गुरुवार, 31 अगस्त 2023

ऋतुपर्ण घोष

फ़िल्म निर्देशक ऋतुपर्णो घोष के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म 31 अगस्त, 1963
⚰️30 मई, 2013
ऋतुपर्णो घोष बंगाली फ़िल्मों के प्रसिद्ध निर्देशक, लेखक और अभिनेता थे। 'चोखेर बाली', 'रेनकोट' और 'अबोहोमन' जैसी फ़िल्मों के लिए 'राष्ट्रीय पुरस्कार' विजेता ऋतुपर्णो घोष की ख्याति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत् में थी। उन्होंने और उनकी फ़िल्मों ने रिकॉर्ड बारह 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीते थे। ऋतुपर्णो घोष उन निर्देशकों में से एक थे, जो फ़िल्म को एक कला मानते थे। व्यवसाय या बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर उन्होंने कभी फ़िल्में नहीं बनाईं। उनकी अपनी सोच थी, शैली थी और अपने मिजाज के अनुरूप ही ‍वे फ़िल्में बनाते थे। बहुत कम समय में ही उन्होंने अपनी एक ख़ास पहचान बना ली थी। घोष ने विज्ञापन की दुनिया से अपना व्यवसाय प्रारम्भ किया था और जल्द ही फ़िल्मों की ओर मुड़ गए थे। अपने 19 साल के फ़िल्मी करियर में ऋतुपर्णो घोष ने 19 फ़िल्मों का निर्देशन और तीन फ़िल्मों में अभिनय किया।

जन्म_तथा_शिक्षा

ऋतुपर्णो घोष का जन्म 31 अगस्त, 1963 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। इनके पिता का नाम सुनील घोष था। सुनील घोष डॉक्युमेंट्री फ़िल्म मेकर और पैंटर थे। ऋतुपर्णो घोष को फ़िल्म मेकिंग की प्रेरणा अपने पिता से ही मिली थी। ऋतुपर्णो घोष ने अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा 'साउथ पॉइंट हाईस्कूल' से प्राप्त की। उन्होंने अपनी अर्थशास्त्र की डिग्री 'जादवपुर यूनिवर्सिटी', कोलकाता से प्राप्त की थी। आगे चलकर अपने आधुनिक विचारों को उन्होंने फ़िल्मों के जरिये पेश किया और जल्दी ही अपनी पहचान एक ऐसे फ़िल्म मेकर के रूप में बना ली, जिसने 'भारतीय सिनेमा' को समृद्ध किया।

फ़िल्म_निर्माण

विज्ञापन की दुनिया से अपना कैरियर शुरू करने वाले ऋतुपर्णो घोष ने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बाल फ़िल्मों के निर्माण से की। वर्ष 1994 में बाल फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी' के निर्देशन से उन्हें शोहरत मिलने लगी थी। इसके बाद 'उनिशे एप्रिल' के लिए उन्हें 1995 में 'राष्ट्रीय पुरस्कार' से नवाज़ा गया था। यह फ़िल्म प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक इंगमार बर्गमन की 'ऑटम सोनाटा' से प्रेरित थी। इस फ़िल्म में ऋतुपर्णो घोष ने माँ-बेटी के तनावपूर्ण रिश्तों को बारीकी से रेखांकित किया था। एक कामकाजी महिला अपने व्यावसायिक कैरियर में सफल है, लेकिन अपनी पारिवारिक ज़िंदगी में वह असफल रहती है। इसका असर उसकी बेटी पर होता है और बेटी अपनी माँ से इस बात को लेकर नाराज है कि वह अपने व्यवसाय को कुछ ज़्यादा ही महत्त्व देती है। इस फ़िल्म में अपर्णा सेन, देबश्री राय और प्रसन्नजीत चटर्जी ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म को सिने प्रेमियों ने खूब सराहा था। उनके जानने-पहचानने वाले लोग उन्हें 'ऋतु दा' के नाम से पुकारने लगे थे।

लोकप्रियता

अपनी फ़िल्मों के माध्यम से ऋतुपर्णो घोष ने बहुत लोकप्रियता प्राप्त की। सारे बड़े फ़िल्मी कलाकार उनके साथ काम करने के लिए तुरंत राजी हो जाते थे, क्योंकि उनकी फ़िल्मों में काम करना गर्व की बात थी। रिश्तों की जटिलता और लीक से हट कर विषय उनकी फ़िल्मों की ख़ासियत होते थे। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी और इस भाषा में वे सहज महसूस करते थे। इसलिए अधिकतर फ़िल्में उन्होंने बांग्ला भाषा में ही बनाईं। फ़िल्म फेस्टिवल में सिनेमा देखने वाले दर्शक और ऑफबीट फ़िल्मों के शौकीन ऋतु दा की फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार करते थे।

राष्ट्रीय_पुरस्कार

फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी', जो कि एक बाल फ़िल्म थी, उसकी सफलता के बाद से ही ऋतुपर्णो घोष की फ़िल्मों को 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिलना आम बात हो गई। कभी कलाकारों को, कभी लेखकों तो कभी फ़िल्म को 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिलता। वर्ष 1999 में ऋतुपर्णो घोष द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'बारीवाली' के लिए अभिनेत्री किरण खेर ने श्रेष्ठ अभिनेत्री का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' हासिल किया था। 'बारीवाली' एक ऐसी महिला की कहानी थी, जिसके होने वाले पति की विवाह के एक दिन पहले ही मौत हो जाती है और इसके बाद वह एकांकी जीवन बिताती है। ऋतुपर्णो घोष ने कुल 19 फ़िल्में बनाईं और 12 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीते। ये पुरस्कार उनकी काबलियत को जाहिर करते हैं।

उल्लेखनीय_तथ्य

'उत्सव' (2000), 'तितली' (2002), 'शुभो महुर्त' (2003) जैसी ‍बांग्ला भाषा में बनी फ़िल्मों ने ऋतुपर्णो घोष की ख्याति को बढ़ाया। इसके बाद ऋतुपर्णो ने हिन्दी फ़िल्मों की मशहूर अभिनेत्री ऐश्वर्या राय को लेकर 'चोखेर बाली' (2003) बनाई। यह फ़िल्म रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास पर आधारित थी। इस फ़िल्म में महिला किरदारों को बखूबी पेश किया गया था।
वर्ष 2004 में ऋतुपर्णो घोष ने हिन्दी भाषा में फ़िल्म 'रेनकोट' बनाई। 'रेनकोट' ऐसे दो प्रेमियों की कहानी है, जो वर्षों बाद बरसात की एक रात में मिलते हैं। इस फ़िल्म को ऐश्वर्या राय के कैरियर की श्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक माना जाता है। अभिनेता अजय देवगन ने भी इस फ़िल्म में शानदार अभिनय किया।
वर्ष 2007 में ऋतुपर्णो घोष ने सिनेमा के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन के साथ किया और फ़िल्म 'द लास्ट लियर' बनाई।
ऋतुपर्णो घोष की दूसरी हिन्दी फ़िल्म 'सनग्लास' थी, जो 2012 में रिलीज हुई थी।

प्रमुख_फ़िल्में

1994 हिरेर आंग्टी बंगाली
1995 उनिशे एप्रिल बंगाली
1997 दहन बंगाली
1999 बेरीवाली बंगाली
2003 चोखेर बाली बंगाली
2004 रेनकोट  हिन्दी
2005 अंतरमहल बंगाली
2006 दोसर  बंगाली
2007 द लास्ट लीअर  अंग्रेज़ी
2008 शोभ चरित्रो काल्पोनिक  बंगाली
2010 अबोहोमन बंगाली
2010 नौकाडूबी बंगाली
2012 चित्रांगदा  बंगाली
2012 सनग्लास  हिन्दी

समलैंगिक_फ़िल्में

चाहे हिन्दी फ़िल्म 'रेनकोट' में ऐश्वर्या राय और अजय देवगन से संवेदनशील अभिनय करवाना हो या फिर बांग्ला और हिन्दी में 'चोखेरबाली' हो, ऋतुपर्णो घोष ने न केवल महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाया, बल्कि समलैंगिक मुद्दों को भी वे उठाते रहे। उनकी फ़िल्मों में समलैंगिक विषयों का काफ़ी संजीदा तरीके से चित्रण हुआ है। सर्वश्रेष्ठ अंग्रेज़ी फ़िल्म के लिए 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीतने वाली फ़िल्म 'मेमरीज़ इन मार्च' भी समलैंगिक विषय पर बनाई गई थी, जिसमें ऋतुपर्णो के अभिनय को काफ़ी सराहा गया था। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ऋतुपर्णो ने कभी भी बॉलीवुड की मुख्य धारा का रुख नहीं किया और कोलकाता में ही रह कर अलग-अलग विषयों पर अर्थपूर्ण फ़िल्में बनाते रहे। इस बात का अंदाजा़ इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें सिर्फ 49 वर्ष की आयु में ही बारह 'राष्ट्रीय पुरस्कार' और कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके थे। सिर्फ़ 21 वर्ष में बहुत कम ही फ़िल्मकारों को इतने पुरस्कार नसीब हुए हैं, लेकिन ऋतुपर्णो घोष अपने आप में ख़ास किस्म के निर्देशक और अभिनेता रहे थे।

पुरस्कार_व_सम्मान

ऋतुपर्णो घोष ने कई श्रेणियों में बारह 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' जीते थे। उन्हें 'चोखेर बाली', 'उन्नीशे अप्रैल', 'रेनकोट' और 'द लास्ट लीअर' जैसी फ़िल्मों के लिए याद किया जाता है। वर्ष 2012 में आई उनकी आखिरी फ़िल्म 'चित्रांगदा' के लिए उन्हें 60वें 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' समारोह में 'स्पेशल ज्यूरी अवार्ड' दिया गया था। घोष ने अपनी फ़िल्मों 'अरेक्ती प्रेमेर गोल्पो' 'मेमोरीज इन मार्च' और 'चित्रांगदा' में अपना अभिनय कौशल भी दिखाया था।

निधन

'भारतीय सिनेमा' को अपनी सूझबूझ और फ़िल्मों के माध्यम से समृद्ध बनाने वाले ऋतुपर्णो घोष पैन्क्रियाटाइटिस से पीड़ित थे। 30 मई, 2013 को कोलकाता में सुबह के समय साढ़े सात बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। उनकी आखिरी फ़िल्म 'चित्रांगदा' थी, जो हाल ही में मुंबई में हुए समलैंगिक फ़िल्म महोत्सव की क्लोज़िग फ़िल्म थी। इस महोत्सव के निर्देशक श्रीधर रंगायन का कहना था कि- "हमने एक ऐसा निर्देशक खोया है, जो समलैंगिक विषयों पर खुलकर, बिना डरे और बेहद ही संजीदगी से फ़िल्में बनाता था।"

बुधवार, 30 अगस्त 2023

राज कुमार यादव

राज कुमार यादव
31 अगस्त 1984 
गुरूग्राम , हरियाणा , भारत
अल्मा मेटर
भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान
पेशा
अभिनेता
सक्रिय वर्ष
2010-वर्तमान
काम करता है
पूरी सूची
जीवनसाथी
पत्रलेखा पॉल ​
भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान में अभिनय का अध्ययन करने के बाद , राव ने एंथोलॉजी फिल्म लव सेक्स और धोखा (2010) से अभिनय की शुरुआत की और गैंग्स ऑफ वासेपुर - भाग 2 और तलाश: द आंसर लाइज़ विदइन फिल्मों में सहायक भूमिकाएँ निभाईं । दोनों 2012)। उन्हें 2013 में काई पो चे नाटक में समीक्षकों द्वारा प्रशंसित प्रदर्शन के साथ सफलता मिली! और शाहिद . बाद में वकील शाहिद आज़मी के उनके चित्रण ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड दिलाया ।

राव का करियर क्वीन (2014), अलीगढ़ (2015) और बरेली की बर्फी (2017) में सहायक भूमिकाओं के साथ आगे बढ़ा , जिसमें बाद में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला । उन्होंने स्वतंत्र फिल्मों ट्रैप्ड (2016) और न्यूटन (2017) में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं, पहली फिल्म ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए दूसरा फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड दिलाया और दूसरी फिल्म ने उन्हें एक अभिनेता द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए एशिया पैसिफिक स्क्रीन अवार्ड दिलाया । राव की हॉरर कॉमेडी स्त्री (2018) में उनकी सबसे अधिक कमाई वाली रिलीज़ थी, और व्यंग्य द व्हाइट टाइगर में उनकी पहली अंग्रेजी-फिल्म भूमिका थी।(2021)। लूडो (2020), मोनिका, ओ माई डार्लिंग (2022) और भेड़ (2023) में उनकी अभिनीत भूमिकाओं के लिए और अधिक प्रशंसा मिली , और उन्होंने बधाई दो (2022) में एक गुप्त समलैंगिक व्यक्ति की भूमिका निभाने के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता।
🌹राजकुमार राव का जन्म राज कुमार यादव के रूप में 31 अगस्त 1984 को प्रेम नगर, गुड़गांव , हरियाणा , भारत में हुआ था।उनके विस्तृत परिवार में दो बड़े भाई-बहन और तीन चचेरे भाई-बहन थे। उनके पिता, सत्य प्रकाश यादव,  हरियाणा राजस्व विभाग में एक सरकारी कर्मचारी थे , और उनकी माँ, कमलेश यादव, एक गृहिणी थीं।उनकी माता और पिता की मृत्यु क्रमशः 2016 और 2019 में हो गई। उन्होंने अपनी 12वीं कक्षा एसएन सिद्धेश्वर सीनियर से पूरी की। सेक पब्लिक स्कूल, जहाँ उन्होंने स्कूल नाटकों में भाग लिया। उन्होंने आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की , (दिल्ली विश्वविद्यालय ) जहां वह क्षितिज थिएटर ग्रुप और दिल्ली में श्री राम सेंटर के साथ एक साथ थिएटर कर रहे थे । 

राव ने कहा कि उन्होंने मनोज बाजपेयी को देखने और उनके प्रदर्शन से "अत्यधिक प्रभावित" होने के बाद अभिनेता बनने का फैसला किया ।2008 में, उन्होंने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में दो साल के अभिनय पाठ्यक्रम में दाखिला लिया और फिल्मी करियर बनाने के लिए मुंबई चले गए।  राव शाकाहारी हैं।उन्होंने 2014 में अपना उपनाम यादव से बदलकर राव कर लिया और अपने नाम में एक अतिरिक्त 'एम' भी जोड़ लिया। उन्होंने इसका कारण बताया, "राव या यादव, मैं दोनों में से किसी एक उपनाम का उपयोग कर सकता हूं क्योंकि दोनों पारिवारिक नाम हैं। जहां तक ​​पहले नाम में दोहरे 'एम' का सवाल है, यह मेरी मां के लिए है। वह अंक ज्योतिष में विश्वास करती हैं।" ।" उन्हें औपचारिक रूप से तायक्वोंडो में प्रशिक्षित किया गया है ।

राव 2010 से अभिनेत्री पत्रलेखा पॉल के साथ रिश्ते में थे। उन्होंने 15 नवंबर 2021 को चंडीगढ़ में उनसे शादी की ।

ए के हंगल

🎂01 फ़रवरी 1914, सियाल कोट पाकिस्तान
⚰️26 अगस्त
अवतार किशन हंगल
indo-canadian 
अभिनेता ए के हंगल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजली

🎂01फरवार 19 17 पाकिस्तान सियालकोट

⚰️26 अगस्त 2012, मुंबई

अवतार किशन हंगल हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता एवं दूरदर्शन कलाकार थे। वर्ष 1967 से हिन्दी फ़िल्म उद्योग का हिस्सा रहे हंगल ने लगभग 225 फ़िल्मों में काम किया। उन्हें फ़िल्म 'परिचय' और 'शोले' में अपनी यादगार भूमिकाओं के लिए जाना जाता है।


भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले ए.के. हंगल का जन्म 1 फ़रवरी 1917 को कश्मीरी पंडित परिवार में अविभाजित भारत में पंजाब राज्य के सियालकोट में हुआ था। इनका पूरा नाम अवतार किशन हंगल था। कश्मीरी भाषा में हिरन को हंगल कहते हैं। उन्होंने हिंदी सिनेमा में कई यादगार रोल अदा किए। वर्ष 1966 में उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा और 2005 तक 225 फ़िल्मों में काम किया। राजेश खन्ना के साथ उन्होंने 16 फ़िल्में की थी। हंगल साहब उर्दू भाषी थे। उन्हें हिंदी में स्क्रिप्ट पढ़ने में परेशानी होती थी। इसलिए वे स्क्रिप्ट हमेशा उर्दू भाषा में ही मांगते थे।


कश्मीरी ब्राह्मणों का यह परिवार बहुत पहले लखनऊ में बस गया था। लेकिन हंगल साहब के जन्म के डेढ़-दो सौ साल पहले वे लोग पेशावर चले गये थे। इनके दादा के एक भाई थे जस्टिस शंभुनाथ पंडित, जो बंगाल न्यायालय के प्रथम भारतीय जज बने थे। हंगल साहब के पिता उन्हें पारसी थियेटर दिखाने ले जाया करते थे। वहीं से नाटकों के प्रति शौक़ उत्पन्न हुआ। हंगल साहब शुरुआती दौर से ही कभी किसी काम को छोटा नहीं समझते थे।


इनका बचपन पेशावर में गुजरा, यहां उन्होंने थिएटर में अभिनय किया। इनके पिता का नाम पंडित हरि किशन हंगल था। अपने जीवन के शुरुआती दिनों में, जब वे कराची में रहते थे, वहां उन्होंने टेलरिंग का काम भी किया है। पिता के सेवानिवृत्त होने के बाद पूरा परिवार पेशावर से कराची आ गया। 1949 में भारत विभाजन के बाद ए.के. हंगल मुंबई चले गए। 21 की उम्र में 20 रुपये लेकर पहली बार मुंबई आए थे। ये बलराज साहनी और कैफी आजमी के साथ थिएटर ग्रुप आईपीटीए के साथ जुड़े थे।

उन्होंने इप्टा से जुड़ कर अपने नाटकों के मंचन के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना जगायी। हंगल साहब पेंटिंग भी करते थे। उन्होंने किशोर उम्र में ही एक उदास स्त्री का स्केच बनाया था और उसका नाम दिया चिंता। वे हमेशा अपनी फ़िल्मों से ज्यादा अपने नाटक को अहमियत देते थे और मानते थे कि ज़िंदगी का मतलब सिर्फ अपने बारे में सोचना नहीं है। वे हमेशा कहते थे कि चाहे कुछ भी हो जाये, ‘मैं एहसान-फरामोश और मतलबी नहीं बन सकता।’

भारत की आज़ादी की लड़ाई में भी इनकी भागीदारी थी। 1930-47 के बीच स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। दो बार जेल गए। हंगल तीन साल पाकिस्तान में जेल में रहे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पेशावर में काबुली गेट के पास एक बहुत बड़ा प्रदर्शन हुआ था, जिसमें हंगल साहब भी उपस्थित थे। अंग्रेजों ने अपने सिपाहियों को प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का हुक्म दिया था, लेकिन चंदर सिंह गढ़वाली के नेतृत्व वाले उस गढ़वाल रेजीमेंट की टुकड़ी ने गोली चलाने से इनकार कर दिया। यह एक विद्रोह था। चंदर सिंह गढ़वाली को जेल में डाला गया। हंगल साहब को दु:ख था कि चंदर सिंह गढ़वाली को ‘भारत रत्न’ नहीं मिला। भारत माँ का यह वीर सपूत 1981 में गुमनाम मौत मरा। पेशावर में हुआ नरसंहार उसी काबुल गेट वाली घटना के बाद हुआ था। उस वक्त अंग्रेजों ने अमेरिकी से गोलियाँ चलवाई थीं। हंगल साहब ने अपनी आँखों से यह सब देखा था। यही वजह रही कि वे थियेटर से जुड़ने के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक आंदोलनों को लेकर हमेशा सजग रहते थे।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी से बचाने के लिए चलाये गये हस्ताक्षर अभियान में भी वे शामिल थे। किस्सा-ख्वानी बाज़ार नरसंहार के दौरान उनकी कमीज ख़ून से भीग गयी थी। हंगल साहब कहते थे, ‘वह ख़ून सभी का था- हिंदू, मुस्लिम, सिख सबका मिला हुआ खून!’ छात्र जीवन से ही वे बड़े क्रांतिकारियों की मदद में जुट गये थे। बाद में उन्हें अंग्रेजों ने तीन साल तक जेल में भी रखा, फिर भी वे अपने इरादे से नहीं डिगे

ए.के. हंगल 50 वर्ष की उम्र में हिंदी सिनेमा में आए। उन्होंने 1966 में बासु चटर्जी की फ़िल्म 'तीसरी कसम' और 'शागिर्द' में काम किया। इसके बाद उन्होंने सिद्घांतवादी भूमिकाएँ निभाई। 70, 80 और 90 के दशकों में उन्होंने प्रमुख फ़िल्मों में पिता या अंकल की भूमिका निभाई। हंगल ने फ़िल्म शोले में रहीम चाचा (इमाम साहब) और 'शौकीन' के इंदर साहब के किरदार से अपने अभिनय की छाप छोड़ी। इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के साथ बढ़-चढ़कर काम करने वाले हंगल ने 139 से अधिक फिल्‍मों में अपने अभिनय कौशल का लोहा मनवाया है। इनके प्रमुख रोल फ़िल्म 'नमक हराम', शौकीन, शोले, आईना, अवतार, अर्जुन, आंधी, तपस्या, कोरा कागज, बावर्ची, छुपा रुस्तम, चितचोर, बालिका वधू, गुड्डी, नरम-गरम में रहे। इनके बाद के समय में यादगार किरदारों में वर्ष 2002 में शरारत, 1997 में तेरे मेरे सपने और 2005 में आमिर खान के साथ लगान में नज़र आए थे।


वर्ष 2006 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण से नवाजा।


टीवी सीरियल में उपस्थिति

1997 में बॉम्बे ब्लू
1998 में जीवन रेखा
1986 में मास्टरपीस थिएटर : लार्ड माउंटबेटन
1996 में चंद्रकांता
1993-94 में जबान संभाल के में छोटी भूमिका
2004-05 में होटल किंग्सटन में छोटी भूमिका
2012 में धारावाहिक कलर्स चैनल के धारावाहिक मधुबाला में विशेष उपस्थित

हंगल लम्बे समय से बुढ़ापे की बीमारियों से पीड़ित रहे। बॉलीवुड के सबसे वयोवृद्ध अभिनेता ए. के. हंगल का 26 अगस्त 2012 को सुबह नौ बजे के क़रीब मुंबई के आशा पारेख अस्पताल में निधन हो गया था। 95 साल के हंगल को 16 अगस्त को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 13 अगस्त को हंगल गिर गए थे। पीठ में चोट लगने और कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनकी सर्जरी हुई। सर्जरी होने के बावजूद उनती सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ। बाद में पता चला कि उन्हें सीने में दर्द और सास लेने में तकलीफ़ है। इसके बाद उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया, लेकिन उनकी सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ।

दीपक देव कोहली


🎂2 नवंबर 1942
⚰️26अगस्त

जाने-माने गीतकार देव कोहली नहीं रहे। अफ़सोस, बहुत सारे गीतकारों को हम उनके गानों के ज़रिए नहीं पहचानते। इसलिए मुझे ये लिखना पड़ रहा है कि ये वही देव कोहली हैं जिन्‍होंने लिखा था—‘दीदी तेरा देवर दीवाना/ हाय राम चिडियों को डाले दाना’ और हम दीवानों की तरह इस गाने को गुनगुनाते या सुनते नहीं थकते थे। देव कोहली का हक़ है कि उन्‍हें हम उनके उन गानों के ज़रिए पहचानें जिन्‍हें हमने ख़ूब सराहा है और जिन्‍होंने ज़िंदगी के बड़े हसीन लम्‍हे साझा किये हैं। नब्‍बे के दशक में कौन होगा जिसने ‘आते-जाते हंसते गाते, सोचा था मैंने कई बार’ नहीं गाया होगा। भला कौन होगा जिसने नाइंटीज़ में सलमान भाई का ‘पहला पहला प्‍यार है/पहली-पहली बार है’ गाकर किसी को यक़ीन ना दिलाया होगा कि सचमुच उस जैसा दीवाना कोई नहीं है। 
प्‍यारे दोस्‍त सुनील करमेले Suneel R. Karmele जैसे लोगों की तो ज़िंदगी बन गयी थी देव कोहली के गाने ‘दीदी तेरा देवर दीवाना’ से। हम गवाह हैं इस बात के। उन्‍होंने ‘माई नी माई मुंडेर पे तेरी बोल रहा है कागा’ भी लिखा जिस पर जाने कितनी लड़कियां कॉलेज के एनुअल डे के दिन मेंडोलिन की तरंग पर थिरकीं और इस गाने की आगे की लाइन ‘चन माहिया मेरे डोल सिपाहिया’ पर उन्‍होंने तालियां बटोरीं। 
यही देव कोहली चुपके से चले गये। 
बता दूं कि ‘वादा रहा सनम’ (खिलाड़ी), ‘ये काली काली आंखें’ (बाज़ीगर) और ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू’ (मिस्‍टर एंड मिसेज खिलाड़ी) भी देव साहब लिखते रहे। पर उन्‍होंने हंसराज हंस वाला ‘देस नूं चलो’ (23 मार्च 1931 शहीद भगत सिंह) भी लिखा। 
भूलना नहीं चाहिए कि 1971 में आई फ़िल्‍म ‘लाल पत्‍थर’ का गाना ‘गीत गाता हूं मैं गुनगुनाता हूं मैं’ भी देव कोहली की कलम का कमाल था। 
फिर भी नाइंटीज़ को लालों!!!! 
फिल्म संगीत के कद्रदानो!!!
देव कोहली को नमन करना बनता है भाई। वो बड़े गीतकार थे। 

शुभाखोटे

शुभा खोटे और विजू खोटे भाई बहन 
फ़िल्म अभिनेत्री शुभा खोटे के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
भाई: विजू खोटे
माता-पिता: नंदू खोटे
बच्चे: भावना बलसावर, अश्विन बलसावर
पति: डी॰ एम॰ बलसावर (विवा. 1960)

शुभा खोटे 
 🎂जन्म 30 अगस्त 1936
एक भारतीय फिल्म और टेलीविजन अभिनेत्री हैं।  वह तैराकी और साइकिलिंग में पूर्व महिला राष्ट्रीय चैंपियन भी हैं।

शुभा खोटे का जन्म मराठी-कोंकणी परिवार में हुआ था उनके पिता नंदू खोटे मराठी थियेटर में काम करते थे उनकी माँ कोंकणी थी जो कर्नाटक के मैंगलोर की रहने वाली थी  अभिनेता विजू खोटे उनके छोटे भाई थे।अनुभवी अभिनेत्री दुर्गा खोटे शुभा के पिता के चचेरे भाई की पत्नी थीं।  शुभा के मामा नयामपल्ली भी एक अभिनेता थे।

शुभा खोटे ने सेंट टेरेसा हाई स्कूल, चर्नी रोड और सेंट कोलंबिया स्कूल (गमदेवी) से पढ़ाई की।  एक लड़की के रूप में, उन्होंने तैराकी और साइकिलिंग में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, और एक ऐसे युग में जब बहुत कम महिलाओं ने इस तरह के खेलों में भाग लिया, वह लगातार तीन वर्षों, 1952-55 में तैराकी और साइकिलिंग में महिला राष्ट्रीय चैंपियन थीं।  स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने विल्सन कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक किया।

शुभा की शादी डी एम बलसावर से हुई है, जो (शुभा की मां की तरह) मैंगलोर से हैं।  वह एक प्रमुख भारतीय कॉरपोरेट नोसिल में मार्केटिंग के उपाध्यक्ष थे। वह मराठी फिल्म चिमुकला पाहुना (1968) में एक कैमियो में दिखाई दिए, जिसका उन्होंने निर्माण और निर्देशन भी किया। उनकी बेटी भावना बलसावर भी एक टीवी अभिनेत्री हैं।

उन्होंने 4 साल की उम्र में बाल कलाकार के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत फ़िल्म सीमा (1955) से की उसमे उनके चरित्र का नाम पुतली था उनकी अच्छी साइकिलिंग ने उसे व्यापक रूप से पहचान दिलाई उस के बाद उन्होंने बड़ी संख्या में हिंदी और मराठी फिल्मों, स्टेज शो और टीवी धारावाहिकों में अभिनय किया है।  उन्होंने ज्यादातर महमूद के साथ अभिनय किया और यह जोड़ी ससुराल, भरोसा, ज़िद्दी, छोटी बहन, सांझ और सवेरा, लव इन टोक्यो, गृहस्थी हमराही और बेटी बेटे में हिट हुई।  उन्होंने फ़िल्म पेइंग गेस्ट और एक दूजे के लिए में नकारात्मक भूमिकाएँ निभाईं।  1962 में, 9 वें फिल्मफेयर पुरस्कारों में, उन्हें घराना और ससुराल के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए दो नामांकन प्राप्त हुए, हालांकि वह निरूपा रॉय से हार गईं। 

उन्होंने हेरा फेरी, हम दोनो, बैचलर्स वाइफ और लेट्स डू इट (2000) जैसे कॉमेडी नाटकों का निर्देशन किया है  उनकी होम प्रोडक्शन बैचलर्स वाइव्स  ने मुंबई और औरंगाबाद में 40 से अधिक प्रदर्शन किए।  उनका टीवी शो ज़बान संभाल के (माइंड योर लैंग्वेज सीरीज़ पर आधारित) एक बड़ी हिट थी। 

नामांकित - सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार - घराना (1962)

नामांकित - सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार - ससुराल (1962)

वर्ष फ़िल्म चरित्र
2005 ज़मीर
2004 घर गृहस्थी
2003 मैं प्रेम की दीवानी हूँ
2002 शरारत
1999 मदर
1999 सिर्फ तुम अम्मा
1998 महाराजा
1997 परदेश
1997 तराज़ू
1994 साजन का घर
1994 संगदिल सनम विमला
1993 वक्त हमारा है
1992 जुनून
1992 एक लड़का एक लड़की
1991 दिल है कि मानता नहीं
1991 कर्ज़ चुकाना है श्रीमती धनिराम
1990 जवानी ज़िन्दाबाद
1990 किशन कन्हैया लीला
1990 वर्दी
1989 दो कैदी
1989 दोस्त
1989 तेरी पायल मेरे गीत
1988 सोने पे सुहागा
1987 प्यार के काबिल
1987 हिफ़ाज़त
1987 हिम्मत और मेहनत सोना की माँ
1986 बेटी गणिका
1986 प्यार के दो पल
1986 तीसरा किनारा
1986 भगवान दादा
1986 स्वर्ग से सुन्दर
1986 सदा सुहागन
1985 उल्टा सीधा
1985 महागुरु
1985 आखिर क्यों?
1985 मोहब्बत
1985 दो दिलों की दास्तान
1985 हम दोनों
1985 बलिदान
1985 महक
1985 हकीकत
1984 ज़िन्दगी जीने के लिये
1984 रक्षा बंधन भोला की माँ
1984 आज का एम एल ए राम अवतार
1984 मेरा फैसला
1983 मैं आवारा हूँ
1983 पु्कार
1983 मुझे इंसाफ चाहिये
1983 कुली
1983 बंधन कच्चे धागों का
1982 तुम्हारे बिना
1982 कच्चे हीरे शोभा
1982 सुन सजना
1981 एक दूजे के लिये
1979 गोल माल
1979 हमारे तुम्हारे
1979 नैया
1978 बदलते रिश्ते
1975 मिली
1975 मज़ाक
1975 धोती लोटा और चौपाटी
1974 पॉकेटमार
1974 बेनाम
1974 कसौटी
1973 आ गले लग जा
1966 लव इन टोक्यो शीला
1966 पिकनिक
1965 आकाशदीप
1965 बेदाग
1964 फूलों की सेज
1964 ज़िद्दी
1964 बेटी बेटे
1963 भरोसा
1963 दिल एक मन्दिर
1963 गृहस्थी
1962 दिल तेरा दीवाना माल्ती
1961 संजोग
1961 काँच की गुड़िया
1961 घराना
1961 ससुराल सीता
1961 सुहाग सिन्दूर
1960 कानून
1959 दीदी
1959 अर्द्धांगिनी
1959 नई राहें
1959 अनाड़ी आशा
1957 पेइंग गेस्ट चंचल
1956 एक शोला
1955 सीमा

मंगलवार, 29 अगस्त 2023

राजबीर सिंह

राजवीर सिंह
जन्म 30 अगस्त
पठानकोट , पंजाब, भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
व्यवसायों
अभिनेता
सिंह ने टेलीविजन पर अपना डेब्यू स्टार प्लस के रियलिटी शो परफेक्ट ब्राइड से किया । उन्होंने रिश्ता .कम पर एक एपिसोडिक भूमिका भी निभाई । 2013 से 2014 तक, सिंह ने लाइफ ओके सीरीज़ द एडवेंचर्स ऑफ हातिम में हातिम की मुख्य भूमिका निभाई ।  इसके बाद उन्होंने अगस्त 2015 से नवंबर 2015 तक ज़ी टीवी के क़ुबूल है सीज़न 4 में मुख्य पुरुष आज़ाद की भूमिका निभाई। क़ुबूल है में, सिंह ने महिला प्रधान के विपरीत एक आधे-पिशाच की भूमिका निभाई।

फिल्में

2011 वहाँ कौन है?
2016 इश्क जुनून
2016 क्लब डांसर

गुरु रंधावा

गुरशरणजोत सिंह रंधावा
जन्म
🎂30 अगस्त 1991
नूरपुर, गुरदासपुर जिला, पंजाब, भारत
विधायें
भांगड़ा इंडी-पॉप बॉलीवुड नृत्य
पेशा
गायक गीतकार संगीतकार
रंधावा का जन्म नूरपुर, डेरा बाबा नानक तहसील गुरदासपुर जिले में गुरशरणजोत सिंह रंधावा के रूप में हुआ था। उन्होंने गुरदासपुर में छोटे-छोटे शो करके शुरुआत की और फिर दिल्ली में छोटे दलों और समारोहों में प्रदर्शन करना शुरू कर दिया।दिल्ली में रहते हुए, रंधावा ने अपना एमबीए पूरा किया।रैपर बोहेमिया द्वारा उन्हें "गुरु" नाम दिया गया, जो मंच पर रहते हुए उनका पूरा नाम छोटा कर देते थे।
उन्होंने यूट्यूब पर अर्जुन के साथ "सेम गर्ल" नाम से अपना पहला गाना गाया, जो रंधावा को अपने वीडियो में लेने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने 2017 इंडियन प्रीमियर लीग उद्घाटन समारोह में गाया।उन्होंने हिंदी मीडियम (2017) से बॉलीवुड गायन में अपनी शुरुआत की।उनके कई गाने फिल्मों में दिखाई दिए हैं। 2018 में, वह सलमान खान के दबंग रीलोडेड टूर का हिस्सा बने।

उनके सबसे ज्यादा देखे जाने वाले गीत "हाई रेटेड गबरू" और "लाहौर" को यूट्यूब पर 823 और 785 मिलियन से अधिक बार देखा गया है।उनका पहला अंतर्राष्ट्रीय सहकार्यता पिटबुल के साथ 19 अप्रैल 2019 को रिलीज हुई "स्लोली स्लोली" है। इस गाने के म्यूजिक वीडियो को 24 घंटे के भीतर यूट्यूब पर 38 मिलियन व्यूज मिले, जो दुनिया के 24 घंटे में सबसे अधिक देखे जाने वाले म्यूजिक वीडियो में से एक बन गया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...