शनिवार, 13 जनवरी 2024

सरदार मालिक

#13jan
#27jan 

सरदार मालिक
🎂जन्म की तारीख और समय: 13 जनवरी 1930, कपूरथला
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 27 जनवरी 2006, मुम्बई

बच्चे: अनु मलिक, अबु मलिक, डब्बू
पोते या नाती: अरमान मलिक, अमाल मलिक, अदा मलिक, अनमोल मलिक,

सरदार मलिक का जन्म 13 जनवरी 1930 को कपूरथला , पंजाब, ब्रिटिश भारत में हुआ था । वह नृत्य और गायन सीखने के लिए सबसे पहले उत्तराखंड के अल्मोडा में उदय शंकर के इंडिया कल्चरल सेंटर के छात्र थे । वह वहां कथकली, मणिपुरी और भरतनाट्यम में प्रशिक्षित कोरियोग्राफर बने। इस संस्थान में रहते हुए, उन्होंने उस्ताद अलाउद्दीन खान से संगीत भी सीखा, जो उसी केंद्र में काम करते थे।

बाद में वह 1940 के दशक के अंत में बॉलीवुड में आये और 600 से अधिक गानों के संगीत निर्देशक रहे। उन्हें ठोकर (1953 फ़िल्म) , औलाद (1954), बचपन (1963 फ़िल्म), महारानी पद्मिनी (1964 फ़िल्म) और विशेष रूप से उनकी संगीतमय फ़िल्म सारंगा (1961) में उनके काम के लिए जाना जाता है। फलस्वरूप उन्हें 'सारंगा पुरुष' के नाम से जाना जाने लगा। 

सरदार मलिक का 76 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद 27 जनवरी 2006 को निधन हो गया। मलिक की पत्नी, बिलकिस, गीतकार हसरत जयपुरी की बहन थीं ।  इस जोड़े के तीन बेटे हैं, अनु मलिक , डब्बू मलिक और अबू मलिक । उनके तीनों बेटे अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए बॉलीवुड में संगीत निर्देशक बने।
📽️
चालीस करोड (1946) एक नृत्य कोरियोग्राफर के रूप में
राज़ (1949 फ़िल्म)
लैला मजनू (1953 फ़िल्म) 
ठोकर (1953 फ़िल्म) 
औलाद (1954) 
अब-ए-हयात (1955 फ़िल्म)
मान के आंसू (1959)
मेरा घर मेरे बच्चे (1960)
सारंगा (1961) 
बचपन (1963 फ़िल्म) 
महारानी पद्मिनी (1964 फ़िल्म)
जंतर मंतर (1964) 
ज्ञानी जी (1977) (पंजाबी फ़िल्म)

शक्ति सामंत

#13jan
#09april
शक्ति सामंत
🎂जन्म 13 जनवरी, 1926
जन्म भूमि बर्धमान नगर, बंगाल
⚰️मृत्यु 09 अप्रैल, 2009
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र निर्माता-निर्देशक
मुख्य फ़िल्में हावड़ा ब्रिज, अमर प्रेम, आराधना, कटी पतंग, कश्मीर की कली, अमानुष आदि
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार (तीन बार) सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म बनाने के लिए
नागरिकता भारतीय
उनके पिता एक इंजीनियर थे जिनकी एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उस वक़्त शक्ति सामंत केवल डेढ़ साल के थे। पढ़ाई के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश के बदायूँ में उनके चाचा के पास भेज दिया गया। देहरादून से अपनी 'इंटरमिडीयट' पास करने के बाद उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) जाकर 'इंजिनीयरिंग एंट्रान्स' की परीक्षा दी और अव्वल भी आये। लेकिन जब वो भर्ती के लिए गये तो उन्हें यह कह कर वापस कर दिया गया कि वह परीक्षा केवल बंगाल, बिहार और ओड़िशा के छात्रों के लिए थी और वो उत्तर प्रदेश से आये हुए थे। दुर्भाग्य यहीं पे ख़तम नहीं हुई। जब वो वापस उत्तर प्रदेश गये तो वहाँ पर सभी कालेजों में भर्ती की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी थी। उनका एक साल बिना किसी वजह के बरबाद हो गया। उनके चाचा के कहने पर शक्ति उनके साथ उनके काम में हाथ बँटाने लग गये। साथ ही साथ वो थियटर और ड्रामा के अपने शौक़ को भी पूरा करते रहे। एक रात जब वो थियटर के रिहर्सल से घर देर से लौटे तो उनके चाचा ने उन्हें कुछ भला बुरा सुनाया। इन्हें उनका वह बर्ताव पसंद नहीं आया और उन्होंने अपने चाचा का घर हमेशा के लिए छोड़ दिया।
कैरियर की शुरूआत
अपने चाचा के घर से निकलने के बाद शक्ति मुंबई के आस-पास काम की तलाश कर रहे थे क्योंकि उन्हें पता था कि उनका अंतिम मुक़ाम यह कला-नगरी ही है। उन्हें दापोली में एक 'ऐंग्लो हाई स्कूल' में नौकरी मिल गई। यहाँ से मुंबई स्टीमर से एक घंटे में पहुँची जा सकती थी। उस स्कूल के छात्र ज़्यादातर अफ़्रीकन मुस्लिम थे और 23-24 साल की आयु के थे, जब कि वो ख़ुद 21 साल के थे। शक्ति ने देखा कि स्कूल में छात्रों की चहुँमुखी विकास के लिए साज़-ओ-सामान का बड़ा अभाव है। उन्होंने स्कूल के प्राधानाचार्य से इस बात का ज़िक्र किया और छात्रों के लिए खेल-कूद के कई चीज़ें ख़रीदवाये। छात्र शक्ति के इस अंदाज़ से मुखातिब हुए और उनके अच्छे दोस्त बन गये। अपने चाचा के साथ काम करते हुए शक्ति को महीने के 3000 रुपये मिलते थे, जबकि यहाँ उन्हें केवल 130 रुपये मिलते। उसमें से 30 रुपये खर्च होते और 100 रुपय वो बचा लेते। फ़िल्म जगत में कुछ करने की उनकी दिली तमन्ना उन्हें हर शुक्रवार मुंबई खींच ले जाती। शुक्रवार शाम को वो स्टीमर से मुंबई जाते, वहाँ पर काम ढ़ूंढ़ते और फिर सोमवार की सुबह वापस आ जाते। वो कई फ़िल्म निर्माताओं से मिले, लेकिन वह राजनीतिक हलचल का समय था। देश के बँटवारे के बाद बहुत सारे कलाकार पाकिस्तान चले गये थे। फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए बुरा वक़्त चल रहा था। शक्ति अंत में जाकर दादा मुनि अशोक कुमार से मिले, जो उनके पसंदीदा अभिनेता भी थे, और जो उन दिनो 'बॉम्बे टॉकीज़' से जुड़े हुए थे। दादामुनि ने उन्हें इस शर्त पर सहायक निर्देशक के तौर पर 'बॉम्बे टॉकीज़' में रख लिया कि उन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिलेगी, सिवाय दोपहर के खाने और चाय के। शक्ति राज़ी हो गये। उत्तर प्रदेश में रहने की कारण उनकी हिंदी काफ़ी अच्छी थी। इसलिए वहाँ पर फ़णी मजुमदार के बांग्ला में लिखे चीज़ों को वो हिंदी में अनुवाद किया करते। इस काम के लिए उन्हें पैसे ज़रूर दिये गये। कुछ दिनो के बाद शक्ति ने अशोक कुमार से अपने दिल की बात कही कि वो मुंबई दरसल अभिनेता बनने आये हैं। पर उनकी प्रतिभा और व्यक्तित्व को समझकर दादामुनि ने उनसे अभिनय में नहीं बल्कि फ़िल्म निर्माण के तक़नीकी क्षेत्र में हाथ आज़माने के लिए कहा।
अभिनय और निर्देशन
शक्ति सामंत के दिल में अभिनय करने की चाहत शुरू से ही थी। वो फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल निभाकर इस शौक़ को पूरा कर लेते थे। उनके अनुसार उन्हे हर फ़िल्म में पुलिस इंस्पेक्टर का रोल दे दिया जाता था और एक ही संवाद हर फ़िल्म में उन्हें कहना पड़ता कि "फ़ॉलो कार नम्बर फ़लाना, इंस्पेक्टर फ़लाना स्पीकींग"। फ़िल्म जगत से जुड़े रहने की वजह से कई बड़ी हस्तियों से उनकी जान-पहचान होने लगी थी। दो ऐसे बड़े लोग थे गुरु दत्त और लेखक ब्रजेन्द्र गौड़। गौड़ साहब को फ़िल्म 'कस्तुरी' निर्देशित करने का न्योता मिला, लेकिन किसी दूसरी कंपनी की फ़िल्म में व्यस्त रहने की वजह से इस दायित्व को वो ठीक तरह से निभा नहीं पा रहे थे। इसलिए उन्होंने शक्ति सामंत से उन्हें इस फ़िल्म में उनकी मदद करने को कहा। सामंत साहब ने इस काम के 250 रुपये लिए थे। किसी फ़िल्म से यह उनकी पहली कमाई थी। 'कस्तुरी' (1954) में संगीत पंकज मलिक का था।

पहली फ़िल्म 'इंस्पेक्टर'

गीतकार और निर्माता एस. एच. बिहारी तथा लेखक दरोगाजी 'इंस्पेक्टर' नामक फ़िल्म के निर्माण के बारे में सोच रहे थे। फ़िल्म को 'प्रोड्यूस' करवाने के लिए वो लोग नाडियाडवाला के पास जा पहुँचे। नाडियाडवाला ने कहा कि इस कहानी पर सफल फ़िल्म बनाने के लिए मशहूर और महँगे अभिनेतायों को लेना पड़ेगा। बजट का संतुलन बिगड़ न जाये इसलिए उन लोगों ने इस फ़िल्म के लिए किसी नये निर्देशक को नियुक्त करने की सोची ताकी निर्देशक के लिए ज़्यादा पैसे न खर्चने पड़े। और इस तरह से शक्ति सामंत ने अपनी पहली फ़िल्म 'इंस्पेक्टर' का निर्देशन किया जो सन 1956 में पुष्पा पिक्चर्स के बैनर तले रिलीज़ हुई। फ़िल्म 'हिट' रही और इस फ़िल्म के बाद उन्हें फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। इस फ़िल्म के गाने भी ख़ासा पसंद किये गये। हेमन्त कुमार इस फ़िल्म के संगीतकार थे। यहाँ यह बताना भी ज़रूरी होगा कि शक्ति सामंत ने काम तो पहले 'इंस्पेक्टर' का ही शुरु किया था लेकिन उनकी दूसरी फ़िल्म 'बहू' (1955) पहले प्रदर्शित हो गई
सम्मान और पुरस्कार
शक्ति सामंत को तीन बार सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म बनाने के लिए फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। फ़िल्में थीं आराधना (1969), अमानुष (1975) और अनुराग (1972)।

निधन
अपनी कला और प्रतिभा के ज़रिये फ़िल्म जगत में पहचान बनाने वाले सुप्रसिद्ध निर्माता एवं निर्देशक शक्ति सामंत 9 अप्रैल, 2009 को मुंबई में 83 वर्ष की आयु में उन्होंने इस दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कह कर अपनी अनंत यात्रा पर चले गये।

उस्ताद अहमद जान थिरकवा

#13jan 
उस्ताद अहमद जान थिरकवा

जन्म की तारीख और समय: 
🎂1892, मुरादाबाद
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 13 जनवरी 1976, लखनऊ

इनाम: संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार - हिंदुस्तानी संगीत - इन्स्ट्रुमेंटल (तबला )
एल्बम: थिरकवा, Rhythms Of India - Tabla Recital
उस्ताद अहमद जान थिरकवा अपने उस्ताद "थिरकवा" उप-नाम से संगीत जगत में प्रख्यात हुये। आपका जन्म मुरादाबाद में संगीतज्ञों के परिवार में हुआ। आपको संगीत अपने पिता से विरासत में मिला। यहीं से संगीत की शिक्षा आरंभ हुई। कुछ वर्षों बाद बम्बई में उस्ताद मुनीर खाँ के शागिर्द बन गए और उन्हीं की देख-रेख अभ्यास करते रहे।
उस्ताद अहमद जान थिरकवा (अहमद जान खाँ) (1891-1976) अपने उस्ताद "थिरकवा" उप-नाम से संगीत जगत में प्रख्यात हुये। आपका जन्म मुरादाबाद (उ.प्र.) में संगीतज्ञों के परिवार में हुआ। आपको संगीत अपने पिता से विरासत में मिला। यहीं से संगीत की शिक्षा आरंभ हुई। कुछ वर्षों बाद बम्बई (मुम्बई) में उस्ताद मुनीर खाँ के शागिर्द बन गए और उन्हीं की देख-रेख(40 वर्ष) अभ्यास करते रहे। तबले पर अपनी थिरकती हुई उंगलियों के कारण आपको "थिरकवा" कहा जाने लगा। (+थिरकु कि उपाधि पटियाले के अब्दुल अज़ीज़ ने दी) काफी समय तक रामपुर दरबार में रहे। उस्ताद थिरकवा के तीन पुत्र थे - नबी जान, मुहम्मद जान और अली जान।

आपके कई शिष्य भी प्रसिद्ध तबला वादक बने। जिनमें पंडित जगन्नाथ बुआ पुरोहित, पंडित लालजी गोखले, पंडित भाई गायतोंडे, पंडित बापू पटवर्धन, पंडित नारायण राव जोशी, पंडित सुधीर कुमार वर्मा, पंडित प्रेम वल्लभ जी तथा पंडित निखिल घोष आदि हैं।

खॉ साहब ने चारों घरानों की शिक्षा ली थी। कठोर परिश्रम तथा विचार के पश्चात उन्होंने सारे घरानों को समेट कर अपनी एक सुंदर शैली बनायी। इसे आज भी थिरकवा बाज के नाम से जाना जाता है

उस्ताद 'थिरकवा' जी को कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन् 1970 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

साक्षी तंवर

#12jan
साक्षी तंवर

साक्षी तंवर
जन्म
12 जनवरी 1973
अलवर, राजस्थान, भारत
आवास
मुम्बई, महाराष्ट्र, भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
पेशा
मॉडल, अभिनेत्री, टेलीविजन प्रस्तुतकर्ता
तंवर ने अपना करियर एक टेलीविजन प्रोग्राम में ऐंकर के रूप में 1990 में आरम्भ किया। उनका प्रथम टीवी धारावाहिक दस्तूर था। उसके बाद उन्होंने विभिन्न टेलीविजन धारावाहिकों में कार्य किया। उनका मुख्य अभिनय कहानी घर घर की नामक धारावाहिक में देखने को मिला जिसे बहुत ही सफलता मिली और यह धारावाहिक 2000 से 2008 तक लगातार आठ वर्षों तक चला। उन्होंने इसमें एक महिला पहलवान, पार्वती अग्रवाल का अभिनय किया है।

साक्षी ने दंगल (फ़िल्म) , मोहल्ला अस्सी और बड़े अच्छे लगते हैं, करले तू भी मोहब्बत में भी भूमिका निभाई है। 2015 में साक्षी साक्षी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री काा अवार्ड प्राप्त हुआ
भारत के राजस्थान के अलवर के एक मध्यम वर्गीय राजपूत परिवार में सेवानिवृत्त सीबीआई अधिकारी राजेंद्र सिंह तंवर के यहाँ हुआ था। नई दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक करने से पहले उन्होंने कई केंद्रीय विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की थी । इससे पहले, 1990 में, अपना प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स पूरा करने के बाद , उन्होंने एक पांच सितारा होटल में सेल्स ट्रेनी के रूप में काम किया। कॉलेज में, वह नाटकीय समाज की सचिव और अध्यक्ष थीं।  स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद, प्रशासनिक सेवाओं और जन संचार के लिए प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते समय, उन्होंने 1998 में राष्ट्रीय प्रसारक दूरदर्शन के फिल्मी गीतों पर आधारित कार्यक्रम अलबेला सुर मेला के लिए ऑडिशन दिया; उन्हें प्रस्तुतकर्ता के रूप में चुना गया था।
2018 में साक्षी सिंगल मदर बनीं, जब उन्होंने नौ महीने की बच्ची दित्या तंवर को गोद लिया।
📺
2022 बड़े अच्छे लगते हैं 2
2017 त्यौहार की थाली
2014 मैं ना भूलूंगी
2013 एक थी नायिका
2013 कौन बनेगा करोड़पति 6
2011–2014 बड़े अच्छे लगते हैं
2010 क्राइम पेट्रोल 2 सह प्रस्तोता 
बालिका वधू
2009 कॉफी हाउस
2008 बवंडर में अतिथि 
कहानी हमारे महाभारत की
2005 कौन बनेगा करोड़पति 2 प्रतियोगी
2004 जस्सी जैसी कोई नहीं
2002-2004 देवी
2001-2002 कुटुंब
2000-2008 कहानी घर घर की
1999 अलबेला सुर मेला प्रस्तुतकर्ता
1999 ललिया टेली फिल्म
📽️
2006 ओ रे मनवा 
2008 सी कंपनी
2009 कॉफी हाउस 
2011 आतंकवादी अंकल 
बावरा मन
2015 कटयार कलजात घुसाली
2016 दंगल दया 
2018 मोहल्ला अस्सी
2021 100 डायल करें
2022 सम्राट पृथ्वीराज

सी रामचंद्र

#12jan
#05jan
सी रामचंद्र
🎂12 जनवरी 1918, पुणतांबा
⚰️: 05 जनवरी 1982, मुम्बई
भारत के फिल्म उद्योग के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे।
संगीतकार की भूमिका में उन्होंने अधिकतर सी नाम का प्रयोग किया।
हालाँकि, रामचन्द्र ने अन्नासाहेब (फिल्मों बहादुर प्रताप, मतवाले और मददगार में), राम चितलकर (फिल्मों सुखी जीवन, बदला, मिस्टर में) नामों का भी इस्तेमाल किया था।
झटपट, बहादुर, और दोस्ती), और श्यामू (फिल्म ये है दुनिया में)।
इसके अलावा, वह अक्सर आर नाम से मराठी फिल्मों में गाते और अभिनय करते थे।
एन।
चितलकर.
एक सामयिक पार्श्व गायक के रूप में अपने करियर के लिए उन्होंने केवल अपने उपनाम चितलकर का उपयोग किया।
चितलकर ने लता के साथ कुछ प्रसिद्ध और अविस्मरणीय युगल गीत गाए जैसे फिल्म आज़ाद में कितना हसीं है मौसम या अलबेला में शोला जो भड़के।
मुख्य फ़िल्में शहनाई, समाधि, अलबेला, अनारकली, नास्तिक, आज़ाद, नवरंग, तीरंदाज, शतरंज, आशा, अमरदीप, शारदा आदि।
बाल्यकाल से ही उनका रुझान संगीत की ओर था। हिन्दी फ़िल्म संगीत को सुरों से नहलाने वाले संगीतकार सी. रामचन्द्र के नाम से उनके तमिल भाषी होने का अनुमान लगाया जाता है, किंतु वे तमिल भाषी नहीं थे। वे पुणे के पास एक गाँव के मराठी देशरथ ब्राह्मण थे। हालांकि यह बात उल्लेखनीय है कि उन्हें सबसे पहले एक तमिल फ़िल्म में ही संगीत देने का मौंका मिला था। संक्रान्ति से दो दिन पहले जन्म लेने वाले सी. रामचन्द्र को असल में कृष्ण की तरह दो माताएँ मिली थीं। जन्म देने वाली माँ के हिस्से का प्यार उन्होंने सौतेली माँ से पाया था। उनके पिता रेलवे में सरकारी कर्मचारी थे। दिन-रात रेल के इंजनों की कर्कश आवाज़ सुनकर भी रामचन्द्र संगीतकार बने। घर में भी संगीत के नाम पर केवल संस्कृत के श्लोक ही गूंजते थे।

सी. रामचन्द्र का पढ़ाई में मन नहीं लगता था। उन्होंने पहली बार एक नाटक में काम किया और उसके लिए गाया भी। इस पर उन्हें वाहवाही मिली थी। इसी दौरान उन्हें सिनेमा देखने और उसमें काम करने का शौक़ लगा। लेकिन नागपुर में फ़िल्मों का निर्माण होता ही नहीं था। इसीलिए वे पुणे आ गये। यहाँ उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा 'गंधर्व महाविद्यालय', महाराष्ट्र के विनायकबुआ पटवर्धन से प्राप्त की। बाद में नागपुर के 'श्रीराम संगीत विद्यालय' में शंकरराव से भी संगीत की शिक्षा ग्रहण की।

फ़िल्मी शुरुआत
सी.रामचन्द्र ने अपने सिने कैरियर की शुरुआत बतौर अभिनेता यू. बी. राव की फ़िल्म 'नागानंद' से की। इस बीच सी. रामचन्द्र को 'मिनर्वा मूवीटोन' की निर्मित कुछ फ़िल्मों में भी अभिनय करने का मौका मिला। इसी समय उनकी मुलाकात महान् निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी से हुई। सोहराब मोदी ने सी. रामचन्द्र को सलाह दी कि यदि वह अभिनय के बजाए संगीत की ओर ध्यान दें तो फ़िल्म इंडस्ट्री में सफल कामयाब हो सकते हैं। इसके बाद सी. रामचन्द्र 'मिनर्वा मूविटोन' के संगीतकार बिन्दु ख़ान और हबीब ख़ान के ग्रुप में शामिल हो गए। अब वे ग्रुप में बतौर हारमोनियम वादक काम करने लगे थे। बतौर संगीतकार सी. रामचन्द्र को सबसे पहले एक तमिल फ़िल्म में काम करने का मौका मिला।1942 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सुखी जीवन' की सफलता के बाद सी. रामचन्द्र कुछ हद तक बतौर संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। चालीस के दशक में सी. रामचन्द्र ने एक संगीतकार के रूप में जिन फ़िल्मों को संगीतबद्ध किया था, उनमें 'सावन' (1945), 'शहनाई' (1947), 'पतंगा' (1949) और 'समाधि' एवं 'सरगम' (1950) जैसी फ़िल्में उल्लेखनीय हैं। सन 1951 में सी. रामचन्द्र को भगवान दादा की निर्मित फ़िल्म 'अलबेला' में संगीत देने का मौका मिला। 1951 में प्रदर्शित फ़िल्म 'अलबेला' में अपने संगीतबद्ध गीतों की कामयाबी के बाद सी. रामचन्द्र एक सफल संगीतकार के रूप में फ़िल्मी दुनिया में जम गए। वैसे तो फ़िल्म 'अलबेला' में उनके संगीतबद्ध सभी गाने सुपरहिट हुए, लेकिन ख़ासकर "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के", "भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे", "मेरे पिया गए रंगून, किया है वहाँ से टेलीफोन" आदि गीतों ने भारत में धूम मचा दी।

फ़िल्म निर्माण
सन 1953 में प्रदीप कुमार और बीना राय अभिनीत फ़िल्म 'अनारकली' की सफलता के बाद सी. रामचन्द्र शोहरत की बुंलदियों पर पहुँच गये। फ़िल्म 'अनारकली' में उनके संगीत से सजे ये गीत "जाग दर्द-ए-इश्क जाग..", "ये ज़िंदगी उसी की है.. ", श्रोताओं के बीच बहुत लोकप्रिय हुए। 1953 में सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया और 'न्यू सांई प्रोडक्शन' का निर्माण किया, जिसके बैनर तले उन्होंने 'झांझर', 'लहरें' और 'दुनिया गोल है' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया। लेकिन ये उनका दुर्भाग्य ही था कि इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं सकी। इसके बाद सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म निर्माण से तौबा कर ली और अपना ध्यान संगीत की ओर जी लगाना शुरू कर दिया। वर्ष 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'नास्तिक' में उनके संगीतबद्ध गीत "देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान", समाज में बढ़ रही कुरीतियों के उपर उनका सीधा प्रहार था। इस गीत की प्रसिद्धि ने उन्हें फिर से लोकप्रिय बना दिया।
राजेन्द्र कृष्ण से जोड़ी
सी. रामचन्द्र के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के साथ बहुत चर्चित रही। उनकी और राजेन्द्र कृष्ण की जोड़ी वाली फ़िल्मो में 'पतंगा' (1949), 'ख़ज़ाना' (1951), 'अलबेला' (1951), 'साकी' (1952), 'अनारकली' (1953), 'कवि' (1954), 'तीरंदाज' (1955), 'शतरंज' (1956), 'शारदा' (1957), 'आशा' (1957) और 'अमरदीप' (1958) जैसी फ़िल्में शामिल हैं। पचास के दशक में स्वरों के लिए विख्यात लता मंगेशकर ने संगीतकार सी. रामचन्द्र की धुनों पर कई गीत गाए, जिनमें फ़िल्म 'अनारकली' के गीत "ये ज़िंदगी उसी की है...", "जाग दर्दे-ए-इश्क जाग.." जैसे गीत इन दोनों फनकारों की जोड़ी की बेहतरीन मिसाल हैं।

पुन: लोकप्रियता की प्राप्ति
साठ का दशक सी. रामचन्द्र के लिए बुरा वक़्त था। इस दशक में पाश्चात्य गीत-संगीत की चमक से निर्माता-निर्देशक स्वयं को नहीं बचा सके और धीरे-धीरे निर्देशकों ने सी. रामचन्द्र की ओर से अपना मुख मोड़ लिया। लेकिन 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म 'तलाक' और 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैग़ाम' में उनके संगीतबद्ध गीत "इंसान का इंसान से हो भाईचारा.." की कामयाबी के बाद सी. रामचन्द्र एक बार फिर से अपनी खोयी हुई लोकप्रियता पाने में सफल हो गए।

भारत के वीर जवानों को श्रद्धाजंलि देने के लिए कवि प्रदीप ने 1962 में "ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी.." गीत की रचना की। इस गीत का संगीत तैयार करने की जिम्मेंदारी उन्होंने सी. रामचन्द्र को सौंप दी। सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में एक कार्यक्रम के दौरान स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण इस गीत को सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आँखों में आँसू छलक आए थे। "ऐ मेरे वतन के लोगों.." गीत को संगीत देकर सी. रामचन्द्र ने जैसे इस गीत को अमर बना दिया। आज भी भारत के महान् देशभक्ति गीत के रूप में याद किया जाता है।

पा‌र्श्वगायन
साठ के दशक में सी. रामचन्द्र ने 'धनंजय' और 'घरकुल' जैसी मराठी फ़िल्मों का निर्माण किया। उन्होंने इन फ़िल्मों में अभिनय और संगीत निर्देशन भी किया। संगीत निर्देशन के अतिरिक्त सी. रामचन्द्र ने अपने पा‌र्श्वगायन से भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। इन गीतों में "मेरी जान मेरी जान संडे के संडे.." (शहनाई, 1947), "कदम कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा.." (समाधि, 1950), "भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे..", "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के.." (अलबेला, 1951), "कितना हसीं है मौसम कितना हसीं सफर है..." (आजाद, 1955), "आ जा रे नटखट ना छू रे मेरा घूंघट.." (नवरंग, 1959) जैसे न भूलने वाले गीत भी शामिल है। सी. रामचन्द्र ने अपने चार दशक के लंबे सिने करियर में लगभग 150 फ़िल्मों को संगीतबद्ध किया। हिन्दी फ़िल्मों के अतिरिक्त उन्होंने तमिल, मराठी, तेलुगू और भोजपुरी फ़िल्मों को भी संगीतबद्ध किया।

प्रसिद्ध संगीतबद्ध गीत

सी. रामचन्द्र के कुछ संगीतबद्ध गीत निम्नलिखित हैं-

मेरी जान मेरी जान संडे के संडे - शहनाई (1947)
कदम कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा - समाधि (1950)
शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के - अलबेला (1951)
भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे - अलबेला
मेरे पिया गए रंगून, किया है वहाँ से टेलीफोन - अलबेला
बलमा बड़ा नादान - अलबेला
ये ज़िंदगी उसी की है, जो किसी का हो गया - अनारकली (1953)
जाग दर्द इश्क जाग - अनारकली (1953)
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान - नास्तिक (1954)
कितना हसीं है मौसम कितना हसीं सफर है - आजाद (1955)
देखो जी बहार आई - आजाद (1955)
आ जा रे नटखट ना छू रे मेरा घूंघट - नवरंग, (1959
ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख में भर लो पानी - (1962)
निधन
अपने संगीतबद्ध गीतों से श्रोताओं के दिलों पर राज करने वाले महान् संगीतकार सी. रामचन्द्र ने 5 जनवरी, 1982 को इस दुनिया से विदा ली। लेकिन उनके संगीतबद्ध गीत आज भी हर किसी की जुबान पर आते रहते हैं।

अमरीश पुरी

#22jun
#12jan 
Amrish Puri
अमरीश पुरी
*🎂जन्म की तारीख और समय: 22 जून 1932, नवांशहर*
*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 12 जनवरी 2005, Hinduja Hospital OPD Building, मुम्बई*
बच्चे: नम्रता पुरी, राजीव पुरी
पत्नी: उर्मिला दिवेकर (विवा. 1957–2005)
भाई: मदन पुरी, चमन पुरी, हरीश सिंह पुरी, चंद्रकांता मेहरा
अमरीश पुरी (जन्म:२२ जून १९३२ -मृत्यु:१२ जनवरी २००५) चरित्र अभिनेता मदन पुरी के छोटे भाई अमरीश पुरी हिन्दी फिल्मों की दुनिया का एक प्रमुख स्तंभ रहे हैं। अभिनेता के रूप निशांत, मंथन और भूमिका जैसी फ़िल्मों से अपनी पहचान बनाने वाले श्री पुरी ने बाद में खलनायक के रूप में काफी प्रसिद्धी पायी। उन्होंने १९८४ में बनी स्टीवेन स्पीलबर्ग की फ़िल्म "इंडियाना जोन्स एंड द टेम्पल ऑफ़ डूम" (अंग्रेज़ी- Indiana Jones and the Temple of Doom) में मोलाराम की भूमिका निभाई जो काफ़ी चर्चित रही। इस भूमिका का ऐसा असर हुआ कि उन्होंने हमेशा अपना सिर मुँडा कर रहने का फ़ैसला किया। इस कारण खलनायक की भूमिका भी उन्हें काफ़ी मिली। व्यवसायिक फिल्मों में प्रमुखता से काम करने के बावज़ूद समांतर या अलग हट कर बनने वाली फ़िल्मों के प्रति उनका प्रेम बना रहा और वे इस तरह की फ़िल्मों से भी जुड़े रहे। फिर आया खलनायक की भूमिकाओं से हटकर चरित्र अभिनेता की भूमिकाओं वाले अमरीश पुरी का दौर। और इस दौर में भी उन्होंने अपनी अभिनय कला का जादू कम नहीं होने दिया फ़िल्म मिस्टर इंडिया के एक संवाद "मोगैम्बो खुश हुआ" किसी व्यक्ति का खलनायक वाला रूप सामने लाता है तो फ़िल्म DDLJ का संवाद "जा सिमरन जा - जी ले अपनी ज़िन्दगी" व्यक्ति का वह रूप सामने लाता है जो खलनायक के परिवर्तित हृदय का द्योतक है। इस तरह हम पाते हैं कि अमरीश पुरी भारतीय जनमानस के दोनों पक्षों को व्यक्त करते समय याद किये जाते हैं ।
माता-पिता: एस० निहाल सिंह पुरी, वेद कौर
पढ़ाई● अमरीश पुरी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पजाब से की। उसके बाद वह शिमला चले गए। शिमला के बी एम कॉलेज(B.M. College) से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत में वह रंगमंच से जुड़े और बाद में फिल्मों का रुख किया। उन्हें रंगमंच से उनको बहुत लगाव था। एक समय ऐसा था जब अटल बिहारी वाजपेयी और स्व. इंदिरा गांधी जैसी हस्तियां उनके नाटकों को देखा करती थीं। पद्म विभूषण रंगकर्मी अब्राहम अल्काजी से 1961 में हुई ऐतिहासिक मुलाकात ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और वे बाद में भारतीय रंगमंच के प्रख्यात कलाकार बन गए।

●करियर● अमरीश पुरी ने 1960 के दशक में रंगमंच की दुनिया से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। उन्होंने सत्यदेव दुबे और गिरीश कर्नाड के लिखे नाटकों में प्रस्तुतियां दीं। रंगमंच पर बेहतर प्रस्तुति के लिए उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी की तरफ से पुरस्कार दिया गया, जो उनके अभिनय कॅरियर का पहला बड़ा पुरस्कार था।

अमरीश पुरी के फ़िल्मी करियर शुरुआत साल 1971 की ‘प्रेम पुजारी’ से हुई। पुरी को हिंदी सिनेमा में स्थापित होने में थोड़ा वक्त जरूर लगा, लेकिन फिर कामयाबी उनके कदम चूमती गयी। 1980 के दशक में उन्होंने बतौर खलनायक कई बड़ी फिल्मों में अपनी छाप छोड़ी। 1987 में शेखर कपूर की फिल्म ‘मिस्टर इंडिया में मोगैंबो की भूमिका के जरिए वे सभी के जेहन में छा गए। 1990 के दशक में उन्होंने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ‘घायल’ और ‘विरासत’ में अपनी सकारात्मक भूमिका के जरिए सभी का दिल जीता।

अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड़, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों तथा हॉलीवुड फिल्म में भी काम किया। उन्होंने अपने पूरे कॅरियर में 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में 'निशांत', 'गांधी', 'कुली', 'नगीना', 'राम लखन', 'त्रिदेव', 'फूल और कांटे', 'विश्वात्मा', 'दामिनी', 'करण अर्जुन', 'कोयला' आदि शामिल हैं। दर्शक उनकी खलनायक वाली भूमिकाओं को देखने के लिए बेहद उत्‍साहित होते थे।

उनके जीवन की अंतिम फिल्‍म 'किसना' थी जो उनके निधन के बाद वर्ष 2005 में रिलीज़ हुई। उन्‍होंने कई विदेशी फिल्‍मों में भी काम किया। उन्‍होंने इंटरनेशनल फिल्‍म 'गांधी' में 'खान' की भूमिका निभाई था जिसके लिए उनकी खूब तारीफ हुई थी। अमरीश पुरी का 12 जनवरी 2005 को 72 वर्ष के उम्र में ब्रेन ट्यूमर की वजह से उनका निधन हो गया। उनके अचानक हुए इस निधन से बॉलवुड जगत के साथ-साथ पूरा देश शोक में डूब गया था। आज अमरीश पुरी इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें आज भी फिल्मों के माध्यम से हमारे दिल में बसी हैं।

अरुण गोविल

#12jan
अरुण गोविल
:🎂 12 जनवरी 1958  मेरठ
पत्नी: श्रीलेखा गोविल
बच्चे: सोनिका गोविल, अमल गोविल
माता-पिता: श्री चंद्रा प्रकाश गोविल
भाई: विजय गोविल
अरुण गोविल का जन्म राम नगर उत्तरप्रदेश में हुआ৷ इनकी प्रारम्भिक शिक्षा उत्तरप्रदेश से ही हुई৷ उन्ही दिनों यह नाटक में अभिनय करते थे৷ इनके पिता चाहते थे कि यह एक सरकारी नौकरीपेशा बने पर अरुण गोविल का सोचना विपरीत था৷ अरुण कुछ ऐसा करना चाहते थे जो यादगार बने, इसलिए सन् 1975 में यह बम्बई चले गए और वहाँ खुद का व्यवसाय प्रारम्भ किया उस वक्त यह केवल 17 वर्ष के थे৷ कुछ दिनों के बाद इन्हें अभिनय के नए नए रास्ते मिलना शुरु हुए৷
अरुण गोविल ज्यादातर राजश्रीवालों की पारिवारिक फ़िल्मों में काम करते थे, जिनमें जीवन मूल्यों को अनदेखा नहीं किया जाता है। रामानंद सागर-निर्देशित रामायण में भगवान राम का किरदार भी ऐसे ही था। इसलिए गोविल भी राम का किरदार अच्छे से कर पाए और यही उनकी शोहरत का मुख्य कारण बना।
📽️
2023 हुकुस बुकुस 
1985 लल्लू राम 
1982 अय्याश
1981 इतनी सी बात
1981 श्रद्धान्जलि 
1981 जियो तो ऐसे जियो 
1980 जुदाई
1979 सावन को आने दो 
1979 राधा और सीता
1979 साँच को आँच नही 
1977 पहेली

डोनल ट्रंप और राहुल गांधी

डोनाल्ड ट्रंप और राहुल गांधी की राजनीतिक शैली, भाषणों और घटनाओं पर हल्के-फुल्के अंदाज में तुलना करता है। ये दोनों ही दुनिया के बड़े 'कॉम...