बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

जगजीत सिंह

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#08feb 

जगजीत सिंह

🎂08 फ़रवरी 1941, श्रीगंगानगर
 ⚰️: 10 अक्तूबर 2011, Lilavati Hospital And Research Centre, मुम्बई

पत्नी: चित्रा सिंह (विवा. 1969–2011)
बच्चे: विवेक सिंह
माता-पिता: बच्चन कौर, अमर सिंह
भाई: इंदरजीत कौर, करतार सिंह, जसवंत सिंह
जगजीत सिंह का नाम बेहद लोकप्रिय ग़ज़ल गायकों में शुमार हैं। उनका संगीत अंत्यंत मधुर है और उनकी आवाज़ संगीत के साथ खूबसूरती से घुल-मिल जाती है। 

जगजीत जी का जन्म 08 फरवरी1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे। जगजीत जी का परिवार मूलतः पंजाब (भारत) के रोपड़ ज़िले के दल्ला गांव का रहने वाला है। मां बच्चन कौर पंजाब के ही समरल्ला के उट्टालन गांव की रहने वाली थीं। जगजीत का बचपन का नाम जीत था। करोड़ों सुनने वालों के चलते सिंह साहब कुछ ही दशकों में जग को जीतने वाले जगजीत बन गए। शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद में पढ़ने के लिए जालंधर आ गए। डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया।

बहुतों की तरह जगजीत जी का पहला प्यार भी परवान नहीं चढ़ सका। अपने उन दिनों की याद करते हुए वे कहते हैं, ”एक लड़की को चाहा था। जालंधर में पढ़ाई के दौरान साइकिल पर ही आना-जाना होता था। लड़की के घर के सामने साइकिल की चैन टूटने या हवा निकालने का बहाना कर बैठ जाते और उसे देखा करते थे। बाद मे यही सिलसिला बाइक के साथ जारी रहा। पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं थी। कुछ क्लास मे तो दो-दो साल गुज़ारे.” जालंधर में ही डीएवी कॉलेज के दिनों गर्ल्स कॉलेज के आसपास बहुत भटकते थे। एक बार अपनी चचेरी बहन की शादी में जमी महिला मंडली की बैठक में जाकर गीत गाने लगे थे। पूछे जाने पर कहते हैं कि सिंगर नहीं होते तो धोबी होते। पिता के इजाज़त के बग़ैर फ़िल्में देखना और टाकीज में गेट कीपर को घूंस देकर हॉल में घुसना आदत थी।
बचपन में अपने पिता से संगीत विरासत में मिली। गंगानगर में ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की। आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं। पिता की ख़्वाहिश थी कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाए लेकिन जगजीत पर गायक बनने की धुन सवार थी। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत में उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रोफ़ेसर सूरजभान ने जगजीत सिंह जी को काफ़ी उत्साहित किया। उनके ही कहने पर वे 1965 में मुंबई आ गए। यहां से उनके संघर्ष का दौर शुरू हुआ। वे पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे।  1967में जगजीत जी की मुलाक़ात चित्रा जी से हुई। दो साल बाद दोनों 1969 में परिणय सूत्र में बंध गए।
जगजीत सिंह फ़िल्मी दुनिया में पार्श्वगायन का सपना लेकर आए थे। तब पेट पालने के लिए कॉलेज और ऊंचे लोगों की पार्टियों में अपनी पेशकश दिया करते थे। उन दिनों तलत महमूद, मोहम्मद रफ़ी साहब जैसों के गीत लोगों की पसंद हुआ करते थे। रफ़ी-किशोर-मन्नाडे जैसे महारथियों के दौर में पार्श्व गायन का मौक़ा मिलना बहुत दूर था। जगजीत जी याद करते हैं, ”संघर्ष के दिनों में कॉलेज के लड़कों को ख़ुश करने के लिए मुझे तरह-तरह के गाने गाने पड़ते थे क्योंकि शास्त्रीय गानों पर लड़के हूट कर देते थे।” तब की मशहूर म्यूज़िक कंपनी एच एम वी (हिज़ मास्टर्स वॉयस) को लाइट क्लासिकल ट्रेंड पर टिके संगीत की दरकार थी। जगजीत जी ने वही किया और पहला एलबम ‘द अनफ़ॉरगेटेबल्स (1976)’ हिट रहा। जगजीत जी उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ”उन दिनों किसी सिंगर को एल पी (लॉग प्ले डिस्क) मिलना बहुत फ़ख्र की बात हुआ करती थी।” बहुत कम लोग जानते हैं कि सरदार जगजीत सिंह धीमान इसी एलबम के रिलीज़ के पहले जगजीत सिंह बन चुके थे। बाल कटाकर असरदार जगजीत सिंह बनने की राह पकड़ चुके थे। जगजीत ने इस एलबम की कामयाबी के बाद मुंबई में पहला फ़्लैट ख़रीदा था।
जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब फ़िल्मी गानों की तरह गाना शुरू किया तो आम आदमी ने ग़ज़ल में दिलचस्पी दिखानी शुरू की लेकिन ग़ज़ल के जानकारों की भौहें टेढ़ी हो गई। ख़ासकर ग़ज़ल की दुनिया में जो मयार बेग़म अख़्तर, कुन्दनलाल सहगल, तलत महमूद, मेहदी हसन जैसों का था।। उससे हटकर जगजीत सिंह की शैली शुद्धतावादियों को रास नहीं आई। दरअसल यह वह दौर था जब आम आदमी ने जगजीत सिंह, पंकज उधास सरीखे गायकों को सुनकर ही ग़ज़ल में दिल लगाना शुरू किया था। दूसरी तरफ़ परंपरागत गायकी के शौकीनों को शास्त्रीयता से हटकर नए गायकों के ये प्रयोग चुभ रहे थे। आरोप लगाया गया कि जगजीत सिंह ने ग़ज़ल की प्योरटी और मूड के साथ छेड़खानी की। लेकिन जगजीत सिंह अपनी सफ़ाई में हमेशा कहते रहे हैं कि उन्होंने प्रस्तुति में थोड़े बदलाव ज़रूर किए हैं लेकिन लफ़्ज़ों से छेड़छाड़ बहुत कम किया है। बेशतर मौक़ों पर ग़ज़ल के कुछ भारी-भरकम शेरों को हटाकर इसे छह से सात मिनट तक समेट लिया और संगीत में डबल बास, गिटार, पिआनो का चलन शुरू किया।.यह भी ध्यान देना चाहिए कि आधुनिक और पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में सारंगी, तबला जैसे परंपरागत साज पीछे नहीं छूटे।

प्रयोगों का सिलसिला यहीं नहीं रुका बल्कि तबले के साथ ऑक्टोपेड, सारंगी की जगह वायलिन और हारमोनियम की जगह कीबोर्ड ने भी ली। कहकशां और फ़ेस टू फ़ेस संग्रहों में जगजीत जी ने अनोखा प्रयोग किया। दोनों एलबम की कुछ ग़ज़लों में कोरस का इस्तेमाल हुआ। विनोद खन्ना, डिंपल कपाड़िया अभिनीत फिल्म 'लीला' के गीत 'जाग के काटी सारी रैना' में गिटार का अद्भुत प्रयोग किया। जलाल आग़ा निर्देशित टीवी सीरियल कहकशां के इस एलबम में मजाज़ लखनवी की ‘आवारा’ नज़्म ‘ऐ ग़मे दिल क्या करूं ऐ वहशते दिल क्या करूं’ और फ़ेस टू फ़ेस में ‘दैरो-हरम में रहने वालों मयख़ारों में फूट न डालो’ बेहतरीन प्रस्तुति थीं। जगजीत ही पहले ग़ज़ल गुलुकार थे जिन्होंने चित्रा जी के साथ लंदन में पहली बार डिजीटल रिकॉर्डिंग करते हुए ‘बियॉन्ड टाइम' अलबम जारी किया।

इतना ही नहीं, जगजीत जी ने क्लासिकी शायरी के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम-आदमी की जिंदगी को भी सुर दिए। "अब मैं राशन के कतारों में नज़र आता हूँ , अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ’", "मैं रोया परदेस में", ‘मां सुनाओ मुझे वो कहानी’ जैसी रचनाओं ने ग़ज़ल न सुनने वालों को भी अपनी ओर खींचा।

शायर निदा फ़ाज़ली, बशीर बद्र, गुलज़ार, जावेद अख़्तर जगजीत सिंह जी के पसंदीदा शायरों में हैं। निदा फ़ाज़ली के दोहों का एलबम ‘इनसाइट’ कर चुके हैं। जावेद अख़्तर के साथ ‘सिलसिले’ ज़बर्दस्त कामयाब रहा। लता मंगेशकर जी के साथ ‘सजदा’, गुलज़ार के साथ ‘मरासिम’ और ‘कोई बात चले’, कहकशां, साउंड अफ़ेयर, डिफ़रेंट स्ट्रोक्स और मिर्ज़ा ग़ालिब अहम हैं। करोड़ों लोगों को दीवाना बनाने वाले जगजीत सिंह ने मीरो-ग़ालिब से लेकर फ़ैज-फ़िराक़ तक और गुलज़ार-निदा फ़ाजली से लेकर राजेश रेड्डी और आलोक श्रीवास्तव तक हर दौर के शायर की ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी।

गजल के बादशाह कहे जानेवाले जगजीत सिंह का 10 अक्टूबर 2011की सुबह 8 बजे मुंबई में देहांत हो गया।उन्हें ब्रेन हैमरेज होने के कारण 23 सितम्बर को मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। ब्रेन हैमरेज होने के बाद जगजीत सिंह की सर्जरी की गई, जिसके बाद से ही उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। वे तबसे आईसीयू वॉर्ड में ही भर्ती थे। जिस दिन उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ, उस दिन वे सुप्रसिद्ध गजल गायक गुलाम अली के साथ एक शो की तैयारी कर रहे थे।

सम्मान और पुरस्कार

जगजीत सिंह को सन2003 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2024

तन्वीर नकवी

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तनवीर नकवी 

जन्म सैयद खुर्शीद अली विवादास्पद है कुछ लोग 🎂06 फरवरी 1919 को मना रहे है।
Imdb और rekhaa पर 06फरवरी अंकित है
🎂 16 फरवरी 1919 
⚰️01 नवंबर 1972)

 तनवीर नकवी

 एक पाकिस्तानी गीतकार और कवि थे। उन्होंने लॉलीवुड और बॉलीवुड सहित 200 अनिश्चित फिल्मों के लिए गीत लिखे । उन्होंने भारतीय सिनेमा में अपनी शुरुआत अब्दुल रशीद कारदार द्वारा निर्देशित स्वामी फिल्म से की , और बाद में पंद्रह वर्षों से अधिक समय तक पाकिस्तानी फिल्म उद्योग में सक्रिय रहे। उन्होंने अनमोल घड़ी फिल्म के लिए "आवाज़ दे कहा है" गीत और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को कवर करने वाला गीत "रंग लाएगा शहीदों का लहू" लिखने के बाद पहचान अर्जित की ।उनका जन्म लाहौर, ब्रिटिश भारत (आधुनिक लाहौर, पाकिस्तान) में हुआ था। वह मूल रूप से ईरान के फ़ारसी लेखकों के परिवार से थे , और उन्होंने नूरजहाँ की बहन, इदान बाई से शादी की।
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एक गीतकार के रूप में, उन्होंने अपना करियर 1946 के आसपास कम उम्र में ही शुरू कर दिया था, लेकिन पाकिस्तान जाने के बाद, उन्होंने उर्दू और पंजाबी भाषा की फिल्मों के लिए गीत लिखे, जिनमें पाकिस्तान की पहली फीचर फिल्म तेरी याद भी शामिल थी । उन्होंने सलमा (1960) के लिए भी लिखा , जो पार्श्व गायक के रूप में नूर की पहली फिल्म थी। 1933 में, वह बंबई गए जब एक फिल्म निर्देशक अब्दुर रशीद कारदार ने उन्हें वहां आमंत्रित किया। फिल्मों में डेब्यू से पहले वह गजलें लिखते थे , लेकिन बाद में हिंदी, उर्दू और पंजाबी फिल्मों के लिए गाने लिखते थे। उन्हें नूरजहाँ द्वारा गाए गए पाकिस्तान के देशभक्ति गीत "रंग लाए गा शहीदों का लहू" के लिए गीत लिखने का भी श्रेय दिया जाता है। यह गाना उन्होंने अपनी एक कविता से लिखा है. अपने करियर के दौरान, उन्होंने "शाह-ए-मदीना यसरब के वली" और "जो ना होता तेरा जमाल हाय" जैसी दो प्रमुख नात लिखीं। भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन से पहले , नकवी को 1950 और 1970 के दशक के बीच पंजाबी कविता और साहित्य में सबसे महान शास्त्रीय लेखकों में से एक माना जाता था ।

विभाजन के बाद, पाकिस्तान फिल्म उद्योग ने अधिक फिल्में नहीं बनाईं और 1952 के अंत तक, इसने केवल पांच फिल्में बनाईं। बाद में, पाकिस्तानी फिल्म निर्माता और संगीत निर्देशक ख्वाजा खुर्शीद अनवर ने गीतकार के रूप में तनवीर नकवी सहित कई अन्य लोगों के साथ मिलकर काम किया। टीम 1956 और 1959 के बीच कुछ फिल्में बनाने में सफल रही, जो कई सांस्कृतिक संघर्षों के कारण अभिनेताओं द्वारा अनुभव किए गए मनोवैज्ञानिक मुद्दों पर केंद्रित थीं । 
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अनमोल घड़ी 1946
जुगनू 1947
तेरी याद 1948 
4 नाता 1955 
1959 झूमर
नींद 1959 
1959 कोयल (फिल्म)
1960शाम ढले 
1960सलमा
1619 गुलफ़ाम 
1962घूँघट 
1962 अज़रा 
1963सीमा 
1967 हमराज़ 
 1969बहन भाई
1970अत्त खुदा दा वैर 
1971दोस्ती (पाकिस्तानी फ़िल्म)

भारत में संगीत निर्देशक के रूप में।

1. कुरमई (पंजाबी) (1941)
2. इशारा (1943)
3. परख (1944 फ़िल्म) (1944)
4. यतीम (1945)
5. परवाना (1947 फ़िल्म) (1947)
6. पगडंडी (1947)
7. आज और कल (1947)
8. सिंघार (1949)
9. निशाना (1950)
10. नीलम परी (1952)
बहन भाई 1969
अत ख़ुदा दा वैर 1970

पाकिस्तानी फ़िल्मों में संगीत निर्देशक के रूप में

1. इंतेज़ार (1956) 
2. मिर्ज़ा साहिबान (1956)
3. ज़हर-ए-इश्क (1958) 
4. झूमर (1959)
5. कोयल (1959) 
6. अयाज़ (1960)
7. घूंघट (1962) 
8. चिंगारी (1964)
9. हवेली (1964)
10. सरहद (1966)
11. हमराज़ (1967)
12. गुड्डो (पंजाबी) (1970)
13. हीर रांझा (पंजाबी) (1970) 
14. पराई आग (1971)
15. सलाम-ए-मोहब्बत (1971)
16. शिरीन फरहाद (1975)
17. हैदर अली (1978)
18. मिर्ज़ा जाट (पंजाबी) (1982)

🌹उनके कुछ लोकप्रिय 🌹

पापी पपीहा रे पी पी ना बोल बैरी" सुरैया द्वारा गाया गया, डीएन मधोक के गीत , फिल्म परवाना 
"जब तुम ही नहीं अपनी दुनिया ही बेगानी है" सुरैया द्वारा गाया गया, डीएन मधोक के गीत , फिल्म परवाना 
"जिस दिन से पिया दिल ले गए, दुख दे गए, चैन नहीं आए" नूरजहाँ द्वारा गाया गया, कतील शिफाई के गीत , फ़िल्म इंतज़ार (1956) 
"चली रे चली रे, बैरी आस लगा काय चली रे" नाहिद नियाजी द्वारा गाया गया, तनवीर नकवी के गीत , फिल्म झूमर (1959) 
"रिम झिम रिम झिम पर्रे फुवार, तेरा मेरा नित का प्यार" नूरजहाँ और मुनीर हुसैन द्वारा गाया गया, तनवीर नकवी के गीत , फिल्म कोयल (1959) 
"सुनो अर्ज़ मेरी कमली वाले" जुबैदा खानम द्वारा गाया गया, कतील शिफाई के गीत , फिल्म ज़हर-ए-इश्क (1958) 
"सल्लू अलाही-ए-वा-अले-ही, जो ना होता तेरा जमाल ही" जुबैदा खानम , कौसर परवीन द्वारा गाया गया, तनवीर नकवी के गीत, फिल्म अयाज़ (1960) 
ए रोशनियों के शहर बता मेहदी हसन द्वारा गाया गया , तनवीर नकवी के गीत, फिल्म चिंगारी (1964) 

01 नवंबर 1972 को लाहौर, पाकिस्तान में उनका निधन हो गया।
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⚰️1 नवंबर 1972 को लाहौर, पाकिस्तान में उनका निधन हो गया।

सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

शोभा गुर्टू

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#27sep 
शोभा गुर्टू
प्रसिद्ध नाम शोभा गुर्टू
अन्य नाम भानुमति शिरोडकर

🎂जन्म- 08 फ़रवरी, 1925, कर्नाटक; मृत्यु-
⚰️ 27 सितम्बर, 2004, मुंबई 

अभिभावक मेनेकाबाई शिरोडकर
पति/पत्नी विश्वनाथ गुर्टू
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र शास्त्रीय गायन
मुख्य फ़िल्में 'पाक़ीज़ा', 'फागुन', 'मैं तुलसी तेरे आँगन की'
पुरस्कार-उपाधि 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' (1978), 'पद्मभूषण' (2002), 'महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार', 'लता मंगेशकर पुरस्कार', 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार'
प्रसिद्धि ठुमरी गायिका
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी 1978 में फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' में शोभा जी ने एक ठुमरी 'सैय्याँ रूठ गए मैं मनाऊँ कैसे' गायी, जो कि बहुत प्रसिद्ध हुई।
भारतीय शास्त्रीय शैली की एक प्रसिद्ध गायिका थीं। उनका मूल नाम 'भानुमति शिरोडकर' था। वे एक ऐसी शास्त्रीय शिल्पी थीं, जिन्होंने गायन की ठुमरी शैली को विश्व भर में ख्याति दिलाई। शोभा गुर्टू को 'ठुमरियों की रानी' कहा जाता है। उन्होंने ठुमरी के अतिरिक्त कजरी, होरी और दादरा आदि उप-शास्त्रीय शैलियों के अस्तित्व को भी बचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

उनकी माताजी मेनेकाबाई शिरोडकर स्वयं भी एक नृत्यांगना थीं तथा जयपुर-अतरौली घराने के उस्ताद अल्लादिया ख़ाँ से गायकी सीखती थीं। शोभा गुर्टू को शास्त्रीय संगीत सीखने की प्रेरणा अपनी माँ से ही मिली थी। उन्होंने संगीत की प्राथमिक शिक्षा उस्ताद अल्लादिया ख़ाँ के सुपुत्र उस्ताद भुर्जी ख़ाँ साहब से प्राप्त की। इसके बाद उस्ताद अल्लादिया ख़ाँ के भतीजे उस्ताद नत्थन ख़ाँ से मिली तालीम ने उनके सुरों में जयपुर-अतरौली घराने की नींव को सुदृढ़ किया। किंतु उनकी गायकी को एक नयी दिशा और पहचान मिली उस्ताद घाममन ख़ाँ की छत्रछाया में, जो उनकी माँ को ठुमरी और दादरा व अन्य शास्त्रीय शैलियाँ सिखाने मुंबई में उनके परिवार के साथ रहने आये थे।

विवाह
शोभा जी का विवाह बेलगाँव के विश्वनाथ गुर्टू से हुआ था, जिनके पिता पंडित नारायणनाथ गुर्टू बेलगाँव पुलीस के एक वरिष्ठ अधिकारी थे। इसके साथ ही वह स्‍वयं भी एक संगीत विद्वान तथा सितार वादक थे। गुर्टू दंपत्ति के तीन सुपुत्रों में सबसे छोटे त्रिलोक गुर्टू एक प्रसिद्ध तालवाद्य शिल्पी हैं।

प्रसिद्धि
शुद्ध शास्त्रीय संगीत में शोभा जी की अच्छी पकड़ तो थी ही, किन्तु उन्हें देश-विदेश में ख्याति प्राप्त हुई ठुमरी, कजरी, होरी, दादरा आदि उप-शास्त्रीय शैलियों से, जिनके अस्तित्व को बचाने में उन्होंने विशेष भूमिका निभाई थी। आगे चलकर अपने मनमोहक ठुमरी गायन के लिए वे 'ठुमरी क्वीन' कहलाईं। वे न केवल अपने गले की आवाज़ से बल्कि अपनी आँखों से भी गाती थीं। एक गीत से दूसरे में जैसे किसी कविता के चरित्रों की भांति वे भाव बदलती थीं, चाहे वह रयात्मक हो या प्रेमी द्वारा ठुकराया हुआ हो अथवा नख़रेबाज़ या इश्कज़ हो। उनकी गायकी बेगम अख़्तर तथा उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब से ख़ासा प्रभावित थी। उन्होंने अपने कई कार्यक्रम कथक नृत्याचार्य पंडित बिरजू महाराज के साथ प्रस्तुत किए थे, जिनमें विशेष रूप से उनके गायन के 'अभिनय' अंग का प्रयोग किया जाता था।

फ़िल्मों में योगदान

शोभा गुर्टू ने कई हिन्दी और मराठी फ़िल्मों में भी गीत गाए। सन 1972 में आई कमल अमरोही की फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' में उन्हें पहली बार पार्श्वगायन का मौका मिला था। इसमें उन्होंने एक भोपाली 'बंधन बांधो' गाया था। इसके बाद 1973 में फ़िल्म 'फागुन' में 'मोरे सैय्याँ बेदर्दी बन गए कोई जाओ मनाओ' गाया। फिर सन 1978 में असित सेन द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' में शोभा जी ने एक ठुमरी 'सैय्याँ रूठ गए मैं मनाऊँ कैसे' गाया, जो कि बहुत प्रसिद्ध हुई।

पुरस्कार व सम्मान
अपनी विशिष्ट गायिका के लिए शोभा गुर्टू को कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' की ठुमरी के लिए उन्हें "फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार" के लिए नामांकित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें निम्न पुरस्कार भी प्राप्त हुए-

'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' - (1978)
'पद्मभूषण' - (2002)
महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार
लता मंगेशकर पुरस्कार

निधन

लगभग पाँच दशकों तक 'ठुमरियों की रानी' के रूप में शोभा जी प्रसिद्ध रहीं। 27 सितम्बर, 2004 को शोभा गुर्टू नामक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का यह नक्षत्र अस्त हो गया।

अंगद सिंह बेदी

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अंगद सिंह बेदी

🎂06 फ़रवरी 1983 
दिल्ली , भारत
अल्मा मेटर
सेंट स्टीफंस कॉलेज
व्यवसायों
अभिनेता 
जीवनसाथी
नेहा धूपा ​( एम.  2018 )
बच्चे2
माता-पिता
बिशन सिंह बेदी (पिता)
बेदी का जन्म पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान बिशन सिंह बेदी के घर हुआ था । उनकी एक बड़ी बहन, नेहा और उनके पिता की पिछली शादी से दो बड़े सौतेले भाई-बहन हैं - एक सौतेली बहन जिसका नाम गिलिंदर है और एक सौतेला भाई जिसका नाम गावसिंदर है। उन्होंने दिल्ली के लिए अंडर-19 स्तर तक क्रिकेट खेला। उन्होंने ज्ञान भारती स्कूल, साकेत, नई दिल्ली से पढ़ाई की और सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली से स्नातक की उपाधि प्राप्त की । इसके बाद, उन्होंने मॉडलिंग में अपना करियर शुरू किया और अभिनय में कदम रखा।
बेदी ने अपने करियर की शुरुआत 2004 में शशि कुमार द्वारा निर्देशित फिल्म काया तरण से की थी  यह फिल्म 2002 के गुजरात दंगों और 1984 के सिख विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि पर आधारित थी । फ़िल्म ने 2004 के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रथम फ़िल्म निर्माता को दिया जाने वाला अरविंदन पुरस्कार जीताऔर फ़िल्म में बेदी के अभिनय की सराहना की गई। 

2005 में, वह स्टार वन पर कुक ना कहो नामक एक कुकिंग शो में होस्ट के रूप में दिखाई दिए। उन्होंने 2010 में एक्स्ट्रा इनिंग्स टी20 की मेजबानी की, यह शो इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के दौरान मैच सत्र के बीच आयुष्मान खुराना के साथ प्रसारित किया गया था । वह कलर्स के शो फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी के सीजन 3 में एक प्रतियोगी के रूप में दिखाई दिए । प्रवेश राणा द्वारा प्रतिस्थापित किए जाने से पहले उन्होंने यूटीवी बिंदास पर रियलिटी टेलीविजन शो इमोशनल अत्याचार के पहले सीज़न की भी मेजबानी की थी ।

उन्होंने 2011 में रेमो डिसूजा द्वारा निर्देशित फिल्म फालतू से बॉलीवुड में वापसी की । अंगद को उंगली (2014) और पिंक (2016) जैसी फिल्मों में उनके अभिनय के लिए जाना जाता है  उन्हें सलमान खान के साथ टाइगर जिंदा है में भी देखा गया था । 

2017 में उन्होंने अमेज़ॅन मूल श्रृंखला इनसाइड एज में मुख्य भूमिका निभाई । 

वह फिल्म गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल , भारतीय वायु सेना पायलट गुंजन सक्सेना की बायोपिक का भी हिस्सा थे , जहां उन्होंने उनके भाई की भूमिका निभाई थी, साथ ही फिल्म सूरमा , पूर्व कप्तान संदीप सिंह की बायोपिक भी थी। भारतीय हॉकी टीम में उन्होंने उनके भाई की भूमिका भी निभाई। अभिनेता "द जोया फैक्टर" का हिस्सा रहे हैं।
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2004 काया तारन
 2011फालतू
2011 फालतू
2013 रंगीला
2014 उंगली
2016 गुलाबी 
2016डियर जिंदगी
2017 टाइगर जिंदा है
2018सुरमा
2019 जोया फैक्टर

कवि प्रदीप

#06feb 
 #11dic 
कवि_प्रदीप कवि प्रदीप . 
कवि प्रदीप (मूल नाम : रामचन्द्र नारायणजी द्विवेदी ; 06फ़रवरी 1915 - 11 दिसम्बर 1998) भारतीय कवि एवं गीतकार थे जो देशभक्ति गीत ऐ मेरे वतन के लोगों की रचना के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों की श्रद्धांजलि में ये गीत लिखा था। लता मंगेशकर द्वारा गाए इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया।गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू के आंख भर आए थे।कवि प्रदीप ने इस गीत का राजस्व युद्ध विधवा कोष में जमा करने की अपील की। मुंबई उच्च न्यायालय ने 25 अगस्त 2005 को संगीत कंपनी एचएमवी को इस कोष में अग्रिम रूप से ₹10 लाख जमा करने का आदेश दिया।

रामचन्द्र नारायणजी द्विवेदी
06 फ़रवरी 1915
मौत
दिसम्बर 11, 1998 (उम्र 83)
पेशा
कवि, गीतकार

परिचय

कवि प्रदीप का मूल नाम 'रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी' था। उनका जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन में बड़नगर नामक स्थान में हुआ। कवि प्रदीप की पहचान 1940 में रिलीज हुई फिल्म बंधन से बनी। हालांकि 1943 की स्वर्ण जयंती हिट फिल्म किस्मत के गीत "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" ने उन्हें देशभक्ति गीत के रचनाकारों में अमर कर दिया। गीत के अर्थ से क्रोधित तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए। इससे बचने के लिए कवि प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा.

पांच दशक के अपने पेशे में कवि प्रदीप ने 71 फिल्मों के लिए 1700 गीत लिखे उनके देशभक्ति गीतों में, फिल्म बंधन (1940) में "चल चल रे नौजवान", फिल्म जागृति (1954) में "आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं", "दे दी हमें आजादी बिना खडग ढाल" और फिल्म जय संतोषी मां (1975) में "यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां-कहां" है। इस गीत को उन्होंने फिल्म के लिए स्वयं गाया भी था।

आपने हिंदी फ़िल्मों के लिये कई यादगार गीत लिखे। भारत सरकार ने उन्हें सन 1997-98 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।

कवि प्रदीप कुमार के सम्‍मान में मध्‍यप्रदेश सरकार के कला एवं संस्‍कृति विभाग ने कवि प्रदीप राष्‍ट्रीय सम्‍मान की स्‍थापना वर्ष 2013 में  की । Archived 2020-02-06 at the वेबैक मशीन पहला कवि प्रदीप राष्‍ट्रीय सम्‍मान पुरस्‍कार उत्‍तर प्रदेश के प्रसिध्‍द गीतकार गोपालदास नीरज को दिया गया।

लोकप्रिय गीत
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"ऐ मेरे वतन के लोगों" (कंगन)
"सूनी पड़ी रे सितार" (कंगन)
"नाचो नाचो प्यारे मन के मोर" (पुनर्मिलन)
"चल चल रे नौजवान" (बंधन)
"चने जोर गरम बाबू" (बंधन)
"पीयू पीयू बोल प्राण पपीहे" (बंधन)
"रुक न सको तो जाओ" (बंधन)
"खींचो कमान खींचो" (अंजान)
"झूले के संग झूलो" (झूला)
"न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे" (झूला)
"मैं तो दिल्ली से दुल्हन लायारे" (झूला)
"आज मौसम सलोना सलोना रे" (झूला)
"मेरे बिछड़े हुए साथी" (झूला)
"दूर हटो ऐ दुनियावालो हिंदुस्तान हमारा है" (किस्मत)
"धीरे धीरे आरे बदल" (किस्मत)
"पपीहा रे, मेरे पियासे" (किस्मत)
"घर घर में दिवाली है मेरे घर में अँधेरा" (किस्मत)
"अब तेरे सिवा कौन मेरा" (किस्मत)
"हर हर महादेव अल्लाह-ओ-अकबर" (चल चल रे नौजवान)
"रामभरोसे मेरी गाड़ी" (गर्ल्स स्कूल)
"ऊपर गगन विशाल" (मशाल)
"किसकी किस्मत में क्या लिखा" (मशाल)
"आज एशिया के लोगों का काफिला चला" (काफिला)
"कोयल बोले कु" (बाप बेटी)
"कान्हा बजाए बंसरी" (नास्तिक)
"जय जय राम रघुराई" (नास्तिक)
"कितना बदलगया इंसान" (नास्तिक)
"गगन झंझना राजा" (नास्तिक)
"तेरे फूलों से भी प्यार" (नास्तिक)
"साबरमती के संत" (जागृती)
"हम लाये हैं तूफ़ान से" (जागृती)
"चलो चलें माँ" (जागृती)
"आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ" (जागृती)
"तेरे द्वार खड़ा भगवान" (वामन अवतार)
"कहेको बिसरा हरिनाम, माटी के पुतले" (चक्रधारी)
"दूसरो का दुखड़ा दूर करनेवाले" (दशहरा)
"तुंनक तुंनक बोले रे मेरा इकतारा" (रामनवमी)
"पिंजरे के पंछी रे" (नागमणि)
"कोई लाख करे चतुराई" (चंडी पूजा)
"नई उम्र की कलियों तुमको देख रही दुनिया सारी" (तलाक़)
"बिगुल बजरहा आज़ादी का" (तलाक़)
"मेरे जीवन में किरण बनके" (तलाक़)
"मुखड़ा देखले प्राणी" (दो बहन)
"इन्सान का इंसान से हो भाईचारा" (पैग़ाम)
"ओ अमीरों के परमेश्वर" (पैग़ाम)
"जवानी में अकेलापन" (पैग़ाम)
"ओ दिलदार बोलो एक बार" (स्कूल मास्टर)
"आज सुनो हम गीत विदा का गारहे" (स्कूल मास्टर)
"सांवरिया रे अपनी मीरा को भूल न जाना" (आँचल)
"न जाने कहाँ तुम थे" (जिंदगी और ख्वाब)
"आजके इस इंसान को ये क्या होगया" (अमर रहे ये प्यार)
"सूरज रे जलते रहना" (हरिश्चंद्र तारामती)
"टूटगई है माला" (हरिश्चंद्र तारामती)
"जन्मभूमि माँ" (नेताजी सुभाषचंद्र बोस)
"सुनो सुनो देशके हिन्दू - मुस्लमान" (नेताजी सुभाषचंद्र बोस)
"भारत के लिए भगवन का एक वरदान है गंगा" (हर हर गंगे)
"ये ख़ुशी लेके मैं क्या करूँ" (हर हर गंगे)
"चल अकेला चल अकेला" (संबंध)
"तुमको तो करोड़ों साल हुए" (संबंध)
"जो दिया था तुमने एक दिन" (संबंध)
"अँधेरे में जो बैठे हो" (संबंध)
"सुख दुःख दोनों रहते" (कभी धूप कभी छाँव)
"हाय रे संजोग क्या घडी दिखलाई" (कभी धूप कभी छाँव)
"चल मुसाफिर चल" (कभी धूप कभी छाँव)
"जय जय नारायण नारायण हरी हरी" (हरिदर्शन)
"प्रभु के भरोसे हांको गाडी" (हरिदर्शन)
"मारनेवाला है भगवन बचानेवाला है भगवन" (हरिदर्शन)
"मैं इस पार" (अग्निरेखा)
"मैं तो आरती उतरूँ" (जय संतोषी माँ)
"यहाँ वहां जहाँ तहां" (जय संतोषी माँ)
"मत रो मत रो आज" (जय संतोषी माँ)
"करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं" (जय संतोषी माँ)
"मदद करो संतोषी माता" (जय संतोषी माँ)
"हे मारुती सारी रामकथा साकार" (बजरंगबली)
"बंजा हूँ मैं" (आँख का तारा)
"ऐ मेरे वतनके लोगों"

लता मंगेशकर

indo-canadian mudar:
कुमारी लता दीनानाथ मंगेशकर
⚰️जन्म 28 सितम्बर, 1929
जन्म भूमि इंदौर, मध्यप्रदेश
⚰️मृत्यु 06 फ़रवरी, 2022
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
अभिभावक दीनानाथ मंगेशकर, सुधामती
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म संगीत (पार्श्वगायिका), भारतीय शास्त्रीय संगीत
मुख्य फ़िल्में मदर इंडिया, मुग़ल ए आज़म
विषय भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, भजन, ग़ज़ल
पुरस्कार-उपाधि भारत रत्न, पद्म भूषण, दादा साहब फाल्के पुरस्कार, पद्मविभूषण
नागरिकता भारतीय
मुख्य गीत 'आएगा आने वाला', 'ऐ मेरे वतन के लोगों', 'नाम गुम जाएगा', 'अल्ला तेरो नाम' आदि।
भाई-बहन हृदयनाथ मंगेशकर, आशा भोंसले, उषा मंगेशकर, मीना खड़ीकर
अन्य जानकारी सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का भी गौरव प्राप्त है।
indo-canadian mudar:
स्वर कोकिला महान पार्श्वगायिका लता मंगेशकर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂लता मंगेशकर जन्म- 28 सितम्बर, 1929; 
⚰️मृत्यु- 6 फ़रवरी, 2022 भारत की 'भारत रत्न' सम्मानित मशहूर पार्श्वगायिका थीं, जिनकी आवाज़ ने छह दशकों से भी ज़्यादा संगीत की दुनिया को सुरों से नवाज़ा। भारत की 'स्‍वर कोकिला' लता मंगेशकर ने 20 भाषाओं में 30,000 गाने गाये। उनकी आवाज़ सुनकर कभी किसी की आँखों में आँसू आए तो कभी सीमा पर खड़े जवानों को सहारा मिला। उन्होंने स्वयं को पूर्णत: संगीत को समर्पित कर रखा था। लता मंगेशकर जैसी शख़्सियतें विरले ही जन्म लेती हैं।

कुमारी लता दीनानाथ मंगेशकर का जन्म इंदौर, मध्यप्रदेश में 28 सितम्बर, 1929 को हुआ था। लता मंगेशकर का नाम विश्व के सबसे जाने माने लोगों में आता है। लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर एक कुशल रंगमंचीय गायक थे। दीनानाथ जी ने लता को तब से संगीत सिखाना शुरू किया, जब वे पाँच साल की थी। उनके साथ उनकी बहनें आशा, ऊषा और मीना भी सीखा करतीं थीं। लता 'अमान अली ख़ान साहिब' और बाद में 'अमानत ख़ान' के साथ भी पढ़ीं।

लता मंगेशकर हमेशा से ही ईश्वर के द्वारा दी गई सुरीली आवाज़, जानदार अभिव्यक्ति व बात को बहुत जल्द समझ लेने वाली अविश्वसनीय क्षमता का उदाहरण रहीं हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण उनकी इस प्रतिभा को बहुत जल्द ही पहचान मिल गई थी लेकिन पाँच वर्ष की छोटी आयु में ही आपको पहली बार एक नाटक में अभिनय करने का अवसर मिला। शुरुआत अवश्य अभिनय से हुई किंतु आपकी दिलचस्पी तो संगीत में ही थी। लताजी का नाम पहले 'हेमा' था, लेकिन जन्म के पांच साल बाद माता-पिता ने नाम बदलकर 'लता' रख दिया था।

ज़िम्मेदारी

1942 ई. में हृदय-गति के रुक जाने से उनके पिता का देहांत हो गया। तेरह वर्ष की अल्पायु में ही लता जी को परिवार की सारी ज़िम्मेदारियाँ अपने नाज़ुक कंधों पर उठानी पड़ी। अपने परिवार के भरण पोषण के लिये उन्होंने 1942 से 1948 के बीच हिन्दी व मराठी में क़रीबन 8 फ़िल्मों में काम किया। इन में से कुछ के नाम हैं: “पहेली मंगलागौर” 1942, “मांझे बाल” 1944, “गजाभाऊ” 1944, “छिमुकला संसार” 1943, “बडी माँ” 1945, “जीवन यात्रा” 1946, “छत्रपति शिवाजी” 1954 इत्यादि।[1] लेकिन आपकी मंज़िल तो संगीत ही थी और उनके पार्श्व गायन की शुरुआत 1942 की मराठी फ़िल्म "कीती हसाल" से हुई दुर्भाग्यवश यह गीत काट दिया गया और फ़िल्म में शामिल नहीं हुआ।

जीवन में संघर्ष

सफलता की राह कभी भी आसान नहीं होती है। लता जी को भी अपना स्थान बनाने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडा़। कई संगीतकारों ने तो आपको शुरू-शुरू में पतली आवाज़ के कारण काम देने से साफ़ मना कर दिया था। उस समय की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका नूरजहाँ के साथ लता जी की तुलना की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर आपको काम मिलने लगा।

संगीत में पहला क़दम

1942 में पहली बार गाने का पार्श्व अनुभव
1943 में पहला हिन्दी गाना
1947 में हिन्दी फ़िल्मों में पार्श्व गायन (आपकी सेवा में) के रूप में पहला गीत
1949 में प्रसिद्ध फ़िल्म बरसात, अंदाज, दुलारी और महल
1950 में वह फ़िल्मों में सबसे ताकतवर महिला बनीं

संगीत में प्रशंसा

नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा। मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे। यह गीत लोग कभी नहीं भूल सकते और लता जी का व्यक्तित्व भी इस गीत से झलकता है कि भले ही नाम गुम जाय या चेहरा बदल जाये पर उनकी आवाज़ कोई नहीं भूल सकता। लता जी की अद्भुत कामयाबी ने लता जी को फ़िल्मी जगत की सबसे मज़बूत महिला बना दिया था।लता जी को सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का भी गौरव प्राप्त है। फ़िल्मी गीतों के अतिरिक्त आपने ग़ैरफ़िल्मी गीत भी बहुत खूबी के साथ गाए हैं। लता जी की प्रतिभा को पहचान मिली सन् 1947 में, जब फ़िल्म “आपकी सेवा में” उन्हें एक गीत गाने का मौक़ा मिला। इस गीत के बाद तो आपको फ़िल्म जगत में एक पहचान मिल गयी और एक के बाद एक कई गीत गाने का मौक़ा मिला। इन में से कुछ प्रसिद्ध गीतों का उल्लेख करना यहाँ अप्रासंगिक न होगा। जिसे आपका पहला शाहकार गीत कहा

जाता है वह 1949 में गाया गया “आएगा आने वाला”, जिस के बाद आपके प्रशंसकों की संख्या दिनोदिन बढ़ने लगी। इस बीच आपने उस समय के सभी प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ काम किया। अनिल बिस्वास, सलिल चौधरी, शंकर जयकिशन, एस. डी. बर्मन, आर. डी. बर्मन, नौशाद, मदनमोहन, सी. रामचंद्र इत्यादि सभी संगीतकारों ने आपकी प्रतिभा का लोहा माना। लता जी ने दो आँखें बारह हाथ, दो बीघा ज़मीन, मदर इंडिया, मुग़ल ए आज़म, आदि महान् फ़िल्मों में गाने गाये है। आपने “महल”, “बरसात”, “एक थी लड़की”, “बड़ी बहन” आदि फ़िल्मों में अपनी आवाज़ के जादू से इन फ़िल्मों की लोकप्रियता में चार चाँद लगाए। इस दौरान आपके कुछ प्रसिद्ध गीत थे: “ओ सजना बरखा बहार आई” (परख-1960), “आजा रे

परदेसी” (मधुमती-1958), “इतना ना मुझसे तू प्यार बढा़” (छाया- 1961), “अल्ला तेरो नाम”, (हम दोनो-1961), “एहसान तेरा होगा मुझ पर”, (जंगली-1961), “ये समां” (जब जब फूल खिले-1965) इत्यादि।

देश-भक्ति गीत

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिये एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उपस्थित थे। इस समारोह में लता जी के द्वारा गाए गये गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों” को सुन कर सब लोग भाव-विभोर हो गये थे। पं नेहरू की आँखें भी भर आईं थीं। ऐसा था आपका भावपूर्ण एवं मर्मस्पर्शी स्वर। आज भी जब देश-भक्ति के गीतों की बात चलती है तो सब से पहले इसी गीत का उदाहरण दिया जाता है।

आवाज़ का जादू

आपने गीत, गज़ल, भजन, संगीत के हर क्षेत्र में अपनी कला बिखेरी है। गीत चाहे शास्त्रीय संगीत पर आधारित हो, पाश्चात्य धुन पर आधारित हो या फिर लोक धुन की खुशबू में रचा-बसा हो। हर गीत को लता जी अपनी आवाज़ के जादू से एक ऐसे जीवंत रूप में पेश करती हैं कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है। लता जी ने युगल गीत भी बहुत खूबी के साथ गाए हैं। मन्ना डे, मुहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर आदि के साथ-साथ आपने दिग्गज शास्त्रीय गायकों पं भीमसेन जोशी, पं जसराज इत्यादि के साथ भी मनोहारी युगल-गीत गाए हैं। गज़ल के बादशाह जगजीत सिंह के साथ आपकी एलबम “सजदा” ने लोकप्रियता की बुलंदियों को छुआ।

फ़िल्मकार, संगीतकार आदि के कथन

फ़िल्मकार श्याम बेनेगल कहते हैं कि "लता मंगेशकर के जैसा कोई और हुआ ही नहीं है। एक मिस्र की 'उम्मे कुल्सुम' थीं और एक लता हैं।"
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की लता जी के बारे में राय है कि "कभी-कभार ग़लती से ऐसा कलाकार पैदा हो जाता है।"
पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख़्तर ने लता मंगेशकर के लिए कई लाजवाब और दिल को छू लेने वाले गीत लिखे हैं। वे कहते हैं, "हमारे पास एक चांद है, एक सूरज है, तो एक लता मंगेशकर भी है।"
अपने समय के प्रसिद्ध अभिनेता दिलीप कुमार कहते हैं कि "लता जी की आवाज़ एक रौशनी है, जो सारे आलम के गोशे-गोशे में मौसिकी का उजाला फैलाती है। उनकी आवाज़ एक करिश्मा है।"
अमिताभ बच्चन कहते हैं कि "लता मंगेशकर की आवाज़ इस सदी की आवाज़ है।"
मशहूर नाटककार विजय तेंडुलकर कहते हैं कि "इस दुनिया में लोग बहुत व्यावहारिक होते हैं, पर लता जी के गीत रोज़ सुनते हैं। उससे किसी का पेट नहीं भरता, लेकिन सुने जा रहे हैं पागलों की तरह।"
शास्त्रीय गायक उस्ताद आमिर ख़ान कहते हैं कि "हम शास्त्रीय संगीतकारों को जिसे पूरा करने में तीन से डेढ़ घंटे लगते हैं, लता जी वह तीन मिनट में पूरा कर देती हैं।"
प्रसिद्ध संगीतकार एस. डी. बर्मन ने एक बार कहा था कि "जब तक लता है, तब तक हम संगीतकार सुरक्षित हैं।"
प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने कहा था कि "बीसवीं सदी की तीन बातें याद रखने लायक हैं, एक चांद पर आदमी की जीत, दूसरा बर्लिन की दीवार का टूटना और तीसरा लता का जन्म।"
अभिनेता शाहरुख़ ख़ान का कहना है कि "मेरी ख़्वाहिश है कि मैं किसी अभिनेत्री की भूमिका निभाऊं और मुझे पर्दे पर लता जी की आवाज़ पर अभिनय करने का मौका मिले।

पुरस्कार

सांगीतिक उपलब्धियों के लिए आपको अनेक पुरस्कारों से नवाज़ा गया। संगीत जगत में अविस्मरणीय योगदान के लिए लता जी को

फ़िल्म फेयर पुरस्कार (1958, 1962, 1965, 1969, 1993 और 1994)
राष्ट्रीय पुरस्कार (1972, 1975 और 1990)
महाराष्ट्र सरकार पुरस्कार (1966 और 1967)
सन 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
सन 1989 में उन्हें फ़िल्म जगत का सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार’ दिया गया।
सन 1993 में फ़िल्म फेयर के 'लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
सन 1996 में स्क्रीन के 'लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।

सन 1997 में 'राजीव गांधी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
सन 1999 में पद्मविभूषण, एन.टी.आर. और ज़ी सिने के 'लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
सन 2000 में आई. आई. ए. एफ.(आइफ़ा) के 'लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
सन 2001 में स्टारडस्ट के 'लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार', नूरजहाँ पुरस्कार, महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सन 2001 में भारत सरकार ने आपकी उपलब्धियों को सम्मान देते हुए देश के सर्वोच्च पुरस्कार “भारत रत्न” से आपको विभूषित किया।

मृत्यु

92 साल की उम्र में लगा मंगेशकर का निधन 22 फ़रवरी, 2022 को हुआ। उनका 29 दिनों से मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में इलाज चल रहा था। जानकारी के मुताबिक, रविवार सुबह 8:12 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली।

पीएम नरेंद्र मोदी ने लता मंगेशकर के निधन पर शोक जताया। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, "लता दीदी के गानों ने कई तरह के इमोशन्स को उभारा। उन्होंने दशकों तक भारतीय फिल्म जगत के बदलावों को करीब से देखा। फिल्मों से परे, वह हमेशा भारत के विकास के बारे में भावुक थीं। वह हमेशा एक मजबूत और विकसित भारत देखना चाहती थीं

लता मंगेशकर के जीवन से जुड़े कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-

लता जी को संगीत के अलावा खाना पकाने और फ़ोटो खींचने का बहुत शौक़ है।
सन 1974 में दुनिया में सबसे अधिक गीत गाने का 'गिनीज़ बुक रिकॉर्ड' उनके नाम पर दर्ज है।
अपना पहला गाना लता मंगेशकर ने मराठी फ़िल्म 'किती हसाल' (1942) में गाया था।
लता मंगेशकर को पहली बार सबसे बड़ा मौक़ा फ़िल्म 'महल' से मिला, उनका गाया "आयेगा आने वाला" बहुत प्रसिद्ध हुआ था।
उन्होंने 1980 के बाद से फ़िल्मों में गाना कम कर दिया था और कहानी, संवाद आदि पर अधिक ध्यान देने लगी थीं।
लता जी ही एकमात्र ऐसी जीवित महिला गायिका हैं, जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं।
'आनंद गान बैनर' तले फ़िल्मों का निर्माण भी उन्होंने किया है और इसके साथ ही संगीत भी दिया है।
अभी भी गाने की रिकॉर्डिंग के लिये जाने से पहले लता मंगेशकर कमरे के बाहर अपनी चप्पलें उतारती हैं। वे हमेशा नंगे पाँव गाना गाती हैं।
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के. दीप मथारू के दीप नाम से मशहूर हैं कुलदीप सिंह

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के. दीप मथारू के दीप नाम से मशहूर हैं कुलदीप सिंह
के. दीप मथारू
के दीप नाम से मशहूर हैं कुलदीप सिंह मथारू.

🎂दीप जन्म 10 दिसंबर 1940

एक पंजाबी गायक हैं।
उन्होंने अधिकांश युगल गीत अपनी पत्नी गायिका जगमोहन कौर के साथ गाए।
यह जोड़ी अपने कॉमेडी किरदारों माई मोहनो और पोस्टी के लिए जानी जाती है।
पूदना इस जोड़ी का एक और उल्लेखनीय गीत है।
वह शिव कुमार बटालवी द्वारा लिखित गीत गाने वाले पहले व्यक्ति थे।
2010 में, उन्हें बाबू सिंह मान के साथ पीटीसी लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला, जो उन्हें पंजाबी गायक गुरदास मान द्वारा प्रदान किया गया था।

दीप का जन्म 10 दिसंबर 1940 को रंगून, बर्मा में हुआ था । उनका पैतृक गांव भारतीय पंजाब के लुधियाना जिले में ऐतियाना है ।

कलकत्ता में एक कार्यक्रम में उनकी मुलाकात अपनी पत्नी जगमोहन कौर से हुई और उन्होंने एक जोड़ी के रूप में साथ काम करना शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने 2 फरवरी 1971 को शादी कर ली, जो एक प्रेम विवाह था। इस जोड़े के बिली और राजा नाम के दो बच्चे थे, राजा को 2015 में अस्वीकार कर दिया गया क्योंकि उनके बीच कभी अच्छे संबंध नहीं थे। बिली अपने माता-पिता, विशेषकर अपने पिता, दोनों के बहुत करीब थी और जब दोनों का तलाक हुआ तो बिली उनके साथ रहने लगी और उनके अंतिम सांस लेने तक उनके साथ ही रही। अब वह अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए एक निर्माता बन गई हैं।

उन्होंने अपना पहला एलपी 1969 में एचएमवी द्वारा रिकॉर्ड किया था और गाना था नशेयां नाल यारी, रोली मैं इज्जत साड़ी । वह सबसे पहले शिव कुमार बटालवी के गाने गाने वाले थे, जिन्हें बाद में जगजीत सिंह , नुसरत फतेह अली खान , गुलाम अली सहित कई अन्य पंजाबी गायकों ने गाया ।

हास्य अभिनेता के रूप में, वे रिकॉर्ड्स में कॉमेडी रिकॉर्ड करने वाली पहली पंजाबी जोड़ी थीं,  और माई मोहनो और पोस्टी की भूमिका निभाते हुए, उन्होंने पोस्टी कनाडा विच , पोस्टी इंग्लैंड विच , नवे पुआरे पै गाए सहित कई रिकॉर्ड जारी किए ।
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भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...