मंगलवार, 5 दिसंबर 2023

नादिरा

अभिनेत्री नादिरा
फ्लोरेंस ईजेकील
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       #05dic 
🎂5 दिसंबर 1932
बगदाद , इराक साम्राज्य (वर्तमान इराक )
⚰️मृत
09 फ़रवरी 2006 (आयु 73 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
पेशा
अभिनेत्री
सक्रिय वर्ष
1952-2001
पुरस्कार
1976 में फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
नादिरा का जन्म 5 दिसंबर 1932 को बगदाद , इराक में एक बगदादी यहूदी परिवार में हुआ था। जब वह शिशु थीं, तो उनका परिवार व्यवसाय के अवसरों की तलाश में बगदाद से बंबई चला गया। उसके दो भाई थे, जिनमें से एक संयुक्त राज्य अमेरिका में और दूसरा इज़राइल में रहता है । 
सिनेमा में नादिरा की पहली उपस्थिति 1943 की हिंदी भाषा की फिल्म मौज में थी जब वह 10 या 11 वर्ष की थीं। 

उन्हें सफलता फिल्म निर्देशक मेहबूब खान की पत्नी सरदार अख्तर से मिली, जिन्होंने उन्हें फिल्म आन (1952) में लिया। फिल्म में राजपूत राजकुमारी के रूप में उनकी भूमिका ने उन्हें सिनेमाई प्रसिद्धि दिलाई। 1955 में, उन्होंने श्री 420 में माया नाम की एक अमीर सोशलाइट की भूमिका निभाई । उन्होंने दिल अपना और प्रीत पराई (1960), पाकीज़ा (1972), हंसते ज़ख्म (1973) और अमर अकबर एंथोनी (1977) जैसी कई फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं । उन्हें अक्सर एक प्रलोभिका या खलनायिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता था, ऐसी भूमिकाएँ जो पवित्र अग्रणी महिला पात्रों के लिए एक बाधा के रूप में उपयोग की जाती थीं, जिन्हें उस समय हिंदी फिल्म उद्योग द्वारा पसंद किया जाता था । 

1975 की फ़िल्म जूली में अपनी भूमिका के लिए नादिरा ने सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता । 1980 और 1990 के दशक के दौरान, उन्होंने ज्यादातर सहायक किरदार निभाए। एक पश्चिमी महिला के रूप में उनकी छवि के कारण , उन्होंने अक्सर ईसाई या एंग्लो-भारतीय महिलाओं की भूमिकाएँ निभाईं। उनकी आखिरी भूमिका फिल्म जोश (2000) में थी।

वह अपने करियर के दौरान सबसे अधिक भुगतान पाने वाली अभिनेत्रियों में से एक थीं, और रोल्स-रॉयस खरीदने वाली पहली भारतीय अभिनेत्रियों में से एक थीं । 
अपने बाद के वर्षों में, नादिरा भारत के मुंबई में अकेली रहती थीं , क्योंकि उनके कई रिश्तेदार इज़राइल चले गए थे । अपनी मृत्यु से पहले पिछले तीन वर्षों में, वह केवल एक नौकरानी के साथ अपने कॉन्डोमिनियम में रह रही थी। 24 जनवरी 2006 को, उन्हें कार्डियक अरेस्ट हुआ और उन्हें अर्ध-बेहोशी की हालत में एक अस्पताल में भर्ती कराया गया । उसे कई मौजूदा स्वास्थ्य समस्याएं थीं, जिनमें ट्यूबरकुलर मेनिनजाइटिस , अल्कोहलिक लिवर डिसऑर्डर और पक्षाघात शामिल हैं । 

लंबी बीमारी के बाद 9 फरवरी 2006 को 73 वर्ष की आयु में तारदेव, मुंबई के भाटिया अस्पताल में उनका निधन हो गया।  उनके दो भाई बचे थे। 
📽️
2001 ज़ोहरा महल 
2000 जोश 
1999 कॉटन मैरी 
1997 तमन्ना 
1992 धर्म-पिता 
1992 महबूबा 
1991 झूठी शान 
1991 हसन दा चोर 
1991 लैला 
1988 मौला बख्श 
1985 सागर 
1984 किम (टीवी धारावाहिक) कुल्लू की विधवा 
1982 रास्ते प्यार के 
1982 अशांति
1981 दहशत 
1981 आस पास 
1980 चाल बाज़
1980 स्वयंवर
1979 दुनिया मेरी जेब में 
1979 बिन फेरे हम तेरे 
1979 मगरूर 
1978 नौकरी
1978 नौकरी 
1977 आप की खातिर 
1977 आशिक हूं बहारों का
1977 अमर अकबर एंथोनी बिना श्रेय वाला कैमियो 
1977 डार्लिंग डार्लिंग 
1977 पापी
1976 भंवर 
1975 धर्मात्मा 
1975 जूली
1975 कहते हैं मुझको राजा 
1975 मेरे सरताज 
1974 फ़सलाह 
1974 इश्क इश्क इश्क 
1974 वो मैं नहीं 
1973 एक नारी दो रूप 
1973 हंसते ज़ख़्म 
1973 प्यार का रिश्ता 
1972 एक नजर
1972 राजा जानी 
1971 कहीं आर कहीं पार 
1972 अनोखा दान 
1972 पाकीज़ा 
1970 बॉम्बे टॉकी
1970 चेतना 
1970 एक नन्हीं मुन्नी लड़की थी 
1970 इश्क़ पर ज़ोर नहीं
1970 सफ़र
1969 गुरु 
1969 इन्साफ का मंदिर 
1969 जहां प्यार मिले 
1969 तलाश
1968 कहीं दिन कहीं रात 
1968 सपनों का सौदागर
1963 मेरी सूरत तेरी आंखें 
1965 छोटी छोटी बातें 
1965 दुर्घटना 
1960 दिल अपना और प्रीत पराई 
1960 काला बाजार 
1958 पुलिस 
1956 प्रिय कोरिन्ना 
1956 पॉकेट मार 
1956 समुंदरी डाकू 
1956 सिपहसालार 
1956 श्री 420 
1955 रफ़्तार 
1954 डाक बाबू 
1954 वारिस 
1953 नगमा 
1952 आन  राजश्री 
1943 मौज '

जय ललिता

जयललिता जयराम
       #24feb
       #05dic 
🎂जन्म 24 फ़रवरी, 1948
जन्म भूमि मैसूर
⚰️मृत्यु 5 दिसम्बर, 2016
मृत्यु स्थान चेन्नई, तमिलनाडु

अभिभावक पिता- जयराम वेदवल्ली, माता- वेदावती
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि तमिल अभिनेत्री तथा राजनीतिज्ञ
पार्टी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम
पद तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री
कार्य काल 24 जून 1991 – 12 मई 1996, 14 मई 2001 – 21 सितम्बर 2001, 2 मार्च 2002 – 12 मई 2006, 16 मई 2011 से 27 सितम्बर, 2014 तक।
भाषा तमिल, तेलुगु, कन्नड़, अंग्रेज़ी, हिंदी
विशेष तमिलनाडु में जयललिता की लोकप्रियता ज़्यादा है, क्योंकि उनकी योजनाएं सीधे जनता से जुड़ती हैं। उनकी योजनाएं ग़रीबों के हित में हैं; और खास बात ये है कि उनकी योजनाओं को अम्मा ब्रांड कहा जाता है।
अन्य जानकारी जयललिता तमिल फ़िल्मों की अभिनेत्री भी थीं। उन्होंने तमिल के अलावा तेलुगु, कन्नड़ और हिन्दी भाषा की लगभग 300 फ़िल्मों में काम किया था।
परिचय
जयललिता का जन्म 24 फ़रवरी सन 1948 को मैसूर में मांडया ज़िले के पांडवपुर नामक तालुके के मेलुरकोट गाँव में एक 'अय्यर परिवार' में हुआ था। इनके पिता का नाम जयराम वेदवल्ली था तथा माता वेदावती थीं। जयललिता ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा चर्च पार्क कॉन्वेंट स्कूल और बिशप कॉटन गर्ल्स स्कूल में पाई। उन्होंने उच्च शिक्षा चेन्नई के चर्च पार्क प्रेजेंटेशन कान्वेंट और स्टेला मारिस कॉलेज से प्राप्त की थी। महज 2 साल की उम्र में ही जयललिता के पिता जयराम, उन्हें माँ के साथ अकेला छोड़ चल बसे थे। इसके बाद शुरू हुआ ग़रीबी और अभाव का वह दौर, जिसने जयललिता को इतना मज़बूत बना दिया कि वे विषम परिस्थितियों में भी खुद को सहज बनाए रखने में पूरी तरह से सफल रहीं। विपक्ष के लिये ख़तरा और अपने चाहने वालों के बीच 'अम्मा' के नाम से मशहूर जयललिता ने अपनी राह अपने आप तय की।

फ़िल्मी कॅरियर
जयललिता ने सिर्फ़ 15 साल की उम्र में परिवार को चलाने के लिए फ़िल्मों का रुख़ कर लिया। उन्होंने बाल कलाकार के रूप में फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत की थी। 1964 में जयललिता को कन्नड़ फ़िल्म 'चिन्नाड़ा गोम्बे' में लीड रोल मिला। जयललिता ने हिंदी, कन्नड़ और इंग्लिश फ़िल्मों में भी काम किया। उन्होंने जानेमाने निर्देशक श्रीधर की फ़िल्म 'वेन्नीरादई' से अपना फ़िल्मी कॅरियर शुरू किया और लगभग 300 फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने तमिल के अलावा तेलुगु, कन्नड़ और हिन्दी फ़िल्मों में भी काम किया।

एम. जी. रामचंद्रन के साथ जोड़ी
सन 1965 में जयललिता ने तमिल फ़िल्म में काम किया, जो बहुत बड़ी हिट साबित हुई। इसी साल उन्होंने एम. जी. रामचंद्रन के साथ भी काम किया। एम. जी. रामचंद्रन तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और जयललिता के पॉलिटिकल मेंटर भी बनें। 1965 से 1972 के दौर में उन्होंने अधिकतर फ़िल्में एम. जी. रामचंद्रन के साथ कीं। 1970 में पार्टी के लोगों के दबाव में एम.जी. आर ने दूसरी अभिनेत्रियों के साथ भी काम करना शुरू कर दिया। वहीं जयललिता भी दूसरे अभिनेताओं के साथ फ़िल्में करने लगीं। करीब 10 सालों तक इन दोनों ने एक साथ कोई फ़िल्म नहीं की। 1973 में जयललिता और एम. जी. आर की जोड़ी आखिरी बार नजर आई थी। इन दोनों ने कुल मिलाकर 28 फ़िल्मों में साथ काम किया। 1980 में उन्होंने अपनी आखिरी तमिल फ़िल्म में काम किया।

राजनीतिक जीवन
राजनीतिक जीवन
पार्टी के अंदर और सरकार में रहते हुए मुश्किल और कठोर फ़ैसलों के लिए मशहूर जयललिता को तमिलनाडु में 'आयरन लेडी' और तमिलनाडु की 'मारग्रेट थैचर' भी कहा जाता है। कम उम्र में पिता के गुजर जाने के बाद जयललिता को पूर्व अभिनेता और नेता एम. जी. रामचंद्रन 1982 में राजनीति में लाए। उसी साल वह ए.आई.ए.डी.एम.के. के टिकट पर राज्यसभा के लिए मनोनीत की गईं और उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

ब्राह्मण विरोधी मंच पर द्रविड़ आंदोलन के नेता अपने चिर प्रतिद्वंद्वी एम. करुणानिधि से जयललिता की लंबी भिड़ंत हुई। राजनीति में 1982 में आने के बाद औपचारिक तौर पर उनकी शुरूआत तब हुई, जब वह अन्नाद्रमुक में शामिल हुईं। वर्ष 1987 में एम. जी. रामचंद्रन के निधन के बाद पार्टी को चलाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गयी और उन्होंने व्यापक राजनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया। भ्रष्टाचार के मामलों में 68 वर्षीय जयललिता को दो बार पद छोड़ना भी पड़ा, लेकिन दोनों मौके पर वह नाटकीय तौर पर वापसी करने में सफल रहीं। राजनीति में उनकी शुरुआत 1982 में हुई, जिसके बाद एमजीआर ने उन्हें अगले साल प्रचार सचिव बना दिया। रामचंद्रन ने करिश्माई छवि की अदाकारा-राजनेता को 1984 में राज्यसभा सदस्य बनाया, जिनके साथ उन्होंने 28 फ़िल्में की थीं। जयललिता ने 1984 के विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रभार का तब नेतृत्व किया, जब रामचंद्रन अस्वस्थता के कारण प्रचार नहीं कर सके थे।

मुख्यमंत्री का पद

वर्ष 1987 में रामचंद्रन के निधन के बाद राजनीति में वह खुलकर सामने आयीं, लेकिन अन्नाद्रमुक में फूट पड़ गयी। ऐतिहासिक राजाजी हॉल में एमजीआर का शव पड़ा हुआ था और द्रमुक के एक नेता ने उन्हें मंच से हटाने की कोशिश की। बाद में अन्नाद्रमुक दल दो धड़े में बंट गया, जिसे जयललिता और रामचंद्रन की पत्नी जानकी के नाम पर 'अन्नाद्रमुक जे' और 'अन्नाद्रमुक जा' कहा गया। एमजीआर कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री आर. एम. वीरप्पन जैसे नेताओं के खेमे की वजह से अन्नाद्रमुक की निर्विवाद प्रमुख बनने की राह में अड़चन आयी और उन्हें भीषण संघर्ष का सामना करना पड़ा। रामचंद्रन की मौत के बाद बंट चुकी अन्नाद्रमुक को उन्होंने 1990 में एकजुट कर 1991 में जबरदस्त बहुमत दिलायी। 1991 में ही प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हुई थी और इसके बाद ही चुनाव में जयललिता ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया था, जिसका उन्हें फ़ायदा पहुँचा था। लोगों में डी.एम.के. के प्रति ज़बरदस्त गुस्सा था, क्योंकि लोग उसे लिट्टे का समर्थक समझते थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद जयललिता ने लिट्टे पर पाबंदी लगाने का अनुरोध किया था, जिसे केंद्र सरकार ने मान लिया था।

जयललिता ने बोदिनायाकन्नूर से 1989 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की और सदन में पहली महिला प्रतिपक्ष नेता बनीं। इस दौरान राजनीतिक और निजी जीवन में कुछ बदलाव आया, जब जयललिता ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ द्रमुक ने उन पर हमला किया और उनको परेशान किया। अलबत्ता, पांच साल के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों, अपने दत्तक पुत्र के विवाह में जमकर दिखावा और उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन नहीं करने के चलते उन्हें 1996 में अपने चिर प्रतिद्वंद्वी द्रमुक के हाथों सत्ता गंवानी पड़ी। इसके बाद उनके खिलाफ आय के ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति सहित कई मामले दायर किये गए। अदालती मामलों के बाद उन्हें दो बार पद छोड़ना पड़ा- पहली बार 2001 में दूसरी बार 2014 में।

कार्यक्षमता

जयललिता 2001 में जब दोबारा सत्ता में आईं, तब उन्होंने लॉटरी टिकट पर पाबंदी लगा दी। हड़ताल पर जाने की वजह से दो लाख कर्मचारियों को एक साथ नौकरी से निकाल दिया, किसानों की मुफ़्त बिजली पर रोक लगा दी, राशन की दुकानों में चावल की क़ीमत बढ़ा दी, 5000 रुपये से ज़्यादा कमाने वालों के राशन कार्ड खारिज कर दिए, बस किराया बढ़ा दिया और मंदिरों में जानवरों की बलि पर रोक लगा दी। लेकिन 2004 के लोक सभा चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद उन्होंने पशुबलि की अनुमति दे दी और किसानों की मुफ़्त बिजली भी बहाल हो गई। उन्हें अपनी आलोचना बिल्कुल पसंद नहीं थी और इस वजह से उन्होंने कई समाचार पत्रों के ख़िलाफ़ मानहानि के मुक़दमे किये।

जयललिता तथा एमजीआर

तमिलनाडु की राजनीति के दो नायक एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) और जयललिता के आपसी संबंध हमेशा चर्चा का विषय रहे। एमजीआर फिल्मी दुनिया में जयललिता के मेंटर थे तो राजनीति में उनके गुरु। एमजीआर जयललिता से बेहद लगाव रखते थे और वो उनका हर दम ख्याल भी रखते थे। एक बार एक फिल्म की शूटिंग के दौरान जयललिता नंगे पांव थीं और तेज धूप के कारण उनके पैर जलने लगे तो एमजीआर ने उन्हें तकलीफ से बचाने के लिए गोद में उठाकर कार तक पहुंचाया।

बाद में अपने एक इंटरव्यू में इस घटना का जिक्र करते हुए जयललिता ने कहा था कि- "एमजीआर कई बार असल जिंदगी में भी हीरो की भूमिका निभाते थे।"

वाकया उस समय का है जब जयललिता एमजीआर के साथ 'आदिमयप्पन' फिल्म की थार रेगिस्तान में शूटिंग कर रही थीं। फिल्म में वो गुलाम लड़की का रोल निभा रही थीं, इसलिए उन्हें नंगे पांव शूटिंग करनी थी। चूंकि फिल्म सेट पर बाकी लोगों ने जूते पहन रखे थे, इसलिए किसी को इस बात का अंदाजा नहीं हुआ कि धूप बढ़ने के साथ रेत तपने लगी है। कुछ ही घंटे बाद रेत इतनी गरम हो गई कि जयललिता के पांव बुरी तरह जलने लगे। फिल्म यूनिट के किसी सदस्य ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन एमजीआर ने भांप लिया कि रेत से जयललिता के पांव जल रहे हैं। उन्होंने तत्काल फिल्म की शूटिंग पैक अप करने के लिए कह दिया। जयललिता की जीवनी "अम्माः जयललिताज जर्नी फ्रॉम मूवीज स्टार टू पोलिटिकल क्वीन" लिखने वाली वासंती ने अपनी किताब में इस वाकये का जिक्र किया है। जयललिता की मुश्किल यहीं नहीं खत्म हुई। उनकी गाड़ी शूटिंग स्थल से थोड़ी दूरी पर खड़ी थी। वे तपती रेत पर नंगे पांव रखते हुए कार तक जाने लगीं, लेकिन धीरे-धीरे जलन उनकी सहनशक्ति से बाहर होने लगी और उन्हें लगने लगा कि वे चक्कर खाकर गिर पड़ेंगी। जयललिता ने बाद में एक इंटरव्यू के दौरान उस घटना को याद करते हुए कहा था- "वो नरक से गुजरने जैसा था।" इस बार भी जयललिता की हालत एमजीआर ने समझी और उन्होंने एक शब्द कहे-सुने बिना गोद में उठा लिया और कार तक ले गए। जयललिता ने अपने इंटरव्यू में कहा था- "मैं एक कदम नहीं बढ़ा पा रही थी। मैं गिरने ही वाली थी। मैंने एक शब्द भी नहीं कहा, लेकिन एमजीआर ने मेरा दर्ज समझ लिया होगा। वे पीछे से अचानक आए और मुझे अपनी बांहों में उठा लिया। वे कई बार असल जिंदगी में भी हीरो की भूमिका निभाते थे।"

क्रिकेट से रिश्ता

ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम' की मुखिया जयललिता ने बॉलीवुड से अपना सफर शुरू किया था, लेकिन उनका एक खास रिश्ता क्रिकेट से भी रहा। जयललिता ने एक चैट शो के दौरान बताया था कि उनका पहला क्रश नरी कॉन्ट्रैक्टर थे, जबकि वे शम्मी कपूर की भी बहुत बड़ी फैन रहीं। नरी कॉन्ट्रैक्टर का पूरा नाम नरीमन जमशेदजी कॉन्ट्रैक्टर था। उन्होंने 1955 से 1962 के बीच भारत के लिए 31 टेस्ट मैच खेले। इस दौरान उनके बल्ले से एक शतक और 11 अर्द्ध शतक निकले थे। कॉन्ट्रैक्टर का जन्म 7 मार्च, 1934 को गुजरात के गोधरा में हुआ था। उन्होंने 52 टेस्ट पारियों में 31.58 की औसत से 1611 रन बनाए थे। दिल्ली में वेस्टइंडीज के खिलाफ 1958-1959 में 92 रनों की पारी खेलकर उन्होंने सनसनी मचा दी थी। 1960-1961 में उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय टीम की कमान संभाली थी। उस समय उनकी उम्र 26 साल की थी और वे उस समय भारत के सबसे कम उम्र में बने टेस्ट कप्तान थे। उन्होंने अपनी कप्तानी में भारत को इंग्लैंड के खिलाफ जीत दिलाई थी। बल्लेबाज और कप्तान के तौर पर वे अपने कॅरियर के चरम पर थे। 1962 में इंडियन टूरिस्ट कॉलोनी और बारबाडोस के बीच खेले गए मैच में उन्हें चार्ली ग्रिफिथ की गेंद सिर में जा लगी। कुछ समय तक उनकी जिंदगी खतरे में थी। उनकी कई सर्जरी करनी पड़ी, जिसके बाद वे खतरे से बाहर निकले। इसके बाद उनका अंतरराष्ट्रीय कॅरियर खत्म हो गया। दो साल बाद उन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में वापसी तो की, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी नहीं कर सके। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उनके बल्ले से 138 मैचों में 39.86 की औसत से 8611 रन निकले थे।

हिन्दी सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री रहीं शर्मिला टैगोर ने जयललिता को श्रद्धंजलि देते हुए बताया था कि उन्हें पटौदी को बल्लेबाज़ी करते देखना बहुत पसंद था और वे सिर्फ नवाब पटौदी को देखने के लिए मैदान पर जाती थीं। शर्मिला टेगौर का कहना था कि उन्होंने ये भी सुना था कि जयललिता मैदान पर दूरबीन लेकर जाती थीं ताकि वे पटौदी को पास से देख सके। वैसे यह भी उल्लेखनीय है कि जयललिता ने एक इंटरव्यू के दौरान ये भी कहा था कि उन्हें भारत के पूर्व कप्तान नरी कॉन्ट्रैक्टर भी बहुत पसंद थे।

जनता की भगवान 'अम्मा'

जयललिता (अम्मा) को जनता भगवान की तरह पूजती है। 2014 में जब जयललिता को जेल भेजा गया तो उनके कई समर्थकों ने आत्महत्या कर ली। दरअसल जयललिता की लोकप्रियता इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि उनकी योजनाएं सीधे जनता से जुड़ती हैं। उनकी योजनाएं ग़रीबों के हित में हैं; और खास बात ये है कि जयललिता की योजनाओं को अम्मा ब्रांड कहा जाता है।

अम्मा कैंटीन
अम्मा कैंटीन में 1 रुपये में इडली सांभर और 5 रुपये में चावल मिलता है। राज्य के सभी बड़े शहरों में अम्मा कैंटीन खुली हुई हैं।

अम्मा मिनरल वाटर
10 रुपये में मिनरल वाटर की बोतल मिलती है। चेन्नई समेत सभी प्रमुख शहरों तथा रेलवे स्टेशन-बस स्टैंड के आसपास ये बिकती है।

अम्मा फार्मेसी
तमिलनाडु के प्रमुख अस्पतालों के पास खुले फार्मेसी में सस्ती दरों पर दवाएं उपलब्ध हैं।

अम्मा सीमेंट
गरीबों को घर बनाने के लिए सस्ते में सीमेंट बेचने की योजना को लोगों ने पसंद किया है।

बेबी केयर किट
अम्मा बेबी केयर किट में मच्छरदानी, मैट्रेस, साबुन, कपड़े, नैपकीन, बेबी शैंपू 16 सामान मुफ़्त में दिये जाते हैं।

अम्मा मोबाइल
इस योजना में तमिलनाडु के स्वयं सहायता समूहों को फ्री में स्मार्टफोन मिलता है। इसके अलावा अम्मा सॉल्ट, अम्मा सीड्स आदि बांड भी हैं।

काफ़ी कुछ मुफ़्त में
गरीब औरतों को मिक्सर ग्राइंडर, लड़कियों को साइकिलें, छात्रों को स्कूल बैग, किताबें, यूनिफाॅर्म तथा मुफ़्त में मास्टर हेल्थ चेकअप की सुविधा भी मिलती है।

निधन
जयललिता का निधन 5 दिसम्बर, 2016 को चेन्नई में हुआ। उन्होंने सोमवार के दिन रात 11: 30 बजे आखिरी सांस ली। जयललिता को कार्डियक अरेस्ट (हृदय की गति रुकना) आने के बाद से उनकी हालत गंभीर थी। वे करीब दो माह से अस्पताल में भर्ती थीं और उनका इलाज चल रहा था।

अन्य द्रविड़ नेताओं के उलट जयललिता की पूरी आस्था भगवान में थी। वह नियमित रूप से प्रार्थना करती थीं और माथे पर आयंगर समुदाय के लोगों की तरह तिलक भी लगाती थीं। बावजूद इसके तमिलनाडु सरकार और शशिकला परिवार ने हिंदू रीति रिवाज के हिसाब से दाह संस्कार करने की बजाय उनके शव को दफनाने का फैसला किया। जयललिता के शव को एम. जी. रामचंद्रन की समाधि के साथ ही दफनाया गया। राज्य सरकार के एक अधिकारी के अनुसार- "जयललिता हमारे लिए आयंगर नहीं थीं। वह किसी भी जाति या धर्म से ऊपर थीं। उनसे पहले पेरियार, अन्नादुराई और एम. जी. रामचंद्रन सहित अधिकतर द्रविड़ नेताओं को दफनाया गया है। हम मौत के बाद भी किसी को आग की लपटों के हवाले नहीं कर सकते। हम उन्हें स्मारक के रूप में याद रखना चाहते हैं। इसलिए चंदन और गुलाब जल के साथ उनके पार्थिव शरीर को दफनाने का फैसला लिया गया।"

भाई वीर सिंह

भाई वीर सिंह
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पूरा नाम भाई वीर सिंह
🎂जन्म 5 दिसंबर, 1872
जन्म भूमि अमृतसर, पंजाब
⚰️मृत्यु 10 जून, 1957
मृत्यु स्थान अमृतसर, पंजाब
अभिभावक पिता- डॉ. चरनसिंह
कर्म भूमि अमृतसर, पंजाब
कर्म-क्षेत्र साहित्य, कवि
मुख्य रचनाएँ मुख्य काव्य ग्रन्थ- राणा सूरत सिंघ, लहरां दे हार, प्रीत वीणा, कंब की कलाई आदि।
भाषा हिन्दी भाषा
पुरस्कार-उपाधि 'पद्म भूषण'
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी भाई वीरसिंह के लेखन में गद्य की मात्रा अधिक होते हुए भी उनकी प्रसिद्ध कवि के रूप में अधिक है।

इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची
भाई वीर सिंह (अंग्रेज़ी: Vir Singh, जन्म- 5 दिसंबर, 1872 , अमृतसर, पंजाब; मृत्यु- 10 जून, 1957) आधुनिक पंजाबी काव्य और गद्य के निर्माता के रूप में प्रसिद्ध कवि थे। उन्होंने 1894 ई. में 'खालसा ट्रैक्ट सोसाइटी' की नींव डाली। फिर साप्ताहिक 'खालसा समाचार' निकाला। भाई वीर सिंह को भारत सरकार द्वारा 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया गया।

जन्म एवं परिचय
भाई वीर सिंह का जन्म दिसंबर,1872 ई. में अमृतसर, पंजाब में हुआ था। उनके पिता सिक्ख नेता डॉ. चरनसिंह भी साहित्य में रुचि रखते थे। वीर सिंह का बचपन अपने नाना के यहां बीता। वे भी साहित्यकार थे। इस प्रकार सहित्य के संस्कार वीर सिंह को विरासत में मिले। उन्होंने नाटककार, उपन्यासकार, निबंध-लेखक, जीवनी-लेखक और कवि के रूप में साहित्य की सेवा की है। सिक्ख धर्म में वीर सिंह की अटल आस्था थी और राजनीतिक गतिविधियों से वे सदा दूर रहे।

लेखन कार्य
आरंभ में भाई वीर सिंह ने सिक्ख मत की एकता और श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए अनेक 'ट्रैक्ट' लिखे और 1894 ई. में 'खालसा ट्रैक्ट सोसाइटी' की नींव डाली। फिर साप्ताहिक 'खालसा समाचार' निकाला। उनके चार उपन्यास 'सुंदरी', 'बिजैसिंघ', 'सतवंत कौर' और 'बाबा नौध सिंघ' प्रसिद्ध हैं। 'राजा लखनदारा सिंघ' नाटक है। 'कलगीधार चमत्कार' नामक गुरु गोविंद सिंह की जीवनी और 'गुरु नानक चमत्कार' नामक गुरु नानक की जीवनी लोकप्रिय है। इसके अतिरिक्त आपने अनेक कहानियां भी लिखी है।

मुख्य काव्य ग्रन्थ
भाई वीर सिंह के लेखन में गद्य की मात्रा अधिक होते हुए भी उनकी प्रसिद्ध कवि के रूप में अधिक है। 'राणा सूरत सिंघ', 'लहरां दे हार', 'प्रीत वीणा', 'कंब की कलाई', 'कंत महेली' और 'साइयां जीओ' मुख्य काव्य ग्रन्थ हैं। वे मनुष्यता के उद्बोधन के कवि थे। उनका कहना था कि "ए प्यारे मनुष्य तू धरती से ऊंचा उठकर देख। परमात्मा ने तुझे पंख दिए हैं। जिसके पास ऊँची दृष्टि है, ऊंचा साहस है, वह नीचे क्यों गिरेगा।"

उपाधि
भाई वीर सिंह के योगदान के लिए पंजाब विश्वविद्यालय ने उन्होंने डी.लिट. की मानक उपाधि दी, साहित्य अकादमी ने पुरस्कृत किया और भारत सरकार ने 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया।

मृत्यु
10 जून, 1957 में भाई वीर सिंह का देहांत हो गया।
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प्रभलीन सिद्धू

प्रभलीन संधू 
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🎂जन्म 5 दिसंबर 1983

धर्म सिख धर्म
जाति जाट
खान-पान की आदत मांसाहारी
शौक यात्रा करना, संगीत सुनना

पसंदीदा वस्तु
पसंदीदा खाना पास्ता, उबला अंडा, भेड़ का बच्चा, पिज्जा, जलेबी, दक्षिण भारतीय भोजन, कढ़ाई पनीर
पसंदीदा अभिनेता अमिताभ बच्चन
पसंदीदा अभिनेत्रियाँ श्रीदेवी, मधुबाला
पसंदीदा भोजनालय मुंबई में ‘बसंती एंड कंपनी’
पसंदीदा गंतव्य जोधपुर, मुंबई

एक पंजाबी फिल्म अभिनेत्री हैं, जो कलर्स के मोहे रंग दे में समय-समय पर स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित भारतीय धारावाहिक क्रांति के रूप में प्रसिद्ध हुईं, ज़ी के नए शो, आपकी अंतरा में विद्या के रूप में एक अलग रूप और भूमिका निभाती हैं। एक मध्यमवर्गीय पत्नी, जिसे अपने "ऑटिस्टिक" बच्चे के साथ तालमेल बिठाने में परेशानी होती है। उनकी पहली फिल्म यारां नाल बहारन थी, जिसमें उन्होंने जूही बब्बर की दोस्त की भूमिका निभाई थी।
उन्होंने 2004 की ड्रामा पंजाबी फिल्म मेहंदी वाले हाथ में भी अभिनय किया।
उन्होंने पंजाबी फिल्म एक जिंद एक जान में भी अभिनय किया है, जिसमें उन्होंने आर्यन वैद और राज बब्बर की बहन की भूमिका निभाई है।
राम गोपाल वर्मा द्वारा निर्देशित फिल्म नॉट ए लव स्टोरी में उन्होंने अंजू की भूमिका निभाई और उन्होंने पंजाबी फिल्म रहे चारदी काला पंजाब दी में भी अभिनय किया।
उनकी फिल्म नाबर (2013) ने 60वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ पंजाबी फिल्म का पुरस्कार जीता।

पायल राजपूत

पायल राजपूत
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🎂05 दिसंबर 1992

पायल राजपूत एक भारतीय अभिनेत्री हैं जो पंजाबी सिनेमा और तेलुगु सिनेमा के साथ-साथ हिंदी टेलीविजन श्रृंखला में अपने काम के लिए जानी जाती हैं।
उन्होंने 2017 में पंजाबी फिल्म चन्ना मेरेया से सिनेमाई शुरुआत की।
वह अगली बार तेलुगु फिल्म आरएक्स 100 में दिखाई दीं जो 2018 में रिलीज़ हुई।

राजपूत ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत हिंदी टेलीविजन श्रृंखला सपनों से भरे नैना (2010) से की। इसके बाद वह आख़िर बहू भी तो बेटी ही है और महाकुंभ: एक रहस्य, एक कहानी सहित शो में दिखाई दीं । उन्होंने अपनी तेलुगु फिल्म की शुरुआत आरएक्स 100 (2018) से की, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला डेब्यू (तेलुगु) के लिए SIIMA अवार्ड मिला । उनकी अन्य उल्लेखनीय फिल्मों में शामिल हैं, वेंकी मामा (2019), शावा नी गिरधारी लाल (2021) और हेड बुश (2022), जो उनकी पहली कन्नड़ फिल्म थी।
2017 में, उन्होंने निंजा के साथ चन्ना मेरेया में मुख्य महिला नायिका कायनात ढिल्लन की भूमिका निभाकर पंजाबी फिल्म उद्योग में भी शुरुआत की।

सोमवार, 4 दिसंबर 2023

मोती लाल राज वंश

मोती लाल राजवंश
🎂जन्म की तारीख और समय: 04 दिसंबर 1910, शिमला (हिमाचल परदेश)
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 17 जून 1965, मुम्बई
पार्टनर: शोभना समर्थ
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मोतीलाल राजवंश हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता थे। उनको हिंदी सिनेमा के पहले सहज अभिनेता होने का श्रेय दिया जाता है। उनको फ़िल्म देवदास और परख के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। 
मोतीलाल राजवंश ने अपने स्क्रीन करियर के बारे में विशिष्ट हास्य के साथ कहा: 
100 बार शादी हुई, लगभग दो बार मृत्यु हुई, कभी जन्म नहीं हुआ लेकिन हमेशा पैराशूट द्वारा नीचे लाया गया।
मोतीलाल  हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता थे। मोतीलाल ने अपने जादू से नायक और चरित्र अभिनेता के रूप में दो दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। उन्होंने हिंदी फ़िल्मों को मेलोड्रामाई संवाद अदायगी और अदाकारी की तंग गलियों से निकालकर खुले मैदान की ताजी हवा में खड़ा किया।

शिमला में 4 दिसंबर 1910 को जन्मे मोतीलाल राजवंश जब एक साल के थे, तभी पिता का साया सिर से उठ गया। चाचा ने परवरिश की, जो उत्तर प्रदेश में सिविल सर्जन थे। चाचा ने मोती को बचपन से जीवन को बिंदास अंदाज में जीने और उदारवादी सोच का नजरिया दिया। शिमला के अंग्रेज़ी स्कूल में शुरूआती पढ़ाई के बाद उत्तर प्रदेश और फिर दिल्ली में उच्च शिक्षा हासिल की। अपने कॉलेज के दिनों में वे हरफनमौला विद्यार्थी थे। नौसेना में शामिल होने के इरादे से मुंबई आए थे। अचानक बीमार हो गए, तो प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाए। शानदार ड्रेस पहनकर सागर स्टूडियो में शूटिंग देखने जा पहुंचे। वहां निर्देशक कालीप्रसाद घोष एक सामाजिक फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे। अपने सामने स्मार्ट यंगमैन मोतीलाल को देखा, तो उनकी आंखें खुली रह गई। उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए ऐसे ही हीरो की तलाश थी, जो बगैर बुलाए मेहमान की तरह सामने खड़ा था। उन्होंने अगली फ़िल्म 'शहर का जादू' (1934) में सविता देवी के साथ मोतीलाल को नायक बना दिया। तब तक पार्श्वगायन प्रचलन में नहीं आया था। लिहाजा मोतीलाल ने के. सी. डे के संगीत निर्देशन में अपने गीत खुद गाए थे। इनमें 'हमसे सुंदर कोई नहीं है, कोई नहीं हो सकता' गीत लोकप्रिय भी हुआ। सागर मूवीटोन उस जमाने में कलाकारों की नर्सरी थी। सुरेंद्र, बिब्बो, याकूब, माया बनर्जी, कुमार और रोज जैसे कलाकार वहां कार्यरत थे। निर्देशकों में महबूब ख़ान, सर्वोत्तम बदामी, चिमनलाल लोहार अपनी सेवाएं दे रहे थे। मोतीलाल ने अपनी शालीन कॉमेडी, मैनरिज्म और स्वाभाविक संवाद अदायगी के जरिए तमाम नायकों को पीछे छोड़ते हुए नया इतिहास रचा। परदे पर वे अभिनय करते कभी नजर नहीं आए। मानो उसी किरदार को साकार रहे हो।

वर्ष 1937 में मोतीलाल ने सागर मूवीटोन छोडकर रणजीत स्टूडियो में शामिल हुए। इस बैनर की फ़िल्मों में उन्होंने 'दीवाली' से 'होली' के रंगों तक, ब्राह्मण से अछूत तक, देहाती से शहरी छैला बाबू तक के बहुरंगी रोल से अपने प्रशंसकों का भरपूर मनोरंजन किया। उस दौर की लोकप्रिय गायिका-नायिका खुर्शीद के साथ उनकी फ़िल्म 'शादी' सुपर हिट रही थी। रणजीत स्टूडियो में काम करते हुए मोतीलाल की कई जगमगाती फ़िल्में आई- 'परदेसी', 'अरमान', 'ससुराल' और 'मूर्ति'। बॉम्बे टॉकीज ने गांधीजी से प्रेरित होकर फ़िल्म 'अछूत कन्या' बनाई थी। रणजीत ने मोतीलाल- गौहर मामाजीवाला की जोडी को लेकर 'अछूत' फ़िल्म बनाई। फ़िल्म का नायक बचपन की सखी का हाथ थामता है, जो अछूत है। नायक ही मंदिर के द्वार सबके लिए खुलवाता है। इस फ़िल्म को गांधीजी और सरदार पटेल का आशीर्वाद मिला था। 1939 में इन इंडियन फ़िल्म्स नाम से ऑल इंडिया रेडियो ने फ़िल्म कलाकारों से साक्षातकार की एक शृंखला प्रसारित की थी। इसमें 'अछूत' का विशेष उल्लेख इसलिए किया गया था कि फ़िल्म में गांधीजी के अछूत उद्घार के संदेश को सही तरीके से उठाया गया था। नायकों में सर्वाधिक वेतन पाने वाले थे उस जमाने के लोकप्रिय अभिनेता मोतीलाल, उन्हें ढाई हजार रुपये मासिक वेतन के रूप में मिलते थे। फ़िल्मी कलाकारों से मिलने के लियए उस जमाने में भी लोग लालायित रहते थे।

मोतीलाल की अदाकारी के अनेक पहलू हैं। कॉमेडी रोल से वे दर्शकों को गुदगुदाते थे, तो 'दोस्त' और 'गजरे' जैसी फ़िल्मों में अपनी संजीदा अदाकारी से लोगों की आंखों में आंसू भी भर देते थे। वर्ष 1950 के बाद मोतीलाल ने चरित्र नायक का चोला धारणकर अपने अद्भुत अभिनय की मिसाल पेश की। विमल राय की फ़िल्म 'देवदास' (1955) में देवदास के शराबी दोस्त चुन्नीबाबू के रोल को उन्होंने लार्जर देन लाइफ का दर्जा दिलाया। दर्शकों के दिमाग में वह सीन याद होगा, जब नशे में चूर चुन्नीबाबू घर लौटते हैं, तो दीवार पर पड़ रही खूंटी की छाया में अपनी छड़ी को बार-बार लटकाने की नाकाम कोशिश करते हैं। 'देवदास' का यह क्लासिक सीन है। राज कपूर निर्मित और शंभू मित्रा-अमित मोइत्रा निर्देशित फ़िल्म 'जागते रहो' (1956) के उस शराबी को याद कीजिए, जो रात को सुनसान सडक पर नशे में झूमता-लडखडाता गाता है- 'ज़िंदगी ख्वाब है
पाये थे। फ़िल्म का नाम भी नहीं याद रह पाया था उनको, न उसके निर्माता-निर्देशक का अता-पता, लेकिन उस फ़िल्म के निर्माण के मध्य जिस छोटी सी घटना के माध्यम से उन्हें जीवन के सबसे बड़े सन्तोष की प्राप्ति हुर्इ थी वह जीवन के अंत तक उनकी आंखों में तैरती रही। कोशिश करने पर भी उसे भूल सकना शायद उनके लिये संभव ही नहीं हो पाया।

बम्बर्इ के बोरीबन्दर के सम्मुख वह उस दृश्य की शूटिंग कर रहे थे। भूमिका थी जूतों पर पालिश करने वाले एक आदमी की। फटे-पुराने कपड़े, बढ़ी हुर्इ डाढ़ी-मूंछें, धूलधूसरित हाथ-पैर और आंखों में एक दारूण दैन्य। पालिश करने वाले उस पात्र का जैसे पूरा रूप उजागर हो गया हो उनके माध्यम से। तभी उनको एक परिचित वृद्ध दिखायी दे गये और यह जानते हुए भी कि वह मात्र अभिनय है, मोती के लिये उनकी आंखों से आंख मिला पाना मुमकिन नहीं हो पाया उस वक्त। लेकिन वह सज्जन मोती के पास पहुंच चुके थे और तब मोती को उनकी ओर मुखातिब ही होना पड़ा। देखा, उन बुज़ुर्ग की आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे और अपने उन्हीं आंसुओं के मध्य वह मोती से कहते जा रहे थे, अभी तो मैं ज़िंदा हूँ बेटा, मेरे पास तुम क्यों नहीं आये आखिर – जैसे भी होता हम लोग मिलजुल कर अपना पेट पाल लेते, यह नौबत आने ही क्यों दी तुमने? …… और मोती कुछ भी नहीं बोल पाये थे उस वक्त। अपनी सफ़ार्इ दे पाना भी संभव नहीं लग रहा था उनको। लेकिन उस घटना को मोती आजीवन अपनी अभिनय-प्रतिभा का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र मानते रहे, और जब कभी उसकी याद उनको आती थी उनकी आंखों से झरझर आंसू बहने लगते थे।

पहले के दिग्गज फ़िल्म निर्देशकों को अपने पर पूरा विश्वास और भरोसा होता था। उनके नाम और प्रोडक्शन की बनी फ़िल्म का लोग इंतज़ार करते थे। उसमें कौन काम कर रहा है यह बात उतने मायने नहीं रखती थी। कसी हुई पटकथा और सधे निर्देशन से उनकी फ़िल्में सदा धूम मचाती रहती थीं। अपनी कला पर पूर्ण विश्वास होने के कारण ऐसे निर्देशक कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं करते थे। ऐसे ही फ़िल्म निर्देशक थे वही। शांताराम। उन्हीं से जुड़ी एक घटना का ज़िक्र है :-

उन दिनों शांताराम जी डॉ. कोटनीस पर एक फ़िल्म बना रहे थे "डॉ. कोटनीस की अमर कहानी" जिसमें उन दिनों के दिग्गज तथा प्रथम श्रेणी के नायक मोतीलाल को लेना तय किया गया था। मोतीलाल ने उनका प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया था। शांतारामजी ने उन्हें मुंहमांगी रकम भी दे दी थी। पहले दिन जब सारी बातें तय हो गयीं तो मोतीलाल ने अपने सिगरेट केस से सिगरेट निकाली और वहीं पीने लगे। शांतारामजी बहुत अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। उनका नियम था कि स्टुडियो में कोई धूम्रपान नहीं करेगा। उन्होंने यह बात मोतीलाल को बताई और उनसे ऐसा ना करने को कहा। मोतीलाल को यह बात खल गयी, उन्होंने कहा कि सिगरेट तो मैं यहीं पिऊंगा। शांतारामजी ने उसी समय सारे अनुबंध खत्म कर डाले और मोतीलाल को फ़िल्म से अलग कर दिया। फिर खुद ही कोटनीस की भूमिका निभायी।

सम्मान और पुरस्कार

1961 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार - परख
1957 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार - देवदास

उन्होंने अपने जीवन के उत्तरार्द्घ में राजवंश प्रोडक्शन क़ायम करके फ़िल्म 'छोटी-छोटी बातें' बनाई थी। फ़िल्म को राष्ट्रपति का सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट जरूर मिला, पर मोतीलाल दिवालिया हो गए। फ़िल्म 'तीसरी कसम' शैलेंद्र के जीवन के लिए भारी साबित हुई थी। मोतीलाल का यही हाल 'छोटी छोटी बातें' कर गयी कहा जाता है कि मोती अभिनय नहीं करते थे, अभिनय की भूमिका को अपने में आत्मसात कर जाते थे वह। इसी से आप उनकी किसी भी फ़िल्म को याद कीजिए, आपको ऐसा लगेगा जैसे उस कहानी का जीवित पात्र आपकी आंखों के सम्मुख आकर उपस्थित हो गया हो। मोती स्वयं इसका कारण नहीं समझ पाते थे - या शायद यह फिर उनकी विनम्रता रही हो। अपने अभिनय जीवन के प्रारंभ की उस घटना को आजीवन विस्मृत नहीं कर सकते
📽️
ये जिंदगी कितनी हसीन है (1966)
छोटी छोटी बातें (1965)
वक़्त (1965)
सोलह सिंगार करे दुल्हनिया (भोजपुरी) (1965)
जी चाहता है (1964)
नेता (1964)
ये रास्ते हैं प्यार के (1963)
असली-नकली (1962)
परख (1960)
अनाड़ी (1959)
पैघम (1959)
अब दिल्ली दूर नहीं (1957)
जागते रहो (1956)
देवदास (1955)
धुन (1953)
एक दो तीन (1953)
अपनी इज्जत (1952)
श्री संपत (1952)
हमारी बेटी (1950)
हंसते आंसू (1950)
एक थी लड़की (1949)
लेख (1949)
गजरे (1948)
मेरा मुन्ना (1948)
आज की रात (1948)
दो दिल (1947)
फुलवारी (1946)
पहली नज़र (1945)
दोस्त (1944)
मुजरिम (1944)
रौनक (1944)
उमंग (1944)
आगे कदम (1943)
तक़दीर (1943)
तसवीर (1943)
अरमान (1942)
परदेसी (1941)
ससुराल (1941)
अछूत (1940)
होली (1940)
आप की मर्जी (1939)
सच है (1939)
हम तुम और वो (1938)
तीन सौ दिन के बाद (1938)
कैप्टन कीर्ति कुमार (1937)
जागीरदार (1937)
कुलवधु (1937)
कोकिला (1937)
दिलावर (1936)
दो दीवाने (1936)
जीवन लता (1936)
लग्न बंधन (1936)
दो घड़ी की मौज (1935)
डॉ. मधुरिका (1935)
सिल्वर किंग (1935)
शहर का जादू (1934)
वतन परस्ता (1934)

निदेशक

छोटी छोटी बातें (1965)

रविवार, 3 दिसंबर 2023

ज्ञान दत्त

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40 के दशक के संगीत के सबसे महान नामों में से एक ज्ञान दत्त थे । वह बंगाल से थे। उनका असली नाम "जनन दत्त" था, लेकिन चूंकि "जनन" गांव का लगता था, इसलिए उनके शुभचिंतकों ने इसे बदलकर "ज्ञान" करने का सुझाव दिया।

वह और खेमचंद प्रकाश उस युग के दो सबसे बड़े गायकों - कुन्दन लाल सहगल और खुर्शीद बेगम की पसंद के संगीतकार थे। ज्ञान दत्त को सीमित सफलता मिल सकी और वह भी शुरुआत में या उनके कैरियर के बीच में... उनका कैरियर डूबा रहा... ज्ञान दत्त जो कि एक बंगाली थे, का 3 दिसंबर 1974 को निधन हो गया...

ज्ञान दत्त रंजीत मूवीटोन में कार्यरत रहे और उन्होंने तूफानी टोली (1937), बाजीगर (1938), गोरख माया (1938), नदी किनारे (39), मुसाफिर (1940) सहित कई फिल्मों में संगीत दिया। तूफ़ानी टोली में उन्होंने वहीदन बाई (निम्मी की माँ) से "क्यों नयनन में नीर बहये" गवाया। कांतिलाल, कल्याणी, राजकुमारी, खुर्शीद और मन्ना डे जैसे कई गायकों ने उनके गाने गाए। उनकी आखिरी फिल्म जनम जनम के साथी (1965) थी जिसमें मुकेश और सुमन कल्याणपुर, हेमंत कुमार और इंद्राणी रॉय ने युगल गीत गाया था। उनकी रचनाओं में सबसे उल्लेखनीय सुनहरे दिन (1949) और गाना - मैंने देखी जग की रीत मीत सब है। झूठे पड़ गए को मुकेश और शमशाद बेगम ने गाया था।
35. अनबन (1944)
36. इंसान (1944)
37. चांद तारा (1945)
38. छमिया (1945) )
39. ग़ज़ल (1945)
40. पन्ना दाई (1945)
41. दूल्हा (1946)
42. कमला (1946)
43. दीवानी (1947)
44. गीत गोविंद (1947)
45. मझधार (1947)
46. सम्राट अशोक ( 1947)
47. चंदा की चांदनी (1948)
48. दुखियारी (1948)
49. हुवा सवेरा (1948)
50. झरना (1948)
51. लाल दुपट्टा (1948)
52. नाव (1948)
53. सुनहरे दिन (1949)
54 . दिलरुबा (1950)
55. घायल (1951)
56. दरियायी लुटेरा (1952)
57. गुल-ए-बकावली (1956)
58. भोला शिकार (1958)
59. जनम जनम के साथी (1965)

टाटा, आशा और ज्ञान दत्त !

आशा जी ने ज्ञान दत्त के साथ गुल-ए-बकावली (1956) नाम से बनी इस फिल्म में सिर्फ एक गीत गाया। और इस तरह दोनों ने सिर्फ एक फिल्म और एक गाने में ही काम किया।
ला ला हुआ क्या है बता तू देख जरा यहां तू। (जानकारी विदुर)

 दुखियारी (1949): अब किसको सुनाओं में कथा कृष्ण मुरारी। गीत का श्रेय एफएम कैसर को दिया जाता है। लता जी की आवाज़ प्राचीन है और रचना स्वर्गीय है
चौथे और पांचवें दशक के नामांकित संगीतकार ज्ञानदत्त का फिल्मी एडवेंचर ट्रेंट मूवीटन से आरंभ हुआ था। 1937 में प्रदर्शित 'तूफ़ानी टॉली' उनकी पहली फ़िल्म थी। दवा रस से औषधि संगीत रचने में उनका कोई प्रतिद्वंदी नहीं था। उनकी चौथे दशक की फिल्मों की प्रमुख गायिका वेदान बाई (अपने समय की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री निम्मी की मां) थीं। संगीत की दृष्टि से कई सफल फिल्मों की संगीत रचना के बाद पांचवें दशक के अंत में ज्ञानदत्त ने राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म 'सुनहरे दिन' की संगीत-रचना की थी। इस फिल्म का संगीत ज्ञानदत्त के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उस वर्ष की फ़िल्मों में राज कपूर द्वारा निर्मित, निर्देशित और अभिनीत फ़िल्म 'बरसात' और केवल अभिनीत फ़िल्म 'सुनहरे दिन' के गीत शीर्ष पर थे। 'सुनहरे दिन' का सर्किट नायक रेडियो-गायक है, मूल रूप से ज्ञानदत्त ने इन ओपेरा में वाद्यवृंद (आर्केस्ट्रा) का बेहद आकर्षक प्रयोग किया है। इस फिल्म में ज्ञानदत्त ने राज कपूर के लिए मुकेश को गायक के रूप में मौका दिया था। मुकेश और राज कपूर एक ही गुरु से संगीत सीखने गए थे। फिल्म 'आग' में मुकेश और राज कपूर की जोड़ी साथ थी, लेकिन इन दोनों के आवाज की स्वाभाविकता का अनुभव फिल्म 'सुनहरे दिन' की झलक से हुआ। फिल्म में मुकेश के साथ सुरिंदर कौर और शमशाद बेगम की आवाजें हैं। फिल्म 'सुनहरे दिन' के सुर में मुकेश और सुरिंदर कौर की आवाजें- 'दिल दो नैनों में खो गया...', 'लो जी सुन लो...', मुकेश और शमशाद बेगम की आवाजों में- 'मेरी निगाहें जग की रीत...' बेहद लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ, लेकिन जो मनोहर मुकेश के एकल स्वर में प्रस्तुत गीत- 'बहारों जिसने छेड़ा है वो साजे जवानी है...' को मिला, उनके समय में यह एक उल्लेखनीय गीत बन गया था।

'सुनहरे दिन' संगीतकार ज्ञानदत्त की फिल्मी सफर की सफलतम फिल्म थी। यह फिल्म बाद में ज्ञानदत्त की म्यूजिकल फिल्म व्यावसायिक रूप में सामने आई। अन्ततः 1965 में 'जन्म-जन्म के मित्र' के साथ अपने संगीतकार-जीवन से विराम ले लिया। 03 दिसंबर, 1974 को संगीतकार ज्ञानदत्त का निधन हो गया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...