गुरुवार, 4 जनवरी 2024

गुरदास मान

#04jan 
प्रसिद्ध हिन्दी पंजाबी गायक अभिनेता गुरदास मान
🎂जन्म 04 जनवरी 1957
मुक्तसर, गांव कस्बा गिद्दड़बाहा 
बच्चे: गुरीक मान
पत्नी: मंजीत मान
भाई: परमजीत बहिया, जसवीर कौर, गुरपंथ मान
माता-पिता: एस० गुरदेव सिंह, तेज कौर
एक भारतीय गायक, गीतकार और अभिनेता हैं जो मुख्य रूप से पंजाबी भाषा के संगीत और फिल्मों से जुड़े हैं। उन्होंने 1980 में "दिल दा मामला है" गाने से राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया । तब से, उन्होंने 34 से अधिक एल्बम रिकॉर्ड किए और 305 से अधिक गाने लिखे।
गुरदास मान पंजाब के मशहूर लोक गायक अभिनेता हैं। उन्हें पंजाबी गायकी का सम्राट कहा जाता है।

गुरदास मान का जन्म 4 जनवरी 1957 को पंजाब के मुक्तसर जिले में स्थित गिद्दड़बाहा नामक कस्बे में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा मलोट में हुई तथा उच्च शिक्षा के लिए आप पटियाला आ गए। पटियाला के नैशनल इंस्टीच्यूट ऑफ स्पोर्टस (एन आई एस) से डिग्री ली।

एक बार जनवरी 2001 को रोपड़ के पास तथा जनवरी 2007 में वे हरियाणा के करनाल जिले के बस्तारा गांव के निकट एक और वाहन दुर्घटना के शिकार हुए जिसमें वह घायल हो गए।

सितम्बर 2010 में ब्रिटेन के वोल्वरहैम्टन विश्वविद्यालय ने पंजाबी गायक गुरदास मान को विश्व संगीत में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। मान के साथ इस सम्मान को पाने वालों में सर पॉल मॅक्कार्टनी, बिल कॉस्बी और बॉब डायलन थे।

14 दिसम्बर 2012 को उन्हें पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के 36वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल ने डाक्टर ऑफ लिटरेचर की मानद उपाधि से सम्मानित किया।
फिल्म देस होया परदेस (2004) में अपने चरित्र के चित्रण के लिए अपने मुख्य अभिनेता गुरदास मान को राष्ट्रपति के राष्ट्रीय पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता ( विशेष जूरी पुरस्कार ) से सम्मानित किया गया।
हीर के अपने गायन के माध्यम से संपूर्ण कथा के निर्माण के लिए फिल्म वारिस शाह-इश्क दा वारिस (2006) के लिए सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक का पुरस्कार भी गुरदास मान को दिया गया।
फिल्म वारिस शाह-इश्क दा वारिस (2006) के लिए बर्लिन एशिया फिल्म महोत्सव में गुरदास मान सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में पुरस्कार मिला।
एलबम बूटपालिशाँ के लिए ब्रिटेन एशियाई संगीत पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय एल्बम।
सुखमनी - होप फॉर लाइफ (2011) के लिए में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (क्रिटिक्स) का पीटीसी फिल्म अवार्ड।

गुरदास मान जागरण प्रकाशन लिमिटेड के पंजाबी भाषा के समाचार पत्र पंजाबी जागरण के ब्रांड एंबेसडर भी हैं।

पंजाबी गायकी का सबसे बड़ा स्टार होने के बावजूद भी स्टारडम या घमंड मान साहब को छू भी नहीं पाया है। छोटे छोटे गांवों में भी धार्मिक अनुष्ठानों, मेलों आदि में वे अक्सर गाया करते हैं।  वे नकोदर स्थित डेरा बाबा मुराद शाह ट्रस्ट के चेयरमैन भी हैं। इस ट्रस्ट की ओर से उत्तराखण्ड में जून 2013 में आई बाढ़ के लिए प्रधानमंत्री राहत कोष में उन्होंने 11 लाख रूपये का दान दिया।

9 जनवरी 2001 को रोपड़ के पास एक भयानक हादसे में मान बाल बाल बचे किंतु इनके ड्राईवर तेजपाल की मृत्यु हो गई। वे उसे अपना अच्छा दोस्त भी मानते थे, उसे समर्पित करते हुए उन्होंने एक गाना भी लिखा व गाया - "बैठी साडे नाल सवारी उतर गयी"।

मान साहब के व्यक्तित्व का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है। म्यूजिक एल्बम "रोटी" की रिलीज पर म्यूजिक वीडियो डायरेक्टर - म्यूजिक डायरेक्टर जतिंदर शाह से जब गुरदास मान के साथ के अनुभव के बारे में पूछा गया तो वह इतने इमोशनल हो गए कि उनकी आंखें भर आई और वह चुप हो गए। तब गुरदास मान अपनी सीट से उठकर आए और जतिंदर को गले से लगा लिया

बुधवार, 3 जनवरी 2024

आर डी बर्मन

#04jan
#27jun 
राहुल देव बर्मन
प्रसिद्ध नाम आर. डी. बर्मन, पंचम दा

🎂जन्म 27 जून, 1939
जन्म भूमि कलकत्ता, पश्चिम बंगाल
⚰️मृत्यु 04 जनवरी, 1994
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

अभिभावक एस.डी. बर्मन, गायिका मीरा
कर्म भूमि मुंबई
कर्म-क्षेत्र संगीतकार और गायक
मुख्य फ़िल्में 1942 ए लव स्टोरी (1995), तीसरी मंज़िल (1966), यादों की बारात (1974), हम किसी से कम नहीं (1978), कारवाँ (1972) आदि।
विषय भारतीय शास्त्रीय संगीत
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक
नागरिकता भारतीय
मुख्य गीत ‘चिंगारी कोई भड़के’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ 'महबूबा महबूबा', 'पिया तू अब तो आजा' आदि।
अन्य जानकारी आर. डी. बर्मन प्रयोगवादी संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने पश्चिमी संगीत को मिलाकर अनेक नई धुनें तैयार की थीं। उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया।
आर. डी. बर्मन  R. D. Burman,

भारतीय हिन्दी सिनेमा में एक महान् संगीतकार के रूप में प्रसिद्ध थे। आर. डी. बर्मन का पूरा नाम 'राहुल देव बर्मन' था और फ़िल्मी दुनिया में वे 'पंचम दा' के नाम से विख्यात थे। उन्होंने अपने कॅरियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया। मधुर संगीत से श्रोताओं का दिल जीतने वाले संगीतकार राहुल देव बर्मन के लोकप्रिय संगीत से सजे गीत 'चिंगारी कोई भड़के', 'कुछ तो लोग कहेंगे', 'पिया तू अब तो आजा' आदि हैं।

आर. डी. बर्मन का जन्म 27 जून, 1939 को कलकत्ता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बालीगंज गवर्नमेंट हाई स्कूल, कोलकाता से प्राप्त की थी। बाद में उन्होंने उस्ताद अली अकबर खान से सरोद भी सीखा। आर. डी. बर्मन ने आशा भोंसले के साथ विवाह किया था।

संगीतकार
आर. डी. बर्मन के पिता एस. डी. बर्मन (सचिन देव बर्मन) भी जाने माने संगीतकार थे और उन्होंने अपने करियर की शुरुआत उनके सहायक के रूप में की थी। आर. डी. बर्मन प्रयोगवादी संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने पश्चिमी संगीत को मिलाकर अनेक नई धुनें तैयार की थीं। उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया।

पंचम दा नाम
आर. डी. बर्मन को पंचम नाम से फ़िल्म जगत में पुकारा जाता था। आर. डी. बचपन में जब भी गुनगुनाते थे, 'प' शब्द का ही उपयोग करते थे। यह अभिनेता अशोक कुमार के ध्यान में आई। सा रे गा मा पा में ‘प’ का स्थान पाँचवाँ है। इसलिए उन्होंने राहुल देव को पंचम नाम से पुकारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनका यही नाम लोकप्रिय हो गया।

सफलता का स्वाद

एस.डी. बर्मन हमेशा आर. डी. बर्मन को अपने साथ रखते थे। इस वजह से आर. डी. बर्मन को लोकगीतों, वाद्यों और आर्केस्ट्रा की समझ बहुत कम उम्र में हो गई थी। जब एस.डी. ‘आराधना’ का संगीत तैयार कर रहे थे, तब काफ़ी बीमार थे। आर. डी. बर्मन ने कुशलता से उनका काम संभाला और इस फ़िल्म की अधिकतर धुनें उन्होंने ही तैयार की। आर. डी. बर्मन को बड़ी सफलता मिली ‘अमर प्रेम’ से। ‘चिंगारी कोई भड़के’ और ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ जैसे यादगार गीत देकर उन्होंने साबित किया कि वे भी प्रतिभाशाली हैं।

पहला अवसर
एस. डी. बर्मन की वजह से आर. डी. बर्मन को फ़िल्म जगत के सभी लोग जानते थे। पंचम दा को माउथआर्गन बजाने का बेहद शौक़ था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल उस समय ‘दोस्ती’ फ़िल्म में संगीत दे रहे थे। उन्हें माउथआर्गन बजाने वाले की ज़रूरत थी। वे चाहते थे कि पंचम यह काम करें, लेकिन उनसे कैसे कहें क्योंकि वे एक प्रसिद्ध संगीतकार के बेटे थे। जब यह बात पंचम को पता चली तो वे फौरन राजी हो गए। महमूद से पंचम की अच्छी दोस्ती थी। महमूद ने पंचम से वादा किया था कि वे स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उन्हें ज़रूर अवसर देंगे। ‘छोटे नवाब’ के ज़रिये महमूद ने अपना वादा निभाया।

पहला एकल गीत
महमूद की फ़िल्म छोटे नवाब बतौर संगीतकार उनकी पहली फ़िल्म थी। लेकिन उन्हें असली पहचान फ़िल्म 'तीसरी मंजिल' और फ़िल्म 'पड़ोसन' से मिली। उन्होंने नासिर हुसैन, रमेश सिप्पी जैसे फ़िल्मकारों के साथ लंबे समय तक काम किया।

प्रयोग के हिमायती

राहुल देव बर्मन
आर. डी. बर्मन को संगीत में प्रयोग करने का बेहद शौक़ था। नई तकनीक को भी वे बेहद पसंद करते थे। उन्होंने विदेश यात्राएँ कर संगीत संयोजन का अध्ययन किया। 27 ट्रैक की रिकॉर्डिंग के बारे में जाना। इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया। कंघी और कई फ़ालतू समझी जाने वाली चीजों का उपयोग उन्होंने अपने संगीत में किया। भारतीय संगीत के साथ पाश्चात्य संगीत का उन्होंने भरपूर उपयोग किया। आर. डी. बर्मन के बारे में कहा जाता है कि वे समय से आगे के संगीतकार थे। उन्होंने अपने संगीत में वे प्रयोग कर दिखाए थे, जो आज के संगीतकार कर रहे हैं। आर. डी. का यह दुर्भाग्य रहा कि उनके समय में फ़िल्मों में एक्शन हावी हो गया था और संगीत के लिए ज़्यादा गुंजाइश नहीं थी। अपने अंतिम समय में उन्होंने ‘1942 ए लव स्टोरी’ में यादगार संगीत देकर यह साबित किया था कि उनकी प्रतिभा का सही दोहन फ़िल्म जगत नहीं कर पाया। 4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक़ ढेर सारे गीत वे दे गए।

युवाओं के संगीतकार
आर. डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध की गई फ़िल्में ‘तीसरी मंजिल’ और ‘यादों की बारात’ ने धूम मचा दी। राजेश खन्ना को सुपर सितारा बनाने में भी आर. डी. बर्मन का अहम योगदान है। राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आर. डी. बर्मन की तिकड़ी ने 70 के दशक में धूम मचा दी थी। आर. डी. का संगीत युवा वर्ग को बेहद पसंद आया। उनके संगीत में बेफ़िक्री, जोश, ऊर्जा और मधुरता है, जिसे युवाओं ने पसंद किया। ‘दम मारो दम’ जैसी धुन उन्होंने उस दौर में बनाकर तहलका मचा दिया था। जब राजेश खन्ना का सितारा अस्त हुआ तो आर. डी. ने अमिताभ के लिए यादगार धुनें बनाईं। आर. डी. बर्मन का संगीत आज का युवा भी सुनता है। समय का उनके संगीत पर कोई असर नहीं हुआ। पुराने गानों को रीमिक्स कर आज पेश किया जाता है, उनमें आर. डी. द्वारा संगीतबद्ध गीत ही सबसे अधिक होते हैं। ऐसा नहीं है कि आर. डी. ने धूम-धड़ाके वाली धुनें ही बनाईं। गीतकार गुलज़ार के साथ राहुल देव एक अलग ही संगीतकार के रूप में नजर आते हैं। ‘आँधी’, ‘किनारा’, ‘परिचय’, ‘खुश्बू’, ‘इजाजत’, ‘लिबास’ फ़िल्मों के गीत सुनकर लगता ही नहीं कि ये वही आर. डी. बर्मन हैं, जिन्होंने ‘दम मारो दम’ जैसा गाना बनाया है।

प्रसिद्ध गीत
जी.पी. सिप्पी के साथ उन्होंने 'सीता और गीता', 'शोले', 'शान' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया। नासिर हुसैन के साथ उनका लंबा साथ रहा और उन्होंने तीसरी मंजिल, कारवाँ, हम किसी से कम नहीं, यादों की बारात जैसी कई फ़िल्मों के गानों को यादगार बना दिया। आर. डी. बर्मन के विविधतापूर्ण गानों में एक ओर जहाँ शास्त्रीय संगीत पर आधारित रैना बीती जाए, मेरा कुछ सामान जैसे गाने है वहीं महबूबा महबूबा, पिया तू अब तो आजा जैसे गाने भी हैं।

लोकप्रियता
1970 के दशक की उनकी लोकप्रियता 1980 के दशक में भी क़ायम रही और इस दौरान भी उन्होंने कई चर्चित फ़िल्मों में संगीत दिया। लेकिन दशक के आखिरी कुछ वर्ष अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे और उनकी कई फ़िल्में नाकाम रहीं। '1942 ए लव स्टोरी' उनके निधन के बाद प्रदर्शित हुई। इस फ़िल्म के गानों में नई ताजगी थी और उन्हें खूब पसंद किया गया। उनका 4 जनवरी, 1994 को निधन हो गया। उनके निधन के बाद रिमिक्स गानों का दौर शुरू हुआ। दिलचस्प है कि रीमिक्स किए गए अधिकतर गाने आर. डी. बर्मन के ही स्वरबद्ध हैं। आर डी बर्मन ने लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया जिनमें 292 हिंदी फ़िल्में थीं। इसके अलावा उन्होंने बंगाली, तमिल, तेलुगू और उड़िया फ़िल्मों के लिए भी संगीत दिया।

निधन
4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक़ बहुत सारे गीत दे गए। अपने अंतिम समय में उन्होंने ‘1942 ए लव स्टोरी’ में यादगार संगीत देकर यह साबित किया था कि उनकी प्रतिभा का सही दोहन फ़िल्म जगत नहीं कर पाया।

अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ

#18feb
#04jan 
पूरा नाम अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ
🎂जन्म 18 फ़रवरी, 1927
जन्म भूमि इन्दौर, मध्य प्रदेश
⚰️मृत्यु 04 जनवरी, 2017
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
अभिभावक उस्ताद जाफ़र खाँ (पिता)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र सितार वादक
पुरस्कार-उपाधि पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, शिखर सम्मान
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ के सितार वादन की अपनी अलग शैली है, जिसे लोग 'जाफ़रखानी बाज' कहने लगे हैं।
इनका चमत्कारिक सितार वादन संगीत से अनभिज्ञ श्रोताओं को भी रसमग्न कर देता है। इनके वादन की अपनी अलग शैली है, जिसे लोग 'जाफ़रखानी बाज' कहने लगे हैं। इसमें मिज़राव का काम कम तथा बाएँ हाथ का काम ज़्यादा होता हैं। कण, मुर्की, खटका आदि का काम भी अधिक रहता है। प्रस्तुतीकरण में बीन तथा सरोद अंग का आभास होता है।

जीवन परिचय

हलीम साहब का जन्म इन्दौर, मध्य प्रदेश के निकटस्थ जावरा नामक गाँव में सन् 1929 में हुआ था। कुछ समय बाद इनका परिवार बंबई चला गया। अब्दुल हलीम के पिता उस्ताद जाफ़र खाँ भी सितार के अच्छे ज्ञाता थे। बचपन से ही सांगीतिक वातावरण मिलने से संगीत के प्रति लगाव हो जाना स्वाभाविक था।

शिक्षा
प्रारंभिक सितार-शिक्षा अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ ने प्रसिद्ध बीनकार उस्ताद बाबू खाँ से शुरू हुई। तत्पश्चात् उस्ताद महबूब खाँ से सितार की उच्च स्तरीय तालीम हासिल की। अब तक आप अपने फन में पूरी तरह माहिर हो चुके थे।

फ़िल्मी जीवन
पिता का इन्तकाल होने की वजह से हलीम साहब के सामने आर्थिक समस्या खड़ी हो गई, परिणामतः आपको फ़िल्मी क्षेत्र में जाना पड़ा। यहाँ आपको काफ़ी कामयाबी मिली, साथ ही सारे भारत में आपके सितार वादन की धूम मच गई। आकाशवाणी के राष्ट्रीय कार्यक्रमों तथा अखिल भारतीय संगीत सम्मेलनों में अपने सितार वादन से आपने लाखों श्रोताओं की आनन्द-विभोर तथा आश्चर्यचकित किया है। आपने चकंधुन, कल्पना, मध्यमी तथा खुसरूबानी जैसे मधुर राग निर्मित किए हैं। कुछ दक्षिणी रागों को भी उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया है। सांस्कृतिक प्रतिनिधिमण्डल के माध्यम से कई बार विदेश भ्रमण कर चुके हैं।

सम्मान और पुरस्कार

पद्मभूषण (2006)
शिखर सम्मान (मध्य प्रदेश सरकार, 1991)
गौरव पुरस्कार (महाराष्ट्र सरकार, 1990)
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1987)
पद्मश्री (1970)

प्रदीप कुमार

#04jan
#27oct 
प्रदीप कुमार
🎂जन्म 4 जनवरी, 1925
जन्म भूमि पश्चिम बंगाल
⚰️मृत्यु 27 अक्टूबर, 2001
मृत्यु स्थान कोलकाता
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अभिनेता
मुख्य फ़िल्में 'श्री फरहाद', 'जागते रहो', 'दुर्गेश नंदिनी', 'बंधन', 'हीर', 'क्रांति' (1981), 'रजिया सुल्तान' आदि।
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी प्रदीप कुमार के सिने कॅरियर में उनकी जोड़ी मीना कुमारी के साथ खूब जमी। उनकी और मीना कुमारी की जोड़ी वाली फ़िल्मों में 'अदले जहांगीर', 'बंधन', 'चित्रलेखा', 'बहू बेगम', 'भींगी रात', 'आरती' और 'नूरजहां' शामिल हैं।
हिन्दी एवं बंगाली फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता थे। हिन्दी सिनेमा में उनको ऐसे अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने 1950 और 60 के दशक में अपने ऐतिहासिक किरदारों के ज़रिये दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। उस जमाने में फ़िल्मकारों को अपनी फ़िल्मों के लिए जब भी किसी राजा, महाराजा, राजकुमार अथवा नवाब की भूमिका की ज़रूरत होती थी तो वह प्रदीप कुमार को याद किया जाता था। उनके उत्कृष्ट अभिनय से सजी 'अनारकली', 'ताजमहल', 'बहू बेगम' और 'चित्रलेखा' जैसी फ़िल्मों को दर्शक आज भी नहीं भूले हैं।

प्रदीप कुमार बचपन से ही फ़िल्मों में बतौर अभिनेता काम करने का सपना देखा करते थे। इसी सपने को पूरा करने के लिए वह अपने जीवन के शुरूआती दौर में रंगमंच से जुड़े। हांलाकि इस बात के लिए उनके पिताजी राजी नहीं थे। 17 वर्ष की उम्र में प्रदीप कुमार अपने सपने को साकार करने के लिए मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद वह कैमरामैन धीरेन डे के सहायक के तौर पर काम करने लगे। वर्ष 1947 में उनकी मुलाकात निर्देशक देवकी बोस से हुई। देवकी बोस को प्रदीप कुमार में एक उभरता हुआ सितारा दिखाई दिया और उन्होंने अपनी बांग्ला फ़िल्म 'अलखनंदा' में काम करने का मौका दिया। इस फ़िल्म के जरिए प्रदीप कुमार बतौर अभिनेता पहचान बनाने में भले ही सफल नहीं हुए, लेकिन एक अभिनेता के रूप में उन्होंने सिने कैरियर के सफर की शुरूआत कर दी। इस बीच प्रदीप कुमार ने एक और बंगला फ़िल्म 'भूली नाय' में अभिनय किया। फ़िल्म भूली नाय ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी सिल्वर जुबली पूरी की। इसके बाद प्रदीप कुमार ने हिंदी फ़िल्म की ओर भी अपना रुख़कर लिया

वर्ष 1946 से वर्ष 1952 तक प्रदीप कुमार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। प्रदीप कुमार में फ़िल्मों में बतौर अभिनेता बनने का नशा कुछ इस कदर छाया हुआ था कि उन्होंने हिंदी और उर्दू भाषा की तालीम हासिल करनी शुरू कर दी। फ़िल्म अलखनंदा के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने कृष्णलीला, स्वामी, विष्णुप्रिया, संध्या बेलार रूपकथा जैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स आफिस पर सफल नहीं हुई। वर्ष 1952 में प्रदर्शित फ़िल्म आंनद मठ में प्रदीप कुमार पहली बार मुख्य अभिनेता की भूमिका में दिखाई दिए। हालांकि इस फ़िल्म में पृथ्वीराज कपूर जैसे महान् अभिनेता भी थे फिर भी प्रदीप कुमार पृथ्वीराज की उपस्थिति में भी दर्शकों के बीच अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म की सफलता के बाद प्रदीप कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए।
📽️यादगार फ़िल्में
वर्ष 1956 प्रदीप कुमार के सिने कैरियर का सबसे अहम वर्ष साबित हुआ। इस वर्ष उनकी 10 फ़िल्में प्रदर्शित हुई, जिनमें श्री फरहाद, जागते रहो, दुर्गेश नंदिनी, बंधन, राजनाथ और हीर जैसी फ़िल्में शमिल है। इसके बाद प्रदीप कुमार ने एक झलक (1957), अदालत (1958), आरती (1962), चित्रलेखा (1964), भींगी रात (1965), रात और दिन, बहू बेगम (1967) जैसी कई फ़िल्मों में अपने अभिनय का जौहर दिखाकर दर्शको का भरपूर मनोरजंन किया। अभिनय में एकरूपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए प्रदीप कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में वर्ष 1969 में प्रदर्शित अजय विश्वास की सुपरहिट फ़िल्म संबध में उन्होंने चरित्र भूमिका निभाई बावजूद इसके उन्होंने अपने सशक्त अभिनय से दर्शको की वाहवाही लूट ली। इसके बाद प्रदीप कुमार ने महबूब की मेहंदी (1971), समझौता (1973), दो अंजाने (1976), धरमवीर (1977), खट्ठामीठा (1978), क्रांति (1981), रजिया सुल्तान (1983), दुनिया (1984), मेरा धर्म (1986), वारिस (1988) जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों के जरिए दर्शको के दिल पर राज किया। प्रदीप कुमार के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी मीना कुमारी के साथ खूब जमी। प्रदीप कुमार और मीना कुमारी की जोड़ी वाली फ़िल्मों में अदले जहांगीर, बंधन, चित्रलेखा, बहू बेगम, भींगी रात, आरती और नूरजहां शामिल है। 

निधन
लगभग चार दशक तक अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों के बीच ख़ास पहचान बनाने वाले प्रदीप कुमार 27 अक्टूबर 2001 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

निरूपा रॉय

#04jan
#13oct

निरूपा राय

कोकिला किशोरचंद्र बुलसारा

🎂04 जनवरी 1931
बुलसर , बॉम्बे प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत , अब यह वलसाड , गुजरात है
⚰️मृत13 अक्टूबर 2004 (आयु 73 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
राष्ट्रीयता भारतीय

यह अभिनेत्री दुख की रानी के नाम से जानी जाती थी.उन्होंने 15 साल की उम्र में कमल रॉय से शादी की और मुंबई चली गईं । जब उन्होंने फिल्म उद्योग में प्रवेश किया तो उन्होंने अपना विवाहित नाम निरूपा रॉय इस्तेमाल किया।
निरूपा रॉय 
1946-1999 तक सक्रिय रही
जीवनसाथी कमल रॉय (जन्म 1946)
बच्चे2
पुरस्कार
मुनीमजी के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार (1956) छाया के लिए
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार (1962) शहनाई के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार (1965) फ़िल्मफ़ेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार (2004)

1946 में, रॉय और उनके पति ने एक गुजराती अखबार में अभिनेताओं की तलाश के एक विज्ञापन का जवाब दिया। उनका चयन हो गया और उन्होंने गुजराती फिल्म रणकदेवी (1946) से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। उसी वर्ष उन्होंने अपनी पहली हिंदी फिल्म अमर राज में अभिनय किया । उनकी लोकप्रिय फिल्मों में से एक दो बीघा ज़मीन (1953) थी। उन्होंने 1940 और 50 के दशक की फिल्मों में बड़े पैमाने पर पौराणिक किरदार निभाए। हर हर महादेव में उन्होंने त्रिलोक कपूर के साथ पार्वती देवी की भूमिका निभाई, जिन्होंने शिव की भूमिका निभाई और यह फिल्म साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। उनकी देवी की छवि बहुत मजबूत थी और लोग उनके घर आते थे और उनका आशीर्वाद लेते थे। उनके सह-कलाकारों में त्रिलोक कपूर (जिनके साथ उन्होंने अठारह फिल्मों में अभिनय किया),भारत भूषण , बलराज साहनी और अशोक कुमार थे ।

1970 के दशक में, अमिताभ बच्चन और शशि कपूर द्वारा निभाए गए पात्रों की मां की भूमिका ने उनके नाम को गरीब पीड़ित मां का पर्याय बना दिया। दीवार (1975) में उनकी भूमिका और माँ और बेटे के संदर्भ में इसके संवाद घिसी-पिटी बातों की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं।
कमल रॉय के साथ उनकी शादी से उनके दो बच्चे हुए, जिनका नाम योगेश और किरण रॉय है।उनकी मृत्यु के बाद के वर्षों में, वे रॉय की संपत्ति और सामान पर विवाद में उलझ गए, जिसने पूरे समाचार और मीडिया में बहुत ध्यान आकर्षित किया है।
13 अक्टूबर 2004 को, रॉय को मुंबई में दिल का दौरा पड़ा और 73 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया । 

रॉय की स्मृति में कई श्रद्धांजलि और लेख बनाए गए हैं।  फिल्म दीवार से उनके संवाद प्रतिष्ठित हो गए,  और फिल्म में उनके अभिनय के साथ-साथ उनकी अन्य उल्लेखनीय फिल्मों को हिंदी सिनेमा में एक मील का पत्थर माना जाता है
📽️
1946 रणकदेवी
1946 अमर राज 
1949 उद्धार
1950 गडानो बेल 
1951 राम जन्म 
1953 दो बिगहा जमीन 
नौलखा हार 
1954 चक्रधारी 
दुर्गा पूजा 
1955 गरम कोट 
मुनीमजी 
तांगा-वाली 
1956 भाई-भाई 
1957 मोहिनी 
मुसाफिर 
1958 चालबाज़ 
दुल्हन 
1960 आंचल 
1961 छाया 
1962 बेज़ुबान 
1963 कौन अपना कौन पराया 
मुझे जीने दो 
ग्रहस्थि 
1964 बेनजीर 
शहनाई 
फूलों की सेज 
1965 शहीद 
1967 राम और श्याम 
जाल 
1968 आबरू 
एक कली मुस्काई 
राजा और रंक 
1969 आंसू बन गए फूल 
प्यार का मौसम 
राहगीर 
1970 अभिनेत्री 
माँ और ममता 
घर घर की कहानी 
महाराजा (1970 फ़िल्म) 
आन मिलो सजना 
पूरब और पश्चिम 
1971 गंगा तेरा पानी अमृत 
1972 जवानी दीवानी 
1973 कच्चे धागे 
1975 दीवार 
1976 मां 
1977 अमर अकबर एंथोनी 
अनुरोध 
1978 आँख का तारा 
1979 सुहाग 
1981 आस पास 
1982 बदले की आग 
1982 [[तीसरी आंख
(1982 फ़िल्म)|तीसरी आंख]] ||

1983 बेताब 
1985 सरफ़रोश 
गिरफ्तार 
मर्द 
1986 अंगाराय 
1988 गंगा जमुना सरस्वती 
इन्तेक़म 
1991 Pratikar 
1993 आसू बने अंगारे 
1996 नमक 
1999 जहां तुम ले चलो 
लाल बादशाह

चांद उस्मानी

#03jan
#26nov 
चांद उस्मानी

 🎂03 जनवरी 1933 
🎂 26 नवंबर 1989

 1950 से 1980 के दशक तक हिंदी फिल्मों की एक भारतीय अभिनेत्री थीं। उन्होंने 1971 में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता । उन्हें आत्म-बलिदान करने वाली पत्नियों और माताओं की भूमिका निभाने के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है।
चांदबीबी खानम उस्मानी का 🎂जन्म 3 जनवरी 1933 को आगरा , उत्तर प्रदेश में एक पश्तून परिवार में हुआ था।  उन्होंने मुकुल दत्त ( आन मिलो सजना के निर्देशक ) से शादी की,  जिनसे उन्हें एक बेटा रोशन हुआ। वह माहिम में अपने घर में उन भागी हुई लड़कियों के लिए एक आश्रम चलाती थीं जो फिल्मों में करियर की तलाश में मुंबई आई थीं। ⚰️ 26 नवंबर 1989 को मुंबई में उनकी मृत्यु हो गई।
चांद उस्मानी 1949 में 'कारदार-कोलीनोस-टेरेसा कॉन्टेस्ट' नामक एक प्रतिभा प्रतियोगिता में भाग लेकर दूसरे स्थान पर जीतकर सुर्खियों में आए।शम्मी कपूर (उनकी भी पहली फिल्म) के साथ जीवन ज्योति में नायिका के रूप में शुरुआत की ।उन्होंने बाराती , बाप रे बाप और सम्राट पृथ्वीराज चौहान में भी अभिनय किया और रंगीन रातें , नया दौर , प्रेम पत्र और पहचान सहित कई अन्य फिल्मों में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं । उन्हें बहुत आलोचनात्मक प्रशंसा मिली: रंगीन रैटन (1956) की समीक्षा में कहा गया कि वह "शानदार प्रदर्शन करती हैं; उनका चरित्र सबसे अच्छा विकसित है, और परिणामस्वरूप वह फिल्म की जान और आत्मा बन जाती हैं।"  बाप रे बाप में , एक मुख्य दृश्य "स्क्रीन पर उस्मानी द्वारा प्रदर्शित खुशी" के लिए जाना जाता है। फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने उन्हें "दिल को छू लेने वाली मुस्कान वाली जोशीली चांद उस्मानी" के रूप में वर्णित किया है। 1970 की फिल्म पहचान में एक वेश्या चंपा के किरदार के लिए उन्होंने 1971 में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता । लगभग 40 साल बाद लिखते हुए, द हिंदू के फिल्म समीक्षक ने माना कि "चांद उस्मानी ने एक ऐसी भूमिका में संयम, शिष्टता और शालीनता प्रदर्शित करते हुए चंपा की भूमिका के साथ न्याय किया है जिसने आसानी से शीर्ष पर जाने का पर्याप्त अवसर प्रदान किया।" लंबे करियर के बावजूद, उन्होंने तबस्सुम के साथ एक साक्षात्कार में कहा कि उन्हें एक एजेंट/प्रबंधक नहीं होने का अफसोस है, जिसके कारण उन्हें विविध भूमिकाएँ नहीं मिलीं और अधिक सफलता नहीं मिली।अपनी कई भूमिकाओं में, उन्होंने एक आत्म-त्यागी पत्नी, माँ, प्रेमिका या बहन की भूमिका निभाई, जैसा कि महाश्वेता देवी ने अपनी 1986 की लघु कहानी 'द वेट-नर्स' में बताया है :

"जशोदा भारतीय नारीत्व का एक सच्चा उदाहरण थीं। वह एक पवित्र और प्यार करने वाली पत्नी और समर्पित माँ की विशिष्ट थीं, जिनके आदर्श बुद्धिमत्ता और तर्कसंगत व्याख्या को अस्वीकार करते हैं, जिनमें कल्पना की सीमाओं तक फैले त्याग और समर्पण शामिल हैं, और जिन्हें आज भी जीवित रखा गया है। सदियों से लोकप्रिय भारतीय मानस, सती-सावित्री-सीता से लेकर हमारे समय में निरूपा रॉय और चंद उस्मानी तक।"

📽️

1990 अमीरी गरीबी
1988 मर मिटेंगे 
1985 पत्थर दिल 
1985 महक 
1985 आँधी तूफान 
1985 उल्टा सीधा 
1984 राजा और राना 
1983 पु्कार 
1983 लाल चुनरिया 
1982 दौलत 
1982 अर्थ 
1981 दहशत 
1981 याराना 
1981 साजन की सहेली 
1980 जल महल 
1979 एहसास 
1978 परमात्मा 
1977 अब क्या होगा 
1977 हत्यारा शान्ता 
1977 परवरिश 
1976 कादम्बरी 
1974 उजाला ही उजाला 
1971 हलचल 
1970 पहचान 
1970 खिलौना
1969 दो भाई 
1967 अनीता 
1967 अमन 
1964 शहनाई 
1958 संस्कार 
1957 नया दौर 
1955 बाप रे बाप 
1954 बाराती 
1953 जीवन ज्योति

नरेश अय्यर

#03jan 
नरेश अय्यर
 🎂जन्म 03 जनवरी 1981 भारत के मुंबई शहर से एक पार्श्वगायक हैं।

 नरेश अय्यर ने कई भारतीय भाषाओं में फ़िल्मी गाने गाए हैं और कई चार्ट हिट गानों का श्रेय उन्हें जाता है। ए.आर.रहमान द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म रंग दे बसंती में उनके द्वारा गाया रूबरू गीत 2006 में कई सप्ताह म्यूज़िक चार्टों की चोटी पर बना रहा और उन्होंने इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीता. उन्होंने आर.डी. बर्मन संगीत प्रतिभा श्रेणी में फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी जीता. वे उन चंद पार्श्वगायकों में से हैं जिन्होंने अपने पहले ही पेशेवर गायन वर्ष में फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार और राष्ट्रीय पुरस्कार, दोनों जीते.
नरेश अय्यर का जन्म तमिल ब्राह्मण परिवार में और पालन-पोषण मुंबई के माटुंगा में हुआ। उन्होंने SIES कॉलेज ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज़ में पढ़ाई की जहां उन्होंने वाणिज्य में स्नातक की डिग्री हासिल की. स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद वे चार्टर्ड एकाउंटेंट बनने का इरादा रखते थे, लेकिन इसके बजाय कर्नाटक संगीत और शास्त्रीय हिंदुस्तानी संगीत सीखने का निर्णय लिया। अय्यर को ए.आर. रहमान ने एक रियॉलिटी टैलेंट शो, चैनल V के सुपर सिंगर में देखा. हालांकि वे शो जीत नहीं पाए, लेकिन ए.आर.रहमान ने बाद में नरेश से संपर्क किया और उन्होंने अनबे आरुइरे के लिए अपना पहला गाना मयिलिरागे गाया. उन्होंने अन्य संगीतकारों के लिए तमिल, तेलुगू और हिंदी में भी गाने गाए हैं।

नरेश मुंबई में अवस्थित ध्वनि नामक एक फ़्यूशन बैंड के गायक भी हैं।उन्होंने अपने बैंड के साथ कई कार्यक्रम और चैरिटी संगीत कार्यक्रमों में प्रदर्शन दिया है।

उन्होंने सर्वश्रेष्ठ नवोदित गायक के रूप में आर.डी. बर्मन पुरस्कार भी जीता.

अमरीकी ट्रंप

ट्रंप चले थे ईरान हराने , खुद अभी बने पप्पू  राहुल बने थे शेर ट्रंप के बल , खुद मुंह के बल गिरे।  दोनों हो रह बेइज्जत दुनिया हुई...