बुधवार, 1 नवंबर 2023

सोहराब मोदी

सोहराब मोदी

🎂जन्म 02 नवम्बर, 1897
जन्म भूमि बम्बई
⚰️मृत्यु 28 जनवरी, 1984

कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेता, निर्माता व निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'रज़िया सुल्तान', 'घर की लाज', 'कुंदन' आदि।
पुरस्कार-उपाधि दादा साहब फाल्के पुरस्कार
प्रसिद्धि अभिनेता और फ़िल्म निर्माता-निर्देशक
जीवन परिचय
सोहराब मोदी का जन्म 2 नवम्बर, 1897 में बम्बई में हुआ था। सोहराब मोदी अपनी स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद वह अपने भाई केकी मोदी के साथ यात्रा प्रदर्शक का कार्य किया। सोहराब मोदी ने कुछ मूक फ़िल्मों के अनुभव के साथ एक पारसी रंगमंच से बतौर अभिनेता के रूप में शुरुआत की थी। सोहराब मोदी का बचपन रामपुर में बीता, जहां उनके पिता नवाब के यहां अधीक्षक थे। नवाब रामपुर का पुस्तकालय बहुत समृद्ध था। रामपुर में ही सोहराब मोदी ने फर्राटेदार उर्दू सीखी। अभिनय की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें अपने भाई रुस्तम की नाटक कंपनी सुबोध थिएट्रिकल कंपनी से मिली, जिसमें उन्होंने 1924 से काम करना शुरू कर दिया था। वहीं उन्होंने संवाद को गंभीर और सधी आवाज में बोलने की कला सीखी, जो बाद में उनकी विशेषता बन गयी। कुछ ही समय में वे नाटकों में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाने लगे। ‘हैमलेट’ और ‘द सोल ऑफ़ डाटर’ उनके लोकप्रिय नाटक थे जिनमें उन्होंने अभिनय किया। बाद में उनका परिवार रामपुर से बंबई चला आया। वहां उन्होंने परेल के न्यू हाईस्कूल से मैट्रिक पास किया। जब ये अपने प्रिंसिपल से यह पूछने गये कि भविष्य में क्या करें, तो उनके प्रिंसिपल ने कहा,-‘तुम्हारी आवाज सुन कर तो यही लगता है कि तुम्हे या तो नेता बनना चाहिए या अभिनेता।’ और सोहराब अभिनेता बन गये। उनकी आवाज की तरह बुलंद थी। अंधे तक उनकी फ़िल्मों के संवाद सुनने जाते थे।

आरम्भिक जीवन

16 वर्ष की उम्र में सोहराब मोदी ग्वालियर के टाउनहाल में फ़िल्मों का प्रदर्शन करते थे। बाद में अपने भाई रुस्तम की मदद से उन्होंने ट्रैवलिंग सिनेमा का व्यवसाय शुरू किया। फिर अपने भाई के साथ ही उन्होंने बंबई में स्टेज फ़िल्म कंपनी की स्थापना की। इस कंपनी की पहली फ़िल्म 1953 में बनी ‘खून का खून’ थी, जो उनके नाटक ‘हैमलेट’ का फ़िल्मी रूपांतर थी। इसमें सायरा बानो की माँ नसीम बानो पहली बार परदे पर आयीं। ‘सैद –ए-हवस’ (1936) भी नाटक ‘किंग जान’ पर आधारित थी। सोहराब मूलतः नाटक से आये थे, यही वजह है कि उनकी पहले की फ़िल्मों में पारसी थिएटर की झलक मिलती है। ऐतिहासिक फ़िल्में बनाने में वे सबसे आगे थे।

सोहराब मोदी ने सन 1935 में स्टेज फ़िल्म कंपनी की स्थापना की थी। 1936 में स्टेज फ़िल्म कंपनी मिनर्वा मूवीटोन हो गयी और इसका प्रतीक चिह्न शेर हो गया। अपने इस बैनर में उन्होंने जो फ़िल्में बनायीं वे थीं-

आत्म तरंग (1937)
खान बहादुर (1937)
डाइवोर्स (1938)
जेलर (1938)
मीठा जहर (1938)
पुकार (1939)
भरोसा (1940)
सिकंदर (1941)
फिर मिलेंगे (1942)
पृथ्वी वल्लभ ((1943)
एक दिन का सुलतान (1945)
मंझधार (1947)
दौलत (1949)
शीशमहल (1950)
झांसी की रानी (1953)
मिर्जा गालिब (1954)
कुंदन (1955)
राजहठ (1956)
नौशेरवा-ए-आदिल (1957)
मेरा घर मेरे बच्चे (1960)
समय बड़ा बलवान (1969)
इनके अलावा उन्होंने सेंट्रल स्टूडियो के लिए ‘परख’ और शैली फ़िल्म्स के लिए ‘मीनाकुमारी की अमर कहानी’ बनायी। 

भारत की पहली रंगीन फ़िल्म

भारत की पहली टेकनीकलर फ़िल्म ‘झांसी की रानी’ उन्होंने बनायी थी। इसके लिए वे हालीवुड से तकनीशियन और साज-सामान लाये थे। इसमें 'झांसी की रानी' बनी थीं उनकी पत्नी महताब। सोहराब मोदी राजगुरु बने थे। इस फ़िल्म को उन्होंने बड़ी लगन से बनाया था, लेकिन फ़िल्म फ़्लॉप हो गयी। इस विफलता से उबरने के लिए उन्होंने ‘मिर्जा गालिब’ (सुरैया-भारतभूषण) बनायी। यह फ़िल्म व्यावसायिक तौर पर तो सफल रही बल्कि इसे राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक भी मिला। उन्होंने सामाजिक समस्याओं पर भी कुछ यादगार फ़िल्में बनायीं। इनमें शराबखोरी की बुराई पर बनायी गयी फ़िल्म ‘मीठा जहर’ और तलाक की समस्या पर ‘डाईवोर्स’ उल्लेखनीय हैं। उनकी सर्वाधिक चर्चित और सफल ऐतिहासिक फ़िल्म थी ‘पुकार’। इसमें चंद्रमोहन (जहांगीर), नसीम बानो (नूरजहां), सोहराब मोदी (संग्राम सिंह) और सरदार अख्तर की प्रमुख भूमिकाएँ थीं। इस फ़िल्म को न सिर्फ प्रेस बल्कि दर्शकों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। ‘सिकंदर’ में पोरस और ‘पुकार’ में संग्राम सिंह की भूमिका में सोहराब मोदी के अभिनय की बड़ी प्रशंसा हुई।

पारिवारिक जीवन

महताब से उनकी शादी 21 अप्रैल 1946 को हुई, लेकिन मोदी का परिवार उन्हें बहू के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं था इसलिए कई साल उन्हें अलग रहना पड़ा। 1950 में उनके परिवार ने उनकी शादी को स्वीकार कर लिया।

पुरस्कार
सोहराब मोदी को सन 1980 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। भारत में ऐतिहासिक फ़िल्मों को प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय उन्हें ही जाता है।

निधन
1978 तक आते-आते 80 साल के मोदी साहब को चलने-फिरने में छड़ी का सहारा लेना पड़ गया था। उनकी बड़ी ख्वाहिश थी ‘पुकार’ को फिर से बनाने की। लेकिन बीमारी ने ऐसा नहीं करने दिया। 1984 में डॉक्टरों ने यह घोषित कर दिया कि उन्हें कैंसर है। तब तक उन्हें खाना निगलने में भी तकलीफ होने लगी थी। 1983 में उन्होंने अपनी आखिरी फ़िल्म ‘गुरुदक्षिणा’ का मुहूर्त किया था। उसे अधूरा छोड़ 28 जनवरी 1984 को मोदी हमेशा के लिए चिरनिद्रा में निमग्न हो गये। वे बड़े आला तबीयत के इंसान थे। उनका धैर्य भी अपार था। कई बार कलाकार कई रिटेक देते, पर मोदी साहब के चेहरे पर शिकन तक नहीं पड़ती।

अनु मालिक

अनु मलिक 

🎂जन्म की तारीख और समय: 02 नवंबर 1960, मुम्बई

भारतीय संगीतकार और गायक हैं। इन्होंने संगीत निर्माण का कार्य 1977 में शुरू किया। वह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार विजेता संगीत निर्देशक हैं, जो मुख्य रूप से हिन्दी फिल्म उद्योग में काम करते हैं। 1990 के दशक में वह कई सफल फिल्मों के गाने संगीतबद्ध कर चुके हैं। वह सरदार मलिक के पुत्र हैं। 
जन्म की तारीख और समय: 02 नवंबर 1960, मुम्बई
पत्नी: अंजु अनु मलिक
बच्चे: अनमोल मलिक, अदा मलिक
माता-पिता: सरदार मलिक
भाई: डब्बू, अबु मलिक।

परिचय
अनु मलिक का जन्म 2 नवंबर, 1960 को पंजाब में हुआ था। उनके पिता सर्द मालिक एक गीतकार और संगीत निर्देशक थे। सात साल की उम्र से ही अनु मलिक की संगीत में रूचि जाग्रत हुई और उन्होंने अपने पिता की सह में संगीत शुरू कर दिया। अनु मलिक का विवाह अंजू मालिक से हुआ। उनकी दो बेटियां हैं। उनकी एक बेटी अनमोल मलिक हिंदी सिनेमा में पार्श्वगायन करती हैं।

कॅरियर
अनु मलिक ने अपने कॅरियर की शुरुआत साल 1977 में फिल्म 'हंटरवाली' से की थी। इसके बाद उन्होंने हिंदी सिनेमा की कई सुपरहिट फिल्मों में संगीत दिया। साल 1993 में अनु मलिक को हिंदी सिनेमा में पहचान फिल्म महेश भट्ट की फिल्म 'बाजीगर' से मिली। 'बाजीगर' का गाना 'ये काली काली आँखें' उस समय सबसे ज्यादा हिट साबित हुआ था।

उसके बाद आने वाले समय में उन्होंने कई बेहतरीन फिल्मों में अपनी आवाज दी और संगीत दिया जो सुपरहिट साबित हुआ। जिस कारण से वह हिंदी सिनेमा में रातों-रात स्टार बन गए। जैसे-जैसे अनु मलिक कामयाबी की सीढ़ी चढ़ते गए, वैसे ही विवादों में भी घिरने लगे। उन पर लोगों ने आरोप लगाया कि वह दूसरे की धुनें चुराते हैं। लेकिन अनु मलिक ने कभी भी इन सब चीजों का अपने काम पर असर नहीं पड़ने दिया और हिंदी सिनेमा को अच्छे-अच्छे गाने दिए।

शारूख खान

शाहरुख खान
🎂 जन्म 02  नवंबर 1965
 को दिल्ली
 बॉलीवुड जगत का नामी चेहरा है I बॉलीवुड में शाहरुख़ खान का सिक्का चलता है I इनके नाम से ही फिल्मे करोड़ो की कमाई कर जाती है I शाहरुख़ को SRK , किंग खान, बॉलीवुड बादशाह के नाम से भी लोग पुकारते है I

शाहरुख़ के माता पिता मूलत पठानी थे I शाहरुख़ के पिता का नाम ताज मोहम्मद जो की एक स्वतंत्रता सैनानी थे और माता जी का नाम लतीफा खान जो की मेजर जनरल शाहनवाज खान की बेटी थी I

शाहरुख़ के पिता भारत विभाजन से पहले पाकिस्तान में पेशावर के कहानी बाजार में रहते थे और माँ रावलपिंडी में रहती थी I शाहरुख़ की बहन का नाम शहनाज़ है I

शाह रुख खान
🎂 जन्म 02 नवंबर 1965 को दिल्ली में हुआ I 

शाहरुख़ खान ने अपनी स्कूल की शिक्षा St Columba ‘s School Delhi से पूरी की इसके पश्चात हंसराज कॉलेज, यूनिवर्सिटी ऑफ़ दिल्ली से इकोनॉमिक्स में स्नातक की शिक्षा पूरी की तत्पश्चात जामिआ मिल्लीअ इस्लामिआ यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली से मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री पूरी की है I  

Height   5’8 feet Inch

Weight   75 Kg

Age        53 years (2018)

Shah Rukh Khan Filmy Career in Hindi I शाहरुख खान फिल्मी करियर

शाहरुख़ खान अपनी पहचान बॉलीवुड जगत में बनाना चाहते थे इसके लिए उन्होंने मुंबई की ओर अपना रुख किया ओर फिल्म “दीवाना” से अपने बॉलीवुड की पारी की शुरुआत की ओर लोगो की ये दिखा दिया की वो किसी से काम नहीं है I फिल्म “दीवाना” बॉक्स ऑफिस पे सुपर हिट साबित रही I इसके बाद 1993 में आयी फिल्म “बाजीगर” में भी शाहरुख़ खान की अदाकारी देखने लायक थी एक नेगेटिव किरदार होते हुए भी उन्होंने फिल्म में उनको सबसे ज्यादा पसंद किया गया I इसके बाद फिल्म “डर” में भी उनकी अदाकारी सबको अपना दीवाना बना गयी I “डर” फिल्म में उनका रोले एक सिरफिरे आशिक़ का था जिस समय शाहरुख़ खान इस तरह के नेगेटिव किरदारों को किये जा रहे थे उस समय हीरो ऐसे रोल करने से कतराते थे क्युकी कही उन लोगो के करियर पे ऐसे किरदारों का ही मुहर न लग जाये लेकिंग शाहरुख़ ने इस चुनौती को स्वीकार किया I इसके बाद “कभी हा कभी ना” फिल्म में काम किया I

1995 में आयी आदित्य चोपड़ा की फिल्म “दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे” से शाहरुख़ खान की इमेज एक लवर बॉय ओर किंग ऑफ़ रोमांस की छवि लेकर लोगो के सामने आयी लोगो ने फिल्म ओर शाहरुख़ खान की एक्टिंग को बहुत प्यार दिया ओर पसंद किया फिल्म सुपर डुपेर हिट साबित हुई इस फिल्म के लिए शाहरुख़ को फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला ओर फिल्म इतिहास की सबसे हिट फिल्म साबित हुई कुछ सिनेमा घरो में 12 सालो तक इस फिल्म को चलाया गया I इसके बाद यश चोपड़ा की फिल्म “दिल तो पागल है”, सुभाष घाई की फिल्म “परदेस” जैसी फिल्मो से शाहरुख़ को ओर भी प्रसिद्दि हासिल हुई I कारन जोहर की फिल्म “कुछ कुछ होता है” साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म साबित हुई ओर मणि रत्नम की फिल्म “दिल से” भी लोगो के बिच बहुत सफल रही I

शाहरुख़ खान समय के साथ ऊंचाइयों की तरफ बढ़ते जा रहे थे बॉलीवुड में उनकी फिल्मो का सफर रह रह कर सफलता की बुलंदियओ की तरफ बढ़ता जा रहा था अपितु ओर लोगो की तरह उनकी सारी फिल्मे सफल न होती लेकिंग कुछ फिल्मो में वो अपने अभिनय के द्वारा सबको पीछे छोड़ते जा रहे थे I

2000 में “मोहब्बते” 2001 में फिल्म “अशोका” ओर “कभी ख़ुशी कभी गम” फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पे बहुत अच्छा प्रदर्शन किया I इसके बाद 2002 में आयी फिल्म “देवदास” में शाह रुख खान के अभिनय को लोगो ने बहुत प्यार दिया फिल्म बॉक्स ऑफिस पे हिट साबित हुई I वीर जारा, डॉन, ॐ शांति ॐ, रब ने बना दी जोड़ी, माय नाम इस खान, चेन्नई एक्सप्रेस ओर रईस जैसी फिल्मो की पारी ने शाहरुख़ खान को बॉलीवुड किंग खान की उपाधि दी ओर ये साबित कर दिया की अगर लगन, कौशल ओर सपने पुरे करने का जुनून हो तो सब हासिल किया जा सकता है I

Shah Rukh Khan Favorite Things in Hindi

– शाहरुख़ खान को खाने में तंदूरी चिकन बहुत पसंद है I

– उनका फेवरेट एक्टर संजय दत्त, अनिल कपूर, दिलीप कुमार ओर अमिताभ बच्चन है I

– फेवरेट एक्ट्रेस काजोल, जूही चावला, माधुरी दीक्षित, मुमताज़ ओर सायरा बानू है I

– ब्लू एंड ब्लैक उनका फेवरेट कलर है I

– उनको लंदन ओर दुबई में घूमना बहुत पसंद है I

– उनको स्पोर्ट्स में हॉकी, फुटबॉल ओर क्रिकेट पसंद है I  

Shah Rukh Khan Marriage News Date and Wife and Childrens Name

शाह रुख खान की शादी गौरी छिब्बर से साथ 25 अक्टूबर 1991 को हुई थी I शादी के बाद गौरी छिब्बर गौरी खान के बाम से जाने जानी लगी I गौरी खान एक फिल्म प्रोडूसर ओर इंटेरियर डिज़ाइनर है I शाहरुख़ खान औऱ गौरी खान के दो बेटे आर्यन खान ओर अबराम खान औऱ एक बेटी सुहाना खान है I

जगजीत कौर

जगजीत कौर 

हिंदी फिल्म जगत के मशहूर संगीतकार ख़य्याम की पत्नी और ख़ुद एक मशहूर पार्श्व गायिका थीं।
🎂जन्म : मई 1930, ब्रिटिश राज
 ⚰️स्वाधीनता दिवस 15 अगस्त 2021 की सुबह 5.30 बजे उनका निधन हो गया। 

पति: मोहम्मद ज़हुर खय्याम (विवा. 1954–2019)

उनके कुछ गीत

शगून (1964) से "देखो देखो जी गोरी ससुराल चली" , गीत साहिर लुधियानवी, संगीत खय्याम
शगून से "तुम अपना रंज-ओ-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो"
दिल-ए-नादान (1953) से "खामोश जिंदगी को अफसाना मिल गया" , गीत शकील बदायुनी, संगीत गुलाम मोहम्मद
बाज़ार (1982) से "चले आओ सइयां रंगीले मैं वारी रे" (पामेला चोपड़ा के साथ) , गीत जगजीत कौर, संगीत खय्याम
बाज़ार से "देख लो आज हमको जी भर के"।
उमराव जान (1981) से "काहे को ब्याही बिदेस" , संगीत खय्याम
कभी-कभी (1976) से जगजीत कौर और पामेला चोपड़ा द्वारा "साडा चिड़िया दा चंबा वे" , संगीत खय्याम
दिल-ए-नादान से "चंदा गाए रागिनी"।
शोला और शबनम (1961) से "पहले तो आँख मिलाना" ( मोहम्मद रफ़ी के साथ ) , गीत कैफ़ी आज़मी, संगीत खय्याम
शोला और शबनम (1961) से "लाडी रे लाडी तुझसे आँख जो लाडी" , गीत कैफ़ी आज़मी, संगीत खय्याम
मेरा भाई मेरा दुश्मन (1967) से "नैन मिलाके प्यार जाता के आग लगा दे" (मोहम्मद रफी के साथ) , संगीत खय्याम
जगजीत कौर ने पंजाबी मूवी संगीत भी तैयार किया- (सतगुरु तेरी ओट) 1974 में दारा सिंह , सोम दत्त जैसे स्टार कलाकार थे।
वह अपनी देहाती आवाज और लोकप्रिय धुनों को करने की अपनी मजबूत क्षमता के लिए जानी जाती थीं। संगीत विशेषज्ञों का मानना ​​है कि उसकी आवाज एक उच्च पिच से कम पिच की ओर खिसकती है, एक नरम अंत प्राप्त करती है।
जगजीत का जन्म एक अमीर पंजाबी जमींदार परिवार में हुआ था।
जब वह छोटी थी तब से उसे सिनेमा और संगीत का शौक था। वह अक्सर अपने स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती थी।
जगजीत के पार्श्व गायन करियर की शुरुआत पंजाबी फिल्म पोस्टी (1950) के एक गाने से हुई। यह पहली पंजाबी फिल्म भी थी जिसमें आशा भोसले ने अपनी आवाज दी थी।
हालाँकि उन्होंने अपना पहला हिंदी गाना संगीतकार गुलाम मोहम्मद के लिए फिल्म दिल-ए-नादान (1953) में गाया था, लेकिन इसने उन्हें बड़ी लीग में जगह बनाने के लिए ज्यादा पहचान नहीं दिलाई।
खय्याम ने पहली बार एक संगीत संगीत कार्यक्रम के दौरान जगजीत कौर की गायन प्रतिभा की खोज की, जहां वह एक शास्त्रीय गीत गा रहे थे। खय्याम ने उनसे संपर्क किया और उन्हें फिल्म शोला और शबनम (1961) के लिए एक सुराग की पेशकश की। फिल्म में, उन्होंने एक एकल गाया जिसमें मोहम्मद रफ़ी के साथ एक युगल गीत शामिल था। उसके बाद से जगजीत कौर और खय्याम के बीच का संगीत बंधन कभी नहीं टूटा।
हालाँकि, खय्याम के साथ अपनी पहली मुलाकात के बारे में बात करते हुए, जगजीत ने कहा कि एक रात, खय्याम ने दादर रेलवे स्टेशन के पुल पर उसका पीछा किया। पहले तो वह डर गई कि कहीं वह उसका पीछा तो नहीं कर रहा है, लेकिन जब उसने खुद को एक संगीत होस्ट के रूप में पेश किया, तो वह शांत हो गई।
खय्याम से अपनी शादी के बारे में बात करते हुए, उसने कहा कि उसके पिता उसकी शादी के खिलाफ थे, लेकिन उसने खय्याम से अकेले शादी करने की ठानी। उनके पिता की अस्वीकृति के बावजूद, उनका फिल्म उद्योग की पहली अंतर-सांप्रदायिक विवाहों में से एक थी।

तनवीर नकवी (गीतकार)

आवाज़ दे कहाँ है दुनिया मेरी जवां है जैसा गीत लिखने वाले प्रसिद्ध गीतकार तनवीर नकवी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

🎂जन्म : 16 फ़रवरी 1919, लाहौर, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु : 01 नवंबर 1972, लाहौर, पाकिस्तान

तनवीर नकवी एक पाकिस्तानी गीतकार और कवि थे।  उन्होंने 200 फिल्मों के लिए गीत लिखे, जिनमें लोलीवुड और बॉलीवुड शामिल हैं उन्होंने भारतीय सिनेमा में अपनी शुरुआत अब्दुल रशीद कारदार द्वारा निर्देशित स्वामी फिल्म  से की, और बाद में पंद्रह वर्षों तक पाकिस्तानी फिल्म उद्योग में सक्रिय रहे उन्होंने अनमोल घड़ी फिल्म के लिए "आवाज़ दे कहाँ है" गीत लिखने के बाद पहचान हासिल की।

उनका जन्म लाहौर, ब्रिटिश भारत (आधुनिक लाहौर, पाकिस्तान में) में हुआ था  वह मूल रूप से ईरान के फारसी लेखकों के परिवार से थे, और नूरजहाँ की बहन, ईदन बाई से शादी की।

एक गीतकार के रूप में, उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत 1946 में कम उम्र में की, लेकिन पाकिस्तान जाने के बाद, उन्होंने उर्दू और पंजाबी भाषा की फ़िल्मों के लिए गीत लिखे, जिनमें पाकिस्तान की पहली फीचर फ़िल्म तेरी याद भी शामिल है 
फ़िल्म निर्देशक ए आर कारदार के निमंत्रण पर तनवीर नकवी बॉम्बे गए   फिल्मों में अपनी शुरुआत से पहले वह गज़ल लिख रहे थे, लेकिन बाद में हिंदी, उर्दू और पंजाबी फिल्मों के लिए गीत लिखे  उन्हें पाकिस्तान के देशभक्ति गीत के लिए गीत लिखने का श्रेय भी दिया जाता है, जिसका शीर्षक "रंग लायेगा शहीदों का लहू" है, जिसे नूरजहाँ ने गाया था।  उन्होंने यह गीत अपनी एक कविता से लिखा है।  अपने करियर के दौरान, उन्होंने "शाह-ए-मदीना यशरब के वली" और "जो ना होता तेरा जमाल ही" जैसे दो प्रमुख नात लिखे भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन से पहले, नकवी को 1950 और 1970 के दशक के बीच पंजाबी कविता और साहित्य में सबसे महान शास्त्रीय लेखकों में से एक माना गया था। 

विभाजन के बाद, पाकिस्तान फिल्म उद्योग ने ज्यादा फिल्मों का निर्माण नहीं किया और 1952 के अंत तक इसने केवल पांच फिल्में बनाईं।  बाद में, एक पाकिस्तानी फिल्म निर्माता ख्वाजा खुर्शीद अनवर ने गीतकार के रूप में तनवीर नकवी सहित अन्य लोगों के साथ मिलकर काम किया।  टीम 1956 और 1958 के बीच कुछ फिल्में बनाने में सफल रही

📽️प्रसिद्ध फिल्में

अनमोल घड़ी 1946
जुगनू 1947
तेरी याद1948
नाता 1955
झूमर 1959
नींद 1959
कोयल 1959
सलमा 1960
शाम ढले 1960
घूँघट 1962
अज़रा 1962
सीमा 1963
हमराज़ 1967

भारत में संगीत निर्देशक के रूप में।

1. कुरमई (पंजाबी) (1941)
2. इशारा (1943)
3. परख (1944 फ़िल्म) (1944)
4. यतीम (1945)
5. परवाना (1947 फ़िल्म) (1947)
6. पगडंडी (1947)
7. आज और कल (1947)
8. सिंघार (1949)
9. निशाना (1950)
10. नीलम परी (1952)
बहन भाई 1969
अत ख़ुदा दा वैर 1970

पाकिस्तानी फ़िल्मों में संगीत निर्देशक के रूप में

1. इंतेज़ार (1956) 
2. मिर्ज़ा साहिबान (1956)
3. ज़हर-ए-इश्क (1958) 
4. झूमर (1959)
5. कोयल (1959) 
6. अयाज़ (1960)
7. घूंघट (1962) 
8. चिंगारी (1964)
9. हवेली (1964)
10. सरहद (1966)
11. हमराज़ (1967)
12. गुड्डो (पंजाबी) (1970)
13. हीर रांझा (पंजाबी) (1970) 
14. पराई आग (1971)
15. सलाम-ए-मोहब्बत (1971)
16. शिरीन फरहाद (1975)
17. हैदर अली (1978)
18. मिर्ज़ा जाट (पंजाबी) (1982)

🌹उनके कुछ लोकप्रिय 🌹

पापी पपीहा रे पी पी ना बोल बैरी" सुरैया द्वारा गाया गया, डीएन मधोक के गीत , फिल्म परवाना 
"जब तुम ही नहीं अपनी दुनिया ही बेगानी है" सुरैया द्वारा गाया गया, डीएन मधोक के गीत , फिल्म परवाना 
"जिस दिन से पिया दिल ले गए, दुख दे गए, चैन नहीं आए" नूरजहाँ द्वारा गाया गया, कतील शिफाई के गीत , फ़िल्म इंतज़ार (1956) 
"चली रे चली रे, बैरी आस लगा काय चली रे" नाहिद नियाजी द्वारा गाया गया, तनवीर नकवी के गीत , फिल्म झूमर (1959) 
"रिम झिम रिम झिम पर्रे फुवार, तेरा मेरा नित का प्यार" नूरजहाँ और मुनीर हुसैन द्वारा गाया गया, तनवीर नकवी के गीत , फिल्म कोयल (1959) 
"सुनो अर्ज़ मेरी कमली वाले" जुबैदा खानम द्वारा गाया गया, कतील शिफाई के गीत , फिल्म ज़हर-ए-इश्क (1958) 
"सल्लू अलाही-ए-वा-अले-ही, जो ना होता तेरा जमाल ही" जुबैदा खानम , कौसर परवीन द्वारा गाया गया, तनवीर नकवी के गीत, फिल्म अयाज़ (1960) 
ए रोशनियों के शहर बता मेहदी हसन द्वारा गाया गया , तनवीर नकवी के गीत, फिल्म चिंगारी (1964) 

01 नवंबर 1972 को लाहौर, पाकिस्तान में उनका निधन हो गया।

किशोर प्रधान

किशोर प्रधान

 एक भारतीय मराठी हिंदी फिल्म और थिएटर अभिनेता थे। 
उन्हें जब वी मेट, लगे रहो मुन्नाभाई, मैकमाफिया और जैक आयरिश जैसी हिंदी फिल्मों के लिए जाना जाता था। 

🎂जन्म: 01 नवंबर 1936
⚰️मृत्यु : 11 जनवरी 2019
पत्नी: शोभा प्रधान (विवा. 1966–2019)
मराठी और हिंदी फिल्मों में हास्य भूमिका निभाने वाले अभिनेता किशोर प्रधान का देर रात मुंबई में निधन हो गया। वे 86 साल के थे। अपने अभिनय से उन्होंने मराठी और अंग्रेजी रंगमंच पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। महेश मांजरेकर द्वारा निर्देशित 'लालबाग परेल' और 'शिवाजी राजे भोसले बोलतोय' में किशोर की दमदार भूमिका के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। इसके अलावा 'लगे रहो मुन्ना भाई' और 'जब वी मेट' में उनके रोल को खूब सराहा गया।

पद्मनी कोहलापुरे

पद्मिनी कोल्हापुरे 

🎂जन्म 01 नवंबर 1965

पति: प्रदीप शर्मा (विवा. 1986)
बच्चे: प्रियांक शर्मा
माता-पिता: पंधारिनाथ कोल्हापुरे, अनुपमा कोल्हापुरे
बहन: शिवांगी कोल्हापुरी, तेजस्विनी कोल्हापुरे
 
एक भारतीय अभिनेत्री और गायिका हैं, जो मुख्य रूप से हिंदी फिल्मों में काम करती हैं।
उन्होंने 1972 में 7 साल की उम्र में अभिनय करना शुरू किया और उनकी शुरुआती कृतियों में जिंदगी (1976) और ड्रीम गर्ल (1977) शामिल हैं।
इसके बाद उन्होंने फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम (1978) से अपनी आधिकारिक फिल्म की शुरुआत की, जिसमें उन्होंने यंग रूपा की भूमिका निभाई।
कोल्हापुरे 1980 के दशक में सबसे प्रमुख अभिनेत्रियों में से एक बन गईं। पंद्रह साल की उम्र में, कोल्हापुरे ने बदला लेने वाले नाटक 'इंसाफ का तराजू' (1980) में अपने प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता, और सत्रह साल की उम्र में, दुखद रोमांस 'प्रेम रोग' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। 1982), इस प्रकार संबंधित श्रेणियों में पुरस्कार जीतने वाली दूसरी सबसे कम उम्र की अभिनेत्री बन गईं।
सौतन (1983) में उनकी भूमिका के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था और प्यार झुकता नहीं (1985) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार के लिए एक और नामांकन भी प्राप्त हुआ।
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फिल्में

1993 प्रोफेसर की पड़ोसन मेनका 
1991 कुरबानी रंग लायेगी 
1990 आग का दरिया 
1989 हम इन्तज़ार करेंगे
1989 दाना पानी 
1989 तौहीन 
1989 दाता 
1988 सागर संगम
1987 प्यार के काबिल
1987 सड़क छाप
1987 दादागिरी 
1987 हवालात 
1986 प्यार किया है प्यार करेंगे
1986 किरायदार 
1986 प्रीती 
1986 ऐसा प्यार कहाँ 
1986 स्वर्ग से सुन्दर
1986 मुद्दत
1985 पत्थर दिल
1985 प्यार झुकता नहीं
1985 दो दिलों की दास्तान
1985 वफ़ादार 
1985 प्यारी बहना 
1985 राही बदल गये 
1985 बेवफ़ाई 
1984 ये इश्क नहीं आसां 
1984 हम हैं लाज़वाब 
1984 एक नई पहेली 
1984 नया कदम
1983 वो सात दिन 
1983 लवर्स 
1983 सौतन
1983 बेकरार 
1982 तेरी माँग सितारों से भर दूँ 
1982 दर्द का रिश्ता 
1982 स्वामी दादा
1982 विधाता 
1982 प्रेम रोग 
1981 जमाने को दिखाना है 
1981 आहिस्ता आहिस्ता
1980 इंसाफ का तराजू
1980 गहराई 
1980 थोड़ी सी बेवफाई 
1978 सत्यम शिवम सुन्दरम
1976 ज़िन्दगी

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...