शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

विशाल भारद्वाज

प्रसिद्ध संगीतकार, गीतकार, पटकथा लेखक एवं निर्देशक विशाल भारद्वाज के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामना
विशाल भारद्वाज भारतीय हिन्दी फिल्म उद्योग बॉलीवुड के एक प्रसिद्ध संगीतकार, गीतकार, पटकथा लेखक व निर्देशक हैं। उन्हे गॉडमदर और इश्किया के लिये सर्वश्रेष्ठ संगीत के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। विशाल के शब्दों मे "गुलजार" उनके प्रेरणास्त्रोत रहे हैं।

विशाल भारद्वाज का जन्म 04 अगस्त 1965 में उतर प्रदेश के बिजनौर जिले के शिकारपुर नामक ग्राम में हुआ था। उनका बचपन मेरठ में गुजरा। उनके पिता राम भारद्वाज शुगरकेन इंसपेक्तर थे और शौकिया तौर पर हिन्दी फिल्मो के लिये गाने लिखते थे। पिता यह चाहने पर उन्होने संगीत सीखा। दिल्ली आने पर एक दोस्त की वजह से उनकी संगीत में दिलचस्पी हुई। विशाल ने राज्य स्तरीय क्रिकेट मैच भी खेले हैं।शुरुआती दौर मे उन्होने पेन म्यूजिक रिकॉर्डिंग कंपनी मे भी काम किया। तभी दिल्ली में उनकी मुलाकात गुलजार साहब से हुई। गुलजार के साथ उन्होने ‘चड्डी पहन के फूल खिला है’ गीत की रिकॉर्डिंग की। उसके बाद से उन्हे माचिस के लिए संगीत बनाने का मौका मिला।

विशाल ने अपना सफर गुलजार के साथ मिलकर छोटे पर्दे पर द जंगल बुक, एलिस इन वंडरलैंड और गुब्बारे के साथ शुरु किया। इसके बाद उन्होने गुलजारनिर्देशित फिल्म माचिस का संगीत दिया। इस फ़िल्म के गीतों ने अपार लोकप्रियता हासिल की और विशाल भारद्वाज रातों रात सुर्खियों में आ गए। इस फिल्म के लिये उन्हे वर्ष 1996  के फिल्मफेयर आर. डी. बर्मन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1999 मे आयी फिल्म गॉडमदर के लिये उन्हे श्रेष्ठ संगीत का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार भी मिला। वर्ष 2011 मे एक बार फिर फिल्म इश्किया के लिये उन्हे यह पुरस्कार दिया गया। इश्किया का निर्माण भारद्वाज ने किया है। इसी फिल्म के लिये उनकी पत्नी रेखा भारद्वाज को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।विशाल ने कई सारी हिन्दी फिल्मों के लिये संगीत दिया है जिसमे सत्या, चाची 420, मकबूल, ओंकारा, इश्किया, कमीने (2007) सात खून माफ (2012) और हैदर (2014) प्रमुख हैं।

विशाल निर्देशित पहली फिल्म मकङी थी। इसके बाद उन्होने शेक्सपियर के नाटक मैकबेथ पर आधारित फिल्म मकबूल बनाई। मक़बूल को बर्लिन फ़िल्म समारोह सहित कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में जगह मिली। वर्ष 2006 मे उन्होने शेक्सपियर द्वारा रचित नाटक ओथेलो पर आधारित फिल्म ओंकारा निर्देशित की। विशाल भारद्वाज ने इस फिल्म के निर्देशन और पटकथा लेखन के साथ-साथ फ़िल्म के संवाद भी लिखे। मक़बूल के बाद एक बार शेक्सपियर की रचनाओं पर फिल्म बनाकर भारद्वाज ने अपनी निर्देशन क्षमता का लोहा मनवाया। इस फिल्म की सफलता ने उन्हे नई पीढ़ी के ऊर्जावान, उत्साही और कल्पनाशील निर्देशको की पंक्ति ला खङा किया। 30वें ‘कायरो फिल्म समारोह’ में फिल्म ओंकारा के लिए उन्हे सर्वश्रेष्ठ निर्देशक घोषित किया गया। ओंकारा के लिए विशाल को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार समिति का विशेष पुरस्कार प्रदान किया गया।इसके बाद उन्होने रस्किन बॉन्ड के उपन्यास पर आधारित बच्चों के लिये फिल्म द ब्लू अम्ब्रेला का निर्देशन किया। 2009 मे उनकी फिल्म कमीने प्रदर्शित हुई। इस फिल्म को दर्शकों से लेकर आलोचक तक सबकी प्रशंसा मिली।कमीने के लिए विशाल को पहले ग्लोबल इंडियन म्यूज़िक अवॉर्ड्स मे सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2010 मे आयी अभिषेक चौबे निर्देशित फिल्म इश्किया जिसका निर्माण, संवाद, संगीत और पटकथा लेखन विशाल ने किया था, के लिये विशाल को विशाल सर्वश्रेष्ठ संगीतकार और उनकी पत्नी रेखा भारद्वाज को सर्वश्रेष्ठ गायिका का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला। 2011 मे उन्होने रस्किन बांड की सुज्ज़न'स सेवन हस्बेंड्स पर आधारित फिल्म 7 खून माफ़ निर्देशित की। इस फिल्म को दर्शकों और आलोचकों की मिली जुली प्रतिक्रिया मिली। 2014 मे आई फिल्म हैदर ने एक बार फिर ये बता दिया कि शेक्सपियर के नाटक का निर्देशन विशाल भारद्वाज से अच्छा कोई नहीं कर सकता। यह फिल्म नाटक हेमलेट पर आधारित थी हैदर ने विशाल भारद्वाज को संगीत तथा पटकथा लेखन के लिए फिल्म फेयर अवार्ड दिलाए।

इस प्रकार 2014 मे शेक्सपीयर के उपन्यास हेलमेट पर आधारित उनकी फिल्म हैदर आई जिसमे उन्होनें एक बार फिर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और फिल्म ने 5 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते

वजहत मिर्जा

🎂जन्म की तारीख और समय: 20 अप्रैल 1908, सीतापुर
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 4 अगस्त 1990, कराची, पाकिस्तान
इनाम: फिल्मफेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ संवाद
किताबें: द डायलाग ऑफ़ मदर इंडिया : मेहबूब ख़ानस् इम्मोर्टल क्लासिक
🎬वजाहत मिर्ज़ा.【पुण्यस्मृति】
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फ़िल्में कला का सबसे श्रेष्ठतम माध्यम होती हैं.इनमें सभी कलाओं का संगम होता है.मसलन:संगीत,अदाकारी,लेखन इत्यादि. इनमें से एक भी पक्ष कमज़ोर हो तो उसका पूरी फ़िल्म पर प्रभाव पड़ता है. दर्शक अक्सर फिल्मों के नायक-नायिकाओं को ही तवज्जो देते हैं पर इनके इतर भी बहुत कुछ होता है. उनके द्वारा बोले गए संवाद,उनके अभिनय करने और संवाद बोलने का तरीक़ा एक पटकथा लेखक तय करता. तब कहीं जाकर वे दर्शकों के दिलों में अपना घर बना पाते हैं.

भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग में ऐसे ही एक पटकथा और संवाद लेखक थे-‘वजाहत मिर्जा.’ जिन्होंने उस दौर की बेहतरीन फिल्मों के संवाद लिखे. उनके लिखे संवादों और पटकथाओं ने न जाने कितने नायक और नायिकाओं को अमर कर दिया.

अपनी लेखन कला से करोड़ों लोगों के दिल पर राज करने वाले वजाहत मिर्ज़ा का जन्म 20 अप्रैल 1908 के दिन लखनऊ के निकट स्थित सीतापुर में हुआ था. सम्पन्न घराने से होने के कारण इन्हें पढने-लिखने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा.जैसे-जैसे ये बड़े होते गए, वैसे-वैसे उनका रुझान सिनेमा और लेखन की तरफ होता गया. इस उद्देश्य से उन्होंने 'गवर्नमेंट जुबिली इंटर कॉलेज' में दाखिला ले लिया.यह वही समय था, जब उन्होंने कुछ ठोस काम करने का मन बनाया.अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने कलकत्ता के सिनेमेटोग्राफर कृष्ण गोपाल से संपर्क साधा. उनके साथ मिलकर उन्होंने निर्देशन और सिनेमा लेखन की बारीकियां सीखीं. उनके सीखने की गति इतनी तेज़ थी कि वे जल्द ही उनके सहायक भी बन गए.

दोनों ने मिलकर कुछ अच्छी का निर्माण किया.उनके फिल्म बनाने का अंदाज़ एकदम नया था.उन्हें जल्द ही जाने-पहचाने निर्देशकों और निर्माताओं की तरफ से बुलावे आने लगा. 

चालीस के दशक में उन्होंने कुछ फिल्मों का निर्देशन किया. इन फिल्मों में ‘स्वामीनाथ’, ‘जवानी’ और ‘प्रभु का घर’ जैसी फ़िल्में शामिल थीं. निर्देशन के साथ-साथ वे लेखन भी कर रहे थे.

जैसे-जैसे वक़्त बीता उन्हें एहसास होने लगा कि लेखन ही उनके लिए सही विकल्प है और उन्हें अपना सारा ध्यान केवल लेखन पर ही लगाना इसका परिणाम यह हुआ कि फ़िल्में हिट होने लगीं.1940 में उन्होंने ‘औरत’ फिल्म के लिए लेखन किया. इसके बाद 1956 में फिल्म ‘आवाज़’ में भी उन्होंने पटकथा और संवाद लिखे. इसके लिए उनकी खूब सराहना हुई.आगे 1957 में मेहबूब खान के निर्देशन में ‘मदर इंडिया’ फिल्म रिलीज हुई तो यह 'ब्लॉकबस्टर' साबित हुई. यह फिल्म अपने संवादों के लिए 'ऑस्कर पुरस्कार' के लिए नॉमिनेट भी हुई और केवल एक वोट से इस पुरस्कार को जीत नहीं पाई. इस फ़िल्म के संवाद वजाहत मिर्ज़ा ने ही लिखे थे.1960 में सदी महान फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ आई. इस फिल्म के संवाद और पटकथा चार लेखकों ने तैयार किये. इनमें से एक वजाहत मिर्ज़ा भी थे.अगले ही साल फिल्म ‘गंगा-जमुना’ रिलीज़ हुई. यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर हिट रही.

वजाहत मिर्जा का संवाद और पटकथा लिखने का अंदाज बिल्कुल निराला था.वे कठिन से कठिन बातों को सीन के अनुरूप ढालकर इतनी सहजता से कह देते थे कि लगता ही नहीं था कि फिल्म में कहीं भारीपन या ऊब है.अगर हम मदर इंडिया की बात करें तो जब राधा अपने दो भूखे बच्चों को लेकर सूदखोर सुखी लाला के पास जाती है, तब लाला उसके सामने एक प्रस्ताव रखता है. लाला कहता कि राधा अगर अपनी इज्जत का सौदा कर ले तो वह उसे पैसे दे देगा. इस बात को वजाहत मिर्ज़ा ने बिल्कुल आसान और प्रभावशाली शब्दों संवाद में ढाला था: "अच्छी तरह सोच विचार कर लो राधा. कौनो जल्दी नाही है, सुखी लाला बहुत सबर वाला आदमी है." वहीँ अगर फिल्म ‘गंगा-जमुना’ की बात करें, तो इसमें भी किरदार जमुना की ख़ुद्दारी को मिर्ज़ा साहब ने बहुत ही आसान शब्दों में  बयान किया है. जमुना जब काम की तलाश में आता है, तब उसे एक  सोने का हार मिलता है. वह यह हार पुलिस को दे देता है. पुलिस वाला उसकी हालत देखकर पूछता है," मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकता हूँ?". तब जमुना जवाब देता है,: "कोई नौकरी मिल सकती है,मैं बहुत तकलीफ में हूँ."

संवाद और पटकथा लिखने का मिर्ज़ा साहब का यह अनोखा अंदाज ही था, जिसकी वजह से उन्हें लगातार दो बार 'फिल्म-फेयर अवार्ड' मिला. 1961 में ‘मुगल-ए-आज़म’ और 1962 में ‘गंगा-जमुना’ के लिए उन्हें इस पुरस्कार से नवाजा गया. आगे उन्होंने ‘लीडर’, ‘शतरंज’, ‘गंगा की सौगंध’ और ‘लव एंड गॉड’ जैसी सुपरहिट फिल्मों के संवाद भी उन्होंने ही लिखे.अपने 53 साल के करियर में उन्होंने कुल मिलाकर 31 फिल्मों के लिए संवाद और पटकथा तैयार की.

अपने संवादों से उन्होंने अनेकानेक कलाकारों को सिनेमा जगत के सबसे ऊपरी पायदान पर बिठाया.उन्होंने ताउम्र अपना काम पूरी शिद्दत से किया और 4 अगस्त 1990 के दिन इस दुनिया को अलविदा कह गए.

☄️स्वर्णिम युग के इस महान संवाद और पटकथा- लेखक को उनकी 33वीं पुण्यतिथि पर हम नमन करते हैं.
🙏🙏

गुरुवार, 3 अगस्त 2023

अनुष्का

अनुष्का
🎂04 अगस्त 2002 (आयु 20)
राँची, झारखण्ड, भारत
पेशा
अभिनेत्रीमॉडल
कार्यकाल
2009–वर्तमान
प्रसिद्धि का कारण
बाल वीर
झांसी की रानी
खतरों के खिलाड़ी 11
अनुष्का ने 2009 में ज़ी टीवी के धारावाहिक यहाँ मैं घर घर खेली के साथ एक बाल कलाकार के रूप में अपना करियर शुरू किया।उसी वर्ष में, उनका पहला संगीत वीडियो हमको है आशा रिलीज़ किया गया था। 2012 में, वह टीवी धारावाहिक बाल वीर में मेहर का किरदार निभाकर लोकप्रिय हुईं। 2015 में, वह बॉलीवुड फिल्म क्रेजी कुक्कड़ फैमिली में दिखाई दीं।

उन्होंने टीवी धारावाहिक इंटरनेट वाला लव और देवों के देव... महादेव में अभिनय किया है। वह पीरियड ड्रामा फिल्म लिहाफ: द क्विल्ट में दिखाई दी और एक लघु फिल्म सम्मदित्ती में भी काम किया। 2020 में वह टीवी शो अपना टाइम भी आएगा में प्रमुख भूमिका में थीं लेकिन उन्होंने इसे तीन सप्ताह के बाद छोड़ दिया। वह कई संगीत वीडियो में भी दिखाई दी हैं।

वह 2019 की श्रृंखला खूब लड़ी मर्दानी - झांसी की रानी में ऐतिहासिक चरित्र मणिकर्णिका राव उर्फ ​​रानी लक्ष्मी बाई की भूमिका निभाने के लिए जानी जाती हैं। मई 2021 में, उन्होंने स्टंट-आधारित रियलिटी टीवी शो फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी 11 में भाग लिया। वह सातवें सप्ताह में इस शो से बाहर हो गई। वह इस शो में आने वाली सबसे कम उम्र की प्रतिभागी थीं। 2023 में उनकी एक फ़िल्म आई एम नेक्स्ट ज़ी5 पर जारी हुई।

अरबाज खान

अरबाज़ ख़ान हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता हैं। 
🎂जन्म की तारीख और समय: 4 अगस्त 1967 (आयु 55 वर्ष), पुणे
पत्नी: मलाइका अरोड़ा खान (विवा. 1998–2017)
बच्चे: अरहान खान
भाई: सोहेल ख़ान, सलमान ख़ान, अर्पिता ख़ान, अल्वीरा खान
माता-पिता: सलीम ख़ान, सुशीला चरक
दादा या नाना: बलदेव सिंह चरक, अब्दुल रशीद खान
अरबाज खान ने 1998 में मलाइका से शादी की। 2016 में दोनों का तलाक हो गया।
📽️
वर्ष       फ़िल्म             चरित्र 
2007 शूट आउट एट लोखंडवाला 
2007 दस कहानियाँ 
2007 फूल एन फाइनल 
2007 जाने तू या जाने ना 
2007 ओम शांति ओम 
2007 वुडस्टॉक विला 
2007 ढोल जयशंकर 'जय' यादव 
2006 भागम भाग 
2006 मालामाल वीकली 
2006 इकरार 
2005 मैंने प्यार क्यूँ किया 
2005 जय चिरंजीवा 
2005 ताजमहल 
2004 गर्व 
2004 हलचल 
2004 वज़ह 
2003 कयामत 
2003 कुछ ना कहो 
2003 करिश्मा 
2002 माँ तुझे सलाम 
2002 तुमको ना भूल पायेंगे 
2002 सोच 
2002 ये मोहब्बत है 
2001 जीतेंगे हम 
1999 हैलो ब्रदर 
1998 प्यार किया तो डरना क्या 
1998 श्याम घनश्याम 
1996 दरार

किशोर कुमार

किशोर कुमार
 🎂जन्म: 4 अगस्त, 1929 खण्डवा मध्यप्रदेश 
⚰️निधन: 13 अक्टूबर, 1987
भारतीय सिनेमा के मशहूर पार्श्वगायक समुदाय में से एक रहे हैं। वे एक अच्छे अभिनेता के रूप में भी जाने जाते हैं। हिन्दी फ़िल्म उद्योग में उन्होंने बंगाली, हिन्दी, मराठी, असमी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम, उड़िया और उर्दू सहित कई भारतीय भाषाओं में गाया था। उन्होंने सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के लिए 8 फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीते और उस श्रेणी में सबसे ज्यादा फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीतने का रिकॉर्ड बनाया है। उसी साल उन्हें मध्यप्रदेश सरकार द्वारा लता मंगेशकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उस वर्ष के बाद से मध्यप्रदेश सरकार ने "किशोर कुमार पुरस्कार"(एक नया पुरस्कार) हिंदी सिनेमा में योगदान के लिए चालु कर दिया था।
श्री किशोर कुमार का जन्म 04 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खण्डवा शहर में वहाँ के जाने माने वकील श्री कुंजीलाल जी के यहाँ हुआ था।किशोर कुमार का मूल नाम आभास कुमार गांगुली था। किशोर कुमार चार भाई बहनों में चौथे नम्बर पर थे। उन्होंने अपने जीवन के हर क्षण में खण्डवा को याद किया, वे जब भी किसी सार्वजनिक मंच पर या किसी समारोह में अपना कर्यक्रम प्रस्तुत करते थे, गर्व से कहते थे किशोर कुमार खण्डवे वाले, अपनी जन्म भूमि और मातृभूमि के प्रति ऐसी श्रद्धा बहुत कम लोगों में दिखाई देता है।

शिक्षा

किशोर कुमार इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़े थे और उनकी आदत थी कॉलेज की कैंटीन से उधार लेकर खुद भी खाना और दोस्तों को भी खिलाना। वह ऐसा समय था जब 10-20 पैसे की उधारी भी बहुत मायने रखती थी। किशोर कुमार पर जब कैंटीन वाले के पाँच रुपया बारह आना उधार हो गए और कैंटीन का मालिक जब उनको अपने पाँच रुपया बारह आना चुकाने को कहता तो वे कैंटीन में बैठकर ही टेबल पर गिलास और चम्मच बजा बजाकर पाँच रुपया बारह आना गा-गाकर कई धुन निकालते थे और कैंटीन वाले की बात अनसुनी कर देते थे। बाद में उन्होंने अपने एक गीत में इस पाँच रुपया बारह आना का बहुत ही भली-भांति प्रयोग किया। बहुत कम लोगों को पाँच रुपया बारह आना वाले गीत की यह मूल कहानी ज्ञात होगी।
किशोर कुमार ने चार विवाह किये थे। विवाह की पहली पत्नी बंगाली गायक और अभिनेत्री रुमा गुहा ठाकुरता उर्फ ​​रुमा घोष थीं। यह विवाह सम्बन्ध 1950 से 1958 तक चला । किशोर दा ने दूसरा विवाह अभिनेत्री मधुबाला से किया था, जिन्होंने उनके घरेलू फिल्म चल्ती का नाम गाड़ी (1958) और झूमूओ (1 9 61) सहित कई फिल्मों में उनके साथ काम किया था। जब किशोर कुमार ने उनके सामने प्रस्ताव रखा, मधुबाला बीमार थीं और इलाज के लिए लन्दन जाने की योजना बना रही थीं। उन्हें वेंट्रिकुलर सेप्टल डिसीस (दिल में छेद) था, और किशोर कुमार अभी भी रुमा से विवाह बन्धन में थे। तलाक के बाद, इस जोड़े ने 1960 में सिविल विवाह किया और किशोर कुमार इस्लाम में परिवर्तित हो गए और कथित तौर पर अपना नाम बदल कर करीम अब्दुल कर दिया। उनके माता-पिता ने विवाह समारोह में भाग लेने से मना कर दिया। माता-पिता को खुश करने के लिए जोड़े ने हिंदू विवाह पद्धति से भी विवाह किया, लेकिन मधुबाला को कभी भी उन्होंने अपनी बहू के रूप में स्वीकार नहीं किया। विवाह के एक महीने के भीतर, मधुबाला अपने पति किशोर कुमार के घर में तनाव की वजह से बांद्रा में अपने बंगले में वापस चली गईं किन्तु वे विवाह में बने रहे, लेकिन मधुबाला के जीवन का बाकी हिस्सा तनाव से भरा रहा। यह सम्बन्ध 23 फरवरी 1969 को मधुबाला की मृत्यु के साथ समाप्त हुआ था।

किशोर दा का तीसरा विवाह योगिता बाली सेे किया जो 1976 से 4 अगस्त 1978 तक चला। किशोर कुमार का चौथा ओर अंतिम विवाह 1980 मे लीना चन्दावरकर से हुआ था। किशोर कुमार के दो बेटे थे, अमित कुमार रुमा के साथ, और सुमित कुमार लीना चन्दावरकर के साथ थे।

मनी शंकर

मणिशंकर

शंकर मणि
🎂03 अगस्त 1957
गुंटूर , भारत
शिक्षा
हैदराबाद पब्लिक स्कूल
अल्मा मेटर
बिट्स, पिलानी
व्यवसाय
फिल्म निर्देशक, निर्माता, लेखक, बिजनेस मैग्नेट
सक्रिय वर्ष
1980-वर्तमान
बच्चे
प्रेम शंकर
उन्होंने बॉलीवुड निर्देशक के रूप में पांच फिल्में बनाईं, जिनमें 16 दिसंबर , 2002 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक और टैंगो चार्ली शामिल हैं, जिसे कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शित किया गया था और इसे संयुक्त राष्ट्र की "युद्ध-विरोधी" फिल्मों का स्थायी हिस्सा नामित किया गया था। . अपने लंबे करियर में मणिशंकर ने कई फिल्मों, विज्ञापनों और राजनीतिक अभियानों पर काम किया है। 
मणिशंकर ने 1978 में बिट्स पिलानी  से केमिकल इंजीनियर के रूप में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने प्रोसेस इंजीनियरिंग और ड्रग डिलीवरी में एक शोध इंजीनियर के रूप में कुछ वर्षों तक काम किया। बिट्स पिलानी में अपने समय के दौरान , उन्होंने रिकॉर्ड लगातार 4 बार होलोफेस्ट 'वर्ष का सर्वश्रेष्ठ होलोग्राम' जीता, और उपनाम "यंग मणि" अर्जित किया।
फिल्म उद्योग में दो दशकों से अधिक समय तक काम करने के बाद, शंकर ने फिल्म निर्माण में बदलाव किया और अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस, भैरव फिल्म्स शुरू किया, जिसने एक हजार से अधिक विज्ञापनों, लघु फिल्मों और छवि निर्माण फिल्मों के साथ-साथ 5 हिंदी फीचर फिल्मों का निर्माण किया। उनकी अधिकांश लघु और फीचर फिल्में सामाजिक मुद्दों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दर्शाती हैं और उनका उद्देश्य दर्शकों को आत्मनिरीक्षण अनुभव प्रदान करना है।

1991 में, उनकी तेलुगु फिल्म 'मनीषी' ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए प्रतिष्ठित नंदी पुरस्कार , साथ ही सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखक के लिए नंदी पुरस्कार जीता। उनकी हिंदी फीचर फिल्म 16 दिसंबर , जो 2002 की शीर्ष दस कमाई करने वाली फिल्मों में से एक थी, उस वर्ष किसी भी फिल्म के लिए निवेश पर सबसे अधिक रिटर्न था।

टैंगो चार्ली एक सैनिक की अपनी अंतरात्मा से निरंतर लड़ाई की कहानी बताती है। इसे कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शित किया गया था और इसे एमनेस्टी इंटरनेशनल की क्लासिक युद्ध-विरोधी फिल्मों की सूची में शामिल किया गया था।

अपने इतिहास के प्रोफेसर इंडियाना से प्रेरित होकर, उन्होंने एक कैरियर-परिभाषित परियोजना का नेतृत्व करने का निर्णय लिया, जो एक शौकिया पुरातत्वविद् के रूप में उनके शुरुआती बीस के अनुभवों को समाहित करेगा। इसके परिणामस्वरूप फिल्म रुद्राक्ष का निर्माण हुआ, जो संजय दत्त , बिपाशा बसु और सुनील शेट्टी अभिनीत एक भविष्य की अलौकिक फिल्म थी । फ़िल्म की रिलीज़ के बाद, कथित तौर पर एक गुप्त हिंदू संगठन की सेनाएँ अक्सर उनसे मिलने जाती थीं, जिन्होंने राक्षस क्षेत्र के बारे में उनके गहरे ज्ञान पर सवाल उठाया था।

मुखबीर ( ओम पुरी , सुनील शेट्टी , समीर दत्तानी और राइमा सेन अभिनीत ) एक युवा व्यक्ति की कहानी बताती है जो खतरनाक अंडरवर्ल्ड से ऊपर उठता है और एक देशभक्त के रूप में मरना चुनता है। इस फिल्म को समीक्षकों द्वारा भी सराहा गया और बर्लिन में ब्लैक इंटरनेशनल फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया।

नॉक आउट ( संजय दत्त , इरफान खान और कंगना रनौत अभिनीत )।

मणि सिम्युलेटेड ब्रह्मांड सिद्धांत में प्रबल विश्वास रखते हैं। उनका दावा है कि हमारे अस्तित्व का तल एक नकली होलोग्राम का दर्पण है; उनके विचारों की चर्चा सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी मिचियो काकू के कार्यों में की गई है ।
📽️. मनीषी (1991)
मेरी जान हिंदुस्तान (संगीत वीडियो) (1995)
16 दिसंबर (2002)
रुद्राक्ष (2004)
टैंगो चार्ली (2005)
मुखबिर (2008)
नॉक आउट (2010)

(होलोग्रफ़ी)

मणिशंकर को भारत में होलोग्राम की शुरुआत करने के लिए जाना जाता है । उन्होंने 2012 के गुजरात विधान सभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी (भारत के वर्तमान प्रधान मंत्री) के लिए पहले होलोग्राफिक अभियान का नेतृत्व किया ।

तब से उन्होंने 2014 के तेलंगाना विधान सभा चुनाव के दौरान तेलंगाना राष्ट्र समिति सहित विभिन्न दलों के लिए चुनाव अभियान चलाया है, जिसने अंततः दौड़ जीत ली,  साथ ही 2014 के महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव के दौरान राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी शामिल है, जिसने पार्टी का पतन .

बुधवार, 2 अगस्त 2023

पंजाबी गायक मनमोहन वारिस

यहां देखे रमेश 
मनमोहन वारिस एक भारतीय पंजाबी लोक/पॉप गायक हैं। 
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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
जन्म की तारीख और समय: 3 अगस्त 1967 होशियारपुर
पत्नी: पृतपाल कौर हीर (विवा. 1996)
भाई: संगतार, कमल हीर
माता-पिता: दीलबाग सिंह
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वह रिकॉर्ड निर्माता संगतर और गायक कमल हीर के बड़े भाई हैं। वारिस को पंजाबी लोक संगीत के सबसे प्रतिभाशाली गायकों में से एक माना जाता है।
मनमोहन वारिस का जन्म भारत के पंजाब के हल्लुवाल में हुआ था , वह दिलबाग सिंह के सबसे बड़े बेटे थे।उन्होंने 11 साल की उम्र में संगीत का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया और जो सीखा उसे अपने छोटे भाइयों को दिया। वह 1990 में कनाडा चले गए, वारिस ने 1993 में अपना पहला एल्बम गैरन नाल पीनघन झूठडेय जारी किया । 

उन्होंने अपने भाइयों कमल हीर और संगतर के साथ अपना खुद का रिकॉर्ड लेबल, प्लाज़्मा रिकॉर्ड्स शुरू करने से पहले, टिप्स म्यूज़िक के साथ अनुबंध किया और 2000 में उनके साथ हुस्न दा जादू एल्बम जारी किया । उन्होंने अपना अधिकांश संगीत इसी लेबल पर जारी किया है।

2004 में वारिस ने नचिये मजाजने रिलीज़ की , उसी वर्ष पंजाबी विरसा 2004 टूर में यात्रा की। 2007 में अपने स्टूडियो एल्बम दिल नचदा के बाद , वारिस का नवीनतम एल्बम, दिल ते ना लें, 2010 में रिलीज़ हुआ। इसके बाद उन्होंने पंजाबी विरसा 2010 के साथ दुनिया भर का दौरा किया ।

वारिस की शादी प्रितपाल कौर हीर से हुई है और उनके दो बच्चे हैं।
उन्हें फिल्म फरार से "परने नू" के गायन के लिए 2016 में पीटीसी पंजाबी फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का पुरस्कार दिया गया था

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...