मंगलवार, 29 अगस्त 2023

गंगा प्रसाद श्रीवास्ता

गंगा प्रसाद श्रीवास्तव
अन्य नाम गंगा बाबू
🎂जन्म 23 अप्रैल, 1889 ई.
जन्म भूमि सारन, बिहार
⚰️मृत्यु 30 अगस्त, 1976 ई.
कर्म-क्षेत्र साहित्यकार
मुख्य रचनाएँ 'लम्बी दाढ़ी' (1913 ई.), 'नाक झोक' (1919 ई.) आदि।
भाषा हिन्दी
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी गंगा बाबू को ‘साहित्य वारिधि’ व ‘साहित्य महारथी’ जैसे अलंकरण से विभूषित किया गया।
गंगा प्रसाद श्रीवास्तव 
जन्म- 23 अप्रैल, 1889, सारन, बिहार; मृत्यु- 30 अगस्त, 1976
हिन्दी साहित्यकार थे। गंगा प्रसाद अच्छे कथाकार, कहानीकार के अलावा एक बेहतर अभिनेता भी थे। 
कई नाटकों में उन्होंने सशक्त अभिनय किया है। 
उस दौरान श्रीवास्तव जी एकांकी के सशक्त अभिनेता थे। सरलता एवं अभिनय के गुण से परिपक्व, एकांकी लिखने में माहिर गंगा बाबू का नाम हिंदी के शुरुआती एकांकीकार के रूप में जाना जाता है। गंगा बाबू को ‘साहित्य वारिधि’ व ‘साहित्य महारथी’ जैसे अलंकरण से विभूषित किया गया।

परिचय
गंगा प्रसाद श्रीवास्तव का जन्म 23 अप्रैल, 1889 ई. को छपरा, ज़िला सारन, बिहार प्रांत में हुआ था। हिन्दी के हास्य रस के लेखकों में इनका प्रमुख स्थान है। जी. पी. श्रीवास्तव का पूरा नाम गंगा प्रसाद श्रीवास्तव है। किंतु हिन्दी के पाठकों में जी. पी. श्रीवास्तव के नाम से ही प्रसिद्ध हैं।

शिक्षा
गंगा प्रसाद जी ने प्रयाग विश्वविद्यालय से बी. ए., एल-एल. बी. की परीक्षा पास करके गोण्डा ज़िला में वकालत की।

भाषा शैली
गंगा प्रसाद जी का हिन्दी के हास्य रस के लेखकों में प्रमुख स्थान है। हास्य रस की जिस परम्परा को भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'अन्धेर नगरी चौपट राजा' में स्थापित किया था, इन्होंने हास्य को उसी दिशा में विकसित किया है। गंगा प्रसाद जी की प्रतिभा प्राय: सभी विधाओं में समान रूप से व्यक्त हुई है। नाटक, उपन्यास, कहानी, कविता एवं शुद्ध परिकल्पना के आधार पर गल्प भी इन्होंने लिखे हैं।

कृतियाँ
गंगा प्रसाद जी की कुल मिलाकर अब तक बाईस पुस्तकें प्रकाश में आ चुकी हैं। आपकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं-

कहानी संग्रह 'लम्बी दाढ़ी' 1913 ई. में प्रकाशित हुई।
नाटक 'उलट फेर' 1918 ई. को प्रकाशित हुआ।
काव्यसंग्रह 'नाक झोक' 1919 ई. प्रकाश में आया।
1931 ई. में गंगा प्रसाद जी का प्रथम उपन्यास 'लतखोरी लाल' प्रकाशित हुआ जो आप के समय में बहुचर्चित उपन्यास रहा।
1932 में दूसरा उपन्यास 'दिल की आग उर्फ दिल जले की आग' प्रकाशित हुआ।
1953 में इनका एक नाटक 'बौछार' के नाम से प्रकाशित हुआ था।
निधन
गंगा प्रसाद श्रीवास्तव की मृत्यु 30 अगस्त 1976 ई. को हुई थी।

चित्रांगदा सिंह

चित्रंगदा सिंह रंधावा, हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री हैं। वह 2005 में बनी फ़िल्म हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी में गीता राव की भूमिका अदा करने के लिए जानी जाती है। उनकी शादी भारतीय गोल्फ़ खिलाडी ज्योति रंधावा से हो चुकी है। चित्रांगदा चहल का जन्म राजस्थान के जोधपुर में हुआ था। 

🎂जन्म की तारीख और समय: 30 अगस्त 1976  जोधपुर
पति: ज्योति रंधावा (विवा. 2001–2014)
बच्चे: ज़ोरावर रंधावा
माता-पिता: निरंजन सिंह
भाई: दिग्विजय सिंह, टीना सिंह

2003 हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी गीता राव 
2005 कल: यैस्टर्डे एंड टुमॉरो भावना वी दयाल 
2008 सौरी भाई ! आलियाह 
2010 बसरा अंतरा मित्रा/अन्ना परेरा 
2011 ये साली जिन्दगी प्रीती 
2011 देसी बॉयज तान्या शर्मा 
2012 जोकर स्वयं "काफिराना" गाने में विशेष उपस्थिति
2013 इनकार माया लुथरा 
2013 आय, मी और मैं अनुष्का लाल

अभिनेत्री जमुना

जमुना अभिनेत्री
पुराने जमाने की अभिनेत्री
🎂जन्म की तारीख और समय: 30 अगस्त 1936, हम्पी
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 27 जनवरी 2023
पति: जुलुरी रमना राव (विवा. 1965–2014)
बच्चे: स्रवनती राव, वामसीकृष्णा राव, श्रावंती जुलुरी
माता-पिता: निप्पनी श्रीनिवास राव, कौसल्या देवी
जमुना का जन्म वर्तमान कर्नाटक के हम्पी में कन्नड़ भाषी निप्पानी श्रीनिवास राव और तेलुगु भाषी कौसल्या देवी के घर हुआ था और उनका नाम जना बाई रखा गया था। उनके पिता माधव ब्राह्मण थे , जबकि उनकी मां वैश्य थीं , जिसके परिणामस्वरूप अंतरजातीय प्रेम विवाह हुआ ।जमुना आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के दुग्गीराला में पली बढ़ीं । उनके पिता हल्दी और तंबाकू के व्यवसाय से जुड़े थे और जब वह सात साल की थीं, तब उनका परिवार वहां चला गया।जब सवित्री दुग्गीराला में नाटक कर रही थी, वह जमुना के घर पर रहेगी। बाद में, सावित्री ने जमुना को फिल्मों में अभिनय करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने 16 साल की उम्र में फिल्मों में नायिका के रूप में अभिनय करना शुरू कर दिया था।
जमुना स्कूल में एक स्टेज कलाकार थीं। उनकी माँ ने उन्हें स्वर संगीत और हारमोनियम सिखाया । 1952 में, इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन के डॉ. गरीकिपति राजा राव ने उनका स्टेज शो माँ भूमि देखा और उन्हें अपनी फिल्म पुत्तिलु में एक भूमिका की पेशकश की।

जमुना ने तेलुगु और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं की 198 फिल्मों में अभिनय किया । उन्होंने मूल तेलुगु फिल्म मूगा मनासुलु (1964) में अपनी भूमिका को दोहराते हुए, मिलान (1967) के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीतकर, हिंदी फिल्मों में भी अभिनय किया।

जमुना ने तेलुगु कलाकार संघ की भी स्थापना की और इसके माध्यम से 25 वर्षों तक सामाजिक सेवाएं प्रदान कीं।
जमुना 1980 के दशक में कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गईं और 1989 में राजमुंदरी निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुनी गईं। वह 1991 का चुनाव हार गईं और राजनीति छोड़ दीं, लेकिन 1990 के दशक के अंत में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान कुछ समय के लिए भाजपा के लिए प्रचार किया।

उन्हों ने अवार्ड जीते

1968: सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - मिलान
1972: फ़िल्मफ़ेयर विशेष पुरस्कार - दक्षिण  पांडंती कपूरम
1999: तमिलनाडु राज्य फ़िल्म मानद पुरस्कार - एमजीआर पुरस्कार
2008: एनटीआर राष्ट्रीय पुरस्कार
2010: पद्मभूषण डॉ. बी. सरोजादेवी राष्ट्रीय पुरस्कार 
2019: 17वें संतोषम फिल्म अवार्ड्स में संतोषम लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड

उनकी हिंदी फिल्में

मिस मैरी (1957)
रामू दादा (1961)
एक राज़ (1963)
हमराही (1963)
बेटी बेटे (1964)
रिश्ते नाते (1965)
मिलन (1967) (फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार)
दुल्हन (1975)
नौकर बीवी का (1983)
राज तिलक (1984)

मृत्यु

1965 में जमुना ने एसवी विश्वविद्यालय में प्राणीशास्त्र के प्रोफेसर जुलुरी रमना राव से शादी की ; 10 नवंबर 2014 को 86 साल की उम्र में कार्डियक अरेस्ट से उनकी मृत्यु हो गई। उनका एक बेटा, वामसी जुलुरी और एक बेटी, श्रावंती जुलुरी थी , और वे हैदराबाद , तेलंगाना , भारत में रहते थे।

जमुना का 86 वर्ष की आयु में 27 जनवरी 2023 को हैदराबाद में उनके घर पर निधन हो गया

शेलेंदर

शंकरदास केसरीलाल
प्रसिद्ध नाम शैलेन्द्र
🎂जन्म 30 अगस्त, 1923
जन्म भूमि रावलपिंडी (पाकिस्तान)
⚰️मृत्यु 14 दिसंबर 1966
मृत्यु स्थान मुंबई
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गीतकार, कवि
मुख्य रचनाएँ 'सब कुछ सीखा हमने...', 'रमैया वस्तावैया...', 'मेरा जूता है जापानी...' आदि।
पुरस्कार-उपाधि तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी गीतकार शैलेंद्र ने राजकपूर और वहीदा रहमान द्वारा अभिनीत 'तीसरी कसम' फ़िल्म का निर्माण भी किया था।

शैलेन्द्र  
Disamb2.jpg शैलेन्द्र एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- शैलेन्द्र (बहुविकल्पी)
शैलेन्द्र
शैलेन्द्र
पूरा नाम शंकरदास केसरीलाल
प्रसिद्ध नाम शैलेन्द्र
जन्म 30 अगस्त, 1923
जन्म भूमि रावलपिंडी (पाकिस्तान)
मृत्यु 14 दिसंबर 1966
मृत्यु स्थान मुंबई
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गीतकार, कवि
मुख्य रचनाएँ 'सब कुछ सीखा हमने...', 'रमैया वस्तावैया...', 'मेरा जूता है जापानी...' आदि।
पुरस्कार-उपाधि तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी गीतकार शैलेंद्र ने राजकपूर और वहीदा रहमान द्वारा अभिनीत 'तीसरी कसम' फ़िल्म का निर्माण भी किया था।
शंकरदास केसरीलाल (अंग्रेज़ी: Shankardas Kesarilal, प्रसिद्ध नाम- 'शैलेन्द्र, जन्म: 30 अगस्त, 1923 रावलपिंडी, (पाकिस्तान); मृत्यु: 14 दिसंबर, 1966 मुंबई) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार थे। ‘होठों पर सच्चाई रहती है, दिल में सफाई रहती है', 'मेरा जूता है जापानी,' ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ जैसे दर्जनों यादगार फ़िल्मी गीतों के जनक शैलेंद्र ने महान् अभिनेता और फ़िल्म निर्माता राज कपूर के साथ बहुत काम किया

आरंभिक जीवन

शैलेन्द्र जी के पिता फ़ौज में थे। बिहार के रहने वाले थे। पिता के रिटायर होने पर मथुरा में रहे, वहीं शिक्षा पायी। घर में भी उर्दू और फ़ारसी का रिवाज था, लेकिन शैलेन्द्र की रुचि घर से कुछ भिन्न ही रही। हाईस्कूल से ही राष्ट्रीय ख़याल थे। सन 1942 में बंबई रेलवे में इंजीनियरिंग सीखने गये। अगस्त आंदोलन में जेल भी गये। लेकिन कविता का शौक़ बना रहा।

बाल्यकाल

किसी ज़माने में मथुरा रेलवे कर्मचारियों की कॉलोनी रही धौली प्याऊ की गली में गंगासिंह के उस छोटे से मकान की पहचान सिर्फ बाबूलाल को है जिसमें शैलेन्द्र अपने भाईयों के साथ रहते थे। सभी भाई रेलवे में थे। बड़े भाई बी.डी. राव, शैलेन्द्र को पढ़ा-लिखा रहे थे। बाबू लाल के अनुसार, मथुरा के 'राजकीय इंटर कॉलेज' में हाईस्कूल में शैलेन्द्र ने पूरे उत्तर प्रदेश में तीसरा स्थान प्राप्त किया। वह बात 1939 की है। तब वे 16 साल के थे। के.आर. इंटर कॉलेज में आयोजित अंताक्षरी प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे और खूब ईनाम जीतते थे। इसके बाद शैलेन्द्र ने रेलवे वर्कशाप में नौकरी कर ली। बाबूलाल भी रेलवे में लग गए। कुछ दिन मथुरा रहकर शैलेन्द्र का तबादला माटुंगा हो गया।

कैरियर की शुरूआत

अगस्त सन् 1947 में श्री राज कपूर एक कवि सम्मेलन में शैलेन्द्र जी को पढ़ते देखकर प्रभावित हुए। और फ़िल्म 'आग' में लिखने के लिए कहा किन्तु शैलेन्द्र जी को फ़िल्मी लोगों से घृणा थी। सन् 1948 में शादी के बाद कम आमदनी से घर चलाना मुश्किल हो गया।इसलिए श्री राज कपूर के पास गये। उन दिनों राजकपूर बरसात फ़िल्म की तैयारी में जुटे थे। तय वक्त पर शैलेन्द्र राजकपूर से मिलने घर से निकले तो घनघोर बारिश होने लगी। क़दम बढ़ाते और भीगते शैलेन्द्र के होंठों पर ‘बरसात में तुम से मिले हम सनम’ गीत ने अनायास ही जन्म ले लिया। अपने दस गीत सौंपने से पहले शैलेन्द्र ने इस नए गीत को राजकपूर को सुनाया। राजकपूर ने शैलेन्द्र को सीने से लगा लिया। दसों गीतों का पचास हज़ार रुपये पारिश्रमिक उन्होंने शैलेन्द्र को दिया। नया गीत बरसात का टाइटिल गीत बना गीत चले, फिर क्या था, उसके बाद शैलेन्द्र जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

संवेदनशील गीतकार

सरल और सटीक शब्दों में भावनाओं और संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर देना शैलेन्द्र जी की महान् विशेषता थी। 'किसी के आँसुओं में मुस्कुराने' जैसा विचार केवल शैलेन्द्र जैसे गीतकार के संवेदनशील हृदय में आ सकता है। उनकी संवेदना का एक उदाहरण देखिये -

“कल तेरे सपने पराये भी होंगे, लेकिन झलक मेरी आँखों में होगी
फूलों की डोली में होगी तू रुख़सत, लेकिन महक मेरी साँसों में होगी…..”

शायद कभी प्यार की राह में कभी ऐसे गिरे रहे होंगे वे कि फिर कभी संभल नहीं पाये। इसीलिये वे लिखते हैं-
“सहज है सीधी राह पे चलना, देख के उलझन, बच के निकलना
कोई ये चाहे माने न माने, बहुत है मुश्किल गिर के संभलना…..”

फ़िल्मों में गीत लिखने के पहले देश के आजादी की लड़ाई में योगदान देने का उनका एक अलग ही तरीका रहा है। वे उस समय देशभक्ति से सराबोर वीररस की कविताएँ लिखा करते थे और उन्हें जोशोखरोश के साथ सुनाकर सुनने वालों को देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत कर दिया करते थे, परिणामस्वरूप देश के आजादी के वीरों का बहुत अधिक उत्साहवर्धन होता था। उनकी रचना ‘जलता है पंजाब……’ ने उन दिनों बहुत प्रसिद्धि पाई। फ़िल्मों में आने के बाद भी उनका ये जज़्बा बना ही रहा इसीलिये वे ग़रीब भारतीय की अभिव्यक्ति इन शब्दों में करते हैं -
“मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी
सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी…..”

एक हिंदुस्तानी स्त्री की भावनाओं का कितना सुंदर प्रदर्शन करते हैं वे अपने इस गीत में-
“तन सौंप दिया, मन सौंप दिया, कुछ और तो मेरे पास नहीं
जो तुम से है मेरे हमदम, भगवान से भी वो आस नहीं…..”

शैलेंद्र के प्रसिद्ध गीत
क्रम गीत फ़िल्म नाम
1- आवारा हूँ आवारा
2- रमैया वस्तावैया श्री 420
3- दिल के झरोखे में तुझको बिठा कर ब्रह्मचारी
4- मुड मुड के ना देख मुड मुड के श्री 420
5- मेरा जूता है जापानी श्री 420
6- आज फिर जीने की गाईड
7- गाता रहे मेरा दिल गाईड
8- पिया तोसे नैना लागे रे गाईड
9- खोया खोया चांद काला बाज़ार
10- हर दिल जो प्यार करेगा संगम
11- दोस्त दोस्त ना रहा संगम
12- सब कुछ सीखा हमने अनाडी
13- किसी की मुस्कराहटों पे अनाडी
14- दिल की नज़र से अनाडी
15- अजीब दास्तां है ये, कहाँ शुरू कहा खतम दिल अपना और प्रीत परायी

गीतकार से बने निर्माता

कम लोग ये जानते होंगे कि शैलेंद्र ने राजकपूर अभिनीत 'तीसरी कसम' फ़िल्म का निर्माण किया था। दरअसल, शैलेन्द्र को फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफाम' बहुत पसंद आई। उन्होंने गीतकार के साथ निर्माता बनने की ठानी। राजकपूर और वहीदा रहमान को लेकर 'तीसरी कसम' बना डाली। खुद की सारी दौलत और मित्रों से उधार की भारी रकम फ़िल्म पर झोंक दी। फ़िल्म डूब गई। कर्ज़ से लद गए शैलेन्द्र बीमार हो गए। यह 1966 की बात है। अस्पताल में भरती हुए। तब वे ‘जाने कहां गए वो दिन, कहते थे तेरी याद में, नजरों को हम बिछायेंगे’ गीत की रचना में लगे थे। शैलेन्द्र ने राजकपूर से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। वे बीमारी में भी आर. के. स्टूडियो की ओर चले। रास्ते में उन्होंने दम तोड़ दिया। यह दिन 14 दिसंबर 1966 का था। मौके की बात है कि इसी दिन राजकपूर का जन्म हुआ था। शैलेन्द्र को नहीं मालूम था कि मौत के बाद उनकी फ़िल्म हिट होगी और उसे पुरस्कार मिलेगा।

सम्मान और पुरस्कार
शैलेन्द्र जी को तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था, जो निम्न प्रकार है-

1958 में 'ये मेरा दीवानापन है...' (फ़िल्म- यहूदी) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
1959 में 'सब कुछ सीखा हमने...' (फ़िल्म- अनाडी) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
1968 में 'मै गाऊं तुम सो जाओ...' (फ़िल्म- ब्रह्मचारी) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
⚰️निधन
14 दिसंबर, 1966 को बीमार शैलेन्द्र राजकपूर से मिलने आर.के. स्टूडियो की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने दम तोड़ दिया। काल के गाल में एक दिन जाना तो सभी को होता है पर शैलेन्द्र जैसे गीतकार के चले जाने से भारतीय सिनेमा में आया ख़ालीपन कभी भी न भर पायेगा। ये जानते हुये भी कि उनके लिखे इन शब्दों का सच होना असंभव है, चलिये एक बार दुहरा लेते हैं उनके उन असंभव शब्दों को -

“ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना…..”

जय श्री गडकरी

🎂जन्म की तारीख और समय: 21 फ़रवरी 1942, कारवार
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 29 अगस्त 2008, मुंबई
पति:  बाल धुरी(विवा. 1975–2008)
अभिनेत्री जयश्री गोडकर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
 
सन 1950 से 1980 के दशक तक मराठी और हिंदी सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री जयश्री गडकर का जन्म 21 फरवरी 1942 को कारवार, कर्नाटक में एक कोंकणी भाषी परिवार हुआ था । जयश्री ने रामानंद की रामायण से  कौशल्या की भूमिका निभाई थी जिसने जयश्री को सम्मान, गौरव, लोकप्रियता के साथ-साथ जीवनसाथी भी मिला यानि रामायण में दशरथ का किरदार निभाने वाले “बाल धुरी” के साथ वह शादी के बंधन में बंध गईं।  उनकी प्रतिभा, नृत्य कौशल और सौंदर्य के सभी कायल थे।राजश्री ने फिल्म ‘तमाशा’ में बाल नृत्य कलाकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी, व्ही. शांताराम की ‘झनक झनक पायल’ बाजे में उन्होंने एक समूह नर्तकी के रूप में अपने नृत्य कौशल का प्रदर्शन किया था। 29  अगस्त 2008  को  जयश्रीजी का निधन हो गया

N.A अंसारी


🎂जन्म की तारीख और समय: 29 अगस्त 1917, झांसी
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 11 जनवरी 1993,पोर्ट कोलबोर्न कनाडा
आकर्षक व्यक्तित्व भावहीन चेहरा सामने वाले को भेदती आँखे कुल मिलाकर एक खलनायक की सारी खूबियां लेकिन निसार अहमद अंसारी का इतना सा परिचय नही है दो दशक तक रहस्य और अपराध के कथानक पर बनी हिंदी फिल्मों में एक लेखक एक निर्देशक के तौर पर भी उनका अहम योगदान रहा है
निसार अहमद अंसारी फिल्मों में एन ए अंसारी और अंसारी के नाम से पहचाने गये
29 अगस्त 1917 को उनका जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी में हुआ था अंग्रेजी में एम ए करने के बाद 1939 में अंसारी अपने एक रिश्तेदार से मिलने बम्बई पहुँचे यह शहर उन्हें इतना भा गया कि वही बसने को योजना बनाने लगे सिनेमा के रोमांच में जकड़े जा चुके अंसारी को मुम्बई में आसानी से विदेशी फिल्में देखने का मौका मिल रहा था और वे उसे छोड़ना नही चाहते थे
यह महज एक इत्तेफाक था कि एक दिन अंसारी की फिल्मकार महबूब से विस्तार से मुलाकात हो गयी महबूब उन दिनों अपनी फिल्म औरत बनाने की तैयारी कर रहे थे
महबूब उनसे प्रभावित हुए और औरत में एक छोटा सा रोल दे दिया (1943 )महबूब खान ने नजमा फ़िल्म बनाई इसमे भी अंसारी को एक अहम रोल मिला बचपन से ही जासूसी साहित्य के दीवाने अंसारी को को लगता था कि जासूसी कहानियों पर जैसी फिल्में बन सकती है वैसी बन नही रही है तभी अंसारी की अभिनेता शेख मुख्तार से दोस्ती हो गयी 1956 में शेख मुख्तार ने फ़िल्म मिस्टर लंबू बनाई जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी अंसारी को सौंप दी अंसारी ने मिस्टर लंबू में एक अहम रोल भी अदा किया
इस फ़िल्म की सफलता ने अंसारी को एक निर्देशक के तौर पर स्थापित कर दिया उनके निर्देशन में अगली फिल्म थी मंगू जो 1954 में बनी थी मगर अंसारी को अगली फिल्म का निर्देशन करने में पांच साल का इंतेज़ार का करना पड़ा  इस बीच वे फिल्मों में अभिनय जरूर करते रहे (1959) में जी पी सिप्पी ने फ़िल्म ब्लैक कैट के लिए अंसारी को कहानी लेखक एवं निर्देशक के तौर पर साइन किया
इसके बाद वांटेड (1961)और टावर हाउस (1962) अंसारी की लिखी कहानियों पर आधारित और उनके ही निर्देशन में बनी वे फिल्में थी जो अपने समय मे काफी चर्चित रही
अब अंसारी को लग रहा रहा कि उन्हें भी फ़िल्म निर्माण में हाथ डालना चाहिये उन्होंने बुंदेलखंड फ़िल्म नाम से अपनी कम्पनी खड़ी की और उसके तहत पहली फ़िल्म बनाई मुलजिम (1963) लेकिन अगली तीन फिल्में ज़िंदगी और मौत(1965)वहां के लोग (1967) और मिस्टर मर्डरर 1969 वो परिणाम नही दे पाई जैसी अंसारी को उम्मीद थी (1974) में फ़िल्म जुर्म और सज़ा अपराध पर बनाई गई उनकी अंतिम फ़िल्म थी हालांकि इस बीच वे दूसरे निर्देशकों की बनाई फिल्मों में काम कर रहे थे रंगा खुश (1975) हरफनमौला (1976) महाबदमाश (1975) में ही कुछ ऐसी फिल्में थी 
अंसारी के निर्देशन में अंतिम फ़िल्म बनी नूर-ए-इलाही (1977) लेकिन तेज़ी से बदलते माहौल में धीरे धीरे अंसारी रुपहले पर्दे से दूर होते चले गये
11 जनवरी 1993 को कनाडा में अपने पुत्र के पास अंसारी का निधन हो गया

नागार्जुन

सुपरस्टार नागार्जुन 
🎂 जन्म 29 अगस्त 1959 को हैदराबाद में हुआ था. 
नागार्जुन की फैन फॉलोइंग तगड़ी है. उनकी अदाकारी के फैंस कायल हैं. नागार्जुन एक्टर होने के साथ-साथ सफल प्रोड्यूसर और बिजनेसमैन भी हैं. नागार्जुन के नाम करोड़ों की संपत्ति है.

दो बार फोर्ब्स की लिस्ट में बनाई जगह मालूम हो कि नागार्जुन अन्नपूर्णा स्टूडियो प्रोडक्शन कंपनी के मालिक हैं. स्टूडियो के अलावा नागार्जुन अन्नपूर्णा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ फिल्म एंड मीडिया, हैदराबाद के प्रेसिडेंट भी हैं. साथ ही एमएनएन रियलिटी इंटरप्राइजेज के फाउंडिंग पार्टनर हैं. नागार्जुन फोर्ब्स की लिस्ट में दो बार (2012 और 2013) जगह पा चुके हैं.  

तब्बू संग रही अफेयर की चर्चा पर्सनल लाइफ में नागार्जुन ने दो शादियां की हैं. पहली पत्नी से तलाक लेने के बाद नागार्जुन ने अमला अक्किनेनी से शादी की. नागार्जुन के दो बेटे नागा चैतन्य और अखिल अक्कीनेनी हैं. नागार्जुन के एक्ट्रेस तब्बू संग अफेयर की खबरें भी खूब चर्चा में रहीं. खबरें हैं कि दोनों लंबे समय तक रिलेशन में रहे थे. दोनों की मुलाकात उस समय हुई थी जब उन्होंने फिल्म में साथ काम किया था. लेकिन नागार्जुन के पहले से ही शादीशुदा होने के कारण दोनों की शादी नहीं हो पाई. इसी कारण से दोनों अलग हो गए थे. हालांकि, दोनों ही स्टार्स ने कभी भी इस पर बात नहीं की.    

वर्कफ्रंट पर नागार्जुन ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट 1967 में अपने करियर की शुरुआत की थी. वो तेलुगू फिल्म Sudigundalu में नजर आए थे. नागार्जुन ने साउथ में एक से बढ़कर एक हिट फिल्म दी है. साउथ फिल्मों के अलावा नागार्जुन बॉलीवुड फिल्मों में भी हाथ आजमा चुके हैं. उन्होंने टीवी की दुनिया में प्रोड्यूसर के तौर पर भी काम किया है. नागार्जुन को 2 नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स, 9 Nandi Awards और 3 फिल्मफेयर अवॉर्ड साउथ मिल चुके हैं.

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...