शनिवार, 2 सितंबर 2023

प्यारे लाल

प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा
प्रसिद्ध नाम प्यारेलाल
🎂जन्म 3 सितम्बर, 1940
जन्म भूमि गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
कर्म भूमि मुंबई
कर्म-क्षेत्र संगीतकार
मुख्य रचनाएँ सावन का महीना, दिल विल प्यार व्यार, बिन्दिया चमकेगी, चिट्ठी आई है आदि
मुख्य फ़िल्में मिलन, शागिर्द, इंतक़ाम, दो रास्ते, सरगम, हीरो, नाम, तेज़ाब, खलनायक आदि
पुरस्कार-उपाधि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने सात बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफेयर पुरस्कार जीता।
नागरिकता भारतीय
प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा 
🎂जन्म: 3 सितम्बर, 1940
हिंदी सिनेमा की प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल में से एक हैं।

जीवन परिचय
प्यारेलाल का बचपन बेहद संघर्ष भरा रहा। उनकी माँ का देहांत छोटी उम्र में ही हो गया था। उनके पिता 'पंडित रामप्रसाद जी' ट्रम्पेट बजाते थे और चाहते थे कि प्यारेलाल वायलिन सीखें। पिता के आर्थिक हालात ठीक नहीं थे, वे घर घर जाते थे जब भी कहीं उन्हें बजाने का मौक़ा मिलता था और साथ में प्यारे को भी ले जाते। उनका मासूम चेहरा सबको आकर्षित करता था। एक बार पंडित जी उन्हें लता मंगेशकर के घर लेकर गए। लता जी प्यारे के वायलिन वादन से इतनी खुश हुईं कि उन्होंने प्यारे को 500 रुपए इनाम में दिए जो उस ज़माने में बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। वो घंटों वायलिन का रियाज़ करते। अपनी मेहनत के दम पर उन्हें मुंबई के 'रंजीत स्टूडियो' के ऑर्केस्ट्रा में नौकरी मिल गई जहाँ उन्हें 85 रुपए मासिक वेतन मिलता था। अब उनके परिवार का पालन इन्हीं पैसों से होने लगा। उन्होंने एक रात्रि स्कूल में सातवें ग्रेड की पढ़ाई के लिए दाख़िला लिया पर 3 रुपये की मासिक फीस उठा पाने की असमर्थता के चलते उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा। मुश्किल हालातों ने भी उनके हौसले कम नहीं किए, वो बहुत महत्त्वाकांक्षी थे, अपने संगीत के दम पर अपने लिए नाम कमाना और देश विदेश की यात्रा करना उनका सपना था।

"मैंने संगीत सीखने के लिए एक संगीत ग्रुप (मद्रिगल सिंगर) जॉइन किया, पर वहां मुझे हिंदू होने के कारण स्टेज आदि पर परफोर्म करने का मौक़ा नहीं मिलता था। वो लोग पारसी और ईसाई वादकों को अधिक बढ़ावा देते थे। पर मुझे सीखना था तो मैं सब कुछ सह कर भी टिका रहा। पर मेरे पिता ये सब अधिक बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। उन्होंने ख़ुद ग़रीब बच्चों को मुफ़्त में सिखाने का ज़िम्मा उठाया और वो उन्हें संगीतकार नौशाद साहब के घर भी ले जाया करते थे। क़रीब 1500 बच्चों को मेरे पिता ने तालीम दी"

लक्ष्मीकांत से मुलाकात
मुख्य लेख : लक्ष्मीकांत
"उन दिनों लक्ष्मीकांत 'पंडित हुस्नलाल भगतराम' के साथ काम करते थे, वो मुझसे 3 साल बड़े थे उम्र में, धीरे धीरे हम एक दूसरे के घर आने जाने लगे। साथ बजाते और कभी कभी क्रिकेट खेलते और संगीत पर लम्बी चर्चाएँ करते। हमारे शौक़ और सपने एक जैसे होने के कारण हम बहुत जल्दी अच्छे दोस्त बन गए।" "सी. रामचंद्र जी ने एक बार मुझे बुला कर कहा कि मैं तुम्हें एक बड़ा काम देने वाला हूँ। वो लक्ष्मी से पहले ही इस बारे में बात कर चुके थे। चेन्नई में हमने ढ़ाई साल साथ काम किया फ़िल्म थी "देवता" कलाकार थे जेमिनी गणेशन, वैजयंती माला, और सावित्री, जिसके हमें 6000 रुपए मिले थे। ये पहली बार था जब मैंने इतने पैसे एक साथ देखे। मैंने इन पैसों से अपने पिता के लिए एक सोने की अंगूठी ख़रीदी जिसकी कीमत 1200 रुपए थी।"

कुछ प्रसिद्ध गीत
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने हिन्दी सिनेमा को बेहतरीन गीत दिये उनमें कुछ के नाम नीचे दिये गये हैं।

सावन का महीना... (फ़िल्म- मिलन)
दिल विल प्यार व्यार... (फ़िल्म- शागिर्द)
बिन्दिया चमकेगी... (फ़िल्म- दो रास्ते)
मंहगाई मार गई... (फ़िल्म- रोटी कपड़ा और मकान)
डफली वाले... (फ़िल्म- सरगम)
तू मेरा हीरो है... (फ़िल्म- हीरो )
यशोदा का नन्दलाला... (फ़िल्म- संजोग)
चिट्ठी आई है... (फ़िल्म- नाम)
एक दो तीन... (फ़िल्म- तेज़ाब)
चोली के पीछे क्या है... (फ़िल्म- खलनायक)

पंडित किशन जी महाराज

पंडित किशन महाराज
🎂जन्म 3 सितंबर, 1923
जन्म भूमि काशी, उत्तर प्रदेश
⚰️मृत्यु 4 मई, 2008
मृत्यु स्थान वाराणसी
अभिभावक पंडित हरि महाराज
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र तबला वादक
पुरस्कार-उपाधि पद्मश्री, पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी सम्मान
प्रसिद्धि तबला वादक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी किशन महाराज तबले के उस्ताद होने के साथ साथ मूर्तिकार, चित्रकार, वीर रस के कवि और ज्योतिष के मर्मज्ञ भी थे।
किशन महाराज का जन्म काशी के कबीरचौरा मुहल्ले में 3 सितंबर 1923 को एक संगीतज्ञ के परिवार में हुआ। कृष्ण जन्माष्टमी पर आधी रात को जन्म होने के कारण उनका नाम किशन पड़ा। उन्होंने अपने प्रारंभिक वर्षों में पिता पंडित हरि महाराज से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की। पिता के देहांत के बाद उनके चाचा एवं पंडित बलदेव सहाय के शिष्य पंडित कंठे महाराज ने उनकी शिक्षा का कार्यभार संभाला।

तबला वादन
किशन महाराज ने तबले की थाप की यात्रा शुरू करने के कुछ साल के अंदर ही उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ाँ, पंडित ओंकार ठाकुर, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां, पंडित भीमसेन जोशी, वसंत राय, पंडित रवि शंकर, उस्ताद अली अकबर खान जैसे बड़े नामों के साथ संगत की। कई बार उन्होंने संगीत की महफिल में एकल तबला वादन भी किया। इतना ही नहीं नृत्य की दुनिया के महान् हस्ताक्षर शंभु महाराज, सितारा देवी, नटराज गोपी कृष्ण और बिरजू महाराज के कार्यक्रमों में भी उन्होंने तबले पर संगत की। उन्होंने एडिनबर्ग और वर्ष 1965 में ब्रिटेन में कॉमनवेल्थ कला समारोह के साथ ही कई अवसरों पर अपने कार्यक्रम प्रस्तुत कर प्रतिष्ठा अर्जित की। उनके शिष्यों में वर्तमान समय के जाने माने तबला वादक पंडित कुमार बोस, पंडित बालकृष्ण अय्यर, सुखविंदर सिंह नामधारी सहित अन्य नाम शामिल हैं।

प्रभावशाली व्यक्तित्व
आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे, माथे पर एक लाल रंग का टिक्का हमेशा लगा रहता था, वे जब संगीत सभाओं में जाते, संगीत सभायें लय ताल से परिपूर्ण हो गंधर्व सभाओं की तरह गीत, गति और संगीतमय हो जाती। तबला बजाने के लिए वैसे पद्मासन में बैठने की पद्धति प्रचलित हैं, किंतु स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी दोनों घुटनों के बल बैठ कर वादन किया करते थे, ख्याल गायन के साथ उनके तबले की संगीत श्रोताओं पर जादू करती थी, उनके ठेके में एक भराव था, और दांये और बांये तबले का संवाद श्रोताओं और दर्शकों पर विशिष्ट प्रभाव डालता था। अपनी युवा अवस्था में पंडित जी ने कई फ़िल्मों में तबला वादन किया, जिनमें नीचा नगर, आंधियां, बड़ी माँ आदि फ़िल्में प्रमुख हैं। कहते हैं न महान् कलाकार एक महान् इंसान भी होते हैं, ऐसे ही महान् आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी भी थे, उन्होंने बनारस में दूरदर्शन केन्द्र स्थापित करने के लिए भूख हड़ताल भी की और संगत कलाकारों के प्रति सरकार की ढुलमुल नीति का भी पुरजोर विरोध किया।[1]

बिंदास जीवन शैली
किशन महाराज का ज़िंदगी जीने का अन्दाज़ बहुत बिंदास रहा। उन्होंने ज़िंदगी को हमेशा 'आज' के आइने में देखा और अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ बिंदास जिया। लुंगी कुर्ते में पूरे मुहल्ले की टहलान और पान की दुकान पर मित्रों के साथ जुटान ताज़िंदगी उनका शगल बना रहा। मर्ज़ी हुई तो भैंरो सरदार को एक्के पर साथ बैठाया और घोड़ी को हांक दिया। तबीयत में आया तो काइनेटिक होंडा में किक मारी और पूरे शहर का चक्कर मार आए।

दिनचर्या
उनकी दिनचर्या पूजा पाठ, टहलना, रियाज, अपने शौक़ पूरे करना, मित्रों से गप्पे मारना था। यह सब ज़िंदगी की आखिरी घड़ी तक जारी रहा। वे बड़ी बेबाकी से कहते थे कि मैं कोई उलझन या दुविधा नहीं पालता बल्कि उसे जल्दी से जल्दी दूर कर देता हूं। ताकि न रहे बांस और न बजे बांसुरी। साठ साल पहले शेविंग के दौरान मूंछें सेट करने में एक तरफ छोटी तो दूसरी तरफ बड़ी हो जाने की दिक्कत महसूस की तो झट से उसे पूरी तरह साफ़ करा दिया। इसके बाद फिर कभी मूंछ रखने की जहमत नहीं उठाई। उनकी दिनचर्या बड़ी नियमित थी। प्रात: छह बजे तक उठ जाते थे। बगीचे की सफाई, चिड़ियों को दाना पानी और फिर टहलने निकल जाते थे।

पसंद-नापसंद
किशन महाराज का खानपान का भी अपना अलग स्टाइल था। दाल, रोटी, चावल के साथ छेना या केला और लौकी चाप उन्हें काफ़ी पसंद था। गर्मी के सीजन में दोपहर में सप्ताह में दो तीन रोज सत्तू भी खाते थे। परंपरागत बनारसी नाश्ता पूड़ी-कचौड़ी उन्हें पसंद नहीं था। कभी-कभार किसी पार्टी में पंडित जी पैंट-शर्ट में भी जलवा बिखेरते दिख जाते थे। मगर अलीगढ़ी पायजामा और कुर्ता उनका पसंदीदा पहनावा था। गहरेबाजी, पतंगबाजी और शिकार के शौकीन रहे पंडित जी क्रिकेट और हॉकी में भी ख़ासी दिलचस्पी रखते थे।[2]

सम्मान और पुरस्कार
लय भास्कर, संगीत सम्राट, काशी स्वर गंगा सम्मान, संगीत नाटक अकादमी सम्मान, ताल चिंतामणि, लय चक्रवती, उस्ताद हाफिज़ अली खान व अन्य कई सम्मानों के साथ पद्मश्री व पद्म विभूषण अलंकरण से इन्हें नवाजा गया।

निधन
किशन महाराज 3 सितम्बर 1923 की आधी रात को ही इस धरती पर आए थे और 4 मई, 2008 की आधी रात को ही वे इस धरती को छोड़, स्वर्ग की सभा में देवों के साथ संगत करने हमेशा के लिए चले गए। उनके जाने से भारत ने एक युगजयी संगीत दिग्गज को खो दिया।

अच्छी फिल्मों की गंदी हिरोइन सोनम खान

अभिनेत्री सोनम
बख्तावर खान
भारत
अन्य नामों
सोनम राय
पेशा
अभिनेत्री
🎂जन्म की तारीख और समय: 2 सितंबर 1972
जीवनसाथी
राजीव राय (1991-2016 तलाकशुदा)
बच्चे
1
रिश्तेदार
रज़ा मुराद (चाचा)
मुराद (दादा)
सनोबर कबीर (चचेरे भाई)

सोनम का नाम उनके माता-पिता (मुशीर खान-पिता और तलत खान-मां) ने "बख्तावर" रखा था। 
"सोनम" उनका स्क्रीन-नाम है, जिसे यश चोपड़ा ने भारतीय फिल्म उद्योग में अधिक विपणन योग्य बनाने का सुझाव दिया था। उनकी पहली रिलीज 1987 में रमेश बाबू के साथ तेलुगु भाषा की फिल्म सम्राट थी। उन्होंने 1988 में ऋषि कपूर के साथ फिल्म विजय में यश चोपड़ा द्वारा लॉन्च किए जाने के बाद बॉलीवुड उद्योग में अपनी शुरुआत की ।
1989 में उनकी नौ फिल्में रिलीज हुईं और उस साल उन्हें फिल्म त्रिदेव से प्रसिद्धि मिली , जहां लोकप्रिय गाना ओए ओए...तिरछी टोपी वाले उन पर फिल्माया गया और उन्हें एक सेक्स सिंबल के रूप में स्थापित किया गया । उन्हें मिट्टी और सोना में आलोचनात्मक प्रशंसा मिली, जहां उन्होंने एक कॉलेज छात्रा की जटिल दोहरी भूमिका निभाई, जिसे अपनी आजीविका बनाए रखने के लिए अजीब काम करना पड़ता है।

1990 में सोनम की दस फिल्में रिलीज़ हुईं, जिनमें बॉक्स ऑफिस पर हिट क्रोध और उनकी एकमात्र बंगाली भाषा की फिल्म मंदिरा भी शामिल थी । वह तेलुगु भाषा की सुपरहिट फिल्म कोडमा सिम्हम में चिरंजीवी के साथ भी नजर आई थीं ।

1991 में उनकी पहली रिलीज़ अमिताभ बच्चन , डिंपल कपाड़िया और ऋषि कपूर के साथ मल्टी-स्टारर अजूबा थी । यह अपने समय की सबसे महंगी फिल्मों में से एक थी। उस वर्ष उनकी सात अन्य फ़िल्में रिलीज़ हुईं, जिनमें से संजय दत्त के साथ फतेह ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया।

1992 में, उन्होंने तीसरी और आखिरी बार नसीरुद्दीन शाह के साथ बड़े बजट की विश्वात्मा में काम किया , जिसने नाटकीय रूप से अच्छा प्रदर्शन किया। अपनी शादी के बाद, वह चुनिंदा रूप से दिखाई दीं और गोविंदा के साथ बाज़ (1992) , चंकी पांडे के साथ पुलिस वाला (1993) और संजय दत्त के साथ इंसाफ अपने लहू से (1994) जैसी फिल्मों में अभिनय किया ।
1991 में, सोनम ने निर्देशक राजीव राय से शादी की , जिन्होंने उन्हें दो बेहद सफल फिल्मों, त्रिदेव और विश्वात्मा में निर्देशित किया था । राजीव त्रिमूर्ति फिल्म्स बैनर के संस्थापक, सफल फिल्म निर्माता गुलशन राय के बेटे थे ।  जहां सोनम मुस्लिम थीं, वहीं राजीव और उनका परिवार पंजाब के हिंदू थे। शादी के बाद सोनम ने एक्टिंग छोड़ दी और खुद को अपने परिवार के लिए समर्पित कर दिया। दंपति को जल्द ही एक बेटा गौरव राय हुआ। हालाँकि बाद में उनका तलाक हो गया।

उस दौर में जब बॉलीवुड अंडरवर्ल्ड माफिया की चपेट में था, सोनम गैंगस्टर अबू सलेम के दबाव में आ गईं , जिसका पहले उनके साथ कुछ लेन-देन था।1997 में, संगठित अपराध नेता अबू सलेम के लिए काम करने वाले बंदूकधारियों द्वारा उनके पति के जीवन पर हमला किए जाने के बाद उन्हें अपने पति और बेटे के साथ भारत छोड़ना पड़ा ।यह जोड़ा शुरू में लॉस एंजिल्स चला गया और फिर लगभग दो दशकों तक स्विट्जरलैंड में बस गया। हालाँकि, अंडरवर्ल्ड से मिल रही परेशानियों और भारत में अपना-अपना करियर नहीं बना पाने के कारण दोनों को पेशेवर निराशाओं का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उनकी शादी ख़राब हो गई। 2016 में, 15 साल के अलगाव के बाद, सोनम और राजीव राय ने आखिरकार तलाक ले लिया
📽️
1988 विजय निशा मेहरा हिंदी
आखिरी अदालत निशा शर्मा हिंदी
मुग्गुरू कोडुकुलु शोभा रानी तेलुगू
1989 आख़िरी ग़ुलाम सोनम हिंदी
आखिरी बाजी सपना हिंदी
त्रिदेव रेणुका हिंदी
मिट्टी और सोना अनुपमा/नीलिमा हिंदी
सच्चाई की ताक़त रेखा हिंदी
ना-इंसाफी रीता हिंदी
आसमां से ऊंचा सोनम हिंदी
गोला बारूद हिंदी
हम भी इंसान हैं सोनी हिंदी
1990 क्रोध सोनू हिंदी
प्यार का कर्ज़ मोना हिंदी
जीने दो सुजाता हिंदी
नाकाबंदी सोनिया हिंदी
मंदिरा मंदिरा बंगाली
चोर पे मोर बसंती हिंदी
आज के शहंशाह बरखा हिंदी
कोडामा सिम्हाम तेलुगू
अपमान की आग मोना हिंदी
शेरा शमशेरा दुर्गा हिंदी
1991 रईसजादा हिंदी
स्वर्ग जैसा घर आशा हिंदी
अजूबा शहजादी हिना हिंदी
दुश्मन देवता गंगा हिंदी
फतेह साहिरा हिंदी
अजूबा कुदरत का हिंदी
कोहराम धन्नो हिंदी
मतवाले करो सोनू हिंदी
1992 विश्वात्मा रेणुका हिंदी
बाज़ हिंदी
1993 पुलिस वाला मीनाक्षी हिंदी
1994 फंटूश करो निम्मो हिंदी
इन्साफ अपने लहू से निशा हिंदी
इंसानियत राधा हिंदी

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

इष्मित सिंह

इश्मित सिंह सोढी
जन्म
🎂02 सितम्बर 1988
Ludhiana, Punjab, India
निधन
⚰️29 जुलाई 2008 (उम्र 19)
Chaaya Island Dhonveli, Maldives
विधायें
Playback singing, Indian classical music
पेशा
गायक
इश्मित सिंह भारत के सबसे प्रतिभाशाली नवोदित गायकों में से एक थे। स्टार प्लस के रियलिटी शो वॉयस ऑफ इंडिया के वर्ष 2007 के विजेता गायक लुधियाना के इश्मित सिंह 24 नवंबर 2007 को लखनऊ के हर्षित सक्सेना को हराकर हिंदुस्तान की आवाज बने थे। वे इस प्रतियोगिता में विजयी होने के बाद महज 18 साल की उम्र में अपनी दिलकश आवाज के जरिए लाखों दिलों की धड़कन बन गए थे। स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने इश्मित को स्वयं अपने हाथों से विजेता का खिताब सौंपा था।
इश्मीत का पहला एल्बम 'सतगुर तुमेरे काज सवार' नाम का एक धार्मिक गुरबानी था । Star Voice Of India में इश्मीत सिंगर अभिजीत और अल्का याग्निक के फेवरेट थे। सिंह ने गुरुनानक पब्लिक स्कूल, सराभा नगर, लुधियाना से अपनी स्कूलिंग की। स्नातक की डिग्री लेने के बाद वो मुंबई में एम.एन.सी कॉलेज से पढ़ाई कर रहे थे । 
इश्मीत ने अपनी मां से वादा किया था कि वो सीए लेवल की पढ़ाई पूरी करेंगे । इश्मीत को गायकी की शिक्षा अपने परिवार से मिली थी । 17 साल की उम्र में उन्होंने शो में हिस्सा लिया था । उनके गाने का स्टाइल शान से मिलता-जुलता था । इश्मीत बहुत शांत स्वभाव के थे ।  ये शो जीतने के बाद इश्मीत का सिंगिंग करियर अच्छा चल रहा था । लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था ।
शो जीतने के एक साल बाद ही उनका निधन हो गया । इश्मीत एक परफॉर्मेंस के सिलसिले में मालदीव गए थे। यहां उनके प्रोग्राम से दो दिन पहले स्विमिंग पूल में उनकी लाश मिली थी। सवाल उठने लगे कि आखिर इश्मीत की मौत कैसे हुई । हालांकि पुलिस का कहना था कि इश्मीत पूल में नहाने के लिए उतरे थे । जहां उनके सिर पर चोट लगी और वो डूब गए । इश्मीत को स्विमिंग नहीं आती थी । 
इश्मीत के पैरेंट्स ने पुलिस से छानबीन करने की मांग की थी । उनका कहना था हो सकता है जब वो डूब रहा हो तो लोग तमाशा देख रहे हों, या इवेंट मैनेजमेंट कंपनी ठीक से ईवेंट ऑर्गनाइज ना कर पाई हो । पंजाब सरकार ने पुलिस को छानबीन के आदेश भी दिए थे । बाद में हॉस्पिटल ने बताया था कि इश्मीत के माथे पर कट का निशान था ।
🎂02 सितम्बर 1988
Ludhiana, Punjab, India

⚰️29 जुलाई 2008 (उम्र 19)

सेन गुप्ता

सेन गुप्ता
फ़िल्म निर्देशक , पटकथा लेखक , कला निर्देशक , प्रोडक्शन डिज़ाइनर , निर्माता का आज जन्म दिन है
🎂02 सितम्बर 1965
मुंबई , भारत
अल्मा मेटर
ला फेमिस
↔️
वह सत्रह साल की उम्र से सिनेमा में काम कर रहे हैं , उन्होंने मुंबई में " बॉलीवुड " के स्टूडियो में कला विभाग में प्रशिक्षु के रूप में अपना करियर शुरू किया । उन्होंने भारतीय कला निर्देशक बिजोन दासगुप्ता के साथ सागर और मिस्टर इंडिया जैसी बड़े बजट की व्यावसायिक हिंदी फिल्मों के सेट पर काम किया ।

अपनी प्रशिक्षुता समाप्त करने में कुछ वर्ष बिताने के बाद, वह सहायक कला निर्देशक बन गए। 1988 में, उन्होंने कला निर्देशक या प्रोडक्शन डिजाइनर के रूप में अपनी पहली फिल्म में सुधीर मिश्रा द्वारा निर्देशित मैं जिंदा हूं ( आई एम अलाइव ) नामक एक भारतीय कला फिल्म में काम किया । इसके बाद उन्होंने अपना डिज़ाइन स्टूडियो स्थापित किया और कई विज्ञापन फिल्मों और कला फिल्मों पर काम किया, सेट डिजाइन किए और वास्तविक समय एसएफएक्स में विशेषज्ञता हासिल की। उन्होंने 1989 में सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशक का पुरस्कार जीता। उन्होंने एलेन कॉर्नेउ द्वारा निर्देशित और मुंबई में शूट की गई फ्रांसीसी फिल्म नॉक्टर्न इंडियन में प्रोडक्शन डिजाइनर के रूप में भी काम किया। 

1993 में, उन्हें पेरिस में फ्रांसीसी फिल्म संस्थान FEMIS में दो महीने की ग्रीष्मकालीन कार्यशाला के लिए चुना गया था। कार्यशाला के दौरान, उन्होंने सैमुअल बेकेट के रेडियो नाटक क्रैप्स लास्ट टेप पर आधारित अपनी पहली लघु फिल्म, "ला डर्नियर..." का निर्देशन किया । फिर उन्हें उसी स्कूल में फिल्म निर्देशन का अध्ययन करने के लिए साढ़े तीन साल की पूर्ण छात्रवृत्ति प्रदान की गई।

अपने फिल्म स्कूल के वर्षों के दौरान, उन्होंने चार लघु फिक्शन फिल्में ले कोचोन ,ला पार्टिशन , ट्रैजेट डिसकॉन्टिनु , और ला पेटिट सोरिस बनाईं जो उन्हें विभिन्न यूरोपीय फिल्म समारोहों में ले गईं और पुरस्कार जीते।

1997 में स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद, उन्होंने अपनी पहली फीचर फिल्म हवा अने डे ( लेट द विंड ब्लो ) का निर्देशन किया, जिसका प्रीमियर 2004 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में हुआ।इसे कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में चुना गया और पुरस्कार जीते।यह फिल्म ग्लोबल फिल्म इनिशिएटिव की ग्लोबल लेंस 2008 श्रृंखला का हिस्सा थी ।और जनवरी 2008 में MoMA NYC में प्रीमियर हुआ।

2005 में, उन्होंने इंडो-फ्यूजन ग्रुप शक्ति पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म द वे ऑफ ब्यूटी बनाई , जिसे मई 2006 में डीवीडी पर रिलीज़ किया गया।

2008 में, उनकी नई फीचर फिल्म परियोजना सनराइज को पुसान अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में 11वें पुसान प्रमोशन प्लान (3 से 6 अक्टूबर 2008) में 30 अन्य अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं के बीच चुना गया था । चयन में सनराइज़ एकमात्र भारतीय परियोजना थी।

सनराइज़ अक्टूबर 2014 में पूरा हुआ और रिलीज़ हुआ और 2014 के बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवलऔर कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इसका प्रीमियर हुआ, पुरस्कार प्राप्त हुए और अंतरराष्ट्रीय आलोचनात्मक प्रशंसा मिली।

2017 में, सेन-गुप्ता ने अपनी पहली ऑस्ट्रेलियाई फीचर फिल्म स्लैम लिखी और निर्देशित की । यह 2016 अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव रॉटरडैम के सिनेमार्ट और 2016 बर्लिनले को-प्रोडक्शन मार्केट में एक आधिकारिक चयनित परियोजना थी ।अकादमी पुरस्कार नामांकित फिल्म उमर के एडम बकरी और पुरस्कार विजेता ऑस्ट्रेलियाई अभिनेत्री राचेल ब्लेक अभिनीत फिल्म को अक्टूबर और नवंबर 2017 में सिडनी , ऑस्ट्रेलिया में फिल्माया गया था ।

स्लैम को 2018 टालिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल में आधिकारिक चयन प्रतियोगिता में चुना गया है और इसका विश्व प्रीमियर 27 नवंबर 2018 को हुआ था।

सेन-गुप्ता ने 2021 से ऑस्ट्रेलियाई फिल्म, टेलीविजन, रेडियो स्कूल एएफटीआरएस में निर्देशन में परास्नातक के लिए वरिष्ठ व्याख्याता के रूप में काम किया है ।

साधना

साधना (अभिनेत्री)  
 
पूरा नाम साधना शिवदासानी
प्रसिद्ध नाम साधना
🎂जन्म 2 सितम्बर, 1941
जन्म भूमि कराची
⚰️मृत्यु 25 दिसम्बर, 2015
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
अभिभावक शेवाराम (पिता), लालीदेवी (माता)
पति/पत्नी आर.के. नैय्यर
कर्म भूमि मुंबई
कर्म-क्षेत्र अभिनय
मुख्य फ़िल्में 'लव इन शिमला', 'मेरे मेहबूब', 'आरज़ू', 'वक़्त', 'मेरा साया', 'हम दोनों', 'अमानत', 'इश्क पर ज़ोर नहीं', 'परख', 'प्रेमपत्र', 'गबन', 'एक फूल दो माली' और 'गीता मेरा नाम'
पुरस्कार-उपाधि 'अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फ़िल्म अकादमी' (आईफा) द्वारा 2002 में 'लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार'।

उन्होंने फ़िल्म 'अबाणा' से अपना फ़िल्मी सफर आरम्भ किया था। साधना ने हिन्दी फ़िल्मों से जो शोहरत पाई और जो मुकाम हासिल किया, वह किसी से छिपा नहीं है। साधना का पूरा नाम 'साधना शिवदासानी' (बाद में नैय्यर) था। वह अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थीं। अपने बालों की स्टाइल की वजह से भी साधना प्रसिद्ध थीं, उनके बालों की कट स्टाइल 'साधना कट' के नाम से जानी जाती है।
शिक्षा तथा विवाह
साधना के पिता का नाम शेवाराम और माता का नाम लालीदेवी था। माता-पिता की एकमात्र संतान होने के कारण साधना का बचपन बड़े प्यार के साथ व्यतीत हुआ था। 1947 में भारत के बंटवारे के बाद उनका परिवार कराची छोड़कर मुंबई आ गया था। इस समय साधना की आयु मात्र छ: साल थी। साधना का नाम उनके पिता ने अपने समय की पसंदीदा अभिनेत्री 'साधना बोस' के नाम पर रखा था। साधना ने आठ वर्ष की उम्र तक अपनी शिक्षा घर पर ही पूरी की थी। ये शिक्षा उन्हें उनकी माँ से प्राप्त हुई थी। रूपहले पर्दे पर अपनी दिलकश अदाकारी से घर-घर में पसंद की जाने वाली साधना का विवाह आर.के. नैय्यर के साथ हुआ था, जिस कारण वह साधना नैय्यर के नाम से भी जानी गईं, किंतु उनका साधना नाम ही ज़्यादा प्रसिद्ध रहा।

नृत्य के लिए चुनाव
जब साधना स्कूल की छात्रा थीं और नृत्य सीखने के लिए एक डांस स्कूल में जाती थीं, तभी एक दिन एक नृत्य-निर्देशक उस डांस स्कूल में आए। उन्होंने बताया कि राजकपूर को अपनी फ़िल्म के एक ग्रुप-डांस के लिए कुछ ऐसी छात्राओं की ज़रूरत है, जो फ़िल्म के ग्रुप डांस में काम कर सकें। साधना की डांस टीचर ने कुछ लड़कियों से नृत्य करवाया और जिन लड़कियों को चुना गया, उनमें से साधना भी एक थीं। इससे साधना बहुत खुश थीं, क्योंकि उन्हें फ़िल्म में काम करने का मौका मिल रहा था। राजकपूर की वह फ़िल्म थी- 'श्री 420'। डांस सीन की शूटिंग से पहले रिहर्सल हुई। वह गाना था- 'रमैया वस्ता वइया..।' साधना शूटिंग में रोज़ शामिल होती थीं। नृत्य-निर्देशक जब जैसा कहते साधना वैसा ही करतीं। शूटिंग कई दिनों तक चली। लंच-चाय तो मिलते ही थे, साथ ही चलते समय नगद मेहनताना भी मिलता था।
एक दिन साधना ने देखा कि 'श्री 420' के शहर में बड़े-बड़े बैनर लगे हैं। फ़िल्म रिलीज हो रही है। ऐसे में एक्स्ट्रा कलाकार और कोरस डांसर्स को कोई प्रोड्यूसर प्रीमियर पर नहीं बुलाता, इसलिए साधना ने खुद अपने और अपनी सहेलियों के लिए टिकटें ख़रीदीं। दरअसल, साधना यह चाहती थीं कि वे पर्दे पर डांस करती हुई कैसी लगती हैं, उनकी सहेलियाँ भी देखें। सहेलियों के साथ साधना सिनेमा हॉल पहुँचीं। फ़िल्म शुरू हुई। जैसे ही गीत 'रमैया वस्तावइया..' शुरू हुआ, तो साधना ने फुसफुसाते हुए सहेलियों से कहा, इस गीत को गौर से देखना, मैंने इसी में काम किया है। सभी सहेलियाँ आँखेंं गड़ाकर फ़िल्म देखने लगीं। लेकिन गाना समाप्त हो गया और वे कहीं भी नज़र नहीं आईं। तभी सहेलियों ने पूछा, अरे तू तो कहीं भी नज़र ही नहीं आई। साधना की आँखेंं उनकी बात सुनकर डबडबा गईं। उन्हें क्या पता था कि फ़िल्म के संपादन में राजकपूर उनके चेहरे को काट देंगे। लेकिन यह एक संयोग ही कहा जायेगा कि जिस राजकपूर ने साधना को उनकी पहली फ़िल्म में आंसू दिए थे, उन्होंने आठ साल बाद उनके साथ 'दूल्हा दुल्हन' में हीरो का रोल निभाया
वर्ष 1955 में "राज कपूर" की फ़िल्म 'श्री 420' के गीत 'ईचक दाना बीचक दाना' में एक कोरस लड़की की भूमिका मिली थी साधना को, उस वक़्त वो 15 साल की थीं, दरअसल साधना को वह एक विज्ञापन कपनी ने अपने उत्पादकों के लिए मौक़ा दिया था। इन्हें भारत की पहली सिंधी फ़िल्म 'अबाणा' (1958) में काम करने का मौक़ा मिला जिसमें उन्होंने अभिनेत्री शीला रमानी की छोटी बहन की भूमिका निभाई थी और इस फ़िल्म के लिए इन्हें 1 रुपए की टोकन राशि का भुगतान किया गया था। इस सिंधी ख़ूबसूरत बाला को सशधर मुखर्जी ने देखा, जो उस वक़्त बहुत बड़े फ़िल्मकार थे। सशधर मुखर्जी को अपने बेटे जॉय मुखर्जी के लिए एक हिरोइन के लिए नये चेहरे की तलाश कर रहे थे।

'साधना कट' हेयर स्टाइल
वर्ष 1960 में "लव इन शिमला" रिलीज़ हुई, इस फ़िल्म के निर्देशक थे आर.के. नैयर, और उन्होंने ही साधना को नया लुक दिया "साधना कट"। दरअसल साधना का माथा बहुत चौड़ा था उसे कवर किया गया बालों से, उस स्टाईल का नाम ही पड़ गया "साधना कट" । 1961 में एक और "हिट" फ़िल्म हम दोनों में देव आनंद के साथ इस B/W फ़िल्म को रंगीन किया गया था और 2011 में फिर से रिलीज़ किया गया था। 1962 में वह फिर से निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा असली-नकली में देव आनंद के साथ थीं।
1963 में, टेक्नीकलर फ़िल्म 'मेरे मेहबूब' एच. एस. रवैल द्वारा निर्देशित उनके फ़िल्मी कैरियर ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी। यह फ़िल्म 1963 की भी ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी और 1960 के दशक के शीर्ष 5 फ़िल्मों में स्थान पर रहीं। मेरे मेहबूब में निम्मी पहले साधना वाला रोल करने जा रही थी न जाने क्या सोच कर निम्मी ने साधना वाला रोल ठुकरा कर राजेंद्र कुमार की बहन वाला का रोल किया। साधना के बुर्के वाला सीन इंडियन क्लासिक में दर्ज है। साल 1964 में उनके डबल रोल की फ़िल्म रिलीज़ हुई जिसमें मनोज कुमार हीरो थे और फ़िल्म का नाम था "वो कौन थी"। सफेद साड़ी पहने महिला भूतनी का यह किरदार हिन्दुस्तानी सिनेमा में अमर हो गया। इस फ़िल्म से हिन्दुस्तानी सिनेमा को नया विलेन भी मिला जिसका नाम था 'प्रेम चोपड़ा'। साधना को लाज़वाब एक्टिंग के लिए प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में पहला फ़िल्मफेयर नामांकन भी मिला था।
क्लासिक्स फ़िल्म वो कौन थी, मदन मोहन के लाज़वाब संगीत और लता मंगेशकर की लाज़वाब गायकी के लिए भी याद की जाती है। "नैना बरसे रिमझिम" का आज भी कोई जवाब नहीं है। इस फ़िल्म के लिए साधना को मोना लिसा की तरह मुस्कान के साथ 'शो डाट' कहा गया था। यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर "हिट" थी। साल 1964 में साधना का नाम एक हिट से जुड़ा यह फ़िल्म थी राजकुमार, हीरो थे शम्मी कपूर। राजकुमार भी साल 1964 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी। साल 1965 की मल्टी स्टार कास्ट की फ़िल्म 'वक़्त' रिलीज़ हुई जो इस साल की ब्लॉकबस्टर भी थी जिसमें राज कुमार सुनील दत्त, शशि कपूर, बलराज साहनी, अचला सचदेव और शर्मिला टैगोर जैसे सितारे थे। 'वक़्त' में साधना ने तंग चूड़ीदार- कुर्ता पहना जो इस पहले किसी भी हेरोइन ने नहीं पहना था। साल 1965 साधना के लिए एक और कामयाबी लाया था इसी साल रिलीज़ हुई रामानन्द सागर की "आरजू" जिसमें शंकर जयकिशन का लाजवाब संगीत और हसरत जयपुरी का लिखा यह गीत जो गाया था लता मंगेशकर ने "अजी रूठ कर अब कहाँ जायेगा" ने तहलका मचा दिया था। फ़िल्म "आरजू" में भी साधना ने अपनी स्टाईल को बरकरार रखा। साधना ने रहस्यमयी फ़िल्में 'मेरा साया' (1966) सुनील दत्त के साथ और 'अनीता' (1967) मनोज कुमार के साथ कीं। दोनों फ़िल्मों की हिरोइन साधना डबल रोल में थी, संगीतकार एक बार फिर मदन मोहन ही थे।
फ़िल्म 'मेरा साया' का थीम सोंग "तू जहाँ जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा" और "नैनो में बदरा छाए" जैसे गीत आज भी दिल को छुते हैं। अनीता (1967) से कोरियोग्राफ़र सरोज खान को मौक़ा मिला था। सरोज खान उन दिनों के मशहूर डांस मास्टर सोहन लाल की सहायक थी, गाना था 'झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में' इस गाने को आवाज़ दी दी थी [आशा भोंसले]] ने। उस दौर में जब यह यह गाना स्क्रीन पर आता था तो दर्शक दीवाने हो जाते थे और परदे पर सिक्कों की बौछार शुरू हो जाती थी जिन्हें लुटने के लिए लोग आपस में लड़ जाते थे। इस फ़िल्म के गीत भी राजा मेंहदी अली खान ने लिखे थे। कहते हैं कि साधना को नजर लग गयी जिससे उन्हें थायरॉयड हो गया था। अपने ऊँचे फ़िल्मी कैरियर के बीच वो इलाज़ के लिए अमेरिका के बोस्टन चली गयी। अमेरिका से लौटने के बाद, वो फिर फ़िल्मी दुनिया में लौटी और कई कामयाब फ़िल्में उन्होंने की। इंतकाम (1969) में अभिनय किया, एक फूल माली इन दोनों फ़िल्मों के हीरो थे संजय ख़ान। बीमारी ने साधना का साथ नहीं छोड़ा अपनी बीमारी को छिपाने के लिए उन्होंने अपने गले में पट्टी बंधी अक्सर गले में दुपट्टा बांध लेती थी, यही साधना आइकन बन गया था और उस दौर की लड़कियों ने इसे भी फैशन के रूप में लिया था। साल 1974 में 'गीता मेरा नाम' रिलीज़ हुई जो उनकी आखिरी कमर्शियल हिट थी, इस फ़िल्म की निर्देशक स्वयं थी और इस फ़िल्म में भी उनका डबल रोल था। सुनील दत्त और फ़िरोज़ ख़ान हीरो थे। साधना की कई फ़िल्में बहुत देर से रिलीज़ हुई। 1970 के आस पास 'अमानत' को रिलीज़ होना था लेकिन वो 1975 में रिलीज़ हुई तब बहुत कुछ बदल चुका था। 1978 में 'महफ़िल' और 1994 में 'उल्फ़त की नयी मंजिलें'।

पारिवारिक परिचय
साधना ने 6 मार्च, 1966 को निर्देशक आर.के. नैयर के साथ शादी कर ली जो 1995 में हमेशा के लिए उनका साथ छोड़ गये। इस शादी से साधना के पिता खुश नहीं थे। आर.के. नैयर दमे के मरीज़ थे। साधना के कोई संतान नहीं हुई। साधना की चचेरी बहन बबिता ने फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा। यह बात और है कि बबिता अपनी बहन से बहुत ज्यादा प्रभावित थी। लिहाजा उन्होंने ने भी साधना स्टाईल को अपनाया। बबिता ने फ़िल्म अभिनेता रंधीर कपूर से शादी कर फ़िल्मों को अलविदा कह दिया। अपने फ़िल्मी करियर को लेकर साधना बहुत संजीदा थीं।
हिंदी सिनेमा में योगदान के लिए, अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फ़िल्म अकादमी (आईफा) द्वारा 2002 में लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है। कई हिंदी फ़िल्मों में उनके पिता का रोल उनके सगे चाचा हरी शिवदासानी ने किया था जो अभिनेत्री बबिता के पिता हैं।

प्रमुख फ़िल्में
1958 में साधना ने अपनी पहली सिंधी फ़िल्म 'अबाणा' की थी। इस फ़िल्म को करते समय उनकी आयु 16-17 वर्ष थी। अभिनेत्री शीला रमानी इस फ़िल्म की नायिका थीं और साधना ने इस फ़िल्म में उनकी छोटी बहन का किरदार निभाया था। उनकी देवआनंद के साथ एक फ़िल्म 'साजन की गलियाँ' कुछ कारणों से थियेटर तक नहीं पहुँच सकी और प्रदर्शित नहीं हो पाई। साधना ने कई कला फ़िल्मों में भी अभिनय किया। रोमांटिक और रहस्यमयी फ़िल्मों के अलावा उन्हें कला फ़िल्मों में भी बहुत सराहा गया। उनकी हेयर स्टाइल आज भी साधना कट के नाम से जानी जाती है। चूड़ीदार कुर्ता, शरारा, गरारा, कान में बड़े झुमके, बाली और लुभावनी मुस्कान यह सब साधना की विशिष्ट पहचान रही है। चार फ़िल्मों में साधना ने दोहरी भूमिका निभाई थी। साधना की जो बेहद कामयाब फ़िल्में रही है, उनमें 'आरज़ू', 'वक़्त', 'वो कौन थी', 'मेरा साया', 'हम दोनों', 'वंदना', 'अमानत', 'उल्फ़त', 'बदतमीज', 'इश्क पर ज़ोर नहीं', 'परख', 'प्रेमपत्र', 'गबन', 'एक फूल दो माली' और 'गीता मेरा नाम' आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।
अभिनेत्री साधना का निधन 25 दिसम्बर, 2015 को मुम्बई, महाराष्ट्र में हुआ।

सी अर्जुन

प्रसिद्ध  परंतु भूले हुए संगीतकारों में एक
संगीतकार सी अर्जुन को अर्धश्रद्धांजलि
🎂जन्म 1 सितंबर 1933
⚰️30 अप्रैल 1992

सी. अर्जुन बॉलीवुड में संगीतकार थे।  उन्हें "जय संतोषी मां" (1975) में उनकी रचनाओं के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है।  एक गीत जिसने इतने वर्षों के बाद प्रशंसकों को नहीं छोड़ा है, वह है 1964 में "पुनर्मिलन" का "पास बैठो तबियत बहल जाएगी", जिसे मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में गाया गया था।

1 सितंबर 1933 को एक सिंधी परिवार में जन्मे उनका परिवार विभाजन के बाद बड़ौदा में बस गया।  उन्होंने संगीत निर्देशक बुलो सी रानी के सहायक के रूप में काम किया  संगीतकार के रूप में अर्जुन की पहली फिल्म "अबाना" (1958), एक सिंधी फिल्म थी।

उन्होंने जिन फिल्मों में काम किया है उनमें "रोड नंबर 303" (1960), "मैं और मेरा भाई" (1961), "एक साल पहले" (1965), "सुशीला" (1966), "गुरु और चेला" (1973) शामिल हैं।  , "लव इन कश्मीर" (1976), "करवा चौथ" (1980) और "सती नाग कन्या" (1983)।

उनके कई गाने उषा मंगेशकर ने गाए हैं।  कवि प्रदीप, महेंद्र कपूर, मुबारक बेगम, तलत महमूद, मुकेश, मन्ना डे और आशा भोंसले अन्य गायकों ने उनके गीतों को अमर बना दिया है।

30 अप्रैल 1992 में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया

उनकी उपलब्धियां

मैं भूले हुए संगीतकारों, अविस्मरणीय धुनों को नहीं भूला हूँ । ऐसा होता है कि एक अनूठे संयोग में लता मंगेशकर और आशा भोंसले की जयंती और मोहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार की पुण्य तिथियां 31 जुलाई से 13 अक्टूबर के बीच ढाई महीने के एक संकीर्ण दायरे में आती हैं। स्वर्ण युग में पार्श्व गायन के प्रतीक, और मैं अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इन विशेष अवसरों को छोड़ना नहीं चाहता था। मैं सी अर्जुन के साथ वापस आ गया हूं, जिन्हें न केवल वर्णानुक्रम में बल्कि अपनी कालजयी रचनाओं के कारण इस श्रृंखला में शीर्ष पर होना चाहिए। यह उस दौर की विशेषता थी कि कई अत्यधिक प्रतिभाशाली संगीतकारों के भीड़ भरे क्षेत्र में, कुछ को बी या सी ग्रेड फिल्मों के लिए भेज दिया गया था। सी अर्जुन उनमें से एक थे. लेकिन उनका संगीत उनकी फिल्मों पर भारी पड़ता है। उनका एक ही गाना-रफी द्वारा गाया गया 'पास बैठो तभीियत बहाल जाएगी' गाना उन्हें अमरता दिलाने के लिए काफी है। इस ब्लॉग के कई पाठकों ने उनके नाम और इस गीत का उल्लेख किया है। बहुत बाद में उनकी सी ग्रेड फिल्म जय संतोषी माँ, जो शक्तिशाली शोले और दीवार के वर्ष में रिलीज़ हुई, ने अपने संगीत के बल पर खुद को अब तक की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्मों में से एक के रूप में स्थापित किया।
मूल रूप से सिंधी होने के कारण उनका जन्म 1 सितंबर 1933 को हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार बड़ौदा में बस गया। उन्हें संगीत प्रतिभा अपने पिता से विरासत में मिली जो एक गायक थे। वह एक अन्य सिंधी संगीत निर्देशक बुलो सी रानी के सहायक बन गए। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत सिंधी फिल्म अबाना के लिए संगीत रचना से की। उनकी पहली हिंदी फिल्म रोड नंबर 303 (1960) थी। बीच-बीच में उन्हें बी/सी ग्रेड कास्ट वाली साधारण बैनर के तहत फिल्में मिलती रहीं। उन्होंने यादगार संगीत तैयार किया, फिर भी उनकी किस्मत बदलने में कोई खास योगदान नहीं हुआ। गीतकार जान निसार अख्तर के साथ उनकी जोड़ी एसडी बर्मन या रोशन द्वारा रचित साहिर लुधियानवी की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं के बराबर होगी। उन्होंने कई गैर फ़िल्मी गीत भी लिखे। एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में दिल का दौरा पड़ने से 59 वर्ष की अपेक्षाकृत कम उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। (पंकज राग की 'धुनों की यात्रा' पर आधारित जीवनी संबंधी जानकारी )।
यहां उनके सर्वकालिक महान गीत हैं, जिन्हें हर संगीत प्रेमी जानता है, हालांकि कई लोग नहीं जानते होंगे कि ये सी अर्जुन की रचनाएं हैं।

1. पुरमिलन (1964) से रफी ​​द्वारा पास बैठो तबियत बहाल जाएगी , गीत इंदीवर
सी अर्जुन का कोई भी उल्लेख इस गीत से शुरू होना चाहिए। यह आसानी से रफ़ी के सर्वकालिक महानों में से एक है। इस ब्लॉग के नियमित अनुयायी केआर वैशम्पायन ने अपनी एक टिप्पणी में इस गीत के पीछे एक दिलचस्प कहानी की ओर ध्यान आकर्षित किया, जो उनके मित्र डॉ. सत्यवीर यादव ने उन्हें बताई थी, जिन्होंने इसे अमीन सयानी द्वारा आयोजित बिनाका गीतमाला पर सुना था । एक बार सी अर्जुन और इंदीवर बेस्ट बस से स्टूडियो से घर लौट रहे थे, तभी एक सुंदर युवा लड़की बस में चढ़ी और उनकी सीट के पास खड़ी हो गई। इंदीवर ने बार-बार उनकी तरफ देखा और सी अर्जुन से उन्हें अपनी सीट छोड़ने के लिए कहा ताकि वह उनके पास बैठ सकें और इस तरह इस गाने का जन्म हुआ। अविश्वसनीय रूप से यह गाना जगदीप पर फिल्माया गया है, जो अमिता के साथ मुख्य भूमिका में थे, जिन्होंने 50 के दशक के अंत और 60 के दशक की शुरुआत में तुम सा नहीं देखा जैसी कुछ सुपर हिट फिल्मों में थोड़े समय के लिए प्रसिद्धि पाई थी।और गूंज उठी शेनाई।
2. पुनर्मिलन से आशा भोसले और मुबारक बेगम द्वारा चाह करनी थी चाह कर बैठे , गीत राजा मेहदी अली खान
पास बैठो तबियत बहाल जाएगी पैन में कोई फ्लैश नहीं था। पुनर्मिलन में कई उत्कृष्ट गाने थे। सी अर्जुन ने राजा मेहदी अली खान की इस खूबसूरत शायरी में ग़ज़ल रचने का अपना कौशल दिखाया है। आशा भोसले और मुबारक बेगम ने इसे उतनी ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है, तो शशिकला और अमिता ने इसे पर्दे पर निभाया है।
3. प्यार की राहों में तेरा ही सहारा है, रफी और आशा भोसले द्वारा पुनर्मिलन, गीतकार गुलशन बावरा
पुनर्मिलन के तीन गीतकार थे। यह रफी और आशा का युगल गीत है जिसे गुलशन बावरा ने लिखा है। इस युगल गीत की तुलना ओपी नैय्यर के सर्वश्रेष्ठ रफ़ी-आशा भोसले युगल से की जाएगी। जगदीप और अमिता किसी भी मुख्यधारा के सितारों की तरह पेड़ों के चारों ओर नृत्य करते हैं।
4. पुनर्मिलन से मन्ना डे और लता मंगेशकर द्वारा भाई रे भाई, मैं तो बावरी भाई , गीत गुलहन बावरा

अब आपके पास मन्ना डे-लता मंगेशकर की शायद ही सुनी गई इस जोड़ी में एक बिल्कुल अलग स्वाद है। जगदीप-अमीता द्वारा मंच पर प्रस्तुत किया गया एक सुंदर कृष्ण-राधा नृत्य गीत।
5. रफी और तलत महमूद द्वारा ग़म की अँधेरी रात में, सुशीला (1966), गीत जान निसार अख्तर
गम की अंधेरी रात में दो दिग्गज रफी और तलत महमूद के सर्वश्रेष्ठ पुरुष युगल में से एक होना चाहिए। खूबसूरत शायरी फिर से जां निसार अख्तर की है, जां निसार अख्तर के साथ उनकी जोड़ी बहुत रचनात्मक लग रही थी। यह गीत साहिर लुधियानवी - खय्याम की रचना 'फिर सुबह होगी' के गीत। वो सुबह कभी तो आए गी।  से अद्भुत समानता रखता है ।

6. बेमुर्रावत बेवफ़ा बेगाना-ए-दिल आप हैं मुबारक बेगम द्वारा सुशीला से
यदि कोई संगीतकार किसी बी/सी ग्रेड फिल्म के लिए अविस्मरणीय गीत बनाता है तो उसे बेहद प्रतिभाशाली होना चाहिए। अगर वह दो ऐसे गाने बनाते हैं तो आप उनके सामने सिर झुकाते हैं।' सी अर्जुन मुबारक बेगम के सबसे अविस्मरणीय गीतों में से एक, एक खूबसूरत ग़ज़ल बनाते हैं।
7. मैं और मेरा भाई (1961) से मुकेश और आशा भोसले द्वारा लिखित मैं अभी गैर हूं मुझको अभी अपना ना कहो , गीत जान निसार अख्तर
मुकेश और आशा भोंसले ने कुछ स्वर्गीय युगल गीत गाए हैं, और मैं अभी गैर हूं मुझको अभी अपना ना कहो को आसानी से उनके सर्वश्रेष्ठ में शुमार किया जाना चाहिए।
8. पीनवाले मेरी आँखों से पिया करते हैं, आशा भोंसले द्वारा 'मंगू दादा' (1970), गीत जान निसार अख्तर
सी. अर्जुन को जो भी सीमित कार्यभार मिला, उसमें उन्होंने अद्भुत विविधता प्रदर्शित की। यह एक और सी-ग्रेड फिल्म में आशा भोंसले का एक प्यारा मुजरा है जिसमें शेख मुख्तार, फरयाल आदि जैसे कलाकार हैं।
9. जितनी हसीं हो तुम उतनी ही बेवफा हो , रफी द्वारा ' मंगू दादा', गीत जान निसार अख्तर द्वारा
यहाँ एक अद्भुत रफ़ी एकल है। यदि आप अपनी आंखें बंद करेंगे तो आप कल्पना करेंगे कि इसे राजेंद्र कुमार जैसे शीर्ष सितारे पर फिल्माया गया होगा और शंकर जयकिशन जैसे शीर्ष संगीत निर्देशक द्वारा संगीतबद्ध किया गया होगा। अत्यधिक प्रतिभाशाली संगीतकार होने के अलावा, सी अर्जुन फरयाल के साथ रोमांस कर रहे सुजीत कुमार के लिए इस रत्न को तैयार करने वाले एक बहुत ही ईमानदार व्यक्ति रहे होंगे।
10. जय संतोषी मां (1975) से उषा मंगेशकर द्वारा मैं तो आरती उतारूं रे
सी अर्जुन के काम का शिखर जय संतोषी मां थी, जो एक कम बजट की फिल्म थी जो शोले और दीवार के वर्ष में आई थी और जल्द ही सभी समय की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में एक आश्चर्यजनक सुपर डुपर हिट रैंकिंग बन गई, जाहिर तौर पर उनकी आश्चर्यजनक रूप से मधुर रचनाओं की लहर पर सवार होकर। . वे पान की दुकान पर रेडियो और हर मोहल्ले के कोने पर लाउडस्पीकर पर लगातार गाने बजने के दिन थे । जय संतोषी मां का कोई न कोई गाना सुने बिना आप आधा घंटा नहीं गुजार सकते . यहां एक प्रतिष्ठित आरती है जिसने वास्तव में संतोषी माता के पंथ की शुरुआत की। इस फिल्म से पहले संतोषी मां शायद ही मशहूर देवी-देवताओं में से थीं.

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...