शुक्रवार, 13 दिसंबर 2024

अध्याय 17


अध्याय 17

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 1

श्लोक:
(श्रद्धा का और शास्त्रविपरीत घोर तप करने वालों का विषय) अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
 तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी?

अर्जुन के इस प्रश्न में शास्त्रों की विधियों के प्रति आदर और श्रद्धा की महत्वपूर्णता को समझाया गया है। वे जानना चाहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति शास्त्रों की विधि को न मानकर अपनी निजी श्रद्धा के आधार पर पूजा करता है, तो उसकी पूजा की स्थिति कैसी होती है? क्या उसकी श्रद्धा उच्चतम स्तर की है या फिर वह किसी अन्य गुण का प्रतिनिधित्व करती है?

आज की परिस्थित को देखते हुए मानो अर्जुन ने तब यह प्रश्न पूछ लिया हो। अर्जुन तो प्रश्न पूछते है,ताकि भगवान उत्तर दे। क्यों कि भगवान ही है जो सही बता सकते हैं। जैसे किसी गाड़ी में क्या कमी नुक्स हुआ क्यों हुआ।मैकेनिक ही बता सकता है।की वकील,या लेखक नहीं बता सकता , मैकेनिक जिसको बताता है कि क्या नुक्स है सुनने वाले से हम भी जान पाते है,ठीक उसी प्रकार अर्जुन दुनिया बनाने वाले से पूछता है और क्या जवाब मिला हम तक अर्जुन के माध्यम से ही पहुंच पाता है।

जैसा कि अध्याय सोलह के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि काम, क्रोध और लोभ के त्यागने पर ही कर्म आरम्भ होता है,   नियत कर्म को बिना किये न सुख, न सिद्धि और न परमगति ही मिलती है। इसलिये अब तुम्हारे लिये कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में कि क्या करूँ, क्या न करूँ ?

 इस सम्बन्ध में शास्त्र ही प्रमाण है। कोई अन्य शास्त्र नहीं; बल्कि ‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदम्।' (१५/२० ) गीता स्वयं शास्त्र है। अन्य शास्त्र भी हैं; किन्तु यहाँ इसी गीताशास्त्र पर दृष्टि रखें, दूसरा न ढूँढ़ने लगें। दूसरी जगह ढूँढ़ेंगे तो यह क्रमबद्धता नहीं मिलेगी, अतः भटक जायेंगे। इस लिए अन्य धर्मो की गवाही तो ले ही सकते हैं?
यहां अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवन्! जो लोग शास्त्रविधि को त्यागकर पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर 'यजन्ते'- यजन करते हैं, उनकी गति कैसी है? सात्त्विकी है, राजसी अथवा तामसी है? क्योंकि पीछे अर्जुन ने सुना था कि सात्त्विक, राजस अथवा तामस, जब तक गुण विद्यमान हैं, किसी-न- किसी योनि के ही कारण होते हैं। इसलिये प्रस्तुत अध्याय के आरम्भ में ही उसने पहला प्रश्न रखा है
अर्जुन ने कहा- हे कृष्ण! जो लोग शास्त्र के नियमों का पालन न करके अपनी कल्पना के अनुसार पूजा करते हैं, उनकी स्थिति कौन सी है? वे सतोगुणी हैं, रजोगुणी हैं या तमोगुणी?

तात्पर्य : चतुर्थ अध्याय के उन्तालीसवें श्लोक में कहा गया है कि किसी विशेष प्रकार की पूजा में निष्ठावान् व्यक्ति क्रमशः ज्ञान की अवस्था को प्राप्त होता है और शान्ति तथा सम्पन्नता की सर्वोच्च सिद्धावस्था तक पहुँचता है। सोलहवें अध्याय में यह निष्कर्ष निकलता है कि जो शास्त्रों के नियमों का पालन नहीं करता, वह असुर है और जो निष्ठापूर्वक इन नियमों का पालन करता है, वह देव है। अब यदि कोई ऐसा निष्ठावान व्यक्ति हो, जो ऐसे कतिपय नियमों का पालन करता हो, जिनका शास्त्रों में उल्लेख न हो, तो उसकी स्थिति क्या होगी? अर्जुन के इस सन्देह का स्पष्टीकरण कृष्ण द्वारा होना है। क्या वे लोग, जो किसी व्यक्ति को चुनकर उस पर किसी भगवान् के रूप में श्रद्धा दिखाते हैं, सतो, रजो या तमोगुण में पूजा करते हैं? क्या ऐसे व्यक्तियों को जीवन की सिद्धावस्था प्राप्त हो पाती है? क्या वे वास्तविक ज्ञान प्राप्त करके उच्चतम सिद्ध अवस्था को प्राप्त हो पाते हैं? जो लोग शास्त्रों के विधि-विधानों का पालन नहीं करते, किन्तु जिनकी किसी पर श्रद्धा होती है और जो देवी, देवताओं तथा मनुष्यों की पूजा करते हैं, क्या उन्हें सफलता प्राप्त होती है? अर्जुन इन प्रश्नों को श्रीकृष्ण से पूछ रहा है।

17॥1॥

अन्य धर्मों में भी इसी प्रकार के विचार पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए:

- इस्लाम में कहा गया है कि अल्लाह की इबादत करने के लिए, एक व्यक्ति को अपने दिल में सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए। (कुरान, 22:37)
- सिख धर्म में कहा गया है कि एक व्यक्ति को अपने जीवन में सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए, और भगवान की सेवा करनी चाहिए। (गुरु ग्रंथ साहिब, पृष्ठ 4)
- ईसाई धर्म में कहा गया है कि एक व्यक्ति को अपने दिल में सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए, और भगवान की सेवा करनी चाहिए। (बाइबिल, मत्ती 22:37)
- यहूदी धर्म में कहा गया है कि एक व्यक्ति को अपने जीवन में सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए, और भगवान की सेवा करनी चाहिए। (तोराह, देवारिम 6:5)

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न धर्मों में भी सच्ची श्रद्धा और विश्वास की महत्वपूर्णता पर जोर दिया जाता है।
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 1

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 2

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
 सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु॥

भावार्थ:
श्री भगवान्‌ बोले- मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा (अनन्त जन्मों में किए हुए कर्मों के सञ्चित संस्कार से उत्पन्न हुई श्रद्धा ''स्वभावजा'' श्रद्धा कही जाती है।)
 सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी- ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है। उसको तू मुझसे सुन
 श्लोक 2 में श्रीभगवान् ने श्रद्धा के तीन प्रमुख प्रकारों का वर्णन किया है, जो प्रत्येक व्यक्ति की स्वभाव और प्रवृत्ति के अनुसार अलग-अलग होती है। यहाँ श्रद्धा की तीन प्रमुख श्रेणियाँ हैं: 

👉सात्त्विकी, से ज्ञान प्रकट होता है। जब हमारे अंदर सतोगुण प्रबल होता है, तो हमें ज्ञान और समझ की प्राप्ति होती है। हमारे मन में शांति और संतुष्टि की भावना उत्पन्न होती है, और हम अपने जीवन में सही निर्णय लेने में सक्षम होते हैं।
यह श्रद्धा शुद्ध, निष्कलंक और परमात्मा के प्रति भक्ति से परिपूर्ण होती है। यह व्यक्ति की आत्मा की शुद्धता और आत्मज्ञान की ओर संकेत करती है। सात्त्विकी श्रद्धा वाले व्यक्ति सदैव सत्य, अहिंसा, और धर्म के मार्ग पर चलते हैं।
👉राजसी से  लोभ प्रकट होता है। जब हमारे अंदर रजोगुण प्रबल होता है, तो हमें लोभ और आसक्ति की भावना उत्पन्न होती है। हम अपने जीवन में अधिक से अधिक सुख और सुविधा प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, और हमारे मन में असंतुष्टि और अशांति की भावना उत्पन्न होती है।यह श्रद्धा व्यक्ति के इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और सांसारिक सुखों पर आधारित होती है। राजसी श्रद्धा से प्रेरित व्यक्ति बाहरी संसार की गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं और अपनी उपलब्धियों और शक्ति को महत्व देते हैं।
👉तामसी। प्रमाद प्रकट होता है। जब हमारे अंदर तमोगुण प्रबल होता है, तो हमें प्रमाद और आलस्य की भावना उत्पन्न होती है। हम अपने जीवन में उदासीनता और निराशा की भावना महसूस करते हैं, और हमारे मन में अशांति और असंतुष्टि की भावना उत्पन्न होती है।यह श्रद्धा अज्ञानता, अंधविश्वास, और नकारात्मक भावनाओं से जुड़ी होती है। तामसी श्रद्धा वाले व्यक्ति अक्सर आत्म-परिहार और नकारात्मक गतिविधियों में लगे रहते हैं, और उनके कार्यों में अव्यवस्था और अराजकता होती है।
श्रीभगवान् इस श्लोक के माध्यम से यह समझाना चाहते हैं कि श्रद्धा केवल व्यक्ति की स्वभाविक प्रवृत्ति के अनुसार होती है और इन तीनों प्रकार की श्रद्धाएँ उनके कर्म और संस्कारों का परिणाम हैं।

अब अन्य धर्मो की गवाही लेते है।

अन्य धर्मों में भी सात्विक, राजस और तामस की अवधारणा पाई जाती है, हालांकि उनके नाम और विवरण अलग-अलग हो सकते हैं। यहाँ कुछ उदाहरण दिए गए हैं:

इस्लाम में:

सात्विक: इस्लाम में सात्विक को "तकवा" कहा जाता है, जो अल्लाह के प्रति डर और सम्मान की भावना को दर्शाता है।
राजस: इस्लाम में राजस को "हवा" कहा जाता है, जो व्यक्ति की इच्छाओं और वासनाओं को दर्शाता है।
तामस: इस्लाम में तामस को "जाहिलियत" कहा जाता है, जो अज्ञानता और अंधविश्वास की भावना को दर्शाता है।

सिख धर्म में:

सात्विक: सिख धर्म में सात्विक को "संतोख" कहा जाता है, जो अकाल पुरख के प्रति श्रद्धा और विश्वास की भावना को दर्शाता है।
राजस: सिख धर्म में राजस को "काम" कहा जाता है, जो व्यक्ति की इच्छाओं और वासनाओं को दर्शाता है।
तामस: सिख धर्म में तामस को "मोह" कहा जाता है, जो अज्ञानता और अंधविश्वास की भावना को दर्शाता है।

ईसाई धर्म में:

सात्विक: ईसाई धर्म में सात्विक को "आत्म-नियंत्रण" कहा जाता है, जो ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास की भावना को दर्शाता है।
राजस: ईसाई धर्म में राजस को "वासना" कहा जाता है, जो व्यक्ति की इच्छाओं और वासनाओं को दर्शाता है।
तामस: ईसाई धर्म में तामस को "अंधकार" कहा जाता है, जो अज्ञानता और अंधविश्वास की भावना को दर्शाता है।

यहूदी धर्म में:

सात्विक: यहूदी धर्म में सात्विक को "त्सदकाह" कहा जाता है, जो ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास की भावना को दर्शाता है।
राजस: यहूदी धर्म में राजस को "येत्सर हारा" कहा जाता है, जो व्यक्ति की इच्छाओं और वासनाओं को दर्शाता है।
तामस: यहूदी धर्म में तामस को "तहारा" कहा जाता है, जो अज्ञानता और अंधविश्वास की भावना को दर्शाता है।
17॥2॥

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 3

श्लोक:
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
 श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥

भावार्थ:
हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है
 ✍️हे भरतपुत्र! विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने-अपने अस्तित्व के अनुसार मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा विकसित करता है। अपने द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार ही जीव को विशेष श्रद्धा से युक्त भी कहा जाता है।

तात्पर्य : प्रत्येक व्यक्ति में चाहे वह जैसा भी हो, एक विशेष प्रकार की श्रद्धा पाई जाती है। लेकिन उसके द्वारा अर्जित स्वभाव के अनुसार उसकी श्रद्धा उत्तम ( सतोगुणी), राजस ( रजोगुणी) अथवा तामसी कहलाती है। इस प्रकार अपनी विशेष प्रकार की श्रद्धा के अनुसार ही वह कतिपय लोगों से संगति करता है। अब वास्तविक तथ्य तो यह है कि, जैसा पंद्रहवें अध्याय में कहा गया है, प्रत्येक जीव परमेश्वर का अंश है, अतएव वह मूलतः इन समस्त गुणों से परे होता है। लेकिन जब वह भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाता है और बद्ध जीवन में भौतिक प्रकृति के संसर्ग में आता है, तो वह विभिन्न प्रकार की प्रकृति के साथ संगति करके अपना अलग ही स्थान बनाता है। इस प्रकार से प्राप्त कृत्रिम श्रद्धा तथा अस्तित्व मात्र भौतिक होते हैं। भले ही कोई किसी धारणा या देहात्मबोध द्वारा प्रेरित हो, लेकिन मूलतः वह निर्गुण या दिव्य होता है। अतएव भगवान् के साथ अपना सम्बन्ध फिर से प्राप्त करने के लिए उसे भौतिक कल्मष से शुद्ध होना पड़ता है। यही एकमात्र मार्ग है, निर्भय होकर कृष्णभावनामृत में लौटने का । यदि कोई कृष्णभावनामृत में स्थित हो, तो उसका सिद्धि प्राप्त करने के लिए वह मार्ग प्रशस्त हो जाता है। यदि वह आत्म-साक्षात्कार के इस पथ को ग्रहण नहीं करता, तो वह निश्चित रूप से प्रकृति गुणों के साथ बह जाता है।
इस श्लोक में श्रद्धा शब्द अत्यन्त सार्थक है। श्रद्धा मूलतः सतोगुण से उत्पन्न होती है। मनुष्य की श्रद्धा किसी देवता, किसी कृत्रिम ईश्वर या मनोधर्म में हो सकती है, लेकिन प्रबल श्रद्धा सात्त्विक कार्यों से उत्पन्न होती है। किन्तु भौतिक बद्धजीवन में कोई भी कार्य पूर्णतया शुद्ध नहीं होता। वे सब मिश्रित होते हैं। वे शुद्ध सात्त्विक नहीं होते। शुद्ध सत्त्व दिव्य होता है, शुद्ध सत्त्व में रहकर मनुष्य भगवान् के वास्तविक स्वभाव को समझ सकता है। जब तक श्रद्धा पूर्णतया सात्त्विक नभगवाहीं होती, तब तक वह प्रकृति के किसी भी गुण से दूषित हो सकती है।
जैसे श्रद्धा तो भगवान में हे पर जब किसी कष्ट का आना हो जाता है तो यही श्रद्धा यंत्र, मंत्र, तंत्र,की ओर ट्रांसफर भी हो जाती है।
जिस से प्रकृति के दूषित गुण हृदय तक फैल जाते हैं, अतएव किसी विशेष गुण के सम्पर्क में रहकर हृदय जिस स्थिति में होता है, उसी के अनुसार श्रद्धा भी उस में स्थापित होजाती है। यह समझना चाहिए कि यदि किसी का हृदय सतोगुण में स्थित है, तो उसकी श्रद्धा भी सतोगुणी है। यदि हृदय रजोगुण में स्थित है, तो उसकी श्रद्धा रजोगुणी है और यदि हृदय तमोगुण में स्थित है तो उसकी श्रद्धा तमोगुणी होती है। इस प्रकार हमें संसार में विभिन्न प्रकार की श्रद्धाएँ मिलती हैं और विभिन्न प्रकार की श्रद्धाओं के अनुसार विभिन्न प्रकार के धर्म होते हैं। धार्मिक श्रद्धा का असली सिद्धान्त सतोगुण में स्थित होता है। लेकिन चूँकि हृदय कलुषित रहता है, अतएव विभिन्न प्रकार के धार्मिक सिद्धान्त पाये जाते हैं। श्रद्धा की विभिन्नता के कारण ही पूजा भी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है।
 दूसरे धर्म भी इस बात की गवाही देते हैं कि सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यहाँ कुछ उदाहरण दिए गए हैं:

इस्लाम में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके दिल की गहराइयों में बसी होती है।" (कुरान, 49:7)

सिख धर्म में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है।" (गुरु ग्रंथ साहिब, पृष्ठ 4)

ईसाई धर्म में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके हृदय की गहराइयों में बसी होती है।" (बाइबिल, मत्ती 22:37)

यहूदी धर्म में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है।" (तोराह, देवारिम 6:5)

बौद्ध धर्म में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है।" (धम्मपद, 1:1)

हिंदू धर्म में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है।" (भगवद गीता, 17:3)

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि सभी धर्मों में यह विश्वास है कि मनुष्य की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है।

17॥3॥

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 4

श्लोक:
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
 प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः॥

भावार्थ:
सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।
 सतोगुणी व्यक्ति देवताओं को पूजते हैं, रजोगुणी यक्षों व राक्षसों की पूजा करते हैं और तमोगुणी व्यक्ति भूत-प्रेतों को पूजते हैं।

तात्पर्य : इस श्लोक में भगवान् विभिन्न बाह्य कर्मों के अनुसार पूजा करने वालों के प्रकार बता रहे हैं। शास्त्रों के आदेशानुसार केवल भगवान् ही पूजनीय हैं। लेकिन जो शास्त्रों के आदेशों से अभिज्ञ नहीं, या उन पर श्रद्धा नहीं रखते, वे अपनी गुण- स्थिति के अनुसार विभिन्न वस्तुओं की पूजा करते हैं। जो लोग सतोगुणी हैं, वे सामान्यतया देवताओं की पूजा करते हैं। इन देवताओं में ब्रह्मा, शिव तथा अन्य देवता, यथा इन्द्र, चन्द्र तथा सूर्य सम्मिलित हैं। देवता तो कई हैं। सतोगुणी लोग किसी विशेष अभिप्राय से किसी विशेष देवता की पूजा करते हैं। इसी प्रकार जो रजोगुणी हैं, वे यक्ष-राक्षसों की पूजा करते हैं। हमें स्मरण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय कलकत्ता का एक व्यक्ति हिटलर की पूजा करता था, क्योंकि, भला हो उस युद्ध का, उसने उसमें काले धन्धे से प्रचुर धन संचित कर लिया था। इसी प्रकार जो रजोगुणी तथा तमोगुणी होते हैं, वे सामान्यतया किसी प्रबल मनुष्य को ईश्वर के रूप में चुन लेते हैं। वे सोचते हैं कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर की तरह पूजा जा सकता है और फल एकसा होगा।
यहाँ पर इसका स्पष्ट वर्णन है कि रजोगुणी लोग ऐसे देवताओं की सृष्टि करके उन्हें पूजते हैं और जो तमोगुणी हैं- अंधकार में हैं - वे प्रेतों की पूजा करते हैं। कभी- कभी लोग किसी मृत प्राणी की कब्र पर पूजा करते हैं। मैथुन सेवा भी तमोगुणी मानी जाती है। इसी प्रकार भारत के सुदूर ग्रामों में भूतों की पूजा करने वाले हैं। हमने देखा है कि भारत के निम्नजाति के लोग कभी-कभी जंगल में जाते हैं और यदि उन्हें इसका पता चलता है कि कोई भूत किसी वृक्ष पर रहता है, तो वे उस वृक्ष की पूजा करते हैं और बलि चढ़ाते हैं। ये पूजा के विभिन्न प्रकार वास्तव में ईश्वर-पूजा नहीं हैं। ईश्वर-पूजा तो सात्त्विक पुरुषों के लिए है। श्रीमद्भागवत में (४.३.२३) कहा गया है सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव- शब्दितम् - जब
(श्रीमद्भागवत में (४.३.२३) में कहा गया है:

"वासुदेवः सर्वम् इति स महात्मा सुदुर्लभः"

अर्थात:

"जो व्यक्ति जानता है कि वासुदेव (भगवान) ही सब कुछ है, वह महात्मा है और ऐसा व्यक्ति बहुत ही दुर्लभ है।"

यह श्लोक भगवान की सर्वव्यापकता को दर्शाता है और यह बताता है कि जो व्यक्ति इस बात को समझता है, वह महात्मा है।)
सात्त्विक श्रद्धा (सात्त्विक व्यक्तियों):
ऐसा व्यक्ति सतोगुणी होता है, तो वह वासुदेव की पूजा करता है। तात्पर्य यह है कि जो लोग गुणों से पूर्णतया शुद्ध हो चुके हैं और दिव्य पद को प्राप्त हैं, वे ही भगवान् की पूजा कर सकते हैं।
निर्विशेषवादी सतोगुण में स्थित माने जाते हैं और वे पंचदेवताओं की पूजा करते हैं। वे भौतिक जगत में निराकार विष्णु को पूजते हैं, जो सिद्धान्तीकृत विष्णु कहलाता है। विष्णु भगवान् के विस्तार भी हैं, लेकिन निर्विशेषवादी अन्ततः भगवान् में विश्वास न करने के कारण सोचते हैं कि विष्णु का स्वरूप निराकार ब्रह्म का दूसरा पक्ष है। इसी प्रकार वे यह मानते हैं कि ब्रह्माजी रजोगुण के निराकार रूप हैं। अतः वे कभी- कभी पाँच देवताओं का वर्णन करते हैं, जो पूज्य हैं। लेकिन चूँकि वे लोग निराकार ब्रह्म को ही वास्तविक सत्य मानते हैं, इसलिए वे अन्ततः समस्त पूज्य वस्तुओं को त्याग देते हैं। निष्कर्ष यह निकलता है कि प्रकृति के विभिन्न गुणों को दिव्य प्रकृति वाले व्यक्तियों की संगति से शुद्ध किया जा सकता है।

राजस श्रद्धा (राजस व्यक्तियों):

जो लोग राजस प्रवृत्तियों से युक्त होते हैं, वे यक्ष और राक्षसों की पूजा करते हैं। यह पूजा अधिकतर शक्ति, ऐश्वर्य और भौतिक लाभ प्राप्ति के उद्देश्य से की जाती है। राजस व्यक्तियों का ध्यान अक्सर बाहरी दिखावे और संपत्ति पर केंद्रित होता है।

तामस श्रद्धा (तामस व्यक्तियों):

तामस प्रवृत्तियों वाले लोग प्रेत, भूत और अन्य अशुभ शक्तियों की पूजा करते हैं। उनकी पूजा आमतौर पर अज्ञानता, अंधविश्वास और नकारात्मक शक्तियों के प्रति एक आकर्षण की वजह से होती है। इस तरह की पूजा प्रायः अंधकार और आत्ममुग्धता को बढ़ावा देती है।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि श्रद्धा और पूजा का प्रकार व्यक्ति की आंतरिक प्रवृत्तियों और मानसिक अवस्था पर निर्भर करता है। हर व्यक्ति की पूजा की शैली उसके स्वभाव और मानसिक स्थिति का प्रतिबिंब होती है।
17॥4॥

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 5

श्लोक:
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
 दम्भाहङ्‍कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥

भावार्थ:
जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं
 
जो लोग दम्भ तथा अहंकार से अभिभूत होकर शास्त्रविरुद्ध कठोर तपस्या और व्रत करते हैं, जो काम तथा आसक्ति द्वारा प्रेरित होते हैं, जो मूर्ख हैं तथा जो शरीर के भौतिक तत्त्वों को तथा शरीर के भीतर स्थित परमात्मा को कष्ट पहुँचाते हैं, वे असुर कहे जाते हैं।

तात्पर्य : कुछ पुरुष ऐसे हैं जो ऐसी तपस्या की विधियों का खुद ही निर्माण कर लेते हैं, जिनका वर्णन शास्त्रों में नहीं है। उदाहरणार्थ, किसी स्वार्थ के प्रयोजन से, यथा राजनीतिक कारणों से उपवास करना शास्त्रों में वर्णित नहीं है। शास्त्रों में तो आध्यात्मिक उन्नति के लिए उपवास करने की संस्तुति है, किसी राजनीतिक या सामाजिक उद्देश्य के लिए नहीं। भगवद्गीता के अनुसार जो लोग ऐसी तपस्याएँ करते हैं, वे निश्चित रूप से आसुरी हैं। 

उनके कार्य शास्त्रविरुद्ध हैं और सामान्य जनता के हित में भी नहीं हैं। वास्तव में वे लोग गर्व, अहंकार, काम तथा भौतिक भोग के प्रति आसक्ति के कारण ऐसा करते हैं। ऐसे कार्यों से न केवल शरीर के उन 5 तत्त्वों को विक्षोभ होता है, जिनसे शरीर बना है, अपितु शरीर के भीतर निवास कर रहे परमात्मा को भी कष्ट पहुँचता है। ऐसे अवैध उपवास से या किसी राजनीतिक उद्देश्य से की गई तपस्या आदि से निश्चय ही अन्य लोगों की शान्ति भंग होती है। उनका उल्लेख वैदिक साहित्य में नहीं है। (भूख हड़ताल)

आसुरी व्यक्ति सोचता है कि इस विधि से वह अपने शत्रु या विपक्षियों को अपनी इच्छा पूरी करने के लिए बाध्य कर सकता है, लेकिन कभी-कभी ऐसे उपवास से व्यक्ति की मृत्यु भी हो जाती है। ऐसे कार्य की भगवान् द्वारा अनुमत नहीं है, वे कहते हैं कि जो इन कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, वे असुर हैं। ऐसे प्रदर्शन भगवान् के अपमान स्वरूप हैं, क्यों कि इन्हें वैदिक शास्त्रों के आदेशों का उल्लंघन करके किया जाता है। इस प्रसंग में अचेतसः शब्द महत्त्वपूर्ण है। सामान्य मानसिक स्थिति वाले पुरुषों को शास्त्रों के आदेशों का पालन करना चाहिए। जो ऐसी स्थिति में नहीं हैं, वे शास्त्रों की उपेक्षा तथा अवज्ञा करते हैं और तपस्या की अपनी विधि निर्मित कर लेते हैं। मनुष्य को सदैव आसुरी लोगों की चरम परिणति को स्मरण करना चाहिए, जैसा कि पिछले अध्याय में वर्णन किया गया है। भगवान् ऐसे लोगों को आसुरी व्यक्तियों के यहाँ जन्म लेने के लिए बाध्य करते हैं। फलस्वरूप वे भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को जाने बिना जन्म जन्मान्तर आसुरी जीवन में रहते हैं। किन्तु यदि ऐसे व्यक्ति इतने भाग्यशाली हुए कि कोई गुरु उनका मार्गदर्शन करके उन्हें वैदिक ज्ञान के मार्ग पर ले जा सके, तो वे इस भवबन्धन से छूट कर अन्ततोगत्वा परमगति को प्राप्त होते हैं।
भाव :
श्रीकृष्ण ने उन लोगों के तप की आलोचना की है, जो शास्त्रों के निर्देशों की अवहेलना करते हुए, केवल अपनी मनोवृत्तियों के अनुसार कठोर तपस्या करते हैं।

अशास्त्रविहितं: इसका मतलब है कि वे लोग शास्त्रों के निर्देशों और नियमों का पालन नहीं करते। शास्त्रों में तपस्या के लिए विशिष्ट मार्गदर्शन और विधियाँ दी गई हैं, लेकिन ये लोग उन निर्देशों की अनदेखी करते हैं।
घोरं तप्यन्ते: ये लोग कठोर और अत्यंत कठिन तपस्या करते हैं, जो सामान्यतः सामान्य मानव के लिए असहनीय हो सकती है।
दम्भाहङ्‍कारसंयुक्ताः: इन लोगों के तप में दम्भ (अहंकार) और अहंकार (स्वयं की श्रेष्ठता का भाव) होता है। वे अपनी तपस्या को दूसरों के सामने दिखाने और अपनी महानता का प्रदर्शन करने के लिए करते हैं, न कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए।
कामरागबलान्विताः: ये लोग अपनी तपस्या में कामना (इच्छाएँ), राग (आसक्ति) और बल (शक्ति का अहंकार) को शामिल करते हैं। इनकी तपस्या आत्मा की शुद्धि के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लाभ और इच्छाओं की पूर्ति के लिए होती है।
संक्षेप में, यह श्लोक यह दर्शाता है कि तपस्या केवल शास्त्रों के निर्देशों का पालन करके और बिना किसी दिखावे या अहंकार के साथ करनी चाहिए। तपस्या का वास्तविक उद्देश्य आत्मा की उन्नति और ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत लाभ या मान्यता प्राप्त करने के लिए।
17॥5॥

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 6

श्लोक:
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
 मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्‌यासुरनिश्चयान्‌॥

भावार्थ:
जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं 
(शास्त्र से विरुद्ध उपवासादि घोर आचरणों द्वारा शरीर को सुखाना एवं भगवान्‌ के अंशस्वरूप जीवात्मा को क्लेश देना, भूत समुदाय को और अन्तर्यामी परमात्मा को ''कृश करना'' है।), 
उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाले जान
 17॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 7

श्लोक:
(आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद) आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
 यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु॥

भावार्थ:
भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक्‌-पृथक्‌ भेद को तू मुझ से सुन।

 प्रकृति: प्रकृति के भिन्न-भिन्न गुणों के अनुसार भोजन, यज्ञ, तपस्या और दान में भेद होते हैं। वे सब एक से नहीं होते। जो लोग यह समझ सकते हैं कि किस गुण में क्या-क्या करना चाहिए, वे वास्तव में बुद्धिमान हैं। जो लोग सभी प्रकार के यज्ञ, भोजन या दान को एक सा ही मान लेते  हैं, वे अंत तक नहीं जान पाते, वे अज्ञानी हैं। 
(विवाह के मंत्रों की जगह दुर्गा शप्तशती के मंत्रों सही विवाह सम्पन्न करवाने वाले।)

ऐसे भी प्रचारक लोग हैं, जो कहते हैं कि जो मनुष्य इच्छा कर सकता है, वह सिद्धि प्राप्त कर सकता है। लेकिन ये मूर्ख मार्गदर्शक शास्त्र के आदेश अधिकारी कार्य नहीं करते। ये अपनी विधियां तोड़ते हैं और आम जनता को धोखा देते रहते हैं।(ऐसा कुछ मिशन संप्रदाय के लोग अपने आश्रमों में करते है)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने आहार (भोजन), यज्ञ (धार्मिक अनुष्ठान), तप (आध्यात्मिक साधना) और दान (दान-पुण्य) के भेद को तीन प्रकार में विभाजित किया है।
आहार का त्रैविध्य: भोजन (आहार) सभी के लिए तीन प्रकार का होता है, जो उनकी मानसिकता और स्वभाव के अनुसार भिन्न होता है। यही बात अन्य धार्मिक क्रियाओं पर भी लागू होती है।
यज्ञ, तप और दान: यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। इनकी प्रवृत्ति और गुणवत्ता भिन्न-भिन्न होती है, और यह इस पर निर्भर करता है कि ये किस श्रद्धा और मनोवृत्ति से किए जाते हैं।
सार यह है कि
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में समझाते हैं कि आहार, यज्ञ, तप और दान सभी में तीन प्रकार की विभाजन की जाती है। इसका मतलब है कि ये सभी गतिविधियाँ और उनके परिणाम व्यक्ति की स्वभाविक प्रकृति और श्रद्धा के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि धार्मिक और आध्यात्मिक क्रियाएँ केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनकी गहराई और प्रभाव व्यक्ति की आंतरिक श्रद्धा और स्वभाव पर निर्भर करते हैं।
17॥7॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 8

श्लोक:
आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
 रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥

भावार्थ:
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले (जिस भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहता है, उसको स्थिर रहने वाला कहते हैं।) तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय- ऐसे आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।
इस श्लोक में सात्त्विक आहार के गुणों का वर्णन किया गया है। यहाँ 'सात्त्विक' शब्द का तात्पर्य उन आहारों से है जो सत्त्वगुण से युक्त होते हैं।
 आयुः, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति: सात्त्विक आहार उन चीज़ों से भरा होता है जो जीवनकाल (आयु), मानसिक शांति (सत्त्व), शारीरिक बल (बल), स्वस्थता (आरोग्य), सुख, और आनंद (प्रीति) को बढ़ाते हैं।
रस्याः: ये आहार स्वादिष्ट होते हैं, जिससे खाने वाला आनंदित महसूस करता है।
स्थिरा: ये आहार शरीर में लंबे समय तक रहते हैं और जल्दी पचते नहीं हैं, जिससे स्थिरता और निरंतरता मिलती है।
हृद्या: इनका सेवन मन और दिल को अच्छा लगता है, जिससे मानसिक शांति और खुशी प्राप्त होती है।
इस श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि सात्त्विक लोग उन आहारों को पसंद करते हैं जो उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ, आनंदित, और संतुष्ट रखते हैं। ये आहार न केवल शरीर की जरूरतों को पूरा करते हैं बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी बढ़ाते हैं।

17॥8॥
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं

कड़वे, खट्टे, नमकीन, अत्यंत गर्म, तीखे, सूखे, और दाहकारक (जलन पैदा करने वाले) आहार राजसी प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को प्रिय होते हैं। ऐसे भोजन के सेवन से शरीर और मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है; यह दुःख, चिंता, और रोगों को उत्पन्न करने वाला होता है।
राजसी आहार आमतौर पर अधिक तामसिक गुणों से भरपूर होते हैं और इनके सेवन से मन में अशांति और असंतोष पैदा होता है। इस प्रकार का आहार व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक अस्वस्थता की ओर ले जाता है, और इसके परिणामस्वरूप जीवन में कठिनाइयाँ और दुख बढ़ जाते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से यह संकेत मिलता है कि हमारे आहार का हमारी मानसिक और शारीरिक स्थिति पर बड़ा प्रभाव होता है। इसलिए, एक सजग व्यक्ति को इस प्रकार के आहार से दूर रहना चाहिए और ऐसा आहार लेना चाहिए जो स्वास्थ्य और संतुलन को बनाए रखने में सहायक हो।
17।।9।।

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 10

श्लोक:
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌।
 उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्‌॥

भावार्थ:
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है
 इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने तामस गुण के अंतर्गत आने वाले भोजन की विशेषताओं का वर्णन किया है।
यातयामं - इसका अर्थ है जो भोजन अधपका या अध्यधिक गरम हो, अर्थात् जो सही से पकाया न गया हो।
गतरसं - इसका अर्थ है जो भोजन स्वादहीन हो गया हो।
पूति - इसका मतलब है जो भोजन दुर्गंधयुक्त या बदबूदार हो गया हो।
पर्युषितं - इस शब्द का तात्पर्य है जो भोजन बासी हो, यानि जो समय के साथ खराब हो गया हो।
उच्छिष्टमपि - इसका अर्थ है जो भोजन उच्छिष्ट हो, यानी जिसे पहले खा लिया गया हो और अब वह बचे हुए टुकड़े या अवशेष हों।
चामेध्यं - इसका मतलब है जो भोजन अपवित्र या अशुद्ध हो।
इन सभी गुणों वाले भोजन को तामसिक माना जाता है। इस प्रकार का भोजन तामसिक प्रकृति वाले व्यक्तियों को प्रिय होता है, जो जीवन में नकारात्मकता और आलस्य को पसंद करते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से, श्री कृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि तामसिक भोजन शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है और इसे त्यागने की सलाह दी गई है।
 17॥10॥

अध्याय 17श्लोक 11

अफलाकाङ्‌‍क्षिभिर्यज्ञो विधिदिष्टो य इज्यते ।  
 यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स सात्त्विक: 
 

*अनुवाद:* 

यज्ञों में वही यज्ञ सात्त्विक होता है, जो शास्त्र के निर्देशानुसार कर्तव्य समझ कर उन लोगों के द्वारा किया जाता है, जो फल की इच्छा नहीं करते।

*तात्पर्य:* 

सामान्यतया यज्ञ किसी प्रयोजन से किया जाता है। लेकिन यहाँ पर बताया गया है कि यज्ञ बिना किसी इच्छा के सम्पन्न किया जाना चाहिए। इसे कर्तव्य समझ कर किया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ, मन्दिरों या गिरजाघरों में मनाये जाने वाले अनुष्ठान सामान्यतया भौतिक लाभ को दृष्टि में रख कर किये जाते हैं, लेकिन यह सतोगुण में नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि वह कर्तव्य मानकर मन्दिर या गिरजाघर में जाए, भगवान् को नमस्कार करे और फूल तथा प्रसाद चढ़ाए। प्रत्येक व्यक्ति सोचता है कि केवल ईश्वर की पूजा करने के लिए मन्दिर जाना व्यर्थ है। लेकिन शास्त्रों में आर्थिक लाभ के लिए पूजा करने का आदेश नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि केवल अर्चाविग्रह को नमस्कार करने जाए। इससे मनुष्य सतोगुण को प्राप्त होगा। प्रत्येक सभ्य नागरिक का कर्तव्य है कि वह शास्त्रों के आदेशों का पालन करे और भगवान् को नमस्कार करे।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि सात्त्विक यज्ञ वह है, जो शास्त्रों के अनुसार विधिपूर्वक किया जाता है, और इसमें फल की इच्छा नहीं होती।
श्लोक के अनुसार, जो यज्ञ शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट विधि से किया जाता है, और जिसके करने वाले व्यक्ति को कोई फल या पुरस्कार की कामना नहीं होती, वह यज्ञ सात्त्विक (शुद्ध और पुण्यकारी) होता है। ऐसे यज्ञ में मन को पूरी तरह से शांत करके, केवल कर्तव्य समझकर और निष्काम भाव से किया जाता है। यहाँ "अफलाकाङ्क्षी" का मतलब है, "फल की इच्छा न रखने वाला", और "विधिदृष्टो" का मतलब है, "शास्त्रों के अनुसार किया गया"।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि सात्त्विक यज्ञ के लिए न तो किसी प्रकार की स्वार्थ की भावना होनी चाहिए, और न ही इसका उद्देश्य किसी लाभ या पुरस्कार को प्राप्त करना होना चाहिए। यह यज्ञ केवल कर्तव्य और धार्मिकता के भाव से किया जाता है, जिससे आत्मा की पवित्रता और शुद्धता बढ़ती है।
यज्ञों में वही यज्ञ सात्त्विक होता है, जो शास्त्र के निर्देशानुसार कर्तव्य समझ कर उन लोगों के द्वारा किया जाता है, जो फल की इच्छा नहीं करते।

 सामान्यतया ऐसा यज्ञ किसी प्रयोजन से किया जाता है। लेकिन यहाँ पर बताया गया है कि यज्ञ बिना किसी इच्छा के सम्पन्न किया जाना चाहिए। इसे कर्तव्य समझ कर किया जाना चाहिए। 
उदाहरणार्थ, मन्दिरों या गिरजाघरों में मनाये जाने वाले अनुष्ठान सामान्यतया भौतिक लाभ को दृष्टि में रख कर किये जाते हैं, लेकिन यह सतोगुण में नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि वह कर्तव्य मानकर मन्दिर या गिरजाघर में जाए, भगवान् को नमस्कार करे और फूल तथा प्रसादं चढ़ाए। प्रत्येक व्यक्ति सोचता है कि केवल ईश्वर की पूजा करने के लिए मन्दिर जाना व्यर्थ है। लेकिन शास्त्रों में आर्थिक लाभ के लिए पूजा करने का आदेश नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि केवल अर्चाविग्रह को नमस्कार करने जाए। इससे मनुष्य सतोगुण को प्राप्त होगा। प्रत्येक सभ्य नागरिक का कर्तव्य है कि वह शास्त्रों के आदेशों का पालन करे और भगवान् को नमस्कार करे।
17॥ 11 ॥  
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 12

श्लोक:
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्‌।
 इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्‌॥

भावार्थ:
परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान
 
ऐसे यज्ञ स्वर्ग प्राप्ति हेतु किए जाते है:

कभी-कभी स्वर्गलोक पहुँचने या किसी भौतिक लाभ के लिए जिस यज्ञ या अनुष्ठान को किया जाता है। ऐसे यज्ञ या अनुष्ठान को राजसी माना जाता है ।
17॥12॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 13

श्लोक:
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्‌।
 श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥

भावार्थ:
शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।

जो यज्ञ शास्त्र के निर्देशों की अवहेलना करके, प्रसाद वितरण किये बिना, वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किये बिना, पुरोहितों को दक्षिणा दिये बिना तथा श्रद्धा के बिना सम्पन्न किया जाता है, वह तामसी माना जाता है।
तमोगुण में श्रद्धा वास्तव में अश्रद्धा है। कभी-कभी लोग किसी देवता की पूजा धन अर्जित करने के लिए करते हैं और फिर वे इस धन को शास्त्र के निर्देशों की अवहेलना करके मनोरंजन में व्यय करते हैं। ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों को सात्त्विक नहीं माना जाता। ये तामसी होते हैं। इनसे तामसी प्रवृत्ति उत्पन्न होती है और मानव समाज को कोई लाभ नहीं पहुँचता।
 17॥13॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 14

श्लोक:
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌।
 ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥

भावार्थ:
देवता, ब्राह्मण, गुरु
 (यहाँ 'गुरु' शब्द से माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपने से जो किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबको समझना चाहिए।) 
और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा- यह शरीर- सम्बन्धी तप कहा जाता है,
जैसे किसी बुजुर्ग को नहलाना पीठ जहां उस का हाथ ना पहुंच पाए ,साबुन लगा देना,किसी को बोझा उठाने में मदद करना,गाड़ी खराब हो जाने पर धक्का लगवाना।ऐसी क्रियाओं को ही शरीर- सम्बन्धी तप कहा जाता है,
और यहाँ पर भगवान् तपस्या के भेद बताते हैं। सर्वप्रथम वे शारीरिक तपस्या का वर्णन करते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह ईश्वर या देवों, योग्य ब्राह्मणों, गुरु तथा माता-पिता जैसे गुरुजनों या वैदिक ज्ञान में पारंगत व्यक्ति को प्रणाम करे या प्रणाम करना सीखे। इन सबका समुचित आदर करना चाहिए। उसे चाहिए कि आंतरिक तथा बाह्य रूप में अपने को शुद्ध करने का अभ्यास करे और आचरण में सरल बनना सीखे। वह कोई ऐसा कार्य न करे, जो शास्त्र सम्मत न हो। वह वैवाहिक जीवन के अतिरिक्त मैथुन में रत न हो, क्योंकि शास्त्रों में केवल विवाह में ही मैथुन की अनुमति है, अन्यथा नहीं। यह ब्रह्मचर्य कहलाता है। ये सब शारीरिक तपस्याएँ हैं।

 17॥14॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 15

श्लोक:
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्‌।
 स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते॥

भावार्थ:
जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है
 (मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहने का नाम 'यथार्थ भाषण' है।) 
तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है।
 वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

वाणी ऐसी बोलिए मन का आपा ना खोए, "भगत कबीर"

 यह एक प्रसिद्ध हिंदी दोहा है जो हमें यह सिखाता है कि हमें अपनी वाणी का तप रूपी उपयोग कैसे करना चाहिए?

इस दोहे का अर्थ यह है कि हमें ऐसी बातें बोलनी चाहिए जो दूसरों को अच्छी लगें और जो सच्ची भी हो और हमारे और दूसरे के मन को भी शांत रखें। हमें अपनी बातों में भाव, अर्थ और व्याख्या का ध्यान रखना चाहिए ताकि हम दूसरों को सही तरीके से समझा सकें और हमारे शब्दों का प्रभाव भी अच्छा ही हो।

यह दोहा हमें यह भी सिखाता है कि हमें अपनि वाणी के शब्दों का चयन सावधानी से करना चाहिए ताकि हम दूसरों को ठेस न पहुँचाएं और हमारे शब्दों से किसी को भी दुख न पहुंचे।
 इस को वाणी का तप कहते है।

अर्थात: सच्चे, भाने वाले, हितकर तथा अन्यों को क्षुब्ध न करने वाले वाक्य बोलना और वैदिक साहित्य का नियमित पारायण करना यही वाणी की तपस्या है।

तात्पर्य : मनुष्य को ऐसा नहीं बोलना चाहिए कि दूसरों के मन क्षुब्ध हो जाएँ। निस्सन्देह जब शिक्षक बोले तो वह अपने विद्यार्थियों को उपदेश देने के लिए सत्य बोल सकता है, लेकिन उसी शिक्षक को चाहिए कि यदि वह उनसे बोले जो उसके विद्यार्थी नहीं हैं, तो उनके मन को क्षुब्ध करने वाला सत्य न बोले। यही वाणी की तपस्या है। इसके अतिरिक्त प्रलाप (व्यर्थ की वार्ता) नहीं करना चाहिए। आध्यात्मिक क्षेत्रों में बोलने की विधि यह है कि जो भी कहा जाय, वह शास्त्र सम्मत हो। उसे तुरन्त ही अपने कथन की पुष्टि के लिए शास्त्रों का प्रमाण देना चाहिए। इसके साथ- साथ वह बात सुनने में अति प्रिय लगनी चाहिए। ऐसी विवेचना से मनुष्य को सर्वोच्च लाभ और मानव समाज का उत्थान हो सकता है। वैदिक साहित्य का विपुल भण्डार है और इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। यही वाणी की तपस्या कही जाती है।
17॥15॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 16

श्लोक:
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
 भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥

भावार्थ:
मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भली भाँति पवित्रता, इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है
 मन सम्बन्धी तप को "मानसिक तप" या "मानसिक तपस्या" कहा जाता है। यह एक प्रकार की आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने मन को शुद्ध, मजबूत और एकाग्र करने का प्रयास करता है।

मानसिक तप के कुछ उदाहरण हैं:

- ध्यान और ज्ञान
- आत्म-विचार और आत्म-मूल्यांकन
- मन की शुद्धि और एकाग्रता के लिए प्रयास करना
- अपने विचारों और भावनाओं को नियंत्रित करना
- आध्यात्मिक पुस्तकों और शास्त्रों का अध्ययन करना

मानसिक तप का उद्देश्य है अपने मन को शुद्ध और मजबूत बनाना, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में अधिक स्थिरता, शांति और आनंद प्राप्त कर सके।
भगवद गीता के 17वें अध्याय के 16वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने मन सम्बन्धी तप के बारे में बताया है।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भली भाँति पवित्रता ही मन सम्बन्धी तप है।

यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं:

- मन की प्रसन्नता: मन को प्रसन्न और शांत रखना ही मन सम्बन्धी तप का पहला चरण है।
- शान्तभाव: शान्तभाव से मन को शांत और एकाग्र रखना होता है।
- भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव: भगवान के बारे में सोचते रहना और उनकी शरण में रहना ही मन सम्बन्धी तप का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- मन का निग्रह: मन को नियंत्रित करना और उसके विचारों को एकाग्र रखना ही मन सम्बन्धी तप का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
- अन्तःकरण के भावों की पवित्रता: अन्तःकरण के भावों को पवित्र और शुद्ध रखना ही मन सम्बन्धी तप का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि मन सम्बन्धी तप क्या है और इसके महत्वपूर्ण पहलू क्या हैं।

तथा संतोष, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन की शुद्धि-ये मन की तपस्याएँ हैं।

❤️यह भगवद गीता के 17वें अध्याय का एक अन्य महत्वपूर्ण श्लोक है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने मन की तपस्याओं के बारे में बताया है।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि संतोष, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम और जीवन की शुद्धि ये सभी मन की तपस्याएँ हैं।

यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं:

- संतोष: संतोष का अर्थ है अपने जीवन में जो कुछ भी है, उसमें संतुष्ट रहना।
- सरलता: सरलता का अर्थ है अपने जीवन में सच्चाई और ईमानदारी का पालन करना।
- गम्भीरता: गम्भीरता का अर्थ है अपने जीवन में गहराई और स्थिरता का पालन करना।
- आत्म-संयम: आत्म-संयम का अर्थ है अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करना।
- जीवन की शुद्धि: जीवन की शुद्धि का अर्थ है अपने जीवन में पवित्रता और शुद्धता का पालन करना।

मन को संयमित बनाने का अर्थ है, उसे इन्द्रियतृप्ति से विलग करना। उसे इस तरह प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जिससे वह सदैव परोपकार के विषय में सोचे। मन के लिए सर्वोत्तम प्रशिक्षण विचारों की श्रेष्ठता है। मनुष्य को कृष्णभावनामृत से विचलित नहीं होना चाहिए और इन्द्रियभोग से सदैव बचना चाहिए। अपने स्वभाव को शुद्ध बनाना कृष्ण भावना भावित होना है। इन्द्रियभोग के विचारों से मन को अलग रख करके ही मन की तुष्टि प्राप्त की जा सकती है। हम इन्द्रियभोग के बारे में जितना सोचते हैं, उतना ही मन अतृप्त होता जाता है। इस वर्तमान युग में हम मन को व्यर्थ ही अनेक प्रकार के इन्द्रियतृप्ति के साधनों में लगाये रखते हैं, जिससे मन संतुष्ट नहीं हो पाता। अतएव सर्वश्रेष्ठ विधि यही है कि मन को वैदिक साहित्य की ओर मोड़ा जाय, क्योंकि यह संतोष प्रदान करने वाली कहानियों से भरा है - यथा पुराण तथा महाभारत। कोई भी इस ज्ञान का लाभ उठा कर शुद्ध हो सकता है। मन को छल-कपट से मुक्त होना चाहिए और मनुष्य को सबके कल्याण (हित) के विषय में सोचना चाहिए। मौन (गम्भीरता) का अर्थ है कि मनुष्य निरन्तर आत्मसाक्षात्कार के विषय में सोचता रहे। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पूर्ण मौन इस दृष्टि से धारण किये रहता है। मन निग्रह का अर्थ है-मन को इन्द्रियभोग से पृथक् करना। मनुष्य को अपने व्यवहार में निष्कपट होना चाहिए और इस तरह उसे अपने जीवन (भाव) को शुद्ध बनाना चाहिए। ये सब गुण मन की तपस्या के अन्तर्गत आते हैं।

17॥16॥

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 17

श्लोक:
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
 अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥

भावार्थ:
फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते हैं
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण तपस्या के विभिन्न प्रकारों पर प्रकाश डालते हैं। यहाँ पर बताया गया है कि जो तप पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा और भक्ति से किया जाता है, और जिसमें फल की इच्छा नहीं होती, वही तप सात्त्विक होता है।
श्रद्धया परया तप्तं: यहाँ 'श्रद्धया परया' का मतलब है परम श्रद्धा और भक्ति के साथ। जब तप को पूर्ण निष्ठा और ईश्वर की आराधना से किया जाता है, तब वह सात्त्विक तप कहलाता है।

सात्त्विक तप के तीन मुख्य पहलू हैं:

1. श्रद्धा: परम श्रद्धा और भक्ति के साथ तप करना।
2. निष्ठा: पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ तप करना।
3. आराधना: ईश्वर की आराधना और पूजा करना।

इन तीनों पहलुओं को मिलाकर सात्त्विक तप किया जा सकता है, जो व्यक्ति को आत्म-साक्षरता और आत्म-नियंत्रण की ओर ले जाता है।
'अफलाकाङ्क्षिभिः' का मतलब है जो लोग तप करते समय किसी प्रकार के परिणाम या फल की आकांक्षा नहीं रखते, वे लोग इस तप को करते हैं। यहाँ 'अफलाकाङ्क्षी' का मतलब है फल की इच्छा न रखने वाला।
सात्त्विकं परिचक्षते: अंत में, यह स्पष्ट किया गया है कि ऐसा तप, जिसमें परम श्रद्धा और भक्ति के साथ फल की इच्छा नहीं होती, वह तप सात्त्विक होता है।
यह श्लोक बताता है कि तप की गुणवत्ता उसकी श्रद्धा और भक्ति पर निर्भर करती है। जब तप को शुद्ध भाव से, बिना किसी स्वार्थ या फल की इच्छा के किया जाता है, तब वह सात्त्विक तप कहलाता है।
इस प्रकार, श्रीकृष्ण ने तपस्या के महत्व और उसकी वास्तविकता को स्पष्ट किया है, जो कि भक्तिपूर्वक और निःस्वार्थ भाव से की जाती है।

17॥17॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 18

श्लोक:
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्‌।
 क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्‌॥

भावार्थ:
जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित 
(अनिश्चित फलवाला' उसको कहते हैं कि जिसका फल होने न होने में शंका हो।) 
एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है

जो तपस्या दंभपूर्वक तथा सम्मान, सत्कार एवं पूजा कराने के लिए सम्पन्न की जाती है, वह राजसी (रजोगुणी) कहलाती है। यह न तो स्थायी होती है न शाश्वत।

तात्पर्य : कभी-कभी तपस्या इसलिए की जाती है कि लोग आकर्षित हों तथा उनसे सत्कार, सम्मान तथा पूजा मिल सके। रजोगुणी लोग अपने अधीनस्थों से पूजा करवाते हैं और उनसे चरण धुलवाकर धन चढ़वाते हैं। तपस्या करने के बहाने ऐसे कृत्रिम आयोजन राजसी माने जाते हैं। इनके फल क्षणिक होते हैं, वे कुछ समय तक रहते हैं। वे कभी स्थायी नहीं होते।
 17॥18॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 19

श्लोक:
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
 परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌॥

भावार्थ:
जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है
 
(सिद्धि ,तंत्र ,मंत्र,यंत्र आदि से आज बहुत से विज्ञापन भी आते है ,वश्वीकरण करवालों , शत्रु का नाश करवालों सब तामस स्वरूप हैं )
जो तपस्या दंभपूर्वक तथा सम्मान, सत्कार एवं पूजा कराने के लिए सम्पन्न की जाती है, वह राजसी (रजोगुणी) कहलाती है। यह न तो स्थायी होती है न शाश्वत।

तात्पर्य : कभी-कभी तपस्या इसलिए की जाती है कि लोग आकर्षित हों तथा उनसे सत्कार, सम्मान तथा पूजा मिल सके। रजोगुणी लोग अपने अधीनस्थों से पूजा करवाते हैं और उनसे चरण धुलवाकर धन चढ़वाते हैं। तपस्या करने के बहाने ऐसे कृत्रिम आयोजन राजसी माने जाते हैं। इनके फल क्षणिक होते हैं, वे कुछ समय तक रहते हैं। वे कभी स्थायी नहीं होते।
और जो मूर्खतावश आत्म-उत्पीड़न के लिए या अन्यों को विनष्ट करने या हानि पहुँचाने के लिए जो तपस्या की जाती है, वह तामसी कहलाती है।

तात्पर्य : मूर्खतापूर्ण तपस्या के ऐसे अनेक दृष्टान्त हैं, जैसे कि हिरण्यकशिपु जैसे असुरों ने अमर बनने तथा देवताओं का वध करने के लिए कठिन तप किए। उसने ब्रह्मा से ऐसी ही वस्तुएँ माँगी थीं, लेकिन अन्त में वह भगवान् द्वारा मारा गया। किसी असम्भव वस्तु के लिए तपस्या करना निश्चय ही तामसी तपस्या है।
17॥19॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 20

श्लोक:
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
 देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥

भावार्थ:
दान देना ही कर्तव्य है- ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल 
(जिसप्रकार देश-काल में जिस वस्तु का अभाव हो, वही देश-काल, उस वस्तु द्वारा प्राणियों की सेवा करने के लिए योग्य समझा जाता है।)

 और पात्र के 
(भूखे, अनाथ, दुःखी, रोगी और असमर्थ तथा भिक्षुक आदि तो अन्न, वस्त्र और ओषधि एवं जिस वस्तु का जिसके पास अभाव हो, उस वस्तु द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र समझे जाते हैं और श्रेष्ठ आचरणों वाले विद्वान्‌ ब्राह्मणजन धनादि सब प्रकार के पदार्थों द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र समझे जाते हैं।) 

प्राप्त होने पर उपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।

वैदिक साहित्य में ऐसे व्यक्ति को दान देने की संस्तुति है, जो आध्यात्मिक कार्यों में लगा हो। अविचारपूर्ण ढंग से दान देने की संस्तुति नहीं है। आध्यात्मिक सिद्धि को सदैव ध्यान में रखा जाता है। अतएव किसी तीर्थ स्थान में, सूर्य या चन्द्रग्रहण के समय, मासान्त में या योग्य ब्राह्मण अथवा वैष्णव (भक्त) को, या मन्दिर में दान देने की संस्तुति है। बदले में किसी प्रकार की प्राप्ति की अभिलाषा न रखते हुए ऐसे दान किये जाने चाहिए। कभी-कभी निर्धन को दान करुणावश दिया जाता है। लेकिन यदि निर्धन दान देने योग्य (पात्र) नहीं होता, तो उससे आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती। दूसरे शब्दों में, वैदिक साहित्य में अविचारपूर्ण दान की संस्तुति नहीं है।

(प्रायः देखा जाता है कुछ लोग दान लेते हुए मीन मेख़ बहुत निकालते हैं।ऐसा अक्सर हम अपने आस पास और तीर्थ यात्रा पर देखने को मिलजाता है जो दान की संस्तुति नहीं है )
दान देने और लेने में किसी भी प्रकार का घमंड नहीं आना चाहिये।
यदि ऐसा कोई ब्राह्मण करे तो उसे 500₹ के दान को ना देते हुए ब्राह्मण के या किसी और के बच्चे को 50₹ दान में दे और देखे वह कैसे प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करता है।

नोट:

दान चाहे लाखों का करे जब तक दक्षिणा नहीं देते तब तक दान नहीं लगता।

अनुपकारिणे दान: दान करने का उद्देश्य केवल दूसरों की सेवा करना और उन्हें लाभ पहुँचाना होना चाहिए, न कि किसी प्रकार के बदले की आशा करना।

इस प्रकार, दान की सात्त्विकता उस समय, स्थान और पात्र के अनुसार तय की जाती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दान सही मायने में प्रभावशाली और उपयोगी हो सके।
 
अब अगले श्लोक में

किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक 
(जैसे प्रायः वर्तमान समय के चन्दे-चिट्ठे आदि में धन दिया जाता है।) 
तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में 
(अर्थात्‌ मान बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि की प्राप्ति के लिए अथवा रोगादि की निवृत्ति के लिए।) 
रखकर फिर दिया जाता है, वह दान क्या  कहा जाता है।
17॥20॥

अध्याय 17श्लोक: 21

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुन: ।  
 दीयते च परिक्ल‍ि‍ष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् 
17॥ 21 ॥  
 
 किन्तु जो दान प्रत्युपकार की भावना से या कर्म फल की इच्छा से या अनिच्छापूर्वक किया जाता है, वह रजोगुणी (राजस) कहलाता है।

*तात्पर्य:* 

दान कभी स्वर्ग जाने के लिए दिया जाता है, तो कभी अत्यन्त कष्ट से तथा कभी इस पश्चात्ताप के साथ कि “मैंने इतना व्यय इस तरह क्यों किया?” कभी-कभी अपने वरिष्ठजनों के दबाव में आकर भी दान दिया जाता है। ऐसे दान रजोगुण में दिये गये माने जाते हैं।  

 ऐसे अनेक दातव्य न्यास हैं, जो उन संस्थाओं को दान देते हैं, जहाँ इन्द्रियभोग का बाजार गर्म रहता है। वैदिक शास्त्र ऐसे दान की संस्तुति नहीं करते। केवल सात्त्विक दान की संस्तुति की गई है।

किन्तु जो दान प्रत्युपकार की भावना से या कर्म फल की इच्छा से या अनिच्छापूर्वक किया जाता है, वह रजोगुणी (राजस) कहलाता है।

तात्पर्य : दान कभी स्वर्ग जाने के लिए दिया जाता है, तो कभी अत्यन्त कष्ट से तथा कभी इस पश्चात्ताप के साथ कि "मैंने इतना व्यय इस तरह क्यों किया?" कभी-कभी अपने वरिष्ठजनों के दबाव में आकर भी दान दिया जाता है। ऐसे दान रजोगुण में दिये गये माने जाते हैं।
ऐसे अनेक दातव्य न्यास हैं, जो उन संस्थाओं को दान देते हैं, जहाँ इन्द्रियभोग का बाजार गर्म रहता है। वैदिक शास्त्र ऐसे दान की संस्तुति नहीं करते। केवल सात्त्विक दान की संस्तुति(recommendation)
 की गई है।
17॥ 21 ॥  
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 22

श्लोक:
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
 असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥

भावार्थ:
जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है
 17॥22॥
तथा जो दान किसी अपवित्र स्थान में, अनुचित समय में, किसी अयोग्य व्यक्ति को या बिना समुचित ध्यान तथा आदर से दिया जाता है, वह तामसी कहलाता है।

तात्पर्य : यहाँ पर मद्यपान तथा द्यूतक्रीड़ा में व्यसनी के लिए दान देने को प्रोत्साहन नहीं दिया गया। ऐसा दान तामसी है। ऐसा दान लाभदायक नहीं होता, वरन् इससे पापी पुरुषों को प्रोत्साहन मिलता है। इसी प्रकार, यदि बिना सम्मान तथा ध्यान दिये किसी उपयुक्त व्यक्ति को दान दिया जाय, तो वह भी तामसी है।

नोट:✍️जुआ खाने, शराब के,ठेके, वैश्या के कोठे पर मनुष्य जब श्री विष्णु पत्नी लक्ष्मी जी को के कर चला जाता है।तो अपनी लक्ष्मी (पत्नी) को क्यों नहीं लेके जाता ऐसी जगह?
17॥22॥

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 23

श्लोक:
(ॐ तत्सत्‌ के प्रयोग की व्याख्या) ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
 ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥

भावार्थ:
ॐ, तत्‌, सत्‌-ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गए
 
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने ‘ॐ तत्सत्‌’ के प्रयोग की व्याख्या की है। यहां पर 'ॐ', 'तत्' और 'सत्' तीन प्रमुख शब्दों के रूप में ब्रह्मा, सच्चिदानंद और अस्तित्व की विशिष्टता को दर्शाया गया है।

(✍️नोट हर मंत्र ॐ से शुरू होता है।जिस के प्रयोग के नियम होते है।राम नाम ही ऐसा मंत्र हे जिस को आप बिना किसी नियम के जप सकते है।उल्टा सीधा जैसे भी जो लाभ कारी ही होता है।)
ॐ - यह ब्रह्मा के सर्वसमर्थ और आदिपरमात्मा स्वरूप को सूचित करता है। यह उच्चतम ब्रह्म का प्रतीक है, जो अनंत और अपरिवर्तनीय है।
तत् - यह ब्रह्मा के अद्वितीयता और एकात्मकता को दर्शाता है, अर्थात् यह संपूर्ण ब्रह्म के संदर्भ में होता है।
सत् - यह ब्रह्मा के सत्यता और अस्तित्व का प्रमाण है। यह ब्रह्म के स्थिर और शाश्वत स्वरूप को इंगित करता है।
पहले के वेदों और यज्ञों के प्रयोग में इसी ‘ॐ तत्सत्’ का प्राय: प्रयोग किया जाता था। इसका तात्पर्य यह है कि वेद और यज्ञों के संकल्प और कार्य वही सच्चिदानंदघन ब्रह्म के प्रति समर्पित होते हैं। जब इन कार्यों में ‘ॐ तत्सत्’ का प्रयोग होता है, तो यह संकेत करता है कि वे कार्य ब्रह्म के प्रति पूर्ण श्रद्धा और आदर से किए जा रहे हैं।
यह बताया जा चुका है कि तपस्या, यज्ञ, दान तथा भोजन के तीन-तीन भेद हैं- सात्त्विक, राजस तथा तामस । लेकिन चाहे ये उत्तम हों, मध्यम हों या निम्न हों, ये सभी बद्ध तथा भौतिक गुणों से कलुषित हैं। किन्तु जब ये ब्रह्म - ॐ तत् सत् को लक्ष्य करके किये जाते हैं तो आध्यात्मिक उन्नति के साधन बन जाते हैं। शास्त्रों में ऐसे लक्ष्य का संकेत हुआ है। ॐ तत् सत् ये तीन शब्द विशेष रूप में परम सत्य भगवान् के सूचक हैं। वैदिक मन्त्रों में ॐ शब्द सदैव रहता है।
जो व्यक्ति शास्त्रों के विधानों के अनुसार कर्म नहीं करता, उसे परब्रह्म की प्राप्ति नहीं होती। भले ही उसे क्षणिक फल प्राप्त हो जाये, लेकिन उसे चरमगति प्राप्त नहीं हो पाती । तात्पर्य यह है कि दान, यज्ञ तथा तप को सतोगुण में रहकर करना चाहिए। रजो या तमोगुण में सम्पन्न करने पर ये निश्चित रूप से निम्न कोटि के होते हैं। ॐ तत् सत् शब्दों का उच्चारण परमेश्वर के पवित्र नाम के साथ किया जाता है, उदाहरणार्थ, ॐ तद्विष्णोः। जब भी किसी वैदिक मंत्र का या परमेश्वर का नाम लिया जाता है, तो उसके साथ ॐ जोड़ दिया जाता है। यह वैदिक साहित्य का सूचक है। ये तीन शब्द वैदिक मंत्रों से लिए जाते हैं। ॐ इत्येतद्ब्रह्मणो नेदिष्ठं नाम (ऋग्वेद) प्रथम लक्ष्य का सूचक है। फिर तत् त्वमसि (छान्दोग्य उपनिषद ६.८.७) दूसरे लक्ष्य का सूचक है। तथा सद् एव सौम्य (छान्दोग्य उपनिषद ६.२.१) तृतीय लक्ष्य का सूचक है। ये तीनों मिलकर ॐ तत् सत् हो जाते हैं। आदिकाल में जब प्रथम जीवात्मा ब्रह्मा ने यज्ञ किये, तो उन्होंने इन तीनों शब्दों के द्वारा भगवान् को लक्षित किया था। अतएव गुरु परम्परा द्वारा उसी सिद्धान्त का पालन किया जाता रहा है। अतः इस मन्त्र का अत्यधिक महत्त्व है। अतएव भगवद्गीता के अनुसार कोई भी कार्य ॐ तत् सत् के लिए, अर्थात् भगवान् के लिए किया जाना चाहिए। जब कोई इन तीनों शब्दों के द्वारा तप, दान तथा यज्ञ सम्पन्न करता है, तो वह कृष्णभावनामृत में कार्य करता है। कृष्णभावनामृत दिव्य कार्यों का वैज्ञानिक कार्यान्वयन है, जिससे मनुष्य भगवद्धाम वापस जा सके। ऐसी दिव्य विधि से कर्म करने में शक्ति का क्षय नहीं होता।अतः इस श्लोक का तात्पर्य है कि वेदों, यज्ञों और अन्य धार्मिक क्रियाओं में ‘ॐ तत्सत्’ का प्रयोग ब्रह्मा के तत्त्व की पुष्टि करता है और यह सभी कार्य ब्रह्म के प्रति समर्पित और आदरपूर्ण होते हैं।

17॥23॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 24

श्लोक:
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः।
 प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌॥

भावार्थ:
इसलिए वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं
 
✍️नोट यहां ध्यान रहे गीता खुद ही शास्त्र है

17॥24॥

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 25

श्लोक:
तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
 दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥

भावार्थ:
तत्‌ अर्थात्‌ 'तत्‌' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है- इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं
 ॐ तद् विष्णोः परमं पदम् (ऋग्वेद १.२२.२०)। विष्णु के चरणकमल परम भक्ति के आश्रय हैं। भगवान् के लिए सम्पन्न हर एक क्रिया सारे कार्यक्षेत्र की सिद्धि निश्चित कर देती है।
आध्यात्मिक पद तक उठने के लिए मनुष्य को चाहिए कि किसी लाभ के निमित्त कर्म न करे। सारे कार्य भगवान् के परम धाम वापस जाने के उद्देश्य से किये जायँ, जो चरम उपलब्धि है।

17॥25॥

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 26

श्लोक:
सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते।
 प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥

भावार्थ:
'सत्‌'- इस प्रकार यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कर्म में भी 'सत्‌' शब्द का प्रयोग किया जाता है
 परम सत्य भक्तिमय यज्ञ का लक्ष्य है और उसे सत् शब्द से अभिहित किया जाता है। हे पृथापुत्र! ऐसे यज्ञ का सम्पन्नकर्ता भी 'सत्' कहलाता है, जिस प्रकार यज्ञ, तप तथा दान के सारे कर्म भी, जो परमपुरुष को प्रसन्न करने के लिए सम्पन्न किये जाते हैं, 'सत्' हैं।
प्रशस्ते कर्मणि अर्थात् "नियत कर्तव्य" सूचित करते हैं कि वैदिक साहित्य में ऐसी कई क्रियाएँ निर्धारित हैं, जो गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक संस्कार के रूप में हैं। ऐसे संस्कार जीव की चरम मुक्ति के लिए होते हैं। ऐसी सारी क्रियाओं के समय ॐ तत् सत् उच्चारण करने की संस्तुति की जाती है। सद्भाव तथा साधुभाव आध्यात्मिक स्थिति के सूचक हैं। कृष्णभावनामृत में कर्म करना सत् है और जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत के कार्यों के प्रति सचेष्ट रहता है, वह साधु कहलाता है।
श्रीमद्भागवत में (३.२५.२५) कहा गया है कि भक्तों की संगति से आध्यात्मिक विषय स्पष्ट हो जाता है। इसके लिए सतां प्रसङ्गात् शब्द व्यवहृत हुए हैं। बिना सत्संग के दिव्य ज्ञान उपलब्ध नहीं हो पाता। किसी को दीक्षित करते समय या यज्ञोपवीत धारण कराते समय ॐ तत् सत् शब्दों का उच्चारण किया जाता है। इसी प्रकार सभी प्रकार के यज्ञ करते समय ॐ तत् सत् या ब्रह्म ही चरम लक्ष्य होता है। तदर्थीयम् शब्द ब्रह्म का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी भी कार्य में सेवा करने का सूचक है, जिसमें भगवान् के मन्दिर में भोजन पकाना तथा सहायता करने जैसी सेवाएँ या भगवान् के यश का प्रसार करने वाला अन्य कोई भी कार्य सम्मिलित है। इस तरह ॐ तत् सत् शब्द समस्त कार्यों को पूरा करने के लिए कई प्रकार से प्रयुक्त किये जाते हैं।
17॥26॥
भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 27

श्लोक:
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
 कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते॥

भावार्थ:
तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्‌' इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्‌-ऐसे कहा जाता है
 17॥27॥

भगवद  गीता अध्याय: 17
श्लोक 28

श्लोक:
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌।
 असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है- वह समस्त 'असत्‌'- इस प्रकार कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही
 
चाहे यज्ञ हो, दान हो या तप हो, बिना आध्यात्मिक लक्ष्य के व्यर्थ रहता है। अतएव इस श्लोक में यह घोषित किया गया है कि ऐसे कार्य कुत्सित हैं। प्रत्येक कार्य कृष्णभावनामृत में रहकर ब्रह्म के लिए किया जाना चाहिए। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में भगवान् में श्रद्धा की संस्तुति की गई है। ऐसी श्रद्धा तथा समुचित मार्गदर्शन के बिना कोई फल नहीं मिल सकता। समस्त वैदिक आदेशों के पालन का चरम लक्ष्य कृष्ण को जानना है। इस सिद्धान्त का पालन किये बिना कोई सफल नहीं हो सकता। इसीलिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग यही है कि मनुष्य प्रारम्भ से ही किसी प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन में कृष्णभावनामृत में कार्य करे। सब प्रकार से सफल होने का यही मार्ग है।
बद्ध अवस्था में लोग देवताओं, भूतों या कुबेर जैसे यक्षों की पूजा के प्रति आकृष्ट होते हैं। यद्यपि सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण से श्रेष्ठ है, लेकिन जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है, वह प्रकृति के इन तीनों गुणों को पार कर जाता है । यद्यपि क्रमिक उन्नति की विधि है, किन्तु शुद्ध भक्तों की संगति से यदि कोई कृष्णभावनामृत ग्रहण करता है, तो यह सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। इस अध्याय में इसी की संस्तुति की गई है। इस प्रकार से सफलता पाने के लिए उपयुक्त गुरु प्राप्त करके उसके निर्देशन में प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। तभी ब्रह्म में श्रद्धा हो सकती है। जब कालक्रम से यह श्रद्धा परिपक्व होती है, तो इसे ईश्वरप्रेम कहते हैं। यही प्रेम समस्त जीवों का चरम लक्ष्य है। अतएव मनुष्य को चाहिए कि सीधे कृष्णभावनामृत ग्रहण करे। इस सत्रहवें अध्याय का यही संदेश है। जैसा मैने समझा वैसा ही बता दिया।

17॥28॥ 
 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय : 
 ॥17॥

अध्याय 16

अध्याय 16

भगवद्गीता के अध्याय 16 में मानव स्वभाव के दो प्रकारों का वर्णन किया गया है: दैवी प्रकृति, आसुरी प्रकृति. 
इस अध्याय में श्रीकृष्ण बताते हैं कि कैसे मनुष्य में दैवी प्रकृति विकसित की जा सकती है और आसुरी प्रकृति से बचा जा सकता है:
दैवी प्रकृति विकसित करने के लिए, सतोगुणी गुणों का विकास करना चाहिए.
शास्त्रों में दिए गए निर्देशों का पालन करना चाहिए.
आध्यात्मिक साधना से मन को शुद्ध करना चाहिए.
इनसे दैवी संपत्ति या ईश्वरीय गुण आकर्षित होते हैं.
अंत में, ईश्वर प्राप्ति की ओर ले जाते हैं. 
वहीं, आसुरी प्रकृति विकसित होती है, जब:
वासना और अज्ञानता के गुणों का विकास होता है.
भौतिक रूप से केंद्रित जीवन शैली अपनाई जाती है.
इससे मानव व्यक्तित्व में अस्वास्थ्यकर गुण विकसित होते हैं.
अंत में, आत्मा नरक जैसे अस्तित्व में चली जाती है. 

अध्याय 16
श्लोक: 1-3
श्रीभगवानुवाच  
 अभयं सत्त्वसंश‍ुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: ।  
 दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ 1॥  
 अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैश‍ुनम् ।  
 दया भूतेष्वलोलुप्‍त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ 2 ॥  
 तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता ।  
 भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ 3 ॥  
 

अनुवाद:भगवान् ने कहा—हे भरतपुत्र! निर्भयता, आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन, दान, आत्म-संयम, यज्ञपरायणता, वेदाध्ययन, तपस्या, सरलता, अहिंसा, सत्यता, क्रोधविहीनता, त्याग, शान्ति, छिद्रान्वेषण में अरुचि, समस्त जीवों पर करुणा, लोभविहीनता, भद्रता, लज्जा, संकल्प, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, ईर्ष्या तथा सम्मान की अभिलाषा से मुक्ति—ये सारे दिव्य गुण हैं, जो दैवी प्रकृति से सम्पन्न देवतुल्य पुरुषों में पाये जाते हैं।

तात्पर्य: पन्द्रहवें अध्याय के प्रारम्भ में इस भौतिक जगत् रूपी अश्वत्थ वृक्ष की व्याख्या की गई थी। उससे निकलने वाली अतिरिक्त जड़ों की तुलना जीवों के शुभ तथा अशुभ कर्मों से की गई थी। नवें अध्याय में भी देवों तथा असुरों का वर्णन हुआ है। अब, वैदिक अनुष्ठानों के अनुसार, सतोगुण में किये गये सारे कार्य मुक्तिपथ में प्रगति करने के लिए शुभ माने जाते हैं और ऐसे कार्यों को दैवी प्रकृति कहा जाता है। जो लोग इस दैवीप्रकृति में स्थित होते हैं, वे मुक्ति के पथ पर अग्रसर होते हैं। इसके विपरीत उन लोगों के लिए, जो रजो तथा तमोगुण में रहकर कार्य करते हैं, मुक्ति की कोई सम्भावना नहीं रहती। उन्हें या तो मनुष्य की तरह इसी भौतिक जगत् में रहना होता है या फिर वे पशुयोनि में या इससे भी निम्न योनियों में अवतरित होते हैं। इस सोलहवें अध्याय में भगवान् दैवीप्रकृति तथा उसके गुणों एवं आसुरी प्रकृति तथा उसके गुणों का समान रूप से वर्णन करते हैं। वे इन गुणों के लाभों तथा हानियों का भी वर्णन करते हैं।  

 दिव्यगुणों या दैवीप्रवृत्तियों से युक्त उत्पन्न व्यक्ति के प्रसंग में प्रयुक्त अभिजातस्य शब्द बहुत सार-गर्भित है। दैवी परिवेश में सन्तान उत्पन्न करने को वैदिक शास्त्रों में गर्भाधान संस्कार कहा गया है। यदि माता-पिता चाहते हैं कि दिव्यगुणों से युक्त सन्तान उत्पन्न हो, तो उन्हें सामाजिक जीवन में मनुष्यों के लिए बताये गये दस नियमों का पालन करना चाहिए। गर्भाधान संस्कार में बताए गए दस नियम जिनका पालन माता-पिता को करना चाहिए ताकि दिव्यगुणों से युक्त सन्तान उत्पन्न हो, निम्नलिखित हैं:

दस नियम
1. *सत्य*: माता-पिता को सत्य बोलना चाहिए और अपने जीवन में सत्य का पालन करना चाहिए।
2. *अहिंसा*: माता-पिता को अहिंसा का पालन करना चाहिए और किसी भी जीव को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए।
3. *अस्तेय*: माता-पिता को अस्तेय का पालन करना चाहिए और किसी की चीज़ को बिना अनुमति के नहीं लेना चाहिए।
4. *ब्रह्मचर्य*: माता-पिता को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और अपने जीवन में संयम और नियंत्रण रखना चाहिए।
5. *अपरिग्रह*: माता-पिता को अपरिग्रह का पालन करना चाहिए और किसी भी प्रकार की लालच या मोह से मुक्त रहना चाहिए।
6. *शौच*: माता-पिता को शौच का पालन करना चाहिए और अपने शरीर और मन को स्वच्छ और पवित्र रखना चाहिए।
7. *इन्द्रिय-निग्रह*: माता-पिता को इन्द्रिय-निग्रह का पालन करना चाहिए और अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करना चाहिए।
8. *धी*: माता-पिता को धी का पालन करना चाहिए और अपने मन को शांत और एकाग्र रखना चाहिए।
9. *विद्या*: माता-पिता को विद्या का पालन करना चाहिए और अपने ज्ञान और बुद्धिमत्ता को बढ़ाना चाहिए।
10. *स्वाध्याय*: माता-पिता को स्वाध्याय का पालन करना चाहिए और अपने जीवन में आत्म-चिंतन और आत्म-विकास को बढ़ावा देना चाहिए।
भगवद्गीता में हम पहले ही पढ़ चुके हैं कि अच्छी सन्तान उत्पन्न करने के निमित्त मैथुन-जीवन साक्षात् कृष्ण है। मैथुन-जीवन गर्हित नहीं है, यदि इसका कृष्ण भावनामृत में प्रयोग किया जाय। जो लोग कृष्णभावनामृत में हैं, कम से कम उन्हें तो कुत्ते-बिल्लियों की तरह सन्तानें उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। उन्हें ऐसी सन्तानें उत्पन्न करनी चाहिए जो जन्म लेने के पश्चात् कृष्ण भावना भावित हो सकें। कृष्णभावनामृत में तल्लीन माता-पिता से उत्पन्न सन्तानों को इतना लाभ तो मिलना ही चाहिए।  

 वर्णाश्रमधर्म नामक सामाजिक संस्था—जो समाज को सामाजिक जीवन के चार विभागों एवं काम-धन्धों अथवा वर्णों के चार विभागों में विभाजित करती है—मानव समाज को जन्म के अनुसार विभाजित करने के उद्देश्य से नहीं है। ऐसा विभाजन शैक्षिक योग्यताओं के आधार पर किया जाता है। ये विभाजन समाज में शान्ति तथा सम्पन्नता बनाये रखने के लिए हैं। 

यहाँ पर जिन गुणों का उल्लेख हुआ है, उन्हें दिव्य कहा गया है और वे आध्यात्मिक ज्ञान में प्रगति करने वाले व्यक्तियों के निमित्त हैं, जिससे वे भौतिक जगत् से मुक्त हो सकें।  

 वर्णाश्रम संस्था में संन्यासी को समस्त सामाजिक वर्र्णों तथा आश्रमों में प्रधान या गुरु माना जाता है। 
ब्राह्मण को समाज के तीन वर्णों—क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों—का गुरु माना जाता है, 

लेकिन संन्यासी इस संस्था के शीर्ष पर होता है और ब्राह्मणों का भी गुरु माना जाता है। 

संन्यासी की पहली योग्यता निर्भयता होनी चाहिए। चूँकि संन्यासी को किसी सहायक के बिना एकाकी रहना होता है, अतएव भगवान् की कृपा ही उसका एकमात्र आश्रय होता है। जो यह सोचता है कि सारे सम्बन्ध तोड़ लेने के बाद मेरी रक्षा कौन करेगा, तो उसे संन्यास आश्रम स्वीकार ही नहीं करना चाहिए। 

उसे यह पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि कृष्ण या अन्तर्यामी स्वरूप परमात्मा सदैव अन्तर में रहते हैं, वे सब कुछ देखते रहते हैं और जानते हैं कि कोई क्या करना चाहता है। इस तरह मनुष्य को दृढविश्वास होना चाहिए कि परमात्मा स्वरूप कृष्ण शरणागत व्यक्ति की रक्षा करेंगे। उसे सोचना चाहिए “मैं कभी अकेला नहीं हूँ, भले ही मैं गहनतम जंगल में क्यों न रहूँ। मेरा साथ कृष्ण देंगे और सब तरह से मेरी रक्षा करेंगे।” ऐसा विश्वास अभयम् या निर्भयता कहलाता है। संन्यास आश्रम में व्यक्ति की ऐसी मनोदशा आवश्यक है।  

 तब उसे अपने अस्तित्व को शुद्ध करना होता है। संन्यास आश्रम में पालन किये जाने के लिए अनेक विधि-विधान हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि संन्यासी को किसी स्त्री के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए। उसे एकान्त स्थान में स्त्री से बातें करने तक की मनाही है। भगवान् चैतन्य आदर्श संन्यासी थे और जब वे पुरी में रह रहे थे, तो उनकी भक्तिनों को उनके पास नमस्कार करने तक के लिए नहीं आने दिया जाता था। उन्हें दूर से ही प्रणाम करने के लिए आदेश था। यह स्त्री जाति के प्रति घृणाभाव का चिह्न नहीं था, अपितु संन्यासी पर लगाया गया प्रतिबन्ध था कि उसे स्त्रियों से निकट सम्पर्क नहीं रखना चाहिए। मनुष्य को अपने अस्तित्व को शुद्ध बनाने के लिए जीवन की विशेष परिस्थिति (स्तर) में विधि-विधानों का पालन करना होता है। संन्यासी के लिए स्त्रियों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध तथा इन्द्रियतृप्ति के लिए धन-संग्रह वर्जित हैं। आदर्श संन्यासी तो स्वयं भगवान् चैतन्य थे और उनके जीवन से हमें यह सीख लेनी चाहिए कि वे स्त्रियों के विषय में कितने कठोर थे। यद्यपि वे भगवान् के सबसे वदान्य अवतार माने जाते हैं, क्योंकि वे अधम से अधम बद्ध जीवों को स्वीकार करते थे, लेकिन जहाँ तक स्त्रियों की संगति का प्रश्न था, वे संन्यास आश्रम के विधि-विधानों का कठोरता के साथ पालन करते थे। उनका एक निजी पार्षद, छोटा हरिदास, अन्य पार्षदों के सहित उनके साथ निरन्तर रहा, लेकिन किसी कारणवश उसने एक तरुणी को कामुक दृष्टि से देखा। भगवान् चैतन्य इतने कठोर थे कि उन्होंने उसे अपने पार्षदों की संगति से तुरन्त बाहर निकाल दिया। भगवान् चैतन्य ने कहा, “जो संन्यासी या अन्य कोई व्यक्ति प्रकृति के चंगुल से छूटने का इच्छुक है और अपने को आध्यात्मिक प्रकृति तक ऊपर उठाना चाहता है तथा भगवान् के पास वापस जाना चाहता है, वह यदि भौतिक सम्पत्ति तथा स्त्री की ओर इन्द्रियतृप्ति के लिए देखता है—भले ही वह उनका भोग न करे, केवल उनकी ओर इच्छा-दृष्टि से देखे, तो भी वह इतना गर्हित है कि उसके लिए श्रेयस्कर होगा कि वह ऐसी अवैध इच्छाएँ करने के पूर्व आत्महत्या कर ले।” इस तरह शुद्धि की ये विधियाँ हैं।  

 अगला गुण है, ज्ञानयोग व्यवस्थिति—ज्ञान के अनुशीलन में संलग्न रहना। संन्यासी का जीवन गृहस्थों तथा उन सबों को, जो आध्यात्मिक उन्नति के वास्तविक जीवन को भूल चुके हैं, ज्ञान वितरित करने के लिए होता है। संन्यासी से आशा की जाती है कि वह अपनी जीविका के लिए द्वार-द्वार भिक्षाटन करे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह भिक्षुक है। विनयशीलता भी आध्यात्मिकता में स्थित मनुष्य की एक योग्यता है। संन्यासी मात्र विनयशीलता वश द्वार-द्वार जाता है, भिक्षाटन के उद्देश्य से नहीं जाता, अपितु गृहस्थों को दर्शन देने तथा उनमें कृष्णभावनामृत जगाने के लिए जाता है। यह संन्यासी का कर्तव्य है कि वह तीन घरों से अधिक घरों में भिक्षा के लिए ना जाए कुछ मिले या ना मिले संतोष करले ब्रह्मा, विष्णु,महेश के तीन घर कहे गए है। 

यदि वह वास्तव में सन्यासी उन्नत है और उसे गुरु का आदेश प्राप्त है, तो उसे तर्क तथा ज्ञान द्वारा कृष्णभावनामृत का उपदेश करना चाहिए और यदि वह इतना उन्नत नहीं है, तो उसे संन्यास आश्रम ग्रहण नहीं करना चाहिए। लेकिन यदि किसी ने पर्याप्त ज्ञान के बिना ही संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया है, तो उसे ज्ञान अनुशीलन के लिए प्रामाणिक गुरु से श्रवण में रत होना चाहिए। संन्यासी को निर्भीक होना चाहिए, उसे सत्त्वसंशुद्धि तथा ज्ञानयोग में स्थित होना चाहिए।  

 अगला गुण दान है। दान गृहस्थों के लिए है।

 गृहस्थों को चाहिए कि वे निष्कपटता से जीवनयापन करना सीखें और कमाई का 10 प्रतिशत विश्व भर में जरूरत मंदों  की सेवा में खर्च करे इस प्रकार से गृहस्थ को चाहिए कि ऐसे कार्य में लगे  दान योग्य पात्र को दिया जाना चाहिए। जैसा आगे वर्णन किया जाएगा, दान भी कई तरह का होता है—यथा सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण में दिया गया दान। सतोगुण में दिये जाने वाले दान की संस्तुति शास्त्रों ने की है, लेकिन रजो तथा तमोगुण में दिये गये दान की संस्तुति नहीं है, क्योंकि यह धन का अपव्यय मात्र है। संसार भर में कृष्णभावनामृत के प्रसार हेतु भी दान दिया जाना चाहिए। ऐसा दान सतोगुणी होता है।  

 जहाँ तक दम (आत्मसंयम) का प्रश्न है, यह धार्मिक समाज के अन्य आश्रमों के ही लिए नहीं है, अपितु गृहस्थ के लिए विशेष रूप से है। यद्यपि उसके पत्नी होती है, लेकिन उसे चाहिए कि व्यर्थ ही अपनी इन्द्रियों को विषयभोग की ओर न मोड़े। गृहस्थों पर भी मैथुन-जीवन के लिए प्रतिबन्ध है और इसका उपयोग केवल सन्तानोत्पत्ति के लिए किया जाना चाहिए। यदि वह सन्तान नहीं चाहता, तो उसे अपनी पत्नी के साथ विषय-भोग में लिप्त नहीं होना चाहिए। 

आधुनिक समाज मैथुन-जीवन का भोग करने के लिए निरोध-विधियों का या अन्य घृणित विधियों का उपयोग करता है, जिससे सन्तान का उत्तरदायित्व न उठाना पड़े। यह दिव्य गुण नहीं, अपितु आसुरी गुण है। यदि कोई व्यक्ति, चाहे वह गृहस्थ ही क्यों न हो, आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना चाहता है, तो उसे अपने मैथुन-जीवन पर संयम रखना होगा और उसे ऐसी सन्तान  उत्पन्न करनी चाहिए, जो कृष्ण की सेवा में कामआए। यदि वह ऐसी सन्तान उत्पन्न करता है, जो कृष्णभावनाभावित हो सके, तो वह सैकड़ों सन्तानें उत्पन्न कर सकता है। लेकिन ऐसी क्षमता के बिना किसी को इन्द्रियसुख के लिए काम-भोग में लिप्त नहीं होना चाहिए।  

 गृहस्थों को यज्ञ भी करना चाहिए, क्योंकि यज्ञ के लिए पर्याप्त धन चाहिए। 

ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम वालों के पास धन नहीं होता। वे तो भिक्षाटन करके जीवित रहते हैं। अतएव विभिन्न प्रकार के यज्ञ गृहस्थों के दायित्व हैं। उन्हें चाहिए कि वैदिक साहित्य द्वारा आदिष्ट अग्निहोत्र यज्ञ करें, लेकिन आज-कल ऐसे यज्ञ अत्यन्त खर्चीले हैं और हर किसी गृहस्थ के लिए इन्हें सम्पन्न कर पाना कठिन है। इस युग के लिए संस्तुत सर्वश्रेष्ठ यज्ञ है—संकीर्तनयज्ञ। यह संकीर्तनयज्ञ—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे, हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—का जप सर्वोत्तम और सबसे कम खर्च वाला यज्ञ है और अन्य छोटे छोटे यज्ञ जैसे किसी को उसका भार उठाने में मदद करना, जहां वो जाना चाहे सही मार्ग दर्शन करवाना और मदद करना कि उसे कोई दिक्कत ना हो।

प्रत्येक व्यक्ति इसे करके लाभ उठा सकता है। अतएव दान, इन्द्रियसंयम तथा यज्ञ करना—ये तीन बातें गृहस्थ के लिए हैं।  

 स्वाध्याय या वेदाध्ययन ब्रह्मचर्य आश्रम या विद्यार्थी जीवन के लिए है। ब्रह्मचारियों का स्त्रियों से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। उन्हें ब्रह्मचर्यजीवन बिताना चाहिए और आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन हेतु, अपना मन वेदों के अध्ययन में लगाना चाहिए। यही स्वाध्याय है।  

 तपस् या तपस्या वानप्रस्थों के लिए है। मनुष्य को जीवन भर गृहस्थ ही नहीं बने रहना चाहिए। उसे स्मरण रखना होगा कि जीवन के चार विभाग हैं—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। अतएव गृहस्थ रहने के बाद उसे विरक्त हो जाना चाहिए। यदि कोई एक सौ वर्ष जीवित रहता है, तो उसे 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य, 25 वर्ष तक गृहस्थ, 25वर्ष तक वानप्रस्थ तथा 25 वर्ष तक संन्यास का जीवन बिताना चाहिए। ये वैदिक धार्मिक अनुशासन के नियम हैं। गृहस्थ जीवन से विरक्त होने पर मनुष्य को शरीर, मन तथा वाणी का संयम बरतना चाहिए बच्चों का पालन पोषण। यही तपस्या है। 
समग्र वर्णाश्रमधर्म समाज ही तपस्या के निमित्त है। तपस्या के बिना किसी को मुक्ति नहीं मिल सकती। इस सिद्धान्त की संस्तुति न तो वैदिक साहित्य में की गई है, न भगवद्गीता में कि जीवन में तपस्या की आवश्यकता नहीं है और कोई कल्पनात्मक चिन्तन करता रहे तो सब कुछ ठीक हो जायगा। ऐसे सिद्धान्त तो उन दिखावटी अध्यात्मवादियों द्वारा बनाये जाते हैं, जो अधिक से अधिक अनुयायी बनाना चाहते हैं।

 यदि प्रतिबन्ध हों, विधि विधान हों तो लोग इस प्रकार आकर्षित न हों। अतएव जो लोग धर्म के नाम पर अनुयायी चाहते हैं, वे केवल दिखावा करते हैं, वे अपने विद्यार्थियों के जीवनों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाते और न ही अपने जीवन पर। लेकिन वेदों में ऐसी विधि को स्वीकृति प्रदान नहीं की गई।  

 जहाँ तक ब्राह्मणों की सरलता (आर्जवम्) का सम्बन्ध है, इसका पालन न केवल किसी एक आश्रम में किया जाना चाहिए, अपितु चारों आश्रमों के प्रत्येक सदस्य को करना चाहिए चाहे वह ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यास आश्रम में हो। मनुष्य को अत्यन्त सरल तथा सीधा होना चाहिए।  

 अहिंसा का अर्थ है किसी जीव के प्रगतिशील जीवन को न रोकना। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि शरीर के वध किये जाने के बाद भी आत्मा-स्फुलिंग नहीं मरता, इसलिए इन्द्रियतृप्ति के लिए पशुवध करने में कोई हानि नहीं है। प्रचुर अन्न, फल तथा दुग्ध की पूर्ति होते हुए भी आजकल लोगों में पशुओं का मांस खाने की लत पड़ी हुई है। लेकिन पशुओं के वध की कोई आवश्यकता नहीं है। यह आदेश हर एक के लिए है। जब कोई विकल्प न रहे, तभी पशुवध किया जाय। लेकिन इसकी यज्ञ में बलि की जाय। जो भी हो, जब मानवता के लिए प्रचुर भोजन हो, तो जो लोग आध्यात्मिक साक्षात्कार में प्रगति करने के इच्छुक हैं, उन्हें पशुहिंसा नहीं करनी चाहिए। वास्तविक अहिंसा का अर्थ है कि किसी के प्रगतिशील जीवन को रोका न जाय। पशु भी अपने विकास काल में एक पशुयोनि से दूसरी पशुयोनि में देहान्तरण करके प्रगति करते हैं। यदि किसी विशेष पशु का वध कर दिया जाता है, तो उसकी प्रगति रुक जाती है। यदि कोई पशु किसी शरीर में बहुत दिनों से या वर्षों से रह रहा हो और उसे असमय ही मार दिया जाय तो उसे पुन: उसी जीवन में वापस आकर शेष दिन पूरे करने के बाद ही दूसरी योनि में जाना पड़ता है। अतएव अपने स्वाद की तुष्टि के लिए किसी की प्रगति को नहीं रोकना चाहिए। यही अहिंसा है।  

सत्यम् का अर्थ है कि मनुष्य को अपने स्वार्थ के लिए सत्य को तोडऩा-मरोडऩा नहीं चाहिए। 

वैदिक साहित्य में कुछ अंश अत्यन्त कठिन हैं, लेकिन उनका अर्थ किसी प्रामाणिक गुरु से जानना चाहिए। वेदों को समझने की यही विधि है। श्रुति का अर्थ है, किसी अधिकारी से सुनना। मनुष्य को चाहिए कि अपने स्वार्थ के लिए कोई विवेचना न गढ़े। 

भगवद्गीता की अनेक टीकाएँ हैं, जिसमें मूलपाठ की गलत व्याख्या की गई है। शब्द का वास्तविक भावार्थ प्रस्तुत किया जाना चाहिए और इसे प्रामाणिक गुरु से प्रत्यक्ष ज्ञान के रूप में ही सीखना चाहिए।  

 अक्रोध का अर्थ है, क्रोध को रोकना। यदि कोई क्षुब्ध बनावे तो भी सहिष्णु बने रहना चाहिए, क्योंकि एक बार क्रोध करने पर सारा शरीर दूषित हो जाता है। क्रोध रजोगुण तथा काम से उत्पन्न होता है। अतएव जो योगी है उसे क्रोध पर नियन्त्रण रखना चाहिए। अपैशुनम् का अर्थ है कि दूसरे के दोष न निकाले और व्यर्थ ही उन्हें सही न करे। निस्सन्देह चोर को चोर कहना छिद्रान्वेषण नहीं है, लेकिन निष्कपट व्यक्ति को चोर कहना उस व्यक्ति के लिए परम अपराध होगा जो आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना चाहता है। ह्री का अर्थ है कि मनुष्य अत्यन्त लज्जाशील हो और कोई गर्हित कार्य न करे। अचापलम् या संकल्प का अर्थ है कि मनुष्य किसी प्रयास से विचलित या उदास न हो। किसी प्रयास में भले ही असफलता क्यों न मिले, किन्तु मनुष्य को उसके लिए खिन्न नहीं होना चाहिए। उसे धैर्य तथा संकल्प के साथ प्रगति करनी चाहिए।  

 यहाँ पर प्रयुक्त तेजस् शब्द क्षत्रियों के निमित्त है। क्षत्रियों को अत्यन्त बलशाली होना चाहिए, जिससे वे निर्बलों की रक्षा कर सकें। उन्हें अहिंसक होने का दिखावा नहीं करना चाहिए। यदि हिंसा की आवश्यकता पड़े, तो हिंसा दिखानी चाहिए। लेकिन जो व्यक्ति अपने शत्रु का दमन कर सकता है, उसे चाहिए कि कुछ विशेष परिस्थितियों में क्षमा कर दे। वह छोटे अपराधों के लिए क्षमा-दान कर सकता है।  

 शौचम् का अर्थ है पवित्रता, जो न केवल मन तथा शरीर की हो, अपितु व्यवहार में भी हो। यह विशेष रूप से वणिक वर्ग के लिए है। उन्हें चाहिए कि वे काला बाजारी न करें। नाति-मानिता अर्थात् सम्मान की आशा न करना शूद्रों अर्थात् श्रमिक वर्ग के लिए है, जिन्हें वैदिक आदेशों के अनुसार चारों वर्णों में सबसे निम्न माना जाता है। उन्हें वृथा सम्मान या प्रतिष्ठा से फूलना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी मर्यादा में बने रहना चाहिए। शूद्रों का कर्तव्य है कि सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए वे उच्चवर्णोंं का सम्मान करें।  

 यहाँ पर वर्णित छब्बीसों गुण दिव्य हैं। 
वर्णाश्रमधर्म के अनुसार इनका आचरण होना चाहिए। सारांश यह है कि भले ही भौतिक परिस्थितियाँ शोचनीय हों, यदि सभी वर्णों के लोग इन गुणों का अभ्यास करें, तो वे क्रमश: आध्यात्मिक अनुभूति के सर्वोच्च पद तक समाज को उठा सकते हैं।

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भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 1

श्लोक:
(फलसहित दैवी और आसुरी संपदा का कथन) 
 
 श्रीभगवानुवाच
 अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
 दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति (परमात्मा के स्वरूप को तत्त्व से जानने के लिए सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में एकी भाव से ध्यान की निरन्तर गाढ़ स्थिति का ही नाम 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' समझना चाहिए) और सात्त्विक दान (ज्ञानयोगव्यवस्थिति में सात्विक दान एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। सात्विक दान का अर्थ है दान करने की वह प्रक्रिया जिसमें दाता का उद्देश्य केवल दान करना होता है, न कि किसी प्रकार के लाभ या प्रतिफल की अपेक्षा करना।

सात्विक दान के तीन मुख्य तत्व हैं:

1. _दान का उद्देश्य_: सात्विक दान में दान का उद्देश्य केवल दान करना होता है, न कि किसी प्रकार के लाभ या प्रतिफल की अपेक्षा करना।
2. _दान का समय_: सात्विक दान में दान का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। दान करने का सबसे अच्छा समय वह होता है जब दान करने वाले के पास दान करने के लिए पर्याप्त साधन हों।
3. _दान की वस्तु_: सात्विक दान में दान की वस्तु भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। दान करने वाले को ऐसी वस्तु दान करनी चाहिए जो दान लेने वाले के लिए उपयोगी हो।

सात्विक दान के कुछ उदाहरण हैं:

- _अन्नदान_: गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न दान करना।
- _विद्यादान_: गरीबों और जरूरतमंदों को विद्या दान करना।
- _अभयदान_: गरीबों और जरूरतमंदों को अभय दान करना, यानी उन्हें सुरक्षा और संरक्षण प्रदान करना।
- _औषधदान_: गरीबों और जरूरतमंदों को औषध दान करना।

सात्विक दान के कई लाभ हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख लाभ हैं:

- _पुण्य_: सात्विक दान करने से पुण्य प्राप्त होता है।
- _कर्मों का नाश_: सात्विक दान करने से कर्मों का नाश होता है।
- _आत्म-शांति_: सात्विक दान करने से आत्म-शांति प्राप्त होती है।
- _समाज की सेवा_: सात्विक दान करने से समाज की सेवा होती है।)

 इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान्‌ के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता
 अध्याय 16, श्लोक 1 में श्री भगवान ने दैवी स्वभाव की कुछ विशेषताओं का वर्णन किया है। यहाँ पर "दैवी" से तात्पर्य उन गुणों से है जो आत्मा की शुद्धता और श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। इस श्लोक में श्री भगवान ने उन गुणों की व्याख्या की है जो किसी व्यक्ति के दैवी स्वभाव को पहचानने में मदद करते हैं।
अभयं: यहाँ अभय का मतलब है भय का अभाव। एक दैवी व्यक्ति हमेशा निडर होता है, उसके मन में किसी प्रकार का डर या संकोच नहीं होता। उसकी आंतरिक शक्ति और विश्वास उसे किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम बनाते हैं।
सत्त्वसंशुद्धि: इसका मतलब है आत्मा की पूर्ण शुद्धता। दैवी स्वभाव वाले व्यक्ति का मन और हृदय पूरी तरह से शुद्ध और स्पष्ट होता है। वह अपनी आत्मा को जानने और समझने में लगा रहता है।
ज्ञानयोगव्यवस्थितिः: यह तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति का उल्लेख करता है। यह स्थिति उन लोगों की होती है जो सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप को जानने के लिए ध्यान की गहरी स्थिति में होते हैं।
दानं: सात्त्विक दान का अर्थ है ऐसे दान जो स्वार्थ रहित और शुद्ध हृदय से किए जाएँ। ये दान न केवल वस्त्र, भोजन या धन देने तक सीमित नहीं होते, बल्कि ज्ञान और मार्गदर्शन देने में भी होते हैं।
दमश्च: इसका मतलब है इन्द्रियों का संयम। दैवी स्वभाव वाले व्यक्ति अपने इन्द्रिय सुखों पर संयम रखते हैं और अपने स्वार्थी इच्छाओं को नियंत्रित करते हैं।
यज्ञश्च: यज्ञ का मतलब है धार्मिक अनुष्ठान और पूजा। दैवी व्यक्ति भगवान और देवताओं की पूजा करता है, यज्ञ करता है और अपने कर्मों को सही दिशा में रखता है।
स्वाध्यायस्तप आर्जवम्: स्वाध्याय का मतलब है वेद-शास्त्रों का अध्ययन और तप का मतलब है आत्मा की शुद्धि के लिए कठोर साधना। आर्जवम् का मतलब है सरलता और सच्चाई। दैवी व्यक्ति अपने धर्म को पालन करता है और सच्चाई का अनुसरण करता है।
इस प्रकार, इस श्लोक में दैवी स्वभाव की विशेषताओं को दर्शाया गया है जो आत्मा की पवित्रता, संयम, ज्ञान और धार्मिकता को स्पष्ट करती हैं। यह श्लोक उन गुणों की व्याख्या करता है जिनके माध्यम से एक व्यक्ति दैवी स्वभाव को प्राप्त कर सकता है।
16॥1॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 2

श्लोक:
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌।
 दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌॥

भावार्थ:
मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण (अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम 'सत्यभाषण' है), अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अन्तःकरण की उपरति अर्थात्‌ चित्त की चञ्चलता का अभाव, किसी की भी निन्दादि न करना, सब भूतप्राणियों में हेतुरहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव
 श्लोक 2 में भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी स्वभाव की विशेषताएँ वर्णित की हैं, जो आत्मा की उच्चस्तरीयता और आध्यात्मिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
अहिंसा: इसका अर्थ है, न केवल शारीरिक हिंसा से बचना बल्कि मन और वाणी से भी किसी को कष्ट न पहुँचाना। यह एक सकारात्मक मानसिकता को दर्शाता है जो अहिंसा की भावना को अपनाती है।
सत्य: यहाँ पर सत्य का अर्थ है, ऐसी बातें करना जो सच में सही हों और जो मन के सत्य के अनुरूप हों। सत्य भाषण वह है जिसमें हमारे विचार और शब्द पूरी तरह मेल खाते हैं और दूसरों को सत्यता से अवगत कराते हैं।
अक्रोध: क्रोध एक विनाशकारी भावना है। इस श्लोक में अक्रोध का मतलब है कि हमें अपने मन को शांत रखना चाहिए, भले ही कोई हमें अपमानित करे या नुकसान पहुँचाए।
त्याग: त्याग का अर्थ है, अपने स्वार्थ और निजी लाभ को छोड़कर दूसरों की भलाई के लिए कार्य करना। इसमें आत्मकेंद्रित न होना और जीवन में दूसरों की भलाई को प्राथमिकता देना शामिल है।
शांति: शांति का मतलब है मानसिक स्थिरता और संतुलन बनाए रखना। शांति का आभाव चित्त को अस्थिर करता है और व्यक्ति को मानसिक तनाव में डालता है।
अपैशुनम्: अपैशुन का मतलब है दूसरों की निंदा से बचना। यह गुण उन व्यक्तियों में होता है जो दूसरों की आलोचना करने से बचते हैं और खुद को आलोचना से दूर रखते हैं।
दया: दया का मतलब है, सभी जीवों के प्रति अनिवार्य करुणा और सहानुभूति। यह बिना किसी स्वार्थ के होती है और सभी प्राणियों के प्रति स्नेह दिखाती है।
अलोलुप्त्वम्: इसका मतलब है, विषयों के प्रति आसक्ति का अभाव। इसका तात्पर्य है कि इंद्रियों को विषयों से जोड़ा नहीं जाना चाहिए, ताकि व्यक्ति आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ सके।
मार्दव: इसका मतलब है, नम्रता और विनम्रता। यह गुण उन लोगों में होता है जो शिष्टता और सौम्यता से भरे होते हैं।
ह्रीर: ह्रीर का अर्थ है लज्जा और आदर। यह समाज और शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए स्वयं को संयमित रखना है।
अचापलम्: इसका मतलब है, व्यर्थ की चेष्टाओं और अनावश्यक कार्यों से दूर रहना। यह स्व-संयम और स्पष्टता की ओर इशारा करता है।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी गुणों का वर्णन किया है जो एक व्यक्ति को धार्मिक और नैतिक जीवन जीने में सहायता करते हैं। ये गुण आत्मा की उन्नति के लिए आवश्यक हैं और हमें इन गुणों को अपने जीवन में अपनाना चाहिए।
16॥2॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 3

श्लोक:
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहोनातिमानिता।
 भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥

भावार्थ:
तेज (श्रेष्ठ पुरुषों की उस शक्ति का नाम 'तेज' है )कि जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृति वाले मनुष्य भी प्रायः अन्यायाचरण से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं), क्षमा, धैर्य, बाहर की शुद्धि  एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव- ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण दैवी सम्पत्ति के लक्षणों को वर्णित कर रहे हैं। यहाँ पर 'तेज', 'क्षमा', 'धृत' और 'शौच' इन गुणों को दैवी सम्पत्ति के संकेतक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
तेज: यह शक्ति और प्रभाव का प्रतीक है। एक व्यक्ति का तेज वह गुण है जो दूसरों को उसके सामने आदर्श व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है। यह आत्मविश्वास, शक्ति और प्रभाव का संयोजन होता है, जो नैतिक और श्रेष्ठ कर्मों की ओर प्रेरित करता है।
क्षमा: क्षमा का मतलब होता है दूसरों की गलतियों को माफ करना। दैवी गुण वाले व्यक्ति में क्षमा की भावना होती है, जो उन्हें ईर्ष्या और द्वेष से दूर रखती है।
धृत: यह धैर्य और स्थिरता को दर्शाता है। धृत वाले व्यक्ति की मनोदशा में स्थिरता होती है, और वह कठिन परिस्थितियों में भी आत्म-नियंत्रण बनाए रखता है।
शौच: शौच का तात्पर्य शारीरिक और मानसिक शुद्धता से है। इसका अर्थ है स्वच्छता, पवित्रता और ईमानदारी। यह बाहरी स्वच्छता के साथ-साथ आंतरिक पवित्रता को भी शामिल करता है।
अद्रोह: किसी भी व्यक्ति के प्रति शत्रुभाव का न होना। इसका मतलब है कि वह सभी के प्रति मित्रवत और सौम्य होता है, और किसी के प्रति भी द्वेष या दुश्मनी का भाव नहीं रखता।
अतिमानिता: अपने आप को दूसरों से ऊँचा समझने की प्रवृत्ति का अभाव। दैवी गुण वाले व्यक्ति में अभिमान और घमंड की कमी होती है, और वह अपने स्वभाव में विनम्र और सरल होता है।
इन गुणों को अपनाने वाले व्यक्ति दैवी सम्पत्ति से सम्पन्न होते हैं और उनके आचरण में इन गुणों की उपस्थिति उनके दैवीय स्वभाव को दर्शाती है।
इस प्रकार, श्लोक 3 में दैवी गुणों का विवरण देते हुए भगवान श्रीकृष्ण यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि इन गुणों से युक्त व्यक्ति का चरित्र कितना उच्च और आदर्श होता है।
16॥3॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 4

श्लोक:
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
 अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्‌॥

भावार्थ:
हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी- ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं
 आसुरीसंपदा एक प्रकार की आध्यात्मिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति के मन और आत्मा में आसुरी गुणों का प्रभाव होता है। आसुरीसंपदा के लक्षण निम्नलिखित हैं:

आसुरीसंपदा के लक्षण
1. _अहंकार_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति में अहंकार की भावना बहुत अधिक होती है।
2. _लोभ_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति में लोभ की भावना बहुत अधिक होती है।
3. _क्रोध_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति में क्रोध की भावना बहुत अधिक होती है।
4. _मोह_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति में मोह की भावना बहुत अधिक होती है।
5. _अन्याय_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति अन्याय के कार्यों में लिप्त रहते हैं।
6. _असत्य_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति असत्य और झूठ बोलने में आनंद लेते हैं।
7. _अहिंसा की कमी_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति अहिंसा की कमी के कारण दूसरों को नुकसान पहुंचाने में आनंद लेते हैं।
8. _ईर्ष्या_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति ईर्ष्या की भावना से ग्रस्त रहते हैं।
9. _अभिमान_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति अभिमान की भावना से ग्रस्त रहते हैं।
10. _नाशकारी कार्य_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति नाशकारी कार्यों में लिप्त रहते हैं।
16॥4॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 5

श्लोक:
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
 मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥

भावार्थ:
दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिए मानी गई है। इसलिए हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुआ है
 देवी संपदा के गुण
1. _सत्य_: देवी संपदा वाले व्यक्ति सत्य के पालन में विश्वास रखते हैं।
2. _अहिंसा_: देवी संपदा वाले व्यक्ति अहिंसा के पालन में विश्वास रखते हैं।
3. _दया_: देवी संपदा वाले व्यक्ति दया के पालन में विश्वास रखते हैं।
4. _करुणा_: देवी संपदा वाले व्यक्ति करुणा के पालन में विश्वास रखते हैं।
5. _संयम_: देवी संपदा वाले व्यक्ति संयम के पालन में विश्वास रखते हैं।
6. _तपस्या_: देवी संपदा वाले व्यक्ति तपस्या के पालन में विश्वास रखते हैं।
7. _स्वाध्याय_: देवी संपदा वाले व्यक्ति स्वाध्याय के पालन में विश्वास रखते हैं।
8. _ईश्वर प्राणिधान_: देवी संपदा वाले व्यक्ति ईश्वर प्राणिधान के पालन में विश्वास रखते हैं।
9. _अनुशासन_: देवी संपदा वाले व्यक्ति अनुशासन के पालन में विश्वास रखते हैं।
10. _सेवा भाव_: देवी संपदा वाले व्यक्ति सेवा भाव के पालन में विश्वास रखते हैं।
16॥5॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 6

श्लोक:
(आसुरी संपदा वालों के लक्षण और उनकी अधोगति का कथन) 
 द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
 दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन
 (आसुरी संपदा वालों के लक्षण और उनकी अधोगति का कथन) 
दैवी स्वभाव वाले - ये लोग उच्च आत्मा और नैतिकता के गुणों से परिपूर्ण होते हैं।अपना ओर दूसरे का अच्छा बुरा भलीभांति जानते हैं।

अब श्री कृष्ण आसुरी स्वभाव वाले लोगों की विशेषताओं और उनकी कुदृष्टि (अधोगति) को विस्तार से समझाएंगे।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान कृष्ण अर्जुन को सूचित कर रहे हैं कि एक व्यक्ति का स्वभाव और उसकी प्रवृत्तियाँ उसे ऊँचाई या नीचाई की ओर ले जाती हैं। दैवी स्वभाव से व्यक्ति उन्नति की ओर बढ़ता है, जबकि आसुरी स्वभाव से व्यक्ति पतन की ओर जाता है।
(स्वभाव को बदलना या ना बदलना इस के लिए मनुष्य स्वतंत्र है)
इस प्रकार, भगवान कृष्ण ने इस श्लोक में आसुरी स्वभाव वाले व्यक्तियों की विशेषताओं को जानने की आवश्यकता की ओर इशारा किया है, ताकि अर्जुन और अन्य लोग भी यह समझ सकें कि वे किन गुणों को अपनाएँ और किन से बचें।

आसुरीसंपदा भी एक प्रकार की आध्यात्मिक अवस्था ही है जिसमें व्यक्ति के मन और आत्मा में आसुरी गुणों का प्रभाव होता है। आसुरीसंपदा के लक्षण निम्नलिखित हैं:

आसुरीसंपदा के लक्षण
1. _अहंकार_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति में अहंकार की भावना बहुत अधिक होती है।
2. _लोभ_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति में लोभ की भावना बहुत अधिक होती है।
3. _क्रोध_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति में क्रोध की भावना बहुत अधिक होती है।
4. _मोह_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति में मोह की भावना बहुत अधिक होती है।
5. _अन्याय_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति अन्याय के कार्यों में लिप्त रहते हैं।
6. _असत्य_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति असत्य और झूठ बोलने में आनंद लेते हैं।
7. _अहिंसा की कमी_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति अहिंसा की कमी के कारण दूसरों को नुकसान पहुंचाने में आनंद लेते हैं।
8. _ईर्ष्या_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति ईर्ष्या की भावना से ग्रस्त रहते हैं।
9. _अभिमान_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति अभिमान की भावना से ग्रस्त रहते हैं।
10. _नाशकारी कार्य_: आसुरीसंपदा वाले व्यक्ति नाशकारी कार्यों में लिप्त रहते हैं।

इन लक्षणों से बचने के लिए, हमें अपने जीवन में सतोगुणों को बढ़ावा देना चाहिए, जैसे कि सत्य, अहिंसा, और दया।
16॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 7

श्लोक:
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
 न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥

भावार्थ:
आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति- इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिए उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही पाया जाता है।
इस प्रकार, यह श्लोक यह बताता है कि आसुरी स्वभाव वाले लोगों की जीवन शैली और आचरण धर्म और सत्य से पूरी तरह वंचित होते हैं।
 16॥7॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 8

श्लोक:
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्‌।
 अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्‌॥

भावार्थ:
वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत्‌ आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है?
 श्रीकृष्ण इस श्लोक में आसुरी स्वभाव वाले लोगों के दृष्टिकोण को स्पष्ट कर रहे हैं। ये लोग संसार की वास्तविकता को समझने में असफल होते हैं और इस तरह के झूठे विचार राष्ट्रीय नेताओं की भांति रखते हैं।
- ये लोग कहते हैं कि इस संसार का कोई वास्तविक आधार नहीं है, यह केवल झूठा है और इसमें कोई ईश्वर नहीं है। वे मानते हैं कि यह सृष्टि किसी प्रकार की दिव्य व्यवस्था या ईश्वरीय शक्ति के बिना ही अस्तित्व में आई है।
ये लोग मानते हैं कि इस संसार की उत्पत्ति केवल स्त्री-पुरुष के मिलन से हुई है और उनका विचार है कि केवल कामना ही इस सृष्टि का मुख्य कारण है। उनके अनुसार, सृष्टि में कोई अन्य कारण नहीं है और यह पूरी तरह से भौतिक प्रक्रिया का परिणाम है।
इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह बताना चाहते हैं कि ये आसुरी प्रकृति वाले लोग आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अज्ञानी होते हैं। वे सृष्टि के कारण और उसके स्वभाव को सही ढंग से नहीं समझते और अपने संकुचित दृष्टिकोण से ही सृष्टि की व्याख्या करते हैं। यह श्लोक हमें यह समझाता है कि कुछ लोग आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों को नकारते हैं और केवल भौतिक दृष्टिकोण को ही सत्य मानते हैं।
इनआसुरी लोग का निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि यह जगत् मायाजाल है। इसका कोई कारण नहीं है, कोई कार्य नहीं है, कोई मानक नहीं है, कोई प्रस्ताव नहीं है- हर वस्तु मिथ्या है। उनका कहना है कि यह दृश्य जगत् विचित्र भौतिक जिज्ञासाएँ और विनाश का कारण है। वे यह नहीं सोचते कि ईश्वर ने इस संसार की रचना का कोई प्रस्ताव रखा है। 
उनका सिद्धांत है कि यह संसार आप से उत्पन्न हुआ है और इस विश्वास का कोई कारण नहीं कि इसके पीछे किसी ईश्वर का हाथ है। उनके लिए आत्मा और पदार्थ में कोई अंतर नहीं होता और वे परम आत्मा को स्वीकार ही नहीं करते। उनके लिए हर वस्तु पदार्थ की मात्रा है और यह पूरा जगत् मनो अज्ञान का पिंड है। उनके अनुसार प्रत्येक वस्तु शून्य है और जो भी सृष्टि दिखती है, वह केवल दृष्टि-भ्रम का कारण है। वे इसे सच मानते हैं कि विभिन्नता से पूर्ण यह सारि सृष्टि अज्ञान का प्रदर्शन है। जिस प्रकार के स्वप्न में हम ऐसी अनेक वस्तुओं की सृष्टि कर सकते हैं, वास्तव में कोई अनुभव नहीं होता, अतएव जब हम जागते हैं, तो देखते हैं कि सब कुछ स्वप्नमात्र था। लेकिन वास्तव में, हालां कि असुर लोग भी कहते हैं कि जीवन स्वप्न है, लेकिन वे इस सपने को भोगने में बड़े ही बड़े होते हैं। अतएव वे ज्ञानार्जन करने के बजाय अपने स्वप्नलोक में अधिकाधिक चर्चा में रहते हैं। इन का कहना है कि जिस तरह का बच्चा-बच्चा केवल स्त्री-पुरुष के संबंध का फल है, उसी तरह का संसार बिना किसी आत्मा के पैदा हुआ है। उनके लिए यह पदार्थ का संयोगमात्रा है, जिसे पदार्थ का निर्माण किया गया, अतएव आत्मा की अनुभूति का प्रश्न ही नहीं है। जिस प्रकार अनेक जीवित एक ही जीव अकारण चमत्कार ही से (स्वेदज) तथा मृत शरीर से उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार यह सारा जीवित संसार जगत के भौतिक संयोग प्रकट होते हैं। अतएव प्रकृति ही इस संसार का कारण स्वरूपा है, इसका कोई अन्य कारण नहीं है। वे भगवद्गीता में कहे गए कृष्ण के वचनों को नहीं मानते - मयाध्येण प्रकृतिः सुयते सचराचरम्- सारा भौतिक जगत् मेरे ही निर्देशों के लिए उपयुक्त है। दूसरे शब्दों में, असुरों को संसार की सृष्टि का विषय पूरा-पूरा ज्ञान नहीं होता है, प्रत्येक का अपना कोई सिद्धांत नहीं है। उनके ज्ञान शास्त्रों का कोई भी एक कथन दूसरे व्याख्या के समान ही है, क्योंकि वे शास्त्रीय शास्त्रों के मानक में विश्वास ही नहीं करते हैं।
16॥8॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 9

श्लोक:
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
 प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥

भावार्थ:
इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके- जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सब अपकार करने वाले क्रुरकर्मी मनुष्य केवल जगत्‌ के नाश के लिए ही समर्थ होते हैं
 यहां 'एतां दृष्टिमवष्टभ्य' का अर्थ है कि जो लोग इस प्रकार के मिथ्या दृष्टिकोण को अपनाते हैं। 'नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः' से तात्पर्य है कि जिनकी आत्मा नष्ट हो चुकी है और जिनकी बुद्धि कमजोर है।
 लोग क्रूर और उग्र कर्मों का अभ्यास करते हैं जो केवल जगत के नाश के लिए होते हैं। उनका कार्य जगत के लिए हानिकारक होता है और वे केवल विनाश की ओर ले जाते हैं।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि मिथ्या ज्ञान और कमजोर बुद्धि वाले लोग, जो दुष्कर्मों में विश्वास करते हैं, वे समाज और विश्व के लिए हानिकारक होते हैं। उनका व्यवहार न केवल स्वयं के लिए बल्कि सम्पूर्ण जगत के लिए भी विनाशकारी होता है। इस प्रकार, यह श्लोक हमें सत्कर्म और सही ज्ञान की ओर प्रवृत्त होने की प्रेरणा देता है।
16॥9॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 10

श्लोक:
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
 मोहाद्‍गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥

भावार्थ:
वे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते हैं
 कभी न होने वाले काम का आश्रय लेकर और गौरव के मद एवं मिथ्या प्रतिष्ठा में डूबे हुए आसुरी लोग इस तरह के मोह से प्रभावित होकर हमेशा के लिए अपवित्र कर्म का व्रत लेकर चले जाते हैं।

यहाँ पर आसुरी मनोवृत्ति का वर्णन है। असुरों में काम कभी तृप्त नहीं होता। वे भौतिक भोग के लिए अपनी अतृप्त इच्छाएँ प्रस्ताव छोड़ते हैं। हालाँकि वे क्षणभंगुर मठ को स्वीकार करने के कारण हमेशा चिंतामग्न रहते हैं, फिर भी वे मोहवश ऐसे कार्य करते हैं। उन्हें कोई ज्ञान नहीं हुआ, अतएव वे यह नहीं कह सके कि वे गलत दिशा में जा रहे हैं क्यों कि अहंकार कुछ भले की बात सुनने ही नहीं देते। क्षणभंगुर मठ को स्वीकार करने के कारण वे अपने निजी ईश्वर का निर्माण कर लेते हैं, अपना निजी मंत्र बना लेते हैं, इसी मंत्र को गुरु मंत्र पा कर गुरमुख बनना पसंद करते हैं और अपने ही कीर्तन भी करते हैं। इसका फल यह होता है कि वे दो नौकाओं की सवारी कर खुद भी डूबते हैं  और दूसरों को भी डुबोते है।  इन के समारोह भी अधिकाधिक आकृष्ट करने वाले होते हैं - 
कामभोग तथा संग्रह संग्रह। इस प्रसंग में अशुचि- व्रतः शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है 'अपवित्र व्रत'। ऐसे आसुरी लोग पागल, शैतान, द्यूतक्रीड़ा ,में दूसरों को भी फंसाने का काम करते है  तथा मांसाहार
(जिंदे लोगों का करने से नहीं चूकते) 
जो इन के प्रति असक्त होते हैं- ये ही उनकी आशुचि अर्थात् अपवित्र (गंदी) आदतें हैं।  और दूषित व्यवहार से प्रेरित होकर वे ऐसे शुद्ध धार्मिक सिद्धांतों को तोड़ देते हैं, जो कि वैदिक आदेश नहीं देते हैं। हालाँकि ऐसे आसुरी लोग बेहद निंदनीय होते हैं, लेकिन दुनिया में कृत्रिम रचनाकारों से ऐसे लोगों के नारे का सम्मान किया जाता है। चाहे वे नरक की ओर बढ़ते रहें, परन्तु वे अपने आप पर बहुत भारी विश्वास तो करते ही हैं। गुरु मुख को क्या कोई अलग मुंह लग जाता है जिसके कारण यह लोग गुरमुख बनने की होड में पीछे नहीं रहना चाहते।
 16॥10॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 11

श्लोक:
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
 कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥

भावार्थ:
तथा वे मृत्युपर्यन्त रहने वाली असंख्य चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले, विषयभोगों के भोगने में तत्पर रहने वाले और 'इतना ही सुख है' इस प्रकार मानने वाले होते हैं
चिंता और व्याकुलता से प्रभावित ये हतोत्साहित लोग अपने निर्थक सहायक के जीवन को दुःख के सहजता से खींचते हुए मृत्यु के आंगन में ले आते हैं। सामान्य जीवन में ये चिंताएं शांति और आनंद के दुर्गा पर टूटे हुए सितारे और विशेष रूप से तब होती हैं जब शक्तिशाली कामनाओं ने मनुष्य को अपने वश में कर लिया होता है। अपने इष्ट वस्तु को प्राप्त करने के लिए परिश्रम और संघर्ष से प्राप्त की गई वस्तु के संरक्षण(क्षेम)क्षेम का सरल अर्थ है "सुरक्षा" या "संरक्षण क्षेम के कुछ अन्य अर्थ हैं:
- सुरक्षा- संरक्षण- रक्षा- संरक्षण- कल्याण
की व्याकुलता में यही मनुष्य जीवन की चिंताएं हैं। 
(चिंता बराबर चिता)
जीवन पर्यन्त की कालपूर्णता केवल मित्रता चिन्मय में अपव्यय करना और अन्त में यही पाना कि हम सभी सम्मिलित रूप से असफल हैं। वास्तव में एक बड़ी त्रासदी है।कामोपभोगपरमा सत्कार्य के क्षेत्र में हो या दुष्कृत्य के क्षेत्र में मनुष्य के प्रवास के लिए किसी दर्शन (जीवन विषयक दृष्टिकोण) की आवश्यकता होती है यह लोग बिना उसका प्रयास असंबद्ध असुरी प्रकृति के लोगों का जीवनदर्शन निरपवादरूप से सर्वत्र एक समान ही होता है। इस श्लोक में चार्वाक मत (नास्तिक दर्शन) को अपनाया गया है।
(यह चार्वाक मत एक प्राचीन भारतीय दर्शन है जो भौतिकवाद और नास्तिकता के सिद्धांतों पर आधारित है। इस मत के अनुसार, केवल भौतिक जगत ही वास्तविक है, और आत्मा या परमात्मा जैसी कोई चीज़ ही नहीं है।

चार्वाक मत के मुख्य सिद्धांत हैं:

1. _भौतिकवाद_: चार्वाक मत के अनुसार, केवल भौतिक जगत ही वास्तविक है, और आत्मा या परमात्मा जैसी कोई चीज़ नहीं है।
2. _नास्तिकता_: चार्वाक मत नास्तिकता के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अनुसार कोई परमात्मा या उच्च शक्ति नहीं है।
3. _इंद्रियों की प्रमाणिकता_: चार्वाक मत के अनुसार, इंद्रियों की प्रमाणिकता पर विश्वास किया जाना चाहिए, और इंद्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान को ही वास्तविक ज्ञान माना जाना चाहिए।
4. _सुखवाद_: चार्वाक मत के अनुसार, सुखवाद का पालन किया जाना चाहिए, जिसके अनुसार जीवन का मुख्य उद्देश्य सुख और आनंद प्राप्त करना है।

चार्वाक मत के प्रमुख प्रति पादक बृहस्पति थे, जिन्होंने इस मत के सिद्धांतों को विस्तार से प्रतिपादित किया था।

चार्वाक मत के कुछ प्रमुख ग्रंथ हैं:

- _बृहस्पति सूत्र_
- _चार्वाक सूत्र_
- _तत्त्वोपप्लवसिंह_

चार्वाक मत का प्रभाव प्राचीन भारतीय दर्शन और संस्कृति पर बहुत अधिक था, और इसके सिद्धांतों ने अन्य दर्शनों और मतों को भी प्रभावित किया था।

 इस मत के अनुसार काम ही मनुष्य जीवन का परम पुरुषार्थ है अन्य धर्म या मोक्ष कुछ भी नहीं है।इतना ही सामान्य है ये भौतिकतावादी मूर्खता नहीं होती और वे अत्यंत स्थूल बुद्धि और सतही दृष्टि से विचार करते हैं। क्या यह अनुभव किया जाता है कि केवल विषय भोग का जीवन दुःखपूर्ण होता है और क्षुद्र लाभ के लिए मनुष्य को अत्यधिक मूल्य चुकाना पड़ता है। फिर भी वे अपने अनियमित कामवासना को ही तृप्त करने में चूहे की तरह लगे हुए हैं। यदि इस विषय में प्रश्न पूछा जाये? 
तो उनका उत्तर होगा कि यह संघर्ष ही जीवन है। वह सुख शांति और जीवन को जानता ही नहीं है। वे तो प्रायश्चित्तवादी होते हैं और नैतिक दृष्टि से जीवन विषयक गंभीर विचार करने से कतराते हैं। फलतः उनमें आत्महत्या और नर हत्या की प्रवृत्तियाँ भी देखी जा सकती हैं। उनकी धारणा यह है कि चिंता और दुःख से ही जीवन की रचना हुई है। जीवन की सतही असमंजस और विषाणु के पीछे कौन सा समंजस्य और लय है? उसे वह पहचान नहीं पा रहा है। भविष्य में कोई आशा की किरण नहीं देखकर उनका हृदय कटुता से भर जाता है और फिर उनका जीवन मात्रा प्रतिशोध पूर्ण हो जाता है। निष्फल परिश्रम में वे अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हैं और अंत में थके हारे और निराश बाक्स मृत्यु को प्राप्त होते हैं। उपयुर्क्त जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति को अगले श्लोक में शिष्य भगवान कहते हैं।
 16॥11॥

भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 12

श्लोक:
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
 ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्‌॥

भावार्थ:
वे आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थों का संग्रह करने की चेष्टा करते हैं
 इस श्लोक में उन लोगों की स्थिति का वर्णन किया गया है जो आशा और इच्छाओं के सैकड़ों बंधनों में फंसे हुए हैं। ये लोग काम और क्रोध के पाश में बंधे रहते हैं, जो उन्हें हर समय अपनी इच्छाओं की पूर्ति की ओर उकसाता है। ऐसे लोग केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए निरंतर धन और अन्य संसाधनों का संग्रह करते रहते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें अन्याय और भ्रष्टाचार का सहारा लेना पड़े।
अपने सुख की तलाश में भगवान को भूल यह लोग यंत्र,मंत्र,तंत्र के साधनों को अपनाने के लिए गुरु ,बाबा,तांत्रिकों को तलाशते फिरते है।जिस से शुद्ध ज्ञान से बहुत दूर हो जाते हैं।ऐसे लोग अपने सब्र का आपा खो कर हथेली पर सरसों उगाने के प्रयास में भूल जाते हैं कि अगर जीवन में अंधेरा है तो दिन भी आए गा अरे कुछ समय बाद तो गोबर भी खाद बन जाता है।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आशा और इच्छाओं का असीम बंधन व्यक्ति को नैतिकता और धर्म के मार्ग से हटा सकता है। जब कोई व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए हर सीमा पार कर जाता है और गलत तरीके अपनाता है, तो वह आसुरी स्वभाव का प्रतीक बन जाता है।
इससे यह भी संकेत मिलता है कि व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और केवल उचित और नैतिक मार्ग पर ही चलना चाहिए। यह श्लोक एक चेतावनी है कि अत्यधिक भौतिक इच्छाएँ और उनमें लिप्त रहना व्यक्ति के चरित्र को गिरा सकता है और समाज में असमानता और अन्याय को बढ़ावा दे सकता है।
16॥12॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 13

श्लोक:
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्‌।
 इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्‌॥

भावार्थ:
वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जाएगा
 इस श्लोक में एक व्यक्ति के आसुरी स्वभाव की छवि प्रस्तुत की गई है। यहाँ वह व्यक्ति इस सोच में है कि उसने अभी तक जो भी प्राप्त किया है, वह पर्याप्त है और अब वह अपने सभी इच्छाओं को पूरा कर लेगा। उसकी सोच है कि उसके पास वर्तमान में बहुत धन है और यह भी बढ़ जाएगा। यह व्यक्ति पूरी तरह से भौतिकता में मग्न है और भविष्य के बारे में उसके विचार केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर ही केन्द्रित हैं।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने उन लोगों की मानसिकता की आलोचना की है जो केवल भौतिक संपत्ति को ही सब कुछ मानते हैं और जीवन के उद्देश्य को केवल भौतिक साधनों तक सीमित कर देते हैं। ऐसे लोग यह मानते हैं कि केवल धन और ऐश्वर्य ही जीवन की पूर्णता का प्रमाण हैं, और वे इस बात को भूल जाते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य और संतोष केवल भौतिक संपत्ति से प्राप्त नहीं होता।
अब इसे सरल तरीके से समझे किसी को एक लाख मृत्युंजय मंत्र के पाठ के लिए कहा जाता है तो 1₹ दक्षिणा के हिसाब से एक लाख रुपए देने को मान लेता है या मोल भाव कर लेता है।पर हनुमान , या शिव के मंदिर में सेवा कर के वही फल प्राप्त नहीं करना चाहता।अब अगर कहा जाएगा कि अश्वमेघ यज्ञ करना होगा जिस में 1kg सोना लगे गा जो उसके पास नहीं है अगर होता तो क्या वो पूरे गांव को आग के हवाले नहीं कर देता?
जबकि;
अश्वमेघ यज्ञ और महामृत्युंजय के पाठ का फल शास्त्रों में एक छोटे उपाय में बताया गया है, जो है "श्री राम जप" या "राम नाम जप"।

शास्त्रों में कहा गया है कि अश्वमेघ यज्ञ और महामृत्युंजय के पाठ का फल श्री राम जप या राम नाम जप करने से भी प्राप्त किया जा सकता है। यह उपाय बहुत ही सरल और सुलभ है, और इसका पालन करने से व्यक्ति को अश्वमेघ यज्ञ और महामृत्युंजय के पाठ का फल प्राप्त हो सकता है।

श्री राम जप या राम नाम जप करने के लिए, व्यक्ति को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

- राम नाम का जप करना चाहिए।
- राम नाम का जप करने के लिए किसी शांत और एकांत स्थान को चुनना नहीं पड़ता।
ना राम नाम का जप करने के लिए एक निश्चित समय निर्धारित करना जरूरी है।
- राम नाम का जप करने के लिए एक निश्चित संख्या में जप करना चाहिए ऐसा भी जरूरी नहीं हर सांस के साथ भी राम नाम जप सकते हैं और जपना भी चाहिए।
दुख में सिमरन सब करें,सुख में करे ना कोय।
श्री राम जप या राम नाम जप करने से व्यक्ति को कई प्रकार के लाभ प्राप्त हो सकते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख लाभ हैं:

- अश्वमेघ यज्ञ और महामृत्युंजय के पाठ का फल प्राप्त होना।
- आत्म-शांति और आत्म-संतुष्टि प्राप्त होना।
- मन की शांति और एकाग्रता प्राप्त होना।
- जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आना।
जहां राम वहीं वज्र देही हनुमान संकटमोचक के रूप में प्रकट होते है।
 चलते फिरते, सोते जागते, उठते बैठते, हर समय राम राम जपा जा सकता है। यह एक बहुत ही सरल और सुलभ तरीका है जिससे हम अपने जीवन में भगवान राम की याद में रह सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

चलते फिरते राम नाम जपने से हमारे मन को शांति और एकाग्रता प्राप्त होती है, और हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। सोते जागते राम नाम जपने से हमारे मन को शांति और सुकून प्राप्त होता है, और हमारे जीवन में भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है।

इसलिए, चलते फिरते, सोते जागते, उठते बैठते, हर समय राम राम जपा जा सकता है। यह एक बहुत ही सरल और सुलभ तरीका है जिससे हम अपने जीवन में भगवान राम की याद में रह सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
इसलिए, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि केवल भौतिक संपत्ति की ओर ध्यान केंद्रित करना और उसके माध्यम से ही संतोष की खोज करना एक सीमित दृष्टिकोण है। वास्तविक संतोष और खुशी केवल आध्यात्मिक उन्नति और नैतिक मूल्यों के अनुसरण से प्राप्त हो सकती है।
16॥13॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 14

श्लोक:
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
 ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥

भावार्थ:
वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्र्वर्य को भोगने वाला हूँ। मै सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान्‌ तथा सुखी हूँ।
 आसुरिसम्पदावले व्यक्ति क्रोधके परायण इस प्रकार मनोरथ करते हैं..... शत्रुःक्या हमारे विपरीत थे? हमार साथ क्या कर लेगे? 

तो हमने तो कईयों  मार मार दिया है और  कौन-कौन से हमारे विपरीत बचे हुए हैं? वो हमारा क्या बिगाड़ ले गे? जो हमारे अनिष्ट सूत्र हैं?  हम उनको भी मजा चखा देंगे मार डालेंगे। हम धन, बल, बुद्धि आदि में सब तरह से समर्थ हैं। हमारे पास क्या नहीं है?
 हमारा अनिष्ट कोई नहीं कर सकता है। हम भोगने वाले हैं। हमारे पास महिला, मकान, कार, आदि किस प्रकार की सामग्री की कोई कमी नहीं हम सभी तरह से सिद्ध हैं। हमने तो पहले ही कह दिया था ना वैसा हो गया कि नहीं हमारे को तो यह पहले से ही ऐसा दिखता था। हम कौन सा भजन, स्मरण, जप , ध्यान आदि करते हैं जो ये सभी किसी के बहकावे में आये हुए हैं। मूलतः उपयोगी क्या है ये भी हम जानते हैं। हमारे समान सिद्ध और दुनिया में हमारे पास कोई पैदा नहीं हुआ है। गरिमा आदि सभी सिद्धियाँ हैं। हम एक फुंकमें बोस बसमा कर सकते हैं। 
बलवान-- हम बड़े बलवान हैं। अमुक ने हमारे से टक्कर लेनी चाही तो उसका क्या नतीजा निकला आदि। 

परन्तु स्वयं कहाँ हार जाते हैं? वह बात करते हैं लेखों को नहीं कहते हैं? ताकि कोई हमें फ़्राईफ़ न समझ ले। उन्हें अपनी हरने की बात तो याद भी नहीं रहती? पर अभिमानकी बात उन्हें याद रहती है। सुखी -- हमारे पास कौन सा सुख है? आराम है. हमारे समान सुखी संसार में ऐसे कौन से लोग हैं तो जलन बनी रहती है? ऊपर से इस प्रकार के डींगें मारा करते हैं। और फुकरा पन दिखाते दिखाते फुकरे बन जाते हैं।
16॥14॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 15-16

श्लोक:
आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
 यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥
 अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
 प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥

भावार्थ:
मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले मोहरूप जाल से समावृत और विषयभोगों में अत्यन्त आसक्त आसुरलोग महान्‌ अपवित्र नरक में गिरते हैं
 
(इस श्लोक में एक ऐसे व्यक्ति का स्वभाव और उसकी सोच को दर्शाया जा रहा है जिस को आज के समय में भारत ही नहीं पूरा विश्व भी जानता है😀इस को यहां केवल भगवान के कहने के भाव को आसानी से समझ ने भर को शामिल कर रहा हूं कोई गलत नियत से नहीं।इसको हंसी मजाक में समझने और समझाने की कोशिश कह सकते है अगर किसी की आत्मा को दुख पहुंचे तो मैं क्षमा प्रार्थी हूं)

 यह व्यक्ति अपने धन, परिवार, और प्रतिष्ठा पर गर्व करता है। उसे लगता है कि उसके समान कोई और है ही नहीं। उसकी यह सोच उसके अज्ञान और भ्रांति का परिणाम है। वह यज्ञ और दान करने की बात करता है, लेकिन इसके पीछे उसकी
(जनेऊ धारी बनने की वास्तविक भावना और उद्देश्य क्या हैं नजर आता है) 
यह उसके अज्ञान में छिपा हुआ है। यथार्थ में, उसका यज्ञ और दान केवल दिखावा हैं, क्योंकि उसका मन और हृदय केवल अपनी भौतिक संपत्तियों और भोग-विलास में ही डूबा हुआ है।
इस श्लोक में उस लोगों  की स्थिति का वर्णन किया गया है जो भौतिक सुख-साधनों और इच्छाओं में पूरी तरह से लिप्त होते हैं। वे कई प्रकार की भ्रांतियों और मोहजाल से घिरे हुए होते हैं। ऐसे लोग केवल भोग-विलास में डूबे रहते हैं और इस आसक्ति के कारण वे अधर्म और पाप के मार्ग पर चलने लगते हैं। अंततः, इनकी यही आसक्ति और मोह उन्हें पवित्रता से तो दूर कर ही देती है और वे अपवित्र नरक में गिर जाते हैं। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह संदेश मिलता है कि भौतिक इच्छाओं और मोह के कारण ही व्यक्ति पाप और अधर्म के रास्ते पर चलता है, जो अंततः उसकी आत्मा की पतन की ओर ले जाता है। और ऐसा मनुष्य पप्पू बन जाता है।
इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि आत्मा की उन्नति और शुद्धता के लिए भौतिक वस्तुओं और इच्छाओं से परे जाकर सच्ची समझ की और ध्यान केंद्रित करना अति आवश्यक है।
16॥15-16॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 17

श्लोक:
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
 यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्‌॥

भावार्थ:
वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरुष धन और मान के मद से युक्त होकर केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्रविधिरहित यजन करते हैं
 ये पप्पू लोग खुद को बहुत बड़ा मानते हैं, और अपने ही आत्म-संयम या आत्म-गौरव में ही मग्न रहते हैं। उन्हें लगता है कि वे सबसे श्रेष्ठ हैं।तात्पर्य है कि वे अत्यधिक घमंडी और अडिग होते हैं, जो दूसरों की बातों को महत्व नहीं देते और अपनी ही धुन में रहते हैं।
धन और मान
 (समाज में प्रतिष्ठा)
 के मद में आकंठ डूबे हुए होते हैं। यह स्थिति उनके घमंड को और बढ़ा ही तो देती है।
 ये लोग केवल नाममात्र के यज्ञ करते हैं। वास्तव में, उनके यज्ञ धार्मिक या शास्त्रीय विधियों के अनुसार नहीं होते, बल्कि केवल दिखावे के लिए ही किए जाते हैं।ये यज्ञ दम्भ (दिखावा पाखंड) और विधि के बिना किए जाते हैं। वास्तविक धार्मिक विधि के पालन के बिना, केवल प्रदर्शन के लिए किए गए यज्ञ होते हैं।
इस प्रकार, यह श्लोक उन पापों लोगों की निंदा करता है जो धर्म के वास्तविक अर्थ को समझे बिना और दिखावे के लिए धार्मिक क्रियाएँ करते हैं, और स्वयं को महान मानते हैं। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ पर ऐसे लोगों की निंदा करते हुए सच्चे धर्म की आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं।
16।।15।।16॥17॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 18

श्लोक:
अहङ्‍कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
 मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥

भावार्थ:
वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोधादि के परायण और दूसरों की निन्दा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले नहीं तो ओर क्या होते हैं?
 16॥18॥

भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 19

श्लोक:
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्‌।
 क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥

भावार्थ:
उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ
 16॥19॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 20

श्लोक:
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
 मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्‌॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! वे मूढ़ मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ घोर नरकों में पड़ते हैं
 16॥20॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 21

श्लोक:
(शास्त्रविपरीत आचरणों को त्यागने और शास्त्रानुकूल आचरणों के लिए प्रेरणा) 
 त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
 कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥

भावार्थ:
काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार
 ( सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को 'नरक के द्वार' कहा है) 
आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए
 काम (इच्छा): यह उन इच्छाओं और वासनों का प्रतीक है जो कभी समाप्त नहीं होतीं और हमेशा अधिक की चाह होती रहती है। जब ये इच्छाएँ अनियंत्रित होती हैं, तो ये जीवन में अशांति और मानसिक कष्ट का कारण बनती हैं।
क्रोध: यह व्यक्ति की मनोस्थिति को इतना प्रभावित करता है कि उसकी सोच और व्यवहार दोनों ही अराजक हो जाते हैं। क्रोध के कारण व्यक्ति अक्सर अपने और दूसरों के प्रति अनावश्यक आक्रोश और हिंसा का प्रदर्शन करता है।
लोभ: यह असंतोष की भावना को जन्म देता है और व्यक्ति को हमेशा अधिक और अधिक की प्राप्ति की दिशा में प्रेरित करता है, जिससे उसके आचार-व्यवहार में भ्रष्टाचार और अनैतिकता का प्रवेश होता है।
इन तीनों बुराइयों को त्याग कर, एक सच्चे और नैतिक जीवन की ओर बढ़ना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, ये तीनों बुराइयाँ मनुष्य की आत्मा को पतन की ओर ले जाती हैं और उसके जीवन को विकृत करती हैं। अतः, भगवान श्रीकृष्ण ने इन्हें त्यागने की सलाह दी है ताकि व्यक्ति सही मार्ग पर चल सके और अपनी आत्मा की उन्नति कर सके।
16॥21॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 22

श्लोक:
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
 आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है (अपने उद्धार के लिए भगवदाज्ञानुसार बरतना ही 'अपने कल्याण का आचरण करना' है), इससे वह परमगति को जाता है अर्थात्‌ मुझको प्राप्त हो जाता है।
काम, क्रोध और लोभ ये आत्मनाश के त्रिविध द्वार हैं, इसलिए इन त्रि को त्याग देना चाहिए।
 दयावान भगवान अर्जुन को बता रहे है।
हे कुन्तीपुत्र! जो व्यक्ति त्रिलोक नरक द्वारों से बच पाता है, वह आत्म-साक्षात्कार के लिए किशोर कार्य करता है और इस प्रकार परम गति की प्राप्ती होती है।

काम, क्रोध और लोभ -

 मनुष्य को मानव जीवन के तीन शत्रु - काम, क्रोध और लोभ  से अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। जो व्यक्ति चाहता है वही इन तीनों से मुक्त होगा, टुकड़ा ही उसका जीवन शुद्ध होगा। तब वह वैदिक साहित्य में आदिष्ट विधि-विधानों का पालन कर सकते हैं। इस प्रकार मानव जीवन के विधि-विधानों का पालन करते हुए वह आपको धीरे-धीरे आत्म-साक्षात्कार के पद पर प्रतिष्ठित कर सकता है। यदि वह इतना भाग्यशाली हो गया कि इस अभ्यास से कृष्णभावनामृत तक उठ सका तो उसकी सफलता निश्चित है। वैदिक साहित्य में कर्म और कर्मफल की प्राप्ति का आदेश है, जिससे मनुष्य शुद्धि की अवस्था (संस्कार) तक पहुंच सके। सारी विधि काम, क्रोध और लोभ के परित्याग पर आधारित है। इस विधि का ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य आत्म-साक्षात्कारकर्ता के उच्च पद तक पहुँच सकता है और यह आत्म-साक्षात्कारकर्ता की पूर्ण भक्ति में है। भक्ति में बुद्धजीव की मुक्ति निश्चित है। वैदिक पद्धति के अनुसार चार आश्रमों और चार वर्णों का वर्णन किया गया है। विभिन्न विधानों के लिए विभिन्न विधानों की व्यवस्था है। यदि मनुष्य का पालन-पोषण होता है, तो उसे आत्म-साक्षात्कार का सर्वोच्च पद प्राप्त होता है। तब उनकी मुक्ति में कोई सन्देह नहीं रह गया।
इस श्लोक का सन्देश यह है कि आत्मिक उन्नति और ईश्वर की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हम अपने जीवन से अज्ञान, अहंकार और अवसाद को दूर करें और अपने कर्मों में संतुलन और शुद्धता बनाए रखें।
 16॥22॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 23

श्लोक:
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
 न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥

भावार्थ:
जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही
 जो शास्त्र स्थापित होते हैं और मनमाने ढंग से कार्य करते हैं, उन्हें न तो सिद्धि मिलती है, न सुख, न ही परमगति की प्राप्ति होती है।इस श्लोक का मुख्य सन्देश यह है कि धार्मिक और नैतिक आचरण के लिए शास्त्रों के निर्देशों का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है। केवल अपनी इच्छाओं और स्वेच्छा से कार्य करने वाला व्यक्ति जीवन की उच्चता और पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता।
16॥23॥
भगवद  गीता अध्याय: 16
श्लोक 24

श्लोक:
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
 ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥

भावार्थ:
इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है
 ॥24॥ 
 
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः 
 ॥16॥

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...