मंगलवार, 10 दिसंबर 2024

अध्याय 13

अध्याय 13 की व्याख्या निम्नलिखित है:

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के बीच के संबंध के बारे में बताते हैं।

क्षेत्र (शरीर) के गुण:

- शरीर एक क्षेत्र है, जिसमें विभिन्न अवयव होते हैं।
- शरीर में विभिन्न गुण होते हैं, जैसे कि सुख, दुख, इच्छा, द्वेष आदि।
- शरीर एक परिवर्तनशील और नाशवान वस्तु है।

क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के गुण:

- आत्मा एक क्षेत्रज्ञ है, जो शरीर के अंदर रहता है।
- आत्मा एक अविनाशी और अपरिवर्तनीय वस्तु है।
- आत्मा के गुण हैं ज्ञान, विज्ञान, और आनंद।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच का संबंध:

- क्षेत्र (शरीर) क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का वाहन है।
- क्षेत्रज्ञ (आत्मा) क्षेत्र (शरीर) को धारण करता है।
- क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच का संबंध एक दूसरे के पूरक होने का है।

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि आत्मा और शरीर के बीच का संबंध क्या है, और कैसे आत्मा को शरीर के बंधनों से मुक्त किया जा सकता है।

✍️चलिए अब गीता के 13वें अध्याय को समझने का एक छोटा सा प्रयास करते हैं।

इस अध्याय में 34 श्लोक हैं

भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 1

श्लोक:
(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय) 
 श्रीभगवानुवाच
 इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
 एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' (जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजों का फल समय पर प्रकट होता है, इसलिए इसका नाम 'क्षेत्र' ऐसा कहा है) इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं
 13॥1॥
इसमें प्रत्यक्ष ज्ञान के लिए भगवान ने निम्न उदाहरण दिया है कि

👉जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजों का फल समय पर प्रकट होता है, इसलिए इसका नाम 'क्षेत्र' ऐसा कहा है👈

खेत में बोए गए बीज:

पृथ्वी पर ही बीजे जाते है, पर इस पर फल उसी समय प्रकट नहीं होते। कुछ बीजों के अनुसार फल अपने समय अनुसार धरती के नीचे प्राप्त होते है।

धरती पर बीज बीजने पर जिनका फल धरती के नीचे से प्राप्त होते हैं और उनके नाम हैं:

1. आलू
2. प्याज
3. लहसुन
4. गाजर
5. शलजम
6. मूली
7. चुकंदर
8. कंद

इत्यादि इन सभी फलों को धरती के नीचे से प्राप्त किया जाता है, और वे सभी धरती के नीचे उगते हैं।

कुछ धरती पर बीजे फल जो आकाश में प्राप्त होते हैं और उनके नाम हैं:

1. आम
2. जामुन
3. नारंगी
4. संतरा
5. अनार
6. पपीता
7. केला
8. अंगूर
9. लीची
10. चीकू

इन सभी फलों को धरती पर बीजा जाता है, लेकिन वे आकाश में पेड़ों पर उगते हैं और वहीं से प्राप्त किए जाते हैं।

कुछ जो बीज बीजे तो धरती पर जाते है उनका फल धरती पर ही प्राप्त होता है, और उनके नाम हैं:

1. टमाटर
2. मिर्च
3. बैंगन
4पालक
5साग आदि
इन सभी फलों और सब्जियों को धरती पर बीजा जाता है, और उनका फल भी धरती पर ही प्राप्त होता है।

अब जैसे तरबूज और खरबूजा के बीज धरती पर बीजे तो जाते ही हैं, लेकिन उनका फल कुछ दूरी पर मिलता है, क्योंकि ये दोनों फल बेल पर उगते हैं और उनकी बेलें धरती पर फैल जाती हैं।

तरबूज और खरबूजा की बेलें धरती पर फैलती हैं और उनके फल धरती से कुछ दूरी पर लगते हैं। इसलिए, तरबूज और खरबूजा के बीज धरती पर बीजे जाते हैं, लेकिन उनका फल कुछ दूरी पर मिलता है।

जिस से साबित होता है इस लोक में बीजे बीज का फल परलोक में भी प्राप्त होता है।

👉बहुत अच्छा ज्ञान प्राप्त हुआ! यह एक बहुत ही गहरा और अर्थपूर्ण कथन है। 
यहाँ पर "परलोक" का अर्थ है कि जिस स्थान पर हमारे कर्मों का फल प्राप्त होता है, चाहे वह इस जीवन में हो या अगले जीवन में।

इस कथन का अर्थ है कि हम जो कुछ भी करते हैं, उसका फल हमें निश्चित रूप से प्राप्त होगा, चाहे वह इस जीवन में हो या अगले जीवन में।

 यह हमें अपने कर्मों के प्रति जिम्मेदार बनाता है और हमें अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। 👈

क्यों कि श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' (जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजों का फल समय पर प्रकट होता है, इसलिए इसका नाम 'क्षेत्र' ऐसा कहा है) इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि यह शरीर, जिसे हम देखते हैं, उसे 'क्षेत्र' कहा जाता है। 'क्षेत्र' का अर्थ होता है खेत। जैसे खेत में बीज बोए जाते हैं और समय आने पर वे फसल के रूप में प्रकट होते हैं, वैसे ही शरीर में किए गए कर्मों के बीज समय आने पर उनके परिणाम के रूप में प्रकट होते हैं। इसलिए शरीर को 'क्षेत्र' कहा गया है।
श्रीकृष्ण यह भी तो बताते हैं कि जो इस शरीर, या 'क्षेत्र' को जानता है, उसे 'क्षेत्रज्ञ' कहा जाता है। 'क्षेत्रज्ञ' वह व्यक्ति है जो इस शरीर के पीछे छिपे हुए सच्चे स्वरूप, अर्थात आत्मा या चेतना को जानता है। जो व्यक्ति यह समझ पाता है कि शरीर तो नश्वर है, परंतु उसके अंदर जो आत्मा है, वह अमर और अजर है, वही सच्चा ज्ञानी है। ज्ञानीजन इस सत्य को समझते हैं और इसीलिए वे शरीर और आत्मा के इस अंतर को जानते हुए जीते हैं।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने शरीर और आत्मा के भेद को स्पष्ट किया है, जिससे यह समझा जा सके कि शरीर एक साधन मात्र है, और असली पहचान आत्मा की है, जो इस शरीर का साक्षी है।

✍️मुझे खेद है, लेकिन मेरे पास श्री हरिकृष्णदास गोयनका द्वारा अनुवादित श्री शंकराचार्य की संस्कृत टीका का हिंदी अनुवाद उपलब्ध नहीं है।

हालांकि, मैं आपको बता सकता हूँ कि श्री शंकराचार्य की संस्कृत टीका भगवद गीता के अध्याय 13 के श्लोक 1 के लिए है:

"अर्जुन उवाच
क्षेत्रं क्षेत्रज्ञं तथा कृत्स्नं
प्रवक्ष्यामि संशयं च्छेत्तारम्"

इसका हिंदी अनुवाद है:

"अर्जुन ने कहा
मैं आपको क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और कृत्स्न के बारे में बताऊँगा, और आपके संशय को दूर करूँगा।"

यह अनुवाद श्री शंकराचार्य की संस्कृत टीका के आधार पर नहीं है, बल्कि भगवद गीता के मूल संस्कृत पाठ के आधार पर है।

✍️चलो हम भी खोज रहे थे तो मैने पाया कि जो प्रत्यक्ष ज्ञान श्री कृष्ण ने दिया है कि
।👉जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजों का फल समय पर प्रकट होता है, इसलिए इसका नाम 'क्षेत्र' ऐसा कहा है👈
इसी में कुछ ना छुपा हो और
जो हम ने खोजा या पाया है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण है। श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कहा है कि जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजों का फल समय पर प्रकट होता है।

यहाँ पर "क्षेत्र" शब्द का अर्थ है "शरीर" या "मन", जिसमें हम अपने कर्मों के बीज बोते हैं। और "क्षेत्रज्ञ" शब्द का अर्थ है "आत्मा" या "जीव", जो इन कर्मों के बीजों को बोता है और उनके फल को प्राप्त करता है।

इस प्रकार, श्री कृष्ण का यह कथन हमें यह समझने में मदद करता है कि हमारे कर्मों के परिणाम हमें निश्चित रूप से प्राप्त होंगे, चाहे वह इस जीवन में हो या अगले जीवन में।

भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 2

श्लोक:
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
 क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही जान (गीता अध्याय 15 श्लोक 7 और उसकी टिप्पणी देखनी चाहिए) और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित प्रकृति और पुरुष का जो तत्व से जानना है (गीता अध्याय 13 श्लोक 23 और उसकी टिप्पणी देखनी चाहिए) वह ज्ञान है- ऐसा मेरा मत है
 
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।

मनःस्थानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।

 भाव श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जीवात्मा कैसे परमात्मा से अलग होता है और फिर से परमात्मा में विलीन हो जाता है।

इस व्याख्या में, श्री कृष्ण बता रहे हैं कि जीवात्मा परमात्मा का एक अंश है, और वह परमात्मा से अलग होकर संसार में आता है। वह जीवात्मा मन सहित शरीर में प्रवेश करता है और श्रोत्रादि इंद्रियों को आकर्षित करता है।

इस व्याख्या में यह भी बताया गया है कि जीवात्मा का परमात्मा से अलग होना और फिर से परमात्मा में विलीन होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, 
जैसे कि जल में सूर्यका प्रतिबिम्ब और घट आदि से परिच्छिन्न आकाश का आकाश ही अंश है। जैसे घटा आकाश का अंश हो कर आकाश में ही मिल जाती है।
अभी तो अध्याय 13 श्लोक 23 की व्याख्या आनी है गीता ही ऐसी है जितनी बार पड़ो भाव वही होता है ज्ञान  कुछ और भी निकल आता है।
उपदृष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।

परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।।13.23।।
 

भगवद गीता के अध्याय 13 के श्लोक 23 का भाव यह है:

"उपदृष्टा" (साक्षी), "अनुमन्ता" (आदेश देने वाला), "भर्ता" (पालन करने वाला), "भोक्ता" (भोगने वाला), और "महेश्वर" (सर्वोच्च भगवान) - यह सभी शब्द परमात्मा के गुणों को दर्शाते हैं।

और यह भी कहा गया है कि यह परमात्मा "देहेऽस्मिन्" (इस शरीर में) "पुरुषः परः" (सर्वोच्च पुरुष) के रूप में विराजमान है।

इस श्लोक का भाव यह है कि परमात्मा हमारे अंदर विराजमान है, और वह हमारे जीवन का साक्षी, आदेश देने वाला, पालन करने वाला, भोगने वाला, और सर्वोच्च भगवान है।अर्थ कुछ और भी बन सकता है।

पर  भाव वही है :जैसे शरीर और आत्मा के भेद को स्पष्ट किया जा रहा है, जिससे यह समझा जा सके कि शरीर एक साधन मात्र है, और असली पहचान आत्मा की है, जो इस शरीर का साक्षी है।
13॥2॥

भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 3

श्लोक:
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्‌।
 स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु॥

भावार्थ:
वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है- वह सब संक्षेप में मुझसे सुन
 श्लोक 3, अध्याय 13 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के बारे में ज्ञान देने की शुरुआत करते हैं। 
इस श्लोक में श्रीकृष्ण का इशारा हैं कि वे संक्षेप में अर्जुन को यह बताने वाले हैं कि क्षेत्र क्या है, इसका स्वरूप कैसा है, इसके विकार (परिवर्तन) क्या हैं, यह कैसे उत्पन्न होता है, और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) कौन है तथा उसका प्रभाव क्या है?
यहां अर्जुन को समझा रहे हैं कि वे अब उन्हें ज्ञान का वह हिस्सा बताएंगे जो जीवन के रहस्यों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वो हे क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद जानना बहुत आवश्यक है क्योंकि यह भेद समझ में आने पर ही मनुष्य अपने सच्चे स्वरूप का अनुभव कर सकता है।

इस श्लोक का सार भी यही है कि संसार में जो कुछ भी होता है वह क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) की समझ पर निर्भर करता है। क्षेत्र का ज्ञान हमें भौतिक संसार और उसके सभी गुणों के बारे में बताता है, जबकि क्षेत्रज्ञ का ज्ञान आत्मा की शाश्वतता और उसकी अद्वितीयता का बोध कराता है। श्रीकृष्ण यह ज्ञान अर्जुन को संक्षेप में देने का वचन देते हैं ताकि अर्जुन इसे समझ सके और अपने जीवन में इसका सही उपयोग कर सके।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा और शरीर के बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, जिससे वे जीवन के वास्तविक अर्थ को समझ सकें।

13॥3॥

भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 4

श्लोक:
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्‌।
 ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥

भावार्थ:
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेदमन्त्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किए हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है
 भगवद गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है। 

जिनके यहाँ कुछ उद्धरण हैं:

- "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत" (भगवद गीता 13.2) - अर्थात्, मुझे क्षेत्रज्ञ के रूप में जानो, जो सभी क्षेत्रों में विराजमान है।
- "इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते" (भगवद गीता 13.2) - अर्थात्, हे कौन्तेय, यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है।
- "क्षेत्रज्ञः चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत" (भगवद गीता 13.3) - अर्थात्, मुझे क्षेत्रज्ञ के रूप में जानो, जो सभी क्षेत्रों में विराजमान है।
- "क्षेत्रं क्षेत्रज्ञं तथा कृत्स्नं प्रवक्ष्यामि" (भगवद गीता 13.1) - अर्थात्, मैं आपको क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और कृत्स्न के बारे में बताऊँगा।

इन उद्धरणों से यह स्पष्ट होता है कि भगवद गीता में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व बहुत महत्वपूर्ण है, और यह ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है।

ऋषियों द्वारा दिया गया प्रत्यक्ष ज्ञान बहुत ही गहरा और अर्थपूर्ण है। यहाँ कुछ उदाहरण हैं:

- "तत् त्वम् असि" (तैत्तिरीय उपनिषद्) - अर्थात्, तुम वही हो।
- "अहं ब्रह्मास्मि" (बृहदारण्यक उपनिषद्) - अर्थात्, मैं ब्रह्म हूँ।
- "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (चांदोग्य उपनिषद्) - अर्थात्, यह सब ब्रह्म है।
- "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (बृहदारण्यक उपनिषद्) - अर्थात्, आत्मा को देखना, सुनना, मनन करना, और निदिध्यासन करना चाहिए।

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि ऋषियों द्वारा दिया गया प्रत्यक्ष ज्ञान आत्म-ज्ञान, ब्रह्म-ज्ञान, और वास्तविकता की प्रकृति के बारे में है।

(विभिन्न धर्मों में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सिद्धांत को अलग-अलग तरीकों से समझाया गया है। यहाँ कुछ उदाहरण हैं:

हिंदू धर्म: जैसा कि हमने पहले देखा, हिंदू धर्म में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सिद्धांत को भगवद गीता और उपनिषदों में समझाया गया है।

बौद्ध धर्म: बौद्ध धर्म में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सिद्धांत को "धातु" और "विज्ञान" के रूप में समझाया गया है। धातु शरीर और मन को दर्शाता है, जबकि विज्ञान आत्मा या जीव को दर्शाता है।

जैन धर्म: जैन धर्म में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सिद्धांत को "जीव" और "अजीव" के रूप में समझाया गया है। जीव आत्मा या जीव को दर्शाता है, जबकि अजीव शरीर और पदार्थ को दर्शाता है।

इस्लाम धर्म: इस्लाम धर्म में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सिद्धांत को "रूह" और "जिस्म" के रूप में समझाया गया है। रूह आत्मा या जीव को दर्शाता है, जबकि जिस्म शरीर को दर्शाता है।

ईसाई धर्म: ईसाई धर्म में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सिद्धांत को "आत्मा" और "शरीर" के रूप में समझाया गया है। आत्मा आत्मा या जीव को दर्शाता है, जबकि शरीर शरीर को दर्शाता है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि विभिन्न धर्मों में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सिद्धांत को अलग-अलग तरीकों से समझाया गया है, लेकिन मूल विचार यह है कि आत्मा या जीव एक अलग इकाई है जो शरीर से अलग है।)
13॥4॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 5

श्लोक:
महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
 इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥

भावार्थ:
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध
 पाँच महाभूत प्राचीन भारतीय दर्शन और विज्ञान में वर्णित पाँच मूलभूत तत्व हैं जो हमारे ब्रह्मांड की रचना करते हैं। ये पाँच महाभूत हैं:

1. *पृथ्वी* (भूमि): 
यह महाभूत ठोस और स्थिर रूप में पाया जाता है। यह हमारे शरीर के हड्डियों, मांसपेशियों और अन्य ठोस अंगों का निर्माण करता है।

2. *जल* (अप): 
यह महाभूत तरल रूप में पाया जाता है। यह हमारे शरीर के रक्त, लार, पेशाब और अन्य तरल पदार्थों का निर्माण करता है।

3. *अग्नि* (तेज): 
यह महाभूत ऊर्जा और ताप के रूप में पाया जाता है। यह हमारे शरीर के तापमान, पाचन क्रिया, और अन्य जैविक प्रक्रियाओं का निर्माण करता है।

4. *वायु* (वायु):
 यह महाभूत गैसीय रूप में पाया जाता है। यह हमारे शरीर के श्वसन, रक्त परिसंचरण, और अन्य जैविक प्रक्रियाओं का निर्माण करता है।

5. *आकाश* (आकाश): 
यह महाभूत शून्य या अवकाश के रूप में पाया जाता है। यह हमारे शरीर के शून्य स्थान, जैसे कि फेफड़ों में हवा का स्थान, और अन्य जैविक प्रक्रियाओं का निर्माण करता है।

इन पाँच महाभूतों का संतुलन और परस्पर क्रिया हमारे शरीर और ब्रह्मांड की रचना और कार्य करने के लिए आवश्यक है।
अर्थात पाँच महाभूत या पंचमहाभूत हैं—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश। ये तत्व भौतिक जगत की संरचना के मूलभूत घटक हैं।

इसी प्रकार यहां:

अहङ्कार: 

अहंकार का मतलब है "मैं" की भावना, जो जीव को उसके अस्तित्व के प्रति सजग रखता है। अहंकार व्यक्ति को उसके स्वभाव और कार्यों के प्रति जकड़े रखता है।

बुद्धि: 

बुद्धि का अर्थ है निर्णय शक्ति या विवेक, जो सही और गलत के बीच में अंतर करने में सहायक होती है।

अव्यक्त:
 वह तत्व है जो प्रत्यक्ष नहीं है, परंतु सब कुछ उसी से उत्पन्न होता है। यह मूल प्रकृति है, जिसे कभी-कभी "माया" भी कहा जाता है।माया जो हम देखते , सुनते ,महसूस करते है पर वह नहीं है।

दस इन्द्रियाँ हैं:
पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (1कान,2 त्वचा, 3आँख, 4जीभ, 5नाक) और पाँच कर्मेंद्रियाँ (1हाथ, 2पैर, 3वाणी, 4गुदा, और 5जननेन्द्रिय)।
इन दस इन्द्रियों के साथ "एक" मन भी होता है, जो सभी इन्द्रियों का संयोजन और निर्देशन करता है।

पाँच इन्द्रियों के विषय:
1शब्द, 2स्पर्श, 3रूप, 4रस, और 5गंध। 
ये विषय इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव किए जाते हैं और जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण हमें सृष्टि के विभिन्न तत्वों की गहराई से जानकारी देते हैं। ये सभी तत्व "प्रकृति" का हिस्सा हैं, जिससे यह संसार चलता है। पाँच महाभूत इस भौतिक संसार के स्थूल तत्व हैं, जो हमारे आसपास की सभी वस्तुओं और जीवों का आधार हैं।
अहंकार और बुद्धि दो आंतरिक तत्व हैं, जो हमारे मानसिक और बौद्धिक स्तर पर कार्य करते हैं। अहंकार हमें हमारे "स्वयं" का बोध कराता है, जबकि बुद्धि हमें निर्णय लेने में सहायता करती है।
अव्यक्त वह अनजाना तत्व है, जो सब कुछ का मूल है, लेकिन स्वयं अव्यक्त रहता है। इसे सृष्टि की जड़ माना जाता है, जिससे सभी चीजें प्रकट होती हैं।
दस इन्द्रियाँ हमारे शरीर के संवेदी और क्रियात्मक अंग हैं, जो हमें बाहरी संसार से जोड़ते हैं। इन इन्द्रियों के माध्यम से हम दुनिया का अनुभव करते हैं और जीवन जीते हैं। मन इन इन्द्रियों का संयोजक और नियंत्रक है, जो हमें विभिन्न इन्द्रिय विषयों का अनुभव कराता है।

इस प्रकार, यह श्लोक हमें बताता है कि कैसे ये विभिन्न तत्व मिलकर इस संसार और हमारे जीवन का निर्माण करते हैं।
13॥5॥

भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 6

श्लोक:
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्‍घातश्चेतना धृतिः।
 एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌॥

भावार्थ:
तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना शरीर और अन्तःकरण की एक प्रकार की चेतन-शक्ति। और 
👉धृति:  

धृति एक महत्वपूर्ण गुण है जो हिंदू धर्म और भारतीय दर्शन में वर्णित है। धृति का अर्थ है "स्थिरता", "धैर्य", और "संयम"।

धृति को भगवद गीता में भी वर्णित किया गया है, जहां भगवान कृष्ण अर्जुन को धृति के महत्व के बारे में बताते हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि धृति से व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित कर सकता है, और अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है।

धृति के तीन प्रकार बताए गए हैं:

1. _धैर्य_: यह धृति का पहला प्रकार है, जिसमें व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए धैर्य रखता है।
2. _संयम_: यह धृति का दूसरा प्रकार है, जिसमें व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए संयम रखता है।
3. _अनासक्ति_: यह धृति का तीसरा प्रकार है, जिसमें व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए अनासक्ति रखता है, यानी वह अपने मन और इंद्रियों को विषयों से जोड़ने की इच्छा को त्याग देता है।

धृति के महत्व को समझने से व्यक्ति अपने जीवन में स्थिरता, धैर्य, और संयम प्राप्त कर सकता है, और अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है।
-- इस प्रकार विकारों (पाँचवें श्लोक में कहा हुआ तो क्षेत्र का स्वरूप समझना चाहिए और इस श्लोक में कहे हुए इच्छादि क्षेत्र के विकार समझने चाहिए।) के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया
 धृति के बारे में अन्य धर्मों में भी वर्णन किया गया है। यहाँ कुछ उदाहरण हैं:

बौद्ध धर्म: बौद्ध धर्म में धृति को "धैर्य" या "संयम" के रूप में वर्णित किया गया है। बौद्ध धर्म में धृति को एक महत्वपूर्ण गुण माना जाता है जो व्यक्ति को अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद करता है।

जैन धर्म: जैन धर्म में धृति को "धैर्य" या "संयम" के रूप में वर्णित किया गया है। जैन धर्म में धृति को एक महत्वपूर्ण गुण माना जाता है जो व्यक्ति को अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद करता है।

इस्लाम धर्म: इस्लाम धर्म में धृति को "सबर" के रूप में वर्णित किया गया है। सबर का अर्थ है धैर्य और संयम। इस्लाम धर्म में सबर को एक महत्वपूर्ण गुण माना जाता है जो व्यक्ति को अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद करता है।

ईसाई धर्म: ईसाई धर्म में धृति को "पेटिएंस" के रूप में वर्णित किया गया है। पेटिएंस का अर्थ है धैर्य और संयम। ईसाई धर्म में पेटिएंस को एक महत्वपूर्ण गुण माना जाता है जो व्यक्ति को अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद करता है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि धृति के बारे में विभिन्न धर्मों में अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन मूल विचार यह है कि धृति एक महत्वपूर्ण गुण है जो व्यक्ति को अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद करता है।
इच्छा (Desire): यह व्यक्ति की किसी वस्तु, परिस्थिति या अनुभव की प्राप्ति की इच्छा को दर्शाता है। यह मानवीय स्वभाव का एक महत्वपूर्ण अंग है और इसे क्षेत्र का विकार कहा गया है।
द्वेष (Aversion): यह किसी वस्तु, परिस्थिति या व्यक्ति से नापसंदगी या नफरत को दर्शाता है। द्वेष भी क्षेत्र का एक विकार है जो हमें अशांति की ओर ले जाता है।
सुख (Pleasure): सुख का अनुभव तब होता है जब व्यक्ति को किसी इच्छा की पूर्ति होती है। यह एक सकारात्मक अनुभूति है, लेकिन इसे भी क्षेत्र का विकार माना गया है, क्योंकि यह व्यक्ति को स्थायी संतोष नहीं देता।
सङ्घात (Body): शरीर या स्थूल देह का पिण्ड, जिसमें पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का संयोजन होता है, इसे क्षेत्र का विकार कहा गया है।
चेतना (Consciousness): यह शरीर और मन के बीच की चेतना शक्ति है, जो जीवन के सभी अनुभवों को संभव बनाती है। यह भी क्षेत्र का एक अंग है।
धृति (Fortitude): धृति का अर्थ है धैर्य या स्थिरता, जो व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में संतुलित रखती है। इसे भी क्षेत्र का एक विकार कहा गया है।
संक्षेप में: इस श्लोक में श्री कृष्ण ने शरीर (क्षेत्र) के विभिन्न विकारों का वर्णन किया है। ये विकार (इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख आदि) मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं और इसे माया के बंधनों में जकड़े रखते हैं। इन विकारों से मुक्त होने पर ही मनुष्य मोक्ष या परम शांति प्राप्त कर सकता है। श्री कृष्ण यहाँ यह समझा रहे हैं कि ये सभी विकार क्षेत्र (शरीर और मन) का हिस्सा हैं और इन्हें समझकर ही हम आत्मा के सत्य स्वरूप को जान सकते हैं।13॥6॥पर ही विस्तृत पुस्तक भी बन सकती है 
13॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 7

श्लोक:
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌।
 आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥

भावार्थ:
श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि (सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जल-मृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि को बाहर की शुद्धि कहते हैं तथा राग, द्वेष और कपट आदि विकारों का नाश होकर अन्तःकरण का स्वच्छ हो जाना भीतर की शुद्धि कही जाती है।) अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह
अब जिन इच्छा आदिको वैशेशिकमतावलंबी 

(वैशेषिक दर्शन के अनुसार, पदार्थ नौ प्रकार के होते हैं:

1. पृथ्वी
2. जल
3. अग्नि
4. वायु
5. आकाश
6. समय
7. दिशा
8. आत्मा
9. मन

वैशेषिक दर्शन के अनुसार, इन पदार्थों के गुण और कर्म होते हैं, और ये गुण और कर्म एक दूसरे के साथ संबंधित होते हैं।)

वैशेषिकमतावलंबी व्यक्ति वैशेषिक दर्शन के सिद्धांतों को मानता है और उनका अनुसरण करता है।
 आत्माके धर्म मानते हैं वे भी क्षेत्रके ही धर्म हैं आत्माके नहीं यह बात भगवान कहते हैं --, इच्छा -- जिस प्रकारके सुखदायक विषयका पहले उपभोग किया गया था फिर वैसा ही पदार्थ के होने पर प्राप्त होने वाला सुखका कारण समझकर मनुष्य उसे लेना चाहता है वह चाहत है नाम की चाहत वह अन्तःकरण का धर्म है और ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र है। तथा द्वितीय--जिस प्रकार के पदार्थको दुःखका कारण समझकर पहले अनुभव हुआ हो फिर एक ही जाति के पदार्थ के प्राप्त होने पर कौन सा मनुष्य द्वेष करता है उस भावका नाम क्या है वह भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। वही प्रकार सुख कौन सा उपयुक्तआशारूप और सात्विक है ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र ही है तथा विपरीतरूप दुःख भी ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र ही है। देह और इंद्रियोंका समूह संघ के सदस्य हैं। प्रकाशित हुई जो अन्तःकरणकी वृत्ति है जो अग्निसे कलश लोहपिंडकी भाँति आत्मचैतन्यके आभासरूपसे व्याप्त है वह स्वयं भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। व्याकुल हुए शरीर और इन्द्रियादि किस आधार पर मिलते हैं वह धृति भी ज्ञेय होने से ही क्षेत्र है। अंतःकरण के लिए समस्त धर्मों का संकेत करने के लिए यहां इच्छादि धर्मों का ग्रहण किया गया है। कौन सा कुछ कहा गया है? उनके उपसंहार हैं--महत्तत्त्वदि अलवरसे सम्मिलित क्षेत्रका इसका स्वरूप संक्षेपसे कहा गया है। अर्थात् जिन समस्त क्षेत्रभेदोंका समूह में यह शरीर क्षेत्र ऐसा कहा गया है? महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त भेदोंसे अलग-अलग उस क्षेत्र की व्याख्या कर दी गई। जो आगे कहे जानेवाले विशेष क्षेत्र से सम्बंधित है जिस क्षेत्रज्ञ को प्रभावयुक्त जन लेने से (मनुष्य) अमृतरूप हो जाता है भगवान स्वयं वाम आश्रम ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि, अन्य वचनों से विशेषों सहित।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक गुणों और आचरणों का वर्णन किया है। यह श्लोक अध्याय 13 के "प्रकृति, पुरुष तथा चेतना" के संदर्भ में है, जिसमें यह बताया गया है कि व्यक्ति को किन-किन गुणों का पालन करना चाहिए ताकि वह सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सके।
यहाँ पर 'अमानित्वम' का अर्थ है श्रेष्ठता का अभाव, यानी कि अपने आपको सबसे बड़ा या सबसे श्रेष्ठ मानने का भाव न होना। 'अदम्भित्वम्' का अर्थ है दिखावा न करना। व्यक्ति को अपने गुणों और योग्यताओं का प्रदर्शन करके दूसरों पर प्रभाव डालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।इस से घमंड पैदा होता है।अर्थात जैसे हो वैसे ही दूसरों को भी दिखाई दो।
अहिंसा: यह गुण सभी प्रकार की हिंसा से दूर रहने की शिक्षा देता है। न केवल शारीरिक हिंसा से बल्कि मानसिक और वाणी द्वारा भी किसी को कष्ट न पहुँचाने का भाव होना चाहिए।
क्षान्ति: यहाँ क्षमाभाव का महत्व बताया गया है, जिसका अर्थ है दूसरों की गलतियों को माफ कर देना। क्षमाशीलता से व्यक्ति के मन में शांति और स्थिरता आती है।बार बार भी गलती माफ नहीं होती फिर भी प्रयासरत रहे कि किसी का बुरा अपने द्वारा ना हो जाए।
आरजवम्: इसका मतलब है सरलता और सच्चाई। जीवन में व्यक्ति को सच्चा और सीधा होना चाहिए, बिना किसी छल-कपट के।दंभी स्वरूप को ग्रहण ना करें।
आचार्योपासनम्: गुरु की सेवा और उनके प्रति श्रद्धा का भाव रखना 'आचार्योपासनम्' कहलाता है। गुरु के ज्ञान और शिक्षाओं का सम्मान और उनका पालन करना आवश्यक है।(गुरु मानो ग्रंथ )
शौचम्: यहाँ शुद्धि के दो पहलुओं का वर्णन है - बाहरी और आंतरिक शुद्धि। बाहरी शुद्धि का अर्थ है शरीर, वस्त्र, और पर्यावरण की सफाई रखना। आंतरिक शुद्धि का अर्थ है मन और हृदय को राग, द्वेष, और छल कपट जैसे विकारों से मुक्त रखना।
स्थैर्यम्: मन और शरीर की स्थिरता। जीवन में आने वाली परेशानियों में धैर्य संतोष  रखना और अपने लक्ष्य की ओर स्थिर रहना 'स्थैर्यम्' कहलाता है।
आत्मविनिग्रहः: अपने मन, इंद्रियों और शरीर पर नियंत्रण रखना। इच्छाओं और वासनाओं को संयमित करके आत्मनियंत्रण करना।(इच्छा कभी पूरी नहीं होती जरूरत जरूर पूरी होती है ,ध्यान में सदा रखना।
इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि यह सभी गुण आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं। इन गुणों का पालन करके व्यक्ति अपने जीवन में सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है और परमात्मा के साक्षात्कार के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।
 13॥7॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 8

श्लोक:
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च।
 जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌॥

भावार्थ:
इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना चाहिए परिवार,समाज,बंधु बांधव कभी दबाव बनाते है कि ऐसे नहीं ऐसे करो तो उस में अपने इस लोक और परलोक की दशा को जानना जरूरी होता है नहीं तो हिरणाकश्यप जैसे लोग भी मिल ही जाते है।ब्राह्मण विवाह पड़ा रहा होता है,तो उसे शॉट कट विवाह पढ़ाने की शिक्षा देने वाले अक्सर मिल जाते हैं (ऐसे में ब्राह्मण को चाहिए कि भाई मैं शास्त्र विरुद्ध नहीं जा सकता चलिए मैं उठ जाता हूं आप ही पड़ा लें विवाह।ऐसे में इसलोक में भी जरूरत जरूर पूरी होती हर और परलोक भी सुख दायक होगा ।यदि 20000₹ की इच्छा पूरी करने को ब्राह्मण भटक जाता है तो इच्छा भी पूरी नहीं हुई क्यों कि आज 20हजार तो कल 50हजार भी होगी और परलोक भी सुखद नहीं रहने वाला ऐसे विचार कर लें।
इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि यह सभी गुण आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं। इन गुणों का पालन करके व्यक्ति अपने जीवन में सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है और परमात्मा के साक्षात्कार के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।
 13॥8॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 9

श्लोक:
असक्तिरनभिष्वङ्‍ग: पुत्रदारगृहादिषु।
 नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥

भावार्थ:
पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना
 अर्थात:
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है जो हमारे जीवन में संतुलन और शांति प्राप्त करने के लिए अति आवश्यक है।

पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना निम्नलिखित तरीकों से प्राप्त किया जा सकता है:

1. *आत्म-ज्ञान*: 
अपने आप को जानना और समझना कि हम कौन हैं और हमारा उद्देश्य क्या है, यह हमें आसक्ति और ममता से मुक्ति दिला सकता है।
2. *वैराग्य*: 
वैराग्य का अर्थ है दुनिया की वस्तुओं से विरक्ति। यह हमें आसक्ति और ममता से मुक्ति दिला सकता है।
3. *ध्यान और योग*: 
ध्यान और योग का अभ्यास करने से हम अपने मन को शांत और स्थिर कर सकते हैं, जिससे हम प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में भी सम रहते हैं।
4. *ज्ञान और विवेक*:
 ज्ञान और विवेक का अर्थ है सही और गलत के बीच का अंतर समझना। यह हमें आसक्ति और ममता से मुक्ति दिला सकता है।
5. *सेवा और त्याग*:
 सेवा और त्याग का अर्थ है दूसरों की सेवा करना और अपने स्वार्थ को त्यागना तो बहुत ही महत्व पूर्ण है। यह हमें आसक्ति और ममता से मुक्ति दिला सकता है।

👉जैसे इस उदाहरण को जान लेने के बाद यह योगी के कर्म को सरल बना देता है।
अपने पुत्र, पुत्री,बंधु,बांधवों (मातुल,पितृतुल में तो मोह का होना स्वाभाविक है)
यदि समाज में ज्ञान द्वारा थोड़ा गहराई में जा कर विचार करें तो हम सुरक्षित मार्ग खुद ही चुन लेते हैं जिसे अपनाने में भी कोई कष्ट नहीं होता।

क्या समाज के हर उस पड़ाव के  अपने माता पिता, पुत्र पुत्री, भाई बहन , छोटे बड़े, बराबर वालों के साथ वही व्यवहार नहीं कर सकते जो हम अपने कुल के लोगों के साथ करते है?

बस यहां हमें इन समान आयु वालो से भी तो वही व्यवहार करना है, जो चाहे किसी भी वर्ण के क्यों ना हों? क्या कठिन है?

पर कठिनाई दूसरे धर्म के समान आयु के लोगों से समान व्यवहार में आती है।जिसको भाईचारा,या गंगा जमुनी तहजीब बताया जाता है।
भगवान मूर्ख नहीं हैं जिन्हें ने हमें हमारे धर्म के अनुसार पैदा तो किया साथ में सम्पूर्ण विश्व को एक कुटुंभ भी बताया । कुटुंब के अनुसार उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार बनता है।परंतु बिना किसी के धर्म की पहचान को छुपाए । उनके खाने , बाने, बाणी जो उनकी है वो उस को निभाए जो हमारी है उस को हम निभाए। उनका भी आदर अपने कुटुंब के अनुसार उनकी आयु के अनुसार ही बनता है। भाई,बहन,पुत्र,पुत्री,सखा,माता, पिता जैसे ही हैं।
इन तरीकों को अपनाकर, हम पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना प्राप्त कर सकते हैं।👈

13॥9॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 10

श्लोक:
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
 विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥

भावार्थ:
मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानते हुए स्वार्थ और अभिमान का त्याग करके, श्रद्धा और भाव सहित परमप्रेम से भगवान का निरन्तर चिन्तन करना 'अव्यभिचारिणी' भक्ति है) तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना
 अव्यभिचारिणी भक्ति भगवान के प्रति एक निष्ठावान और अविचल भक्ति है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित रहता है और कभी भी अपनी भक्ति से विचलित नहीं होता है।

अव्यभिचारिणी भक्ति का अर्थ है कि भक्त अपने ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति में कभी भी कमी नहीं आने देता है और हमेशा अपने ईश्वर की सेवा में लगा रहता है।

अव्यभिचारिणी भक्ति के कुछ मुख्य लक्षण हैं:

1. _निष्ठा_: भक्त अपने ईश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित रहता है।
2. _अविचलितता_: भक्त अपनी भक्ति में कभी भी विचलित नहीं होता है।
3. _एकाग्रता_: भक्त अपने ईश्वर की सेवा में एकाग्र रहता है।
4. _प्रेम_: भक्त अपने ईश्वर से प्रेम करता है और उनकी सेवा में लगा रहता है।

अव्यभिचारिणी भक्ति का महत्व भगवद गीता और अन्य हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित है। यह भक्ति भगवान के साथ एक गहरा संबंध स्थापित करने में मदद करती है और भक्त को आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष प्राप्त करने में मदद करती है।
अव्यभिचारिणी भक्ति का महत्व दूसरे धर्मो में भी है जो गवाही देते है;

अव्यभिचारिणी भक्ति का महत्व अन्य धर्मों में भी है। यहाँ कुछ उदाहरण हैं:

बौद्ध धर्म: बौद्ध धर्म में अव्यभिचारिणी भक्ति को "अनुराधा" कहा जाता है, जिसका अर्थ है "निष्ठावान भक्ति"। बौद्ध धर्म में अव्यभिचारिणी भक्ति को भगवान बुद्ध के प्रति निष्ठावान भक्ति के रूप में देखा जाता है।

इस्लाम धर्म: इस्लाम धर्म में अव्यभिचारिणी भक्ति को "इखलास" कहा जाता है, जिसका अर्थ है "निष्ठावान भक्ति"। इस्लाम धर्म में अव्यभिचारिणी भक्ति को अल्लाह के प्रति निष्ठावान भक्ति के रूप में देखा जाता है।

ईसाई धर्म: ईसाई धर्म में अव्यभिचारिणी भक्ति को "अगापे" कहा जाता है, जिसका अर्थ है "निष्ठावान प्रेम"। ईसाई धर्म में अव्यभिचारिणी भक्ति को ईश्वर के प्रति निष्ठावान प्रेम के रूप में देखा जाता है।
सिख धर्म में भी अव्यभिचारिणी भक्ति का महत्व है। सिख धर्म में इसे "निष्काम सेवा" या "निष्काम भक्ति" कहा जाता है, जिसका अर्थ है "निष्ठावान और स्वार्थरहित सेवा"।

सिख धर्म में अव्यभिचारिणी भक्ति को वाहेगुरु (ईश्वर) के प्रति निष्ठावान और स्वार्थरहित भक्ति के रूप में देखा जाता है। सिख धर्म में यह माना जाता है कि अव्यभिचारिणी भक्ति से व्यक्ति वाहेगुरु के साथ एक गहरा संबंध स्थापित कर सकता है और अपने जीवन में शांति और संतुष्टि प्राप्त कर सकता है।

सिख धर्म के गुरुओं ने अव्यभिचारिणी भक्ति के महत्व पर बहुत जोर दिया है। गुरु नानक देव जी ने कहा है, "निष्काम सेवा करो, और वाहेगुरु के प्रति निष्ठावान रहो।" गुरु गोबिंद सिंह जी ने भी कहा है, "अव्यभिचारिणी भक्ति से व्यक्ति वाहेगुरु के साथ एक गहरा संबंध स्थापित कर सकता है।"

इस प्रकार, सिख धर्म में भी अव्यभिचारिणी भक्ति का महत्व है, और यह व्यक्ति को वाहेगुरु के साथ एक गहरा संबंध स्थापित करने में मदद करती है।
यहां यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अव्यभिचारिणी भक्ति का महत्व विभिन्न धर्मों में अलग-अलग तरीकों से देखा जाता है, लेकिन मूल विचार यह है कि अव्यभिचारिणी भक्ति एक निष्ठावान और अविचल भक्ति है जो ईश्वर के प्रति समर्पण और प्रेम को दर्शाती है।
वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) भी स्थित वही है।इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि परमात्मा की उपस्थिति हर जगह है और उसकी पहचान केवल गहरे ध्यान और अंतर्दृष्टि के माध्यम से संभव है। वह सदा सबके समीप रहते हुए भी हमारी सामान्य समझ से परे रहते हैं।
 13॥10॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 11

श्लोक:
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌।
 एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥

भावार्थ:
अध्यात्म ज्ञान में (जिस ज्ञान द्वारा आत्मवस्तु और अनात्मवस्तु जानी जाए, उस ज्ञान का नाम 'अध्यात्म ज्ञान' है) नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान (इस अध्याय के श्लोक 7 से लेकर यहाँ तक जो साधन कहे हैं, वे सब तत्वज्ञान की प्राप्ति में हेतु होने से 'ज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान (ऊपर कहे हुए ज्ञान के साधनों से विपरीत तो मान, दम्भ, हिंसा आदि हैं जो सभी धर्मो में सामान्य रूप से लागू होते हैं, वे अज्ञान की वृद्धि में हेतु होने से 'अज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है- ऐसा कहा है।
13॥11॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 12

श्लोक:
ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
 अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥

भावार्थ:
जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत्‌ ही कहा जाता है, न असत्‌ ही
 क्यों कि भगवान तो सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। (आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है) 
और किसी भी सनातनी हिंदू, सनातनी मुस्लिम, सनातनी सिख,सनातनी ईसाई से एक जैसा ही व्यवहार करता है।ना किसी से कम ना किसी से ज्यादा उसको सभी प्रिय है।सिवाए म्लेच्छ हिंदू, म्लेच्छ सिख,म्लेच्छ ईसाई, और म्लेच्छ मूसल मानों के।
यहां 4 के अनुसार
हिंदू 
मुस्लिम
सिख 
ईसाई
आपस में 4 भाई
4 वेद:

- ऋग्वेद
- यजुर्वेद
- सामवेद
- अथर्ववेद

4 दिशाएँ:

- उत्तर
- दक्षिण
- पूर्व
- पश्चिम

4 बेदी (विवाह में प्रयोग की जाने वाली आग):

- यह चार आगें विवाह के समय प्रयोग की जाती हैं और इन्हें चारों वेदों के प्रतीक के रूप में माना जाता है।

4 पवित्र धर्म:

- धर्म
- अर्थ
- काम
- मोक्ष

4 पवित्र की संख्या में अन्य बातें:

- 4 आश्रम 
ब्रह्मचर्य, 
गृहस्थ, 
वानप्रस्थ, 
संन्यास
- 4 वर्ण 
ब्राह्मण, 
क्षत्रिय, 
वैश्य, 
शूद्र
- 4 युग 
सतयुग,
 त्रेतायुग, 
द्वापरयुग, 
कलियुग
- 4 पुरुषार्थ
धर्म, 
अर्थ, 
काम, 
मोक्ष

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हिंदू धर्म में 4 की संख्या का विशेष महत्व है, और यह कई पवित्र और महत्वपूर्ण अवधारणाओं से जुड़ा हुआ है।
इस श्लोक का सार यह है कि भगवान का स्वरूप अपार, असीम और गुणों से परे है, लेकिन फिर भी वे समस्त सृष्टि का पालन करने वाले और गुणों का भोग करने वाले हैं। उनका यह गुण ही उनकी सर्वव्यापकता और पूर्णता को दर्शाता है।
13॥12॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 13

श्लोक:
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्‌।
 सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥

भावार्थ:
वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।
 आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है।
यह श्लोक भगवान की सर्वव्यापकता और उनकी सार्वभौमिक उपस्थिति को दर्शाता है। यहाँ भगवान की उन विशेषताओं का वर्णन किया गया है जो उनके समस्त प्राणियों और ब्रह्मांड में व्यापक रूप से विद्यमान होने को प्रमाणित करती हैं।
 13॥13॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 14

श्लोक:
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्‌।
 असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥

भावार्थ:
वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है
 वह भगवान सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला भी है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला ही है।
इस श्लोक में भगवान की प्रकृति का वर्णन किया गया है। यहाँ कुछ मुख्य बिंदुओं की चर्चा की जा रही है:

सर्वेन्द्रियगुणाभासं: भगवान सब इन्द्रियों के गुणों को जानने वाले हैं, अर्थात् वे सभी इन्द्रियों की क्रियाओं और उनके प्रभावों का पूरा ज्ञान रखते हैं।
सर्वेन्द्रियविवर्जितम्: परन्तु वे स्वयं सभी इन्द्रियों से परे हैं। इसका अर्थ है कि भगवान स्वयं इन्द्रिय संबंधी नहीं हैं और उनके ऊपर इन्द्रियों का कोई प्रभाव नहीं होता।
असक्तं: भगवान को किसी भी वस्तु या घटना में आसक्ति नहीं होती। वे सब कुछ धारण करने के बावजूद किसी भी वस्तु से बंधे नहीं होते।
सर्वभृच्चैव: वे फिर भी सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करने वाले हैं। भगवान समस्त ब्रह्मांड और जीवों का पोषण और संरक्षण करते हैं।
निर्गुणं गुणभोक्तृ च: भगवान स्वयं निर्गुण होते हुए भी गुणों का अनुभव करते हैं। यानि कि वे गुणों से रहित हैं, फिर भी वे गुणों का भोग करते हैं और उनकी उपस्थिति का अनुभव करते हैं।
इसका सार यह है कि भगवान का स्वरूप अपार, असीम और गुणों से परे है, लेकिन फिर भी वे समस्त सृष्टि का पालन करने वाले और गुणों का भोग करने वाले हैं। उनका यह गुण ही उनकी सर्वव्यापकता और पूर्णता को दर्शाता है।

13॥14॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 15

श्लोक:
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
 सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌॥

भावार्थ:
वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) भी स्थित वही है
 ❤️परम ब्रह्म का आत्मरूप से निर्देश करने की एक विधि यह है कि उसे विरोधाभास की भाषा में उपदेश दें।
जैसे कोई एक वाक्य जिस को सुनकर आश्चर्य हुआ हो जब बुद्धि ने अपने विषय में कोई अलग धारणा बनायी हो? तब दूसरा वाक्य उस धारणा का खंडन करता हो। चोरी करले कौन देखता है।अब खंडन करने वाला कहता है।चोरी तो पाप है।फिर कहता है अगर चोरी नहीं की तो खाएगा क्या बेशक चोरी पाप है।एक धारणा तो बनी कि चोरी करना पाप है(जो सत्य के रूप में सामने होता है)
चोरी करेगा तो पाप करेगा।चोरी नहीं करेगा तो भूखा मरे गा।मर गया तो जो तेरे लिए जरूरी काम पुण्य के हैं नहीं कर सके गा। पाप पुण्य का भार बराबर बराबर करने को आज चोरी कर ले।इस प्रकार की प्रकृति यह है कि वह बुद्धि शून्यता की कल्पना अपने निर्विकल्प स्वरूप के अनुभव में स्थित करती है। यह विरोधा भासी भाषा आध्यात्मिक ग्रंथों का उपयोग करती है। चर्चा का सतही अध्ययन करने वाले लोग शास्त्रोपदेश की विधि को न समझें कर अपने विश्वास या नास्तिकता को न्यायोचित सिद्ध करने के लिए इस प्रकार की बातों का उत्पादन किया करते कि इसमें सही या गलत क्या है? 
जो मन को भाता है उसी को धारण कर लेता है। जब कि शास्त्र ही प्रायश्चित करने की बात भी कहता है।जब स्वार्थ से जोड़ कर कोइ वैचारिक आत्मसाक्षार निर्णय लेता है वह घातक होता है। जब निस्वार्थ भाव से आत्म साक्षात्कार से ज्ञान पाता है वह कल्याणकारी होता है।फिर उसकी प्रमाणिकता की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।
आत्मचैतन्य के संबंध से ही सभी इन्द्रियाँ अपना-अपना व्यापार करती हैं। लेकिन ऐसा ही कुछ देखने को मिलता है कि उसकी अच्छिन्न आत्मा ही कार्य करती है और वह इंद्रियों से युक्त है। वास्तविक विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इन्द्रियाँ भौतिक पदार्थ हैं और रसायन भी हैं जबकि वे अभिव्यक्ति उन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मा सनातन और अविकारी है। संक्षेप में  आत्मा की उत्पत्ति कैसे होती है? बुरा स्वसंप्रदाय से वह सर्वेन्द्रिय विवर्जित है। स्ट्रॉक्टर के रूप में समझना पैनासोनिक स्टूडेंट्स के लिए आसान नहीं है। तथापि अपने देश के महानों आचार्यों द्वारा इसे दृष्टांतों और उपमाओं के विद्वानों द्वारा करने का प्रयास किया गया है। कोई भी तरंग संपूर्ण समुद्र के रूप में नहीं है संपूर्ण तरंगे संपूर्ण समुद्र के रूप में नहीं है। हम यह नहीं कह सकते कि समुद्र उन तरंगों में सहायक है क्योंकि वह तो उन सबका स्वरूप ही है। असक्त होते हुए भी उन सबको सहने वाला समुद्र के अतिरिक्त और कोई नहीं होता। सिक्के सभी वस्त्रों में है घरेलू वस्त्र कप नहीं है। तथापि कपडा  ही कपड़े को धारण करने वाला होता है। इसी प्रकार विविधता की यह सृष्टि चैतन्य ब्रह्म नहीं है परन्तु ब्रह्म ही सर्वभृत है। वह निर्गुण मनुष्य के मन में सदैव सात्विकता का भोजन क्या है राज और तम इन तीन गुणों के प्रभाव में काम करते हैं। इन गुणवत्ता वाले उपकरणों को आत्मा सदा प्रकाशित करती रहती है। प्रकाशक प्रकाश के धर्मों से मुक्त होने के कारण आत्मा का गुण समाप्त हो जाता है। बुरा एक चेतन मन ही इन गुणवत्ता का अनुभव कर सकता है इसलिए यहां कहा गया है कि आत्मा स्वयं निर्गुण होती है और मन की शक्तियों द्वारा गुण का भोक्ता भी होती है। इस प्रकार इस श्लोक में आत्मा का सोपाधिक (उपाधि सहित) और निरूपाधिक (उपाधि घटक) इन दोनों दर्शनों का निर्देश दिया गया है। इतना ही नहीं वर्ण भी एक व्यष्टि डिग्री में व्यक्ति आत्मा ही सर्वत्र समस्त विध्वंस में स्थित है
परमात्मा चर और अचर सभी जीवों के भीतर और बाहर दोनों जगह व्याप्त है। अर्थात्, वह ब्रह्मा (अचर) और जीवों (चर) दोनों के स्वरूप में समाया हुआ है। इस प्रकार, परमात्मा सभी स्थितियों में मौजूद है, चाहे वह स्थिर वस्तुएं हों या गतिशील प्राणी।परंतु परमात्मा अत्यंत सूक्ष्म है, और इसलिए सामान्य मनुष्यों के लिए उसका ज्ञान प्राप्त करना कठिन है। जैसे सूर्य की किरणों में स्थित जल को सामान्य आँख से देखना कठिन होता है, वैसे ही परमात्मा की सूक्ष्मता के कारण उसका तात्त्विक स्वरूप मनुष्य की साधारण समझ से परे होता है। चोरी कर ले नाकर में ही लगा रहता है
परमात्मा न केवल निकटतम है बल्कि दूरस्थ भी है। भक्तों और ज्ञानी व्यक्तियों के लिए परमात्मा अति समीप है, जबकि अज्ञानी और श्रद्धारहित व्यक्तियों के लिए वह दूर लगता है। यह द्वैत और अद्वैत का भी संकेत है— परमात्मा एक ही समय में सभी जगह पर स्थित है, चाहे वह भौतिक रूप से समीप हो या दूर।श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि परमात्मा की उपस्थिति हर जगह है और उसकी पहचान केवल गहरे ध्यान और अंतर्दृष्टि के माध्यम से संभव है। वह सदा सबके समीप रहते हुए भी हमारी सामान्य समझ से परे ही रहते हैं।
आत्म जागरूकता को प्रमाणित करने के लिए, व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और क्रियाओं को निम्नलिखित तरीकों से परखता है:

1. *आत्म-विश्लेषण*: व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और क्रियाओं का विश्लेषण करता है और उनके पीछे के कारणों और प्रेरणाओं को समझने का प्रयास करता है।
2. *आत्म-मूल्यांकन*: व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और क्रियाओं का मूल्यांकन करता है और उनके अनुसार अपने जीवन में सुधार करने का प्रयास करता है।
3. *आत्म-निरीक्षण*: व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और क्रियाओं का निरीक्षण करता है और उनके प्रभावों को समझने का प्रयास करता है।
4. *आत्म-साक्षात्कार*: व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और क्रियाओं के माध्यम से अपने आप को समझने का प्रयास करता है और अपने जीवन के उद्देश्य और अर्थ को समझने का प्रयास करता है।

इन तरीकों से, व्यक्ति अपनी आत्म जागरूकता को प्रमाणित कर सकता है और अपने जीवन में सुधार करने के लिए आवश्यक कदम उठा सकता है।

13॥15॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 16

श्लोक:
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌।
 भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥

भावार्थ:
वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है (जैसे महाकाश विभागरहित स्थित हुआ भी घड़ों में पृथक-पृथक के सदृश प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा सब भूतों में एक रूप से स्थित हुआ भी पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है) तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने परमात्मा की प्रकृति और उसके गुणों का वर्णन किया है। यहाँ पर बताया गया है कि परमात्मा सब जगह मौजूद है, लेकिन उसकी उपस्थिति एक अद्वितीय और अद्वितीय रूप में है। इस श्लोक को विस्तार से समझते हैं:

"अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌": यहाँ पर कहा गया है कि परमात्मा वस्तुतः विभक्त (अलग-अलग) नहीं है, बल्कि वह एक ही रूप में साक्षात् हर जगह मौजूद है। जैसे आकाश (ether) ईथर का कोई विभाजन नहीं होता, वह पूरे स्थान में समान रूप से फैला होता है, वैसे ही परमात्मा भी एकरूप और विभाजनहीन है।
हालांकि, इसी परमात्मा की उपस्थिति चराचर (सभी जीवित और निर्जीव वस्तुओं) में विभक्त (अलग-अलग) रूप में अनुभव होती है। उदाहरण के लिए, एक ही आकाश कई बर्तन (घड़े, बर्तन आदि) में विभाजित सा दिखता है, लेकिन वास्तव में वह एक ही आकाश होता है। इसी प्रकार, परमात्मा सब प्राणियों और वस्तुओं में बंटा हुआ प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में वह एक ही है।
"भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च": 
इस भाग में परमात्मा के तीन मुख्य गुणों का उल्लेख किया गया है:
"भूतभर्तृ": परमात्मा भूतों का पालनकर्ता है। वह सभी जीवों और वस्तुओं का संभार और पोषण करता है।
"ग्रसिष्णु": वह संहारक है। वह समय पर सबको समाप्त कर देता है, जिससे सृष्टि का पुनर्निर्माण संभव हो सके।
"प्रभविष्णु": वह सृष्टि का रचनाकार है। वह सब प्राणियों और वस्तुओं का निर्माण करता है।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण ने परमात्मा के अद्वितीयता, उसकी सर्वव्यापकता और उसके गुणों को स्पष्ट किया है। परमात्मा एक ही रूप में सर्वत्र विद्यमान है, लेकिन उसकी उपस्थिति और प्रभाव विभक्त रूप में अनुभव होती है, और वह सभी जीवों के पालन, संहार, और सृष्टि का कर्ता है।G O D है 

15॥16॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 17

श्लोक:
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
 ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌॥

भावार्थ:
वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति  एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों की एक विशेषता का वर्णन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों की क्रियाओं से प्रभावित नहीं होता और न ही दूसरों के द्वारा उत्पन्न कष्टों से परेशान होता है, वह भक्त भगवान को अत्यंत प्रिय होता है।इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति स्वयं को लोगों के कार्यों से विचलित नहीं होने देता, जो दूसरों के व्यवहार या घटनाओं से उत्तेजित नहीं होता।इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति दूसरों को उसके अपने कार्यों या व्यवहार से परेशान नहीं करता, यानी जो नकारात्मक प्रभाव दूसरों पर नहीं डालता।हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः" - इसका मतलब है कि जो व्यक्ति खुशी, क्रोध, भय या किसी भी प्रकार की भावनात्मक उथल-पुथल से मुक्त होता है। वह मानसिक रूप से शांत और संतुलित रहता है।
"स च मे प्रियः" - इसका अर्थ है कि ऐसा व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है।
इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह संकेत दे रहे हैं कि एक सच्चा भक्त वह होता है, जो आत्मिक शांति और संतुलन बनाए रखता है, और जो अपने आंतरिक और बाहरी वातावरण को संतुलित बनाए रखता है। ऐसा व्यक्ति भगवान के लिए विशेष रूप से प्रिय होता है, क्योंकि वह अनुकूल और सकारात्मक दृष्टिकोण से जीवन जीता है।
"ज्योतिषामपि तज्ज्योति": यहाँ पर 'ज्योति' का अर्थ है 'प्रकाश'। इस भाग में भगवान कहते हैं कि परमात्मा (परब्रह्म) सभी प्रकार की ज्योतियों (प्रकाशों) में भी सर्वोच्च ज्योति है। इसका मतलब यह है कि चाहे जो भी प्रकाश हो—सूरज की ज्योति, चाँद की ज्योति, या किसी और प्रकार का प्रकाश—सबमें सबसे श्रेष्ठ और ऊँची स्थिति वाला प्रकाश परमात्मा है।
"तमसः परमुच्यते": यहाँ पर 'तमस' का अर्थ है अंधकार। यह भाग कहता है कि परमात्मा अंधकार (अज्ञान) से भी परे है। वह अज्ञान, भ्रम, और माया से पूर्णतः मुक्त और स्वतंत्र है।
"ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं": इस वाक्य में भगवान बताते हैं कि परमात्मा स्वयं ज्ञान है, ज्ञेयं (जिसे जानने योग्य है) और ज्ञान प्राप्ति के माध्यम से ज्ञेय (प्राप्त करने योग्य) है। परमात्मा ही वह तत्वज्ञान है जिसे जानना और समझना हमारे लिए संभव है।
"हृदि सर्वस्य विष्ठितम्": यहाँ पर यह कहा गया है कि परमात्मा सभी के हृदय में स्थित है। वह हर व्यक्ति के अंदर गहराई से व्याप्त है, वह किसी विशेष स्थान पर सीमित नहीं है।
संक्षेप में, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि परमात्मा सच्चे ज्ञान का स्रोत है और हर प्राणी के हृदय में वास करता है। वह अज्ञान और माया से परे है और सभी प्रकार की ज्योतियों में सबसे ऊँचा है।
13॥17॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 18

श्लोक:
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
 मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥

भावार्थ:
इस प्रकार क्षेत्र (श्लोक 5-6 में विकार सहित क्षेत्र का स्वरूप कहा है) तथा ज्ञान (श्लोक 7 से 11 तक ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन कहा है।) और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप (श्लोक 12 से 17 तक ज्ञेय का स्वरूप कहा है) संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है
 इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि उन्होंने क्षेत्र (शरीर), ज्ञान (बुद्धि), ज्ञेय (आत्मा) और उनके संबंधों के बारे में बताया है।

 इस प्रकार मैंने क्षेत्र (शरीर), ज्ञान (बुद्धि), ज्ञेय (आत्मा) और उनके संबंधों के बारे में बताया है। मेरे भक्त इस ज्ञान को समझकर मेरी भावना में लीन हो जाते हैं।

व्याख्या:

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि उन्होंने क्षेत्र (शरीर), ज्ञान (बुद्धि), ज्ञेय (आत्मा) और उनके संबंधों के बारे में बताया है। यह ज्ञान भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन्हें भगवान की भावना में लीन होने में मदद करता है।

क्षेत्र (शरीर) का अर्थ है हमारा भौतिक शरीर, जो पंचभूतों से बना होता है। ज्ञान (बुद्धि) का अर्थ है हमारी बुद्धि, जो हमें सोचने, समझने और निर्णय लेने में मदद करती है। ज्ञेय (आत्मा) का अर्थ है हमारी आत्मा, जो हमारे असली स्वरूप को दर्शाती है।

भगवान कृष्ण के अनुसार, जब हम क्षेत्र (शरीर), ज्ञान (बुद्धि) और ज्ञेय (आत्मा) के बारे में समझते हैं, तो हम भगवान की भावना में लीन हो जाते हैं। यह भगवान की भावना में लीन होने का अर्थ है कि हम भगवान के साथ एकता का अनुभव करते हैं और हमारे जीवन में शांति और संतुष्टि का अनुभव करते हैं।

इस प्रकार, यह श्लोक हमें भगवान कृष्ण के ज्ञान को समझने और भगवान की भावना में लीन होने के लिए प्रेरित करता है।
संक्षेप में, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि उन्होंने 'क्षेत्र', 'ज्ञान', और 'ज्ञेयं' के बारे में संक्षेप में ज्ञान दिया है। जो भक्त इस ज्ञान को समझता है और अपने जीवन में लागू करता है, वह परमात्मा के सानिध्य को प्राप्त करता है और दिव्य स्वरूप को अनुभव कर सकता है।
13॥18॥
यह श्लोक भगवद गीता के 13वें अध्याय का 19वां श्लोक है। इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि उन्होंने क्षेत्र (शरीर), ज्ञान (बुद्धि), ज्ञेय (आत्मा) और उनके संबंधों के बारे में बताया है।

विस्तृत व्याख्या:

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥

अर्थ: इस प्रकार मैंने क्षेत्र (शरीर), ज्ञान (बुद्धि), ज्ञेय (आत्मा) और उनके संबंधों के बारे में बताया है। मेरे भक्त इस ज्ञान को समझकर मेरी भावना में लीन हो जाते हैं।

व्याख्या:

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि उन्होंने क्षेत्र (शरीर), ज्ञान (बुद्धि), ज्ञेय (आत्मा) और उनके संबंधों के बारे में बताया है। यह ज्ञान भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन्हें भगवान की भावना में लीन होने में मदद करता है।

क्षेत्र (शरीर) का अर्थ है हमारा भौतिक शरीर, जो पंचभूतों से बना होता है। ज्ञान (बुद्धि) का अर्थ है हमारी बुद्धि, जो हमें सोचने, समझने और निर्णय लेने में मदद करती है। ज्ञेय (आत्मा) का अर्थ है हमारी आत्मा, जो हमारे असली स्वरूप को दर्शाती है।

भगवान कृष्ण के अनुसार, जब हम क्षेत्र (शरीर), ज्ञान (बुद्धि) और ज्ञेय (आत्मा) के बारे में समझते हैं, तो हम भगवान की भावना में लीन हो जाते हैं। यह भगवान की भावना में लीन होने का अर्थ है कि हम भगवान के साथ एकता का अनुभव करते हैं और हमारे जीवन में शांति और संतुष्टि का अनुभव करते हैं।

इस प्रकार, यह श्लोक हमें भगवान कृष्ण के ज्ञान को समझने और भगवान की भावना में लीन होने के लिए प्रेरित करता है।
प्रकृति और पुरुष दोनों ही भगवद गीता में वर्णित महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं। यहाँ इन दोनों के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है:

प्रकृति:

प्रकृति का अर्थ है प्राकृतिक जगत, जिसमें हमारा शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि शामिल हैं। प्रकृति अनादि है, अर्थात् इसका कोई आरंभ नहीं है। यह भगवान की शक्ति है, जो समस्त सृष्टि को बनाए रखने और संचालित करने में मदद करती है।

पुरुष:

पुरुष का अर्थ है आत्मा, जो हमारे असली स्वरूप को दर्शाती है। पुरुष भी अनादि है, अर्थात् इसका कोई आरंभ नहीं है। यह भगवान का एक अंश है, जो हमारे शरीर में वास करता है और हमें जीवन प्रदान करता है।

प्रकृति और पुरुष का संबंध:

प्रकृति और पुरुष का संबंध बहुत ही गहरा है। प्रकृति पुरुष के लिए एक आधार है, जिस पर वह अपने जीवन को बनाए रखता है। पुरुष प्रकृति के माध्यम से ही अपने जीवन को जीता है और अपने कर्मों को करता है।

भगवद गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं और दोनों ही भगवान की शक्ति हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति और पुरुष का संबंध बहुत ही गहरा है और दोनों ही एक दूसरे के लिए आवश्यक हैं।

इस प्रकार, प्रकृति और पुरुष दोनों ही भगवद गीता में वर्णित महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं और दोनों ही भगवान की शक्ति हैं।
त्रिगुणात्मक प्रकृति एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो भगवद गीता और अन्य हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित है। यहाँ इसे सरल भाषा में विस्तार से बताया जा रहा है:

त्रिगुणात्मक प्रकृति का अर्थ है कि प्रकृति में तीन प्रकार के गुण होते हैं: सत्व, रज और तम। ये तीनों गुण प्रकृति के हर पहलू में मौजूद होते हैं और हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं।

सत्व गुण:

सत्व गुण का अर्थ है शुद्धता, पवित्रता और ज्ञान। यह गुण हमें ज्ञान, बुद्धि और विवेक प्रदान करता है। सत्व गुण के प्रभाव में, हमारा मन शांत, स्थिर और एकाग्र होता है।

रज गुण:

रज गुण का अर्थ है गति, परिवर्तन और क्रिया। यह गुण हमें गति, ऊर्जा और क्रियाशीलता प्रदान करता है। रज गुण के प्रभाव में, हमारा मन गतिशील, उत्साही और क्रियाशील होता है।

तम गुण:

तम गुण का अर्थ है अज्ञान, अंधकार और निष्क्रियता। यह गुण हमें अज्ञान, भ्रम और निष्क्रियता प्रदान करता है। तम गुण के प्रभाव में, हमारा मन भ्रमित, अस्थिर और निष्क्रिय होता है।

इन तीनों गुणों का संतुलन:

इन तीनों गुणों का संतुलन हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। जब हमारे जीवन में सत्व गुण का प्रभाव अधिक होता है, तो हमारा मन शांत, स्थिर और एकाग्र होता है। जब रज गुण का प्रभाव अधिक होता है, तो हमारा मन गतिशील, उत्साही और क्रियाशील होता है। और जब तम गुण का प्रभाव अधिक होता है, तो हमारा मन भ्रमित, अस्थिर और निष्क्रिय होता है।

इन तीनों गुणों का संतुलन हमारे जीवन में सुख, शांति और संतुष्टि प्रदान करता है। जब हम इन तीनों गुणों का संतुलन बनाए रखते हैं, तो हमारा जीवन सुखी, शांत और संतुष्ट होता है।
13।।19।।

अध्याय13श्लोक: 20
श्लोक:
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।  
 विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् 13॥ 20 ॥  
 

अनुवाद: 
प्रकृति तथा जीवों को अनादि समझना चाहिए। उनके विकार तथा गुण प्रकृतिजन्य हैं।

तात्पर्य:

 इस अध्याय के ज्ञान से मनुष्य शरीर (क्षेत्र) तथा शरीर के ज्ञाता (जीवात्मा तथा परमात्मा दोनों) को जान सकता है। शरीर क्रियाक्षेत्र है और प्रकृति से निर्मित है। शरीर के भीतर बद्ध तथा उसके कार्यो का भोग करने वाला आत्मा ही पुरुष या जीव है। वह ज्ञाता है और इसके अतिरिक्त भी दूसरा ज्ञाता होता है, जो परमात्मा है। निस्सन्देह यह समझना चाहिए कि परमात्मा तथा आत्मा एक ही भगवान् की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। जीवात्मा उनकी शक्ति है और परमात्मा उनका साक्षात् अंश (स्वांश) है।  

 प्रकृति तथा जीव दोनों ही नित्य हैं। तात्पर्य यह है कि वे सृष्टि के पहले से विद्यमान हैं। यह भौतिक अभिव्यक्ति परमेश्वर की शक्ति से है, और उसी प्रकार जीव भी हैं, किन्तु जीव श्रेष्ठ शक्ति है। जीव तथा प्रकृति इस ब्रह्माण्ड के उत्पन्न होने के पूर्व से विद्यमान हैं। प्रकृति तो महाविष्णु में लीन हो गई और जब इसकी आवश्यकता पड़ी तो यह महत्-तत्त्व के द्वारा प्रकट हुई। इसी प्रकार से जीव भी उनके भीतर रहते हैं, और चूँकि वे बद्ध हैं, अतएव वे परमेश्वर की सेवा करने से विमुख हैं। इस तरह उन्हें वैकुण्ठ-लोक में प्रविष्ट होने नहीं दिया जाता। लेकिन प्रकृति के व्यक्त होने पर इन्हें भौतिक जगत् में पुन: कर्म करने और वैकुण्ठ-लोक में प्रवेश करने की तैयारी करने का अवसर दिया जाता है। इस भौतिक सृष्टि का यही रहस्य है। वास्तव में जीवात्मा मूलत: परमेश्वर का अंश है, लेकिन अपने विद्रोही स्वभाव के कारण वह प्रकृति के भीतर बद्ध रहता है। इसका कोई महत्त्व नहीं है कि ये जीव या श्रेष्ठ जीव किस प्रकार प्रकृति के सम्पर्क में आये। किन्तु भगवान् जानते हैं कि ऐसा कैसे और क्यों हुआ। शास्त्रों में भगवान् का वचन है कि जो लोग प्रकृति द्वारा आकृष्ट हैं, वे कठिन जीवन-संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन इन कुछ श्लोकों के वर्णनों से यह निश्चित समझ लेना होगा कि प्रकृति के तीन गुणों के द्वारा उत्पन्न विकार प्रकृति की ही उपज हैं। जीवों के सारे विकार तथा प्रकार शरीर के कारण हैं। जहाँ तक आत्मा का सम्बन्ध है, सारे जीव एक से हैं।
श्लोक 20 में प्रकृति और पुरुष के भेद को स्पष्ट किया गया है। इस श्लोक में मुख्यतः दो बातें बताई गई हैं:
प्रकृति और पुरुष दोनों ही भगवद गीता में वर्णित महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं। यहाँ इन दोनों के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है:

प्रकृति:

प्रकृति का अर्थ है प्राकृतिक जगत, जिसमें हमारा शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि शामिल हैं। प्रकृति अनादि है, अर्थात् इसका कोई आरंभ नहीं है। यह भगवान की शक्ति है, जो समस्त सृष्टि को बनाए रखने और संचालित करने में मदद करती है।

पुरुष:

पुरुष का अर्थ है आत्मा, जो हमारे असली स्वरूप को दर्शाती है। पुरुष भी अनादि है, अर्थात् इसका कोई आरंभ नहीं है। यह भगवान का एक अंश है, जो हमारे शरीर में वास करता है और हमें जीवन प्रदान करता है।

प्रकृति और पुरुष का संबंध:

प्रकृति और पुरुष का संबंध बहुत ही गहरा है। प्रकृति पुरुष के लिए एक आधार है, जिस पर वह अपने जीवन को बनाए रखता है। पुरुष प्रकृति के माध्यम से ही अपने जीवन को जीता है और अपने कर्मों को करता है।

भगवद गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं और दोनों ही भगवान की शक्ति हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति और पुरुष का संबंध बहुत ही गहरा है और दोनों ही एक दूसरे के लिए आवश्यक हैं।

इस प्रकार, प्रकृति और पुरुष दोनों ही भगवद गीता में वर्णित महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं और दोनों ही भगवान की शक्ति हैं।
प्रकृति का स्वरूप: श्लोक के अनुसार, 'प्रकृति' कार्य और करण के उत्पन्न होने का कारण होती है। यहाँ 'कार्य' से तात्पर्य उन तत्वों से है जो भौतिक सृष्टि का निर्माण करते हैं, जैसे आकाश, वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी। 'करण' से तात्पर्य उन इन्द्रियों और मनोवैज्ञानिक तत्त्वों से है जिनका उपयोग हम भौतिक और मानसिक अनुभव के लिए करते हैं, जैसे बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ आदि। प्रकृति इन सभी तत्वों का निर्माण करने वाली ताकत है।
पुरुष का स्वरूप: 'पुरुष' यहाँ जीवात्मा को संदर्भित करता है, जो सुख और दुःख का अनुभव करता है। अर्थात, पुरुष (जीवात्मा) उन सभी भौतिक अनुभवों को भोगता है जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न किए गए हैं।

✍️मैं आपके लिए नोट बंदी को स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ:

*आत्मचैतन्य और आत्म-साक्षात्कार*

- आत्मचैतन्य का अर्थ है आत्म-जागरूकता और आत्म-साक्षात्कार।
- आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है अपने आप को पूरी तरह से समझना और अपने विचारों, भावनाओं और क्रियाओं को पूरी तरह से नियंत्रित करना।

*प्रकृति और पुरुष*

- प्रकृति का अर्थ है प्राकृतिक जगत, जिसमें हमारा शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि शामिल हैं।
- पुरुष का अर्थ है आत्मा, जो हमारे असली स्वरूप को दर्शाती है।
- प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं और दोनों ही भगवान की शक्ति हैं।

*त्रिगुणात्मक प्रकृति*

- त्रिगुणात्मक प्रकृति का अर्थ है कि प्रकृति में तीन प्रकार के गुण होते हैं: सत्व, रज और तम।
- सत्व गुण का अर्थ है शुद्धता, पवित्रता और ज्ञान।
- रज गुण का अर्थ है गति, परिवर्तन और क्रिया।
- तम गुण का अर्थ है अज्ञान, अंधकार और निष्क्रियता।

*दुख और सुख*

- दुख और सुख दोनों ही जीवन का एक हिस्सा हैं।
- दुख हमें मजबूत बनाता है, जबकि सुख हमें खुशी देता है।
- दुख और सुख का संतुलन हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है।
इस प्रकार, श्लोक में स्पष्ट किया गया है कि प्रकृति और पुरुष की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं। प्रकृति भौतिक और मनोवैज्ञानिक तत्त्वों का निर्माण करने वाली शक्ति है, जबकि पुरुष उन तत्त्वों के अनुभव और भोग में संलग्न रहता है।
13॥ 20 ॥  

भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 21

श्लोक:
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌।
 कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥

भावार्थ:
प्रकृति में  में कही हुई भगवान की त्रिगुणमयी माया समझना चाहिए स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है। (सत्त्वगुण के संग से देवयोनि में एवं रजोगुण के संग से मनुष्य योनि में और तमो गुण के संग से पशु आदि नीच योनियों में जन्म होता है।)
 13॥21॥

*अनुवाद:* 

प्रकृति समस्त भौतिक कारणों तथा कार्यों (परिणामों) की हेतु कही जाती है, और जीव (पुरुष) इस संसार में विविध सुख-दुख के भोग का कारण कहा जाता है।

*तात्पर्य:* 

जीवों में शरीर तथा इन्द्रियों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ प्रकृति के कारण हैं। कुल मिलाकर ८४ लाख भिन्न-भिन्न योनियाँ हैं और ये सब प्रकृतिजन्य हैं। जीव के विभिन्न इन्द्रिय-सुखों से ये योनियाँ मिलती हैं जो इस प्रकार इस शरीर या उस शरीर में रहने की इच्छा करता है। जब उसे विभिन्न शरीर प्राप्त होते हैं, तो वह विभिन्न प्रकार के सुख तथा दु:ख भोगता है। उसके भौतिक सुख-दु:ख उसके शरीर के कारण होते हैं, स्वयं उसके कारण नहीं। उसकी मूल अवस्था में भोग में कोई सन्देह नहीं रहता, अतएव वही उसकी वास्तविक स्थिति है। वह प्रकृति पर प्रभुत्व जताने के लिए भौतिक जगत् में आता है। वैकुण्ठ-लोक में ऐसी कोई वस्तु नहीं होती। वैकुण्ठ-लोक शुद्ध है, किन्तु भौतिक जगत् में प्रत्येक व्यक्ति विभिन्न प्रकार के शरीर-सुखों को प्राप्त करने के लिए कठिन संघर्ष में रत रहता है। यह कहने से बात और स्पष्ट हो जाएगी कि यह शरीर इन्द्रियों का कार्य है। इन्द्रियाँ इच्छाओं की पूर्ति का साधन हैं। यह शरीर तथा हेतु रूप इन्द्रियाँ प्रकृति द्वारा प्रदत्त हैं, और जैसा कि अगले श्लोक से स्पष्ट हो जाएगा, जीव को अपनी पूर्व आकांक्षा तथा कर्म के अनुसार परिस्थितियों के वश वरदान या शाप मिलता है। जीव की इच्छाओं तथा कर्मों के अनुसार प्रकृति उसे विभिन्न स्थानों में पहुँचाती है। जीव स्वयं ऐसे स्थानों में जाने तथा मिलने वाले सुख-दु:ख का कारण होता है। एक प्रकार का शरीर प्राप्त हो जाने पर वह प्रकृति के वश में हो जाता है, क्योंकि शरीर, पदार्थ होने के कारण, प्रकृति के नियमानुसार कार्य करता है। उस समय शरीर में ऐसी शक्ति नहीं कि वह उस नियम को बदल सके। मान लीजिये कि जीव को कुत्ते का शरीर प्राप्त हो गया। ज्योंही वह कुत्ते के शरीर में स्थापित किया जाता है, उसे कुत्ते की भाँति आचरण करना होता है। वह अन्यथा आचरण नहीं कर सकता। यदि जीव को सूकर का शरीर प्राप्त होता है, तो वह मल खाने तथा सूकर की भाँति रहने के लिए बाध्य है। इसी प्रकार यदि जीव को देवता का शरीर प्राप्त हो जाता है, तो उसे अपने शरीर के अनुसार कार्य करना होता है। यही प्रकृति का नियम है। लेकिन समस्त परिस्थितियों में परमात्मा जीव के साथ रहता है। वेदों में (मुण्डक उपनिषद् ३.१.१) इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है—द्वा सुपर्णा सयुजा सखाय:। 
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाय: एक महत्वपूर्ण श्लोक है जो ऋग्वेद में पाया जाता है। यहाँ इसकी व्याख्या की जा रही है:

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाय:।
समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति,
अनश्नन्नन्यः अभिचाकशीति॥

अर्थ:
"दो सुंदर पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हुए हैं, जो एक ही जड़ से जुड़े हुए हैं। उनमें से एक पक्षी पिप्पल का स्वाद लेता है, जबकि दूसरा पक्षी बिना खाए हुए देखता है।"

व्याख्या:

इस श्लोक में, दो सुंदर पक्षियों का वर्णन किया गया है, जो एक ही वृक्ष पर बैठे हुए हैं। यह वृक्ष ज्ञान का प्रतीक है, और दो पक्षी जीव और परमात्मा का प्रतीक हैं।

पहला पक्षी, जो पिप्पल का स्वाद लेता है, जीव का प्रतीक है, जो ज्ञान का स्वाद लेता है और जीवन का आनंद लेता है। दूसरा पक्षी, जो बिना खाए हुए देखता है, परमात्मा का प्रतीक है, जो ज्ञान को देखता है और जीवन को नियंत्रित करता है।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि जीव और परमात्मा दोनों ही एक ही ज्ञान के स्रोत से जुड़े हुए हैं, लेकिन जीव ज्ञान का स्वाद लेता है और जीवन का आनंद लेता है, जबकि परमात्मा ज्ञान को देखता है और जीवन को नियंत्रित करता है।

✍️मुण्डक उपनिषद् ३.१.१ एक महत्वपूर्ण श्लोक है जो वेदों में पाया जाता है। यहाँ इसकी व्याख्या की जा रही है:

मुण्डक उपनिषद् ३.१.१:
"ब्रह्मविद्या सर्वभूतेषु येनिकेतं यथा विज्ञायते"।

अर्थ:
"जिस प्रकार से ब्रह्मविद्या को सर्वभूतों में व्याप्त देखा जाता है, उसी प्रकार से इसे जानना चाहिए।"

व्याख्या:

इस श्लोक में, ब्रह्मविद्या का अर्थ है ब्रह्म के बारे में ज्ञान। यह श्लोक बताता है कि ब्रह्मविद्या को सर्वभूतों में व्याप्त देखा जाता है, अर्थात् यह ज्ञान सभी जीवों और वस्तुओं में व्याप्त है।

यह श्लोक यह भी बताता है कि इस ज्ञान को जानने के लिए हमें सर्वभूतों में व्याप्त ब्रह्म को देखना चाहिए। अर्थात्, हमें सभी जीवों और वस्तुओं में ब्रह्म की उपस्थिति को महसूस करना चाहिए।

इस श्लोक का अर्थ यह भी है कि हमें अपने जीवन में ब्रह्म के साथ एकता का अनुभव करना चाहिए। अर्थात्, हमें अपने जीवन में ब्रह्म की उपस्थिति को महसूस करना चाहिए और अपने जीवन को ब्रह्म के अनुसार जीना चाहिए।

परमेश्वर जीव पर इतना कृपालु है कि वह सदा जीव के साथ रहता है और सभी परिस्थितियों में परमात्मा रूप में विद्यमान रहता है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने पुरुष और प्रकृति के संबंध को स्पष्ट किया है। यहाँ पर "पुरुष" से तात्पर्य आत्मा से है, और "प्रकृति" से तात्पर्य प्रकृति की त्रिगुणमयी माया से है, जैसा कि गीता के अध्याय 7, श्लोक 14 में बताया गया है।

(इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने पुरुष और प्रकृति के संबंध को स्पष्ट किया है। यहाँ पर "पुरुष" से तात्पर्य आत्मा से है, और "प्रकृति" से तात्पर्य प्रकृति की त्रिगुणमयी माया से है, जैसा कि गीता के अध्याय 7, श्लोक 14 में बताया गया है।)
"पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌": इस भाग का अर्थ है कि आत्मा (पुरुष) जब प्रकृति के साथ स्थित होता है, तो वह प्रकृति के त्रैगुणिक गुणों का अनुभव करता है। यहाँ "भुङ्‍क्ते" का मतलब है "भोगना" या "अनुभव करना"।
"कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु": इसका तात्पर्य है कि आत्मा के गुणों से संपर्क (संग) के कारण उसे विभिन्न योनियों में जन्म लेना पड़ता है। यहाँ "सदसद्योनि" का अर्थ है "अच्छी और बुरी योनियाँ"।
सत्त्वगुण के संग: जब आत्मा का सत्त्वगुण प्रबल होता है, तो वह उच्च योनियों, जैसे देवयोनि, में जन्म लेता है।
रजोगुण के संग: जब रजोगुण प्रबल होता है, तो आत्मा मनुष्य योनि में जन्म लेता है।
तमो गुण के संग: जब तमोगुण प्रबल होता है, तो आत्मा नीच योनियों, जैसे पशु योनि, में जन्म लेता है।इस श्लोक के माध्यम से गीता यह बताती है कि आत्मा और प्रकृति का गहरा संबंध है। प्रकृति के त्रैगुणिक प्रभावों के कारण आत्मा को विभिन्न योनियों में जन्म लेना पड़ता है। ये गुण और उनके प्रभाव आत्मा के कर्मों और उसकी स्थिति पर निर्भर करते हैं।
इस प्रकार, इस श्लोक से यह भी समझ में आता है कि आत्मा का परिपूर्ण ज्ञान और योग साधना के माध्यम से प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्ति पाना भी संभव हो जाता है।
13॥21॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 22

श्लोक:
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
 परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥

भावार्थ:
इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है। वह साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करने वाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा- ऐसा कहा गया है।
 इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है। वह साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करने वाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा- ऐसा कहा गया है।
उपद्रष्टा (साक्षी): यह आत्मा, जो शरीर में स्थित है, एक निराकार साक्षी की तरह काम करता है। यह शरीर की गतिविधियों को देखता है, लेकिन स्वयं को उनसे प्रभावित नहीं मानता।
बचपन ,आत्मा वही ,जवानी,आत्मा वही,बुढ़ापा,आत्मा वही। 
शरीर का स्वरूप बदलता है आत्मा नहीं बदलती इस लिए आत्मा ही परमात्मा है कहा गया है।

👉किंतु गहराई से देखे तो पता चलता है कि 👈

 परमात्मा सर्व व्यापक है, अर्थात् वह सभी जगहों पर और सभी कणों में व्याप्त है। वह एक ऐसी चेतना है जो सभी जीवों और वस्तुओं में व्याप्त है, और वह सभी को एक ही समय में जानती है और नियंत्रित करती है।

आत्मा, दूसरी ओर, एक व्यक्तिगत चेतना है जो एक विशिष्ट शरीर में निवास करती है। आत्मा एक जगह पर होती है, अर्थात् वह एक विशिष्ट शरीर में निवास करती है, और वह उस शरीर के साथ जुड़ी हुई होती है।

इस प्रकार, परमात्मा और आत्मा दोनों ही अलग-अलग हैं, लेकिन वे एक ही समय में जुड़े हुए भी हैं। परमात्मा आत्मा को नियंत्रित करता है, और आत्मा परमात्मा के साथ जुड़ी हुई होती है।

 लेकिन यह एक बात स्पष्ट है कि परमात्मा और आत्मा दोनों ही एक ही समय में जुड़े हुए हैं, और वे एक ही समय में अलग-अलग भी हैं। इसी लिए अन्तरात्मा हमें न्यायाधीश के समान दण्ड देने से पूर्व मित्र की भांति चेतावनी भी तो  देती है।

अनुमन्ता (स्वीकर्ता): आत्मा उन गतिविधियों को स्वीकार करता है और उन्हें अपनी वास्तविकता के अनुसार मान्यता देता है। यह गतिविधियाँ इस आत्मा के वास्तविक स्वभाव से मेल खाती हैं।
भर्ता (पालक): आत्मा इस शरीर का पालन करने वाला है। यह शरीर के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है और इसकी विभिन्न प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।
महेश्वर (सर्वशक्तिमान): आत्मा, ब्रह्मा और अन्य देवताओं का स्वामी है, जो सृष्टि के विभिन्न कार्यों को संचालित करते हैं। इसका कोई वास्तविक मालिक नहीं है, यह सभी का मालिक है।
परमात्मा (अद्वितीय तत्व): आत्मा, शुद्ध सच्चिदानंदघन है, यानी यह अस्तित्व, चेतना, और आनंद का संपूर्ण रूप है। यह शाश्वत, अचिंत्य और अद्वितीय है।
इस श्लोक में आत्मा के विभिन्न पहलुओं को वर्णित किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आत्मा शाश्वत और अनंत है, और इसे सभी भौतिक और आध्यात्मिक गुणों से परे देखा जाता है।
शरीर के मामले में जो स्थान साबुन का है, वही आत्मा के संदर्भ में आंसू का है।आवेश कोई भावनात्मक ऊर्जा नहीं, बल्कि आत्मा और बाहरी दुनिया का टकराव है।
13॥22॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 23

श्लोक:
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह।
 सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥

व्याख्या:
इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है (दृश्यमात्र सम्पूर्ण जगत माया का कार्य होने से क्षणभंगुर, नाशवान, जड़ और अनित्य है तथा जीवात्मा नित्य, चेतन, निर्विकार और अविनाशी एवं शुद्ध, बोधस्वरूप, सच्चिदानन्दघन परमात्मा का ही सनातन अंश है, आत्मा को न शाश्त्र काट सकता है, न आग जला सकती है, न जल भिगो सकता है और न हवा सुखा सकती है।
इस प्रकार समझकर सम्पूर्ण मायिक पदार्थों के संग का सर्वथा त्याग करके परम पुरुष परमात्मा में ही एकीभाव से नित्य स्थित रहने का नाम उनको 'तत्व से जानना' है) वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता।
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने यह समझाने का प्रयास किया है कि जिस व्यक्ति ने पुरुष (आत्मा) और प्रकृति (माया) को सही अर्थ में समझ लिया है, वह किस प्रकार जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
जो व्यक्ति पुरुष (आत्मा) और प्रकृति (माया) के गुणों को समग्रता में जानता है, वह समझता है कि:माया (प्रकृति) की सम्पूर्ण रचना केवल क्षणिक, नाशवान, जड़ और अनित्य है।
जीवात्मा (आत्मा) नित्य, चेतन, निर्विकार, और अविनाशी है।
परमात्मा (ईश्वर) शुद्ध, बोधस्वरूप, और सच्चिदानन्दघन है, जो कि जीवात्मा का सनातन अंश है।
जब व्यक्ति इस प्रकार के तत्वज्ञान के साथ सम्पूर्ण मायिक पदार्थों को त्यागकर परमात्मा में एकीभाव से स्थित होता है, तो वह सच्चे अर्थ में ज्ञान प्राप्त करता है।

ऐसा व्यक्ति सर्वथा वर्तमान (की हर स्थिति और समय में) कर्म करते हुए भी, जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
सार: यह श्लोक यह सिखाता है कि ज्ञान की प्राप्ति से, और सही तरीके से प्रकृति और पुरुष की पहचान कर, एक व्यक्ति कर्म करने के बावजूद पुनर्जन्म से मुक्त हो सकता है। इस प्रकार, सच्चे ज्ञान के द्वारा ही आत्मा को शाश्वत शांति प्राप्त होती है।
 13॥23॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 24

श्लोक:
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
 अन्ये साङ्‍ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥

भावार्थ:
उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान (जिसका वर्णन गीता अध्याय 6 में श्लोक 11 से 32 तक विस्तारपूर्वक किया है जिसमें जिस का भाव है

गीता अध्याय 6 में श्लोक 11 से 32 तक, भगवान कृष्ण ने योग के बारे में विस्तार से बताया है। यहाँ इसकी संक्षिप्त व्याख्या दी जा रही है:

*योग की परिभाषा*

श्लोक 11 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि योग एक ऐसी अवस्था है जिसमें मन एकाग्र होता है और आत्मा के साथ जुड़ जाता है।

*योग के लिए आवश्यक गुण*

श्लोक 12-14 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि योग के लिए आवश्यक गुण हैं: शांति, एकाग्रता, और आत्म-नियंत्रण।

*योग के लिए आवश्यक अभ्यास*

श्लोक 15-19 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि योग के लिए आवश्यक अभ्यास हैं: प्राणायाम, ध्यान, और आत्म-चिंतना।

*योग के फल*

श्लोक 20-23 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि योग के फल हैं: आत्म-ज्ञान, शांति, और मोक्ष।

*योग के लिए आवश्यक सावधानी*

श्लोक 24-27 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि योग के लिए आवश्यक सावधानी है: आत्म-नियंत्रण, मन की एकाग्रता, और आत्म-चिंतना।

*योग के लिए आवश्यक समर्पण*

श्लोक 28-32 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि योग के लिए आवश्यक समर्पण है: भगवान के प्रति समर्पण, आत्म-नियंत्रण, और आत्म-चिंतना।

इस प्रकार, गीता अध्याय 6 में श्लोक 11 से 32 तक, भगवान कृष्ण ने योग के बारे में विस्तार से बताया है, जिसमें योग की परिभाषा, योग के लिए आवश्यक गुण, अभ्यास, फल, सावधानी, और समर्पण के बारे में बताया गया है।)
द्वारा हृदय में देखते हैं, अन्य कितने ही ज्ञानयोग (जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 11 से 30 तक विस्तारपूर्वक किया है जिसका भाव यह रहा 
गीता अध्याय 2 में श्लोक 11 से 30 तक, भगवान कृष्ण ने आत्मा की अमरता और शरीर की नाशवान होने के बारे में विस्तार से बताया है। यहाँ इसकी संक्षिप्त व्याख्या दी जा रही है:

_आत्मा की अमरता_

श्लोक 11-13 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि आत्मा अमर है, और यह शरीर की मृत्यु के साथ नहीं मरती।

_शरीर की नाशवान होने_

श्लोक 14-15 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि शरीर नाशवान है, और यह जन्म, वृद्धि और मृत्यु के चक्र में पड़ता है।

_आत्मा की प्रत्येक शरीर में प्रवेश_

श्लोक 16-22 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि आत्मा प्रत्येक शरीर में प्रवेश करती है, और यह शरीर की मृत्यु के साथ नहीं मरती।

_आत्मा की मुक्ति_

श्लोक 23-30 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि आत्मा की मुक्ति तब होती है जब यह शरीर की मृत्यु के साथ नहीं मरती, और यह भगवान के साथ एकता का अनुभव करती है।

इस प्रकार, गीता अध्याय 2 में श्लोक 11 से 30 तक, भगवान कृष्ण ने आत्मा की अमरता और शरीर की नाशवान होने के बारे में विस्तार से बताया है, और आत्मा की मुक्ति के बारे में भी बताया है।) द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोग (जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 40 से अध्याय समाप्तिपर्यन्त विस्तारपूर्वक किया है सभी इसी प्रकार है।गीता अध्याय 2 में श्लोक 40 से अध्याय समाप्ति तक, भगवान कृष्ण ने कर्मयोग के बारे में विस्तार से बताया है। यहाँ इसकी संक्षिप्त व्याख्या दी जा रही है:

कर्मयोग की परिभाषा

श्लोक 40 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि कर्मयोग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करता है, और अपने कर्मों के फल की इच्छा नहीं करता है।

कर्मयोग के लाभ

श्लोक 41-45 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि कर्मयोग के कई लाभ हैं, जिनमें से कुछ हैं: आत्म-शांति, आत्म-ज्ञान, और भगवान के साथ एकता का अनुभव।

कर्मयोग के लिए आवश्यक गुण

श्लोक 46-51 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि कर्मयोग के लिए आवश्यक गुण हैं: आत्म-नियंत्रण, आत्म-विश्वास, और भगवान के प्रति समर्पण।

कर्मयोग के लिए आवश्यक अभ्यास

श्लोक 52-55 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि कर्मयोग के लिए आवश्यक अभ्यास हैं: प्राणायाम, ध्यान, और आत्म-चिंतना।

कर्मयोग के फल

श्लोक 56-72 में, भगवान कृष्ण कहते हैं कि कर्मयोग के फल हैं: आत्म-मुक्ति, भगवान के साथ एकता का अनुभव, और आत्म-शांति।

इस प्रकार, गीता अध्याय 2 में श्लोक 40 से अध्याय समाप्ति तक, भगवान कृष्ण ने कर्मयोग के बारे में विस्तार से बताया है, जिसमें कर्मयोग की परिभाषा, लाभ, आवश्यक गुण, अभ्यास, और फल के बारे में बताया गया है।) द्वारा देखते हैं अर्थात प्राप्त करते हैं
 13॥24॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 25

श्लोक:
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
 तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥

भावार्थ:
परन्तु इनसे दूसरे अर्थात जो मंदबुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात तत्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसार-सागर को निःसंदेह तर जाते हैं
  पर 'अन्ये' से अभिप्राय उन लोगों से है जो 'एवं' (उक्त) तत्त्वज्ञान को नहीं जानते। ये लोग शास्त्रों और उपदेशों के अनुसार वास्तविकता को समझने में असमर्थ होते हैं।
ये लोग, जो खुद तत्त्वज्ञान को नहीं जानते, वे दूसरों से सुनी हुई बातों के आधार पर पूजा और उपासना करते हैं। यानी, वे सीधे तत्त्वज्ञान को नहीं समझते लेकिन वे उन बातों को मानते हैं जो उन्हें दूसरों से सुनने को मिलती हैं।
वह भी मुक्ति को अग्रसर होते है।
भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि ये लोग भी, जिनके पास तत्त्वज्ञान की गहराई नहीं है, फिर भी वे मृत्यु के महासागर को पार कर सकते हैं। इसका मतलब है कि यदि वे श्रवण और उपासना में लगे रहते हैं, तो वे अंततः मुक्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
जो लोग सुनने और श्रवण में विश्वास रखते हैं, वे भी इस भौतिक संसार के दुख और मृत्यु के समुद्र से पार हो सकते हैं।
इस प्रकार, इस श्लोक का तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञान की गहराई में न जाकर भी अगर लोग श्रवण और उपासना में विश्वास रखते हैं, तो वे भी मुक्ति की प्राप्ति कर सकते हैं। यह दर्शाता है कि सही मार्ग पर चलने और भगवान के उपदेशों को मानने से, भले ही व्यक्ति ज्ञान की गहराई को न समझे, वे भी मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
13॥25॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 26

श्लोक:
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्‍गमम्‌।
 क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान
 भगवान कहते है अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान।
हे अर्जुन! जितना भी स्थावर और जंगम सत्त्व, अर्थात् जीवों की विविधता उत्पन्न होती है, वह सब क्षेत्र (पृथ्वी) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के संयोग से उत्पन्न होती है। इसका तात्पर्य यह है कि सभी जीव और उनके विभिन्न रूप, चाहे वे स्थावर हों (जैसे पेड़-पौधे) या जंगम (जैसे मनुष्य और पशु), ये सभी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के मिलन से उत्पन्न होते हैं।
यह श्लोक प्रकृति और आत्मा के बीच के संबंध को स्पष्ट करता है। 'क्षेत्र' अर्थात् शरीर या भौतिक जगत और 'क्षेत्रज्ञ' अर्थात् आत्मा या चेतना, दोनों का संगम ही जीवन और सत्त्व के सभी रूपों का निर्माण करता है।

टिप्पणी:

यह श्लोक हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि जीवों की उत्पत्ति और उनके विविध रूप एक गहन आध्यात्मिक सत्य के परिणाम हैं, जहां भौतिक तत्व (क्षेत्र) और आध्यात्मिक तत्व (क्षेत्रज्ञ) का मिलन जीवन का आधार है। यह जीवन की प्रकृति को समझने में सहायक है और हमें यह भी बताता है कि सभी जीवों का अस्तित्व और उनके स्वरूप इन दोनों के संयोजन से है।
13॥26॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 27

श्लोक:
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌।
 विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥

भावार्थ:
जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है वही यथार्थ देखता है
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने हमें यह सिखाया है कि वास्तविक दृष्टि किसे कहा जा सकता है। यहाँ पर भगवान परमेश्वर की पहचान और उनका स्वरूप समझाने की कोशिश तो  की ही जा रही है।
राम राम करो या मरा मरा कैसे भी करो उसमें अहंकार नहीं होना चाहिए क्यों कि पिछले शुभ कर्मों के अनुसार ही मनुष्य योनि मुक्ति के अधिकारी के लिए ही मिलती है।हम सभी मोक्ष के अधिकारी ही है।जिस में  गिरने की सारी संभावना काम,मोह,लोभ,क्रोध, में ना के बराबर पर अहंकार ही सब से बड़ा कारण है ,जिस की उत्पति भी काम,मोह,लोभ,पूरा ना हो पाने पर क्रोध के रूप में फिर प्राप्त होने पर अहंकार में बदल जाती है।
इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने हमें यह ज्ञान दिया है कि सच्ची दृष्टि वही है जो सभी प्राणियों में एक समान परमेश्वर को देखे और यह समझे कि वह नाशरहित और स्थिर हैं।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि बाहरी रूप-रंग और भौतिक बदलावों से परे, परमेश्वर का वास्तविक स्वरूप नाशरहित और अनन्त है। यही सच्ची दृष्टि है।
13॥27॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 28

श्लोक:
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌।
 न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌॥

भावार्थ:
क्योंकि जो पुरुष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है
 13॥28॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 29

श्लोक:
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
 यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥

भावार्थ:
और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है
 अर्थात: भला,बुरा,मान,अपमान आदि जो जीव का हो रहा है उसका कारण वह नहीं वह तो भगवान की लीला है जो इस जीव के साथ हो रही है।
प्रकृति और कर्म: श्लोक के पहले भाग में कहा गया है कि सभी कर्म प्रकृति (प्राकृतिक तत्व) द्वारा किए जाते हैं। यहाँ 'प्रकृति' का मतलब(माया) उन अंतर्निहित गुणों (सत्व, रजस, तमस) से है जिनके आधार पर संसार में सभी कार्य होते हैं। इन गुणों की प्रेरणा से ही सब कुछ होता है, और इस प्रकार हम अपने कर्मों को प्रकृति के माध्यम से देखते हैं।
आत्मा का वास्तविक स्वरूप: श्लोक के दूसरे भाग में कहा गया है कि जो व्यक्ति इन कर्मों को देखने के बावजूद आत्मा को अकर्ता (निर्माता नहीं) के रूप में देखता है, वही वास्तव में समझदार है। इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा (अहम्) स्वयं कर्म नहीं करता है, बल्कि वह केवल दृष्टा(दर्शक भर)  है।
यथार्थ देखने की प्रक्रिया: जब व्यक्ति यह समझ जाता है कि कर्म करने वाला वास्तव में प्रकृति है और आत्मा अकर्ता है, तो वह वास्तविकता को समझ पाता है। यथार्थ देखने का मतलब है कि व्यक्ति ने इस सच्चाई को जान लिया है कि आत्मा कर्मों का कर्ता नहीं है, बल्कि सभी कर्म प्रकृति के नियमों के अनुसार होते हैं।
तब उसे अपने भला,बुरा,मान,अपमान से कोई लगाव नहीं होता परंतु अगर कोई जो वास्तव में उस का अपना भगवान है को कोई बुरा,भला,कह अपमानित करे तो वह बर्दास्त नहीं करता और उस पर ज्ञान रूपी खंडे की धार को तेज कर प्रहार जरूर करता है क्यों कि यही "धर्मयुद्ध" है।

सारांश: 

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि कर्मों का संचालन प्रकृति द्वारा होता है और आत्मा इन कर्मों से अप्रभावित रहती है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझता है, वही सच्चे अर्थ में यथार्थ को देखता है और ज्ञान प्राप्त करता है।
13॥29॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 30

श्लोक:
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
 तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥

भावार्थ:
जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है अर्थात परम पिता ब्रह्म (भगवान)का हो जाता है।

भूतपृथग्भाव: इसका तात्पर्य है भूतों (प्राणियों) की विविधता और पृथक अस्तित्व। इस संसार में विभिन्न जीव और पदार्थ हैं जो अलग-अलग रूपों में दिखते हैं।
एकस्थमनुपश्यति: जब कोई व्यक्ति इन विविधताओं को देखता है और समझता है कि यह सभी एक ही परमात्मा की अभिव्यक्तियाँ हैं, तब वह एकता की दृष्टि को प्राप्त करता है। और भाईचारे को समझने लगता है। जो तुम्हारे मंदिर तोड़े नुकसान पहुंचाए अपमानित करे तो क्या वो भाईचारा बनाने को योग्य है या नहीं जान लेता है।
तत एव च विस्तारं: यहाँ पर विस्तार से तात्पर्य है कि जिस समय यह व्यक्ति सभी भूतों को एक ही ब्रह्मा (परमात्मा) से संबंधित देखता है, वह वास्तव में ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है। जब ब्रह्म के अपमान के विरोध में होता है तब भी उसी ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है।
ब्रह्म सम्पद्यते: यह स्थिति ब्रह्म की प्राप्ति का संकेत है। जब व्यक्ति अपनी चेतना को इस ब्रह्मा के साथ जोड़ लेता है, तब वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्मा की अनुभूति करता है।
इस श्लोक के माध्यम से, भगवान कृष्ण हमें यह सिखाते हैं कि आध्यात्मिक ज्ञान का वास्तविकता तब प्राप्त होती है जब हम भूतों(भूत,भविष्य,वर्तमान) की विविधता को एक परमात्मा के विस्तार के रूप में देखते हैं, और तब इसी से ब्रह्म की वास्तविकता का अनुभव होता है।
 13॥30॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 31

श्लोक:
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
 शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है
 
व्याख्या:

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि परमात्मा, जो अनादि (निरंतर) और निर्गुण (गुणों से रहित) है, वह अविनाशी है। इसका मतलब है कि परमात्मा के पास किसी भी प्रकार की उत्पत्ति, परिवर्तन या विनाश नहीं है।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि परमात्मा शरीर में निवास करते हुए भी वह न तो कुछ करता है और न ही किसी चीज से प्रभावित होता है। यहाँ 'न करोति' का अर्थ है कि परमात्मा किसी भी प्रकार की गतिविधि में भाग नहीं लेते, जबकि 'न लिप्यते' का मतलब है कि वह किसी भी अनुभव या क्रिया से प्रभावित नहीं होते।

इस प्रकार, परमात्मा की प्रकृति ऐसी है कि वह शरीर के भौतिक कार्यों और गुणों से परे है। वह सर्वत्र विद्यमान होते हुए भी इन भौतिक क्रियाओं से अलग रहते हैं। यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि सच्ची आत्मा और परमात्मा की पहचान भौतिकता से परे है और यह ब्रह्मा की सर्वोच्च स्थिति को भी दर्शाता है।इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह भी स्पष्ट करते हैं कि जीवन की वास्तविकता को समझने के लिए हमें अपने मन और आत्मा की पहचान करनी चाहिए, न कि केवल भौतिक वस्तुओं और क्रियाओं को ही वास्तविकता मानना चाहिए।
13॥31॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 32

श्लोक:
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
 सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥

भावार्थ:
जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता
 
व्याख्या:

इस श्लोक में श्री कृष्ण आत्मा की प्रकृति को स्पष्ट कर रहे हैं। श्लोक के दो मुख्य बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है:

आकाश और आत्मा की तुलना: आकाश का गुण यह है कि वह सूक्ष्म और सर्वव्यापी होता है। इसलिए, आकाश का किसी भी वस्तु से संपर्क नहीं होता; वह न तो छूता है और न ही प्रभावित होता है। इसी प्रकार, आत्मा भी सभी स्थानों पर व्याप्त है लेकिन उस पर भी शरीर के गुणों का कोई असर नहीं होता।

आत्मा का निर्गुण स्वरूप: जैसा कि आकाश किसी वस्तु के गुणों को नहीं अपनाता, आत्मा भी देह के गुणों और परिवर्तनों से प्रभावित नहीं होती। आत्मा का स्वभाव निर्गुण (गुण रहित) होता है, जो उसे देह के अनुभवों और गुणों से उस को मुक्त करता है।
जैसे ,बचपन,जवानी और बुढ़ापा आने पर शरीर बदलता है पर आत्मा वही की वही होती है।पर स्वभाव को बदलना या ना बदलना मनुष्य के अपने हाथ में है।

इस प्रकार, इस श्लोक में आत्मा की शुद्धता और अपरिवर्तनीयता को दर्शाया गया है, जो शरीर के भौतिक गुणों से परे रहती है। आत्मा का यह स्वभाव उसे शाश्वत और अविनाशी बनाता है, जबकि शरीर समय के साथ बदलता और समाप्त होता है।
13॥32॥
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 33

श्लोक:
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
 क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है
 "यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः": इस भाग में भगवान श्रीकृष्ण यह संकेत कर रहे हैं कि सूर्य (रवि) एक ही प्रकाश के माध्यम से पूरे ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है। सूर्य का प्रकाश सम्पूर्ण आकाश और पृथ्वी को एक समान तरीके से रोशन करता है, जिससे हर कोना उजागर हो जाता है।ऐसा ज्ञान से ही संभव है नहीं तो सूर्य उदय और अस्त होता रहता है।

ज्ञान का प्रकाश कम नहीं होता अज्ञान में कोई यात्रा भी पूर्ण नहीं हो पाती।

"क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत": इसी प्रकार, एक ही आत्मा (क्षेत्री) सम्पूर्ण शरीर (क्षेत्र) को प्रकट करता है। आत्मा, जो कि हमारे भीतर का प्रकाश है, शरीर की सम्पूर्ण गतिविधियों और अनुभवों को रोशन रता है। यह आत्मा ही है जो सभी संवेदनाओं, विचारों और अनुभवों को स्पष्टता प्रदान करती है।

आत्मा का प्रकाश ज्ञान है। रात में जब चारो ओर अंधकार होता है तो एक कदम भी आगे बढ़ पाना संभव नहीं होता यदि हाथ में टॉर्च हो तो चाहे कितना भी यात्रा करले कोई फर्क नहीं पड़ता।इसी प्रकार आत्मा का छोटा सा ज्ञान भी व्यक्ति का सब से बड़ा आध्यात्मिक सहारा बन भव सागर से पार ले जाने में सक्षम है।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह दर्शाना चाहते हैं कि आत्मा, जैसा कि सूर्य का प्रकाश सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करता है, वैसे ही आत्मा सम्पूर्ण शरीर और उसके अनुभवों को प्रकट और स्पष्ट करता है। आत्मा और शरीर के इस संबंध को समझना हमें जीवन की सच्चाई और आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।

13॥33॥

भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 34

श्लोक:
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
 भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्‌॥

भावार्थ:
इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को (क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही 'उनके भेद को जानना' है) तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्व से जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं
 इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को (क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही 'उनके भेद को जानना' है) तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्व से जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं

व्याख्या:

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा": इस भाग में भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के बीच के भेद को समझना महत्वपूर्ण है। क्षेत्र (शरीर) जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान है, जबकि क्षेत्रज्ञ (आत्मा) नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी है। ज्ञान की दृष्टि से इस भेद को पहचानना और समझना 'ज्ञानचक्षुषा' या ज्ञान के दृष्टिकोण से किया जाता है।

अर्थात:

ज्ञानचक्षुषा एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है "ज्ञान की आँखें"। यह शब्द भगवान कृष्ण द्वारा गीता में प्रयोग किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ज्ञानचक्षुषा से ही हमें सच्चाई की दृष्टि मिलती है।

ज्ञानचक्षुषा का भाव यह है कि जब हमारी आँखें ज्ञान से भर जाती हैं, तो हमें सच्चाई की दृष्टि मिलती है। हमें यह समझ में आती है कि क्या सही है और क्या गलत है, और हम अपने जीवन में सही निर्णय ले सकते हैं।

ज्ञानचक्षुषा के माध्यम से हमें यह भी समझ में आती है कि हमारा असली स्वरूप क्या है, और हमारा जीवन किस उद्देश्य से है। यह हमें अपने जीवन में एक नई दृष्टि और एक नई दिशा प्रदान करता है।
"भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्": जो लोग इस भेद को जानने के साथ-साथ कार्यशील प्रकृति से मुक्ति को भी समझते हैं, वे वास्तव में परम ब्रह्म (परमात्मा) को प्राप्त होते हैं। यहाँ 'भूतप्रकृति' से मुक्ति का तात्पर्य है कि व्यक्ति प्राकृतिक गुणों और विकारों से पार हो जाता है और सच्चे ज्ञान को प्राप्त करता है।

इस श्लोक का सार यह है कि जो व्यक्ति आत्मा और शरीर के बीच के भेद को ज्ञान की दृष्टि से समझते हैं और इस समझ के आधार पर कार्यशील प्रकृति से मुक्त होते हैं, वे वास्तव में ब्रह्म (ईश्वर) को प्राप्त कर लेते हैं। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आत्मज्ञान और प्रकृति से मुक्ति के माध्यम से ही हम परम सत्य और ब्रह्म के साक्षात्कार की ओर बढ़ सकते हैं।

13॥34॥ 
 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः
 अध्याय॥13॥ समाप्त

सोमवार, 9 दिसंबर 2024

गीता अध्याय 12

*📚भगवद गीता अध्याय12📚*

*🌹❖════❃≛⃝❈⬤🪷
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 12: भक्ति योग

अध्याय 12 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को भक्ति योग की महिमा बताते हैं। यह अध्याय भक्त और परमात्मा के संबंध, भक्ति के प्रकार, और सच्चे भक्त के गुणों का वर्णन करता है।

मुख्य विषय:

1. साकार और निराकार उपासना का तुलनात्मक वर्णन:
अर्जुन पूछते हैं कि भगवान की साकार उपासना श्रेष्ठ है या निराकार? श्रीकृष्ण बताते हैं कि दोनों मार्ग श्रेष्ठ हैं, लेकिन साकार उपासना सरल और भक्तिपूर्ण जीवन जीने के लिए अधिक अनुकूल है।

2. भक्ति मार्ग की महिमा:
भगवान कहते हैं कि जो भक्त निस्वार्थ भाव से केवल ईश्वर को प्रेम और श्रद्धा से पूजता है, वह शीघ्र ही मुझे प्राप्त करता है।

3. सच्चे भक्त के गुण:
श्रीकृष्ण ने 36 गुणों का वर्णन किया है जो एक सच्चे भक्त में होते हैं, जैसे अहिंसक, दया भाव रखने वाला, शत्रुता रहित, स्थिर चित्त, मितभाषी, संतुष्ट और क्षमाशील होना।
✍️36 गुणों का विस्तृत विचार:

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 12 में श्रीकृष्ण ने सच्चे भक्त के 36 गुणों का उल्लेख किया है। यह गुण एक भक्त के शुद्ध चरित्र और भक्ति की गहराई को दर्शाते हैं। विस्तार से:

1. अद्वेष्टा (शत्रुता रहित):

भक्त किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति प्रेमभाव रखता है।

2. मैत्र (मित्रता):

सबके प्रति मित्रवत व्यवहार करता है।

3. करुण (दयालु):

दूसरों के दुख को समझता है और उनकी सहायता के लिए तत्पर रहता है।

4. निर्मम (ममता रहित):

सांसारिक चीज़ों से मोह नहीं करता।

5. निर्मान (अहंकार रहित):

स्वयं को बड़ा समझने की भावना से मुक्त होता है।

6. संतोषी (संतुष्ट):

जो कुछ भी प्राप्त होता है, उसमें संतुष्ट रहता है।

7. युक्त आत्मा:

मन और आत्मा को नियंत्रित रखता है।

8. दृढ़निश्चयी:

अपने मार्ग पर दृढ़ता से चलता है।

9. मयि अर्पितमनोबुद्धि:

अपना मन और बुद्धि भगवान में लगाता है।

10. असक्त:

किसी भी सांसारिक वस्तु या संबंध के प्रति आसक्ति नहीं रखता।

11. अनपेक्ष:

अपेक्षाओं से मुक्त रहता है।

12. शुचि (पवित्र):

अंतःकरण और आचरण से पवित्र होता है।

13. दक्ष:

सभी कार्यों में कुशल और योग्य होता है।

14. उदासीन:

सुख-दुख, लाभ-हानि से प्रभावित नहीं होता।

15. गृहत्यागी (सर्वारंभ परित्यागी):

सभी प्रकार की इच्छाओं और आरंभों का त्याग करता है।

16. हर्ष-शोक रहित:

खुशी और दुख के समय समान भाव रखता है।

17. क्षमी (क्षमाशील):

अपमान और कष्ट सहन करता है।

18. सुख-दुख समः:

सुख और दुख में समता बनाए रखता है।

19. नवद्यति:

किसी कार्य में दोष नहीं निकालता।

20. सर्वभूतहितरतः:

सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।

21. आत्माराम:

आंतरिक शांति में संतुष्ट रहता है।

22. विगत स्पृह:

इच्छाओं से मुक्त रहता है।

23. योगी:

योग साधना में रत रहता है।

24. निर्मल:

मनोमालिन्य से रहित होता है।

25. सर्वत्र समदर्शी:

सभी को समान दृष्टि से देखता है।

26. तुल्य निंदा-स्तुति:

निंदा और स्तुति में समान रहता है।

27. मौन:

अनावश्यक बोलने से बचता है।

28. संतोषी:

जैसा भी है, उसमें संतुष्ट रहता है।

29. अप्रमतः:

चेतन और सजग रहता है।

30. भयमुक्त:

डर और संदेह से परे रहता है।

31. सदाचारी:

सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है।

32. ईश्वरनिष्ठ:

सदैव ईश्वर की शरण में रहता है।

33. निश्चल प्रेम:

ईश्वर के प्रति अनवरत प्रेम रखता है।

34. द्वेष रहित:

सभी से द्वेष और ईर्ष्या से मुक्त रहता है।

35. सद्गुणी:

सभी श्रेष्ठ गुणों से युक्त होता है।

36. अनन्य भक्त:

अखंड और विशुद्ध भक्ति करता है।

निष्कर्ष:

ये गुण सच्चे भक्त की परिभाषा हैं। इनका अनुसरण करने से व्यक्ति भक्ति और मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है।

भक्ति के स्तर:

श्रीकृष्ण ने भक्ति के विभिन्न स्तर सुझाए हैं:

1. यदि ध्यान और पूजा संभव हो, तो उसे करना चाहिए।

2. यदि ऐसा न हो सके, तो कर्मयोग द्वारा प्रभु को समर्पित भाव से सेवा करनी चाहिए।

3. यदि यह भी कठिन हो, तो स्वयं को प्रभु पर छोड़ देना चाहिए।

सार:

भक्ति योग, प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का मार्ग है। भगवान के प्रति अडिग विश्वास रखने वाले व्यक्ति में दैवीय गुण स्वतः विकसित होते हैं। यह अध्याय हमें सिखाता है कि भक्ति और समर्पण के मार्ग से परमात्मा की कृपा कैसे प्राप्त की जा सकती है।चलिए गीता में देखते हैं।
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भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 1

श्लोक:
(साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय और भगवत्प्राप्ति के उपाय का विषय) 
 अर्जुन उवाच
 एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
 ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं- उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
 12॥1॥

आते ही अर्जुन ने दो प्रकार के भक्तों का उल्लेख किया है:
यह दो प्रकार के भगत कौन से हैं देखते चलें?

1. देवताओं की पूजा करने वाले भक्त
2. अक्षर ब्रह्म (परमात्मा) की पूजा करने वाले भक्त

अब आगे अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि इन दो प्रकार के भक्तों में  अधिक श्रेष्ठ कौन है। स्पष्ट है कि हम भी तो जानना चाहते है कि भगवत ज्ञान का सर्व श्रेष्ठ मार्ग क्या है?

जो भगवान से अर्जुन ने सिखा क्या भगवान के अर्जुन को बताए उस मार्ग को अनुसरण कर हम अपना कल्याण नहीं कर सकते? इतनी सी बात सीखने को क्या किसी गुरु या शिक्षक की कोई आवश्यकता है? नहीं ना अपना भला बुरा हम खुद ही जान सकते हैं बिना गुरु अपनी इंद्रियों की और बुद्धि की शक्ति द्वारा।जब कोई व्यक्ति अपना बुरा हो नहीं सोच सकता। तो है भी क्यों सोचेंगे? हम भी श्रेष्ठ को चुन उस श्रेष्ठ का ही अनुसरण करेंगे।

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 2

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
 मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
 श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए (अर्थात गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में लिखे हुए प्रकार से निरन्तर मेरे में लगे हुए) जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं
 मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए अर्थात गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में लिखे को देख कर आगे बढ़ते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 55

श्लोक:
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः।
 निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।
अब संपूर्ण गीताशास्त्र का सारभूत अर्थ कल्याण संक्षेप में कर्तव्यरूपसे बताया जाता है --, जो मुझे भगवान के लिए कर्म करने वाला है और मेरा ही परायण है -- सेवक स्वामी के लिए कर्म करता है लेकिन शेष प्राप्तयोग्य अपनी परमगति उसे प्रमाणित नहीं करता और यह तो मेरे लिए ही कर्म करने वाला है, और मुझे ही अपनी परमगति समझ वाला होता है? इस प्रकार परमगति मैं ही हूं ऐसा जो मत्परायण है। तथापि मेरा एक ही भक्त है अर्थात जो सबसे प्रकार की सभी इंद्रियों से परिपूर्ण उत्साह रखता है वह मेरा ही भजन है? ऐसा मेरा भक्त है। तथा जो धन, पूत, मित्र, स्त्री और बंधुवर्गमें सङ्ग--प्रीति--प्रेमसेअनुपयोगी है। तथा सभी भूतों में वैरभाव से अनुपयोगी है अर्थात अपना अत्यंत अनिष्ट करने की चेष्टा करने वालों में भी जो शत्रुभाव से अनुपयोगी है। ऐसा जो मेरा भक्त है।हे पाण्डव वह मुझे ही पाता है अर्थात् मैं ही उसकी परमगति हूँ। ओर क्या चाहिए?
(तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा पर मैने देखा है लोग मंदिर में अपना धूप ना ले जाकर वही पहले से पड़े धूप को जला कर भी पूजा कर लेते है और तेरा तुझ को अर्पण पूरा कर देते हैं। इसे ऐसा समझते हुए बुद्धि से निर्णय गलत सही का भी तो हमें ही करना है अगर कुछ नहीं ला सके तो प्रणाम तो कर ही सकते थे कि नहीं?)भगवान कहते है उसकी दूसरी कोई गति कभी नहीं होती। यह मैंने तेरे दर्शन के लिए इष्ट उपदेश दिया है।
11 ॥55॥ 
जिन लोगों ने अपने मन को पूर्ण रूप से मेरे में समर्पित कर दिया है।जो लोग नियमित रूप से मेरी उपासना और भक्ति करते हैं। वे मेरे अनुसार सबसे उन्नत और उत्कृष्ट भक्त माने जाते हैं।इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण भक्ति के उच्चतम स्तर की व्याख्या करते हैं और बताते हैं कि एक सच्चा भक्त वह है जो मन, श्रद्धा और निरंतरता के साथ भगवान की उपासना करता है।
12॥2॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 3-4

श्लोक:
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
 सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌॥
 सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
 ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥

भावार्थ:
परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं
 12॥3-4॥
श्लोक
ये त्वक्षरं निर्देशितमव्यक्तं प्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।12.3।।
इस श्लोक का भावार्थ यह है:

जो लोग अव्यक्त (निराकार) और अक्षर (अविनाशी) परमात्मा की उपासना करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है, जो कूटस्थ (स्थिर) और अचल (अप्राप्य) है, और जो ध्रुव (स्थिर) है, वे भी मेरी पूजा करते हैं।

आगे इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग निराकार परमात्मा की उपासना करते हैं, वे भी उनकी पूजा करते हैं। यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण निराकार परमात्मा के गुणों का वर्णन कर रहे हैं, जैसे कि सर्वत्र व्याप्त, अकल्पनीय, स्थिर, अचल और ध्रुव।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र संबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।12.4।।

इस श्लोक का भावार्थ यह हैकि:

जो लोग अपने इन्द्रियों को वश में करके और सर्वत्र बुद्धि को व्याप्त करके, सबके हित में रत होकर, मेरी पूजा करते हैं, वे मुझे ही प्राप्त करते हैं।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग अपने इन्द्रियों को वश में करके और सर्वत्र बुद्धि को व्याप्त करके, सबके हित में रत होकर, उनकी पूजा करते हैं, वे उनके साथ एकता प्राप्त करते हैं। यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि उनकी पूजा करने के लिए अपने इन्द्रियों को वश में करना और सर्वत्र बुद्धि को व्याप्त करना अति आवश्यक है।

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 5

श्लोक:
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌।
 अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥

भावार्थ:
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है
 12॥5॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्तियोग की कठिनाई और उसके लाभ के बारे में बात कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो लोग अनिश्चित और अव्यक्त (अस्पष्ट) ब्रह्म को ध्यान में रखकर भक्ति करते हैं, उनके लिए यह मार्ग अधिक कठिन होता है। यहाँ पर 'अव्यक्ता' से तात्पर्य है कि निराकार, अदृश्य और अपार ब्रह्म को पकड़ना और समझना बहुत ही कठिन है।

इस कठिनाई के कारण, जो भक्त ऐसे ब्रह्म को ध्यान में रखते हैं, उनके लिए भक्ति का मार्ग बहुत ही क्लेशपूर्ण और दुःखदाई हो सकता है। यह कठिनाई इसलिए होती है क्योंकि उनके मन की चंचलता और शरीर की इंद्रियों की सीमाएँ इस ब्रह्म के अनन्त और अदृश्य स्वरूप को स्वीकार करने में ही बाधा डालती हैं।इस से यह भी स्पष्ट होता है कि जब भक्ति का मार्ग स्पष्ट और साकार रूप में हो, जैसे कि भगवान की एक निश्चित पूजा या उनकी लीलाओं का ध्यान, तो यह कठिनाई कम हो जाती है।
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि निराकार ब्रह्म की भक्ति कठिन हो सकती है, और इसके लिए विशेष प्रयास और काफी धैर्य की आवश्यकता होती है।

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 6

श्लोक:
0 ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः।
 अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥

भावार्थ:
परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। (इस श्लोक का विशेष भाव जानने के लिए गीता अध्याय 11 श्लोक 55 देखना चाहिए)
 12॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 55

श्लोक:
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः।
 निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है
 11॥55॥ 
तब और क्या चाहिए?

विचार की बात यह है कि निराकार रूप कष्ट कारक और सुगम मार्ग बिना कष्ट प्राप्त होता है सही मार्ग हो सकता है पर दोनों का लक्ष तो परमात्मा की प्राप्ति ही है।तो निराकार साकार रूप के द्वारा मनुष्य को भटकाना भर तो नहीं?

जिस का सही ज्ञान मार्ग कलयुग में गुरु ग्रंथ साहिब ने समझा है और समझाया है कि निराकार रूप में साकार क्या है?

✍️गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना को बहुत महत्व दिया गया है। गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि अकाल पुरख एक निराकार और सर्वशक्तिमान ईश्वर है, जो सभी जीवों में व्याप्त है।

गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना को निम्नलिखित तरीकों से समझाया गया है:

1. नाम सिमरन: गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि अकाल पुरख का नाम सिमरन करना सबसे महत्वपूर्ण उपासना है। नाम सिमरन से जीव को अकाल पुरख के साथ जुड़ने का अवसर मिलता है।
2. सेवा और सिमरन: गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि अकाल पुरख की सेवा करना और उनका सिमरन करना दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। सेवा से जीव को अकाल पुरख के प्रति समर्पण का अवसर मिलता है, जबकि सिमरन से जीव को अकाल पुरख के साथ जुड़ने का अवसर मिलता है।

3. गुरु की शरण: गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि अकाल पुरख की उपासना करने के लिए गुरु की शरण में जाना आवश्यक है। गुरु जीव को अकाल पुरख के बारे में समझाता है और जीव को अकाल पुरख की उपासना करने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है।

गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना को निराकार और साकार दोनों रूपों में समझाया गया है। गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि अकाल पुरख एक निराकार ईश्वर है, लेकिन वह साकार रूप में भी प्रकट हो सकता है।

इस प्रकार, गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना को एक समग्र और व्यापक दृष्टिकोण से समझाया गया है, जिसमें निराकार और साकार दोनों रूपों को शामिल किया गया है।
🪯जैसे कि गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है:

"एक ओंकार सतनामु कर्ता पुरखु निरभऊ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि।"

इसका अर्थ है कि एक ओंकार, सतनाम, कर्ता, पुरख, निरभऊ, निरवैर, अकाल, मूरति, अजूनी, सैभं, गुरु प्रसादि।

इस श्लोक में अकाल पुरख के गुणों का वर्णन किया गया है, जैसे कि वह निराकार है, निरभऊ है, निरवैर है, अकाल है, मूरति है, अजूनी है, और सैभं है।

इस प्रकार, गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना को एक समग्र और व्यापक दृष्टिकोण से समझाया गया है, जिसमें निराकार और साकार दोनों रूपों को शामिल किया गया है।
गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख के साकार रूप का वर्णन भी किया गया है। इसमें कहा गया है कि अकाल पुरख ने स्वयं को साकार रूप में प्रकट किया है, जिसे गुरु रूप में जाना जाता है।

गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है:

"गुरु नानक देव जी ने कहा है कि अकाल पुरख ने स्वयं को गुरु रूप में प्रकट किया है, जो साकार रूप में है।"

इस प्रकार, गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख के साकार रूप का वर्णन किया गया है, जिसे गुरु रूप में जाना जाता है।

"आज्ञा भई सब सीखन को हुक्म है गुरु मानो ग्रंथ" का भावार्थ सिख धर्म के मुख्य सिद्धांत पर आधारित है। इसमें सिखों को आदेश दिया गया है कि वे गुरु ग्रंथ साहिब को ही अपना गुरु मानें।

विस्तार:

1. गुरु ग्रंथ साहिब की महिमा: यह वचन सिख धर्म के अंतिम गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने दिया। उन्होंने सिख समुदाय को आदेश दिया कि अब से कोई मानव गुरु नहीं होगा, और केवल गुरु ग्रंथ साहिब को ही मार्गदर्शक एवं आध्यात्मिक गुरु माना जाएगा।

2. सर्वज्ञान का स्रोत: गुरु ग्रंथ साहिब सिख धर्म की धार्मिक, आध्यात्मिक, और नैतिक शिक्षाओं का संग्रह है। इसे "जीवित गुरु" का दर्जा दिया गया है।

3. अनुभव और शिक्षाएं: यह आदेश सभी सिखों को समर्पण, विश्वास और समानता का पालन करने की प्रेरणा देता है।

इस प्रकार, यह वचन सिख धर्म के केंद्रीय सिद्धांत का प्रतीक है।

और निराकार में साकार के भी दर्शन करवाता है जिस से निराकार रूप की पूजा कर मोक्ष की कामना पूर्ण हो जाती है।

गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना के रूप में पांच ककार का महत्व बताया गया है जो साकार रूप ही है। पांच ककार हैं:

1. केश (केश धारण करना)
2. कंगा (कंगा धारण करना)
3. कच्छा (कच्छा धारण करना)
4. किरपान (किरपान धारण करना)
5. कड़ा (कड़ा धारण करना)

इन पांच ककारों को धारण करने से सिखों को अकाल पुरख की उपासना करने में मदद मिलती है और वे अपने जीवन में अधिक धार्मिक और नैतिक बनते हैं।

इस प्रकार, पांच ककार अकाल पुरख निराकार स्वरूप की उपासना के रूप में महत्वपूर्ण हैं और सिख धर्म में उनका विशेष स्थान भी है।
12॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 7

श्लोक:
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌।
 भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ
 12॥7॥
 जो लोग निराकार , साकार को मानने वाले अपने सभी कर्मों को मुझ से संबंधित मानते हुए मेरे प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण रखते हैं, और जो केवल मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं, वे मेरे लिए अनन्य भक्ति करते हैं। ये लोग योग के माध्यम से, अर्थात ध्यान और भक्ति के माध्यम से, मुझमें पूर्ण रूप से समर्पित रहते हैं और केवल मुझे ही अपना एकमात्र लक्ष्य मानते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 8

श्लोक:
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
 निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥

भावार्थ:
मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है
 12॥8॥
भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों को भक्तियोग की राह पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि आप अपने मन और बुद्धि को मुझमें पूर्ण रूप से समर्पित कर देंगे, तो आप मुझमें स्थिर हो जाएंगे। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, जब व्यक्ति अपने मन और बुद्धि को पूरी तरह से भगवान में लिप्त कर देता है, तो उसकी आत्मा भगवान के साथ विलीन हो जाती है और वह परम शांति की प्राप्ति करता है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि भगवान में पूरी तरह से समर्पित रहने से, हमारे भीतर शांति और सुख का आगमन होता है। इस प्रकार, जब हम भगवान की शरण में आत्म-समर्पण करते हैं और अपनी समस्त क्षमताओं को उन्हीं में समर्पित कर देते हैं, तो न केवल हमें आध्यात्मिक उन्नति मिलती है, बल्कि जीवन की हर कठिनाई से भी उबरने की क्षमता प्राप्त होती है।
संक्षेप में: भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में यह स्पष्ट किया है कि जब हम पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ अपने मन और बुद्धि को भगवान में लिप्त कर लेते हैं, तो हम उनकी कृपा प्राप्त करते हैं और हमारे जीवन का हर पहलू ऊर्ध्वगति की ओर अग्रसर होता है।
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 9

श्लोक:
अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्‌।
 अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय॥

भावार्थ:
यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम 'अभ्यास' है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि यदि तुम मेरी भक्ति में अपने चित्त को स्थिर करने में असमर्थ हो, तो तुम्हारे लिए एक और मार्ग है।
यदि तुम मेरे प्रति एकाग्रचित्त होकर ध्यान नहीं कर पाते, अर्थात् तुम्हारा मन मेरी भक्ति में स्थिर नहीं हो पाता है, तो कोई बात नहीं। इसका मतलब है कि यदि भक्ति में ध्यान की स्थिरता प्राप्त करना तुम्हारे लिए कठिन है या असंभव लगता है।तब तुम्हें अभ्यास के माध्यम से, अर्थात् नियमित साधना और प्रयत्न के द्वारा मुझ तक पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए। भगवान कृष्ण अर्जुन को सुझाव दे रहे हैं कि यदि ध्यान के माध्यम से स्थिरता प्राप्त नहीं हो पा रही है, तो निरंतर अभ्यास और साधना द्वारा भी वह भगवान तक पहुँच सकते हैं।इस श्लोक में भगवान कृष्ण यह सिखाते हैं कि भक्ति का मार्ग केवल एक ही नहीं है। यदि किसी को ध्यान में स्थिरता प्राप्त करना कठिन लगे, तो भी निरंतर प्रयास और अभ्यास के माध्यम से भगवान की प्राप्ति संभव है। यह दर्शाता है कि भगवान की भक्ति में विविध मार्ग और साधन हो सकते हैं, और हर व्यक्ति की स्थिति और क्षमता के अनुसार मार्ग अपनाया जा सकता है।

अभ्यास:

जैसे हम अपनी  किसी पाठ्य पुस्तक के किसी पाठ का अध्ययन करते है तो उसके अंत में अभ्यास का उल्लेख आता है जिस में कुछ प्रश्न पूछे जाते हैं।जिनका उत्तर उसी पाठ में होता है। यदि हमें समझ नहीं आता तो हम उसे उसी पाठ में पुनः खोजते है तो हमें प्राप्त हो जाता है।
यही नियम धार्मिक पवित्र पुस्तकों पर भी तो लागू है इनको पड़ते समय कापी पेंसिल,pen (लेखनी) को पास रखे जो समझ नहीं आ रहा उसको लिख लें क्या समझ नहीं आया ।पाठ पूरा होने पर उसी पाठ में पुनः खोजें तो प्रश्न का उत्तर मिल जाता है।पर अभ्यास करना जरूरी होता है।
गुरु ग्रंथ साहिब में एक प्रसिद्ध शब्द है:

"आपे गुरु आपे चेला, आपे ही दातारु।"

इसका भावार्थ है:

"आप ही गुरु हैं, आप ही चेला हैं, और आप ही दातारु (देने वाला) हैं।"

इस शब्द में गुरु नानक देव जी ने बताया है कि अकाल पुरख एक ही है, जो गुरु, चेला, और दातारु सभी रूपों में प्रकट होता है। यह शब्द अकाल पुरख की एकता और सर्वशक्तिमानता को दर्शाता है।
गुरु ग्रंथ साहिब में "आपे गुरु आपे चेला आपे ही दातारु" शब्द के तीन मुख्य पहलू हैं:

1. गुरु (आपे गुरु):
गुरु का अर्थ है आध्यात्मिक मार्गदर्शक या शिक्षक। अकाल पुरख स्वयं ही गुरु है, जो जीवों को आध्यात्मिक ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करता है। गुरु के रूप में, अकाल पुरख जीवों को अपने असली स्वरूप को समझने और आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है।

2. चेला (आपे चेला):
चेला का अर्थ है शिष्य या अनुयायी। अकाल पुरख स्वयं ही चेला है, जो अपने स्वयं के गुणों और स्वभाव को समझने के लिए प्रयासरत है। चेला के रूप में, अकाल पुरख जीवों को अपने स्वयं के गुणों और स्वभाव को समझने के लिए प्रेरित करता है।

3. दातारू (आपे ही दातारु):
दातारू का अर्थ है देने वाला या प्रदाता। अकाल पुरख स्वयं ही दातारू है, जो जीवों को सभी प्रकार की सामग्री और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है। दातारू के रूप में, अकाल पुरख जीवों को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रेरित करता है और उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करता है।
12॥9॥

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 10

श्लोक:
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
 मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि॥

भावार्थ:
यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण (स्वार्थ को त्यागकर तथा परमेश्वर को ही परम आश्रय और परम गति समझकर, निष्काम प्रेमभाव से सती-शिरोमणि, पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और शरीर द्वारा परमेश्वर के ही लिए यज्ञ, दान और तपादि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों के करने का नाम 'भगवदर्थ कर्म करने के परायण होना' है) हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा
 यह श्लोक भक्ति और कर्म के संबंध को स्पष्ट करता है। भगवान श्रीकृष्ण यह कह रहे हैं कि यदि कोई व्यक्ति भक्तियोग के लिए पूरी तरह समर्थ नहीं भी है, तो भी यदि वह मेरे लिए समर्पित होकर कर्म करता है, तो उसे पवित्रता और आत्मसिद्धि प्राप्त होगी। इस प्रकार, भक्ति और समर्पण के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को साध सकता है और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है।इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया है कि भक्ति का मार्ग सिर्फ साधना या नियमित अभ्यास तक ही सीमित नहीं है। बल्कि, भगवान के लिए किए गए कर्म भी उस व्यक्ति को उच्चतम उद्देश्य की ओर ले जाते हैं। यही इस श्लोक का प्रमुख संदेश है कि भक्ति और कर्म की सही दिशा में किया गया प्रयास भी फलदायी होता है।
 12॥10॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 11

श्लोक:
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
 सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌॥

भावार्थ:
यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में विस्तार देखना चाहिए) 
चलो पहले गीता के अध्याय 9 के श्लोक 27 में देखते है।
भगवद  गीता अध्याय: 9

भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 27

श्लोक:

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्‌।

 यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्‌॥

भावार्थ:

हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर
भगवान का यह नियम है कि जो मेरी शरण लेता है, मैं उसी प्रकार उसे शरण देता हूँ । जो भक्त अपनी वस्तु मुझे अर्पण करता है, मैं उसे अपनी वस्तु देता हूं। भक्त तो सीमित ही वस्तु देता है, पर मैं अनंत गुणा करके देता हूं। परन्तु जो अपना- तुम्हें ही मुझे देता है, मैं तुम्हें ही उसे देता हूं। वास्तव में मैंने अपने- तुम्हें संसारमात्रको दे रखा है , और सब कुछ करनेकी स्वतन्त्रता दे रखा है। यदि मनुष्य अपनी दी हुई स्वतन्त्रता को मेरा अर्पण कर देता है, तो मैं भी अपनी स्वतन्त्रता को उसका अर्पण कर देता हूँ। इसलिए यहां भगवान स्वतन्त्रताको अपने अर्पण करने के लिए अर्जुनसे कहते हैं।
इस का प्रत्यक्ष ज्ञान है कि किसान एक बीज बोता है भगवान उस एक को कई गुना बड़ा कर देते है।

अब इस पदके में संपूर्ण शारीरिक क्रियाएं भी ली जाती हैं अर्थात शरीरके लिए तू जो भोजन करता है, जल पीता है, कुपथ्य त्याग और पथ्य सेवन करता है, ओष-सेवन करता है, कपड़ा पहनना है, सर्दी-गर्मीसे शरीर की रक्षा करना है, स्वास्थ्य के लिए समय-सोता और जागता है, घूमना-फिरना है, शौच-स्नान करना है, आदि सभी कामो को मेरा अर्पण करना है फिर कर दें ना।

इसी प्रकार यज्ञ-संबन्धी सभी क्रियाएं होती हैं अर्थात् शाकल्य-सामग्री एकत्र करना, अग्नि समर्पण करना, मन्त्र समर्पण करना, आहुति देना आदि सभी शास्त्रीय क्रियाएं मेरे अर्पण कर दे।

अब तू जो कुछ देता है अर्थात् दस्तावेज़ी सेवाएँ करता है, अध्ययन की सहायता करता है, अध्ययन की आवश्यकता-विशेषता करता है, आदि जो कुछ शास्त्रीय क्रिया करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।

तू जो कुछ तप करता है विषय-वस्तु से अपनी इन्द्रियोंका संयम करता है, अपनी कर्तव्या पालना करता है अनुपयुक्त-प्रतिकूल वैज्ञानिकों को सिद्धांतों का पालन करना और तीर्थ, व्रत, भजन-ध्यान, जप-कीर्तन, श्रवण-मनन, समाधि आदि जो कुछ भी पारमार्थिक क्रिया करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे। 
उच्च तीर्थ पद शास्त्रीय और पारमार्थिक कार्यका दूसरा विभाग है।
इसका सरल भाव है कि
हे भगवान! मैं अपने सभी कार्यों को आपको अर्पण करता हूं। जब मैं ऐसा करता हूं, तो मेरा 'मैं' और 'मेरा'पन समाप्त हो जाता है, और मुझे पूर्णता की प्राप्ति होती है। यह पूर्णता ऐसी है कि जिसमें कोई दुःख नहीं होता है, और जिसमें स्थित होने पर कोई भी दुःख मुझे प्रभावित नहीं कर सकता है।"

इस श्लोक में भगवान को अर्पण करने के महत्व को बताया गया है, और यह भी बताया गया है कि जब हम अपने कार्यों को भगवान को अर्पण करते हैं, तो हमें पूर्णता की प्राप्ति होती है।

चलो सांसारिक बंधन से मुक्ति का सरल उपाय है। प्रभु बच्चे को सद्बुद्धि दो की इस कठिन उपाय को करने पर आने वाली सभी अड़चनों को भी आप में अर्पण कर निश्चिंत हो कर बाकी जीवन जिए।

✍️सभी प्रकार के कर्म करते हुए हम ईश्वरप्रणय की भावना से रह सकते हैं। संपूर्ण गीता में इस पर बल दिया गया है कि केवल शारीरिक कर्म की आवश्यकता ईश्वर दर्पण की भावना है और यह एक ऐसा तथ्य है। जिसका अभ्यासे को विस्मरण हो जाता है।शरीर, मन,  बुद्धि के स्तर पर होने वाले विषय ग्रहण और उनकी प्रति हमारी प्रतिक्रिया के रूप में भी व्यवसाय हैं? 

उन सबको भक्ति से वंचित करें मुझे अर्पण करे। यह किसी भी प्रकार से मनुष्य के लिए पालन-पोषण करना बहुत कठिन है। एक ही आत्मा ,ईश्वर, गुरु ,और भक्त में और सर्वत्र राम रहते हुए हम अपने व्यावहारिक जीवन में सामान्य नाम और सिद्धांत के साथ व्यवहार करते हैं। हम जानते हैं कि इन लोगों के लिए आत्मसत्ता की आवश्यकता होती है। यदि हम अपने समग्र व्यवहार में इस आत्मतत्व का स्मरण रखते हैं तो वह जगत् के अधिष्ठान का ही स्मरण होगा। यदि किसी वस्त्र की दुकान में विभिन्न रूप  रंग हो।किसे सदा इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि वह समुद्र तट के सूती वस्त्रों का व्यापार कर रहे हैं। किसी भी तरह से व्यापार को समझना मुश्किल नहीं होगा। में देखा गया तो इस का स्मरण रखें कि उसके लिए अधिक सुरक्षित और प्रकार के फायदे हैं अन्यथा वह किसी कप की कीमत ऊनी प्रतिबंध के खाते से बहुत अधिक बता देता है या अपने माल को टाट के बोरे जैसे कि बहुमत में बेच देता है। यदि किसी स्वर्णकार को यह स्मरण-गृह की सलाह दी जाए कि वह सोने पर काम कर रहा है तो वह सलाह देता है कि उसके लाभ के लिए ही हैं। जैसे गहनों में सोने और कपडे में सूत हैं वैसे ही विश्व के सभी नाम और सिद्धांतों में आत्मा ही मूल तत्व हैं। जो भक्त अपने जीवन के सर्वांगीण व्यवहार में इस दिव्य तत्त्व का स्मरण रखता है वही पुरुष जीवन को आदर और सम्मान दे सकता है जो योग्य जीवन हैं। यह नियम है कि जीवन को जो तुम दोगे, तुम्हें जीवन से  वही पाओ गे। तुम हँसोगे तो जीवन हँसोगे और तुम खिलोगे तो जीवन भी खिलेगा उसके पास आत्मज्ञान से उत्पन्न आदर और सम्मान के साथ तो जीवन रक्षा में भी आदर और सम्मान प्राप्त होगा।समर्पण की भावना से सभी कर्मों को करने पर न केवल भगवान के प्रति हमारा प्रेम बढ़ता है। बल्कि आदर्श जीवन और दिव्य लक्ष्य के कारण हमारा भी जीवन पवित्र बन जाता है। गीता में अद्वितीय भाव और सतत आत्मानुसंधान पर विशेष बल दिया गया है। इस श्लोक में हम देख सकते हैं कि एक ऐसे उपाय का वर्णन किया गया है जिसके उपदेश से ही साधक को ईश्वर का अखंड स्मरण बना रहता है। इसके लिए जहां कहीं भी निर्जन सोसायटी वन या गुप्त गुफाओं में इसे रखने की आवश्यकता नहीं है तो हम अपने दैनिक कार्य क्षेत्र में ही कर सकते हैं। इस प्रकार का संकेत भावना का जीवन जीने से  लाभ जो अब कार्य कर रहे हैं लाभ हो या हानि मैनेजर बने भगवान ही जाने सारी टेंशन यह की।
9॥27॥
 12॥11॥से आगे
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 12

श्लोक:
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते।
 ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌॥

भावार्थ:
मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग (केवल भगवदर्थ कर्म करने वाले पुरुष का भगवान में प्रेम और श्रद्धा तथा भगवान का चिन्तन भी बना रहता है, इसलिए ध्यान से 'कर्मफल का त्याग' श्रेष्ठ कहा है) श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है
 इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने भक्ति और ध्यान के विभिन्न प्रकारों की तुलना की है। यहाँ पर ज्ञानयोग, ध्यानयोग, और कर्मफल त्याग की महत्वपूर्णता का वर्णन किया गया है।
ध्यान की साधना करने से कर्मफल का त्याग होता है। अर्थात् ध्यान करने वाले व्यक्ति को अपने कर्मों के परिणामों को त्यागने में सहायता मिलती है, जिससे शांति और संतोष की प्राप्ति होती है। त्याग का अर्थ है कि व्यक्ति अपने कर्मों के परिणामों से बंधा नहीं रहता, जिससे वह शांति और स्थिरता अनुभव करता है।
यह श्लोक हमें बताता है कि ज्ञान और ध्यान की साधना के माध्यम से कर्मों के परिणामों को त्यागकर शांति प्राप्त की जा सकती है। ज्ञान की साधना श्रेष्ठ है, और ध्यान द्वारा कर्मफल का त्याग करना अधिक प्रभावी है, जिससे अंततः शांति की प्राप्ति होती है।
अर्थात:
यहाँ क्रमवार विस्तार से समझाया गया है:

1. अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है:
अभ्यास का अर्थ है प्रयोग और अनुभव। जब हम किसी विषय का अध्ययन करते हैं और उसका प्रयोग करते हैं, तो हमें उस विषय का ज्ञान प्राप्त होता है। अभ्यास से ज्ञान प्राप्त करना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे हमें अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने में मदद मिलती है।

2. ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है:
जब हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो हमें परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान करने की प्रेरणा मिलती है। परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान करने से हमें अपने जीवन में शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है। यह ध्यान हमें अपने जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।

3. ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग:
जब हम परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान करते हैं, तो हमें अपने कर्मों के फल का त्याग करने की प्रेरणा मिलती है। कर्मों के फल का त्याग करने से हमें अपने जीवन में मुक्ति और शांति प्राप्त होती है। यह त्याग हमें अपने जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।
✍️ना दान से ,ना जप से, ना तप से, ना ध्यान से।मुक्ति मिलती है तो सिर्फ :"ज्ञान" से।
12॥12॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 13-14

श्लोक:
(भगवत्‌-प्राप्त पुरुषों के लक्षण) 
 अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
 निर्ममो निरहङ्‍कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
 संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः।
 मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥

भावार्थ:
जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है- वह मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है
 
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः कुरुण एव च।

निर्ममो निर्हङकारः समदुःखसुखः क्षमि।।12.13।।
इसलीए प्रेमी ने सभी का त्याग कर दिया है ऐसे अक्षरोपासक यथार्थ ज्ञाननिष्ठा संतोंका जो साक्षात् मोक्षका कारणरूप अद्वैष्ठा सर्वभूतानाम् एक ही धर्म का समूह है उसका वर्णन स्टॉक भंडार इस उद्देश्य से भगवान कहते हैं--, जो सभी भूतों में द्वेषभाव से अनुपयोगी है अर्थात अपने दुःख देने वाले भी किसी जीव से द्वेष नहीं करते संपूर्ण भूतोंको आत्मारूपसे ही दृष्टिगोचर होता है। तथा जो मित्रता से युक्त है अर्थात् व्यक्तिगत साथ मित्र भावसे बढ़ता है और करुणामय है। दिनदुखियोंपर दया करना करुणा है वह युक्त है अभिप्राय यह है कि जो सब भूतोंको अभय देनेवाला संत है। तथा जो अनैतिक से अनुपयोगी और अनुपयुक्त है एवं सुखदुःख में सम है अर्थात जिनके सुख और दुख अंतःकरण में रागद्वेष उत्पन्न नहीं हो सकता। जो क्षमावान है अर्थात किसी के द्वारा गाली दी जाने पर या पीटे जानेपर भी जो विकार रहित ही रहता है।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।
जो सदा ही सन्तुष्ट है अर्थात देहके स्थिति कारणरूपदुग्धकी लाभ हानि जिसमें जो कुछ होता है वही ठीक है ऐसा आलम भाव हो गया है इस प्रकार जो गुण युक्त वस्तु के लाभ में और उसका नुकसान में सदा ही सन्तुष्ट रहता है। तथा जो सम्मिलितचित्त जीव बने स्वभाववाला और दृढ़ निश्चय वाला है अर्थात् आत्मतत्त्वके विषय में जिसका निश्चय स्थिर हो गया है। तथा जो मुझे अर्पण किये हुए मनबुद्धिवाला है अर्थात जिस संतिका संकल्प विकल्प वास्तविक मन और स्थिरात्मिका बुद्धि ये दोनों मुझमें समर्पित हैं--स्थापित हैं। जो ऐसा मेरा भक्त है वो मेरा प्यारा है। ज्ञानीको मैं अत्यंत प्रिय हूं और वह मुझे प्रिय है, इस प्रकार जो सप्तम अध्याय में बताया गया है उसका यहां विस्तार से वर्णन किया गया है।

अध्याय 7 में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों के गुणों का वर्णन किया है और बताया है कि कैसे वे अपने जीवन में भगवान की भक्ति को महत्व दे सकते हैं।

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि उनके भक्तों को निम्नलिखित गुणों का पालन करना चाहिए:

- मुझमें विश्वास रखना और मेरी शरण में आना
- मेरी भक्ति करना और मेरे नाम का जाप करना
- मेरी पूजा करना और मुझे अर्पण करना
- मेरे गुणों का चिंतन करना और मेरी महिमा का गान करना
- मेरी शरण में आने वाले सभी जीवों को समान रूप से देखना और उनके प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखना

इसके अलावा, भगवान श्रीकृष्ण ने इस अध्याय में बताया है कि उनके भक्तों को कैसे अपने जीवन में भगवान की भक्ति को महत्व देना चाहिए और कैसे वे अपने जीवन में भगवान की कृपा को प्राप्त कर सकते हैं।
॥13-14॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 15

श्लोक:
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
 हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥

भावार्थ:
जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (दूसरे की उन्नति को देखकर संताप होने का नाम 'अमर्ष' है), भय और उद्वेगादि से रहित है वह भक्त मुझको प्रिय है
 12॥15॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों की एक विशेषता का वर्णन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों की क्रियाओं से प्रभावित नहीं होता और न ही दूसरों के द्वारा उत्पन्न कष्टों से परेशान होता है, वह भक्त भगवान को अत्यंत प्रिय होता है।इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति स्वयं को लोगों के कार्यों से विचलित नहीं होने देता, जो दूसरों के व्यवहार या घटनाओं से उत्तेजित नहीं होता।इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति दूसरों को उसके अपने कार्यों या व्यवहार से परेशान नहीं करता, यानी जो नकारात्मक प्रभाव दूसरों पर नहीं डालता।हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः" - इसका मतलब है कि जो व्यक्ति खुशी, क्रोध, भय या किसी भी प्रकार की भावनात्मक उथल-पुथल से मुक्त होता है। वह मानसिक रूप से शांत और संतुलित रहता है।
"स च मे प्रियः" - इसका अर्थ है कि ऐसा व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है।
इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह संकेत दे रहे हैं कि एक सच्चा भक्त वह होता है, जो आत्मिक शांति और संतुलन बनाए रखता है, और जो अपने आंतरिक और बाहरी वातावरण को संतुलित बनाए रखता है। ऐसा व्यक्ति भगवान के लिए विशेष रूप से प्रिय होता है, क्योंकि वह अनुकूल और सकारात्मक दृष्टिकोण से जीवन जीता है।
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 15
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 15 से आगे इसी अध्याय के श्लोक नंबर 16 की ओर बढ़ते है।
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 16

श्लोक:
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
 सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥

भावार्थ:
जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए) चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है- वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है
 चलो अब पहले गीता अध्याय 13 श्लोक 7 पर छलांग लगाते हैं ।
मूल श्लोकः
इच्छा द्वेषः सुखं दुखं संघातश्चेतनाधृतिः।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।13.7।।
इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात, आत्मशक्ति और धृति--इसमें पोषक तत्वसंहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया है।

अब जिन इच्छा आदिको वैशेशिकमतावलंबी आत्माके धर्म मानते हैं वे भी क्षेत्रके ही धर्म हैं आत्माके नहीं यह बात भगवान कहते हैं --, इच्छा -- जिस प्रकारके सुखदायक विषयका पहले उपभोग किया गया था फिर वैसा ही पदार्थ के होने पर प्राप्त होने वाला सुखका कारण समझकर मनुष्य उसे लेना चाहता है वह चाहत है नाम की चाहत वह अन्तःकरण का धर्म है और ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र है। तथा द्वितीय--जिस प्रकार के पदार्थको दुःखका कारण समझकर पहले अनुभव हुआ हो फिर एक ही जाति के पदार्थ के प्राप्त होने पर कौन सा मनुष्य द्वेष करता है उस भावका नाम क्या है वह भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। वही प्रकार सुख कौन सा उपयुक्त आशारूप और सात्विक है ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र ही है तथा विपरीतरूप दुःख भी ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र ही है। देह और इंद्रियोंका समूह संघ के सदस्य हैं। प्रकाशित हुई जो अन्तःकरणकी वृत्ति है जो अग्निसे कलश लोहपिण्डकी भाँति आत्मचैतन्यके आभासरूपसे व्याप्त है वह स्वयं भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। व्याकुल हुए शरीर और इन्द्रियादि किस आधार पर मिलते हैं? वह धृति भी ज्ञेय होने से ही क्षेत्र है। अंतःकरण के लिए समस्त धर्मों का संकेत करने के लिए यहां इच्छादि धर्मों का ग्रहण किया गया है। कौन सा कुछ कहा गया है उनके उपसंहार हैं--महत्तत्त्वदि अलवरसे सम्मिलित क्षेत्रका इसका स्वरूप संक्षेपसे कहा गया है। अर्थात् जिन समस्त क्षेत्रभेदोंका समूह में यह शरीर क्षेत्र ऐसा कहा गया है महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त भेदोंसे अलग-अलग उस क्षेत्र की व्याख्या कर दी गई। जो आगे कहे जानेवाले विशेष क्षेत्र से सम्बंधित है? जिस क्षेत्रज्ञ को प्रभावयुक्त जन लेने से (मनुष्य) अमृतरूप हो जाता है? भगवान स्वयं वाम आश्रम ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि, अन्य वचनों से विशेषों सहित।

संक्षेप में ऐसे समझें:

इस श्लोक का भावार्थ और व्याख्या निम्नलिखित है:

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने 
क्षेत्र (शरीर) 
क्षेत्रज्ञ (आत्मा) इन दोनों के बीच के संबंध को समझाने के लिए एक विस्तृत व्याख्या दी है।

श्लोक का पहला भाग कहता है:

इच्छा द्वेषः सुखं दुखं संघातश्चेतनाधृतिः

इसका अर्थ है:

इच्छा (कामना),
 द्वेष (घृणा), 
सुख (आनंद), 
दुख (पीड़ा), संघात (शरीर के अवयवों का संयोजन),
  चेतनाधृति (जीवन शक्ति) 
ये सभी क्षेत्र (शरीर) के गुण हैं।

श्लोक का दूसरा भाग कहता है:

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्

इसका अर्थ है:

यह क्षेत्र (शरीर) समग्र रूप से विकारों से युक्त है, जैसा कि ऊपर वर्णित है।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने 
क्षेत्र (शरीर) के गुणों और विकारों का वर्णन किया है, जो क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के साथ जुड़े हुए हैं। यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच का संबंध कैसे काम करता है।

जिनमें इनके गुण अवगुण है।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के गुण और अवगुण भगवद गीता में वर्णित हैं। यहाँ उनका विवरण दिया गया है:

क्षेत्र (शरीर) के गुण:

1. इच्छा (कामना)
2. द्वेष (घृणा)
3. सुख (आनंद)
4. दुख (पीड़ा)
5. संघात (शरीर के अवयवों का संयोजन)
6. चेतनाधृति (जीवन शक्ति)
7. विकार (दोष)
8. अविद्या (अज्ञानता)

क्षेत्र (शरीर) के अवगुण:

1. मोह (माया का प्रभाव)
2. अज्ञानता (अविद्या)
3. द्वेष (घृणा)
4. क्रोध (क्रोध)
5. लोभ (लालच)
6. मादकता (नशा)
7. अहंकार (अहंकार)

क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के गुण:

1. ज्ञान (ज्ञान)
2. विज्ञान (विशेष ज्ञान)
3. असंगता (माया से अलगाव)
4. शुद्धता (पवित्रता)
5. निर्लेपता (माया से अलगाव)
6. निर्विकारिता (विकारों से मुक्ति)
7. निराकारिता (आकार से मुक्ति)

क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के अवगुण:

क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के अवगुण नहीं होते हैं, क्योंकि वह माया से अलग और विकारों से मुक्त होता है।

12॥16॥

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 17

श्लोक:
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति।
 शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥

भावार्थ:
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है।

व्याख्या:
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में उन भक्तों की विशेषताएँ बताते हैं, जो सच्चे भक्त होते हैं। वे भक्त कौन होते हैं, जो भगवान के अनुसार प्रिय होते हैं, यह श्लोक उसकी व्याख्या करता है

"यो न हृष्यति" – ऐसा भक्त जो खुशी और उत्तेजना के बाहरी प्रभाव से प्रभावित नहीं होता। वह आत्म-संतोषी रहता है और सुख-स्वाद का अनुभव बिना किसी अशांति या अतिरेक के करता है।

"न द्वेष्टि" – ऐसा भक्त जो नफरत और द्वेष से दूर रहता है। किसी से द्वेष रखने की बजाय, वह सबको समान दृष्टि से देखता है और हर स्थिति को सकारात्मक तरीके से लेता है।

"न शोचति" – ऐसा भक्त जो शोक और चिंता से मुक्त रहता है। वह जीवन की कठिनाइयों और समस्याओं को धैर्य और शांति के साथ स्वीकार करता है।

"न काङ्क्षति" – ऐसा भक्त जो किसी भी प्रकार की आकांक्षा या इच्छाओं के पीछे नहीं दौड़ता। उसकी इच्छाएँ केवल ईश्वर की भक्ति और सेवा में सीमित होती हैं, न कि भौतिक लाभ में।
 
"श्रुभाश्रुभपरित्यागी" – ऐसा भक्त जो सुख और दुःख दोनों को समान रूप से देखता है। वह सुख और दुःख के भेद को समझता है और दोनों के प्रति एक जैसा दृष्टिकोण रखता है।

इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, वह भक्त जो इन गुणों को अपनाता है और सच्चे प्रेम और भक्ति से भगवान की सेवा करता है, वह भगवान के लिए अत्यंत प्रिय होता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि भक्ति में सच्ची साधना और निरपेक्षता के बिना कोई भी व्यक्ति ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति नहीं कर सकता।

✍️मुख्य विकार चार हैं --
 (1) राग,
 (2) द्वेष, 
(3) हर्ष 
(4) शोक 
 सिद्ध भक्तों में ये चारों ओर कोई विकार नहीं होता। उनका यह अनुभव होता है कि संसार का प्रतिक्षण वियोग हो रहा है और भगवान से कभी वियोग होता ही नहीं। इसी लिए वह अविनाश कहे जाते हैं 
दुनिया के साथ कभी संयोग नहीं था,ना है , आगे रहेगा भी नहीं और रह भी नहीं सकता। 
वस्तुतः संसार की कोई, स्वतन्त्र सत्ता तो है ही नहीं 

इस वास्तविकता का अनुभव कर लेने के बाद (जायदाद का कोई सम्बन्ध नही रहता है) भक्त का केवल भगवान के साथ अपने नित्यसिद्ध सम्बन्ध का अनुभव कर अटलरूपसे रहता है। इस कारण उनका अंतःकरण राग-द्वेषादि क्रोध से सर्वथा मुक्त होता है। भगवान् का साक्षात्कार होने पर ये विकार सर्वथा मिट जाते हैं।
साधन-विज्ञान में भी साधक ज्यों-ज्यों साधन आगे बढ़ते हैं, त्यों-ही-त्यों में राग-द्वेषादि कम होते चले जाते हैं। जो कम होने वाला होता है,वास्तव में वह मिटने वाला भी होता है। मूलतः जब साधनकुशलता में ही विकार कम होते हैं, तब सहजता  से ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सिद्धावस्थामें भक्तमें ये विकार नहीं रहता, पूर्णतया मिट जाता है।
  
हर्ष और शोक:
 
दोनों राग-द्वेषके ही परिणाम हैं। जो प्रति राग होता है, उसका संयोग जिससे और प्रति द्वेष से होती है, उसका वियोगसे 'हर्ष' होता है। इसके विपरीत प्रति राग होता है, उसके वियोग या वियोगकी अश्क से और जिसके प्रति द्वेष होता है, उसके संयोग या संयोग से अश्क से 'शोक' होता है। सिद्ध भक्त में राग-द्वेष्का अत्यंतभाव होने से स्वतः एक साम्य सिद्धांत रहता है। इस लिए वह घटकों से सर्वथा अनुपयोगी होता है।
 जैसे रात के समय अंधकार में दीपक जलने की चाहत होती है; दीपक जलाने से हर्ष होता है, दीपक बर्तनवाले के प्रति द्वेष या क्रोध होता है और दीपक कैसे जले -- ऐसी चिंता होती है। रात होने से ये चारों बातें होती हैं। लेकिन मध्याह्नका सूर्य तपता हो तो दीपक जलाए जाने की इच्छा नहीं होती, दीपक जलाने से हर्ष नहीं होता, दीपक सितारे के प्रति द्वेष या क्रोध नहीं होता और (अंधेरा न होने से) प्रकाश के अभाव की चिंता भी नहीं होती। इसी प्रकार भगवान से विमुख और संसार के सम्मुख होने से शरीर निर्वाह और सुखके लिए उपयुक्त पदार्थ, परिस्थिति आदि के मिलनकी इच्छा होती है, इनमें से प्रत्येक मिलन पर हर्ष होता है; प्रामाणिक में बाधा व्यक्तित्ववालेके प्रति द्वेष या क्रोध होता है; और इनसे न मुलाकात पर 'कैसे मिलें' ऐसी चिंता होती है। परंतु (मध्याह्नके सूर्य की तरह) भगवत्प्राप्ति हो गई है, इसमें ये विकार कभी नहीं रहते। वह पूरा काम हो जाता है। मूलतः तब दुनिया की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती।
भक्ति, अकर्म और फलेच्छा से अनुपयुक्त ही शुभ कर्म करने के कारण भक्त के कर्म 'अकर्म' हो जाते हैं।
 इसलिए भक्त को शुभ कर्मों वाला भी कहा गया है। राग-द्वेष सर्वथा अभाव होने के कारण अशुभ कर्म होते ही नहीं। अशुभ कर्मों में इच्छा, मैत्री, भक्ति ही प्रमुख कारण होती है, और भक्त होने में इस की सर्वथा कमी होती है। इस लिए अशुभ कर्मों का भी उल्लेख किया गया है। भक्त शुभ-कर्मों से तो राग नहीं करता और अशुभ-कर्मोंसे द्वेष नहीं करता। वह स्वभावतः शास्त्रविहित शुभ कर्मों का आचरण और अशुभ (निषिद्ध एवं काम्य) कर्मों का त्यागी होता है, राग-द्वेष अंधकार नहीं। राग-द्वेषका सर्वथा त्याग करने वाला ही सच्चा त्यागी है।
 मनुष्य को कर्म नहीं छोड़ते, प्रत्युत् कर्मों में राग-द्वेष ही छोड़ते हैं। भक्त के संपूर्ण कर्म राग-द्वेषरहित होते हैं, इसलिए वह शुभाशुभ संपूर्ण कर्मों का परित्यागी है।

(अब आगे के दो श्लोकों में सिद्ध भक्त के दसवें दशक वाला पंचवाँ और अंतिम प्रसंग कहा गया है।)
12॥17॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 18

श्लोक:
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
 शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्‍गविवर्जितः॥

भावार्थ:
जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है
 जो शत्रु और मित्र में सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दु:ख में सम है एवं आस्तिकसे अयोग्य है, और जो निन्दास्तुतिको समान बुद्धिवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकार भी (शरीरका)। निर्वासन (निर्वासन) में (निवास में) निवास स्थान और शरीर में ममता-आसक्तिसे अनुपयोगी और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान मनुष्य मुझे प्रिय है।
12॥18॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 19

श्लोक:
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्‌।
 अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥

भावार्थ:
जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है
 
जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है।
श्री कृष्ण बताते हैं कि एक भक्त जो निंदा और स्तुति दोनों को समान रूप से स्वीकार करता है, मौन रहने वाला, संतुष्ट रहने वाला, और जो स्थिर मति (धारणा) वाला होता है, वह भगवान को प्रिय होता है। इस श्लोक का आशय यह है कि ऐसा व्यक्ति जो अपने मन और शरीर को हर परिस्थिति में स्थिर रखता है, चाहे उसे निंदा मिले या प्रशंसा, और जो किसी भी बाहरी प्रभाव से प्रभावित नहीं होता, वह सच्चे भक्त का आदर्श है। ऐसे व्यक्ति को भगवान अत्यंत प्रिय मानते हैं।
सार: 
ये दोनों ही श्लोक भक्तियोग के गहरे और महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सच्चा भक्त वह है जो सभी परिस्थितियों में संतुलित रहता है, मान और अपमान, सुख और दुःख में समान दृष्टिकोण रखता है। ऐसे भक्त की मानसिक स्थिरता और अपरिग्रह उसे भगवान के निकट ले जाते हैं।
12॥19॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 20

श्लोक:
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
 श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥

भावार्थ:
परन्तु जो श्रद्धायुक्त (वेद, शास्त्र, महात्मा और गुरुजनों के तथा परमेश्वर के वचनों में प्रत्यक्ष के सदृश विश्वास का नाम 'श्रद्धा' है) पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं।
 
हिंदू धर्म ही नहीं सभी धर्मो का मुख्य उद्देश्य आत्मसाक्षात्कार करना है, जिससे हम अपने जीवन को सही दिशा में आगे बढ़ा सकें। इसके लिए हमें अपने व्यक्तित्व के सभी पहलुओं - शारीरिक, मानसिक और विरासत - को समझना और उन्हें अपने जीवन में लागू करना होगा।

केवल शास्त्रों का अध्ययन करना या उनका पाठ करना पर्याप्त नहीं है। हमें अपने जीवन में शास्त्रीय ज्ञान को प्रमाणित करना होगा और स्वयं को पूर्ण पुरुष बनाना होगा।

भगवान कहते हैं कि इसके लिए हमें श्रद्धावान होना चाहिए, जिसका अर्थ है स्वयं के अनुभव के द्वारा शास्त्र प्रतिपादित आत्मज्ञान को सिद्ध करने की क्षमता। ऐसे भक्त भगवान को अतिशय प्रिय हैं।

यह भाव हमें अपने जीवन में आत्मसाक्षात्कार के महत्व को समझने और शास्त्रीय ज्ञान को प्रमाणित करने के लिए प्रेरित करता है।

निष्कर्ष: इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि भगवान को वही भक्त प्रिय हैं, जो पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी बताई हुई शिक्षाओं का पालन करते हैं और अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य भगवान की भक्ति को मानते हैं।
12॥20॥ 
 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः
 ॥12॥

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...