शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

सेन गुप्ता

सेन गुप्ता
फ़िल्म निर्देशक , पटकथा लेखक , कला निर्देशक , प्रोडक्शन डिज़ाइनर , निर्माता का आज जन्म दिन है
🎂02 सितम्बर 1965
मुंबई , भारत
अल्मा मेटर
ला फेमिस
↔️
वह सत्रह साल की उम्र से सिनेमा में काम कर रहे हैं , उन्होंने मुंबई में " बॉलीवुड " के स्टूडियो में कला विभाग में प्रशिक्षु के रूप में अपना करियर शुरू किया । उन्होंने भारतीय कला निर्देशक बिजोन दासगुप्ता के साथ सागर और मिस्टर इंडिया जैसी बड़े बजट की व्यावसायिक हिंदी फिल्मों के सेट पर काम किया ।

अपनी प्रशिक्षुता समाप्त करने में कुछ वर्ष बिताने के बाद, वह सहायक कला निर्देशक बन गए। 1988 में, उन्होंने कला निर्देशक या प्रोडक्शन डिजाइनर के रूप में अपनी पहली फिल्म में सुधीर मिश्रा द्वारा निर्देशित मैं जिंदा हूं ( आई एम अलाइव ) नामक एक भारतीय कला फिल्म में काम किया । इसके बाद उन्होंने अपना डिज़ाइन स्टूडियो स्थापित किया और कई विज्ञापन फिल्मों और कला फिल्मों पर काम किया, सेट डिजाइन किए और वास्तविक समय एसएफएक्स में विशेषज्ञता हासिल की। उन्होंने 1989 में सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशक का पुरस्कार जीता। उन्होंने एलेन कॉर्नेउ द्वारा निर्देशित और मुंबई में शूट की गई फ्रांसीसी फिल्म नॉक्टर्न इंडियन में प्रोडक्शन डिजाइनर के रूप में भी काम किया। 

1993 में, उन्हें पेरिस में फ्रांसीसी फिल्म संस्थान FEMIS में दो महीने की ग्रीष्मकालीन कार्यशाला के लिए चुना गया था। कार्यशाला के दौरान, उन्होंने सैमुअल बेकेट के रेडियो नाटक क्रैप्स लास्ट टेप पर आधारित अपनी पहली लघु फिल्म, "ला डर्नियर..." का निर्देशन किया । फिर उन्हें उसी स्कूल में फिल्म निर्देशन का अध्ययन करने के लिए साढ़े तीन साल की पूर्ण छात्रवृत्ति प्रदान की गई।

अपने फिल्म स्कूल के वर्षों के दौरान, उन्होंने चार लघु फिक्शन फिल्में ले कोचोन ,ला पार्टिशन , ट्रैजेट डिसकॉन्टिनु , और ला पेटिट सोरिस बनाईं जो उन्हें विभिन्न यूरोपीय फिल्म समारोहों में ले गईं और पुरस्कार जीते।

1997 में स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद, उन्होंने अपनी पहली फीचर फिल्म हवा अने डे ( लेट द विंड ब्लो ) का निर्देशन किया, जिसका प्रीमियर 2004 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में हुआ।इसे कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में चुना गया और पुरस्कार जीते।यह फिल्म ग्लोबल फिल्म इनिशिएटिव की ग्लोबल लेंस 2008 श्रृंखला का हिस्सा थी ।और जनवरी 2008 में MoMA NYC में प्रीमियर हुआ।

2005 में, उन्होंने इंडो-फ्यूजन ग्रुप शक्ति पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म द वे ऑफ ब्यूटी बनाई , जिसे मई 2006 में डीवीडी पर रिलीज़ किया गया।

2008 में, उनकी नई फीचर फिल्म परियोजना सनराइज को पुसान अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में 11वें पुसान प्रमोशन प्लान (3 से 6 अक्टूबर 2008) में 30 अन्य अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं के बीच चुना गया था । चयन में सनराइज़ एकमात्र भारतीय परियोजना थी।

सनराइज़ अक्टूबर 2014 में पूरा हुआ और रिलीज़ हुआ और 2014 के बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवलऔर कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इसका प्रीमियर हुआ, पुरस्कार प्राप्त हुए और अंतरराष्ट्रीय आलोचनात्मक प्रशंसा मिली।

2017 में, सेन-गुप्ता ने अपनी पहली ऑस्ट्रेलियाई फीचर फिल्म स्लैम लिखी और निर्देशित की । यह 2016 अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव रॉटरडैम के सिनेमार्ट और 2016 बर्लिनले को-प्रोडक्शन मार्केट में एक आधिकारिक चयनित परियोजना थी ।अकादमी पुरस्कार नामांकित फिल्म उमर के एडम बकरी और पुरस्कार विजेता ऑस्ट्रेलियाई अभिनेत्री राचेल ब्लेक अभिनीत फिल्म को अक्टूबर और नवंबर 2017 में सिडनी , ऑस्ट्रेलिया में फिल्माया गया था ।

स्लैम को 2018 टालिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल में आधिकारिक चयन प्रतियोगिता में चुना गया है और इसका विश्व प्रीमियर 27 नवंबर 2018 को हुआ था।

सेन-गुप्ता ने 2021 से ऑस्ट्रेलियाई फिल्म, टेलीविजन, रेडियो स्कूल एएफटीआरएस में निर्देशन में परास्नातक के लिए वरिष्ठ व्याख्याता के रूप में काम किया है ।

साधना

साधना (अभिनेत्री)  
 
पूरा नाम साधना शिवदासानी
प्रसिद्ध नाम साधना
🎂जन्म 2 सितम्बर, 1941
जन्म भूमि कराची
⚰️मृत्यु 25 दिसम्बर, 2015
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
अभिभावक शेवाराम (पिता), लालीदेवी (माता)
पति/पत्नी आर.के. नैय्यर
कर्म भूमि मुंबई
कर्म-क्षेत्र अभिनय
मुख्य फ़िल्में 'लव इन शिमला', 'मेरे मेहबूब', 'आरज़ू', 'वक़्त', 'मेरा साया', 'हम दोनों', 'अमानत', 'इश्क पर ज़ोर नहीं', 'परख', 'प्रेमपत्र', 'गबन', 'एक फूल दो माली' और 'गीता मेरा नाम'
पुरस्कार-उपाधि 'अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फ़िल्म अकादमी' (आईफा) द्वारा 2002 में 'लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार'।

उन्होंने फ़िल्म 'अबाणा' से अपना फ़िल्मी सफर आरम्भ किया था। साधना ने हिन्दी फ़िल्मों से जो शोहरत पाई और जो मुकाम हासिल किया, वह किसी से छिपा नहीं है। साधना का पूरा नाम 'साधना शिवदासानी' (बाद में नैय्यर) था। वह अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थीं। अपने बालों की स्टाइल की वजह से भी साधना प्रसिद्ध थीं, उनके बालों की कट स्टाइल 'साधना कट' के नाम से जानी जाती है।
शिक्षा तथा विवाह
साधना के पिता का नाम शेवाराम और माता का नाम लालीदेवी था। माता-पिता की एकमात्र संतान होने के कारण साधना का बचपन बड़े प्यार के साथ व्यतीत हुआ था। 1947 में भारत के बंटवारे के बाद उनका परिवार कराची छोड़कर मुंबई आ गया था। इस समय साधना की आयु मात्र छ: साल थी। साधना का नाम उनके पिता ने अपने समय की पसंदीदा अभिनेत्री 'साधना बोस' के नाम पर रखा था। साधना ने आठ वर्ष की उम्र तक अपनी शिक्षा घर पर ही पूरी की थी। ये शिक्षा उन्हें उनकी माँ से प्राप्त हुई थी। रूपहले पर्दे पर अपनी दिलकश अदाकारी से घर-घर में पसंद की जाने वाली साधना का विवाह आर.के. नैय्यर के साथ हुआ था, जिस कारण वह साधना नैय्यर के नाम से भी जानी गईं, किंतु उनका साधना नाम ही ज़्यादा प्रसिद्ध रहा।

नृत्य के लिए चुनाव
जब साधना स्कूल की छात्रा थीं और नृत्य सीखने के लिए एक डांस स्कूल में जाती थीं, तभी एक दिन एक नृत्य-निर्देशक उस डांस स्कूल में आए। उन्होंने बताया कि राजकपूर को अपनी फ़िल्म के एक ग्रुप-डांस के लिए कुछ ऐसी छात्राओं की ज़रूरत है, जो फ़िल्म के ग्रुप डांस में काम कर सकें। साधना की डांस टीचर ने कुछ लड़कियों से नृत्य करवाया और जिन लड़कियों को चुना गया, उनमें से साधना भी एक थीं। इससे साधना बहुत खुश थीं, क्योंकि उन्हें फ़िल्म में काम करने का मौका मिल रहा था। राजकपूर की वह फ़िल्म थी- 'श्री 420'। डांस सीन की शूटिंग से पहले रिहर्सल हुई। वह गाना था- 'रमैया वस्ता वइया..।' साधना शूटिंग में रोज़ शामिल होती थीं। नृत्य-निर्देशक जब जैसा कहते साधना वैसा ही करतीं। शूटिंग कई दिनों तक चली। लंच-चाय तो मिलते ही थे, साथ ही चलते समय नगद मेहनताना भी मिलता था।
एक दिन साधना ने देखा कि 'श्री 420' के शहर में बड़े-बड़े बैनर लगे हैं। फ़िल्म रिलीज हो रही है। ऐसे में एक्स्ट्रा कलाकार और कोरस डांसर्स को कोई प्रोड्यूसर प्रीमियर पर नहीं बुलाता, इसलिए साधना ने खुद अपने और अपनी सहेलियों के लिए टिकटें ख़रीदीं। दरअसल, साधना यह चाहती थीं कि वे पर्दे पर डांस करती हुई कैसी लगती हैं, उनकी सहेलियाँ भी देखें। सहेलियों के साथ साधना सिनेमा हॉल पहुँचीं। फ़िल्म शुरू हुई। जैसे ही गीत 'रमैया वस्तावइया..' शुरू हुआ, तो साधना ने फुसफुसाते हुए सहेलियों से कहा, इस गीत को गौर से देखना, मैंने इसी में काम किया है। सभी सहेलियाँ आँखेंं गड़ाकर फ़िल्म देखने लगीं। लेकिन गाना समाप्त हो गया और वे कहीं भी नज़र नहीं आईं। तभी सहेलियों ने पूछा, अरे तू तो कहीं भी नज़र ही नहीं आई। साधना की आँखेंं उनकी बात सुनकर डबडबा गईं। उन्हें क्या पता था कि फ़िल्म के संपादन में राजकपूर उनके चेहरे को काट देंगे। लेकिन यह एक संयोग ही कहा जायेगा कि जिस राजकपूर ने साधना को उनकी पहली फ़िल्म में आंसू दिए थे, उन्होंने आठ साल बाद उनके साथ 'दूल्हा दुल्हन' में हीरो का रोल निभाया
वर्ष 1955 में "राज कपूर" की फ़िल्म 'श्री 420' के गीत 'ईचक दाना बीचक दाना' में एक कोरस लड़की की भूमिका मिली थी साधना को, उस वक़्त वो 15 साल की थीं, दरअसल साधना को वह एक विज्ञापन कपनी ने अपने उत्पादकों के लिए मौक़ा दिया था। इन्हें भारत की पहली सिंधी फ़िल्म 'अबाणा' (1958) में काम करने का मौक़ा मिला जिसमें उन्होंने अभिनेत्री शीला रमानी की छोटी बहन की भूमिका निभाई थी और इस फ़िल्म के लिए इन्हें 1 रुपए की टोकन राशि का भुगतान किया गया था। इस सिंधी ख़ूबसूरत बाला को सशधर मुखर्जी ने देखा, जो उस वक़्त बहुत बड़े फ़िल्मकार थे। सशधर मुखर्जी को अपने बेटे जॉय मुखर्जी के लिए एक हिरोइन के लिए नये चेहरे की तलाश कर रहे थे।

'साधना कट' हेयर स्टाइल
वर्ष 1960 में "लव इन शिमला" रिलीज़ हुई, इस फ़िल्म के निर्देशक थे आर.के. नैयर, और उन्होंने ही साधना को नया लुक दिया "साधना कट"। दरअसल साधना का माथा बहुत चौड़ा था उसे कवर किया गया बालों से, उस स्टाईल का नाम ही पड़ गया "साधना कट" । 1961 में एक और "हिट" फ़िल्म हम दोनों में देव आनंद के साथ इस B/W फ़िल्म को रंगीन किया गया था और 2011 में फिर से रिलीज़ किया गया था। 1962 में वह फिर से निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा असली-नकली में देव आनंद के साथ थीं।
1963 में, टेक्नीकलर फ़िल्म 'मेरे मेहबूब' एच. एस. रवैल द्वारा निर्देशित उनके फ़िल्मी कैरियर ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी। यह फ़िल्म 1963 की भी ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी और 1960 के दशक के शीर्ष 5 फ़िल्मों में स्थान पर रहीं। मेरे मेहबूब में निम्मी पहले साधना वाला रोल करने जा रही थी न जाने क्या सोच कर निम्मी ने साधना वाला रोल ठुकरा कर राजेंद्र कुमार की बहन वाला का रोल किया। साधना के बुर्के वाला सीन इंडियन क्लासिक में दर्ज है। साल 1964 में उनके डबल रोल की फ़िल्म रिलीज़ हुई जिसमें मनोज कुमार हीरो थे और फ़िल्म का नाम था "वो कौन थी"। सफेद साड़ी पहने महिला भूतनी का यह किरदार हिन्दुस्तानी सिनेमा में अमर हो गया। इस फ़िल्म से हिन्दुस्तानी सिनेमा को नया विलेन भी मिला जिसका नाम था 'प्रेम चोपड़ा'। साधना को लाज़वाब एक्टिंग के लिए प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में पहला फ़िल्मफेयर नामांकन भी मिला था।
क्लासिक्स फ़िल्म वो कौन थी, मदन मोहन के लाज़वाब संगीत और लता मंगेशकर की लाज़वाब गायकी के लिए भी याद की जाती है। "नैना बरसे रिमझिम" का आज भी कोई जवाब नहीं है। इस फ़िल्म के लिए साधना को मोना लिसा की तरह मुस्कान के साथ 'शो डाट' कहा गया था। यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर "हिट" थी। साल 1964 में साधना का नाम एक हिट से जुड़ा यह फ़िल्म थी राजकुमार, हीरो थे शम्मी कपूर। राजकुमार भी साल 1964 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी। साल 1965 की मल्टी स्टार कास्ट की फ़िल्म 'वक़्त' रिलीज़ हुई जो इस साल की ब्लॉकबस्टर भी थी जिसमें राज कुमार सुनील दत्त, शशि कपूर, बलराज साहनी, अचला सचदेव और शर्मिला टैगोर जैसे सितारे थे। 'वक़्त' में साधना ने तंग चूड़ीदार- कुर्ता पहना जो इस पहले किसी भी हेरोइन ने नहीं पहना था। साल 1965 साधना के लिए एक और कामयाबी लाया था इसी साल रिलीज़ हुई रामानन्द सागर की "आरजू" जिसमें शंकर जयकिशन का लाजवाब संगीत और हसरत जयपुरी का लिखा यह गीत जो गाया था लता मंगेशकर ने "अजी रूठ कर अब कहाँ जायेगा" ने तहलका मचा दिया था। फ़िल्म "आरजू" में भी साधना ने अपनी स्टाईल को बरकरार रखा। साधना ने रहस्यमयी फ़िल्में 'मेरा साया' (1966) सुनील दत्त के साथ और 'अनीता' (1967) मनोज कुमार के साथ कीं। दोनों फ़िल्मों की हिरोइन साधना डबल रोल में थी, संगीतकार एक बार फिर मदन मोहन ही थे।
फ़िल्म 'मेरा साया' का थीम सोंग "तू जहाँ जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा" और "नैनो में बदरा छाए" जैसे गीत आज भी दिल को छुते हैं। अनीता (1967) से कोरियोग्राफ़र सरोज खान को मौक़ा मिला था। सरोज खान उन दिनों के मशहूर डांस मास्टर सोहन लाल की सहायक थी, गाना था 'झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में' इस गाने को आवाज़ दी दी थी [आशा भोंसले]] ने। उस दौर में जब यह यह गाना स्क्रीन पर आता था तो दर्शक दीवाने हो जाते थे और परदे पर सिक्कों की बौछार शुरू हो जाती थी जिन्हें लुटने के लिए लोग आपस में लड़ जाते थे। इस फ़िल्म के गीत भी राजा मेंहदी अली खान ने लिखे थे। कहते हैं कि साधना को नजर लग गयी जिससे उन्हें थायरॉयड हो गया था। अपने ऊँचे फ़िल्मी कैरियर के बीच वो इलाज़ के लिए अमेरिका के बोस्टन चली गयी। अमेरिका से लौटने के बाद, वो फिर फ़िल्मी दुनिया में लौटी और कई कामयाब फ़िल्में उन्होंने की। इंतकाम (1969) में अभिनय किया, एक फूल माली इन दोनों फ़िल्मों के हीरो थे संजय ख़ान। बीमारी ने साधना का साथ नहीं छोड़ा अपनी बीमारी को छिपाने के लिए उन्होंने अपने गले में पट्टी बंधी अक्सर गले में दुपट्टा बांध लेती थी, यही साधना आइकन बन गया था और उस दौर की लड़कियों ने इसे भी फैशन के रूप में लिया था। साल 1974 में 'गीता मेरा नाम' रिलीज़ हुई जो उनकी आखिरी कमर्शियल हिट थी, इस फ़िल्म की निर्देशक स्वयं थी और इस फ़िल्म में भी उनका डबल रोल था। सुनील दत्त और फ़िरोज़ ख़ान हीरो थे। साधना की कई फ़िल्में बहुत देर से रिलीज़ हुई। 1970 के आस पास 'अमानत' को रिलीज़ होना था लेकिन वो 1975 में रिलीज़ हुई तब बहुत कुछ बदल चुका था। 1978 में 'महफ़िल' और 1994 में 'उल्फ़त की नयी मंजिलें'।

पारिवारिक परिचय
साधना ने 6 मार्च, 1966 को निर्देशक आर.के. नैयर के साथ शादी कर ली जो 1995 में हमेशा के लिए उनका साथ छोड़ गये। इस शादी से साधना के पिता खुश नहीं थे। आर.के. नैयर दमे के मरीज़ थे। साधना के कोई संतान नहीं हुई। साधना की चचेरी बहन बबिता ने फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा। यह बात और है कि बबिता अपनी बहन से बहुत ज्यादा प्रभावित थी। लिहाजा उन्होंने ने भी साधना स्टाईल को अपनाया। बबिता ने फ़िल्म अभिनेता रंधीर कपूर से शादी कर फ़िल्मों को अलविदा कह दिया। अपने फ़िल्मी करियर को लेकर साधना बहुत संजीदा थीं।
हिंदी सिनेमा में योगदान के लिए, अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फ़िल्म अकादमी (आईफा) द्वारा 2002 में लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है। कई हिंदी फ़िल्मों में उनके पिता का रोल उनके सगे चाचा हरी शिवदासानी ने किया था जो अभिनेत्री बबिता के पिता हैं।

प्रमुख फ़िल्में
1958 में साधना ने अपनी पहली सिंधी फ़िल्म 'अबाणा' की थी। इस फ़िल्म को करते समय उनकी आयु 16-17 वर्ष थी। अभिनेत्री शीला रमानी इस फ़िल्म की नायिका थीं और साधना ने इस फ़िल्म में उनकी छोटी बहन का किरदार निभाया था। उनकी देवआनंद के साथ एक फ़िल्म 'साजन की गलियाँ' कुछ कारणों से थियेटर तक नहीं पहुँच सकी और प्रदर्शित नहीं हो पाई। साधना ने कई कला फ़िल्मों में भी अभिनय किया। रोमांटिक और रहस्यमयी फ़िल्मों के अलावा उन्हें कला फ़िल्मों में भी बहुत सराहा गया। उनकी हेयर स्टाइल आज भी साधना कट के नाम से जानी जाती है। चूड़ीदार कुर्ता, शरारा, गरारा, कान में बड़े झुमके, बाली और लुभावनी मुस्कान यह सब साधना की विशिष्ट पहचान रही है। चार फ़िल्मों में साधना ने दोहरी भूमिका निभाई थी। साधना की जो बेहद कामयाब फ़िल्में रही है, उनमें 'आरज़ू', 'वक़्त', 'वो कौन थी', 'मेरा साया', 'हम दोनों', 'वंदना', 'अमानत', 'उल्फ़त', 'बदतमीज', 'इश्क पर ज़ोर नहीं', 'परख', 'प्रेमपत्र', 'गबन', 'एक फूल दो माली' और 'गीता मेरा नाम' आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।
अभिनेत्री साधना का निधन 25 दिसम्बर, 2015 को मुम्बई, महाराष्ट्र में हुआ।

सी अर्जुन

प्रसिद्ध  परंतु भूले हुए संगीतकारों में एक
संगीतकार सी अर्जुन को अर्धश्रद्धांजलि
🎂जन्म 1 सितंबर 1933
⚰️30 अप्रैल 1992

सी. अर्जुन बॉलीवुड में संगीतकार थे।  उन्हें "जय संतोषी मां" (1975) में उनकी रचनाओं के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है।  एक गीत जिसने इतने वर्षों के बाद प्रशंसकों को नहीं छोड़ा है, वह है 1964 में "पुनर्मिलन" का "पास बैठो तबियत बहल जाएगी", जिसे मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में गाया गया था।

1 सितंबर 1933 को एक सिंधी परिवार में जन्मे उनका परिवार विभाजन के बाद बड़ौदा में बस गया।  उन्होंने संगीत निर्देशक बुलो सी रानी के सहायक के रूप में काम किया  संगीतकार के रूप में अर्जुन की पहली फिल्म "अबाना" (1958), एक सिंधी फिल्म थी।

उन्होंने जिन फिल्मों में काम किया है उनमें "रोड नंबर 303" (1960), "मैं और मेरा भाई" (1961), "एक साल पहले" (1965), "सुशीला" (1966), "गुरु और चेला" (1973) शामिल हैं।  , "लव इन कश्मीर" (1976), "करवा चौथ" (1980) और "सती नाग कन्या" (1983)।

उनके कई गाने उषा मंगेशकर ने गाए हैं।  कवि प्रदीप, महेंद्र कपूर, मुबारक बेगम, तलत महमूद, मुकेश, मन्ना डे और आशा भोंसले अन्य गायकों ने उनके गीतों को अमर बना दिया है।

30 अप्रैल 1992 में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया

उनकी उपलब्धियां

मैं भूले हुए संगीतकारों, अविस्मरणीय धुनों को नहीं भूला हूँ । ऐसा होता है कि एक अनूठे संयोग में लता मंगेशकर और आशा भोंसले की जयंती और मोहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार की पुण्य तिथियां 31 जुलाई से 13 अक्टूबर के बीच ढाई महीने के एक संकीर्ण दायरे में आती हैं। स्वर्ण युग में पार्श्व गायन के प्रतीक, और मैं अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इन विशेष अवसरों को छोड़ना नहीं चाहता था। मैं सी अर्जुन के साथ वापस आ गया हूं, जिन्हें न केवल वर्णानुक्रम में बल्कि अपनी कालजयी रचनाओं के कारण इस श्रृंखला में शीर्ष पर होना चाहिए। यह उस दौर की विशेषता थी कि कई अत्यधिक प्रतिभाशाली संगीतकारों के भीड़ भरे क्षेत्र में, कुछ को बी या सी ग्रेड फिल्मों के लिए भेज दिया गया था। सी अर्जुन उनमें से एक थे. लेकिन उनका संगीत उनकी फिल्मों पर भारी पड़ता है। उनका एक ही गाना-रफी द्वारा गाया गया 'पास बैठो तभीियत बहाल जाएगी' गाना उन्हें अमरता दिलाने के लिए काफी है। इस ब्लॉग के कई पाठकों ने उनके नाम और इस गीत का उल्लेख किया है। बहुत बाद में उनकी सी ग्रेड फिल्म जय संतोषी माँ, जो शक्तिशाली शोले और दीवार के वर्ष में रिलीज़ हुई, ने अपने संगीत के बल पर खुद को अब तक की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्मों में से एक के रूप में स्थापित किया।
मूल रूप से सिंधी होने के कारण उनका जन्म 1 सितंबर 1933 को हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार बड़ौदा में बस गया। उन्हें संगीत प्रतिभा अपने पिता से विरासत में मिली जो एक गायक थे। वह एक अन्य सिंधी संगीत निर्देशक बुलो सी रानी के सहायक बन गए। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत सिंधी फिल्म अबाना के लिए संगीत रचना से की। उनकी पहली हिंदी फिल्म रोड नंबर 303 (1960) थी। बीच-बीच में उन्हें बी/सी ग्रेड कास्ट वाली साधारण बैनर के तहत फिल्में मिलती रहीं। उन्होंने यादगार संगीत तैयार किया, फिर भी उनकी किस्मत बदलने में कोई खास योगदान नहीं हुआ। गीतकार जान निसार अख्तर के साथ उनकी जोड़ी एसडी बर्मन या रोशन द्वारा रचित साहिर लुधियानवी की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं के बराबर होगी। उन्होंने कई गैर फ़िल्मी गीत भी लिखे। एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में दिल का दौरा पड़ने से 59 वर्ष की अपेक्षाकृत कम उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। (पंकज राग की 'धुनों की यात्रा' पर आधारित जीवनी संबंधी जानकारी )।
यहां उनके सर्वकालिक महान गीत हैं, जिन्हें हर संगीत प्रेमी जानता है, हालांकि कई लोग नहीं जानते होंगे कि ये सी अर्जुन की रचनाएं हैं।

1. पुरमिलन (1964) से रफी ​​द्वारा पास बैठो तबियत बहाल जाएगी , गीत इंदीवर
सी अर्जुन का कोई भी उल्लेख इस गीत से शुरू होना चाहिए। यह आसानी से रफ़ी के सर्वकालिक महानों में से एक है। इस ब्लॉग के नियमित अनुयायी केआर वैशम्पायन ने अपनी एक टिप्पणी में इस गीत के पीछे एक दिलचस्प कहानी की ओर ध्यान आकर्षित किया, जो उनके मित्र डॉ. सत्यवीर यादव ने उन्हें बताई थी, जिन्होंने इसे अमीन सयानी द्वारा आयोजित बिनाका गीतमाला पर सुना था । एक बार सी अर्जुन और इंदीवर बेस्ट बस से स्टूडियो से घर लौट रहे थे, तभी एक सुंदर युवा लड़की बस में चढ़ी और उनकी सीट के पास खड़ी हो गई। इंदीवर ने बार-बार उनकी तरफ देखा और सी अर्जुन से उन्हें अपनी सीट छोड़ने के लिए कहा ताकि वह उनके पास बैठ सकें और इस तरह इस गाने का जन्म हुआ। अविश्वसनीय रूप से यह गाना जगदीप पर फिल्माया गया है, जो अमिता के साथ मुख्य भूमिका में थे, जिन्होंने 50 के दशक के अंत और 60 के दशक की शुरुआत में तुम सा नहीं देखा जैसी कुछ सुपर हिट फिल्मों में थोड़े समय के लिए प्रसिद्धि पाई थी।और गूंज उठी शेनाई।
2. पुनर्मिलन से आशा भोसले और मुबारक बेगम द्वारा चाह करनी थी चाह कर बैठे , गीत राजा मेहदी अली खान
पास बैठो तबियत बहाल जाएगी पैन में कोई फ्लैश नहीं था। पुनर्मिलन में कई उत्कृष्ट गाने थे। सी अर्जुन ने राजा मेहदी अली खान की इस खूबसूरत शायरी में ग़ज़ल रचने का अपना कौशल दिखाया है। आशा भोसले और मुबारक बेगम ने इसे उतनी ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है, तो शशिकला और अमिता ने इसे पर्दे पर निभाया है।
3. प्यार की राहों में तेरा ही सहारा है, रफी और आशा भोसले द्वारा पुनर्मिलन, गीतकार गुलशन बावरा
पुनर्मिलन के तीन गीतकार थे। यह रफी और आशा का युगल गीत है जिसे गुलशन बावरा ने लिखा है। इस युगल गीत की तुलना ओपी नैय्यर के सर्वश्रेष्ठ रफ़ी-आशा भोसले युगल से की जाएगी। जगदीप और अमिता किसी भी मुख्यधारा के सितारों की तरह पेड़ों के चारों ओर नृत्य करते हैं।
4. पुनर्मिलन से मन्ना डे और लता मंगेशकर द्वारा भाई रे भाई, मैं तो बावरी भाई , गीत गुलहन बावरा

अब आपके पास मन्ना डे-लता मंगेशकर की शायद ही सुनी गई इस जोड़ी में एक बिल्कुल अलग स्वाद है। जगदीप-अमीता द्वारा मंच पर प्रस्तुत किया गया एक सुंदर कृष्ण-राधा नृत्य गीत।
5. रफी और तलत महमूद द्वारा ग़म की अँधेरी रात में, सुशीला (1966), गीत जान निसार अख्तर
गम की अंधेरी रात में दो दिग्गज रफी और तलत महमूद के सर्वश्रेष्ठ पुरुष युगल में से एक होना चाहिए। खूबसूरत शायरी फिर से जां निसार अख्तर की है, जां निसार अख्तर के साथ उनकी जोड़ी बहुत रचनात्मक लग रही थी। यह गीत साहिर लुधियानवी - खय्याम की रचना 'फिर सुबह होगी' के गीत। वो सुबह कभी तो आए गी।  से अद्भुत समानता रखता है ।

6. बेमुर्रावत बेवफ़ा बेगाना-ए-दिल आप हैं मुबारक बेगम द्वारा सुशीला से
यदि कोई संगीतकार किसी बी/सी ग्रेड फिल्म के लिए अविस्मरणीय गीत बनाता है तो उसे बेहद प्रतिभाशाली होना चाहिए। अगर वह दो ऐसे गाने बनाते हैं तो आप उनके सामने सिर झुकाते हैं।' सी अर्जुन मुबारक बेगम के सबसे अविस्मरणीय गीतों में से एक, एक खूबसूरत ग़ज़ल बनाते हैं।
7. मैं और मेरा भाई (1961) से मुकेश और आशा भोसले द्वारा लिखित मैं अभी गैर हूं मुझको अभी अपना ना कहो , गीत जान निसार अख्तर
मुकेश और आशा भोंसले ने कुछ स्वर्गीय युगल गीत गाए हैं, और मैं अभी गैर हूं मुझको अभी अपना ना कहो को आसानी से उनके सर्वश्रेष्ठ में शुमार किया जाना चाहिए।
8. पीनवाले मेरी आँखों से पिया करते हैं, आशा भोंसले द्वारा 'मंगू दादा' (1970), गीत जान निसार अख्तर
सी. अर्जुन को जो भी सीमित कार्यभार मिला, उसमें उन्होंने अद्भुत विविधता प्रदर्शित की। यह एक और सी-ग्रेड फिल्म में आशा भोंसले का एक प्यारा मुजरा है जिसमें शेख मुख्तार, फरयाल आदि जैसे कलाकार हैं।
9. जितनी हसीं हो तुम उतनी ही बेवफा हो , रफी द्वारा ' मंगू दादा', गीत जान निसार अख्तर द्वारा
यहाँ एक अद्भुत रफ़ी एकल है। यदि आप अपनी आंखें बंद करेंगे तो आप कल्पना करेंगे कि इसे राजेंद्र कुमार जैसे शीर्ष सितारे पर फिल्माया गया होगा और शंकर जयकिशन जैसे शीर्ष संगीत निर्देशक द्वारा संगीतबद्ध किया गया होगा। अत्यधिक प्रतिभाशाली संगीतकार होने के अलावा, सी अर्जुन फरयाल के साथ रोमांस कर रहे सुजीत कुमार के लिए इस रत्न को तैयार करने वाले एक बहुत ही ईमानदार व्यक्ति रहे होंगे।
10. जय संतोषी मां (1975) से उषा मंगेशकर द्वारा मैं तो आरती उतारूं रे
सी अर्जुन के काम का शिखर जय संतोषी मां थी, जो एक कम बजट की फिल्म थी जो शोले और दीवार के वर्ष में आई थी और जल्द ही सभी समय की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में एक आश्चर्यजनक सुपर डुपर हिट रैंकिंग बन गई, जाहिर तौर पर उनकी आश्चर्यजनक रूप से मधुर रचनाओं की लहर पर सवार होकर। . वे पान की दुकान पर रेडियो और हर मोहल्ले के कोने पर लाउडस्पीकर पर लगातार गाने बजने के दिन थे । जय संतोषी मां का कोई न कोई गाना सुने बिना आप आधा घंटा नहीं गुजार सकते . यहां एक प्रतिष्ठित आरती है जिसने वास्तव में संतोषी माता के पंथ की शुरुआत की। इस फिल्म से पहले संतोषी मां शायद ही मशहूर देवी-देवताओं में से थीं.

गुरुवार, 31 अगस्त 2023

डाक्टर राही मासूम रजा

राही मासूम रज़ा 
🎂01सितंबर 1925
⚰️15 मार्च 1992
उनका जन्म गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे।

राही मासूम रज़ा
राष्ट्रीयता भारतीय
१९६८ से राही बम्बई में रहने लगे थे। वे अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखते थे जो उनकी जीविका का प्रश्न बन गया था। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। यहीं रहते हुए राही ने आधा गांव, दिल एक सादा कागज, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी उपन्यास व १९६५ के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी कृतियाँ हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य १८५७ जो बाद में हिन्दी में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व गजलें लिखे चुके थे। आधा गाँव, नीम का पेड़, कटरा बी आर्ज़ू, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद और सीन ७५ उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं।पिछले कुछ वर्षों प्रसिद्धि में रहीं हिन्दी पॉप गायिका पार्वती खान का विवाह इनके पुत्र नदीम खान, हिन्दी फिल्म निर्देशक एवं सिनेमैटोग्राफर से हुआ था।

उन्होंने एक टीवी धारावाहिक महाभारत की पटकथा और संवाद लिखे।टीवी धारावाहिक महाकाव्य महाभारत पर आधारित था। धारावाहिक भारत के सबसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों में से एक बन गया, जिसमें लगभग 86% की चोटी की टेलीविजन रेटिंग थी।

राकेश बापट

राकेश बापट
🎂01 सितंबर 1978 
अमरावती , महाराष्ट्र , भारत
अन्य नामों
राकेश वशिष्ठ
व्यवसायों
अभिनेतानमूना
सक्रिय वर्ष
1999–2022
जीवनसाथी
रिद्धि डोगरा
​राकेश बापट का जन्म 0 1 सितंबर 1978 को अमरावती , महाराष्ट्र , भारत में हुआ था । उन्होंने अपनी पेंटिंग के लिए जूनियर स्तर पर राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।

उनकी शादी 2011 में रिद्धि डोगरा से हुई थी लेकिन 2019 में उनका तलाक हो गया। उन्होंने सितंबर 2021 में शमिता शेट्टी को डेट करना शुरू किया , जो बिग बॉस ओटीटी में उनकी कनेक्शन थीं
उन्हें उनकी पहली भूमिका फिल्म तुम बिन (2001) में अमर शाह दी गई, जब निर्देशक की पत्नी ने उन्हें एक टूथपेस्ट विज्ञापन में देखा और अपने पति से उनकी सिफारिश की।उन्होंने अगली बार दिल विल प्यार व्यार (2002) में गौरव की भूमिका निभाई । इसके बाद वह जिग्नेश एम. वैष्णव द्वारा निर्देशित सस्पेंस थ्रिलर तुमसे मिलके रॉन्ग नंबर (2003), राजेश भट्ट द्वारा निर्देशित कौन है जो सपनों में आया (2004) में दिखाई दिए; नाम गुम जाएगा में , अमोल शेटगे द्वारा लिखित और निर्देशित एक रोमांटिक ड्रामा; और समीक्षकों द्वारा आलोचना की गई कोई मेरे दिल में है (2005) में, दीपक रामसे द्वारा निर्देशित।
बापट ने अपने टेलीविजन करियर की शुरुआत 2005 में स्फीयर ऑरिजिंस हिंदी टेलीविजन नाटक सात फेरे - सलोनी का सफर से की, जो 2005 से 2008 तक चला। उन्हें नकारात्मक भूमिका में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए इंडियन टेली अवार्ड के लिए नामांकित किया गया था।

बापट 2006 में दो फिल्मों में दिखाई दिए: अहमद सिद्दीकी द्वारा निर्देशित जय संतोषी माँ , जिसमें नुसरत भरूचा भी मुख्य भूमिका में थीं, और जादू सा चल गया , देव बसु द्वारा निर्देशित।

2008 में, बापट ने हैट्स ऑफ प्रोडक्शंस द्वारा प्रस्तुत एक शो में अनुज की भूमिका निभाई, जो इमेजिन टीवी के एक पैकेट उम्मीद पर प्रसारित हुआ । इस शो में एक छत के नीचे रहने वाली सभी शैलियों की महिलाओं की कहानी दिखाई गई और राकेश ने धारावाहिक में एकमात्र पुरुष की भूमिका निभाई। इस शो को द इंडियन टेली अवार्ड्स में सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक कार्यक्रम का नाम दिया गया । 

2010 में, बापट सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन पर प्रसारित एक भारतीय अलौकिक टेलीविजन श्रृंखला सेवन- द अश्वमेध प्रोफेसी शो में दिखाई दिए । इस सीरीज का निर्माण यश चोपड़ा ने किया था । बापट ने सेवन के पुरुष संरक्षक श्लोक की भूमिका निभाई। सेवन सात वंशजों की खोज और उनकी वास्तविक क्षमताओं की खोज की यात्रा की कहानी थी। शो ने तीन टेली पुरस्कार और एक आईटीए पुरस्कार जीता।

2010 से 2012 तक, बापट ने मर्यादा: लेकिन कब तक? में पुरुष नायक आदित्य सिंह जाखड़ की भूमिका निभाई। , स्टार प्लस पर एक भारतीय टेलीविजन नाटक । यह शो झाकर परिवार की चार महिलाओं के जीवन और उनके रिश्तों की स्याह सच्चाइयों के इर्द-गिर्द घूमता है।

राम कपूर

राम कपूर
🎂01 सितम्बर 1973 
अल्मा मेटर
कोडाइकनाल इंटरनेशनल स्कूल
पेशा
अभिनेता
सक्रिय वर्ष
1997-वर्तमान
के लिए जाना जाता है
मंशा
कसम से
बड़े अच्छे लगते हैं
दिल की बातें दिल ही जाने
हमशकल्स
जीवनसाथी
गौतमी कपूर ​( एम.  2003 )
बच्चे
2
उन्होंने अपने प्रारंभिक वर्ष उत्तराखंड के नैनीताल में शेरवुड कॉलेज में बिताए । शेरवुड कॉलेज में, कपूर को अभिनय से परिचित कराया गया, जब एक चुनौती और अपने मुख्य कप्तान के आदेश के रूप में उन्होंने चार्लीज़ आंटी के वार्षिक स्कूल नाट्य निर्माण के लिए ऑडिशन दिया और मुख्य भूमिका निभाई। अमीर रज़ा हुसैन के निर्देशन और संरक्षण में, कपूर को अपना करियर पथ मिला और उन्हें अभिनय के प्रति अपने प्यार का एहसास हुआ।

अपनी दसवीं बोर्ड परीक्षा पूरी करने के बाद, कपूर ने कोडाइकनाल इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाई की । अपनी स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद, कपूर ने मनोरंजन उद्योग में शामिल होने का फैसला किया और फिल्म निर्माण का अध्ययन करने के लिए यूसीएलए में शामिल होने के इरादे से संयुक्त राज्य अमेरिका में लॉस एंजिल्स चले गए , लेकिन लॉस एंजिल्स में स्टैनिस्लावस्की -आधारित अभिनय अकादमी में शामिल हो गए।
कपूर ने टेलीविजन धारावाहिक न्याय (1997) से ऑनस्क्रीन डेब्यू किया । उन्होंने तीन और शो हीना (1998), संघर्ष (1999) और कविता (2000) में काम किया।

2000 में, कपूर ने लोकप्रिय पारिवारिक नाटक घर एक मंदिर में अभिनय किया । कपूर ने एक बार फिर अमीर रज़ा हुसैन के साथ नाटक द फिफ्टी डेज़ ऑफ़ वॉर - कारगिल में काम किया , जो कारगिल युद्ध के नायकों को श्रद्धांजलि के रूप में नई दिल्ली में 10 दिनों तक चला । कपूर ने पांच किरदार निभाए।

2001 में, कपूर ने रिश्ते , धारावाहिक कभी आए ना जुदाई में अभिनय किया और मीरा नायर की प्रशंसित फिल्म मॉनसून वेडिंग में एक छोटी सी भूमिका निभाई ।

वह धड़कन (2003) और आवाज़ - दिल से दिल तक जैसी फिल्मों में दिखाई दिए , उसके बाद हजारों ख्वाहिशें ऐसी और बाली (2004), एक टेलीफिल्म जिसमें उन्होंने पृथ्वी सिंह की भूमिका निभाई।

2005 में, कपूर को देवकी ,  कल: यस्टरडे एंड टुमॉरो और मिस्ड कॉल जैसी फिल्मों में देखा गया था ।

2006 में, उन्होंने शो कसम से में जय उदय वालिया की भूमिका निभाई ।

इसके बाद कपूर को सोप ओपेरा बसेरा में देखा गया और उन्होंने दो रियलिटी शो में भाग लिया: एक प्रतिभागी के रूप में झलक दिखला जा और मेजबान के रूप में राखी का स्वयंवर ।

कपूर 2010 में दो फिल्मों में छोटी भूमिकाओं में दिखाई दिए। पहली व्यावसायिक रूप से सफल कार्तिक कॉलिंग कार्तिक थी , जिसमें कपूर ने कामथ सर की भूमिका निभाई थी। दूसरी, उड़ान , विक्रमादित्य मोटवानी द्वारा निर्देशित और अनुराग कश्यप द्वारा निर्मित समीक्षकों द्वारा प्रशंसित और पुरस्कार विजेता फिल्म थी ।

2011 में, उन्होंने टीवी शो बड़े अच्छे लगते हैं में अभिनय किया और पुरुष नायक राम अमरनाथ कपूर की भूमिका निभाई । शो तुरंत सफल रहा और कपूर के प्रदर्शन की सराहना की गई।

वह बॉलीवुड फिल्मों एजेंट विनोद (2012), स्टूडेंट ऑफ द ईयर (2012) और हमशकल्स (2014) में दिखाई दिए।

के एन सिंह

नाम K.N.SINGH 

 कृष्ण निरंजन सिंह
प्रसिद्ध नाम के. एन. सिंह
🎂जन्म 01 सितंबर, 1908
जन्म भूमि देहरादून
⚰️मृत्यु 31 जनवरी, 2000
मृत्यु स्थान देहरादून
अभिभावक पिता- चंडी दास
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेता
मुख्य फ़िल्में हुमायूं (1944), बरसात (1949), सज़ा व आवारा (1951), जाल व आंधियां (1952) आदि।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी के.एन. सिंह अपनी इस खासियत के लिये भी पहचाने जाते थे कि वो किरदार में घुस कर एक्टिंग तो करते हैं लेकिन ओवर एक्टिंग नहीं। उनका किरदार परदे पर चीखने-चिल्लाने से सख़्त परहेज़ रखता था। उन्हें यकीन था कि हर किरदार में एक क्रियेटीविटी है, स्कोप है।
के. एन. सिंह का जन्म 1 सितंबर, 1908 को देहरादून (उत्तराखंड) में हुआ था। यह भारतीय सिनेमा के जाने-माने अभिनेता थे। ये हर भूमिका का अच्छा अध्ययन करते थे। इनका पूरा नाम कृष्ण निरंजन सिंह था। इनके पिता चंडी दास एक जाने-माने वकील (क्रिमिनल लॉएर) थे और देहरादून में कुछ प्रांत के राजा भी थे। ये भी उनकी तरह वकील बनना चाहते थे लेकिन अप्रत्याशित घटना चक्र उन्हें फ़िल्मों की ओर खींच ले आया। मंजे हुए अभिनय के बल पर के. एन. सिंह एक चरित्र अभिनेता बने व विलेन के रूप में स्थापित हुए। के. एन. सिंह की पत्नी प्रवीण पाल भी सफल चरित्र अभिनेत्री थीं। उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। उनके छोटे भाई विक्रम सिंह थे, जो मशहूर अंग्रेज़ी पत्रिका फ़िल्मफ़ेयर के कई साल तक संपादक रहे। उनके पुत्र पुष्कर को के.एन. सिंह दंपति ने अपना पुत्र माना था। ये अपने 6 भाई-बहिनों में सबसे बड़े थे।

कुंदन लाल सहगल से भेंट
के. एन. सिंह की दोस्ती लखनऊ में ही अपने एक हम उम्र कुंदन लाल सहगल से हुई। आगे चल कर इस दोस्ती ने कई पड़ाव तय किये। पढ़ाई खत्म कर के. एन. देहरादून आ गए उनके पिता चाहते थे कि के. एन. जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़े हों। उन्होंने कई काम किए कभी लाहौर जा कर प्रिंटिग प्रेस स्थापित की कभी राजों रजवाड़ों को पालने के लिये जंगली जानवर स्पलाई किये तो कभी चाय बागान में काम करने वालों के लिये ख़ास तरह के जूते बनवाए, तो कभी फ़ौज में खुखरी की सप्लाई की हर धंधा शुरू में चला लेकिन के. एन. सिंह का स्वभाव व्यवसायिकता के लिए बना ही नहीं था। पिता परेशान थे और के. एन. का खुद का आत्मविश्वास भी लगातार असफलताओं से डिगने लगा था। उन्हें लग रहा था कि इससे बेहतर तो लंदन जाकर बैरिस्टर की पढ़ाई ही कर ली होती। पिता को लगने लगा कि बेटे को जीवन की कठोरताओं से मुक़ाबला करवाने के लिये उस पर ज़िम्मेदारी लादनी ही होगी। 1930 में मेरठ के फ़ौलादा गांव की आनंद देवी से के. एन. का विवाह करवा दिया गया। इनकी ऊँचाई 6 फुट दो इंच थी।

विवाह के कुछ दिनों बाद के. एन. सिंह ने ज़ाफ़रान की सप्लाई का काम शुरू किया। धंधा फूलने फलने लगा तो के. एन. का आत्मविश्वास भी लौटा और घरवालों का उन पर भरोसा भी बढ़ा इसी दौरान के. एन. की पत्नी बीमार पड़ गयीं। उस दौर में जब इंजेक्शन की पहुंच आम आदमी तक नहीं हुई थी और ऑपरेशन को मौत का दूसरा नाम समझा जाता था इलाज की व्यापक सुविधाएं नहीं थीं। जब तक पत्नी की बीमारी की सही वजह पता चलता उनका निधन हो गया। उधर बीमारी की वजह से उलझे के. एन. सिंह अपने धंधे पर भी ध्यान नहीं दे पाए और उनके व्यवसाय पर उनके भागीदारों ने कब्ज़ा जमा लिया। इस हादसे के कुछ दिनों बाद के. एन. की मुलाक़ात एक अंग्रेज़ लड़की से हुई जिसके साथ मिल कर उन्होंने रूढ़की में एक स्कूल खोला, लेकिन साल भर में ही स्कूल ठप हो गया। इससे पहले उन्होंने होटलों में बासमती चावल की सप्लाई की धंधा भी किया, लेकिन जल्द ही वो खत्म हो गया।

पृथ्वी राज कपूर को पत्र
के. एन. सिंह की एक बहन की शादी कोलकाता में हुई थी। उनकी अचानक तबियत खराब हो गयी। उनकी देखभाल के लिए किसी को जाना था। के. एन. सिंह ख़ाली थे उन्हें ही यह ज़िम्मेदारी सौंपी गयी। उनके कोलकाता जाने की बात सुनकर देहरादून में उनके एक दोस्त नित्यानंन्द खन्ना ने उन्हें पृथ्वी राज कपूर के नाम एक पत्र दिया। पृथ्वी राज उन दिनों कोलकाता में रह कर फ़िल्मों में व्यस्त थे और नित्यानंद उनके फुफेरे भाई थे। कोलकाता सफ़र के दौरान के. एन. सिंह को याद आया कि उनका लड़कपन का दोस्त कुंदन लाल तो फ़िल्मों में स्टार हो गया है शायद मिलने पर वह पहचान ले। सहगल भी उन दिनों कोलकाता में ही थे क्योंकि उस समय कोलकाता फ़िल्म निर्माण का सबसे प्रमुख केंद्र था। कोलकाता में के. एन. दिन भर तो बहन के पास अस्पताल में रहते और शाम को कुछ समय किसी पब या बार में बिताते थे।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...