शनिवार, 3 फ़रवरी 2024

रीमा लागू

#03feb
#18may 

रीमा लागू

🎂जन्म-03 फ़रवरी, 1958;

 ⚰️मृत्यु- 18 मई, 2017, मुम्बई 

हिन्दी फ़िल्मों की शानदार अभिनेत्री थीं। मुख्यत: उन्हें फ़िल्मों में माँ की शानदार भूमिकाएँ निभाने के लिए जाना जाता है। फ़िल्म 'मैंने प्यार किया' की साथिन माँ हो या 'वास्तव' की कठोर माँ या फिर 'ये दिल्लगी' की मालिकाना माँ, रीमा लागू की इन भूमिकाओं का कोई सानी नहीं था। उन्होंने नए जमाने की माँ की भूमिकाओं को खूब चरितार्थ किया। 'आशिकी', 'साजन', 'हम आपके हैं कौन', 'मैंने प्यार किया, 'वास्तव', 'कुछ कुछ होता है' और 'हम साथ साथ हैं' जैसी कई फ़िल्मों में रीमा ने माँ का जीवंत किरदार निभाया। उन्होंने सलमान ख़ान के लिए कई फ़िल्मों में उनकी माँ की भूमिका निभाई। टीवी सीरियल 'तू तू मैं मैं' में वह सास के किरदार में थीं।

उनका वास्तविक नाम गुरिंदर भादभाड़े था। वे जानी-मानी मराठी अभिनेत्री मंदाकनी भादभाड़े की बेटी थीं। उनके अभिनय की काबिलियत तब सामने आई, जब वे पुणे के हुजूरपागा एच.एच.सी.पी हाईस्कूल में पढ़ाई कर रही थीं। प्रोफेशनल तौर पर अभिनय करने के लिए उन्होंने हाईस्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। रीमा का विवाह मराठी अभिनेता विवेक लागू से हुई थी। विवाह के बाद उन्होंने अपना नाम रीमा लागू रख लिया था।

रंगमंच से अपने अभिनय का सफर शुरू करने वाली रीमा ने हिन्दी की कई सुपरहिट फिल्‍मों में काम किया। उनको हिन्दी फ़िल्मों में माँ की शानदार भूमिकाओं के लिए जाना जाता था। बॉलीवुड में उनका सितारा फ़िल्म 'कयामत से कयामत तक' में जूही चावला की माँ के किरदार से चमका। रीमा अंत समय तक अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय थीं। अपने अंतिम दिनों में वह स्टार प्लस के धारावाहिक 'नामकरण' में काम कर रहीं थीं। इसके अलावा वे रंगमंच और विज्ञापन फ़िल्में भी कर रहीं थीं। वैसे तो रीमा लागू ने अपना अभिनय का सफर रंगमंच से शुरू किया था, लेकिन देखते ही देखते वह बॉलीवुड की चहेती माँ बन गईं। बॉलीवुड की अक्‍सर 'दया का पात्र' जैसी दिखने वाली माँ से अलग रीमा लागू ने अपने किरदारों में हमेशा एक अलग अंदाज़रखा। सिर्फ फ़िल्म 'वास्‍तव' ही नहीं, उन्होंने अपने माँ के हर किरदार को हमेशा पारंपरिक माँ की छवि से अलग और ज्‍यादा प्रैक्टिकल रखा। रीमा लागू को अपने किरदारों के लिए चार बार फ़िल्‍मफेयर का बेस्‍ट सपोर्टिंग एक्‍ट्रेस अवॉर्ड मिल चुका था
सन 1970 के आखिरी और 1980 की शुरुआत में रीमा लागू ने हिन्दी और मराठी फ़िल्मों में काम शुरू किया था। उन्होंने मराठी अभिनेता विवेक लागू से विवाह किया था। हालांकि कुछ साल बाद ही दोनों अलग हो गए। उनकी एक बेटी है।

माँ की भूमिकाएँ
रीमा लागू की माँ की भूमिका में फ़िल्में
वर्ष फ़िल्म अभिनेता/अभिनेत्री
1988 कयामत से कयामत तक जूही चावला
1989 मैंने प्यार किया सलमान ख़ान
1990 आशिकी राहुल रॉय
1991 साजन सलमान ख़ान
1991 पत्थर के फूल सलमान ख़ान
1992 निश्चय सलमान ख़ान
1993 संग्राम करिश्मा कपूर
1993 गुमराह श्रीदेवी
1994 दिलवाले अजय देवगन
1194 हम आपके हैं कौन माधुरी दीक्षित
1999 वास्तव: द रियल्टी संजय दत्त
2000 जिस देश में गंगा रहता है गोविंदा
2000 कहीं प्यार न हो जाए रानी मुखर्जी
2003 मैं प्रेम की दीवानी हूं अभिषेक बच्चन
2005 शादी करके फंस गया यार सलमान ख़ान
2005 सैंडविच गोविंदा
ममता और स्नेह से भरी माँ का रोल निभाने के लिए रीमा लागू हमेशा प्रसिद्ध रहीं। सलमान ख़ान के कॅरियर में रीमा लागू का बहुत बड़ा योगदान है। सलमान ख़ान की कई बड़ी फ़िल्मों में रीमा उनकी माँ बनीं। सलमान की जिन फ़िल्मों में भी उन्होंने माँ की भूमिका निभाई, वह सुपरहिट रही। हालत तो यह थी कि लोग उन्हें सलमान ख़ान की माँ कहकर पुकारने लगे थे। हालांकि रीमा और सलमान की उम्र में ज्यादा फासला नहीं था, लेकिन उनके चेहरे पर ममता और स्नेह ने उन्हें वास्तविक जीवन में भी सलमान ख़ान की माँ बना दिया। उस पर संयोग भी ऐसा रहा कि जिस भी फिल्म में रीमा सलमान की माँ बनीं, उस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। सबसे पहले फिल्म 'मैंने प्यार किया', जो सुपरहिट रही। उसके बाद 'पत्थर के फूल', फिर 'साजन', 'हम साथ-साथ हैं' और 'जुड़वां'। हालांकि 'हम आपके हैं कौन' में रीमा लागू सलमान ख़ान की हिरोइन माधुरी दीक्षित की माँ बनी थीं और यह फिल्म भी सुपरहिट रही।

पुरस्कार व सम्मान
रीमा लागू को फ़िल्म 'मैंने प्यार किया' और 'हम आपके हैं कौन' के लिए वर्ष 1990 में बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का 'फ़िल्म फेयर अवार्ड' मिला था। अभिनेता राहुल रॉय की 'आशिकी' और संजय दत्त की 'वास्तव' के लिए भी उन्हें इसी सम्मान से नवाजा गया था।

मृत्यु
रीमा लागू की मृत्यु 59 वर्ष की आयु में 18 मई, 2017 को हुई। दिल का दौरा पड़ने पर उन्हें एक दिन पहले 17 मई की रात को मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। दिन में उन्हें छाती में दर्द की शिकायत थी, लेकिन गुरुवार सुबह करीब पांच बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा, जिसके बाद उन्हें नहींं बचाया जा सका।
इनकी जन्म की तारीख का अपवाद है कुछ लोग इनका जन्म और समय 

#21 

जून 1958 मुंबई भी बताते है।

दीप्ती नवल

#03feb 

दीप्ति नवल
 
🎂03 फ़रवरी, 1952 

को हुआ था। वे अपने खुले विचारों के लिए मशहूर हैं। उनका बचपन अमरीका के न्यूयॉर्क में बीता, जहां उनके पिता सिटी यूनिवर्सिटी में शिक्षक थे। दीप्ति नवल को बचपन से ही अभिनय के साथ-साथ चित्रकारी एवं फोटोग्राफी का शौक था। उन्होंने 1985 में मशहूर फ़िल्म निर्देशक प्रकाश झा से विवाह किया, लेकिन ये शादी अधिक सफल नहीं रही और चार साल बाद दोनों का तलाक हो गया। प्रकाश झा से दीप्ति नवल को एक बेटी दिशा है। दीप्ति नवल, प्रकाश झा से अलग होने के बाद भी एक अच्छे दोस्त के तौर पर उनसे मिलती हैं। दोनों तलाक के बाद अपनी बेटी और दोस्त विनोद के साथ डिनर पर भी गए थे। दीप्ति की बेटी दिशा सिंगर बनना चाहती हैं। वे अपने पिता की फ़िल्म राजनीति में बतौर कॉस्ट्यूम सुपरवाइजर काम कर चुकी हैं।

दीप्ति नवल की पहली फ़िल्म श्याम बेनेगल की 

‘जुनून’ (1978) थी। एक बहुत बड़ी और सीज़न्ड स्टारकास्ट से सजी इस फ़िल्म में दीप्ति का बहुत छोटा सा रोल था। इसके बाद एक लीड एक्ट्रेस के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म 1980 में आई। नाम था- ‘एक बार फिर’। विवाहेतर संबंधों पर बनी थी। पहले इस फ़िल्म का सब्जेक्ट कितना बोल्ड कहा गया होगा, ये कल्पना करना मुश्किल नहीं है। ‘एक बार फिर’ में निभाए ‘कल्पना’ के इस किरदार के बारे में दीप्ति नवल ने एक बार बताया कि- 'एक बार फिर’ में पहली बार ऐसा था कि लीड एक्ट्रेस, पुरुष दर्शकों की फेंटेसी को संतुष्ट करने के लिए नहीं थी। इस फ़िल्म ने हिंदी फ़िल्मों में महिला किरदारों के बिल्कुल नई परिभाषा दी थी। कल्पना का ये किरदार मील का पत्थर था'।

इस फ़िल्म में उनके साथ को-एक्ट्रेस सुरेश ओबरॉय और प्रदीप वर्मा थे। कहा जाता है कि इस फ़िल्म के बाद दीप्ति नवल ने सुरेश ओबरॉय से किनारा कर लिया और दोनों के बीच ये दूरी 4 साल तक ज़ारी रही। फिर इन दोनों की एक साथ जो फ़िल्म आई उसका नाम था ‘कानून क्या करेगा’ (1984)। इसके बाद दीप्ति नवल पैरलल सिनेमा का पर्यायवाची बन गईं। उनके अनुसार- 'मेरी इस तरह के सिनेमा से ही शुरुआत हुई। उन दिनों जिस तरह की म्यूज़िक फ़िल्में आ रही थीं उन सबके बीच मेरी यात्रा कहीं ज़्यादा रोचक रही थी। मैंने ऐसी फ़िल्में कीं जैसे, ‘कमला’ (जगमोहन मूदंड़ा), ‘मैं ज़िन्दा हूं’ (सुधीर मिश्रा), ‘पंचवटी’ (बासु भट्टाचार्य) और ‘अनकही’ (अमोल पालेकर)'।

फ़िल्म 'अनकही' से जुड़ा अनुभव
‘अनकही’ (1985) में अपने रोल को समझने के लिए दीप्ति नवल एक मेंटल हॉस्पिटल गईं। ये 1983 की बात थी। इससे पहले दीप्ति जब सिर्फ 12 साल की थीं, तब भी उन्हें पागलखाने जाने का अनुभव मिला। उनकी एक दोस्त वहां भर्ती हुई थी। फिर अमोल पालेकर की फ़िल्म के दस साल बाद, 1993 में, वो मेंटल होम में दो हफ्ते तक रहीं। उस वक्त वो एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहीं थीं। उसी की रिसर्च के चलते। हालांकि ये स्क्रिप्ट कभी पूरी न हो सकी लेकिन टेलीग्राफ को दिए एक इंटरव्यू मेंउन्होंने बताया था कि उस अनुभव ने उनका जीवन बदल कर रख दिया।

उनको पागलखाने से बाहर की दुनिया, होशमंद लोगों की दुनिया सतही और काल्पनिक लगने लगी। वहां दीप्ति ऐसे लोगों, ऐसी औरतों से भी मिलीं जो पागल नहीं थीं लेकिन जिनके परिवार वालों ने उन्हें वहां डाल दिया था। क्यूंकि परिवार में अब उनकी कोई ज़रूरत नहीं थी। इस पूरे अनुभव को बाद में दीप्ति नवल ने एक अंग्रेज़ी कविता के माध्यम से व्यक्त किया- 'होशमंदी की बदबू' 
(The Stench of Sanity)।

मिस चमको
अच्छा सुनिए ‘मिस चमको’, आप दीजिए अपना डेमोंस्ट्रेशन।

ये पहली बार था जब ‘चश्मे बद्दूर’ फ़िल्म में सिद्धार्थ, नेहा को ‘मिस चमको’ के नाम से पुकारता है। फ़िल्म में नेहा का किरदार दीप्ति नवल ने और सिद्धार्थ का किरदार फ़ारुख़ शेख़ ने निभाया था। आज कई साल बीत जाने के बाद भी हम नहीं जानते कि ‘चश्मे बद्दूर’ में दीप्ति नवल के किरदार का नाम नेहा था। लेकिन आज भी ‘चमको’ कहते ही आंखों के सामने करीने से साड़ी पहने हुए, हाथ में चमको वाशिंग पाउडर पकड़े हुए दीप्ति नवल का किरदार जीवंत हो जाता है। इस फ़िल्म की डायरेक्टर थीं सईं परांजपे। मराठी रंगमंच से आईं, सईं अपनी आर्टहाउस फ़िल्मज़ के लिए जानी जातीं थीं। ‘चश्मे बद्दूर’ डायरेक्ट करने से पहले उन्हें अपनी पहली हिंदी फ़िल्म 'स्पर्श' (1980) के लिए नेशनल अवॉर्ड मिल चुका था।

सोसायटी वालों का हंगामा
उस ‘चश्मे बद्दूर’ के ठीक बत्तीस साल बाद, 2013 में इसकी ऑफिशियल रीमेक आई थी। 2013 की रीमेक फ़िल्म को डायरेक्ट किया था डेविड धवन ने और दीप्ति नवल वाला किरदार निभाया था तापसी पन्नू ने। जब ये रीमेक रिलीज़ होने वाली थी उसी दौरान का ये एक क़िस्सा है। हुआ यह कि डेविड वाली ‘चश्मे बद्दूर’ की रिलीज़ के साथ-साथ पुरानी, सईं परांजपे वाली ‘चश्मे बद्दूर’ फ़िल्म भी री-रिलीज़ होने वाली थी। इसी मसले पर दीप्ति नवल से पत्रकार मिलने आए थे, उनके घर पर। ‘ओशियेनिक अपार्टमेंट’ के छठे फ्लोर में। उस वक्त उनके घर पर फ़ारूख़ शेख़ भी थे। अभी पत्रकारों से बात चल ही रही थी कि जिस सोसायटी में दीप्ति का घर था, उस सोसायटी में रहने वाले लोग दीप्ति के घर में आ गए और इंटरव्यू को जबरिया रोकने लगे। उन्हें लगा कि ये इंटरव्यू नहीं, किसी फ़िल्म का सीन है। हंगामा खड़ा हो गया। सोसायटी वाले कोई बात सुनने को तैयार न थे। जब दीप्ति ने बताया कि ये इंटरव्यू है तो बोले कि इंटरव्यू लेना भी सोसायटी के नियमों के खिलाफ है।

खैर, दीप्ति नवल को बेवजह शर्मिंदा होकर वो घर छोड़ना पड़ा। जहां दीप्ति को रहते हुए 30 साल से ज़्यादा हो गए थे। इस पूरे वाक़ये पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए दीप्ति नवल ने बताया था कि- 'मैं तब उस अपार्टमेंट में रहने आई थी, जब किसी की हिम्मत नहीं थी वहां रहने की। मैंने पहले भी कई पार्टियां और प्रेस कॉन्फ्रेंस वहां की हैं। ऐसा पहली बार था कि मुझे ऐसा महसूस करवाया गया कि मैं एक वैश्यालय चला रही हूं। मैंने अपनी ज़िंदगी में इतना शर्मसार महसूस नहीं किया था'।

जब ये स्टोरी अख़बार में छपी तो वो थी तो दीप्ति के पक्ष में, लेकिन इसकी हैडिंग थी- 'मैं कोई प्रॉस्टिट्यूट रैकेट नहीं चला रही हूं: दीप्ति नवल'। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की इस खबर को प्राइमरी सोर्स मानकर कई अख़बारों और वेब न्यूज़ पोर्टल्स ने खबर चला दी और इस दौरान कई पोर्टल्स ने पूरी खबर पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई। अगले कुछ दिनों तक ये खबर चलती रही कि दीप्ति पर सोसायटी वालों ने आरोप लगाया है कि वो सेक्स रैकेट चलाती हैं।

सिनेमा की टॉर्च बियरर
मेनस्ट्रीम सिनेमा के पैरलल में एक आर्टहाउस सिनेमा खड़ा हो रहा था। इस दौर को ‘दी इंडियन पैरलल फ़िल्म मूवमेंट’ कहा गया। दीप्ति नवल, शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल इस मूवमेंट की झंडाबरदार बनीं। स्टारडस्ट के कवर में तीनों की तस्वीरें छपी। हैडिंग थी- 'न्यू वेव ग्लैमर क्वीन्स'। हालांकि स्मिता और दीप्ति ने एक साथ सिर्फ एक फ़िल्म की थी। 1985 में आई केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’। लेकिन उनकी दोस्ती के बारे में आज तक बातें होती हैं। स्मिता सिर्फ 31 साल की थीं जब गुज़रीं। हिंदुस्तान टाइम्स को एक बार सोसायटी ने बताया था कि- 'मैं स्मिता पाटिल को बहुत मिस करती हूं। मैं उनसे खुद को रिलेट कर पाती थी'।

स्मिता और मैं
सोसायटी ने स्मिता पाटिल के लिए भी एक कविता अंग्रेज़ी में लिखी। 
'स्मिता और मैं'
 (Smita and I) 
नाम की इस छोटी-सी कविता में दीप्ति ने लिखा कि वो अक्सर स्मिता से तब मिलती थीं, जब उन्हें साथ में फ्लाइट लेनी होती थी, सफ़र पर निकलना होता था। ये शायद रूपक है, इस बात का कि दीप्ति और स्मिता ने जीवन का सफ़र साथ बिताया, दोस्तों की तरह। तमाम भौतिक और नकली चीजों के बीच एक-दूसरे का साथ और स्पर्श था, जो असली था, सच्चा था। दीप्ति लिखती हैं कि स्मिता के साथ जब वो आखिरी फ्लाइट लेने वाली थीं, तो उन्होंने स्मिता से पूछा था कि- 'क्या जीवन जीने का कोई और तरीका नहीं हो सकता?'

स्मिता कुछ देर चुप रहीं फिर कहा- 'नहीं, जीने का कोई और तरीका नहीं हो सकता'।

दीप्ति नवल की लिखी एक और कविता है 'सफेद कागज़ पे पानी से'

सफेद कागज़ पे पानी से
तुम्हारे नाम इक नज़्म लिखी है मैंने
तिलस्मी रातों पर जब चांद का पहरा होगा
तमाम उम्र सिमट कर जब
इक लम्हें में ढल जायेगी
काशनी अंधेरों के तले
जब कांच के धागों की तरह
पानी की रुपहली सतह पर
ख़ामोशी थिरकती होगी
और झील के उस किनारे पर मचलेंगी
चांद की सोलह परछाइयां
मैं इस पार बैठ कर सुनाऊंगी तुम्हें
सफ़ेद कागज़ पे पानी से
तुम्हारे नाम जो नज़्म लिखी है मैंने

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2024

वहीदा रहमान

#03feb 

वहीदा रहमान

🎂जन्म03 फ़रवरी, 1938
जन्म भूमि हैदराबाद

अभिभावक जयराम, संध्या
पति/पत्नी कमलजीत सिंह
कर्म भूमि मुंबई
कर्म-क्षेत्र अभिनेत्री
मुख्य फ़िल्में गाइड, प्यासा, चौदहवीं का चाँद, काग़ज़ के फूल, साहिब बीबी और ग़ुलाम, तीसरी कसम, राम और श्याम
पुरस्कार-उपाधि पद्मश्री, पद्म भूषण, चार बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, फ़िल्म फ़ेयर लाइफ़टाइम एचीवमेंट अवॉर्ड, एनटीआर राष्ट्रीय पुरस्कार, भारतीय फ़िल्म हस्ती का शताब्दी पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी आज भी वहीदा रहमान फ़िल्मों में सक्रिय हैं और भारतीय सिनेमा के स्वर्ण काल की याद दिलाती हैं।

जीवनपरिचय
वहीदा रहमान का जन्म 03 फ़रवरी, 1938 में हैदराबाद के एक परंपरागत मुस्लिम परिवार में हुआ था। बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना संजो रखा था वहीदा रहमान ने पर किस्मत को ये मंजूर न था, फेफड़ों में इंफेक्शन की वजह से वह यथोचित शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकी। भरतनाट्यम में प्रवीण वहीदा रहमान को अपने अभिभावकों से अभिनय की प्रेरणा मिली। सन् 1955 में उन्हें एक के बाद एक करके दो तेलुगू फ़िल्मों में काम करने अवसर मिल गया।

फ़िल्मीयात्रा

फ़िल्म सी.आई.डी. (1956) में खलनायिका का रोल दे कर गुरु दत्त वहीदा को बंबई (वर्तमान मुंबई) ले आये। सी.आई.डी. की सफलता के बाद फ़िल्म प्यासा (1957) में वहीदा रहमान को हिरोइन का रोल मिला। फ़िल्म प्यासा से ही गुरु दत्त और वहीदा रहमान का विफल प्रेम प्रसंग का आरंभ हुआ। गुरु दत्त एवं वहीदा रहमान अभिनीत फ़िल्म काग़ज़ के फूल (1959) की असफल प्रेम कथा उन दोनों की स्वयं के जीवन पर आधारित थी। दोनों ही कलाकारों ने फ़िल्म चौदहवीं का चाँद (1960) और साहिब बीबी और ग़ुलाम (1962) में साथ-साथ काम किया।
गुरु दत्त के बाद
10 अक्टूबर, 1964 को गुरुदत्त ने कथित रुप से आत्महत्या कर ली थी जिसके बाद वहीदा अकेली हो गई, लेकिन फिर भी उन्होंने कैरियर से मुंह नहीं मोड़ा और 1965 में गाइड के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड का पुरस्कार मिला। 1968 में आई 'नीलकमल' के बाद एक बार फिर से वहीदा रहमान का कैरियर आसमान की ऊंचाइयां छूने लगा। साल 1974 में उनके साथ काम करने वाले अभिनेता कमलजीत ने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा जिसे वहीदा रहमान ने सहर्ष स्वीकार कर लिया और शादी के बंधन में बंध गईं। वर्ष 2000 उनके ज़िंदगी में एक और धक्के के रुप में आया जब उनके पति की आकस्मिक मृत्यु हो गई पर वहीदा ने यहां भी अपनी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए दुबारा फ़िल्मों में काम करने का निर्णय लिया और 'वाटर', 'रंग दे बसंती' और 'दिल्ली 6' जैसी फ़िल्मों में अपनी बेजोड़ अदाकारी का परिचय दिया।सन 1963 में गुरु दत्त और वहीदा रहमान के बीच अनबन हो गयी और उनके बीच दूरी बढ़ गई। सन् 1964 में गुरु दत्त ने आत्महत्या कर ली। वहीदा रहमान ने 27 अप्रैल 1974 को कमलजीत सिंह, जो कि फ़िल्म शगुन (1964) में उनके साथ हीरो थे, से विवाह कर लिया।

📽️
1956 सी.आई.डी.
1957 प्यासा
1958 12 ओ 'क्लॉक'
1958 सोलवाँ साल
1959 काग़ज़ के फूल
1960 चौदहवीं का चाँद
1960 एक फूल चार कांटे
1960 गर्ल फ्रेंड
1960 काला बाज़ार
1961 रूप की रानी चोरों का राजा
1962 बात एक रात की
1962 बीस साल बाद
1962 राखी
1962 साहिब बीबी और ग़ुलाम
1963 एक दिल सौ अफसाने
1963 मुझे जीने दो
1964 कोहरा
1964 मजबूर
1964 शगुन
1965 गाइड
1966 दिल दिया दर्द लिया
1966 तीसरी कसम
1966 घर का चिराग
1967 पालकी
1967 पत्थर के सनम
1967 राम और श्याम
1968 आदमी
1968 बाज़ी
1968 नीलकमल
1969 खामोशी
1969 मेरी भाभी
1969 शतरंज
1970 दर्पण
1970 धरती
1970 मन की आंखें
1970 प्रेम पुजारी
1971 मन मंदिर
1971 रेशमा और शेरा
1972 दिल का राजा
1972 सुबहो शाम
1972 त्रिसंध्या
1972 जिंदगी जिंदगी
1973 इंसाफ
1973 फागुन
1976 कभी कभी
1976 अदालत
1978 त्रिशूल
1979 आज की धारा
1980 ज्वालामुखी
1980 ज्योति बने ज्वाला
1982 धरम कांता
1982 नमक हलाल
1982 नमकीन
1982 सवाल
1982 कुली
1983 घुंघरू
1983 हिम्मतवाला
1983 महान
1983 प्यासी आंखें
1984 मशाल
1984 मकसद
1984 सनी
1986 अल्ला रक्खा
1986 सिंहासन
1989 चांदनी
1989 लम्हे
1991 स्वयं
1994 उल्फ़त की नई मंजिलें
1999 ईस्ट इज़ ईस्ट
2002 ओम जय जगदीश
2005 15 पॉर्क एव्हेन्यू
2005 मैने गाँधी को नहीं मारा
2005 वाटर
2006 रंग दे बसन्ती
2009 दिल्ली 6
अभिनय के क्षेत्र में बेमिसाल प्रदर्शन के लिए उन्हें साल 1972 में पद्म श्री और साल 2011 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके साथ वहीदा रहमान को दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिल चुका है। भारत के तीसरे सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण के लिए नामित किए जाने पर बॉलीवुड की सदाबहार अभिनेत्री वहीदा रहमान ने सिनेमा उद्योग में और काम करने की उम्मीद ज़ाहिर की है।

नागरिक सम्मान
1972 - पद्मश्री
2011 - पद्म भूषण
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री
1966 - फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - गाइड
1967 - बंगाल फ़िल्मी पत्रकार संघ पुरस्कार - तीसरी कसम
1968 - फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - नीलकमल
1971 - राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार - रेशमा और शेरा
अन्य
1994 - फ़िल्म फ़ेयर लाइफ़टाइम एचीवमेंट अवॉर्ड
2006 - एनटीआर राष्ट्रीय पुरस्कार
वर्तमान में
आज भी वहीदा रहमान फ़िल्मों में सक्रिय हैं और भारतीय सिनेमा के स्वर्ण काल की याद दिलाती हैं। उन्होंने एक से बढ़कर एक हिट फ़िल्में दीं। पति की मृत्यु के पश्चात् वहीदा बैंगलोर छोड़कर मुंबई में अपने दो बच्चों के साथ जीवन व्यतीत कर रही हैं। उनका अभिनय सफर जारी है।

ताहिर हुसैन

#19sep
#02फेब2

मोहम्मद ताहिर हुसैन खान,
🎂: 19 सितंबर 1938, शाहाबाद
⚰️: 02 फ़रवरी 2010, मुम्बई

पत्नी: ज़ीनत हुसैन 
भाई: नासिर हुसैन
बच्चे: फैसल ख़ान, आमिर खान, फरहत खान, निखत खान
माता-पिता: जाफ़र हुसैन खान

 जिन्हें ताहिर हुसैन के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय फिल्म निर्माता, पटकथा लेखक, अभिनेता और फिल्म निर्देशक थे जो हिंदी सिनेमा में अपने काम के लिए जाने जाते थे।ताहिर हुसैन अभिनेता आमिर खान और फैसल खान के पिता थे । हिट फिल्म निर्माता, निर्देशक और लेखक नासिर हुसैन ताहिर हुसैन के बड़े भाई और गुरु थे। ताहिर के बेटे, आमिर खान ने कयामत से कयामत तक में अभिनय किया , यह फिल्म उनके चाचा नासिर हुसैन द्वारा निर्मित और उनके चचेरे भाई मंसूर खान द्वारा निर्देशित थी ।

ताहिर हुसैन ने अपने बेटे आमिर को पहली बार (और एकमात्र) 1990 में तुम मेरे हो निर्देशित फिल्म में निर्देशित किया था।

ताहिर हुसैन भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के रिश्तेदार थे ।  

⚰️02 फरवरी 2010 को गंभीर दिल का दौरा पड़ने से मुंबई में उनका निधन हो गया। 
📽️
कारवां (1971)
Anamika (1973)
Madhosh (1974)
ज़ख्मी (1975)
Phir Janam Lenge Hum/Janam Janam Na Saathi (1977)
Khoon Ki Pukaar (1978)
लॉकेट (1986)
Tum Mere Ho (1990)
Hum Hain Rahi Pyar Ke (1993)
मदहोश (1994) (सहायक निर्माता)

अभिनेता

जब प्यार किसी से होता है (1961)
प्यार का मौसम (1969)सरदार रंजीत कुमार के रूप में
फिर जनम लेंगे हम / जनम जनम ना साथी (1977)
दूल्हा बिकता है (1982)....अदालत में जज

निदेशक

तुम मेरे हो (1990)

लेखक

तुम मेरे हो (1990)
कर्मी दल

तीसरी मंजिल (1966) (उत्पादन कार्यकारी)

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...