शनिवार, 6 जनवरी 2024

दलजीत दोसांझ

#06jan
दिलजीत दोसांझ
🎂06 जनवरी 1984
दोसांझ कलां , पंजाब , भारत
दिलजीत दोसांझ (जन्म 6 जनवरी 1984) एक भारतीय गायक, गीतकार, अभिनेता, फिल्म निर्माता और टेलीविजन व्यक्तित्व हैं। वह पंजाबी संगीत और उसके बाद पंजाबी और हिंदी सिनेमा में काम करते हैं । दोसांझ ने 2020 में बिलबोर्ड द्वारा सोशल 50 चार्ट में प्रवेश किया । उन्हें कनाडाई एल्बम चार्ट , आधिकारिक चार्ट कंपनी द्वारा यूके एशियाई चार्ट और न्यूजीलैंड हॉट सिंगल्स सहित विभिन्न संगीत चार्ट में दिखाया गया है । उनकी फिल्में, जिनमें जट्ट एंड जूलियट 2 , पंजाब 1984 , सज्जन सिंह रंगरूट और होन्सला राख शामिल हैं , इतिहास में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली पंजाबी फिल्मों में से हैं ।

व्यवसाय
गायकगीतकारअभिनेताटेलीविजन व्यक्तित्वनिर्माता
सक्रिय वर्ष
2002-वर्तमान
संगीत कैरियर
शैलियां
जल्दी से आनाआर एंड बीहिप हॉपपॉप रैप
लेबल
वार्नर संगीतसोनी म्यूजिक इंडियास्पीड रिकॉर्ड्स ( टाइम्स म्यूजिक )धर्म सेवामूवीबॉक्स रिकॉर्ड्सफाइनटोन कैसेट्सटी-सीरीज़प्रसिद्ध स्टूडियोज़ी म्यूजिक कंपनी
दिलजीत दोसांझ का जन्म 6 जनवरी 1984 को भारत के पंजाब के जालंधर जिले की फिल्लौर तहसील के दोसांझ कलां गांव में एक सिख [8] परिवार में हुआ था । उनके पिता, बलबीर सिंह, पंजाब रोडवेज के पूर्व कर्मचारी हैं और उनकी माँ, सुखविंदर कौर, एक गृहिणी हैं। उनके दो भाई-बहन हैं, एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई।  उन्होंने अपना प्रारंभिक बचपन दोसांझ कलां में बिताया और फिर लुधियाना , पंजाब चले गए जहां से उन्होंने डी ब्लॉक मॉडल के पास श्री गुरु हरकृष्ण पब्लिक स्कूल (पंजाब राज्य शिक्षा बोर्ड अब सीबीएसई से संबद्ध) से हाई स्कूल में स्नातक करने सहित अपनी औपचारिक शिक्षा पूरी की। शहर अरवा ओड लुधियाना. स्कूल में रहते हुए, उन्होंने स्थानीय गुरुद्वारों में कीर्तन (सिख धार्मिक संगीत) प्रस्तुत करके अपने गायन करियर की शुरुआत की । दलजीत सिंह और उनका परिवार फिर लुधियाना चले गए और वर्तमान में वहीं रह रहे हैं।
📽️पंजाबी
2010 मेल करादे रब्बा
2010 पंजाब का शेर
2011 जिने मेरा दिल लुटिया
2012 जट और जूलियट
2013 सादी लव स्टोरी
जट्ट और जूलियट 2
डिस्को सिंह
पंजाब
1984 मान (शिव)
2015 सरदारजी
मुख्तियार चड्ढा
2016 जट अम्बरसरिया
सरदारजी 2 सरदारजी जग्गी
सिंह, सरदारजी अथरा सिंह और सरदारजी सत्कार सिंह

तिहरी भूमिका
2017 सुपर सिंह साजन सैम सुपर सिंह
2018 सज्जन सिंह रंगरूट सज्जन सिंह
2019 शादा चढ़ता
2021 होन्सला राख येंकी सिंह निर्माता भी
2022 बेब भांगड़ा पौंडे ने जग्गी निर्माता भी
2023 जोड़ी सितारा
2024 जट्ट और जूलियट 3
📽️हिंदी

2012 तेरे नाल लव हो गया
2016 उड़ता पंजाब
2017 फिल्लौरी
2018 न्यूयॉर्क में स्वागत है
2018 सूरमा
2019 अर्जुन पटियाला
2019 गुड न्यूज
2020 सूरज पे मंगल भारी
2022 जोगी
📺

2010 आवाज़ पंजाब दी वह स्वयं मेज़बान; रियलिटी शो
2012 पीटीसी पंजाबी फिल्म पुरस्कार 2012 मेज़बान; टेलीविजन विशेष
2013 पीटीसी पंजाबी फिल्म पुरस्कार 2013
2014 पीटीसी पंजाबी फिल्म पुरस्कार 2014
2017–2019 उभरता सितारा न्यायाधीश;
रियलिटी शो

रामेश्वरी

#06jan 

अभिनेत्री रामेश्वरी 

🎂 06 जनवरी 1958

रामेश्वरी का जन्म 06 जनवरी 1958 में आंध्र प्रदेश में हुआ था वही जन्मी और पली-बढ़ीं और उन्होंने अपना बचपन काकीनाडा में बिताया वह दो बहनों में छोटी है वह दिग्गज हिंदी अभिनेत्री राजश्री (वी। शांताराम की बेटी) से काफी मिलती जुलती है

वैसे तो सभी दुल्हन सुंदर होती हैं। आकर्षक और मनमोहक होती हैं। लेकिन दुल्हन का दुल्हन होना तब सार्थक होता है, जब वह अपने पिया के मन यानी उसके दिल-दिमाग को भा जाए। ऐसी ही दुल्हन आई थी 1977 में। हिन्दी सिनेमा के परदे पर। पेश किया था राजश्री प्रोडक्शन ने। फिल्म का नाम था - दुल्हन वही जो पिया मन भाए। और दुल्हन बनी थीं आंध्र प्रदेश के काकीनाड़ा की साँवली-सुंदर-सलोनी तल्लुरी रामेश्वरी। बाद में सिर्फ रामेश्वरी के नाम से वे दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो गईं। दुल्हन वही जो पिया मन भाये ने देश के सिनेमाघरों में सिल्वर और गोल्डन जुबिली मनाकर रातों-रात रामेश्वरी को स्टार बना दिया था।

उस दौर में साँवले रंग की लड़की को हीरोइन के काबिल नहीं माना जाता था। गोरा रंग पहली शर्त होती थी। सांवली लड़की को हीरोइन की सहेली के रोल मिला करते थे। जया बच्चन ने रंग के बदले नहीं बल्कि अपनी प्रतिभा के बल पर सफलता पाई थी।

रामेश्वरी ने जब करियर आरंभ किया, तब जया बच्चन शादी कर परिवार में व्यस्त हो गई थी। रामेश्वरी के उदय के कारण यह माना गया कि फिल्म इंडस्ट्री को नई जया मिल गई है। रामेश्वरी ने एकदम सादगी अपनाई। ठीक जया भादुड़ी स्टाइल में उनका स्क्रीन प्रजेंस इतना प्रभावी हो गया था कि दर्शक टकटकी लगाकर देखा करता था।

इसके पहले कि रामेश्वरी उनसे की गई अपेक्षाओं पर खरा उतर पातीं, ना जाने उन्हें किसकी नजर लग गई। फिल्म सुनयना की शूटिंग के दौरान उनकी आँख में चोट लग गई। इससे उनकी एक आँख छोटी हो गई जो रामेश्वरी के करियर में बहुत बड़ी रूकावट बन गई। दुल्हन वही जो पिया मन भाये जैसी फिल्में उन्हें दोबारा नहीं मिल पाई। मजबूर होकर उन्हें सेकण्ड लीड वाले रोल करना पड़े।

रामेश्वरी के फिल्म करियर की एक ट्रेजेडी यह रही कि उन्हें अन्य दक्षिण भारतीय हीरोइन की तरह बम्बइया नामी-गिरामी हीरो नहीं मिल पाए। उस दौर में हर हीरो ग्लैमरस हीरोइन चाहता था और रामेश्वरी के पास सादगी थी। जबकि रामेश्वरी के पहले या बाद में दक्षिण भारत से आई वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, जया प्रदा, श्रीदेवी को स्टार वैल्यू के हीरो मिलने से उनकी चमक-दमक दो गुनी हो गई थी।

रामेश्वरी को प्रेमकिशन (दुल्हन वही जो पिया मन भाये), राज किरण (मान-अभिमान, साजन मेरे मैं साजन की, वक्त वक्त की बात) और मुकेश खन्ना (मुझे कसम है) जैसे नायक मिले, जो बॉलीवुड फिल्मों में तीसरी पंक्ति के कलाकार माने जाते हैं।

सुनयना फिल्म में नसीरुद्दीन शाह जैसे नायक का साथ तो मिला, लेकिन नसीर आर्ट फिल्म के हीरो माने जाते थे और कमर्शियल फिल्मों के लिए उन्हें उपयुक्त नहीं माना जाता था। फिल्म अग्निपरीक्षा में अमोल पालेकर, शारदा और आशा फिल्म में जीतेन्द्र, कालका में शत्रुघ्न सिन्हा का साथ मिला,लेकिन रामेश्वरी लीड रोल में नहीं थी।

वक्त वक्त की बात में राकेश रोशन भी उनके साथ थे। उनकी भी संघर्षरत अभिनेता से ज्यादा हैसियत नहीं थी। मेरा रक्षक तथा आदत से मजबूर फिल्मों में मिठुन चक्रवर्ती सहनायक थे, लेकिन इनमें रामेश्वरी के अलावा अन्य हीरोइन भी थी। उस दौर के टॉप एक्टर्स अमिताभ, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, ऋषि कपूर का साथ रामेश्वरी को कभी नहीं मिल पाया।

यही हाल फिल्म डायरेक्टर्स का रहा। ए-श्रेणी के निर्देशकों का स्पर्श नही मिलने से भी रामेश्वरी हिन्दी सिनेमा में अपना ऊँचा मकाम नहीं बना सकी। हीरेन नाग, जे. ओमप्रकाश और लेख टंडन के साथ एक या दो फिल्में करने से बात नहीं बन पाई।

फिर दक्षिण की ओर
अपने दशक के हिन्दी फिल्म सफर में रामेश्वरी को यह समझ आ गई थी कि वे उत्तर भारतीय सिनेमा में ज्यादा दिनों तक चल नहीं पाएगी और सुपरहिट सक्सेस तो उन्हें मिलना भी नहीं है। इसलिए उन्होंने तेलुगु फिल्मों में अपना अभिनय जारी रखा।

तेलुगु फिल्मों के प्रतिष्ठित फिल्मकार के.विश्वनाथ की फिल्म सीतामालक्ष्मी रामेश्वरी के करियर की क्लासिक फिल्म मानी जाती है। फिल्मों के ऑफर्स कम हो गए तो रामेश्वरी ने छोटे परदे की ओर भी कदम बढ़ाए। मितवा फूल के, जब लव हुआ, बाबुल का आँगन छूटे ना जैसे धारावाहिकों में उन्होंने काम किया।

रामेश्वरी का जीवन-वृत्त बहुआयामी रहा है। पुणे फिल्म एंड टीवी इंस्टीट्यूट से 1975 में उसने अभिनय में स्नातक उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने कई भाषाओं की फिल्मों में काम किया है। इंस्टीट्यूट के सहपाठी और पंजाबी फिल्मों के अभिनेता, निर्माता दीपक सेठ से शादी की है। दोनों के दो बेटे हैं- भास्कर प्रताप और सूर्य प्रेम।

अपने पति के साथ मिलकर 1988 में रामेश्वरी ने हिंदी फिल्म हम फरिश्ते नहीं का निर्माण कर अभिनय भी किया है। शेक्सपीयर के नाटक द कॉमेडी ऑफ एरर्स पर 2007 में पंजाबी फिल्म भी बनाई। इन दिनों कभी-कभी रामेश्वरी फिल्मों में दिख जाती है, जैसे बंटी और बबली (2005) और फाल्तू (2011) में।

प्रमुख फिल्में :

दुल्हन वहीं जो पिया मन भाये (1977), मेरा रक्षक (1978), सुनयना (1979), आशा (1980), मान अभिमान (1980), शारदा (1981), अग्नि परीक्षा (1981), आदत से मजबूर (1981), कालका (1983), मान मर्यादा (1984)

शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

सी.रामचन्द्ररामचन्द्र नरहर चितलकर

#12jan
#05jan 
सी.रामचन्द्ररामचन्द्र नरहर चितलकर

🎂12 जनवरी 1918
पुणतांबा , अहमदनगर जिला , बॉम्बे प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत05 जनवरी 1982 (आयु 63 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत

अन्य जिन नामों से पहिचान बनाई सी. रामचन्द्र, चितलकर, अन्ना साहब
व्यवसाय फ़िल्म संगीतकार , फ़िल्म निर्माता

प्रसिद्ध संगीतकार, गायक, फ़िल्म निर्माता सी रामचन्द्र
चितळकर रामचन्द्र न केवल संगीत निर्देशन की प्रतिभा से परिपूर्ण थे, अपितु उन्होंने अपनी गायकी, फ़िल्म निर्माण, निर्देशन और अभिनय से भी सिने प्रेमियों को अपना दीवाना बनाए रखा।

 फ़िल्म जगत में 'अन्ना साहब' के नाम से मशहूर सी. रामचन्द्र से फ़िल्मों से जुड़ी कोई भी विधा अछूती नहीं रही थी। वह ऐसे हंसमुख इंसान थे, जिनकी उपस्थिति मात्र से ही माहौल खुशनुमा हो जाता था। हँसते-हँसाते रहने की प्रवृत्ति को उन्होंने अपने संगीत निर्देशन और गायकी में भी खूब बारीकी से उकेरा था। सी. रामचन्द्र का यह अंदाज आज भी उनके चहेतों की यादों में बसा हुआ है।

सी. रामचन्द्र का जन्म 12 जनवरी, सन 1918 में महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के एक छोटे-से गांव 'पुंतबा' में हुआ था। बाल्यकाल से ही उनका रुझान संगीत की ओर था। हिन्दी फ़िल्म संगीत को सुरों से नहलाने वाले संगीतकार सी. रामचन्द्र के नाम से उनके तमिल भाषी होने का अनुमान लगाया जाता है, किंतु वे तमिल भाषी नहीं थे। वे पुणे के पास एक गाँव के मराठी देशरथ ब्राह्मण थे। हालांकि यह बात उल्लेखनीय है कि उन्हें सबसे पहले एक तमिल फ़िल्म में ही संगीत देने का मौंका मिला था। संक्रान्ति से दो दिन पहले जन्म लेने वाले सी. रामचन्द्र को असल में कृष्ण की तरह दो माताएँ मिली थीं। जन्म देने वाली माँ के हिस्से का प्यार उन्होंने सौतेली माँ से पाया था। उनके पिता रेलवे में सरकारी कर्मचारी थे। दिन-रात रेल के इंजनों की कर्कश आवाज़ सुनकर भी रामचन्द्र संगीतकार बने। घर में भी संगीत के नाम पर केवल संस्कृत के श्लोक ही गूंजते थे।

सी. रामचन्द्र का पढ़ाई में मन नहीं लगता था। उन्होंने पहली बार एक नाटक में काम किया और उसके लिए गाया भी। इस पर उन्हें वाहवाही मिली थी। इसी दौरान उन्हें सिनेमा देखने और उसमें काम करने का शौक़ लगा। लेकिन नागपुर में फ़िल्मों का निर्माण होता ही नहीं था। इसीलिए वे पुणे आ गये। यहाँ उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा 'गंधर्व महाविद्यालय', महाराष्ट्र के विनायकबुआ पटवर्धन से प्राप्त की। बाद में नागपुर के 'श्रीराम संगीत विद्यालय' में शंकरराव से भी संगीत की शिक्षा ग्रहण की।

सी.रामचन्द्र ने अपने सिने कैरियर की शुरुआत बतौर अभिनेता यू. बी. राव की फ़िल्म 'नागानंद' से की। इस बीच सी. रामचन्द्र को 'मिनर्वा मूवीटोन' की निर्मित कुछ फ़िल्मों में भी अभिनय करने का मौका मिला। इसी समय उनकी मुलाकात महान् निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी से हुई। सोहराब मोदी ने सी. रामचन्द्र को सलाह दी कि यदि वह अभिनय के बजाए संगीत की ओर ध्यान दें तो फ़िल्म इंडस्ट्री में सफल कामयाब हो सकते हैं। इसके बाद सी. रामचन्द्र 'मिनर्वा मूविटोन' के संगीतकार बिन्दु ख़ान और हबीब ख़ान के ग्रुप में शामिल हो गए। अब वे ग्रुप में बतौर हारमोनियम वादक काम करने लगे थे। बतौर संगीतकार सी. रामचन्द्र को सबसे पहले एक तमिल फ़िल्म में काम करने का मौका मिला

1942 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सुखी जीवन' की सफलता के बाद सी. रामचन्द्र कुछ हद तक बतौर संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। चालीस के दशक में सी. रामचन्द्र ने एक संगीतकार के रूप में जिन फ़िल्मों को संगीतबद्ध किया था, उनमें 'सावन' (1945), 'शहनाई' (1947), 'पतंगा' (1949) और 'समाधि' एवं 'सरगम' (1950) जैसी फ़िल्में उल्लेखनीय हैं। सन 1951 में सी. रामचन्द्र को भगवान दादा की निर्मित फ़िल्म 'अलबेला' में संगीत देने का मौका मिला। 1951 में प्रदर्शित फ़िल्म 'अलबेला' में अपने संगीतबद्ध गीतों की कामयाबी के बाद सी. रामचन्द्र एक सफल संगीतकार के रूप में फ़िल्मी दुनिया में जम गए। वैसे तो फ़िल्म 'अलबेला' में उनके संगीतबद्ध सभी गाने सुपरहिट हुए, लेकिन ख़ासकर "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के", "भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे", "मेरे पिया गए रंगून, किया है वहाँ से टेलीफोन" आदि गीतों ने भारत में धूम मचा दी।

सन 1953 में प्रदीप कुमार और बीना राय अभिनीत फ़िल्म 'अनारकली' की सफलता के बाद सी. रामचन्द्र शोहरत की बुंलदियों पर पहुँच गये। फ़िल्म 'अनारकली' में उनके संगीत से सजे ये गीत "जाग दर्द-ए-इश्क जाग..", "ये ज़िंदगी उसी की है.. ", श्रोताओं के बीच बहुत लोकप्रिय हुए। 1953 में सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया और 'न्यू सांई प्रोडक्शन' का निर्माण किया, जिसके बैनर तले उन्होंने 'झांझर', 'लहरें' और 'दुनिया गोल है' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया। लेकिन ये उनका दुर्भाग्य ही था कि इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं सकी। इसके बाद सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म निर्माण से तौबा कर ली और अपना ध्यान संगीत की ओर जी लगाना शुरू कर दिया। वर्ष 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'नास्तिक' में उनके संगीतबद्ध गीत "देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान", समाज में बढ़ रही कुरीतियों के उपर उनका सीधा प्रहार था। इस गीत की प्रसिद्धि ने उन्हें फिर से लोकप्रिय बना दिया

सी. रामचन्द्र के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के साथ बहुत चर्चित रही। उनकी और राजेन्द्र कृष्ण की जोड़ी वाली फ़िल्मो में 'पतंगा' (1949), 'ख़ज़ाना' (1951), 'अलबेला' (1951), 'साकी' (1952), 'अनारकली' (1953), 'कवि' (1954), 'तीरंदाज' (1955), 'शतरंज' (1956), 'शारदा' (1957), 'आशा' (1957) और 'अमरदीप' (1958) जैसी फ़िल्में शामिल हैं। पचास के दशक में स्वरों के लिए विख्यात लता मंगेशकर ने संगीतकार सी. रामचन्द्र की धुनों पर कई गीत गाए, जिनमें फ़िल्म 'अनारकली' के गीत "ये ज़िंदगी उसी की है...", "जाग दर्दे-ए-इश्क जाग.." जैसे गीत इन दोनों फनकारों की जोड़ी की बेहतरीन मिसाल हैं।

साठ का दशक सी. रामचन्द्र के लिए बुरा वक़्त था। इस दशक में पाश्चात्य गीत-संगीत की चमक से निर्माता-निर्देशक स्वयं को नहीं बचा सके और धीरे-धीरे निर्देशकों ने सी. रामचन्द्र की ओर से अपना मुख मोड़ लिया। लेकिन 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म 'तलाक' और '1959' में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैग़ाम' में उनके संगीतबद्ध गीत "इंसान का इंसान से हो भाईचारा.." की कामयाबी के बाद सी. रामचन्द्र एक बार फिर से अपनी खोयी हुई लोकप्रियता पाने में सफल हो गए।

भारत के वीर जवानों को श्रद्धाजंलि देने के लिए कवि प्रदीप ने 1962 में "ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी.." गीत की रचना की। इस गीत का संगीत तैयार करने की जिम्मेंदारी उन्होंने सी. रामचन्द्र को सौंप दी। सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में एक कार्यक्रम के दौरान स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण इस गीत को सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आँखों में आँसू छलक आए थे। "ऐ मेरे वतन के लोगों.." गीत को संगीत देकर सी. रामचन्द्र ने जैसे इस गीत को अमर बना दिया। आज भी भारत के महान् देशभक्ति गीत के रूप में याद किया जाता है

साठ के दशक में सी. रामचन्द्र ने 'धनंजय' और 'घरकुल' जैसी मराठी फ़िल्मों का निर्माण किया। उन्होंने इन फ़िल्मों में अभिनय और संगीत निर्देशन भी किया। संगीत निर्देशन के अतिरिक्त सी. रामचन्द्र ने अपने पा‌र्श्वगायन से भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। इन गीतों में "मेरी जान मेरी जान संडे के संडे.." (शहनाई, 1947), "कदम कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा.." (समाधि, 1950), "भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे..", "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के.." (अलबेला, 1951), "कितना हसीं है मौसम कितना हसीं सफर है..." (आजाद, 1955), "आ जा रे नटखट ना छू रे मेरा घूंघट.." (नवरंग, 1959) जैसे न भूलने वाले गीत भी शामिल है। सी. रामचन्द्र ने अपने चार दशक के लंबे सिने करियर में लगभग 150 फ़िल्मों को संगीतबद्ध किया। हिन्दी फ़िल्मों के अतिरिक्त उन्होंने तमिल, मराठी, तेलुगू और भोजपुरी फ़िल्मों को भी संगीतबद्ध किया।

सी. रामचन्द्र के कुछ संगीतबद्ध गीत निम्नलिखित हैं-

मेरी जान मेरी जान संडे के संडे - शहनाई (1947)
कदम कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा - समाधि (1950)
शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के - अलबेला (1951)
भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे - अलबेला
मेरे पिया गए रंगून, किया है वहाँ से टेलीफोन - अलबेला
बलमा बड़ा नादान - अलबेला
ये ज़िंदगी उसी की है, जो किसी का हो गया - अनारकली (1953)
जाग दर्द इश्क जाग - अनारकली (1953)
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान - नास्तिक (1954)
कितना हसीं है मौसम कितना हसीं सफर है - आजाद (1955)
देखो जी बहार आई - आजाद (1955)
आ जा रे नटखट ना छू रे मेरा घूंघट - नवरंग, (1959
ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख में भर लो पानी - (1962)

अपने संगीतबद्ध गीतों से श्रोताओं के दिलों पर राज करने वाले महान् संगीतकार सी. रामचन्द्र ने 5 जनवरी, 1982 को इस दुनिया से विदा ली। लेकिन उनके संगीतबद्ध गीत आज भी हर किसी की जुबान पर आते रहते हैं।

गुरुवार, 4 जनवरी 2024

उदय चोपड़ा

#05jan 
उदय चोपड़ा 

🎂जन्म: 05 जनवरी, 1973

मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
पेशा
अभिनेता, निर्माता और निर्देशक

माता-पिता
यश चोपड़ा
पामेला चोपड़ा
संबंधी
आदित्य चोपड़ा (भाई)
हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता, निर्माता, पटकथा लेखक और सहायक निर्देशक हैं। ये यश चोपड़ा के बेटे और आदित्य चोपड़ा के भाई हैं। इन्होंने अपने पिता और भाई के कुछ फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया था। ये वाईआरएफ़ एंटरटैनमेंट के सीईओ और यश राज फिल्म्स में अपनी माँ, पामेला चोपड़ा और अपने भाई के साथ मैनेजर रहे हैं।
1994 में इन्होंने ये दिल्लगी फिल्म का निर्माण किया था, जिसमें अक्षय कुमार, काजल और सैफ अली खान मुख्य भूमिका में थे। इन्होंने अभिनय की शुरुआत मोहब्बतें (2000) के साथ शुरू किया था। इन्होंने ज्यादातर अपने पिता के कंपनी की निर्मित फिल्मों में ही अभिनय किया था।

2004 में इन्होंने अभिषेक बच्चन और जॉन अब्राहम के साथ धूम फिल्म में काम किया था। इसके बाद इन्होंने इसकी आगे की कड़ी, धूम 2 में और धूम 3 में भी काम किया।

निर्देशक यश चोपड़ा और पामेला चोपड़ा के बेटे हैं । उनकी भाभी अभिनेत्री रानी मुखर्जी हैं । चोपड़ा ने यशराज फिल्म्स बैनर के तहत अपने पिता और भाई की कई फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में काम किया ।1994 में, चोपड़ा ने अक्षय कुमार , काजोल और सैफ अली खान अभिनीत ये दिल्लगी का निर्माण किया । उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत फिल्म मोहब्बतें से की थी । [1] चोपड़ा ने ज्यादातर अपने पिता के प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों में अभिनय किया है।

उन्होंने क्रमशः 2006 और 2013 में रिलीज़ एक्शन थ्रिलर धूम और इसके सीक्वल धूम 2 और धूम 3 में अभिनय किया। हालाँकि पहली किस्त में अली अकबर फ़तेह खान के रूप में उनके प्रदर्शन की सराहना की गई, लेकिन दोनों सीक्वल में उन्होंने वही भूमिका दोहराई, लेकिन सीक्वल को मिश्रित समीक्षा मिली।
2011 में, वह यूसीएलए में एक प्रोडक्शन वर्क शॉप में शामिल होने के लिए लॉस एंजिल्स गए ।

2014 में, चोपड़ा ने दो फिल्मों का निर्माण किया। ग्रेस ऑफ मोनाको ग्रेस केली की जीवनी पर आधारित फिल्म थी जिसमें निकोल किडमैन ने मुख्य भूमिका निभाई थी । उन्होंने ओलिविया वाइल्ड और जेसन बेटमैन अभिनीत एक कॉमेडी ड्रामा हॉलीवुड फिल्म द लॉन्गेस्ट वीक का निर्माण किया । यह यशराज फिल्म की सहायक हॉलीवुड प्रोडक्शन हाउस YRF एंटरटेनमेंट की पहली परियोजना है । 

जुलाई 2012 में, चोपड़ा ने अपनी खुद की कंपनी, "योमिक्स" की स्थापना की, जो यशराज फिल्म्स पर आधारित कॉमिक्स बनाती है।

📽️
2006 धूम 2
2005 नील एन निक्की
2004 धूम 
2002 मेरे यार की शादी है
2002 मुझसे दोस्ती करोगे 
2000 मोहब्बतें
📺
2023 रोमैंटिक्स वह स्वयं दस्तावेज़ी; कार्यकारी निर्माता भी

अंजना मुमताज

अभिनेत्री अंजना मुमताज 
#04jan 
अंजना मुमताज़
 जन्म 4 जनवरी 1949 

एक भारतीय अभिनेत्री हैं, जो सौ से अधिक हिंदी, मराठी और गुजराती भाषा की फिल्मों में सहायक भूमिकायें निभा चुकी है अंजना मुमताज़ का बचपन का नाम अंजना मांजरेकर था बाद में उन्होंने एयर इंडिया के अधिकारी साजिद मुमताज से शादी की
अंजना मुमताज (Anjana Mumtaz) का दिल एक्टिंग में लगता था लेकिन 36 साल की उम्र में उन्हें कौन काम देगा यही सोचकर मन मार लिया. लेकिन उनके हस्बैंड साजिद मुमताज ने उन्हें प्रोत्साहित किया. इसी बीच पता चला कि रमेश सिप्पी (Ramesh Sippy) एक धारावाहिक ‘बुनियाद’ (Buniyaad) बनाने जा रहे हैं तो अंजना उनसे मिली. इस तरह 1986 में दूरदर्शन के इस प्रसिद्ध धारावाहिक की वजह उन्हें काफी शोहरत मिली.
इनकी शादी साजिद मुमताज नामक शख्स से हुई तो अपना नाम अंजना मुमताज रख लिया. हिंदू मराठा फैमिली से ताल्लुक रखने वाली अंजना की फैमिली का दूर-दूर तक फिल्म इंडस्ट्री से नाता नहीं था. इनके पिता सरकारी नौकरी में थे जबकि मां एक हाउसवाइफ थीं.
अंजना जब छोटी थीं तो शानदार डांस करती थीं. उनकी डांस टैलेंट को देखते हुए उनकी मां ने उन्हें क्लासिकल डांस की ट्रेनिंग दिलवाई. अंजना अपने डांस की वजह से आस-पास काफी मशहूर थीं. दूरदर्शन को दिए एक इंटरव्यू में अंजना ने बताया था कि मीना कुमारी की वह दीवानी थीं. एक बार उनकी मुलाकात मीना कुमारी से हुई तो उन्होंने कहा कि एक दिन तुम जरूर एक्ट्रेस बनोगी लेकिन अभी मेहनत से पढ़ाई करो. अपनी फेवरेट एक्ट्रेस के मुंह से ऐसी बात सुनकर अंजना का दिल एक्टिंग की तरफ होने लगा.अंजना का मन पढ़ाई-लिखाई में बिलकुल भी नहीं लगता था, बड़ी मुश्किल से मैट्रिक पास किया. हर समय डांस में रमी रहने वाली अंजना को एक दिन पता चला कि फिल्म ‘पाकीजा’ की शूटिंग हो रही है. वह शूटिंग सेट पर पहुंची तो मीना जी ने उनकी मुलाकात अपने हस्बैंड कमाल अमरोही से करवाई. उन्होंने अपनी फिल्म ‘शंकर हुसैन’ में काम देने का वादा किया और काम मिल भी गया लेकिन ये फिल्म रिलीज होने में काफी वक्त लगा और जब रिलीज हुई भी तो उसमें अंजना नदारद थीं.लेकिन इस फिल्म में काम करने के दौरान ही अंजना को ‘मां का आंचल’, ‘संबंध’, ‘महुआ’ जैसी फिल्मों में बतौर लीड एक्ट्रेस काम मिल गया. अंजना ने कई हिंदी फिल्मों में लीड एक्ट्रेस के तौर पर काम किया लेकिन उन्हें खास पहचान नहीं मिली तो उन्होंने मराठी, गुजराती फिल्मों की तरफ रुख किया और वहां स्टार एक्ट्रेस के तौर पर जानी जाने लगीं. हिंदी से अधिक उन्हें मराठी और गुजराती में पसंद किया गया.
इसी बीच अंजना मांजरेकर की शादी साजिद मुमताज से हो गई. साजिद और अजना पड़ोसी थे, घरवालों को इस शादी से कोई ऐतराज नहीं था. लेकिन उस दौर में शादीशुदा एक्ट्रेस को काम मिलना काफी मुश्किल होता था, इसलिए अंजना ने फिल्मों से दूरी बना ली और अपनी घर-गृहस्थी में जम गईं. इनका एक बेटा हुआ रुसलान मुमताज जो जाना-माना एक्टर है.

📽️
2006 जननी 
2003 जोड़ी क्या बनाई वाह वाह रामजी 
2003 कोई मिल गया 
2002 तुम जियो हज़ार साल 
2002 अँखियों से गोली मारे 
2002 ये मोहब्बत है 
2001 कसम 
2000 जोड़ीदार
2000 क्रोध 
2000 धड़कन 
1999 चेहरा
1999 होते होते प्यार हो गया
1999 जय हिन्द
1998 दुल्हे राजा 
1998 आक्रोश 
1998 बरसात की रात
1998 ज़ुल्म-ओ-सितम
1997 शेयर बाज़ार 
1997 दिल के झरोखे में 
1996 भैरवी 
1996 खिलाड़ियों का खिलाड़ी 
1996 ज़ोरदार 
1996 साजन चले ससुराल 
1996 दुश्मन दुनिया का 
1995 सबसे बड़ा खिलाड़ी
1995 हकीकत 
1994 खुद्दार
1994 नज़र के सामने 
1994 साजन का घर
1994 यार गद्दार 
1994 ईना मीना डीका
1994 चीता 
1994 बेटा हो तो ऐसा 
1994 प्रेम योग 
1994 इंसानियत 
1993 बलमा
1993 दिल है बेताब 
1993 प्लेटफॉर्म 
1993 साहिबाँ 
1993 मेरी आन 
1993 शक्तिमान
1993 गुनाह 
1993 दिल तेरा आशिक 
1993 संग्राम 
1993 बड़ी बहन
और
1993 धारावी 
1992 दीदार 
1992 दिल ही तो है
1992 ख़ुदागवाह
1992 साहेबज़ादे
1992 चमत्कार 
1992 युद्धपथ 
1992 बलवान 
1991 पाप की आँधी
1991 शिकारी 
1991 डांसर 
1991 बंजारन 
1991 साजन 
1991 दो मतवाले 
1991 फूल और काँटे 
1991 खून का कर्ज़ 
1991 योद्धा 
1991 त्रिनेत्र 
1991 नम्बरी आदमी 
1990 खतरनाक
1990 आग का गोला 
1990 पत्थर के इंसान
1990 वर्दी 
1989 भ्रष्टाचार 
1989 निगाहें 
1989 दोस्त गरीबों का 
1989 फर्ज़ की जंग
1989 मिट्टी और सोना 
1989 काला बाज़ार 
1989 त्रिदेव
1988 खतरों के खिलाड़ी 
1988 हम तो चले परदेस 
1988 गुनाहों का फ़ैसला 
1988 अग्नि 
1988 वारिस 
1988 विजय
1987 मजाल 
1986 प्यार हो गया 
1986 समुन्दर 
1986 घर संसार
1985 लवर बॉय 
1985 अलग अलग 
1983 तकदीर 
1975 सलाखें
1973 दो फूल 
1973 बंधे हाथ 
1969 संबंध 
📺
1986 बुनियाद
1997-1998 चट्टान
1998-1999 जान
2001 कुदरत
2001-2003 घराने
2002-2004 देवी

गुरदास मान

#04jan 
प्रसिद्ध हिन्दी पंजाबी गायक अभिनेता गुरदास मान
🎂जन्म 04 जनवरी 1957
मुक्तसर, गांव कस्बा गिद्दड़बाहा 
बच्चे: गुरीक मान
पत्नी: मंजीत मान
भाई: परमजीत बहिया, जसवीर कौर, गुरपंथ मान
माता-पिता: एस० गुरदेव सिंह, तेज कौर
एक भारतीय गायक, गीतकार और अभिनेता हैं जो मुख्य रूप से पंजाबी भाषा के संगीत और फिल्मों से जुड़े हैं। उन्होंने 1980 में "दिल दा मामला है" गाने से राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया । तब से, उन्होंने 34 से अधिक एल्बम रिकॉर्ड किए और 305 से अधिक गाने लिखे।
गुरदास मान पंजाब के मशहूर लोक गायक अभिनेता हैं। उन्हें पंजाबी गायकी का सम्राट कहा जाता है।

गुरदास मान का जन्म 4 जनवरी 1957 को पंजाब के मुक्तसर जिले में स्थित गिद्दड़बाहा नामक कस्बे में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा मलोट में हुई तथा उच्च शिक्षा के लिए आप पटियाला आ गए। पटियाला के नैशनल इंस्टीच्यूट ऑफ स्पोर्टस (एन आई एस) से डिग्री ली।

एक बार जनवरी 2001 को रोपड़ के पास तथा जनवरी 2007 में वे हरियाणा के करनाल जिले के बस्तारा गांव के निकट एक और वाहन दुर्घटना के शिकार हुए जिसमें वह घायल हो गए।

सितम्बर 2010 में ब्रिटेन के वोल्वरहैम्टन विश्वविद्यालय ने पंजाबी गायक गुरदास मान को विश्व संगीत में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। मान के साथ इस सम्मान को पाने वालों में सर पॉल मॅक्कार्टनी, बिल कॉस्बी और बॉब डायलन थे।

14 दिसम्बर 2012 को उन्हें पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के 36वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल ने डाक्टर ऑफ लिटरेचर की मानद उपाधि से सम्मानित किया।
फिल्म देस होया परदेस (2004) में अपने चरित्र के चित्रण के लिए अपने मुख्य अभिनेता गुरदास मान को राष्ट्रपति के राष्ट्रीय पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता ( विशेष जूरी पुरस्कार ) से सम्मानित किया गया।
हीर के अपने गायन के माध्यम से संपूर्ण कथा के निर्माण के लिए फिल्म वारिस शाह-इश्क दा वारिस (2006) के लिए सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक का पुरस्कार भी गुरदास मान को दिया गया।
फिल्म वारिस शाह-इश्क दा वारिस (2006) के लिए बर्लिन एशिया फिल्म महोत्सव में गुरदास मान सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में पुरस्कार मिला।
एलबम बूटपालिशाँ के लिए ब्रिटेन एशियाई संगीत पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय एल्बम।
सुखमनी - होप फॉर लाइफ (2011) के लिए में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (क्रिटिक्स) का पीटीसी फिल्म अवार्ड।

गुरदास मान जागरण प्रकाशन लिमिटेड के पंजाबी भाषा के समाचार पत्र पंजाबी जागरण के ब्रांड एंबेसडर भी हैं।

पंजाबी गायकी का सबसे बड़ा स्टार होने के बावजूद भी स्टारडम या घमंड मान साहब को छू भी नहीं पाया है। छोटे छोटे गांवों में भी धार्मिक अनुष्ठानों, मेलों आदि में वे अक्सर गाया करते हैं।  वे नकोदर स्थित डेरा बाबा मुराद शाह ट्रस्ट के चेयरमैन भी हैं। इस ट्रस्ट की ओर से उत्तराखण्ड में जून 2013 में आई बाढ़ के लिए प्रधानमंत्री राहत कोष में उन्होंने 11 लाख रूपये का दान दिया।

9 जनवरी 2001 को रोपड़ के पास एक भयानक हादसे में मान बाल बाल बचे किंतु इनके ड्राईवर तेजपाल की मृत्यु हो गई। वे उसे अपना अच्छा दोस्त भी मानते थे, उसे समर्पित करते हुए उन्होंने एक गाना भी लिखा व गाया - "बैठी साडे नाल सवारी उतर गयी"।

मान साहब के व्यक्तित्व का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है। म्यूजिक एल्बम "रोटी" की रिलीज पर म्यूजिक वीडियो डायरेक्टर - म्यूजिक डायरेक्टर जतिंदर शाह से जब गुरदास मान के साथ के अनुभव के बारे में पूछा गया तो वह इतने इमोशनल हो गए कि उनकी आंखें भर आई और वह चुप हो गए। तब गुरदास मान अपनी सीट से उठकर आए और जतिंदर को गले से लगा लिया

बुधवार, 3 जनवरी 2024

आर डी बर्मन

#04jan
#27jun 
राहुल देव बर्मन
प्रसिद्ध नाम आर. डी. बर्मन, पंचम दा

🎂जन्म 27 जून, 1939
जन्म भूमि कलकत्ता, पश्चिम बंगाल
⚰️मृत्यु 04 जनवरी, 1994
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

अभिभावक एस.डी. बर्मन, गायिका मीरा
कर्म भूमि मुंबई
कर्म-क्षेत्र संगीतकार और गायक
मुख्य फ़िल्में 1942 ए लव स्टोरी (1995), तीसरी मंज़िल (1966), यादों की बारात (1974), हम किसी से कम नहीं (1978), कारवाँ (1972) आदि।
विषय भारतीय शास्त्रीय संगीत
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक
नागरिकता भारतीय
मुख्य गीत ‘चिंगारी कोई भड़के’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ 'महबूबा महबूबा', 'पिया तू अब तो आजा' आदि।
अन्य जानकारी आर. डी. बर्मन प्रयोगवादी संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने पश्चिमी संगीत को मिलाकर अनेक नई धुनें तैयार की थीं। उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया।
आर. डी. बर्मन  R. D. Burman,

भारतीय हिन्दी सिनेमा में एक महान् संगीतकार के रूप में प्रसिद्ध थे। आर. डी. बर्मन का पूरा नाम 'राहुल देव बर्मन' था और फ़िल्मी दुनिया में वे 'पंचम दा' के नाम से विख्यात थे। उन्होंने अपने कॅरियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया। मधुर संगीत से श्रोताओं का दिल जीतने वाले संगीतकार राहुल देव बर्मन के लोकप्रिय संगीत से सजे गीत 'चिंगारी कोई भड़के', 'कुछ तो लोग कहेंगे', 'पिया तू अब तो आजा' आदि हैं।

आर. डी. बर्मन का जन्म 27 जून, 1939 को कलकत्ता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बालीगंज गवर्नमेंट हाई स्कूल, कोलकाता से प्राप्त की थी। बाद में उन्होंने उस्ताद अली अकबर खान से सरोद भी सीखा। आर. डी. बर्मन ने आशा भोंसले के साथ विवाह किया था।

संगीतकार
आर. डी. बर्मन के पिता एस. डी. बर्मन (सचिन देव बर्मन) भी जाने माने संगीतकार थे और उन्होंने अपने करियर की शुरुआत उनके सहायक के रूप में की थी। आर. डी. बर्मन प्रयोगवादी संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने पश्चिमी संगीत को मिलाकर अनेक नई धुनें तैयार की थीं। उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया।

पंचम दा नाम
आर. डी. बर्मन को पंचम नाम से फ़िल्म जगत में पुकारा जाता था। आर. डी. बचपन में जब भी गुनगुनाते थे, 'प' शब्द का ही उपयोग करते थे। यह अभिनेता अशोक कुमार के ध्यान में आई। सा रे गा मा पा में ‘प’ का स्थान पाँचवाँ है। इसलिए उन्होंने राहुल देव को पंचम नाम से पुकारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनका यही नाम लोकप्रिय हो गया।

सफलता का स्वाद

एस.डी. बर्मन हमेशा आर. डी. बर्मन को अपने साथ रखते थे। इस वजह से आर. डी. बर्मन को लोकगीतों, वाद्यों और आर्केस्ट्रा की समझ बहुत कम उम्र में हो गई थी। जब एस.डी. ‘आराधना’ का संगीत तैयार कर रहे थे, तब काफ़ी बीमार थे। आर. डी. बर्मन ने कुशलता से उनका काम संभाला और इस फ़िल्म की अधिकतर धुनें उन्होंने ही तैयार की। आर. डी. बर्मन को बड़ी सफलता मिली ‘अमर प्रेम’ से। ‘चिंगारी कोई भड़के’ और ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ जैसे यादगार गीत देकर उन्होंने साबित किया कि वे भी प्रतिभाशाली हैं।

पहला अवसर
एस. डी. बर्मन की वजह से आर. डी. बर्मन को फ़िल्म जगत के सभी लोग जानते थे। पंचम दा को माउथआर्गन बजाने का बेहद शौक़ था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल उस समय ‘दोस्ती’ फ़िल्म में संगीत दे रहे थे। उन्हें माउथआर्गन बजाने वाले की ज़रूरत थी। वे चाहते थे कि पंचम यह काम करें, लेकिन उनसे कैसे कहें क्योंकि वे एक प्रसिद्ध संगीतकार के बेटे थे। जब यह बात पंचम को पता चली तो वे फौरन राजी हो गए। महमूद से पंचम की अच्छी दोस्ती थी। महमूद ने पंचम से वादा किया था कि वे स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उन्हें ज़रूर अवसर देंगे। ‘छोटे नवाब’ के ज़रिये महमूद ने अपना वादा निभाया।

पहला एकल गीत
महमूद की फ़िल्म छोटे नवाब बतौर संगीतकार उनकी पहली फ़िल्म थी। लेकिन उन्हें असली पहचान फ़िल्म 'तीसरी मंजिल' और फ़िल्म 'पड़ोसन' से मिली। उन्होंने नासिर हुसैन, रमेश सिप्पी जैसे फ़िल्मकारों के साथ लंबे समय तक काम किया।

प्रयोग के हिमायती

राहुल देव बर्मन
आर. डी. बर्मन को संगीत में प्रयोग करने का बेहद शौक़ था। नई तकनीक को भी वे बेहद पसंद करते थे। उन्होंने विदेश यात्राएँ कर संगीत संयोजन का अध्ययन किया। 27 ट्रैक की रिकॉर्डिंग के बारे में जाना। इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया। कंघी और कई फ़ालतू समझी जाने वाली चीजों का उपयोग उन्होंने अपने संगीत में किया। भारतीय संगीत के साथ पाश्चात्य संगीत का उन्होंने भरपूर उपयोग किया। आर. डी. बर्मन के बारे में कहा जाता है कि वे समय से आगे के संगीतकार थे। उन्होंने अपने संगीत में वे प्रयोग कर दिखाए थे, जो आज के संगीतकार कर रहे हैं। आर. डी. का यह दुर्भाग्य रहा कि उनके समय में फ़िल्मों में एक्शन हावी हो गया था और संगीत के लिए ज़्यादा गुंजाइश नहीं थी। अपने अंतिम समय में उन्होंने ‘1942 ए लव स्टोरी’ में यादगार संगीत देकर यह साबित किया था कि उनकी प्रतिभा का सही दोहन फ़िल्म जगत नहीं कर पाया। 4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक़ ढेर सारे गीत वे दे गए।

युवाओं के संगीतकार
आर. डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध की गई फ़िल्में ‘तीसरी मंजिल’ और ‘यादों की बारात’ ने धूम मचा दी। राजेश खन्ना को सुपर सितारा बनाने में भी आर. डी. बर्मन का अहम योगदान है। राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आर. डी. बर्मन की तिकड़ी ने 70 के दशक में धूम मचा दी थी। आर. डी. का संगीत युवा वर्ग को बेहद पसंद आया। उनके संगीत में बेफ़िक्री, जोश, ऊर्जा और मधुरता है, जिसे युवाओं ने पसंद किया। ‘दम मारो दम’ जैसी धुन उन्होंने उस दौर में बनाकर तहलका मचा दिया था। जब राजेश खन्ना का सितारा अस्त हुआ तो आर. डी. ने अमिताभ के लिए यादगार धुनें बनाईं। आर. डी. बर्मन का संगीत आज का युवा भी सुनता है। समय का उनके संगीत पर कोई असर नहीं हुआ। पुराने गानों को रीमिक्स कर आज पेश किया जाता है, उनमें आर. डी. द्वारा संगीतबद्ध गीत ही सबसे अधिक होते हैं। ऐसा नहीं है कि आर. डी. ने धूम-धड़ाके वाली धुनें ही बनाईं। गीतकार गुलज़ार के साथ राहुल देव एक अलग ही संगीतकार के रूप में नजर आते हैं। ‘आँधी’, ‘किनारा’, ‘परिचय’, ‘खुश्बू’, ‘इजाजत’, ‘लिबास’ फ़िल्मों के गीत सुनकर लगता ही नहीं कि ये वही आर. डी. बर्मन हैं, जिन्होंने ‘दम मारो दम’ जैसा गाना बनाया है।

प्रसिद्ध गीत
जी.पी. सिप्पी के साथ उन्होंने 'सीता और गीता', 'शोले', 'शान' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया। नासिर हुसैन के साथ उनका लंबा साथ रहा और उन्होंने तीसरी मंजिल, कारवाँ, हम किसी से कम नहीं, यादों की बारात जैसी कई फ़िल्मों के गानों को यादगार बना दिया। आर. डी. बर्मन के विविधतापूर्ण गानों में एक ओर जहाँ शास्त्रीय संगीत पर आधारित रैना बीती जाए, मेरा कुछ सामान जैसे गाने है वहीं महबूबा महबूबा, पिया तू अब तो आजा जैसे गाने भी हैं।

लोकप्रियता
1970 के दशक की उनकी लोकप्रियता 1980 के दशक में भी क़ायम रही और इस दौरान भी उन्होंने कई चर्चित फ़िल्मों में संगीत दिया। लेकिन दशक के आखिरी कुछ वर्ष अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे और उनकी कई फ़िल्में नाकाम रहीं। '1942 ए लव स्टोरी' उनके निधन के बाद प्रदर्शित हुई। इस फ़िल्म के गानों में नई ताजगी थी और उन्हें खूब पसंद किया गया। उनका 4 जनवरी, 1994 को निधन हो गया। उनके निधन के बाद रिमिक्स गानों का दौर शुरू हुआ। दिलचस्प है कि रीमिक्स किए गए अधिकतर गाने आर. डी. बर्मन के ही स्वरबद्ध हैं। आर डी बर्मन ने लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया जिनमें 292 हिंदी फ़िल्में थीं। इसके अलावा उन्होंने बंगाली, तमिल, तेलुगू और उड़िया फ़िल्मों के लिए भी संगीत दिया।

निधन
4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक़ बहुत सारे गीत दे गए। अपने अंतिम समय में उन्होंने ‘1942 ए लव स्टोरी’ में यादगार संगीत देकर यह साबित किया था कि उनकी प्रतिभा का सही दोहन फ़िल्म जगत नहीं कर पाया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...