सोमवार, 2 दिसंबर 2024

अध्याय 10



अध्याय 10 गीता का सरल उद्देश्य यह है:

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी विभूतियों (विशेष शक्तियों और गुणों) के बारे में बताते हैं, जो कि उन्हें परमेश्वर के रूप में प्रकट करती हैं। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि वे स्वयं ही इस सृष्टि के रचयिता, पालक और संहारक हैं, और वे ही सभी जीवों में व्याप्त हैं।

इस अध्याय के मुख्य बिंदु हैं:

- भगवान श्रीकृष्ण की विभूतियों का वर्णन
- भगवान श्रीकृष्ण की सर्वशक्तिमानता और सर्वव्यापकता का प्रदर्शन
- अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण की महिमा को समझने के लिए प्रेरित करना

इस अध्याय का उद्देश्य अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण की महिमा को समझने और उनकी भक्ति में प्रेरित करने के लिए है।

परंतु जब हम इस का अध्ययन करते है तो हमें क्या प्राप्त होता है?
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जानने को आरंभ करते है।भगवद  गीता अध्याय: 10
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भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 1

श्लोक:
( भगवान की विभूति और योगशक्ति का कथन तथा उनके जानने का फल) 
 श्रीभगवानुवाच
 भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः।
 यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥

भावार्थ:
श्री भगवान्‌ बोले- हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन, जिसे मैं तुझे अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए हित की इच्छा से कहूँगा
 10॥1॥
प्रथम अध्याय के अनिश्चय की स्थिति को देखते हुए अर्जुन ने अब तक एक अतुलनीय अंतरिक्ष सन्तुलन प्राप्त कर लिया है। 
हिंदू दर्शन के चमत्कार का अध्ययन कैसे किया गया? 
कौन सा आन्तरिक शांति प्राप्त होती है? 
भगवान इस अध्याय के सारथी में ही उनके शिष्य अर्जुन को प्रियमान स्पष्ट करते हैं। प्रियामान का अर्थ है जो प्रिय हो। यहां अर्जुन के उपदेश का कारण भगवान के उपदेश का श्रवण है। शिष्यों के उत्साह एवं रुचिपूर्ण श्रवण से गुरु का उत्साह भी द्विगुणित हो जाता है। वेदांत दर्शन के गूढ़ अभिप्रायों को आन्तरिक हुए शांति पर अधिकाधिक स्पर्श और संतोष का अनुभव बिना नहीं रह सकता। गीताचार्य श्रीकृष्ण पुनरुद्धार से इस ज्ञान का विस्तार से वर्णन करते हैं। पुन: तुम मेरे परम वचनों को सुनो? 
जो मैं तेरे हित की इच्छा से कहूँगा।यहाँ अर्जुन को महाबाहो का अभिषेक किया गया है। यह सम्बोधन अर्जुन को इस बात का स्मरण कराता है कि अपने अन्तरिक्ष जीवन में भी एक वीर साहसी पुरुष के समान प्राप्त परिस्थिति में से एक दिव्य आनन्द के राज्य का निर्माण करना चाहिए?
 यह स्पष्ट है कि भगवान का उपदेश किसी भी लौकिक विषय पर है, मनुष्य में ही निहित आध्यात्मिक श्रेष्ठता की दुर्लभताओं और उन्हें उजागर करने के उपायों पर है क्योंकि यहाँ कहा गया है कि तुम मेरे परम वचनों को सुनो?
 जो मैं तुम्हारे (आध्यात्मिक) हित की इच्छा से प्रेरित करता हूं हूं। पुन: प्रवचन करने का प्रस्ताव क्या है? 
हिंदू दर्शन में चमत्कार का अध्ययन करने के लिए, हमें पहले यह समझना होगा कि हिंदू दर्शन में चमत्कार की अवधारणा क्या है?

हिंदू दर्शन में चमत्कार को "चमत्कार" या "आश्चर्य" कहा जाता है। यह एक ऐसी घटना है जो हमारी सामान्य समझ और अनुभव से परे होती है। चमत्कार को अक्सर ईश्वर की शक्ति और कृपा के प्रमाण के रूप में देखा जाता है।

अब, आइए देखें कि हिंदू दर्शन में चमत्कार का अध्ययन कैसे किया गया है:

1. *वेदों और उपनिषदों में चमत्कार का वर्णन*: 

वेदों और उपनिषदों में चमत्कार के कई उदाहरण मिलते हैं। इन ग्रंथों में ईश्वर की शक्ति और कृपा के बारे में बताया गया है।
2. *पुराणों में चमत्कार का वर्णन*: 

पुराणों में भी चमत्कार के कई उदाहरण मिलते हैं। इन ग्रंथों में ईश्वर की शक्ति और कृपा के बारे में बताया गया है।
3. *चमत्कार का अध्ययन करने के लिए योग और ध्यान*: 

हिंदू दर्शन में चमत्कार का अध्ययन करने के लिए योग और ध्यान का अभ्यास किया जाता है। यह अभ्यास हमें ईश्वर की शक्ति और कृपा को समझने में मदद करता है।
4. *चमत्कार का अध्ययन करने के लिए गुरु की शिक्षा*: 

हिंदू दर्शन में चमत्कार का अध्ययन करने के लिए गुरु की शिक्षा का महत्व है।गुरु भी ग्रंथ,वेद,पुराण, शास्त्र ही तो है।

 जो गुरु हमें ईश्वर की शक्ति और कृपा को समझने में मदद करता है।वह भी तो यही ग्रंथ,वेद,पुराण, शास्त्र ही तो है।

अब, आइए देखें कि हिंदू दर्शन में चमत्कार का अध्ययन करने से कौन सी आन्तरिक शांति प्राप्त होती है:

1. *ईश्वर की शक्ति और कृपा की समझ*:

 हिंदू दर्शन में चमत्कार का अध्ययन करने से हमें ईश्वर की शक्ति और कृपा की समझ मिलती है। यह समझ हमें ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास की भावना को विकसित करने में मदद करती है।
2. *आन्तरिक शांति और संतुष्टि*: 

हिंदू दर्शन में चमत्कार का अध्ययन करने से हमें आन्तरिक शांति और संतुष्टि मिलती है। यह शांति और संतुष्टि हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद करती है।
3. *आत्म-ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार*: 

हिंदू दर्शन में चमत्कार का अध्ययन करने से हमें आत्म-ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति होती है। यह ज्ञान और साक्षात्कार हमें अपने जीवन के उद्देश्य और अर्थ को समझने में हमारे आंतरिक अनुभव से मदद करता है। जो हम सब की अलग अलग तो हो सकतीं है पर भाव एक ही होता है।
4. *जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता*:

 हिंदू दर्शन में चमत्कार का अध्ययन करने से हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता मिलती है। यह क्षमता भी सभी की अलग अलग होती है। जो हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद करती है और हमें जीवन की चुनौतियों से न जीवन की चुनौतियों से निपटने की क्षमता प्राप्त करने के बाद, हमें अपने जीवन की चुनौतियों से आगे बढ़ने की क्षमता भी मिलती है। यह क्षमता हमें जीवन की चुनौतियों को पार करने और अपने जीवन के उद्देश्य और अर्थ को प्राप्त करने में मदद करती है।

जीवन की चुनौतियों से आगे बढ़ने की क्षमता से हमें निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं:

1. _आत्म-विश्वास और आत्म-सम्मान_: 
जीवन की चुनौतियों से आगे बढ़ने की क्षमता से हमें आत्म-विश्वास और आत्म-सम्मान की भावना मिलती है।
2. _जीवन के उद्देश्य और अर्थ की प्राप्ति_: 
जीवन की चुनौतियों से आगे बढ़ने की क्षमता से हमें जीवन के उद्देश्य और अर्थ की प्राप्ति होती है।
3. _आन्तरिक शांति और संतुष्टि_: 
जीवन की चुनौतियों से आगे बढ़ने की क्षमता से हमें आन्तरिक शांति और संतुष्टि मिलती है।
4. _जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता_: 

जीवन की चुनौतियों से आगे बढ़ने की क्षमता से हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता मिलती है।

इस प्रकार, जीवन की चुनौतियों से आगे बढ़ने की क्षमता से हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं में सफलता और संतुष्टि मिलती है।

अब ये वे  कर्मचारी हैं--
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 2

श्लोक:
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
 अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥

भावार्थ:
मेरी उत्पत्ति को अर्थात्‌ लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ
 10॥2॥
जब कभी हम प्रत्यक्ष प्रमाण या अनुभव के द्वारा कोई ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाते? 

तब हम उसे उस विषय के बारे में वो लोग बताते हैं जिन पुरुषों हमारे द्वारा से पूछा जाता है। उन्हें आप्त पुरुष कहा जाता है।
(आप्त पुरुष एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है "विश्वसनीय व्यक्ति" या "ज्ञानी व्यक्ति"। यह शब्द आमतौर पर उन व्यक्तियों के लिए उपयोग किया जाता है जो ज्ञान, अनुभव और विश्वसनीयता के मामले में उच्च स्तर पर होते हैं।

आप्त पुरुष से जुड़े कुछ भाव हैं:

1. _विश्वसनीयता_: आप्त पुरुष विश्वसनीय और भरोसेमंद होते हैं।
2. _ज्ञान_: आप्त पुरुष ज्ञानी और अनुभवी होते हैं।
3. _आध्यात्मिक ज्ञान_: आप्त पुरुष आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-ज्ञान के मामले में उच्च स्तर पर होते हैं।
4. _मार्गदर्शन_: आप्त पुरुष मार्गदर्शन और सलाह देने में सक्षम होते हैं।
5. _आदर और सम्मान_: आप्त पुरुष को समाज में आदर और सम्मान मिलता है।

आप्त पुरुष की अवधारणा हिंदू धर्म और दर्शन में बहुत महत्वपूर्ण है, जहां ज्ञान और आध्यात्मिक विकास को बहुत महत्व दिया जाता है।)

 आंतरिक ब्रह्मविद्या के क्षेत्र में आत्मप्रशिक्षण की यह विधि कितनी कठिन है क्यों कि ऐसा भगवान कहते हैं कि मेरी उत्पत्ति को न देवतागण जानते हैं और न ही रहस्यजन।

बाद में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही स्पष्ट रहेंगे कि महर्षि शब्द से उनकी निश्चित अभिप्राय क्या है। ये महर्षिगण पुराणों में बताए गए भृगु आदि सप्त ऋषि नहीं हैं। सप्त ऋषियों का सैद्धान्तिक अर्थ निम्न प्रकार से है। जब अनन्तस्वरूप ब्रह्म केवल अलौकिक रूप से समष्टि बुद्धि (महत् तत्त्व) के साथ तादात्म्य प्राप्त होता है तो अपना एक व्यक्तित्व प्रकट (अहंकार) करता है। तब वह स्वयं ही स्वयं को। स्वयं के आनंद के लिए इस विषयगत जगत् में प्रक्षेपित कर जाता है या व्यक्त कर जाता है। वास्तव में ये भोग के विषय सूक्ष्मदर्शी होते हैं जिसमें तन्मात्रा भी कहा गया है। इन सार्वजनिक पुराणों में सप्त ऋषियों के भिन्न-भिन्न नाम भी बताये गये हैं, क्या वे सप्तर्षि महत् तत्त्व हैं? ह्यु और पंचतन्मात्राएँ। पुराणों में मानवीय रूप दिया गया है। संयुक्त रूप में ये सप्तर्षि मनुष्य के गुण और मानसिक जीवन के तथा सृष्टि के निमित्त और उपादान कारण के प्रतीक हैं।देव (सूर) शब्द का वाच्यार्थ स्वर्ग के निवासी का यहाँ अभिप्रेत नहीं है हालाँकि उसका अर्थ भी संभव है। देव शब्द द्यु धातु से बना है जिसका अर्थ प्रकाशित करना है।
 अत: हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ही वे देव हैं जो हमारे उपकरणों के लिए वस्तुओं को प्रकाशित किया करतीं हैं। इसलिए यह सुझाव है कि चिन्मय स्वरूप मैं सभी देवगणों और देवगणों का आदिकरण तो हैं। अर्थात् आत्मा हमारी स्थूल और सूक्ष्म शारीरिक एवं मानसिक जीवन का अधिष्ठान है। हालाँकि वे सत्य आत्मा में ही स्थित हैं। बुरा वे मेरे प्रभाव को नहीं जान सकते। चैतन्य आत्मा हमारे हृदय में दृष्टा के रूप में स्थित है। इंद्रियों का दृश्य विषय क्या है?
इंद्रियों का दृश्य विषय वह है जो हमारी इंद्रियों द्वारा अनुभव किया जाता है। यह विषय हमारी इंद्रियों के माध्यम से हमारे मन में आता है और हमारे ज्ञान और अनुभव को आकार देता है।

इंद्रियों के दृश्य विषय के उदाहरण हैं:

1. _रूप_: 
हमारी आंखों द्वारा देखा जाने वाला रूप।
2. _ध्वनि_: 
हमारे कानों द्वारा सुनी जाने वाली ध्वनि।
3. _गंध_: 
हमारी नाक द्वारा सूंघी जाने वाली गंध।
4. _स्वाद_: 
हमारी जीभ द्वारा चखा जाने वाला स्वाद।
5. _स्पर्श_: 
हमारी त्वचा द्वारा महसूस किया जाने वाला स्पर्श।

इन इंद्रियों के दृश्य विषयों के माध्यम से हम अपने आसपास की दुनिया को समझते हैं और अपने अनुभवों को आकार देते हैं।

जो मन की भावना या बुद्धि के ज्ञान का विषय कदापि नहीं बन सकता। तब क्या सत्य है कि संपूर्ण जगत के आधिपत्य में इस आत्मा का ज्ञान और अनुभव कोई भी नहीं हो सकता जैसे संकट को दूर करने के लिए भगवान कहते हैं--
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 3

श्लोक:
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌।
 असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

भावार्थ:
जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है
 10॥3॥

व्याख्या:

जो मुझे पता है वह केवल भावना के प्रवाह में या बुद्धि के विचारों से प्राप्त तो हो नहीं पता है।
की यही पूर्ण और वास्तविक आत्मानुभूति है? 
जो आत्मा के साथ मरा हुआ तादात्म्य जुड़ा हुआ के रूप में होता है। आत्मा को किसी दृश्य के समान नहीं होता 
जैसे"एकता" या "एकत्व"। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: "ताद" जिसका अर्थ है "उस" या "उसका", और "आत्म्य" जिसका अर्थ है "आत्मा" या "स्व"।

तादात्म्य का अर्थ है कि दो या दो से अधिक वस्तुएं या व्यक्तियों में एकता या एकत्व होता है। यह एकता भौतिक, मानसिक, या आध्यात्मिक स्तर पर भी तो हो सकती है।

इस के कुछ उदाहरण हैं:

1. _आत्मा और परमात्मा की एकता_: 
हिंदू धर्म में यह माना जाता है कि आत्मा और परमात्मा में एकता होती है, जिसे तादात्म्य कहा जाता है।
2. _जीव और ईश्वर की एकता_: 

हिंदू धर्म में यह भी माना जाता है कि जीव और ईश्वर में एकता होती है, जिसे तादात्म्य ही कहा जाता है।
3. _मन और आत्मा की एकता_:
 तादात्म्य का अर्थ यह भी हो सकता है कि मन और आत्मा में एकता होती है, जिससे व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है।

तादात्म्य की अवधारणा हिंदू धर्म और दर्शन में बहुत महत्वपूर्ण है, जहां यह माना जाता है कि सभी वस्तुएं और व्यक्तियों में एकता होती है।

स्वस्वरूप से इस प्रकार की खोज है कि वह अजन्मा है अनादि एवं सर्वलोकमहेश्वर हैं। कौन से लोग वेदांत दर्शन की प्राचीन परंपरा से कुछ परिचित भी हैं उनके लिए ये तीन विशेष विशेषज्ञ बेहद सारगर्भित हैं जबकि उनमें से अनाभिज्ञ लोगों को ये विशेष निर्रथक ही विशिष्ट होंगे ऐसा भी लगता है। अनात्म जड़ जगत् परिच्छिन्न है प्रत्येक वस्तु कहाँ है? जीव या अनुभव अनित्य हैं? 
अर्थात संपूर्ण सनातन आदि (जन्म) और अंत (मत्यु) से युक्त हैं। असीम अनंत परमात्मा का जन्म कभी नहीं हो सकता? क्योंकि जो उत्पन्न हुआ है? 

वह परिच्छन्न जिसका का भाव यह है कि कोई वस्तु या व्यक्ति किसी आवरण या छिपाव में होता है, जिससे उसका वास्तविक स्वरूप छिप जाता है। यह आवरण या छिपाव कई प्रकार का हो सकता है, जैसे कि:

1. _माया का आवरण_: 
हिंदू धर्म में माया को एक ऐसी शक्ति माना जाता है जो वास्तविक स्वरूप को छिपा देती है।
2. _अज्ञान का आवरण_: 

अज्ञान के कारण व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं होता है।
3. _कार्मिक आवरण_: 

कार्मिक आवरण के कारण व्यक्ति को अपने पिछले कर्मों के परिणामों का सामना करना पड़ता है।

परिच्छन्न का भाव यह है कि व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए इन आवरणों को हटाना होगा। यह आवरणों को हटाने की प्रक्रिया ही मुक्ति या आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है।
 है और किसी भी परिच्छिन्न वस्तु में अनन्त तत्त्व कभी भी अपने अनन्त स्वरूप में व्यक्त नहीं हो सकता। स्थाणु (स्तम्भ) में जब भ्रांति से पुरुष (या प्रेत) की विशेषता होती है तो क्या पुरुष का नाश हो सकता है? क्योंकि वह पैदा हुआ था वास्तव में यह नहीं कहा जा सकता कि स्थाणु ने प्रेत को जन्म दिया था। या स्तम्भ से प्रेत की उत्पत्ति हुई। स्थाणु तो पहले भी वहां था है और रहनेवाला भी है।
 आत्मा नित्य सनातन है? इसलिए वह जन्म से है। अन्य वस्तु का जन्म स्थिति और नाश यह आत्मा में ही होती है। तरंगे समुद्र से उत्पन्न होते हैं परन्तु समुद्र स्वयं अजन्मा है। हर परिवर्तन का आदि है मध्य है और अंत भी। पर उन सभी सारतत्त्वों में से सर्वथा मुक्त है और इसलिए।

इस श्लोक में आत्मा को अनादि विशेषण दिया गया है। लोकमहेश्वर लोक शब्द का अर्थ जगत करने से इस संस्कृत शब्द के व्यापक प्रयोग की दृष्टि होती है। लोक शब्द जिस धातु से बना है उसका अर्थ देखें अनुभव करना। अत: इसका सम्पूर्ण अर्थ अनुभव का क्षेत्र होगा। हमारे दैनिक जीवन में भी इसी अर्थ में लोक शब्द का प्रयोग क्या किया जाता है धनवानों का लोक कैसा? बिज़नेस का लोक कैसा? क्या लोक? बैटरी का लोक आदि। इसलिए उनका व्यापक अर्थ लोक शब्द से यह  भौतिक जगत् ही नहीं है? बल्कि बकवास एवं दर्शन के जगत् का बोध भी होता है। इस प्रकार मेरा लोक वह है। जो मैं अपना शरीर मन और बुद्धि का अनुभव प्राप्त होता है। यह तो स्पष्ट है कि जब तक मुझे ये सादृश्य भान नहीं होता तब तक ये अनुभव मेरा नहीं हो सकता। यह चैतन्य तत्त्व किस कारण से मैं जीता हूं और जगत का अनुभव करता हूं वास्तव में मेरे लोक का ईश्वर ही होना चाहिए। जो मेरे व्यष्टि के विषय में सत्य हो किस जगत् के सभी साक्षियों का विषय भी सत्य है?
 क्योंकि आत्मा सर्वत्र एक ही है। यह समष्टि लोक का शासक है महान ईश्वर स्वयं परमात्मा ही हो सकते हैं। यह लोक महेश्वर शब्द का वास्तविक अर्थ है। ईश्वर कोई निरंकुश एवं तानाशाह शासक या आकाश में कोई सुल्तान नहीं। आत्मा हमारे लोक का ईश्वर ऐसा ही है।
 जैसे दिन के समय सूर्य इस चमकीली जगत् का स्वामी है क्योंकि जगत् ने किसको प्रकाशित किया है। जो मुझे अजन्मा अनादि लोक और महेश्वर के रूप में जानते हैं। वह भी संमोहित हो जाता है। स्थाणु में वास्तविक व्यक्ति क्या है जो उस स्थाणु को पहचानता है वैसे ही वह मोह और भ्रम से मुक्त हो जाती है। हिन्दू धर्म में पाप की कल्पना में किसी भी प्रकार का विकारालंभाविता का उग्र चित्र नहीं है। मनुष्य अपने पापों के लिए दंडित नहीं? वर्ण अपने पापों के द्वारा ही दण्डित होता है। पाप वह स्वपमानजनक कर्महै।
जिसका कारण मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का अज्ञान है। जब कोई व्यक्ति अपने शुद्ध आत्मस्वरूप से भटक कर दूर हो जाता है तब वह जगत् की कहानियों के साथ तादात्म्य कर सुखदुख का अनुभव करता है। वह जगत् में इस प्रकार व्यवहार करता है? मनो वह एक घृणित मांसपिंड ही है या स्पंदनशील भावनाओं की गठरी या विचारधारा का समूह है। उसका यह व्यवहार अपना एकमेव अद्वितीय ईश्वरीय है? दिव्य प्रतिष्ठा का अपमान ही है। ऐसे कर्म और विचार मनुष्य को निम्न स्तर के भोगों में आ कर छोड़ देते हैं जिस वजह से उन्होंने शानदार रियलिटी पूर्णत्व के शिखर पर पहुंचकर शिखर तक कभी पहुंच नहीं बनाई। पापवृत्तियाँ वे विशाले फोड़े हैं। जहाँ हम अपने परिच्छिन्न रोगियों की पीड़ा और बंधनों के दुःख सहते रहते हैं। जिस क्षण हम अपने आत्मस्वरूप को पहचानते हैं कि वह अजन्मा और अनादि है तथा विकारी और विनाशी अवस्थाओं से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। उस समय हम सब कुछ प्राप्त कर लेते हैं जो जीवन में प्राप्त होता है? और वह सब कुछ जान लेते हैं जो ज्ञातव्य है। ऐसा सम्यक् तत्वदर्शन पुरुष स्वयं ही लोकमहेश्वर बन जाता है।

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 4

बुद्धिर्जनसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।

सुखं दुःखं भावोऽभावो भयं चाभ्यमेव च।।10.4।।
 
 
भावार्थ:
निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं
 10॥4॥

1ज्ञान, 2असममोह, 3क्षमा, 4सत्य, 5दम, 6शम, 7सुख, 8दुख, 9भव, 10अभाव, 11भय, 12अभय, 13अहिंसा, 14समता, 15तुष्टि, 16तप, 17दान,18 यश 19 अपयश20 बुद्धि

यहाँ 1 से 20 तक के शब्दों के भाव क्रमानुसार दिए गए हैं:

1. ज्ञान - जानने की क्षमता, समझ, बुद्धि
2. असममोह - मोह से मुक्ति, स्पष्टता, स्थिरता
3. क्षमा - क्षमा, सहनशीलता, दया
4. सत्य - सच्चाई, ईमानदारी, निष्ठा
5. दम - आत्म-नियंत्रण, संयम, आत्म-शिक्षा
6. शम - शांति, स्थिरता, मानसिक शांति
7. सुख - खुशी, आनंद, संतुष्टि
8. दुख - दर्द, पीड़ा, असंतुष्टि
9. भव - अस्तित्व, जीवन, सृष्टि
10. अभाव - अनुपस्थिति, अभाव, शून्यता
11. भय - डर, भय, असुरक्षा
12. अभय - निडरता, सुरक्षा, आत्मविश्वास
13. अहिंसा - अहिंसा, दया, करुणा
14. समता - समानता, न्याय, निष्पक्षता
15. तुष्टि - संतुष्टि, खुशी, आनंद
16. तप - तपस्या, आत्म-शिक्षा, आत्म-नियंत्रण
17. दान - दान, उदारता, सहानुभूति
18. यश - यश, प्रसिद्धि, सम्मान
19. अपयश - अपयश, बदनामी, निंदा
20. बुद्धि - बुद्धि, समझ, ज्ञान
 
यह संप्रदायके ये अनेक प्रकार और अलग-अलग 20 भाव मेरे से ही होते हैं। ऐसा भगवान ने कहा ।

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।

भवन्ति भाव भूतानां मत्त एव पृथ्ग्विधा:
।।10.5।।
प्रस्तुत प्रकरण के विचार में आगे कहा गया है कि परमात्मा ही संपूर्ण विश्व का उपादान और निमित्त कारण है भगवान श्रीकृष्ण इन दो श्लोकों में कौन-कौन से अनोखे मिश्रण शामिल हैं कौन से मनुष्य के मन और बुद्धि में वाणी होती है।साधारणत सृष्टि शब्द से केवल हम भौतिक जगत् ही निहित हैं। फुटबॉल समग्र गुण अपने व्यापक एवं सर्वग्राहक अर्थ को सूचित करते हैं। यह स्पष्ट रूप से ज्ञात है कि जगत् शब्द के अर्थ में हमारे मानसिक और सांस्कृतिक जीवन भी शामिल हैं। प्रत्येक व्यक्ति का अपना गुण या स्वभाव वशीभूत होता है। यथा मन तथा मनुष्य। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहां केवल शुभ दैवीय गुणों का ही निर्धारण किया गया है। संस्कृत व्याख्याताओं की पारम्परिक शैली का अनुकरण कैसे किया गया? 
श्लोक में सुसंगत च शब्द का वर्णन यह हो सकता है कि उसके प्रतिकूल गुण को भी यहाँ सूचित किया गया है। तथापि भगवान के केवल शुभ गुण ही स्पष्ट नहीं हैं? 

क्योंकि जिस व्यक्ति में इन विशेषताओं का अधिकता होता है इनमें आत्मा के स्वर्ग एवं दिव्यता के दर्शन होते हैं। विभिन्न प्रकार की भावनाओं एवं विचारों से प्रत्येक व्यक्ति को उसके अपने संस्कारों के अनुसार कर्म में प्रवृत्त किया जाता है। इस प्रकार यहां विविध प्रकार के जीवन दर्शन होते हैं। ये सब गुण
मेरे में ही दिखाई देते हैं। स्तम्भ में अद्भुत हुआ प्रेत किरण प्रेम से मंदबुद्धि करे या क्रोध से खिसियाये या प्रतिशोध की भावना से धमाकाये उनका मांद स्मित या धमाका विशिष्ट गुण का केवल एक अधिष्ठान है स्तम्भ। आत्मचैतन्य के बिना बुद्धि ज्ञान आदि मिश्रण का कोई प्रमाण नहीं है और न ही भान। इन गुणों के द्वारा संपूर्ण मॅकॅस्ट का और उनके डॉक्युमेंट्स का प्रायोरिटी पूर्ण रूप से किया गया है। जैसा कि किस प्रकार कहा जाता है ये दो श्लोक आत्मा का सर्वलोकमहेश्वर सिद्ध करते हैं।

*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
दुनिया को कैसे देखें
 ऐसे देखें?
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 कि संसार में जो कुछ क्रिया, पदार्थ, घटना आदि है, वह सब भगवान का रूप है। छल रूपी रोग की उत्पत्ति हो,या  छल रूपी रोग की प्रलय हो; 
रेखा की अनुकूलता हो,  प्रतिकूलता हो; ख़र अमृत हो, ख़र मौत हो; नरक स्वर्ग हो,या नरक ,नरक हो यह सब भगवान की लीला है। भगवान की लीला में बालकाण्ड भी है, अयोध्याकाण्ड भी है, अरण्यकाण्ड भी है और लंकाकाण्ड भी है। पुरियों में देखा गया तो अयोध्यापुरी में भगवान का प्राकट्य है राजा, रानी और प्रजा का वात्सल्य भाव में है। रामजी के प्रति राजा राजा, महारानी सुनयना और प्रजाके अंत-विलक्षण भाव हैं। वे रामजी को चरित्ररूप से खेलते हैं, खेलते हैं, विनोद करते हैं। वनों में (अरण्यकाण्ड में) भक्तों का अपॉइंटमेंट भी है और राक्षसों की अपॉइंटमेंट भी। लंकापुरी में युद्ध होते हैं, मार-काट होती हैं, खूनी नदियाँ बह निकलती हैं। इस तरह की अलग-अलग पुरियों में, अलग-अलग काण्डों में भगवानकी तरह-तरह की लीलाएँ होती हैं। लेकिन जो तरह-तरह की लीलाएँ होती हैं जिनमें भी रामायण एक ही है और ये सभी लीलाएँ एक ही रामायणके अङ्ग हैं और इन अङ्गोंसे रामायण सङ्गोपाङ्ग होती हैं। ऐसे ही संसार में शैतान के तरह-तरह के भाव हैं, क्रियाएँ हैं। कहीं कोई मजाक कर रहा है तो कहीं कोई घूम रहा है, कहीं पर विद्वतगोष्ठी हो रही है तो कहीं पर अपनों की लड़ाई हो रही है, कोई जन्म ले रहा है तो कोई मर नहीं रहा है, आदि-आदि जो भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक चेष्टा हो रही हैं, वे सब भगवानकी लीलाएँ हैं। लीलाएं करनेवाले ये सब भगवान के रूप हैं। इस प्रकार भक्त की दृष्टि हरदम भगवान पर ही रहती है जन्मोत्सव; क्योंकि इन सबके मूल में एक परमात्मतत्त्व ही है। और हम प्राणी बुरे को ना चाहते हुए भी रामायण में इनको भी श्रद्धा विश्वाश प्रेम भाव से नमस्कार भी तो करते हैं?
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 6

श्लोक:
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।
 मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥

भावार्थ:
सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है
 10॥6॥
यहाँ सात महर्षिजन, चार सनकादि और चौदह मनुओं के नाम दिए गए हैं:

सात महर्षिजन:

1. मरीचि
2. अत्रि
3. अंगिरा
4. पुलह
5. कृतु
6. पुलस्त्य
7. वशिष्ठ

चार सनकादि:

1. सनक
2. सनंदन
3. सनातन
4. सनत्कुमार

चौदह मनु:

1. स्वायम्भुव मनु
2. स्वरोचिष मनु
3. उत्तम मनु
4. तामस मनु
5. रैवत मनु
6. चाक्षुष मनु
7. वैवस्वत मनु
8. सावर्णि मनु
9. दक्षसावर्णि मनु
10. ब्रह्मसावर्णि मनु
11. धर्मसावर्णि मनु
12. रुद्रसावर्णि मनु
13. देवसावर्णि मनु
14. इंद्रसावर्णि मनु
 यह सब मुझ में भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है।
यहां सृष्टि के अभिप्राय को समझने की क्या आवश्यकता है सुनो--

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 7

श्लोक:
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
 सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥

भावार्थ:
जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है 
(जो कुछ दृश्यमात्र संसार है वह सब भगवान की माया है और एक वासुदेव भगवान ही सर्वत्र परिपूर्ण है, यह जानना ही तत्व से जानना है), 
वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है
 10॥7॥
कौन है जो इस मेरी विभूति और योग को तत्त्व से जानता हो?

वही ब्रह्मज्ञान में निष्ठा प्राप्त करता है। इस श्लोक में सम्मिलित इन दो शब्दों में विभूति और योग का जो अर्थ है वह सदैव बताया जाता है वह है सिद्दी की भूतमात्र का विस्तार और ऐश्वर्य सार्मथ्य है। तथापि वे सुंदर इतने प्रभावशाली नहीं हैं कि पूर्व श्लोक में वर्णित सिद्धांत और इस श्लोक के साथ सूक्ष्म सूक्ष्म और संगति को व्यक्ित कर दिया गया है। सप्तर्षियों के माध्यम से समष्टि विश्व की अभिव्यक्ति ही परमात्मा की विभूति है जबकि चार मानस पुत्र सृष्ट जीव (व्यष्टि) के अनुभव का जगत् आत्मा का दिव्य योग है। विविध जीव के जगत् का अधिष्ठान आत्मा ही परमात्मा (ब्रह्म) है? जो संपूर्ण विश्व का आधार है। अतः यहाँ कहा गया है कि? कौन पुरुष विभूति और योग इन दोनों को ही परमात्मा की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में साक्षात् जानता है? 
जैसे हमें अमृतसर से दिल्ली से सड़क मार्ग से जाने का अवसर प्राप्त हो और यात्रा के पश्चात पूछा जाए मार्ग में कितने वृक्ष आए? तब हमारी हालत जो होती है!

तब हम कुछ नहीं बता पाते पर सरकार के रिकॉर्ड में लिखा होता है?

हमें केवल इतना याद होता है कि फलानी जगह शीतल जल या भोजन मिला।

इसी प्रकार शास्त्रों में बहुत कुछ कहा जाता है जिसमें याद एक दो ही होते है। जो दोराहा होता है । एक रास्ता आध्यामिक ज्ञान से भगवान और दूसरा शैतान की शरण में ले जाता है। जब कि यह स्वरूप भी उसी एक ईश्वर का ही है।अलग अलग नहीं है।

इसी प्रकार  पुरुष अनंत ब्रह्म का अपरोक्ष अनुभव करता है। उपर्युक्त विवेचन पूर्व श्लोक में कथित सप्तर्षि और चार कुमारों के मन से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई की उपयुक्तता को समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। 
जब परमात्मा व्यष्टि और समष्टि मनों से अपना तादात्म्य त्याग देता है तब वह अपनी स्वामीमहिमा में ही प्रतिष्ठित रामता है। समष्टि  के साथ तादात्म्य से वह ब्रह्म ईश्वर बन जाता है। 
( जैसे चित्र कूट के घाट पर लगी संतान की भीड़ तुलसी दास चंदन घिसे चंदन करें रघुवीर)
आज के समय में सभी खुद को तिलक लगा कर महान होने का क्या ढोंग नहीं कर रहे?

क्यों कि 

पूजा-पाठ के दौरान पुजारी द्वारा तिलक लगाने का कारण यह है कि पुजारी को भगवान का प्रतिनिधि माना जाता है। पुजारी के द्वारा तिलक लगाने से यह माना जाता है कि भगवान स्वयं जजमान को आशीर्वाद दे रहे हैं।

विवाह के समय दूल्हे को तिलक लगाने का कारण यह है कि यह एक पारंपरिक और धार्मिक अनुष्ठान है। दूल्हे को तिलक लगाने से यह माना जाता है कि भगवान दूल्हे को आशीर्वाद दे रहे हैं और उसके विवाहित जीवन को सफल और सुखी बनाने में मदद कर रहे हैं।

दूल्हा या जजमान खुद तिलक नहीं लगा सकता है ?
क्योंकि यह एक पारंपरिक और धार्मिक अनुष्ठान है जिसे केवल एक अधिकृत व्यक्ति द्वारा ही किया जा सकता है। पुजारी या पंडित को भगवान का प्रतिनिधि माना जाता है और उन्हें ही तिलक लगाने का अधिकार होता है।इस परम्परा की खोज का श्रेय तुलसी दास जी को मिलता है।

 और व्यष्टि के साथ संबंध से जीवभाव प्राप्त होता है। वेदांत के इस अभिप्राय को ठीक करें और उसी अनुभव में जीना ही अविस्मरणीय योग है। इस योग से ही आत्मानुभूति में दृढ़ और स्थिर निष्ठा प्राप्त होती है। योग शब्द से कुछ ऐसा अर्थ समाज में प्रचलित हो गया कि लोगों के मन में उसका प्रति भय व्याप्त हो गया। गीता में गणितज्ञ व्यास स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से इस अज्ञात शब्द योग का अर्थ नए सन्दर्भ में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है कि उनका प्रति-व्याधि खतरा निर्मूल हो जाता है और वह सर्वव्यापी कल्याण कारक भी सिद्ध होता है। अविकम्प योग शब्द की विभिन्न परिभाषाएँ क्या हैं? 

जो गीता के पूर्वाध्यायों के विभिन्न श्लोक दिए गए हैं। गीता हिंदूपुनरुत्थान की उत्तेजित क्रांति का क्या एकमात्र धर्मग्रंथ है? जिसका स्थान कोई अन्य ग्रंथ नहीं ले सकता। आत्मस्वरूप के अखण्ड अनुभव में दृढ़ और स्थायी निष्ठा प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के निम्नलिखित श्लोक में कौन सा निश्चित साधन है--
तुलसी दास जी ने अपने ग्रंथ "रामचरितमानस" में एक प्रसिद्ध दोहा लिखा है:

"तिलक करें रघुवीर को,
चंदन घिसें को नहीं सो"

इस दोहे में तुलसी दास जी ने कहा है कि तिलक केवल रघुवीर (भगवान राम) को ही लगाया जाना चाहिए, न कि चंदन घिसने वाले को।

इस प्रकार, तुलसी दास जी ने इस परम्परा को आरंभ किया कि तिलक केवल भगवान को ही लगाया जाना चाहिए, न कि किसी अन्य व्यक्ति को।

आगे बढ़ते है

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 8

श्लोक:
( फल और प्रभाव सहित भक्तियोग का कथन ) 
 अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
 इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥

भावार्थ:
मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत्‌ की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत्‌ चेष्टा करता है, इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान्‌ भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजते हैं
 10॥8॥

सार्वभौम मूल में परमात्मा है और परमात्मा से ही वस्तु, व्यक्तित्व, पदार्थ, घटना आदि सर्वसाधारण सत्य-संस्कृति मिलती है -- ऐसा ज्ञान होना परमात्म प्राप्ति सामान्यवाले के लिए सभी साधकों के लिए बहुत जरूरी है। क्योंकि जब सार्वभौम मूल में परमात्मा ही है, तब साधक का लक्ष्य भी परमात्मा की तरफ ही होना। उस परमात्मा की ओर लक्ष्य में ही संपूर्ण विभूतियाँ और योग के ज्ञाता तट हैं। यही बात गीता में जगह-जगह बताई गई है; जैसे -- सम्पूर्ण संसार में व्याप्त सृष्टि है और सम्पूर्ण संसार में व्याप्त सृष्टि है, उस ईश्वर का अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा वन्दन करना ; जो संपूर्ण धार्मिक हृदय में निहित है और जो सबको प्रेरणा देता है, वह भगवान की सर्वभावसे शरण में जाना जाता है । अन्य कर्मयोग, ज्ञानयोग, और भक्तियोग-- ये साधन तो अपनी-अपनी रुचि के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन शैक्षणिक ज्ञान के लिए सभी साधकों को इन की बहुत आवश्यकता होती है।
अर्थात:

भगवान ही सबका प्रभव स्थान है; उन से ही सब (जगत) विकास को प्राप्त होता है, इस प्रकार ज्ञान बुधजन भक्ति भाव से युक्त हो कर ही भगवान को भजते हैं।

 भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 9

श्लोक:
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्‌।
 कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥

भावार्थ:
निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं
 ॥9॥
जब मन सुगठित और एकाग्र होता है? तभी साधक उस मन के द्वारा भगवान का ध्यान धारण कर सकता है। ध्येय से भिन्न विषय का विचार पर विचार करने से एकाग्रता भंग हो जाती है। विद्युत के सभी उपकरणों में विद्युत शक्ति देखना? या मिट्टी से बने घाटों में मिट्टी को अपवित्र करने में हमें कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती? क्योंकि उनका हमें दृढ़ ज्ञान होता है। इसी प्रकार? एक बार प्रमाणित रूप से यह जान लें कि ईश्वर और जीव का वास्तविक स्वरूप एक चैतन्य आत्मा ही है? मन में किसी भी प्रकार की प्रेरणा पुनः सत्य के साधक को इस आत्मा का भान बनाये रखने में कोई कमी नहीं आती। इस कार्य को यहाँ मच्छिता इस शब्द से स्पष्ट किया गया है। समस्त प्राणों अर्थात् इंद्रियों को मुझसे सुरक्षित करके (मद्गत्प्राण) प्राण शब्द से केवल प्राणवायु से ही कोई सुरक्षा नहीं होनी चाहिए। पागलों के शरीर में पाचन क्रिया का प्राण शब्द से संग्रहित किया जाता है। बोरा यहाँ इस शब्द का उद्देश्य पाँच ज्ञानेन्द्रियों को सूचित करने के लिए दिया गया है। ये इन्द्रियाँ ही पाँचवें द्वार या वातायन हैं? एक व्यक्ति द्वारा मन में प्रयुक्त विषयों का विचरण किया जाता है और दूसरे माध्यम से ही जगत के विषय में मन में प्रवेश किया जाता है। वेदांत कभी भी इन विषयों से पलायन का उपदेश नहीं देता। इस जगत में जीते हुए विषयों से पलायन कदापि संभव नहीं हो सकता। ज्ञानमार्ग विवेकपूर्ण विचार का मार्ग है। विवेक के द्वारा मन को इस प्रकार संयमित और प्रशिक्षित किया जाता है कि जब कभी भी वैयक्तिक विषय मन पर अपना प्रभाव डालते हैं? वास्तविक ही साधक को अपने उस आत्मस्वरूप का स्मरण क्यों होता है? जिसके बिना वे विषय कभी प्रकाशित नहीं हो सकते थे। पारस्पर चर्चा करते हुए किसी एक विषय में समान रुचि के हितग्राही जब उस विषय में चर्चा करते हैं? तब न केवल वे अपने ज्ञान को स्पष्ट बोल पाते हैं? वर्ण इस प्रक्रिया में उनके ज्ञान को सांकेतिक रूप में भी ले जाता है जो कि केवल पुस्तकीय ज्ञान ही था। प्रसंवाद की इस सर्वविदित पद्धति का वेदांत में काफी रूप से मंज़ूरी एवं उपदेश दिया गया है। वेदांत में इसका नाम ब्रह्माभ्यास है जो साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है। अध्यात्म का सच्चा साधक कौन है? जो अपने मन और इन्द्रियों की सभी प्रकार की कृतियों में आत्मा का स्मरण करना सुनिश्चित करता है। इसका एक उपाय है आत्म विषय में अन्य साधकों के साथ चर्चा एवं निदिध्यासन। ऐसे साधक साधना के आरंभ से उस परम आनंद को प्राप्त होता है? जो उनके जीवन रथ के चक्रों के लिए पथरीले मार्ग पर सरलता से जहर बनने के लिए चिकन तेल का काम करता है और यात्रा को सुविधाजनक बनाता है। तुष्यन्ति और रमण्ति के भाव को ही उपनिषदों में सुन्दर प्रकार से कृदंती और रमण्ति के शब्दों द्वारा ग्रहण किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ पर पूर्णत्व का उपदेश देते हैं जब विचार मार्ग पर भ्रम होता है तब उसी समय सन्तोष और रमण का अनुभव होता है। है. संतोष और आनंद से मन में ऐसा सुंदर वातावरण बनता है? जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए अत्यंत उपयुक्त सहायक साधक की सफलता निश्चित रूप से देता है। सदैव असन्तुष्ट? सत्य वाले मानसिक स्थिरता और उत्कृष्ट दरिद्रता का चित्र शोक प्रस्तुत करने वाले साधक कपी अपने इस परम आनन्दस्वरूप में प्रवेश नहीं कर सकते।अब यह उत्तर है ।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 10

श्लोक:
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌।
 ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

भावार्थ:
उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं
 10॥10॥
व्याख्या:

जब तक सबसे श्रेष्ठ मनोरंजक वस्तु या लक्ष्य नहीं मिल जाता जिसमें हमारा मन पूर्णतया राम से नहीं साक्षात करता तब तक विषय? भावनाओं और विचारों के जगत् के साथ हुए तादात्म्य से हमारी स्थिर निवृत्ति नहीं हो सकता।
आनंदस्वरूप आत्मा में ध्यानाकर्षण करने की ऐसा सामर्थ्‍य और इस लिए जिस मात्रा या सीमा तक इस आत्मस्वरूप में मन स्थित होता है उतनी ही मात्रा में वह दुःखद मिथ्या बंधनों की पकड़ से मुक्त हो जाता है।जब उसे भगवान सत्य से नजर आने लगते हैं।
 इस वेदांतिक सत्य भगवान श्रीकृष्ण का इस वाक्य में वर्णन करते हैं जो मेरी भक्ति अधूरा भजन करता है।प्रिय के साथ तादात्म्य का ही अर्थ है प्रेम। आत्मा के साथ हुए तादात्म्य के अनुपात में ही जीव भक्त होता है और जब वह सतत् युक्त हो जाता है तब तक वह वास्तविक रूप में हृदय में स्थित होकर अपने अव्यक्त दिव्यता को अभिव्यक्त कर पाता है। ऐसे भक्त जो धार्मिक भक्ति ही है सन्तोष और आनन्द के वातावरण में सतत आत्मा का चिन्तन क्या उन भक्तों को स्वयं भगवान ही इसकी बुद्धियोग देते हैं जो भगवान को ही प्राप्त होते हैं।बुद्धियोग का वर्णन सबसे पहले किया जा चुका है। आत्मा के अनंत स्वरूप पर निदिध्यासन से सम्यक ज्ञान प्राप्त करना ही बुद्धियोग है। प्रस्तुत संदर्भ में इस कथन से यह संभव है कि शैक्षणिक पद्धति से साधनाभ्यास करने वाले साधक को सत्य का संतुलन प्राप्त होता है। निसंदेह हमारा वह अभिप्राय कदापि नहीं है कि परिच्छिन्न बुद्धि द्वारा कभी भी अनंत वस्तु का ग्रहण किया नहीं जा सकता है। हम केवल लौकिक जगत् के एक सुपरिचित वाक्प्रचार का उपयोग ही कर रहे हैं। जब तक बुद्धि से एक अनुभव ग्रहण किया गया तब तक किसी अन्य अनुभव से कोई व्यवधान भी नहीं होता। तब तक उस पूर्व अनुभव को प्रामाणिक और संदिग्ध अनुपयोगी माना जाता है। आत्मा का अनुभव कदापि बाधित नहीं हो सकता क्योंकि वह अनुभवी अभिनेता का ही रूप है। ऐसा दृढ़ ज्ञान केवल उन साधकों को ही प्राप्त होता है जो आत्मानुसंधान करने की अभिनव एवं स्थिरता प्राप्त होती है। उक्त ध्यानाभ्यास के द्वारा सत्य पर पाद अकारण और तज्जनित विक्षेपों की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। तब वह साधक समाधि का साक्षात् अनुभव करता है। जो बुद्धियोग की परिसमाप्ति और पूर्णता है। इस बुद्धियोग के भगवान अपने अनुयायियों के लिए निश्चित रूप से क्या करते हैं? इसका वर्णन अगले श्लोक में है --

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 11

श्लोक:
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
 नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ
 10॥11॥

आपकी कामना के प्रति बंधनके कारण नाश करनेवाला बुद्धियोग आप अपने भक्तों को देते हैं और किसलिये देते हैं यह आकाक्षापर कहते हैं --, उन (मेरे भक्तों) का किसी तरह का भी कल्याण हो ऐसी कृपा करने के लिए ही मैं उनके आत्मभाव में स्थित हुआ अर्थात आत्माका भाव जो अंतःकरण में स्थित है, उनका अविवेकजन्य मिथ्या प्रकृतिरूप, मोहमय अंधकारको प्रकाशमय विवेकबुद्धिरूप ज्ञानदीपक द्वारा नष्ट कर देता हूँ। अर्थात जो भक्तिके प्रसादरूप घृतसे का आनंद है और मेरे स्वरूपकी भावनाके अभिनिवेशरूप वायुकी सहायतासे लाभ हो रहा है? जिसमें ब्रह्मचर्य आदि गुरुआदि संस्कारों से युक्त बुद्धिरूप संयंत्र है? आस्कितरहित अंतःकरण किसका आधार है? जो विषय हटे हुए और रागद्वेषरूप कलुष्यसे रहित हुए चित्तरूप वायुरंजित अपवारकें (ध्याननेमें) स्थित हैं और जो सात्त्विक अभ्यास किए गए हैं एकाग्रतारूप ध्यानजनित? पूर्ण ज्ञानस्वरूप प्रकाशसे युक्त है? वह ज्ञानदीपक (मैं उनका मोहका नाश कर देता हूं)।

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवन।

पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्
।।10.12।।
ऊपर कही गई भगवानकी विभूतिको और योगको आश्चर्यचकित अर्जुन बोला --, क्या आप परमब्रह्मपरमात्मा हैं? परमधाम--परमतेज और परमपावन हैं और आप नित्य और दिव्य पुरुष हैं अर्थात देवलोक में रहने वाले अलौकिक पुरुष हैं और क्या आप सभी देवों से पहले हो रहे हैं आदिदेव? अजन्मा और व्यापक हैं।
 ।।10.12।।
मूल श्लोकः
आहुस्त्वमृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।

असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे
।।10.13।।
अर्जुन बोले-- परम ब्रह्म, परम धाम और महान पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं - ऐसे सबके-सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 12-13

श्लोक:
( अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति तथा विभूति और योगशक्ति को कहने के लिए प्रार्थना ) 
 अर्जुन उवाच
 परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्‌।
 पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्‌॥
 आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।
 असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और आप भी मेरे प्रति कहते हैं
 ॥12-13॥

व्याख्या:

अर्जुन वैदिक साहित्य से अज्ञात थे। उन्होंने यहां बताया है कि प्राचीन ऋषियों ने अनंत सनातन सत्य को जिन शब्दों में बताया है क्या वह इसमें शामिल है? जैसे परं ब्रह्म? परम धाम? परम पवित्र आदि। लेकिन अब तक यही समझाया था कि ये सब परम सत्य के गुण हैं। इस लिए जब वह भगवान को मित्रवत शब्दों का प्रयोग स्वयं के लिए करना सुनता है? 
तब वह कुन्तीपुत्रा अद्भुत रहती है। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि वह अपने रथसारथी श्रीकृष्ण को विश्व के आदिकरण के रूप में किस प्रकार के जनव्यावाहरिक बुद्धि के व्यक्तित्व के होने के नाते अर्जुन को श्रीकृष्ण के स्वरूप को समझने के लिए और अधिक जानकारी की आवश्यकता थी। हम देखते हैं कि उनकी मांग को पूरा करने के लिए इसी अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने सामाहित्य और तथ्य प्रस्तुत किए हैं। क्या? अर्जुन को सन्तुष्ट करने के स्थान पर वह जानकारी उसकी जिज्ञासा को द्विगुणित कर देती है? और वह भक्तवत्सल करुणासागर भगवान श्रीकृष्ण से अपने विश्वरूप को भेंट करने के लिए अगले अध्याय में अपने विश्वरूप को दर्शन देने वाले अर्जुन को कृतार्थ कर देते हैं। बुरा उसे वे अर्थहीन और निःप्रयोजना ही दिखाई देते थे। उनके आश्चर्यजनक इन शब्दों में स्पष्ट रूप से बातचीत होती है कि? आप भी मेरे प्रति ऐसा ही कहते हैं। यहां उनके कुछ अद्भुत एवं रहस्यमय होने का अवसर मिला था कि उन्हें समझ नहीं आया कि उनके समकालीन श्रीकृष्ण कौन से थे? 
इसमें कई वर्षों की कहानियाँ शामिल थीं और उनकी कौन सी संगति भी अनंत प्रकार की थी? परम? जन्मबंध और सर्व सहयोग हो सकता है। अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को उनके चरण चक्र दिखाई देते हैं और इस लिए उनका एकमात्र शरीर ही दिखाई देता है। सम्पूर्ण गीता में श्रीकृष्ण स्वयं का आत्मस्वरूप ही प्रकट होता है? और न ही समाज के एक सदस्य के रूप में। गीता के उपदेष्टा श्री भगवान खुद ही भगवान हैं? वासुदेव के पुत्र या गोपियों के प्रियतम नहीं। क्या श्रीकृष्ण हमेशा के लिए दोस्त या प्रेमी या एक विश्वसनीय बुद्धिमान व्यक्ति हैं? 
जज के रूप में देखने पर अर्जुन के आत्मसंतुष्ट श्रीकृष्ण को पहचान नहीं मिली। यही उनके आश्चर्य और भ्रम का कारण था।अगला श्लोक अर्जुन में स्थित एक जिज्ञासु साधक के भाव को स्पष्ट करता है--
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 14

श्लोक:
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
 न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥

भावार्थ:
हे केशव! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्‌! आपके लीलामय  स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही
 10॥14॥

लीला मय स्वरूप की व्याख्या:

चित्त का समाधान कर लेने वाला योगी जब इंद्रियोंके अर्थों में अर्थात् इंद्रियोंके विषय जो शब्दादि हैं वे एवं नित्य नैमित्तिक काम्य और दृढ़ कर्मों में अपने कुछ भी प्रस्ताव न देखकर असक्त नहीं होते उनमें आशक्ति अर्थात ये होती है मुझे ऐसा करने की अनुमति नहीं है। तब उस समय वह सब संकल्पों का त्याग करता है अर्थात इस लोक और लोक के भोगों की कामना के कारण सभी संकल्पों का त्याग करना जिसका स्वभाव हो गया है ऐसा पुरुष योगारूढ़ अर्थात योग को प्राप्त हो गया है ऐसा कहा जाता है। सर्वसंकल्पसंन्यासी इस कथन का उद्देश्य यह है कि सभी कामनाओं को और सभी कर्मों को पितृत्व छोड़ दें। क्योंकि सबकी इच्छा मूल संकल्प ही है। स्मृति में यह भी कहा गया है कि काम का मूल कारण संकल्प ही है। समस्त यज्ञ संकल्पों से उत्पन्न होते हैं। हे काम मैं तेरा मूल कारण जानता हूँ। तू निःसंदेह संकल्प से ही उत्पन्न होता है। मैं तेरा संकल्प नहीं, बल्कि फिर तू मुझे प्राप्त नहीं करेगा। सभी कामनाओं के परित्याग से ही सर्व कर्मों का त्याग सिद्ध हो जाता है। यह बात उसने जैसी चाही थी वैसी ही स्थिति वाली होती है जैसी स्थिति वाली होती है वैसी ही कर्म करती है अन्य श्रुतिसे प्रमाणित है और जीव जो जो कर्म करता है वह सब काम करता है वही चेष्टा है। अन्य स्मृतियों से भी प्रमाणित है। युक्तिसे से भी यही बात सिद्ध होती है क्योंकि सभी संकल्पों का त्याग कर दें तो कोई जरासा हिल भी नहीं सकता। सुतरां सर्वसंकल्पसंन्यासी भगवान सभी की कामना करते हैं और सभी कर्मोंका त्याग करते हैं।

यहां अर्जुन ने अपने मन के भावों को स्पष्ट करते हुए गुरु के प्रति श्रद्धा को भी व्यक्त किया है जो आप मेरे प्रति कहते हैं उसे मैं सत्य प्रमाणित करता हूं। केशव शब्द का अर्थ है केश सुंदर हैं या केशी को असुर का वध करने वाले कहा जाता है। हालाँकि वह श्रीकृष्ण के कथन को सत्य प्रमाणित तो करता है परन्तु वह उनका सारा काम ग्रहण नहीं करता। क्या यह है कि उसका हृदय भगवान के वचनों में पूर्ण विश्वास रखता है? उसकी बुद्धि अभी भी असन्तुष्ट ही है। ज्ञान पिपासा के वशीभूत अर्जुन का असन्तुष्ट व्यक्तित्व मनो कराहता है। यह ज्ञान पिपासा दूसरी पंक्ति में प्रतिध्वनिित है जहां वह कहता है कि आपके व्यक्तित्व को न देवता पता है और न दानव। दानव दनु के पुत्र थे जो स्वर्ग पर आक्रमण करते थे।
 यज्ञयागादि में बाधा लाते थे और आसुरी जीवन जीते थे। इसके विपरीत। पुराणों का वर्णन देवतागण स्वर्ग के निवासी हैं कौन से मानवों की शारीरिक आवश्यकता मानसिक और ढांचागत संरचनाओं में अधिक शक्तिशाली होते हैं। वैयक्तिक दृष्टि से देव और दानव हमारे मन की शुभ और अशुभ अशुभताओं के प्रतीक हैं। जब अर्जुन का कथन है कि आत्मा के स्वरूप का अस्तित्व न तो सूक्ष्म और शुभ के दर्शन के समान हो सकता है और न ही दानवी प्रवृत्ति के समान तब उसकी स्पष्ट झलकियाँ है। न तो हमारी दैवी प्रवृत्तियाँ सत्य का आलिंगन कर सकती हैं और न ही दानवी गुण युद्ध के लिए शत्रु रूप में हमारे सामने ला सकते हैं। जगत् में हम वस्तुएँ या शब्द केवल दो रूप में मिलते हैं प्रिय , मित्र और शत्रु के रूप में। आत्मा के व्यक्तित्व की पहचान इन दोनों को ही गोलों से नहीं किया जा सकता क्योंकि वह योग और विभूति की कड़ी में दृष्टा है। क्या सत्य को कोई नहीं जान सकता? 
तो फिर अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से उनका वर्णन करने का आग्रह क्यों करते हैं उनमें ऐसा कौन सा विशेष गुण है? 
किस कारण से वे उस वस्तु का वर्णन करने में सक्षम हैं? 
जिसे कोई और जान भी नहीं पाता है।

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 15

श्लोक:
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
 भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥

भावार्थ:
हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत्‌ के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं
 10॥15॥

इस श्लोक में बताया गया है कि किस प्रकार श्रीकृष्ण उस परम सत्य का वर्णन करने में असमर्थ हैं? जिसे न स्वर्ग के देवता जान सकते हैं और न दानवगण। क्या आत्मा को कभी साक्ष्यों (इंद्रियों) द्वारा दृश्य पदार्थ के रूप में नहीं जाना जा सकता है? और वह हमारी शुभ अशुभ कुरीतियों का ही अनुभव कर सकती है। क्या? आत्मा चैतन्य स्वरूप से स्वयं ज्ञानमय है और ज्ञान के अन्वेषण के लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। इसलिए अर्जुन यहाँ रहता है? आप स्वयं अपने आप को जानते हैं।सांख्यदर्शन के अनुसार प्रतिदेह में स्थित चैतन्य? पुरुष है. यहाँ श्रीकृष्ण को मूल नाम से अंकित किया गया है? इसका क्या अर्थ है? वह एकमेव अनोखा तत्व है जो भूतमात्र की आत्मा है। पुरूषोत्तम शब्द का लौकिक अर्थ है पुरुषों में उत्तम और अध्यात्मशास्त्र के अनुसार अर्थ है परमात्मा। अब अर्जुन? भगवान श्रीकृष्ण के शुद्ध ब्रह्म को उनके गौरव गान के रूप में स्वीकार करते हुए उन्हें उनमें स्थापित किया गया है? हे भूतभावन (भूतों की उत्पत्ति करने वाले) हे भूतेश हे देवों के देव हे जगत् के शासक स्वामी किसी भी वस्तु का सारतत्त्व उस वस्तु का शासक और स्वामी होता है। स्वर्ण आभूषणों का आकार? आहा आदि गुणी का शासक होता है। परन्तु चैतन्य के नियम एवं शासन की शक्ति अन्य की आवश्यकता से अधिक है? क्योंकि उसके बिना हम न कुछ जान सकते हैं और न कुछ कर्म ही कर सकते हैं। जब इनमें से अन्तःकरण में उत्पन्न वृत्तान्तों में शुद्ध चैतन्यरूप आत्मा से प्रकाशित बातें होती हैं, तो इनका आश्चर्य होता है। इस कथन के बाद आदर और भक्ति को व्यक्त करने वाले
हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं अपने आप को जानते हैं। आप भूतों के भावन, भूतों के ईश्वर, देवों के देव और जगत के पति हैं।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण को संबोधित किया गया है और उन्हें पुरुषोत्तम कहा गया है, जिसका अर्थ है "सर्वश्रेष्ठ पुरुष"। भगवान श्रीकृष्ण को यहां भूतों के भावन, भूतों के ईश्वर, देवों के देव और जगत के पति कहा गया है, जो उनकी सर्वोच्चता और सर्वज्ञता को दर्शाता है।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने आप को जानते हैं और वे ही एकमात्र हैं जो अपने आप को पूरी तरह से जानते हैं। वे भूतों के भावन हैं, जिसका अर्थ है कि वे भूतों को उत्पन्न करने वाले हैं और वे ही भूतों को नियंत्रित करते हैं। वे भूतों के ईश्वर हैं, जिसका अर्थ है कि वे भूतों के ऊपर अधिकार रखते हैं और वे ही भूतों को निर्देश देते हैं। वे देवों के देव हैं, जिसका अर्थ है कि वे देवताओं के भी देवता हैं और वे ही देवताओं को निर्देश देते हैं। अंत में, वे जगत के पति हैं, जिसका अर्थ है कि वे संपूर्ण जगत के स्वामी हैं और वे ही जगत को नियंत्रित करते हैं।
अब अर्जुन सीधे ही भगवान के समतुल्य अपनी अप्रतिम जिज्ञासा प्रकट करते हैं--
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 16

श्लोक:
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
 याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥

भावार्थ:
इसलिए आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को संपूर्णता से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं
 10॥16॥

आपकी दिव्य विभूतियों का पूर्णत्या वर्णन करने में (आप ही) समर्थ हैं -- 
आपकी कौन सी विभूतियाँ हैं? जिन विभूतियों से अर्थात् अपने महात्म्यके गुणों से आप इन सभी लोकों में व्याप्त होकर स्थित हो रहे हैं? इन्हें देखने में भी आप ही समर्थ हैं। कोई और नहीं।

अब अर्जुन के बारे में यह बात निश्चित हो गई है कि कौन से भगवान विश्व में स्थापित हैं? बिना विश्व का अनुभव सिद्ध सिद्ध नहीं हो सकता। तथापि जब वह अपने उपलब्ध और प्रमाणिक इन्द्रियों मन और बुद्धि के द्वारा लोचदार जगत् को जब देखा जाता है तब उसे केवल विषय भावनाओं और विचारों का ही अनुभव होता है जिसमें किसी भी दृश्य से दिव्य नहीं कहा जा सकता है। जब किसी भवन पर विद्युत की दीपसज्जा की जाती है या जब किसी उत्सव का अवसर मिलता है तब उस  में विभिन्न प्रकार के रंगीन और विभिन्न विद्युत इलेक्ट्रानिक इलेक्ट्रानिक्स के चमत्कारों से प्रकाश फ़ुटकर निकल ने की झलक मिलती है। लेकिन जब हमें बताया गया कि एक ही विद्युत इन सभी में अभिव्यक्ति धारण कर रही है तो कोई अनपढ़ अज्ञानी पुरुष अपने स्वभाव से ही प्रत्येक बल्ब में व्यक्त विद्युत् को देखने की इच्छा प्रकट कर सकता है जिसमें विराट ईश्वर के रूप में भगवान ही इस नाम रूप मय संसार की समष्टि सृष्टि (विभूति) और व्यष्टि सृष्टि (योग) बने हैं। हालांकि श्रद्धा से जड़ी बूटी हृदय के द्वारा इसका अनुभव किया जा सकता है परन्तु बुद्धि की तीक्ष्णता भी उसके द्वारा ग्रहण नहीं की जा सकी। इस लिए अर्जुन का प्रश्न पूछने का स्वभाव ही है। भगवान श्रीकृष्ण से उन विभूतियों का वर्णन अर्जुन क्यों मांगते हैं जिनके द्वारा वे इस जगत को व्याप्त करके स्थित हैं। कर्मशील होने के कारण अर्जुन भी कोई असाधारण बुद्धि का पुरुष नहीं है इसलिए वह और अधिक संतुलित एकता को एक साथ इसे जानना चाहता था जिन पर वह विचार करके और उनकी आकृति बनाकर उन्हें समझ सके।अर्जुन की यह एक मात्र विलक्षण जिज्ञासा ही तो है। जिस कारण उसने ऐसा प्रश्न किया है वह स्वयं स्पष्ट करता है

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 17

श्लोक:
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌।
 केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥

भावार्थ:
हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्‌! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने के योग्य हैं?
 10॥17॥

भगवान ने खाता की जो अनन्यचित्त नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उन योगिको मैं सहजता से प्राप्त हो जाता हूँ। फिर नवें अध्यायके बाईसवें श्लोक में कहा गया है कि जो अनन्य भक्त मेरा चिंतन करते हैं, उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूं। इस प्रकार चिंतनकी महिमा सुनने वाले अर्जुन कहते हैं कि जिस चिंतनसे मैं आपको तत्त्वसे जान जाऊं, वह चिंतन मैं कहां-कहां करूं किस वस्तु, व्यक्ति, देश, काल, घटना, परिस्थिति आदिमें मैं आपका चिंतन करूं? 

यहाँ चिंतन करना साधन है और भगवान्को तत्त्वसे ज्ञात साध्य है।

 यहाँ अर्जुन ने तो पूछा है कि मैं कहाँ-कहाँ, किस किस वस्तु, व्यक्ति, स्थान आदि में आपका चिंतन करूँ, पर,भगवान् ने उत्तर दिया है कि यहाँ भी तू चिंतन करता  है, वहां-वहां ही तू मेरे को समझ। प्रकृति यह है कि मैं तो सब वस्तु, देश, काल आदिमें हूँ। इसलिए किसी का उपयोग, महत्ता, सुंदरता आदि को लेकर जहां-जहां तेरा मन जाता है, वहां-वहां मेरा ही चिंतन कर यानी वहां का लाभ आदि को मेरी ही समझ। क्योंकि दुनिया की सुविधाओं से दुनिया का चिंतन होगा, पर मेरी सुविधाओं से मेरा ही चिंतन होगा। इस प्रकार विश्वका चिंतन मेरे चिंतन में जन्मोत्सव मनाया जाता है।
पर अब तक किसी भी अध्याय में कहीं भी गीता ने ध्यानाभ्यास के लिए नदी के तट पर या एकांत गुफा में शिष्य संत का जीवन उपदेश करने का समर्थन नहीं किया है। श्रीकृष्ण के मनुष्य को स्थापित कर्त्तव्य कर्म करने के लिए है और अपने समान व्यावहारिक जीवन में ईश्वरानुभूति को जीने के लिए है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गीताशास्त्र का उद्घोष महाभारत के समरांगण में कौन सा क्षण आया था जब सभी राष्ट्र अपने समय की सबसे बड़ी ऐतिहासिक क्रांति वेला का सामना करने के लिए उद्यत हुए। यह क्रांति वेला लौकिक और आध्यात्म दोनों ही पुरातन काल की थी।अर्जुन कर्तव्य पालन के गीताधर्म में पूर्णता परिवर्तित हो गया ।  श्रीकृष्ण ऐसे थे सर्वश्रेष्ठ कर्मयोगी? विभिन्न घटनाओं से लेकर प्राचीन जीवन में अत्यंत सह-अस्तित्व में रहते हुए भी आपने कभी अपने शुद्ध दिव्यस्वरूप का विस्मरण नहीं किया। क्या आप किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं, व्यावहारिक जीवन जीना चाहते हैं और अपने उद्घाटन का सामना करना चाहते हैं। यदि सर्वत्र व्याप्ति आत्मा का अखण्ड स्मरण बनाये रख रहे हो तो साधक को निश्चित रूप से यह जानने की आवश्यकता है कि वह प्रत्येक वस्तु का तत्व क्या है? व्युत्पत्ति के समूह और संप्रदाय के समाज में कहां और कैसे देखें। अर्जुन अपनी इच्छा को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि यदि भगवान का उत्तर विस्तृत भी हो तब भी उन्हें सुनने और समझने में थकान महसूस नहीं होगी।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 18

श्लोक:
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
 भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्‌॥

भावार्थ:
हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तार पूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात्‌ सुनने की उत्कंठा बनी ही रहती है।
 10॥18॥
हे जनार्दन अपने योगको -- अपने योगैश्वर्यरूप विशेष शक्तियों को और विभूतिको अर्थात चिंतन करने योग्य योगके विस्तारको? विस्तारअंक कहिये। गमन का कर्म है ऐसी अर्ध धातुका रूप जनार्दन है। असुरोंको यानी देवोंके विपक्ष को नरकादिमें जिपवाले होनेसे भगवान्का नाम जनार्दन है। या उन्नत कल्याण और -- ये दोनों पुरुषार्थरूप प्रस्ताव सभी लोगों द्वारा भगवान से मांगे जाते हैं? इसलिए भगवान का नाम जनार्दन है -- हालाँकि आप पहले कह चुके हैं तो फिर भी कहें क्योंकि आपके मुख से निकले वाक्यरूप अमृतको सुन्ते मुझे तृप्ति नहीं होती है -- संतोष नहीं होता है।
दर्शनशास्त्र के तथा अन्य किसी विषय के विद्वान भी।
प्रथम प्रखर जिज्ञासा का होना अत्यावश्यक है। विषय को जानने और समझने की इस जिज्ञासा के बिना कोई भी ज्ञान दृढ़ नहीं होता है और किसी भी मित्र के लिए वह सराहना ही नहीं कर सकता है। आत्मविकास के आध्यात्मिक ज्ञान में यह विशेष रूप से लागू होता है क्यों कि बात अन्य ज्ञान के समान है न केवल इसे ग्रहण और धारण करना ही उचित है वर्ना यह आत्मज्ञान है कि उसे अपने जीवन में दृढ़ निश्चय से जीना ओर लागू भी करना होता है। इसलिए श्रवण की इच्छा को एक श्रेष्ठ एवं आदर्श गुण माना गया है जो वेदांत के उत्तम अधिकारी के लिए आवश्यक भी होता है। इस गुण के होने से ज्ञानमार्ग में प्रगति तीव्र गति से होती है। इस में कोई सन्देह नहीं कि वेदांत का शुद्धिकारी प्रभाव रुचि संदेह अवलोकन करने वाले सभी बौद्धिक छात्रों पर आधारित है। एक शिष्य ज्ञानी गुरु के मुख से आत्मतत्त्व का उपदेश सुनाने वाला शिष्य को होने वाला आनंद क्षणिक उल्लास ही देता है जो स्थिर नहीं रह पाता। 
जब वह शिष्य प्रवचन के बाद अकेले रह जाता है तब उसका मन पुन: अनेक विकल्पों से अशांत हो सकता है। और फिर भी कितना ही क्षणिक आनंद क्यों न हो अर्जुन के समान नव दीक्षित छात्रों को आकर्षित करने की क्षमता क्या है?
 जिस कारण उनके उस विषय के प्रति रुचि एक व्यसन के समान ही है। वेदांत प्रवचनों के श्रवणार्थ इस अधिकाधिक अभिरुचि को यहाँ स्पष्ट रूप से पुनः प्रकाशित किया गया है। हालाँकि यह साधना भर है साध्य नहीं तब भी निसंदेह यह एक शुभ पद पर आसीन है। जिन लोगों को तत्वज्ञान के आधारभूत अध्ययन से ही संतोष का अनुभव होता है क्या?
 वे यह भी निश्चित करते हैं कि कौन से सहस्रों लोग श्रेष्ठतर हैं? जो दिव्य आत्मस्वरूप के दर्शन वाले एक भी आध्यात्मिक प्रवचन को नहीं सुन सकते या फिर भगवान श्रीकृष्ण के रूप में एक अत्यंत धर्म प्रचारक के रूप में अत्यधिक गंभीरता के साथ समझा नहीं जा सकता अर्जुन से कहते हैं।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 19

श्लोक:
(भगवान द्वारा अपनी विभूतियों और योगशक्ति का कथन) 
 श्रीभगवानुवाच
 हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
 प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तेरे लिए प्रधानता से कहूँगा; क्यों कि मेरे विस्तार का अंत नहीं है
 10॥19॥
श्रीभगवान् बोले -- हे कुरुवंशियों में श्रेष्ठ अब मैं तेरे दिव्य -- देवलोक में होनेवाली विभूतियाँ प्रधानतासे बतलाता हूँ अर्थात् मेरी जहानपर जोजोप्रधान विभूतियाँ हैं? उनु प्रधान विभूतियों का ही मैं प्रधानतासे वर्णन करता हूँ। संपूर्णतासे तो वे सैकड़ों वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि मेरा विस्तारका अर्थ मेरी विभूतियों का अंत नहीं है।

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भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 19
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श्लोक:
(भगवान द्वारा अपनी विभूतियों और योगशक्ति का कथन) 
 श्रीभगवानुवाच
 हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
 प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तेरे लिए प्रधानता से कहूँगा; क्यों कि मेरे विस्तार का अंत नहीं है
 10॥19॥
श्रीभगवान् बोले -- हे कुरुवंशियों में श्रेष्ठ अब मैं तेरे दिव्य -- देवलोक (इस प्रकार अन्य लोक भी है पर देव लोक का ही भगवान कहते हैं )
में होनेवाली विभूतियाँ प्रधानतासे बतलाता हूँ अर्थात् मेरी जहानपर जोजोप्रधान विभूतियाँ हैं? उनु प्रधान विभूतियों का ही मैं प्रधानतासे वर्णन करता हूँ। संपूर्णतासे तो वे सैकड़ों वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि मेरा विस्तारका अर्थ मेरी विभूतियों का अंत नहीं है।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करेंगे, लेकिन वे यह भी कहते हैं कि उनकी विभूतियों का कोई अंत नहीं है।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि उनकी विभूतियों का वर्णन करना असंभव है, क्योंकि वे अनंत हैं। लेकिन वे अर्जुन को अपनी प्रधान विभूतियों का वर्णन करने के लिए तैयार हैं।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह भी समझाते हैं कि उनकी विभूतियों का वर्णन करना एक सीमित काम है, क्योंकि उनकी विभूतियों का कोई अंत नहीं है। लेकिन वे अर्जुन को अपनी विभूतियों का वर्णन करने के लिए तैयार हैं, ताकि अर्जुन उनकी महिमा को समझ सके।
भगवद गीता के दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी महिमा और शक्ति का वर्णन करते हैं, और अर्जुन को अपनी विभूतियों के बारे में समझाते हैं।
"भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं, जो उनकी महिमा और शक्ति को दर्शाती हैं। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हैं, जो अर्जुन को उनकी महिमा और शक्ति के बारे में समझा रहे  हैं।"

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 20

श्लोक:
( सकाम और निष्काम उपासना का फल) 
 त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्‍वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
 ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌॥

भावार्थ:
तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोम रस को पीने वाले, पाप रहित पुरुष (यहाँ स्वर्ग प्राप्ति के प्रतिबंधक देव ऋणरूप पाप से पवित्र होना समझना चाहिए) मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं
 10॥20॥

भगवान का चिंतन दो तरह से होता नजर आ रहा है
(1) साधक अपना जो इष्ट मानक है, उसका दूसरा सिद्धांत कोई भी चिंतन न हो। कभी हो भी जाए तो मनको वहां से रेशम अपने इष्टदेवके चिंतन में ही लगा दे; और
 (2) मन में पर्यावरण सुविधाओं को लेकर चिंतन हो, तो उसे भगवान की ही सुविधाएं समझे। इस अन्य चिंतनके के लिए यहां विभूतियों का वर्णन है। ईश्वरका ही चिंतन होता है, वह वस्तु-व्यक्तिका नहीं। इसीके लिए भगवान विभूतियों का वर्णन कर रहे हैं।यहां भगवान ने अपनी संपूर्ण विभूतियों का सार कहा है कि संपूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अंतमें मैं ही हूं। यह नियम है कि जिस वस्तु का उत्पत्ति-विनाश होता है, उसका उद्भव और अंत में जो तत्त्व रहता है, वह तत्त्व उसके माध्यम में भी रहता है (चाहे दिखे या न दिखे) यानी जो वस्तु जिस तत्त्व से उत्पन्न होती है और जिसमें लीन होती है, वह वस्तु के आदि, मध्य और अंत में (सब समय में) वही तत्व रहता है। जैसे, सोने से बने पहले स्थान पर सोना रूप  होते हैं और अंत में (गहनों के सोने में लीन पर) सोनारूप ही रहते हैं और बीच में भी सोना रूप ही रहते हैं। केवल नाम, शीर्षक, उपयोग, माप, तौल आदि अलग-अलग होते हैं; और ये अलग-अलग होते हुए भी स्थिर सोना ही रहते हैं। ऐसे ही संपूर्ण सजीव आदि में भी परमात्म स्वरूप थे और अंत में लीन होने पर भी परमात्म स्वरूप और मध्यमें नाम, रूप, स्वरूप, क्रिया, स्वभाव आदि भिन्न-भिन्न होने पर भी तत्त्वत: परमात्मस्वरूप ही हैं ।यह इंगितके लिए ही यहां भगवान अपने को संपूर्ण सजीव के आदि, मध्य और अंत में कहा गया है। भगवानने विभूतियोंके इस प्रकरण में आदि, मध्य और अंत में तीन जगह साररूपसे अपनी विभूतियों का वर्णन है। पहले  भगवान ने कहा था कि सम्पूर्ण सर्गोंके आदि, मध्य और अन्त में भी मैं ही हूँ। और अंतके   'संपूर्ण दिव्यका जो बीज है, वह मैं ही हूं क्यों कि मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है। चिंतन करने के लिए यही विभूतियों का सार है। यह है कि किसी विशेष आदिको लेकर जो विभूतियाँ बताई गयी हैं, उन विभूतियों के अतिरिक्त भी जो कुछ दिखायी दे, वह भी भगवान्की ही विभूति है -- यह समझने के लिये भगवान आपके संपूर्ण चराचर मछुआरी आदि, मध्य और अन्तमें भगवान कहे गये हैं। तत्त्वसे सब कुछ परमात्मा ही है।इस लक्ष्य को बताने के लिए ही विभूतियाँ कही गयी हैं।

यहां भी भगवानने दैत्य में जो आत्मा है, चौरासी का जो स्वरूप है, उसमें अपनी विभूति बताई  है। फिर से भगवानने सृष्टिरूपसे अपनी विभूति बताएं कि जो जड़-चेतन, स्थावर-जंगम सृष्टि है,उनके आदिमें 'मैं एक ही बहुत वैज्ञानिक हूं'
क्योंकि जो तत्त्व आदि और अन्त में होता है, वही तत्त्व बीच में होता है। अंत में अंतिम श्लोक में ईश्वरने बीज-(कारण-) रूपसे अपनी विभूति बताता है कि मैं ही सब बीज हूं, मेरे बिना कोई भी जीव नहीं है। इस प्रकार तीन जगह--तीन श्लोकों में मुख्य विभूतियाँ बताई गई हैं और अन्य श्लोकों में जो समुदाय में मुख्य हैं, समुदाय पर अधिपत्य है, जिसमें कोई विशेषता नहीं है, अन्य लेकर विभूतियाँ बताई गई हैं। परन्तु साधकों की मान्यता है कि वह इन विभूतियों की महत्ता, विशिष्टता, सुन्दरता, आदिपत्य आदि की ओर से प्रकट नहीं होता है, प्रत्युत् ये सभी विभूतियाँ भगवान से ही प्रकट होती हैं, इनमें से जो महत्ता आदि है, वह केवल भगवान की है; ये विभूतियाँ भगवत्स्वरूप ही हैं-- इस तरफ खाल राखे। कारण कि अर्जुनका प्रश्न भगवानके चिंतनके विषयमें है किसी वस्तु, व्यक्तिगतचिंतनके विषयमें नहीं।
साधक इन विभूतियों का उपयोग कैसे करें? इसमें कहा गया है कि जब साधक की दृष्टि साक्षात की ओर चली जाती है, तब वह 'संपूर्ण साक्षात में आत्मारूपसे भगवान ही हैं'--इस तरह भगवान का चिंतन करें। जब किसी विचारक साधक की दृष्टि रचनात्मकता की ओर चली गई, तब वह 'उत्पत्ति विनाशशील और हरदम परिवर्तनशील सृष्टिके आदि, मध्य और अंत में एक भगवान ही हैं' इस तरह भगवान का चिंतन करें। कभी-कभी 'मुलकी' की ओर उसकी दृष्टि चली जाती है, तब वह बीजरूप से भगवान ही होते हैं, भगवान के बिना कोई भी चराचर नहीं होता और हो भी नहीं सकता'-- इस तरह भगवान का चिंतन करें।
10॥20॥

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 21

श्लोक:
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति।
 एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥

भावार्थ:
वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्ग के साधनरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्म का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामना वाले पुरुष बार-बार आवागमन को प्राप्त होते हैं, अर्थात्‌ पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में जाते हैं और पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते हैं
9॥21॥

👉उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं। और पुनः पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते हैं।तो इस में मुझे कोई अच्छाई नजर नहीं आती।जैसे किसी ऐसे मजदूर जिस की हैसियत ही ना हो कि वह किसी महंगे वाहन में बैठने का सुख प्राप्त कर सके, जब उसी मजदूर की जरूरत किसी महंगे वाहन के मालिक को होती है तो वह उसे अपने महंगे वाहन में बिठा कर कार्य स्थल तक छोड़ने को लेकर जाता है।तो समझा जा सकता है कि मजदूर स्वर्ग का सुख भोग रहा है। जैसे ही कार्य स्थल आता है तो उस के स्वर्ग का समय समाप्त होने पर वाहन सुख से वंचित हो पुनः मजदूर की ही भूमिका में आना होता है। तो ऐसे तप ,के प्रयोजन से क्या लाभ?
👉भूतमात्रा के हृदय में स्थित आत्मा मैं ही हूं इस सामान्य कथन के साथ श्रीकृष्ण इस प्रकरण के पात्र हैं। वैज्ञानिक विचारपद्धति से शोध कार्य करने का एक सुप्रशिक्षित सिद्धांत है? शोध के अपने प्रिय विषय की चर्चा एक आदर्श व सर्वपूर्ण कथन के साथ होती है। वह उस विषय का विस्तार से विचार करके युक्तियुक्त विवेचन के अंत में एक ही विशेषज्ञ सिद्धांत के निष्कर्ष पर पहुंचता है।
 (यहां हमने यह भी देखा कि इस मजदूर का स्वर्ग कैसा है) अध्याय के अंत में भगवान के समान विचार को और अधिक संक्षिप्त रूप से दोहराया गया है कि मैं इस संपूर्ण जगत को अपने एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूं। पंक्ति में एक ही भाव को प्रकारान्तर से लिया गया है कि मैं सभी भूतों का आदि हूँ(आरंभ) मध्य और अंत में ही हूँ। वस्तु बाह्य चराचर जगत् मन की प्रक्षेपित सृष्टि है दूसरे शब्दों में जगत् परिच्छन्न मन के द्वारा अनंत का दर्शन किया गया है। इस तथ्य को अंतरिक्ष वैज्ञानिक जगत् से संबंधित भी समझा जा सकता है। प्रत्येक बुद्धिवृत्ति चैतन्य प्रकट होकर उसी में लीन हो जाती है। चैतन्य की कमी में वृत्ति की उत्पत्ति नहीं हो सकती। आगे भी इसी विचार को परिभाषित किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण इस महान सत्य को कभी नहीं थकने देते चलता ही रहने देते हैं।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 21

श्लोक:
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌।
 मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥

भावार्थ:
मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ
 10॥21॥
मैं आदित्यों में विष्णु हूं वैदिक परंपराओं में आदित्यों की संख्या कहीं पांच तो कहीं नहीं बताई गई है। ये आदित के पुत्र थे। बैच पारम्परिक विश्वास के अनुसार संख्या में कितने अंक दिए गए? जो बारह मास के सूचक हैं। विष्णु पुराण के अनुसार विष्णु को एक आदित्य कहा जाता है। जो अन्य आदित्यों की विशिष्टता में श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण है। मैं सूर्य को आधुनिक भौतिक विज्ञान में भी सूर्य को समस्त ऊर्जाओं के स्रोत के रूप में स्वीकार करता हूं। अत भगवान के कथन का अभिप्राय स्वतः स्पष्ट है। कहाँ भी कोई ऊर्जा अभिव्यक्ति होती है उनका स्रोत आत्मा ही है। मुख्य वायु देवताओं में मरीचि हूँ वायु के अधिष्ठाता देवता मरु कहलाते हैं प्रोपोज़ संख्या उनचास कहा गया है। इन में मरीचि नामक मरुत मैं हूं। मरुतगण रुद्र पुत्र माने गए हैं। ऋग्वेद के अनुसार मरीचि उनमें प्रमुख हैं। मैं नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ भारतीय खगोल शास्त्र में किस अर्थ में नक्षत्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है वह चन्द्रमा के मार्ग के तीन नेपोलियन का सूचक है। इस दृष्टि से विश्व में चन्द्रमा का यह मार्ग भगवान की विभूति की ही एक अभिव्यक्ति है और चन्द्रमा उनमें सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह नियंत्रक और मानक है और तेज में भी पूर्व है। परंतु हम नक्षत्र शब्दों से सामान्य अर्थ को भी स्वीकार कर सकते हैं। जिसके अनुसार रात के समय आकाश में जड़ते हुए छोटे छोटे चमकते हुए तारे ही नक्षत्र दिखाई देते हैं। कुछ व्याख्याकार एक पेज आगे कहते हैं कि नक्षत्र शब्द रात्रि के सभी प्रकाशों का सूचक है। चिंतन के लिए उपयोगी होने से यह अर्थ भी सीख सकता है। रात के समय एक छोटी सी कुटिया से लेकर संसद भवन तक को चमकाने वाले चन्द्रमा का प्रकाश शीतल शांतिप्रद और गौरवमय होता है। ठीक उसी प्रकार आत्मा का प्रकाश भी अतुलनीय है। यहाँ बाइस श्लोक की क्या विशेषता है भगवान श्रीकृष्ण कुल पचहत्तर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनका उद्देश्य ज्ञानयोग के मार्ग पर चलने वाले साधक की सहायता करना है। यहां उक्त उपासनाओं के द्वारा साधकगण अपने मनबुद्धि को सुगठित करके चित्त की एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं। ध्यान के लिए उपयोगी ये पचहत्तर अभ्यास हैं।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 22

श्लोक:
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
 इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥

भावार्थ:
मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात्‌ जीवन-शक्ति हूँ
 10॥22॥मैं वेदों में सामवेद हूँ ऋग्वेद का सार ही सामवेद है। चारों वेदों में ऋग्वेद का स्थान सबसे प्रमुख है। सामवेद को छान्दोग्योपनिषद में सुन्दरता से गौरवान्वित किया गया है। सामवेद में संगीत का विशेष आनंद भी कहा है। क्योंकि साम मन्त्रों को सुन्दर राग सुर और लय में चला जाता है जो इस बात के प्रमाण हैं कि संगीत की इस सुंदर और शक्तिशाली कला को हमारे प्रिय ने इतना अधिक विकसित किया था। इस उपमा केन्दर सौय के द्वारा हम क्या कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण संगीत की आत्मा हैं।
 जैसे ऋग्वेद का सार सामवेद है। मैं देवताओं में इंद्र हूं स्वर्ग के निवासी देवों का राजा वासव इंद्र है। यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि क्या वैदिक सिद्धांत के अनुसार रहमानाशन का सर्वोच्च स्तर स्वर्ग में है। लेकिन वहां भी देवताओं में श्रेष्ठता और साक्षातता का तारतम्य होता है। स्वर्ग की प्राप्ति इस लोक में हुई है पुण्य कर्मों की प्राप्ति और इसी कारण से जिस पुरुष ने यहां अधिक पुण्य अर्जित किया होगा। उसे वहां श्रेष्ठतर भोगों की प्राप्ति होगी। इस नियम के अनुसार उन सभी देवों के जीवन की प्रबल इन्द्र का जीवन अधिक वैभव एवं विलासपूर्ण तथा शक्तिशाली एवं समर्थ होना स्वभाव के अनुरूप स्वाभाविक ही है।
 देवताओं में इन्द्र मैं हूँ अन्य देवों का शासक और नियंता कौन है? जिससे उनका जीवन सुखी एवं समृद्धशाली होता है। मैं इन्द्रियों में मन हूँ आधिदैविक दृष्टि से इन्द्र कहते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से कौन सा मन का विशेषज्ञ है। क्योंकि देव शब्द का अर्थ इन्द्रिय होता है। इंद्र देवताओं का राजा कैसा है, वैसे ही मन इंद्रियों का राजा है। मन के बिना इन्द्रियों का स्वतन्त्र रूप से व्यापार नहीं किया जा सकता। इसलिए यहां कहा गया है कि मैं इंद्रियों में मन हूं।
 जगत् की संपूर्ण सृष्टी वस्तु में सर्वोच्च एवं अद्भुत वस्तु है। यह एक ऐसी रहस्यमयी शक्ति है। इस विषय में आधुनिक वैज्ञानिक एक काल्पनिक और काल्पनिक धारणा बनाने के अतिरिक्त कुछ विशेष ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 23

श्लोक:
रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌।
 वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌॥

भावार्थ:
मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ
 ॥23॥
यहां हर, बहुरूप, त्र्यम्बक आदि बारह रुद्रोंमें शम्भु अर्थात् शंकर सर्वाधिपति हैं। ये कल्याण प्रदान करने वाले और कल्याण प्रदान करते हैं। इस लिए भगवान ने भगवान की विभूति बताई है।
कुबेर यक्ष तथा राक्षसों के अधिपति हैं तथा राक्षसों के अधिपति के पद पर नियुक्त किये गये हैं। सब यक्ष राक्षसों में मुख्य हैं ये भगवानकी विभूतियाँ हैं।
धर, ध्रुव, सोम, आदि आठ वसुओंमें अनल अर्थात पावक (अग्नि) सार्वभौम अधिपति हैं। ये सब देवताओं को यज्ञकी हवि मनुष्यवाले तथा भगवानके मुख हैं। इसलिए भगवान ने अपनी विभूति बताई है।
सोने, चाँदी, ताँबे आदिके शिखरोंवाले पर्वत हैं, उनमें सुमेरु पर्वत मुख्य है। यह सोने और रत्नोंका भंडार है। इसलिए भगवान ने अपनी विभूतियाँ बताईं। मूलतः इन विभूतियों में भी केवल परमात्मा का ही चिंतन होना चाहिए।
अर्थात:
मैं रुद्रों में शंकर हूं जीवन का अध्ययन करने वाले छात्रों को नाश के अधिष्ठाता देवता के रूप में रुद्र की कल्पना को भलीभांति पुस्तकालय स्मारक कहते हैं। प्रत्येक पर स्कूली (आगामी) रचना का पूर्व नाश होना आवश्यक है। फल को स्थान देने के लिए फूल को नष्ट करना आवश्यक है और बीज को प्राप्त करने के लिए फल को नष्ट करना आवश्यक है। ये बीज पुनरुत्पादन औषधियों को जन्म देते हैं। इस प्रकार प्रत्येक प्रगति एवं विकास के पूर्व प्रेरित विनाश की एक अखण्ड शृंखला बनी हुई है। इस तथ्य को सूक्ष्मदर्शी तत्त्वचिन्तक ऋषियों ने कहा। और ज्ञान की पत्रिका में निर्भय ने विनाश के सुखदायक देवता शंकर को सम्मान देने और उनकी पूजा-अर्चना करने का आह्वान किया। मैं यक्ष और राक्षसों में कुबेर हूं स्वर्ग के धन के पात्र कुबेर कहे जाते हैं। कुबेर शब्द का अर्थ है कुत्सित शरीर वाला। पुराणों में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है कि कुबेर अत्यंत कुत्सित राक्षसी प्राणी है स्थूल एवं ह्रस्व काय (त्रिपाद) तीन दोस्ती वाले विशाल उदर के लघु मस्तक वाले और आठ दांत बाहर निकलने वाले हैं। स्वर्ग के लिए इस समान योग्यता की सहायता के लिए कुरूप भोगवादी और राक्षसचिन्तक यक्ष और राक्षसों की पेशकश है जो कोष रक्षा में कुबेर की सहायता करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि भारतीय ऋषिगण पूंजीवाद के कितने विरोधी थे कि उन्होंने धनपति कुबेर को बेहद हास्यप्रद और विचित्र भाग वाला इतना कुरूप चित्रित किया है कि हममें हास्य भी संभव नहीं है। मैं अग्नि वेदों में आठ वसुओं का वर्णन करता हूं जो ऋतुओं के अधिष्ठाता देवता हैं। छांदोग्य उपनिषद में कहा गया है कि इन वसुओं का मुख अग्नि है। वहाँ मुख से विद्युत अनुभव और भोग के साधन से है। अत आत्मा ही वह स्रोत है हमें सभी ऋतुओं का अनुभव कहां से प्राप्त होता है।बाह्य प्रकृति में छह ऋतुएं हैं? तथा दो ऋतुएँ मन की हैं सुख और दुःख। इस प्रकार यहां आठ सीज़न का निर्देश है। बसंत ऋतु में यदि वियोग के कारण हम दुखी हैं तो उस सीज़न के फूलों में भी हमारे लिए आश्रुधार बहाते हुए विशेष रूप से होते हैं, जबकि मन में सफलता का पूरा आनंद मिलता है। प्रत्येक अनुभव में आत्मचैतन्य की उपस्थिति कैसे हो सकती है? अन्यथा नहीं।मैं सभी पर्वतों में मेरु पर्वत हूँ क्या मेरु एक पौराणिक पर्वत है जिसका प्राचीन हिंदू भूगोल शास्त्र में विश्व के मध्य बिंदु के रूप में वर्णन किया गया है। इस पर्वत के ऊपर देवता वास करते हैं और इसके नीचे सप्तद्वीप भी उभरे हुए हैं रैना यह जगत बना है। मेरु पर्वत की नाव से आठ हजार मील की दूरी तय की गई है जो गंगा से सभी दिशाओं में बहती है। 
इस वर्णन से विभिन्न बौद्ध धर्म का वर्णन क्या है? जो निःदेह ही ठीक नहीं हो सकता हो।
परन्तु हम उसे वस्तुत गूढ़ सांकेतिक भाषा में तत्त्व का वर्णन अगर मानें गे तो। मेरु पर्वत ऐसे प्रभावशाली स्थान का सूचक है जिसका आधार जम्बू द्वीप में है। उच्च शिखर से आध्यात्म ज्ञान की गंगा के लिए समस्त तीर्थों का कल्याण करने के लिए ही प्रवाहित होता है।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 24

श्लोक:
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्‌।
 सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥

भावार्थ:
पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ
 ॥24॥
पुरोहितों में मै बृहस्पति हूँ गुरु ग्रह के अधिष्ठाता बृहस्पति को ऋग्वेद में ब्राह्मणस्पति कहा गया है, जो स्वर्ग के अन्य देवों में अपने पद को स्वतः स्पष्ट कर देता है। देवताओं के वे आध्यात्मिक गुरु भी माने जाते हैं। 
मुख्य सेनापतियों में स्कंद हूं स्कंद को ही कार्तिक स्वामी का नाम कहां से जाना जाता है, जो भगवान शिव के पुत्र हैं। उनका वाहन मृदु है तथा हाथ में वे भाला (बरछा) धारण किये हुए हैं।
 मैं सागर में रहता हूँ इन सभी उदाहरणों में एक बात स्पष्ट है कि भगवान न केवल स्वयं के समष्टि या सर्वातीत रूप को ही बता रहे हैं, वर्ण अपने विषय या वस्तु के व्यापक स्वरूप को भी दिखा रहे है। 

विशेष इस श्लोक में साझा उदाहरण देखें। निःदेह ही गंगाजल का समुद्र के जल से कोई संबंध नहीं दिखता। 

मैं गोदावरी नाम सिन्धु या कावेरी नील टेम्स या संगम जगत के विभिन्न समुद्रों का जल ग्रामों के तालाबों का जल और नहरों का जल व्यक्तिगत रूप से तो सभी स्वतन्त्र हैं उनका उस समुद्र से कोई संबंध भी नहीं है। जो जगत को आलिंगन किए हुए हैं। और फिर भी यह एक सुविदित तथ्य है कि इस विशाल समुद्र के बिना ये सारी नदियाँ और सुझाव बहुत पहले ही सूख जाते हैं। इसी प्रकार की आकृति रचना और अचार वस्तु का अपना स्वतन्त्रता अनुभव होता है सत्य के कोट समुद्र से सतही दृष्टि से कोई संबंध मौलिक नहीं हो भगवान भगवान ने संदेश दिया है कि इस सत्य के बिना दृश्य जगत ने बहुत पहले ही अपनी राय व्यक्त की थी। इस विचार का विस्तार करते हुए कहा गया है। कि सभी नदिया नाले समुंदर की ओर ही बढ़ते है।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 25

श्लोक:
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌।
 यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥

भावार्थ:
मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जप यज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ
 10॥25॥
 मैं महर्षियों में भृगु हूँ इसी अध्याय में बताए गए सप्तऋषियों में भृगु ऋषि प्रमुख हैं। भृगु मनु के पुत्र माने गए हैं जो मानव धर्मशास्त्र का वर्णन करते हैं। 
मुख्य शब्दों में एकाक्षर ओंकार हूँ शब्द अपने विचार को व्यक्त करने के लिए ध्वनि के संकेत हैं। एक वक्ता अपने मन के भावों को शब्दों के द्वारा व्यक्त कर नन्हें भावों को मन में जगाता है।
जैसे टमाटर शब्द एक पदार्थ का पता है। जिस कथन से समान टमाटर से परिचित लोगों के मन में आकार की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।
 यदि वक्ता से यह पाया जाता है कि इस शब्द के उद्घोष से अर्थ का बोध नहीं हुआ है तो फिर उसे अनेक वाक्यों द्वारा उस वस्तु का वर्णन करके अर्थ बोध का ज्ञान  कराते है। उस सीमा तक जब वह वक्ता टमाटर के रूप में,उसका रंग, स्वाद और अन्य मसालों के संबंध में श्रोता के मन में चित्र क्या है स्पष्ट नहीं हो जाता। उस सीमा तक की कलाकृति को उसके प्रतिपाद्य विषय का ज्ञान होगा। इस प्रकार सामान्यतः कोई भी भाषा ऐसे शब्द से ही पूर्ण होती है।
 हमारे कौन से शास्त्र और विचारधारा को व्यक्त किया जा सकता है और अन्य को बोधगम्य बनाया जा सकता है। तो ऋषियों ने एक ऐसे शब्द की कल्पना की जो नित्य वस्तु का सूचक या वाचक हो। वह शब्द है  जिसे ओंकार या प्रणव भी कहते हैं। वेदमंत्रों में प्रणवमंत्र महानतम है तथा आध्यात्मिक जगत में आज तक साधकों के ध्यान के लिए आलंबन के रूप में इस शब्द प्रतीक का प्रयोग किया जाता है। 
मैं यज्ञों में जपयज्ञ हूं ,जप एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक साधना है। किसी भी एक मंत्र के जप की सहायता से साधक अपने मन में एक इष्ट देवता की अखण्ड परम्परा कायम रखता है। 
वही कर्म भक्ति या ज्ञान के मार्ग में भी साधक का प्रयास यही होता है कि मन में एक जातीय वृत्ति धारा बनी रहे वह कर्मकांड की पूजा के द्वारा हो या ध्यान से। इस प्रकार सभी साधनाओं में किसी के भी रूप में। इसी परम्परा की  प्रथा है। क्या आपके मन्त्र जप में कोई सन्देह नहीं है?
 किसी अन्य उपकरण के रूप में वह अन्य उपकरणों का भी अंतरतम केंद्र है। इस प्रकार यहाँ जप,यज्ञ की प्रशंसा कैसे की गयी है क्योंकि वह आपके साथ एक स्वतन्त्र साधन मार्गदर्शक के रूप में भी काम करता है। अखंड आत्मस्मरण ही पूर्णत्व का अनुभव और बुद्धि का परम शांतिसमाधि का क्षण है। मैं स्थावरों में स्थावर हूं क्या स्थावर का अर्थ है जड़? 
अचेतन वस्तु। पर्वत किसे कहते हैं मिट्टी और चट्टानें पेड़ और उनका उपाय क्या है? 
पशु और पक्षी जो प्राकृतिक शक्तियों के वैभव के साथ जा मिलते हैं। जैसे सनसनाती गड़गड़ाहट की आवाज आई तो तूफ़ान होगया, मेघों को चीर कर गई बिजली की गड़गड़ाहट शांत घाटियों से कल कल गा कर रवाना हुई नदियाँ, शांत झील और झील, नील वर्ण आकाश और गिरि योगों को स्नेह से अपने हृदयों में प्रतिबिम्बित करते हुए निस्तब्ध बताते हैं, ये सब संयुक्त रूप में पर्वत हैं। अब भगवान कहते हैं सभी पर्वतों में मैं हिमालय हूँ। निश्चय ही वह हिमालय को उसके विशेष गुण के कारण अधिक गौरव और दिव्य प्रतिष्ठा प्रदान कर रहे है। जगत के सभी पर्वतों की सर्वथा विपरीत भारत में हिमालय के ऐसे गुप्त रहस्य मय योग हैं जहाँ मनुष्य ने अपने विचारों की शक्ति के आधार पर बुद्धि के अतिरिक्त तत्त्व का अनुभव करने के लिए अपने प्रयोग में सफलता पायी है। जो मक़सद के इतिहास में उसके पूर्व किसी ने नहीं पाया था।इससे भी जब संतुष्ट न हुआ भगवान श्रीकृष्ण और अधिक उत्साह के साथ अन्य सुन्दर उदाहरणों के द्वारा अपने अनंत वैभव को दिव्य बुद्धि के वयोवृद्ध मित्र अर्जुन को समझाते हुए आगे कहा गया है कि।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 26

श्लोक:
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।
 गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥

भावार्थ:
मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।
 ॥26॥
जैसे पीपल एक सौम्य वृक्ष है। इसके नीचे हरेक वृक्ष का निशान, और यह पहाड़, मकान की दीवार, छत आदि कठोर स्थानों पर भी पैदा होता है। पीपल के पेड़ की पूजा की सबसे बड़ी महिमा है। आयुर्वेद में बहुत से फूलों का नाश करने की शक्ति पीपल के पेड़ में बताई गई है। इन सब दर्शनों से भगवान ने पीपलको अपनी विभूति बताया है।
इसी प्रकार देवर्षि भी कई हैं और नारद भी कई हैं; पर 'देवर्षि नारद' एक ही हैं। ये भगवान मान के जीवित हैं और भगवान मान के जैसी लीला करते हैं
जो पहले से ही कलाकार की भूमिका तैयार कर देते हैं। इसलिए नारदजीको भगवान का मन कहा गया है। ये सदा वीणा लेकर भगवानके गुण गाते हुए दिखते रहते हैं। वाल्मिकी और व्यासजी को उपदेश देने वाले रामायण और भागवत-गीत ग्रंथों के लेखन-कार्यों में प्रोवृत्तवाले भी नारदजी ही हैं। नारदजी की बातें मनुष्य, देवता, असुर, नाग आदि सभी विश्वास करते हैं। सभी पुरानी बातें मानते हैं और आज्ञा देते हैं। महाभारत आदि ग्रंथों में अनेक अनेक पहलुओं का वर्णन किया गया है। यहां भगवान गणेश की विभूति बताई गई है।क्यों कि हमने जरूर देखा है। कि नारद द्वारा किसी को कुछ भी बताते ही श्रीगणेश हो जाता है।
स्वर्गके गायकोंको गंधर्व कहते हैं और सभी गंधर्वोंमें चित्ररथ मुख्य हैं। अर्जुनके साथ युसुकी मित्रता रही और अलोचना ही अर्जुनने गणविद्या सीखी थी। गणविद्यामें अत्यंत विलक्षण और गंधर्वोंमेंमुख्यहोनेसेभगवान् भगवानकी अपनी विभूति बताई गई है।
अब सिद्ध दो तरह के होते हैं--एक तो साधन करके सिद्ध होते हैं और दूसरा दो तरह के सिद्ध होते हैं। कपिलजी डॉयट सिद्ध और जादूगर आदिसिद्ध कहे जाते हैं। ये कर्दमजीके यहां देवहुतिके गर्भसे प्रकट हुए थे। ये सांख्यके आचार्य और संपूर्ण सिद्धोंके गणगण हैं। इसलिए भगवान ने अपनी विभूति बताई है। इन सभी विभूतियों में जो विलक्षणता है, वह मूलतः, तत्त्वतः भगवान की ही है। असल में साधककी, दृष्टि भगवान में ही रहती है।
अर्थात संपूर्ण वृक्षों में पीपल, देवर्षियों में नारद, गंधर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि मैं हूं।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 27

श्लोक:
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌।
 एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌॥

भावार्थ:
घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा मुझको जान
 ॥27॥
समुद्रमंथनके समय प्रकट होनेवाले चौदह रत्नोंमें उच्चैःश्रवा घोड़ा भी एक रत्न है। यह इंद्रका वाहनों और संपूर्ण घोड़ों का राजा है। इसलिए भगवान ने अपनी विभूति बताई है।
हाथियोंके समुदाय में जो श्रेष्ठ होता है, उसे गजेंद्र कहते हैं। ऐसे गजेन्द्रों में भी ऐरावत हाथी श्रेष्ठ है। उच्चश्रवा घोड़े की तरह ऐरावत हाथी की उत्पत्ति भी समुद्र से हुई है और यह इंद्र भीका वाहन है। इसलिए भगवान ने अपनी विभूति बताई है।
संपूर्ण प्रजा का पालन, संरक्षण, शासन करने वाला होने से राजा संपूर्ण रूप से श्रेष्ठ है। साधारणतया स्पष्ट राजा में भगवान की अधिकांश शक्तियाँ होती हैं। इसलिए भगवान ने राजाको अपनी विभूति बताई है  ।इन विभूतियों में जो बलवत्ता है, दृढ़ता है, वह भगवान से ही आया है, अन्यथा भगवानकी ही प्रसिद्ध भगवान का चिंतन करना है।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 28

श्लोक:
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌।
 प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥

भावार्थ:
मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ
 
।।10.28।। मैं शस्त्रों में वज्र हूं दिव्यास्त्रों में प्रमुख वज्रास्त्र अमोघ है। वृत्रासुर प्राय: स्वर्ग पर आक्रमण करके वहां की शांति भंग की गई थी। अपनी प्रचंड शक्ति के कारण वह अवध्य बन गया था। उस समय दधीचि नाम के एक महान तपस्वी ऋषि ने अपनी अस्थियों का दान एक दिव्य शस्त्र बनाने के लिए किया था जिससे इस अस्त्र का निर्माण करके वृत्रासुर का वध किया गया। 
मैं धेनु में कामधेनु हूं मैं कामधेनु की प्राप्ति भी अमृतमंथन से हुई थी। ऐसा माना जाता है कि यह एक अनोखा अवेलेबल गाय है जिसके द्वारा हम अपने सभी निबंधों की अनुमति दे सकते हैं। 

प्रजोत्पत्ति के आधार पर मैं कामदेव हूं। भारतीय धारणा के अनुसार काम का देवता क्या है?
(कामदेव को प्रभाषित करने के लिए, मैं उनकी महिमा और शक्ति का वर्णन करना चाहूंगा:

"हे कामदेव, आप प्रेम और आकर्षण के देवता हैं। आपकी शक्ति इतनी महान है कि आप समस्त संसार को आकर्षित कर सकते हैं। आपके बाण इतने शक्तिशाली हैं कि वे किसी भी व्यक्ति को प्रेम में पड़ने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

आपकी महिमा इतनी व्यापक है कि आप समस्त संसार में पूजे जाते हैं। आपकी शक्ति इतनी महान है कि आप किसी भी व्यक्ति को प्रेम में पड़ने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

हे कामदेव, मैं आपकी महिमा और शक्ति का वर्णन करने में असमर्थ हूं। आपकी महिमा इतनी व्यापक है कि वह मेरी शब्दों में नहीं बंध सकती।")
 

जो एक कुटिल हस्तपुस्तक युवा के रूप में चित्रित किया गया है। यह कामदेव अपनी मंदस्मृति के धनुराशि द्वारा पाँचवें सुपुष्पित बाणों से मनुष्य की एक इंद्रिय को प्रभावित करता है यह जीव विज्ञान से संबंधित एक सत्य है। प्रजोत्तपत्ति माने केवल गर्भाधान की क्रिया या वनस्पति जगत में होने वाली सेचन क्रिया ही नहीं समझी जानी चाहिए। भारतीय कामशास्त्र के अनुसार इसका अर्थ उन सभी उचक्के प्रवृत्तियों की शांति से है जो सभी इंद्रियों के माध्यम से बातचीत करते हैं। एक सैद्धांतिक वैज्ञानिक वैज्ञानिक होता है और इस कारण से वह मिथ्या लज्जा या आर्द्र नहीं होता है जो प्रायोरिटी से वर्जिनिया बराक दिखावे के लिए कट्टरपंथी कट्टरपंथी वातिलकधारी पाखंडी लोगों का होता है। वेदांत के आचार्य कामवासना के संबंध में विश्लेषण करते समय इस प्रकार निर्मम होते हैं जैसे मेडिकल शास्त्र के कॉलेज में कोई प्रोफेसर। वैश्यिक भोग के क्षेत्र में कामदेव मानव के शारीरिक मानसिक एवं बहुमूल्य व्यक्तित्व के पूर्ण संतोष का प्रतीक है।

 हालाँकि यह सर्प शिवजी की अंगूठी का आकार हटाने योग्य छोटा है।लेकिन क्षीरसागर के मंथन के लिए वह रज्जु (रस्सी) का कार्य करने के लिए उपयुक्त होता है। स्वभाव ही वासुकि शब्द से उपनिषद के उस कथन का स्मरण होता है जिसमें कहा गया है कि आत्मतत्त्व पदार्थ से भी सूक्ष्म है और बृहत्तम पदार्थ से भी अधिक बृहत् है। अत: सर्पों में वासुकि को भगवान की विभूति शोभा देती है। सर्प और नाग में अंतर है। 
सर्प एक फैन वाला होता है जबकि नाग के अनेक फन होते हैं। गीता के दिव्य गायक अपने सुन्दर राग में अपने गणपूर्ण विभूतियों को और भी शिष्य हैं।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 29

श्लोक:
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌।
 पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्‌॥

भावार्थ:
मैं नागों में (नाग और सर्प ये दो प्रकार की सर्पों की ही जाति है।) शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ
 ॥29॥

।।10।29. मैं नागों में शेषनाग (अनंत) हूं, अनेक फन वाले सर्प नाग कहलाते हैं। उन नागों में सहस्र प्रशंसकों वाले शेषनाग को भगवान विष्णु की शय्या कहा गया है जिस पर वे अपनी योगनिद्रा में विश्राम या शयन करते हैं। यहां श्रीकृष्ण कहते हैं कि नागों में कितने फैन हैं वे सबसे शक्तिशाली और दिव्य नाग हैं क्योंकि वे एकमात्र अधिष्ठान हैं जिस पर सृष्टकर्ता ब्रह्मा और उपदेशक विष्णु विश्राम और कार्य करते हैं। मैं जल देवताओं में हूं पंच महाभूतों में चतुर्थ तत्त्व जल का अधिष्ठाता देवता वरुण हैं। वैदिक काल में दृश्य जगत की प्राकृतिक शक्तियों को दैवी सिद्धांतों द्वारा प्रस्तुत करके उनकी पूजा और उपासना की जाती थी। यह तो काफी समय की मूर्तियां हैं, हमारे यहां देवताओं के मानवीकरण की पौराणिक परंपराएं हैं और हम फिर धार्मिक मान्यताओं की समानताएं और सांप्रदायिक संप्रदायों में खो गए हैं। जेरूसलम के मसीहा वृन्दावन के गोपाल और मक्का के पैगम्बर के अज्ञानी भक्त मरने लगे। वरुण के शरीर अर्धमत्स्य और अर्धमनुष्य का वर्णन किया गया है जो अर्नाल्ड के मरमन (मत्स्यपुरुष) के समान है, वरुण समुद्र के शासक और जल के अधिष्ठाता देवता हैं। मैं पितरों में अर्यमा हूं हिंदू धर्म में मृत्यु भी जीवन का ही एक अनुभव है। सूक्ष्म शरीर को हमेशा के लिए अपने वर्तमान निवास स्थान रूपी स्थूल देह में त्याग कर चला दिया जाता है। यह सूक्ष्म शरीर (जीव) का अपना अलग अनुभव बना रहता है? कौन से पितर कहते हैं? ये पितर (अथवा प्रेतात्माएं) एक साथ किसी लोक में विशेष रहते हैं? जिसे पितृलोक कहा जाता है। इसके पूर्व हम बारह आदित्यों के संबंध में वैदिक सिद्धांत को देख चुके हैं? जो बारह महीने की अधिष्ठाता हैं। उनमें से एक अर्यमा नामक आदित्य को इस पितृलोक का शासक कहा गया है। मुख्य समर्थकों में यम हूं यमराज मृत्यु के देवता हैं। भारत में? हम उग्रता उदासी और दुखान्त को भी पूजते हैं? क्योंकि हम जानते हैं कि ईश्वर शुभ और अशुभ आनन्दप्रद और दुःखप्रद सभी तीर्थों का अधिष्ठान है। हम किस तरह के सिद्धांत से संतुष्ट नहीं होते जिसमें हम ईश्वर की उस वस्तु से कोई संबंध स्वीकार नहीं करते? जो हमें पसंद है या नहीं हो मृत्यु तत्त्व ही हमारे जीवन का सिद्धांत और प्रमाण है। मृत्यु ही प्रत्येक क्षण प्रगतिशील क्षेत्र की तैयारी के लिए प्रोत्साहन विकास किया जाता है। युवा संस्था की अभिव्यक्ति के लिए बाल्यावस्था का अंत होना आवश्यक है। कॉलेज में प्रवेश के लिए कॉलेज हाई स्कूल का त्याग करना होता है। प्रगति आपके जीवन में वास्तविक आंशिक चित्र और जीवन की संपूर्ण गति का एकांगी दर्शन है। प्रत्येक विकास के पूर्व नाश अवश्य होता है। इस प्रकार नैश का सिद्धांत, प्रगति में योगदान, मृत्यु की रचनात्मक कला कहलाती है। किसी भी भौतिक वस्तु की वर्तमान स्थिति का नैश किसी नवीन वस्तु के निर्माण के बिना नहीं जा सकता। भौतिक जगत के इस नियम को समझने से ही हम इस युक्तिसंगत निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। निरीक्षित नियम यह है कि कोई भी दो वस्तुएँ एक ही समय में एक ही स्थान पर एक साथ नहीं रह सकतीं। जब एक चित्रकार पैट पर फूल का चित्र बन रहा है? तब वह केवल विभिन्न रंगों का ही प्रयोग नहीं करता है वर्न उसकी कंसर्ट कला का नमूना उस पैट के सतह की पूर्व अवस्था को भी नष्ट करता है। इस प्रकार? जब जीवन को सम्पूर्णता में देखा जाता है? टैब से पता चलता है कि मृत्यु के देवता का भी क्या महत्व है धीरे-धीरे कि सृष्टि के देवता का। सृष्टि के साथ-साथ एक ही गति से यदि मृत्युउत्कृष्ट कार्य नहीं कर रही है? तो जगत् में वस्तू की गांठ और अनियंत्रित बाढ़ उत्पन्न हो गई। उस स्थिति में वास्तुशिल्प की संख्या एवं परिमाण के कारण ही जीवन पर प्रभाव पड़ता है। यदि मृत्यु नहीं होती? तो हमारे पूर्व के सबसे बड़े देवता के पितामह आदि अभी भी हमारे दो मूर्ति वाले घरों में रह रहे हैं जब कुछ ही मात्रा में जनसंख्या में वृद्धि होने पर प्रकृति का संतुलन और जगत की राजनीतिक शांति अस्तव्यस्त हो जाती है? यदि सृष्टिकर्ता के समान मृत्यु देवता भी कार्य नहीं कर रहे हैं तो जगत् की क्या स्थिति होती है सभी प्रमाण पत्रों में यमराज प्रमुख हैं और उदाहरण के तौर पर अत्यंत सुंदर एवं अद्वितीय हैं। भगवान आगे कहते हैं
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 30

श्लोक:
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्‌।
 मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्‌॥

भावार्थ:
मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय (क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास आदि में जो समय है वह मैं हूँ) हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ
 ॥30॥
जो दितिसे उत्पन्न हुए हैं, उनको दैत्य कहा गया है। उन दैत्यों में प्रह्लादजी मुख्य हैं और श्रेष्ठ हैं। ये भगवानके परम विश्वासी और निष्काम प्रेमी भक्त हैं। इसलिए भगवान ने 'देवताओं में प्रह्लाद मैं हूं' ऐसा वर्तमानका प्रयोग किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान के भक्त नित्य रहते हैं और श्रद्धा-भक्तिके के अनुसार दर्शन भी दे सकते हैं। उनके भगवान में लीन हो जाते हैं बाद में यदि कोई उन्हें याद करता है और उनके दर्शन करना चाहता है, तो उनके रूप धारण करके भगवान  दर्शन देते हैं।

ज्योतिष-शास्त्र में काल-(समय-) से ही आयुकी गणना होती है। इसलिए क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास, वर्ष आदि गणना करने से संगीत में काल भगवान की विभूति होती है।

बाघ, हाथी, चीता, रीछ आदि पशु भी हैं, उन सबमें सिंह बलवान, युवा, दीर्घ, शूरवीर और वीर हैं। यह सब सीता का राजा है। इसलिए भगवान ने अपनी विभूति बताई है।

विनायके पुत्र गरुड़जी संपूर्ण पक्षीके राजा हैं और भगवानके भक्त हैं। ये भगवान विष्णुके वाहन हैं और जब ये उड़ते हैं, तब तेरह राफेल से स्वतः सामवेद की ऋचाएं ध्वनित होती हैं। इसलिए भगवान ने अपनी विभूति बताई है। इन सभी विभूतियों में अलग-अलग रूपसे जो बताया गया है, वह तत्त्वतः भगवानकी ही है। इसलिए अन्य दृष्टि से जाना ही स्वतः भगवान का चिंतन होना बनता है।
देवताओं में प्रह्लाद हूँ, बोलचाल में बालक भक्त प्रह्लाद की कथा अत्यंत प्रसिद्ध है। प्रह्लाद हिरण्यकशिपु नामक दैत्य राजा का पुत्र था। जिसे भगवान हरि में अटूट श्रद्धा और दृढ़ भक्ति थी। इसके लिए ईश्वरद्वेषी हिरण्यकश्यपु ने अनेक प्रकार की यतनाएँ दीं  जिन को बोस प्रह्लाद ने सहन किया लेकिन भक्ति को नहीं छोड़ा।मैं गणना करने वालों में काल हूं भारत के सिद्धांतों में नैय्यायिकों का अपना विशेष स्थान है। वे सृष्टि की विविधता को सत्य स्वीकार करते हैं, ईश्वर की मान्यता का निषेध करते हैं। केवल मूल्यवान तर्कों के द्वारा वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि काल ही नित्य तत्त्व है। व्यष्टि मन और बुद्धि ही काल के विभाजक हैं जो लोग भूत, वर्तमान और भविष्य की कल्पना करते हैं। उनके मत के अनुसार मन का यह खेल ही काल का विभाजन इस प्रकार करता है कि मनो काल कोई खंडित और परिच्छिन्न तत्त्व हो। इस सम्भावना से इसी सिद्धांत को ध्यान में रखना चाहिए। महर्षि व्यास ने बहुविध रचना के अनंत अधिष्ठान का उदाहरण भी दिये है। कुछ व्याख्याकार हैं। जो लोग इसे एक सरल कथन के रूप में स्वीकार करते हैं, क्या वे उनके अनुसार हैं समझना जरूरी है? अनादि अनंत काल ही इस जगत् की विद्या की अंतिम गति है। सिंह अपनी महानता प्रतिष्ठा एवं पौरूषता के कारण मृगराज सैनिक हैं। गरुड़ को पक्षियों का राजपद से मिलने का कारण क्या है? 
इसकी सूक्ष्मदर्शिता एवं सर्वाधिक टेलीकॉम तक उड़ान भरने की क्षमता। गरुड़ को भगवान विष्णु का वाहन कहा गया है।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 31

श्लोक:
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌।
 झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥

भावार्थ:
मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ
 ॥31॥
वायुसे ही सभी पदार्थ पवित्र होते हैं। वायुसे ही निरोगता आती है। मूलतः भगवान ने पवित्र करने वालों में वायुको भगवान ने अपनी विभूति बताई है।
ऐसे तो राम अवतार हैं, साक्षात भगवान हैं, जहां शस्त्र शस्त्रों की गणना होती है, उन सबमें राम श्रेष्ठ हैं। इसलिए भगवानने रामको अपनी विभूति बताया है।
-जन्तुमें मगर सबसे बलवान है। इसलिए जलचरोंमें मगरको भगवानने अपनी विभूति बताया  है।जैसे जल में रह कर मगर से बैर नहीं किया जा सकता उसी प्रकार भगवान की किसी भी विभूति से बैर नहीं हो सकता। अग्नि में जल कर मरने वाले पानी में डूब कर मरने वाले प्रिय के लिए इनका त्याग नहीं हो सकता।

अतः प्रवाह रूप से प्रवाह वाले अवशेष भी नद, नदी, झरने, झरने हैं, उन सबमें गंगा जी श्रेष्ठ हैं। जो भगवान की खुद चरणोदक हैं। गंगाजी अपने दर्शन, स्पर्श आदि से विश्व का दर्शन करने वाली हैं। मरे हुए संगम की अस्थियाँ गंगाजी में स्थापित होकर उनकी सद्गति हो जाती है। इसलिए भगवान ने भगवान की अपनी विभूति बताई है। सच में इन विभूतियों की मान्यता को न भी मानना चाहो भगवान की ही मान्यता  है। क्योंकि इन सबमें जो उपाय है-- महत्ता दर्शन में आती है, वह भगवान से ही आई है। सत्रहवें श्लोक में अर्जुन के दो प्रश्न थे--पहला, भगवान को जानने का उपाय (मैं आपको कैसे जानूं) और दूसरा, दर्शन के उपाय (किन-किन भावों में मैं आपका चिंतन करूँ।'' इन दोनों में से एक उपाय तो है-- विभूतियों में भगवान का चिंतन करना और उस चिंतन का फल (परिणाम) होगा-- सभी विभूतियों के मूल में भगवान का चिंतन करना। जैसे, शस्त्र शस्त्रों में श्रीरामको और वृष्णियों में वासुदेव-(अपने-) को भगवान ने अपनी विभूति बताई। यह तो उस समुदाय में विभूति रूप से श्री राम का और वासुदेव का चिंतन करने के लिए बताया गया और उनके चिंतन का फल होगा-- श्रीराम को और वासुदेव के तत्त्व से भगवान को जानना। यह चिंतन करना और भगवान्को तत्त्वसे सभी विभूतियों के विषय में जानना है।

संसार में जहां-जहां भी कुछ विशिष्टता, विलक्षणता, सुंदरता दिखती है,वस्तु-व्यक्तित्व की विशिष्टताएं निहित होती हैं अर्थात मनुष्य की विशिष्टताएं संसार की संरचना में शामिल होती हैं। इसलिए भगवान ने यहां ह्यूमन मित्रता के लिए यह बताया है कि तुम लोग उस शानदार सुंदरता आदि को ऑब्जेक्ट-पर्सनैलिटी मत मानो, प्रत्युत मेरी और मेरे से ही आई हुई मानो। ऐसा मेरा चिंतन करोगे तो विदेशी दुनिया का चिंतन तो छूट जाएगा और उस जगह मैं आ जाऊंगा। इसका परिणाम यह होगा कि तुम लोग मेरे को तत्त्व से जान कर। मेरेको तत्त्वसे पर दर्शन मेरे में पवित्र भक्ति में लीन हो जायेगे।

मैं पवित्र रंगों में वायु हूं, किसी भी स्थान पर सूर्य और वायु के समान प्रभावी अन्य कोई स्वास्थ्यवर्धक और अपूटिक (घव को खिलाने से निषेध वाली औषधि) साधन उपलब्ध नहीं है। यदि यहाँ केवल वायु का ही उल्लेख किया गया है तो इसका कारण यह है कि ज्योतिषी जानते हैं कि सूर्य की ऊष्मा में ही वायु की गति हो सकती है। सदाबहार वायु कहाँ से निकलती है वहाँ सूर्य का होना भी सिद्ध होता है। किसी गुफा में न तो सूर्य का प्रकाश होता है और न ही वायु का स्पंदन। मुख्य कवि धारियों में राम हैं भारत के आदि महर्षि बाल्मीकि ने रामायण के नायक मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र का चित्रण एक संपूर्ण काव्य की छंद रचना के लिए किया है। यह चित्र अत्यंत विस्तृत एवं अलौकिक है? जिसमें श्री राम के संपूर्ण जीवन में एक पूर्ण पुरुष का रूप दर्शाया गया है। श्रीराम एक पूर्ण एवं आदर्श पुत्र, पति, भ्राता, मित्र, पर्यवेक्षक, गुरु, शासक और पिता थे। 
सामान्य जनता के दोष तथा अत्यंत उग्रता एवं ब्रह्माण्ड उत्पन्न करने वाली, श्रीराम की पृष्ठभूमि में, श्रीराम की सर्वपाक्षिक पूर्णता एवं उससे भी अधिक चमक उठती है। 
ऐसे में सर्वोत्तम आदर्श पुरुष के हाथ में क्या वह योग्यता है?
 जो उस धनुर्धर को धारण करे जिसमें से सदैव अमोघ बाणों की ही वर्षा होती है। मैं मत्स्यों में मकर और नदियों में बालू हूँ जाह्नु ऋषि की पुत्री क्या कहलाती है जो गंगानदी का एक नाम हैं। आख्यायिका यह है कि एक बार जाह्नु ऋषि ने संपूर्ण गंगा नदी का पान कर उन्हें सुखा दिया था और उत्पाद लोक कल्याण के लिए उसे अपने क्रेन के दरवाजे से बाहर बहा दिया हमने पहले भी देखा था कि गंगा नदी का यह रूप सांकेतिक है। हिंदू लोग गंगा को अध्यात्म ज्ञान या भारत की आध्यात्मिक संस्कृति का प्रतीक मानते हैं। अपने गुरु से प्राप्त ऋषियों की ज्ञान सम्पदा को साधक शिष्य ध्यानाभ्यास के द्वारा यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि यही नदी का आचमन है। ज्ञान के झरने से पान कर ज्ञान पिपासा को शांत करना आदि वाक्यों का प्रयोग सभी समुद्र में भी होता है आख्यायिका में कहा गया है कि इस नदी का उद्गम ऋषि के नाम से जाना जाता है। वास्तव में यह अत्यंत सुंदर काव्यात्मक कल्पना है जो कान का रिश्ता श्रुति से स्थापित होती है। उपनिषद् ही श्रुतियाँ हैं जिसमें गुरु शिष्य संवाद द्वारा आत्मज्ञान का बोध कराया गया है। भारत में समय समय पर आचार्यों का अवतरण होता ही रहते है अपने युग के सन्दर्भ से प्राचीन ज्ञान की पूर्ण व्यवस्था क्या है, यह प्रचार कार्य वे किस प्रकार करते हैं जब उन्होंने स्वयं वैदिक सत्य का साक्षात् अनुभव प्राप्त  किया हो। इस स्वानुभूति के बिना कोई भी श्रेष्ठ आचार्य जगत में इस प्राचीन सत्य का नवीन भाषा में प्रचार करने का साहस भी नहीं करना चाहिए वो पाखंडी ही कहलाएगा। मकर राशि में सर्वाधिक उग्रता के कारण यहां भगवान ने उन्हें अपनी विभूति कहा है।

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 32

श्लोक:
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
 अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ
 10॥32॥
जैसे सर्ग और महासर्ग होते हैं अर्थात् धार्मिकों की उत्पत्ति होती है, उनके आदि मैं भी रहता हूँ, उनके माध्यमों में भी रहता हूँ और उनके अन्तों में भी मैं रहता हूँ। प्रकृति है कि सब कुछ वासुदेव ही है। असल में बड़े पैमाने पर दुनिया को, साज़िशों को देखते ही भगवान की याद आनी चाहिए ।

अर्थात:

सर्ग और महासर्ग वास्तव में हिंदू धर्म में प्रयुक्त शब्द हैं जो भगवान की सृष्टि और उनकी महिमा को दर्शाते हैं।

सर्ग का अर्थ है "सृष्टि" या "निर्माण"। यह शब्द भगवान की सृष्टि को दर्शाता है, जिसमें वे संसार को बनाते हैं और जीवों को उत्पन्न करते हैं।

महासर्ग का अर्थ है "महान सृष्टि" या "महान निर्माण"। यह शब्द भगवान की महिमा और उनकी सृष्टि को दर्शाता है, जिसमें वे संसार को बनाते हैं और जीवों को उत्पन्न करते हैं।

इन शब्दों से यह भाव निकलता है कि भगवान की सृष्टि और उनकी महिमा अत्यधिक महान और अद्भुत है। यह शब्द भगवान की शक्ति और उनकी सृष्टि को दर्शाते हैं, और हमें उनकी महिमा और शक्ति को समझने और उनकी पूजा करने के लिए प्रेरित करते हैं।

जिस विद्या से मनुष्य का कल्याण हो जाता है, वह अध्यात्मविद्या कहलाती है।
दूसरी आस्था होती है कितनी ही विद्याओं को पढ़ने के लिए शेष ही रहता है, लेकिन इस अध्यात्मविद्याके प्राप्तकर्ता पर शिक्षा अर्थात् शेष नहीं रहता है। इसलिए भगवान ने अपनी विभूति बताई है।

👉इनमें जो शास्त्रार्थ किया जाता है, वह तीन प्रकार का होता है--,
(1) जल्प--युक्ति-युक्ति-प्रिसे अपना पक्षा मण्डन और दूसरा पक्ष का खण्डन कर के अपना पक्ष की जीत और दूसरा पक्ष की हानि करने की भावना से जो शास्त्रार्थ किया जाता है कहा जाता है, उपयोग झल्प कहते हैं।
झलप: अर्थात झल्प का अर्थ है "एक छोटी सी चीज़" या "एक छोटा सा हिस्सा"। यह शब्द अक्सर किसी बड़े से हिस्से को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जाता है, जैसे कि एक बड़े पेड़ की एक छोटी सी टहनी या एक बड़े समुद्र की एक छोटी सी लहर।

उपयोग के संदर्भ में, झल्प का अर्थ हो सकता है कि कोई चीज़ या कोई हिस्सा किसी बड़े उद्देश्य या कार्य के लिए प्रयोग किया जा रहा है, लेकिन वह चीज़ या हिस्सा अपने आप में बहुत बड़ा या महत्वपूर्ण नहीं है।

उदाहरण के लिए, "मैंने अपने घर के लिए एक छोटी सी झल्प खरीदी है"। इसमें झल्प का अर्थ है एक छोटी सी चीज़, जैसे कि एक छोटा सा पौधा या एक छोटी सी सजावट।
(2) वितण्डा--अपना कोई भी पक्ष न दीक्षा केवल दूसरा पक्ष खंडन-ही-खण्डन करने के लिए जो शास्त्र किया जाता है, उसका उपयोग वितण्डा कहते हैं।

वितण्डा का भाव :

वितण्डा का अर्थ है "विवाद" या "तर्क-वितर्क"। यह शब्द अक्सर किसी विषय पर चर्चा या बहस को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जाता है, जिसमें दो या दो से अधिक पक्ष अपने विचारों और तर्कों को प्रस्तुत करते हैं।

वितण्डा का भाव यह है कि कोई व्यक्ति या समूह किसी विषय पर अपने विचारों और तर्कों को प्रस्तुत करता है, और दूसरे पक्ष से अपने विचारों और तर्कों को सुनने और उनका जवाब देने की अपेक्षा करता है।

वितण्डा के भाव में अक्सर एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा या चुनौती की भावना शामिल होती है, जहां प्रत्येक पक्ष अपने विचारों और तर्कों को सबसे अच्छा साबित करने की कोशिश करता है।
(3) वाद--बिना किसी पूर्वापेक्षा के केवल तत्त्व-निर्णयके लिए जो शास्त्रार्थ (विचार-विनिमय) किया जाता है उसे वाद कहा जाता है। इसी वाद् को भगवान ने अपनी विभूति बताया है।

वाद का भाव यह है कि कोई व्यक्ति या समूह किसी विषय पर अपने विचारों और तर्कों को प्रस्तुत करता है, और दूसरे पक्ष से अपने विचारों और तर्कों को सुनने और उनका जवाब देने की अपेक्षा करता है।

वाद के भाव में अक्सर एक प्रकार की चर्चा या बहस की भावना शामिल होती है, जहां प्रत्येक पक्ष अपने विचारों और तर्कों को प्रस्तुत करता है और दूसरे पक्ष के विचारों और तर्कों का जवाब देता है।

वाद के भाव के कुछ मुख्य तत्व हैं:

- चर्चा या बहस
- विचारों और तर्कों का आदान-प्रदान
- दूसरे पक्ष के विचारों और तर्कों का जवाब देना
- अपने विचारों और तर्कों को प्रस्तुत करना

वाद का भाव अक्सर शिक्षा, विज्ञान, दर्शन और राजनीति जैसे क्षेत्रों में पाया जाता है, जहां विभिन्न विचारों और तर्कों का आदान-प्रदान किया जाता है।

इस प्रकार के वाद विवाद के बाद जो निकल कर आता है उसका आदि मध्य और अंत ही भगवान है।
👉करले भगवान के दर्शन

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 33

श्लोक:
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च।
 अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥

भावार्थ:
मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्थात्‌ काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ
 10॥33॥
वर्णमाला में पहला अकार आता है। स्वर और विज्ञान--दोनो में अकार मुख्य है। अकार के बिना व्यंजोन का उच्चारण नहीं होता। इस लिए अकार को भगवानने अपनी विभूति बताते है।
जिससे दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर एक शब्द बनता है, इसलिए समसा कहते हैं। समास कई तरह के होते हैं। वे अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुब्रीहि और द्वन्द्व -- ये चार मुख्य हैं। दो शब्दों के समास में यदि पहला शब्द प्रधानता है तो वह 'अव्ययीभाव समास' होता है। यदि ध्याना शब्द प्रधानता है तो वह 'तत्पुरुष समास' होता है। यदि दोनों शब्द अन्य वाचक होते हैं तो वह 'बहुब्रीहि समास' होता है। यदि दोनों शब्दों का अर्थ है तो वह द्वन्द्व समास होता है।
जिस कालका का कभी क्षय नहीं होता अर्थात जो कालातीत है और अनाद-अनंतरूप है, वह काल भगवान ही है।

सर्ग और प्रलयकी गणना तो सूर्य से होती है, महाप्रलय में जब सूर्य भी लीन हो जाता है, तब सर्ग और प्रलयकी गणना तो सूर्य से ही होती है इसलिए सनातन अक्षय काल है।

तीसवें श्लोकके 'कालः कलयतामहम्'  सत्यमें आये कालमें और यहाँ आये 'अक्षय काल'में क्या अन्तर है वहाँका जो 'काल' है, वह एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता, बदलता रहता है। वह काल ज्योतिषशास्त्र का आधार है और उसी से संसारमात्रके समयकी गणना होती है। परन्तु यहाँ जो 'अक्षय काल' है, वह परमात्मस्वरूप कभी नहीं बदलता। वह अक्षय काल अल्ट्रासाउंड खा जाता है और स्वयं ज्यों-का-त्यों ही रहता है यानी इसमें कभी कोई विकार नहीं होता। वही अक्षय कालको यहां भगवान की विभूति बताई गई है। अगले चतुर्थ अध्याय में भी भगवान ने अक्षय कालको अपना स्वरूप बताया गया है।

सब ओर मुख होने वाले भगवान की दृष्टि सभी मठों पर रहती है। मूलतः सभी धारणाएं करने में भगवान बहुत सावधान रहते हैं। किसको कौन-सी वस्तु कब मिलती है, इस भगवान को बहुत बुरा लगता है और समय पर वह वस्तु को लाते हैं। इसलिए भगवान ने अपनी विभूतिरूपसे का वर्णन किया है।

अर्थात: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी विभूतियों का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि वे अक्षय काल हैं, जो कभी नहीं बदलता और जो स्वयं ज्यों-का-त्यों ही रहता है।

यहाँ दो प्रकार के काल की बात की जा रही है:

1. काल: यह वह काल है जो बदलता रहता है और जो ज्योतिषशास्त्र का आधार है। यह काल समय की गणना के लिए प्रयोग किया जाता है।
2. अक्षय काल: यह वह काल है जो कभी नहीं बदलता और जो स्वयं ज्यों-का-त्यों ही रहता है। यह अक्षय काल भगवान की विभूति है और यह कभी नहीं बदलता।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे अक्षय काल हैं और वे सभी मठों पर अपनी दृष्टि रखते हैं। वे सभी धारणाएं करने में बहुत सावधान रहते हैं और वे समय पर सभी वस्तुओं को लाते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 34

श्लोक:
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्‌।
 कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥

भावार्थ:
मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति (कीर्ति आदि ये सात देवताओं की स्त्रियाँ और स्त्रीवाचक नाम वाले गुण भी प्रसिद्ध हैं, इसलिए दोनों प्रकार से ही भगवान की विभूतियाँ हैं), श्री, वाक्‌, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ
 ॥34॥

मृत्यु में हरण होने की ऐसी विशिष्टता होती है कि मृत्यु के बाद यहां स्मृति तक नहीं रहती, सब कुछ अप्राप्त हो जाता है। वास्तव में यह मौलिकता मृत्युकी नहीं है, प्रत्युत् परमात्माकी है। मनुष्य न जाने कितना जन्म ले चुका है। अगर एक जन्मोंकी याद रहती है तो मनुष्य की चिन्मयका, उसका मोहका कभी अंत ही नहीं आता। लेकिन मृत्युके द्वारा विस्मृति होनेसे पूर्वजन्मोंके कुटुंब, अंतिम आदिचिंता नहीं होती। इस तरह की मौत में जो चिंता, मोहो आदि की शक्ति है, वह सब भगवान की है। जिनको मृत्यु के पश्चात भगवान डिलीट कर देते हैं।

अर्थात: इस श्लोक की सरल व्याख्या यह है:

मृत्यु के बाद, हमारी स्मृति और हमारे पूर्वजन्म की यादें सब कुछ खो जाती हैं। यह मृत्यु की विशिष्टता है कि वह हमारी स्मृति और यादों को मिटा देती है।

लेकिन यह मृत्यु की नहीं, बल्कि परमात्मा की मौलिकता है। परमात्मा हमारी स्मृति और यादों को मिटा देता है ताकि हमारा मोह और चिंता खत्म हो जाए।

इस तरह, मृत्यु के द्वारा हमारी स्मृति और यादें मिट जाती हैं, जिससे हमारा मोह और चिंता खत्म हो जाता है। यह परमात्मा की मौलिकता है, न कि मृत्यु की।
 जैसे पूर्वश्लोक में भगवान ने बताया कि सभी धारणा-धारणा करने वाला मैं ही हूं, वैसे ही यहां संकेत हैं कि सभी उत्पन्न होने वाली उत्पत्ति का विकास भी मैं ही हूं। इलेक्ट्रिक्स है कि दुनिया की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने वाला मैं ही हूं।
भाव:भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि  सभी उत्पन्न होने वाली चीजों की उत्पत्ति और विकास का कारण हैं। वे ही हैं यानी वे ही दुनिया की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने वाले  भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सभी चीजों के निर्माण, विकास और विनाश का कारण हैं। वे ही दुनिया को बनाते हैं, उसकी देख भाल करते हैं और अंत में उसे नष्ट भी करते हैं।
जैसे हम आराम करने को बिस्तर लगाते है , फिर हम ही उस को समेट भी देते हैं।

 कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा--ये सातों संसार भर की मित्र में श्रेष्ठ मणि बनी हैं। इनमें से कीर्ति, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा--ये पांच प्रजापति दाक्ष की कन्याएं हैं, 'श्री' महारानी भृगु की कन्या हैं और 'वाक' ब्रह्माजी की कन्याएं हैं।

   कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा -- ये सातों स्त्रीवाचक नाम वाले गुण भी संसार में प्रसिद्ध हैं। सदगुणों को लेकर दुनिया में जो संयुक्त है, प्रतिष्ठा है, उसे कीर्ति कहते हैं।

स्थावर और जङगम -- यह दो प्रकार का ऐश्वर्य होता है। भूमि, मकान, धन, प्लास्टिक आदि स्थावर ऐश्वर्य हैं और गाय, बफ़ेलो, घोड़ा, ऊंट, हाथी आदि स्थावर ऐश्वर्य हैं। इन दोनों में ऐश्वर्योंको 'श्री' कहा गया है।

 जिस वाणी को धारण करने से दुनिया में यश-प्रतिष्ठा होती है और जिससे मनुष्य पंडित, विद्वान व्यक्ति होता है, उसे 'वाक' कहा जाता है।

 पुरानी-समझदारी वाली बात फिर याद आई इन का नाम 'स्मृति' है।

 बुद्धिकी जो प्रतिष्ठित रूप से  धारण करनेकी शक्ति है अर्थात् जिस शक्ति से विद्या ठीक प्रकार याद रहती है, उस शक्तिका नाम 'मेधा' है।

   मनुष्य को अपना सिद्धांत, सिद्धांत आदि पर तारीख रखना और ईसा मसीह न देने की शक्ति का नाम 'धृति' है।

 दूसरा कोई भी बिना कारण अपराध कर दे, तो अपने में दंड देने की शक्ति होने पर भी उसे दंड न दे और उसे लोक-परलोक में कहीं भी उस अपराध का दंड न मिले--

तो इस तरह का भाव रखते हुए उसे माफ कर देने का नाम 'क्षमा' है।

 कीर्ति, श्री और वाक्-- इन तीन मजूदरों के बाहर प्रकट होने वाली विशेषताएँ हैं तथा स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा-- इन चार मिस्टैक गलतियों के अंदर प्रकट होने वाली विशेषताएँ हैं। इन सातों को भगवान ने अपनी विभूति बताया है।

 यहां जो विशेष गुणधर्मों को विभूति रूप से कहा गया है, उसका केवल भगवान की तरफ का लक्ष्य निर्धारित करना होता है। किसी व्यक्ति में ये गुणी दिखायी दे तो उस व्यक्ति की सुविधा न मांग भगवान की ही सुविधा मननी कलाकृतियाँ और भगवान की ही याद आनी कलाकृतियाँ। यदि ये गुण अपने में दिखायी दें तो ग्रान्ट भगवान के ही कलाकृतियाँ, अपने नहीं। क्यों कि यह देवी-(भगवानकी-) विनाशक है, जो भगवान से ही प्रकट होता है। इन गुणों को अपना मान लेने से अभिमान पैदा होता है, जिससे पतन हो जाता है क्योंकि अभिमान संपूर्ण आसुरी-संपत्तिका ज्ञात होता है। जैसे, लोमश ऋषिके श्रापसे काकभुशुण्डि ब्राह्मणसे चांडाल पक्षी बन गया, पर उसे न भय, न किसी प्रकार का दिनता आया और न कोई विचार ही हुआ, प्रत्युत अभिशाप ही हुआ। कारण कि वे इसमें ऋषिका दोष न तृष्णा भगवान्की प्रेरणा ही मानते हैं।
यानी भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा है कि वे कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा के रूप में प्रकट होते हैं।
इन सातों गुणों का अर्थ यह है:
 कीर्ति: प्रसिद्धि और यश
श्री: ऐश्वर्य और समृद्धि
वाक्: वाणी और बोलने की शक्ति
स्मृति: स्मरण शक्ति और याददाश्त
मेधा: बुद्धि और समझ
धृति: धैर्य और स्थिरता
क्षमा: क्षमा और सहनशीलता
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये सातों गुण उनकी विभूतियों के रूप में प्रकट होते हैं और इन्हें अपना मानने से अभिमान पैदा होता है, जिससे पतन हो जाता है।
"सुनु खगेस नहिं कछु ऋषि दूषण।"
"उरप्रेषक रघुबंस विभूषण।।"
"जगत जननी जानकी मातु पावनी।"
"तनु धरनी धरा धरahu दुखावनी।।"

इस श्लोक का भाव यह है:

हे पक्षी! सुनो, ऋषियों को कोई दो
यह श्लोक रामचरितमानस से लिया गया है, जिसमें भगवान राम की महिमा का वर्णन किया गया है।

इस श्लोक में, कवि कहता है कि हे पक्षी! सुनो, ऋषियों को कोई दोष नहीं है। भगवान राम की महिमा ही सब कुछ है।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि जब हम भगवान को सभी वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं और परिस्थितियों के मूल में देखने लगते हैं, तो हमें हर समय आनंद का अनुभव होता है।

यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमें भगवान की महिमा को देखना चाहिए और उनकी कृपा को समझना चाहिए। जब हम ऐसा करते हैं, तो हमें जीवन में आनंद और शांति का अनुभव होता है।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 35

श्लोक:
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्‌।
 मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥

भावार्थ:
तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ
 ॥35॥

भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा है कि सामवेद में बृहत्साम नामक एक गीति है, जो भगवान की स्तुति के लिए प्रयोग किया जाता है।

यह बृहत्साम सामवेद में सबसे श्रेष्ठ होने के कारण भगवान ने अपनी विभूति बताया है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा है कि वे गायत्री छंद के रूप में प्रकट होते हैं।
गायत्री वेदों की एक प्रमुख ऋचा है, जिसे *वेदजननी* भी कहा जाता है। गायत्री में भगवान के स्वरूप, प्रार्थना और ध्यान का समावेश होता है, जिससे परमात्मतत्त्व की प्राप्ति होती है।

गायत्री की महिमा स्मृतियों और शास्त्रों में व्यापक रूप से वर्णित है। इसलिए, भगवान श्रीकृष्ण ने गायत्री को अपनी विभूति बताया है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा है कि वे मार्गशीर्ष महीने के रूप में प्रकट होते हैं।

मार्गशीर्ष महीना हिंदू कैलेंडर का एक महत्वपूर्ण महीना है, जो अक्टूबर-नवंबर के बीच आता है। इस महीने में नया अन्न पैदा होता है, जिससे संपूर्ण प्रजा जीवित रहती है।

इस महीने में नये अन्न की उत्पत्ति के कारण, मार्गशीर्ष महीने में नये अन्न से यज्ञ भी किया जाता है। यह महीना नये वर्ष की शुरुआत का भी प्रतीक है, जैसा कि महाभारत काल में देखा गया था।

भगवान श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष महीने को अपनी विभूति बताया है, क्योंकि यह महीना नये अन्न की उत्पत्ति और नये वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। यह भगवान की कृपा और प्रेम का प्रतीक है, जो संपूर्ण प्रजा को जीवित रखने के लिए नया अन्न प्रदान करते हैं।
👉टिप्पणी:.... सनातनियों का नव वर्ष सनातन धर्म अनुसार भगवान को प्रिय है।👈

भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा है कि वे वसंत ऋतु के रूप में प्रकट होते हैं।
वसंत ऋतु हिंदू कैलेंडर की एक महत्वपूर्ण ऋतु है, जो फरवरी-मार्च के बीच आती है। इस ऋतु में बिना वर्षा के ही वृक्ष, लता आदि पत्र-पुष्पों से युक्त हो जाते हैं। वसंत ऋतु में न ज्यादा गरमी रहती है और न ज्यादा सर्दी, जिससे यह ऋतु बहुत ही सुखद और आनंददायक होती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने वसंत ऋतु को अपनी विभूति कहा है, क्योंकि यह ऋतु प्रकृति की सुंदरता और जीवन की नवीनता का प्रतीक है। वसंत ऋतु में प्रकृति की सुंदरता और जीवन की नवीनता को देखकर मनुष्य को भगवान की महिमा और उनकी कृपा का अनुभव होता है।

इस श्लोक का अर्थ यह भी है कि भगवान श्रीकृष्ण की विभूतियों में से एक वसंत ऋतु है, जो प्रकृति की सुंदरता और जीवन की नवीनता का प्रतीक है। इस ऋतु में मनुष्य को भगवान की महिमा और उनकी कृपा का अनुभव होता है, जिससे वह भगत कर्म भगवान की भक्ति और सेवा में लग जाता है।

आगे महत्व पूर्ण है कि

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 36

श्लोक:
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌।
 जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌॥

भावार्थ:
मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ
 ॥36॥

 व्याख्या यह है:

समाधान--' ऐसा करो और ऐसा मत करो'--यह शास्त्र का विधि-निषेध अर्थ है। ऐसे विधि-निषेध का वर्णन यहां नहीं है। यहां तो विभूतियों का वर्णन है। मैं आपका चिंतन कहां-कहां करूं?' -
अर्जुन के इस प्रश्न के अनुसार भगवान विभूतियों के रूप में आपके चिंतन की बात ही बताई गई है अर्थात भगवान के चिंतन से सहजता से हो जाए, इसका उपाय भगवान विभूतियों के रूप में बताया गया है। मूलतः जिस समुदाय में मनुष्य रहता है, उस समुदाय में जहां दृष्टि पड़े, वहां दुनिया को न देखने वाले भगवान को ही देखते है; क्योंकि भगवान कहते हैं कि यह संपूर्ण जगत् मेरे से व्याप्ति है अर्थात यह जगत्में मैं ही व्याप्ति हूं, रेगिस्तान हूं ।
समाधान--' ऐसा करो और ऐसा मत करो'--यह शास्त्र का विधि-निषेध अर्थ है। ऐसे विधि-निषेध का वर्णन यहां नहीं है। यहां तो विभूतियों का वर्णन है। मैं आपका चिंतन कहां-कहां करूं?' -अर्जुन के इस प्रश्न के अनुसार भगवान विभूतियों के रूप में आपके चिंतन की बात ही बताई गई है अर्थात भगवान के चिंतन से सहजतासे हो जाए, इसका उपाय भगवान विभूतियों के रूप में बताया गया है। मूलतः जिस समुदाय में मनुष्य रहता है, उस समुदाय में जहां दृष्टि पड़े, वहां दुनिया को न देखने वाले भगवान्को ही देखें; क्योंकि भगवान कहते हैं कि यह संपूर्ण जगत् मेरे से व्याप्ति है अर्थात यह जगत्में मैं ही व्याप्ति हूं, रेगिस्तान हूं (गीता 9। 4)।
जैसे किसी साधक का पहले जुआका व्यसन रह रहा हो और अब वह भगवान के भजन में लगा है। इसे कभी भी जूआ याद आ जाए तो उस जुएका चिंतन को छोड़ने के लिए वह भगवान्का चिंतन करे कि इस जुएके खेल में हार-जीत की सुविधा है, वह भगवानकी ही है। इस प्रकार भगवान को देखने से पहले भगवान का चिंतन करना तो छूट जाएगा और भगवान का चिंतन होता रहेगा। ऐसे ही किसी दूसरे को जूआ की प्रतियोगिता में देखा और हार-जीत को शामिल किया, तो जीत और जीतने की शक्ति को जू एकी न उत्सुक भगवानकी ही माने। कारण कि खेल तो समाप्त हो रहा है और समाप्त हो जाएगा, पर परमात्मा सहित सामान्य लोग रहते हैं और बने रहते हैं। इस प्रकार जुआ आदिको विभूति दर्शनका तूफान भगवान के चिंतन में है
जैसे किसी साधक का पहले जुआका व्यसन रह रहा हो और अब वह भगवान के भजन में लगा है। इसे कभी भी जूआ याद आ जाए तो उस जुएका चिंतन को छोड़ने के लिए वह भगवान्का चिंतन करे कि इस जुएके खेल में हार-जीत की सुविधा है, वह भगवानकी ही है। इस प्रकार भगवान को देखने से पहले भगवान का चिंतन करना तो छूट जाएगा और भगवान का चिंतन होता रहेगा। ऐसे ही किसी दूसरे को जूआ की प्रतियोगिता में देखा और हार-जीत को शामिल किया, तो जीत और जीतने की शक्ति को जू एकी न उत्सुक भगवानकी ही माने। कारण कि खेल तो समाप्त हो रहा है और समाप्त हो जाएगा, पर परमात्मा सहित सामान्य लोग रहते हैं और बने रहते हैं। इस प्रकार जुआ आदिको विभूति दर्शनका तूफान भगवान के चिंतन में है
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी विभूतियों के बारे में बताते हुए कहा है कि वे छल करने वालों में जूआ हैं, प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हैं, जीतने वालों का विजय हैं, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हैं।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों को विभिन्न रूपों में प्रकट किया है। वे छल करने वालों में जूआ हैं, जो उनकी माया का प्रतीक है। वे प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हैं, जो उनकी शक्ति और प्रभाव का प्रतीक है।

वे जीतने वालों का विजय हैं, जो उनकी विजय और सफलता का प्रतीक है। वे निश्चय करने वालों का निश्चय हैं, जो उनकी निश्चयता और दृढ़ता का प्रतीक है। और वे सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हैं, जो उनकी शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि भगवान श्रीकृष्ण की विभूतियाँ विभिन्न रूपों में प्रकट होती हैं और वे अपनी शक्ति, प्रभाव, विजय, निश्चयता और शुद्धता के माध्यम से संसार को प्रभावित करते हैं।यहां भगवान ने छल करने वालों में शामिल होकर अपनी विभूति बताई है तो फिर इसे खेलने में क्या दोष है? यदि दोष नहीं है तो फिर शास्त्रों में निषेध क्यों किया गया है।

वास्तव में इस शङ्का का उत्तर यह है:

भगवान श्रीकृष्ण ने छल करने वालों में जूआ को अपनी विभूति बताया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जूआ खेलना उचित है। भगवान ने यह कहा है कि वे छल करने वालों में जूआ हैं, लेकिन इसका मतलब यह है कि वे जूआ के पीछे की शक्ति हैं, न कि जूआ खेलने की प्रेरणा देने वाले हैं।

शास्त्रों में जूआ खेलने का निषेध किया गया है क्योंकि यह एक दुर्गुण है जो मनुष्य को नुकसान पहुंचा सकता है। जूआ खेलने से मनुष्य की बुद्धि और विवेक खराब हो सकते हैं, और यह उसके जीवन को भी बर्बाद कर सकता है।

इसलिए, भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन का मतलब यह नहीं है कि जूआ खेलना उचित है, बल्कि इसका मतलब यह है कि वे जूआ के पीछे की शक्ति हैं, और हमें जूआ खेलने से बचना चाहिए।

जुआ क्या कभी किसका हुआ?

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 37

श्लोक:
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः।
 मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥

भावार्थ:
वृष्णिवंशियों में (यादवों के अंतर्गत एक वृष्णि वंश भी था) वासुदेव अर्थात्‌ मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात्‌ तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ
 ॥37॥

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के अवतार का वर्णन नहीं है, प्रत्युत वृषिनवंशियों में अपनी जो विशेषता है, उस विशेष को लेकर भगवान ने अपने विभूतिरूपसे इस का वर्णन किया है। यहाँ भगवान ने अपने विभूतिरूपसे  वर्णन किया है तो' सासारकी दृष्टिसे है, साक्षात् दृष्टिसे तो वे साक्षात भगवान ही हैं। इस अध्याय में जितनी विभूतियाँ आई हैं, वे सभी संसार की दृष्टि से ही हैं। तत्त्वतः तो वे,परमात्मास्वरूप ही हैं।

पाण्डवो में अर्जुनकी जो उपयोगिता है, वह भगवानकी ही है। इसलिए भगवान ने अर्जुन को अपनी वो विभूतियां बताई है।
वेदका चार चंद्रमा विभाग, पुराण, उपपुराण, महाभारत आदि जो कुछ भी संस्कृत वाङ्मय है, वह सबका-सब व्यासजीकी कृपाका ही फल है। आज भी कोई नई रचना करता है तो उसे भी व्यासजीका ही उच्छिष्ट माना जाता है। कहा भी है इ-पर इसी प्रकार सभी मुनियों में व्यासजी मुख्य हैं। इसलिए भगवान ने व्यासजीको अपनी विभूति बताया है। भगवान की याद आती है और भगवान से भी मिलती है।शास्त्रीय सिद्धांतों को ठीक तरह से देखने वाले विद्यार्थी भी पंडित हैं, वे सभी 'कवि' कहलाते हैं। उन सभी बर्तनों में शुक्राचार्य जी मुख्य हैं। आचार्य शुक्रजी संजीवनी विद्याके ज्ञाता हैं। शुक्र शुक्रनीति विख्यात है। इस प्रकार कई गुणधर्मों के कारण भगवान ने अपनी विभूति बताई है। क्योंकि वह महत्ता एक क्षण भी स्थिररू पसे न टिकने वाले दुनिया की नहीं हो सकती।
"कवियों में से कवि (यानी सबसे बड़ा कवि) मैं हूँ।"
भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा है कि वे कवियों में से सबसे बड़े कवि हैं। इसका मतलब यह है कि भगवान श्रीकृष्ण की रचनात्मकता और सृजनात्मकता अनंत है, और वे अपनी शक्ति और प्रभाव से संसार को रचते और संचालते हैं।
इस श्लोक का भाव यह भी है कि भगवान श्रीकृष्ण की महिमा और उनकी कृपा का अनुभव करने के लिए, हमें उनकी रचनात्मकता और सृजनात्मकता को समझना और महसूस करना चाहिए।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 38

श्लोक:
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्‌।
 मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्‌॥

भावार्थ:
मैं दमन करने वालों का दंड अर्थात्‌ दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ
 ॥38॥

व्याख्या:भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा है कि वे दण्ड के रूप में दमयताम (विधायकों) में हैं, नीति के रूप में जिगीषताम (विजय प्राप्त करने वालों) में हैं, मौन के रूप में गुह्यानाम (गुप्त बातों को रखने वालों) में हैं, और ज्ञान के रूप में ज्ञानवताम (ज्ञानी पुरुषों) में हैं।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों को विभिन्न रूपों में प्रकट किया है। वे दण्ड के रूप में दमयताम में हैं, जो उनकी न्यायप्रियता और विधि के पालन की प्रतिज्ञा का प्रतीक है।

वे नीति के रूप में जिगीषताम में हैं, जो उनकी विजय प्राप्त करने की क्षमता और उनकी नीतियों की महिमा का प्रतीक है।

वे मौन के रूप में गुह्यानाम में हैं, जो उनकी गुप्तता और उनकी गुप्त बातों को रखने की क्षमता का प्रतीक है।

और वे ज्ञान के रूप में ज्ञानवताम में हैं, जो उनकी ज्ञानप्रियता और उनकी ज्ञान की महिमा का प्रतीक है।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि भगवान श्रीकृष्ण की विभूतियाँ विभिन्न रूपों में प्रकट होती हैं, और वे अपनी न्यायप्रियता, विजय प्राप्त करने की क्षमता, गुप्तता, और ज्ञानप्रियता के माध्यम से संसार को प्रभावित करते हैं।
भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 39

श्लोक:
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
 न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌॥

भावार्थ:
और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो
 ॥39॥
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया है कि जो कुछ भी संसार में है, उसका मूल कारण और बीज मैं हूँ। अर्जुन, मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि जो कुछ भी चर और अचर है, वह सब मेरे बिना नहीं हो सकता है।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी सर्व-व्यापकता और सर्व-निर्भरता का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि जो कुछ भी संसार में है, उसका मूल कारण और बीज वे ही हैं। यह उनकी सर्व-व्यापकता का प्रतीक है, जो संसार के सभी जीवों और वस्तुओं में व्याप्त है।

इसके अलावा, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो कुछ भी चर और अचर है, वह सब उनके बिना नहीं हो सकता है। यह उनकी सर्व-निर्भरता का प्रतीक है, जो संसार के सभी जीवों और वस्तुओं को अपनी शक्ति और प्रभाव से संचालित करते हैं।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि भगवान श्रीकृष्ण संसार के सभी जीवों और वस्तुओं के मूल कारण और बीज हैं। वे संसार के सभी जीवों और वस्तुओं को अपनी शक्ति और प्रभाव से संचालित करते हैं, और उनके बिना कुछ भी नहीं हो सकता है।

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 40

श्लोक:
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप।
 एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥

भावार्थ:
हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिए एकदेश से अर्थात्‌ संक्षेप से कहा है
 ॥40॥
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया है कि उनकी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है, और वे अनंत और अपार हैं। अर्जुन, तुम्हें मैंने अपनी विभूतियों का केवल एक अंश ही बताया है, और यह भी तुम्हारे लिए पर्याप्त होगा।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों की अनंतता और अपारता का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि उनकी विभूतियों का कोई अंत नहीं है, और वे अनंत और अपार हैं। यह उनकी महिमा और उनकी शक्ति का प्रतीक है।

इसके अलावा, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने अर्जुन को अपनी विभूतियों का केवल एक अंश ही बताया है, और यह भी अर्जुन के लिए पर्याप्त होगा। यह भगवान की कृपा और उनकी दया का प्रतीक है, जो अर्जुन को अपनी विभूतियों का ज्ञान देने के लिए तैयार हैं।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि भगवान श्रीकृष्ण की विभूतियाँ अनंत और अपार हैं, और वे अपनी शक्ति और महिमा के माध्यम से संसार को प्रभावित करते हैं। भगवान ने अर्जुन को अपनी विभूतियों का ज्ञान दिया है, और यह ज्ञान अर्जुन के लिए पर्याप्त होगा।

टिप्पणी: किसी ज्ञान को पाने को एक छोटा सा इशारा भी काफी होता है।

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 41

श्लोक:
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
 तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌॥

भावार्थ:
जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान
 ॥41॥

।।10.41।। इस अध्याय में तथाकथित उदाहरणों द्वारा भगवान की विभूतियों के दर्शन का अल्पाहार करने का प्रयास किया गया है परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने सत्य की पूर्ण व्याख्या की है। हमें यह बताया गया है कि हम विवेक के द्वारा समान अनित्य जगत में नित्य और दिव्य तत्व को पहचान सकते हैं। धार्मिक दृष्टांतों से यह स्पष्ट होता है कि जगत् के चराचर वैभव में स्वयं भगवान को ऐश्वर्ययुक्त कहा गया है कान्तियुक्त या शक्तियुक्त रूप में अभिव्यक्त होते हैं। वे सभी नाम और सैद्धांतिक रूप से बौद्ध हैं।यहाँ श्रीकृष्ण अत्यंत स्पष्ट रूप से यह कहते हैं कि बहुविध जगत में दिव्य उपस्थिति क्या है?
 तथा उसका डॉयचेमेण्ट की परीक्षा क्या है?
(डॉयचेमेण्ट की परीक्षा एक प्रकार की प्रोफेशनल परीक्षा है जो कि डॉयचेमेण्ट नामक एक जर्मन कंपनी द्वारा आयोजित की जाती है। यह परीक्षा उन व्यक्तियों के लिए है जो कि रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, गणित, और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में अपना करियर बनाना चाहते हैं।

डॉयचेमेण्ट की परीक्षा में आमतौर पर निम्नलिखित विषयों पर प्रश्न पूछे जाते हैं:

1. रसायन विज्ञान
2. भौतिक विज्ञान
3. गणित
4. इंजीनियरिंग
5. विज्ञान और प्रौद्योगिकी

परीक्षा का प्रारूप आमतौर पर लिखित परीक्षा के रूप में होता है, जिसमें प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उम्मीदवारों को एक निश्चित समय सीमा दी जाती है।

डॉयचेमेण्ट की परीक्षा को पास करने से उम्मीदवारों को निम्नलिखित लाभ मिल सकते हैं:

1. डॉयचेमेण्ट कंपनी में नौकरी के अवसर
2. अन्य कंपनियों में नौकरी के अवसर
3. विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में अध्ययन और अनुसंधान के अवसर
4. प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन और मान्यता

यह परीक्षा उन व्यक्तियों के लिए उपयुक्त है जो कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हैं और डॉयचेमेण्ट कंपनी में नौकरी करने के इच्छुक हैं।)

जिस की कहीं महानता ,कान्ति या शक्ति की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है।
 वह भी भगवान के कोट की एक किरण है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि एलामिक विस्तृत विवेचन का यह सारांश भी बहुत पहले का है। 
एलामिक विस्तृत विवेचन एक प्रकार की वैज्ञानिक विधि है जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के पदार्थों के गुणों और विशेषताओं (श्री कृष्ण की विभूतियों के अध्ययन जैसा ही तो है?)
जिस का अध्ययन करने के लिए किया जाता है। यह विधि विशेष रूप से पदार्थों के रासायनिक और भौतिक गुणों का अध्ययन करने के लिए उपयुक्त है।

एलामिक विस्तृत विवेचन के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:

1. *नमूना तैयारी*: पदार्थ का नमूना तैयार किया जाता है और उसे विश्लेषण के लिए तैयार किया जाता है।
2. *विश्लेषण*: नमूने का विश्लेषण विभिन्न प्रकार के उपकरणों और तकनीकों का उपयोग करके किया जाता है, जैसे कि एक्स-रे फ्लोरोसेंस, इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी, और न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस।
3. *डेटा विश्लेषण*: विश्लेषण के परिणामों का विश्लेषण किया जाता है और पदार्थ के गुणों और विशेषताओं के बारे में निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

एलामिक विस्तृत विवेचन के लाभ निम्नलिखित हैं:

1. *विस्तृत जानकारी*: यह विधि पदार्थों के गुणों और विशेषताओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करती है।
2. *उच्च सटीकता*: एलामिक विस्तृत विवेचन के परिणाम उच्च सटीकता के साथ प्राप्त किए जा सकते हैं।
3. *विभिन्न पदार्थों का अध्ययन*: यह विधि विभिन्न प्रकार के पदार्थों के अध्ययन के लिए उपयुक्त है, जैसे कि धातुएं, प्लास्टिक, और जैविक पदार्थ।

एलामिक विस्तृत विवेचन के अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं:

1. *वैज्ञानिक अनुसंधान*: यह विधि वैज्ञानिक अनुसंधान में पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए उपयुक्त है।
2. *उद्योग*: एलामिक विस्तृत विवेचन का उपयोग उद्योग में पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए किया जा सकता है।
3. *चिकित्सा*: यह विधि चिकित्सा में जैविक पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए उपयुक्त है।

इन सभी उदाहरणों में भगवान का या तो ऐश्वर्य का भाव है? या कांति या फिर शक्ति। सर्वत्र परमात्मदर्शन करने के लिए अर्जुन (चेले) को इस पवित्र मंत्र का उपयोग करना चाहिए, गीता के सभी शिष्यों के लिए समान रूप से दर्शन करना होगा। अब अंत में भगवान कहते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 10
श्लोक 42

श्लोक:
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
 विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌॥

भावार्थ:
अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रायोजन है। मैं इस संपूर्ण जगत्‌ को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ
 ॥42॥ 
 इस श्लोक की विस्तृत व्याख्या यह है:

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि हे अर्जुन, तुम्हें मेरी विभूतियों के बारे में जानने की आवश्यकता नहीं है। मैं इस संपूर्ण जगत को अपने एक अंश से ही धारण कर रखा हूँ।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों के बारे में अर्जुन को बताया है कि उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं है। इसका मतलब यह है कि भगवान की विभूतियाँ इतनी व्यापक और अनंत हैं कि उन्हें पूरी तरह से समझना संभव नहीं है।

इसके अलावा, भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि वे इस संपूर्ण जगत को अपने एक अंश से ही धारण कर रखा हूँ। इसका मतलब यह है कि भगवान की शक्ति और प्रभाव इतने व्यापक हैं कि वे संपूर्ण जगत को अपने एक अंश से ही संचालित कर सकते हैं।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि भगवान श्रीकृष्ण की विभूतियाँ अनंत और व्यापक हैं, और उन्हें पूरी तरह से समझना संभव नहीं है। भगवान की शक्ति और प्रभाव इतने व्यापक हैं कि वे संपूर्ण जगत को अपने एक अंश से ही संचालित कर सकते हैं।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः॥10।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...