी का पैतृक गाँव दन्या, ज़िला अल्मोड़ा है। प्रसून जोशी के पिता का नाम श्री देवेन्द्र कुमार जोशी और उनकी माता का नाम श्रीमती सुषमा जोशी है। उनका बचपन एवं उनकी प्रारम्भिक शिक्षा  टिहरी, गोपेश्वर, रुद्रप्रयाग, चमोली एवं नरेन्द्रनगर में हुई क्योंकि उनके पिता उत्तर प्रदेश सरकार में 'शिक्षा निदेशक' थे और उनका  कार्यकाल अधिकतर इन्हीं जगहों पर रहा। प्रसून जोशी बचपन से ही प्रकृति, सृष्टि द्वारा सृजित चीजों एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति आकर्षित रहे। इसलिए लेखन उनके स्वभाव में स्वत: ही प्रवेश कर गया। बचपन में वे खुद की हस्तलिखित पत्रिका भी निकालते थे और इस प्रकार लेखन उनका शौक़ बना। जहां तक गीतों की रचना का प्रश्र है उनके माता-पिता संगीत के बहुत ज्ञाता थे। जब उन्होंने उनसे संगीत विरासत में ग्रहण किया और वे उसकी बारिकियों से वाकिफ़ हुए तो फिर वो गीतों के रचनाकार बने। बड़े होकर जब प्रसून जोशी ने व्यवसायिक शिक्षा (एमबीए) पूरी की तब उन्हें लगा कि  उन्हें सृजन को दूसरे माध्यम से भी आगे बढ़ाना चाहिए। यह माध्यम विज्ञापन के अलावा दूसरा नहीं था। काम चाहे लेखन का हो या विज्ञापन का दोनों ही अपनी बात को दूसरों के दिलों तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है।
शिक्षा
प्रसून जोशी की प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा उत्तराखण्ड के गोपेश्वर एवं नरेन्द्रनगर में हुई। उन्होंने एम.एससी., के बाद एम.बी.ए. की पढ़ाई भी की।

शास्त्रीय संगीत की दीक्षा
गीतकार प्रसून के लिखे गीतों से हम सब वाकिफ हैं, पर बहुत कम लोग जानते है कि वो उन्होंने उस्ताद हफीज़ अहमद खान से शास्त्रीय संगीत की दीक्षा भी ले रखी है। उनके उस्ताद उन्हें ठुमरी गायक बनाना चाहते थे। उन दिनों को याद कर प्रसून बताते हैं कि उनके पास रियाज़ का समय नहीं होता था, तो बाईक पर घर लौटते समय गाते हुए आते थे और उनका हेलमेट उनके लिए "अकॉस्टिक" का काम करता था।
कार्य क्षेत्र
प्रसून संगीत को अपना उपार्जन नहीं बना पाये। उनके पिता उन्हें प्रशासन अधिकारी बनाना चाहते थे, पर ये उनका मिज़ाज नहीं था, तो MBA करने के बाद आखिरकार विज्ञापन की दुनिया में आकर उनकी रचनात्मकता को ज़मीन मिली। बचपन से उन्हें हिन्दी और उर्दू भाषा साहित्य में रुचि थी। उनके शहर रामपुर के एक पुस्तकालय में उर्दू शायरों का जबरदस्त संकलन मौजूद था। मात्र 17 साल की उम्र में उनका पहला काव्य संकलन आया। कविता अभी भी उनका पहला प्रेम है। प्रसून मानते हैं कि यदि संगीत के किसी एक घटक की बात की जाए जो आमो ख़ास सब तक पहुँचता हो और जहाँ हमने विश्व स्तर की निरंतरता बनाये रखी हो तो वो गीतकारी का घटक है। 50 के दशक से आज तक फ़िल्म जगत् के गीतकारों ने गजब का काम किया है। "हम तुम", "फ़ना" और "तारे ज़मीन पर" जैसी फ़िल्मों के गीत लिख कर फ़िल्म फेयर पाने वाले प्रसून तारे ज़मीन पर के अपने सभी गीतों को अपनी बेटी ऐश्निया को समर्पित करते हैं, और बताते हैं कि किस तरह एक 80 साल के बूढे आदमी ने उनके लिखे "माँ" गीत की तारीफ करते हुए उनसे कहा था कि वो अपनी माँ को बचपन में ही खो चुके थे, गाने के बोल सुनकर उन्हें उनका बचपन याद आ गया। ए. आर. रहमान के साथ गजनी में काम कर रहे प्रसून से जब रहमान गीत को आवाज़ देने की "गुजारिश" की तो प्रसून ने बड़ी आत्मीयता से कहा कि जिस दिन आप धाराप्रवाह हिन्दी बोलने लगेंगे उस दिन मैं आपके लिए अवश्य गाऊंगा.देखते हैं वो दिन कब आता है।

उपलब्धियां
राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापनों में पुरस्कार। शुभा मुदगल तथा ‘सिल्क रूट’ के ऊपर चार सुपर हिट ‘एलबम्स’ में धुन रचना के लिए पुरस्कार। फ़िल्म ‘लज्जा’, ‘आँखें’, ‘क्यों’ में संगीत दिया। तीन पुस्तकें प्रकाशित कीं। ‘ठण्डा मतलब कोका कोला’ एवं ‘बार्बर शॉप-ए जा बाल कटा ला’ जैसे प्रचलित विज्ञापनों हेतु अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिली।

सम्मान और पुरस्कार
मशहूर गीतकार प्रसून जोशी को इस क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए आज यहां 'शैलेंद्र सम्मान' प्रदान किया गया। युवा गीतकार प्रसून ने ‘दिल्ली.6’, ‘तारे ज़मीन पर’, ‘रंग दे बस्ती’, ‘हम तुम’ और ‘फना’ जैसी फ़िल्मों के लिए कई सुपरहिट गाने लिखे हैं। यह सम्मान पाने के बाद प्रसून कैफ़ी आज़मी और गुलज़ार की कतार में शामिल हो गये। इन लोगों को पहले शैलेंद्र सम्मान मिल चुका है।
उन्होंने कई हिंदी फ़िल्मों के लिए गाने भी लिखे हैं। सुपरहिट फ़िल्म ‘तारे ज़मीन पर’ के गाने ‘मां...’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

डाली सोही

डॉली सोही धनोवा एक भारतीय टेलीविजन अभिनेत्री हैं, जिन्हें भाभी, कलश जैसे शो में मुख्य भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है।मेरी आशिकी तुम से ही और खूब लड़ी मर्दानी झाँसी की रान जैसे शो के साथ डॉली ने टेलीविजन पर वापसी की।
🎂जन्म की तारीख और समय: 15 सितंबर 1975 

जसपाल भट्टी

जसपाल भट्टी हिन्दी टेलिविज़न और सिनेमा के एक जाने-माने हास्य अभिनेता, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक थे।उन्होंने पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली, लेकिन बाद में वे नुक्कड़ थिएटर आर्टिस्ट बन गए.
🎂जन्म: 03 मार्च 1955, अमृतसर
⚰️मृत्यु: 25 अक्तूबर 2012, शाहकोट
पत्नी: सविता भट्टी (विवा. 1985–2012)
बच्चे: जसराज भट्टी, राबिया भट्टी
माता-पिता: सरदार नरिंदर सिंह भट्टी, मंजित कौर कैलर

हिन्दी टेलिविज़न और सिनेमा के एक जाने-माने हास्य अभिनेता, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक थे।उन्होंने पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली  लेकिन बाद में वे नुक्कड़ थिएटर आर्टिस्ट बन गए. व्यंग-चित्रकार (कार्टूनिस्ट) जसपाल भट्टी, 80 के दशक के अंत में दूरदर्शन की नई प्रातःकालीन प्रसारण सेवा में उल्टा-पुल्टा कार्यक्रम के माध्यम से प्रसिद्ध हुए थे।उनके इस सबसे लोकप्रिय फ़्लॉप शो को उनकी उनकी पत्नी सविता भट्टी ने प्रोड्यूस किया साथ ही उसमें अभिनय भी किया| इस शो से इससे पहले जसपाल भट्टी चण्डीगढ़ में द ट्रिब्यून नामक अख़बार में व्यंग्य चित्रकार के रूप में कार्यरत थे। एक व्यंग्य चित्रकार होने के नाते इन्हे आम आदमी से जुड़ी समस्याओं और व्यवस्था पर व्यंग्य के माध्यम से चोट करने का पहले से अनुभव था। अपनी इसी प्रतिभा के चलते उल्टा-पुल्टा को जसपाल भट्टी बहुत रोचक बना पाए थे। 90के दशक के प्रारम्भ में जसपाल भट्टी दूरदर्शन के लिए एक और टेलीविज़न धारावाहिक, फ्लॉप शो लेकर आए जो बहुत प्रसिद्ध हुआ और इसके बाद जसपाल भट्टी को एक कार्टूनिस्ट की बजाय एक हास्य अभिनेता के रूप में जाना जाने लगा। 25 अक्टूबर 2012 को सुबह 3बजे जालंधर, पंजाब में एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
📽️
2006 फ़ना 
2005 कुछ मीठा हो जाये 
2003 कुछ ना कहो 
2003 तुझे मेरी कसम 
2002 जानी दुश्मन 
2002 कोई मेरे दिल से पूछे 
2002 शक्ति 
2002 ये है जलवा 
2000 हमारा दिल आपके पास है 
2000 खौफ़ 
1999 जानम समझा करो 
1999 काला साम्राज्य 
1999 आ अब लौट चलें 
1999 कारतूस

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...