शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

महान संगीतकार अनिल बिस्वास

महान संगीतकार अनिल बिस्वास के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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*अनिल बिस्वास*
 *🎂जन्म: 7 जुलाई, 1914; 
⚰️मृत्यु: 31 मई, 2003*
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 बॉलीवुड के प्रसिद्ध संगीतकार थे। हिन्दी फ़िल्मों के गीत-संगीत के स्वर्ण-युग के सारथी अनिल बिस्वास रहे हैं। उन्होंने न सिर्फ अपने संगीत से फ़िल्म संगीत को शास्त्रीय, कलात्मक और मधुर बनाया बल्कि अनेक गायक-गायिकाओं को तराशकर हीरे-जवाहरात की तरह प्रस्तुत किया। इनमें तलत महमूद, मुकेश, लता मंगेशकर, सुरैया के नाम प्रमुखता से गिनाए जा सकते हैं। अनिल बिस्वास शास्त्रीय संगीत के निष्णात होने के साथ लोक-संगीत के अच्छे जानकार थे। उनकी धुनों में जो संगीत है, वह अब हमारी विरासत बन गया है।

जीवन परिचय

अनिल बिस्वास का जन्म बारीसाल, पूर्वी बंगाल में 7 जुलाई, 1914 को हुआ था, जो अब बांग्लादेश है। वे स्वतंत्रता संग्राम में भी शामिल हुए और बंगाल के महान् कवि और संगीतकार काज़ी नज़रुल इस्लाम के भी संपर्क में रहे। वे काफ़ी कम उम्र में कोलकाता चले आए और उसके बाद वहाँ से 1934 में मुंबई चले गए। मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में आकर उन्होंने देखा कि यहाँ तो हर प्रांत का संगीत मौजूद है। अनिल दा ने अपने प्रयत्नों से इसे और अधिक विस्तार दिया। मुंबई पहुँचते ही उन्हें 'धर्म की देवी' नाम की फ़िल्म में संगीत देने का अवसर मिला और उसके बाद यह सिलसिला बरसों तक चलता रहा।

'दिल जलता है तो जलने दे...' से मुकेश ने अपने करियर की शुरूआत की और उसके बाद अनेक हिट गाने गए। अनिल बिस्वास को हिंदी फ़िल्म संगीत में पहली बार ऑर्केस्ट्रा का इस्तेमाल करने का श्रेय भी दिया जाता है। 1949 में उन्होंने तलत महमूद से आरज़ू फ़िल्म में पहली बार गाना गवाया जो सुपरहिट रहा--'ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल.

स्व #अनिल_बिस्वास अपनी पत्नी के साथ घर में मजे से कुछ पका रहे हैं और स्व #लता_मंगेशकर बगल में बैठे हुए ध्यान से देख रही हैं, कोयले की सिगड़ी जल रही है, डालडे का डिब्बा रखा हुआ है

अनिल बिस्वास का लता, तलत महमूद और दिलीप कुमार से पारिवारिक संबंध था। 
ये संगीतकार होने के साथ मजबूत कद काठी के अत्यंत ताकतवर और पहलवान किस्म के आदमी थे। 
कलकत्ता से मुंबई आए अनिल दा का सफर फिल्म जगत में सिर्फ 26 साल रहा। 1961 में बीस दिनों में छोटे भाई सुनील और बड़े बेटे के निधन ने अनिल दा को भीतर से तोड़ दिया। 
वे मुंबई से दिल्ली चले गए और मृत्युपर्यंत साउथ एक्सटेंशन में रहे। यहाँ रहते हुए भी उन्होंने आकाशवाणी को अपनी सेवाएँ दीं और "हम होंगे कामयाब एक दिन" जैसा गीत युवा पीढ़ी को दिया। इस गीत की शब्द रचना में उन्होंने कवि गिरिजा कुमार माथुर से सहयोग किया था।

अनिल बिस्वास की पत्र-पत्रिका और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चर्चा 1994 में हुई, जब म.प्र. शासन के संस्कृति विभाग ने उन्हें लता मंगेशकर अलंकरण से सम्मानित किया। लता मंगेशकर अपने गायन के आरंभिक चरण में गायिका नूरजहाँ से प्रभावित थीं। अनिल दा ने लता को इस 'प्रेत बाधा' से मुक्ति दिलाकर शुद्ध-सात्विक लता मंगेशकर बनाया। अनिल दा के संगीत में लताजी के कुछ उम्दा गीतों की बानगी देखिए- मन में किसी की प्रीत बसा ले (आराम), बदली तेरी नजर तो नजारे बदल गए (बड़ी बहू), रूठ के तुम तो चल दिए (जलती निशानी)।

स्वयं लताजी ने इस बात को स्वीकार किया है कि अनिल दा ने उन्हें समझाया कि गाते समय आवाज में परिवर्तन लाए बगैर श्वास कैसे लेना चाहिए। यह आवाज तथा श्वास प्रक्रिया की योग कला है। अनिल दा उन्हें लतिके कहकर पुकारते थे। इसी तरह मुकेश को सहगल की आवाज के प्रभाव से मुक्त कराकर उसे मुकेशियाना शैली प्रदान करने में अनिल दा का हाथ है।

तलत महमूद की मखमली आवाज पर अनिल दा फिदा थे। तलत की आवाज के कम्पन और मिठास को अनिल दा ने रेशम-सी आवाज कहा था। किशोर कुमार से फिल्म 'फरेब' (1953) में अनिल दा ने संजीदा गाना क्या गवाया, आगे चलकर इस शरारती तथा नटखट गायक के संजीदा गाने देव आनंद-राजेश खन्ना के प्लस-पाइंट हो गए।
संगीतकार नौशाद ने कहा था "अनिल बिस्वास एकमात्र ऐसे बंगाली संगीतकार हैं, जो पंजाबी फिल्म में पंजाबी, गुजराती फिल्म में गुजराती, मुगल फिल्म में मुगलिया संगीत देने में माहिर हैं। वे कीर्तन, जत्रा और रवीन्द्र संगीत के अलावा भी हिन्दुस्तानी संगीत को बखूबी जानते हैं "
अनिल विश्वास का जन्म बरीसाल (पूर्वी बंगाल) में 7 जुलाई 1914 को हुआ था। चार साल की उम्र से वे गाने लगे थे। किशोर उम्र में देशभक्ति जागी और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। जेल गए और यातनाएँ सही। 16 साल की उम्र में नवंबर 1930 में कलकत्ता में महान बाँसुरी वादक पन्नालाल घोष के घर शरण ली। अनिल दा की बहन पारुल घोष ने पन्नालालजी से विवाह रचाया था। युवा अनिल ने यहाँ ट्यूशनें की। काजी नजरूल इस्लाम के कहने पर मेगा फोन रिकॉर्ड कंपनी में काम किया। उनका पहला रिकॉर्ड उर्दू में जारी हुआ था। यहीं पर उनकी मुलाकात कुंदनलाल सहगल और सचिन देव बर्मन से हुई थी। हीरेन बोस के साथ मुंबई आए और 26 साल संगीत सृजन किया। अभिनेत्री मीना कपूर से उन्होंने शादी की थी।

अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन की पहली फिल्म 'धर्म की देवी' (1935) थी और अंतिम 'छोटी-छोटी बातें'(1965)। 
इसे अभिनेता मोतीलाल ने बनाया था। अनिल विश्वास संगीत को स्वतंत्र पहचान देने वाले प्रथम संगीतकार हैं। 
"आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है/ दूर हटो, दूर हटो, दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिन्दुस्तान हमारा है'  भारत की आजादी के 4 साल पहले देशभक्ति का यह तराना गली-गली गूँजा था। बच्चे-बच्चे की जबान पर था। फिल्म किस्मत (1943) के इस गीत को बड़नगर (म.प्र.) के गीतकार कवि प्रदीप ने लिखा था और पूर्वी बंगाल के संगीतकार अनिल बिस्वास ने जोशीले संगीत से सँवारा था। इस गीत को सुनकर देशभक्तों की रगों में खून की रफ्तार तेज हो जाती थी

कार्यक्षेत्र

कलकत्ता से मुंबई आए अनिल दा का सफर फ़िल्म जगत् में सिर्फ 26 साल रहा। 1961 में बीस दिनों में छोटे भाई सुनील और बड़े बेटे के निधन ने अनिल दा को भीतर से तोड़ दिया। वे मुंबई से दिल्ली चले गए और मृत्युपर्यंत साउथ एक्सटेंशन में रहे। यहाँ रहते हुए भी उन्होंने आकाशवाणी को अपनी सेवाएँ दीं और 'हम होंगे कामयाब एक दिन' जैसा कौमी तराना युवा पीढ़ी को दिया। इस गीत की शब्द रचना में उन्होंने कवि गिरिजाकुमार माथुर से सहयोग किया था। अनिल बिस्वास की पत्र-पत्रिका और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चर्चा 1994 में हुई, जब मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग ने उन्हें लता मंगेशकर अलंकरण से सम्मानित किया। लता मंगेशकर अपने गायन के आरंभिक चरण में गायिका नूरजहाँ से प्रभावित थीं। अनिल दा ने लता को इस 'प्रेत बाधा' से मुक्ति दिलाकर शुद्ध-सात्विक लता मंगेशकर बनाया। अनिल दा के संगीत में लताजी के कुछ उम्दा गीतों की बानगी निम्नलिखित गीतों में सुनी जा सकती है-

मन में किसी की प्रीत बसा ले (आराम)
बदली तेरी नज़र तो नज़ारे बदल गए (बड़ी बहू)
रूठ के तुम तो चल दिए (जलती निशानी)।

लोकप्रियता

'आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है दूर हटो, दूर हटो, दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिन्दुस्तान हमारा है'।

भारत की आजादी के 4 साल पहले देशभक्ति का यह तराना गली-गली गूँजा था। बच्चे-बच्चे की जबान पर था। फ़िल्म किस्मत (1943) के इस गीत को बड़नगर (मध्य प्रदेश) के गीतकार कवि प्रदीप ने लिखा था और पूर्वी बंगाल के संगीतकार अनिल बिस्वास ने जोशीले संगीत से सँवारा था। इस गीत को सुनकर देशभक्तों की रगों में ख़ून की रफ्तार तेज हो जाती थी।

संगीत के पितामह

हिंदी सिने संगीत के पितामह कहे जाने वाले दादा अनिल बिस्वास की सबसे बड़ी ख़ासियत थी उनका ज्ञान और उनका समर्पण। उन्‍होंने ऐसा कोई गाना नहीं बनाया जो उनकी मरज़ी के ख़िलाफ़ हो। अनिल बिस्वास की संगीत-यात्रा पर कुबेर दत्‍त की एक महत्‍त्‍वपूर्ण पुस्‍तक भी आई है। अनिल दा ही वो संगीतकार हैं जिन्‍होंने तलत महमूद को विश्‍वास दिलाया कि उनकी आवाज़ की लरजिश ही उनकी दौलत है। अनिल दा ही वो संगीतकार हैं जिन्‍होंने डांट-डपटकर कई प्रतिभाओं को संवारा और लता मंगेशकर भी उन्‍हीं प्रतिभाओं में से एक हैं। लता जी बड़े ही सम्‍मान के साथ अनिल बिस्‍वास का ज़िक्र करती हैं। स्वयं लताजी ने इस बात को स्वीकार किया है कि अनिल दा ने उन्हें समझाया कि गाते समय आवाज़ में परिवर्तन लाए बगैर श्वास कैसे लेना चाहिए। यह आवाज़ तथा श्वास प्रक्रिया की योग कला है। अनिल दा उन्हें लतिके कहकर पुकारते थे। इसी तरह मुकेश को सहगल की आवाज़ के प्रभाव से मुक्त कराकर उसे मुकेशियाना शैली प्रदान करने में अनिल दा का हाथ है। तलत महमूद की मखमली आवाज़ पर अनिल दा फिदा थे। तलत की आवाज़ के कम्पन और मिठास को अनिल दा ने रेशम-सी आवाज़ कहा था। किशोर कुमार से फ़िल्म 'फरेब' (1953) में अनिल दा ने संजीदा गाना क्या गवाया, आगे चलकर इस शरारती तथा नटखट गायक के संजीदा गाने देव आनंद और राजेश खन्ना के प्लस-पाइंट हो गए।

प्रतिभाओं की प्रतिस्पर्धा

अनिल बिस्वास के दौर में एक से बढ़कर एक संगीतकार रहे। इसका लाभ यह हुआ कि संगीतकारों की स्वस्थ स्पर्धा के चलते श्रोताओं को मधुर से मधुरतम गीत मिले। उस दौर में नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप, गोपालसिंह नेपाली, इंदीवर, डी.एन. मधोक जैसे गीतकार भी हुए, जिनके गीत कविता की तरह भावपूर्ण और सार्थक होते थे। नौशाद, रोशन, मदन मोहन, सचिन देव बर्मन, सज्जाद, ग़ुलाम हैदर, वसंत देसाई, हेमंत कुमार, शंकर-जयकिशन और खय्याम जैसे संगीतकारों के तालाब में अनिल दा सदैव कमल की भाँति रहते हुए सबका मार्गदर्शन करते रहे। सी. रामचंद्र अपने को अनिल दा का शिष्य मानते थे। ये तमाम संगीतकार एक-दूसरे की इज्जत करते हुए फ़िल्म-संगीत के खजाने में अपना विनम्र योगदान करते रहे।

सम्मान और पुरस्कार

1986 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

निधन

अनिल बिस्वास का दिल्ली में 31 मई, 2003 को निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे।

यूसुफ खान उर्फ दलीप कुमार

🎂जन्म की तारीख और समय: 11 दिसंबर 1922, Qissa Khwani Bazaar, पेशावर, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 7 जुलाई 2021, Hinduja Hospital OPD Building, मुम्बई
पत्नी: अस्मा रहमान (विवा. 1981–1983), सायरा बानो (विवा. 1966–2021)
भाई: नासिर ख़ान, एहसान खान, फ़ौज़िया खान, सईदा खान
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*अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट में कहा कि कुमार को एक सिनेमाई किंवदंती के रूप में याद किया जाएगा,* 

*जबकि राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा कि "उन्हें उपमहाद्वीप में प्यार किया गया था"।* 
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दिलीप कुमार 🎂11 दिसंबर, 1922 - ⚰️7 जुलाई, 2021
जन्म का नाम: मुहम्मद यूसुफ़ ख़ान, हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे जो भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के सदस्य रह चुके है। दिलीप कुमार को भारत तथा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में गिना जाता है, उन्हें दर्शकों द्वारा 'अभिनय सम्राट' के नाम से पुकारा जाता है, वे आज़ादी से लेकर 60 के दशक तक भारत के सबसे लोकप्रिय अदाकार थे। वे हिंदी सिनेमा के आज तक के सबसे कामयाब अदाकार हैं। उनके फ़िल्मों की कामयाबी दर लगभग अस्सी (८०) फ़ीसदी से ऊपर रही है छह दशकों के कार्यकाल में।उन्हें दुनिया में पहली बार परदे पर 'मेथड एक्टिंग' को इजाद करने का श्रेय भी दिया जाता है जिसके कारण वे तमाम पीढ़ियों के अदाकार के प्रेरणाश्रोत रहे।दिलीप कुमार को भारत का दूसरा एवं तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण और पद्म भूषण प्राप्त है । उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ भी प्राप्त है। अभिनेेत्री और निर्माता देविका रानी ने उन्हें फिल्मों में काम दिया और उन्हीं के सुझाव पर उन्होंने अपना स्टेज नाम *'दिलीप कुमार'* रखा। इसका एक कारण उस वक्त तक सिनेमा की बदनाम स्थिति थी और पिता का डर भी था।
अपने करियर के शुरुआती वर्षों में कई सफल त्रासद या दु:खद भूमिकाएं करने के कारण उन्हें मीडिया में 'ट्रेजिडी किंग' भी कहा जाता था। व्यापार विश्लेषकों के अनुसार उनकी बहुत सी फ़िल्में इसलिए भी कामयाब हुईं क्योंकि जनता सिर्फ़ उनकी अदाकारी देखने आया करती थी फिर चाहे उन चलचित्रों में खास मनोरंजन के तत्व ना भी हों। इस प्रकार के वाक्या और किसी भी अदाकार के साथ नही हुएं हैं। उन्होंने बहुत सी बड़े पैमाने पर कामयाब फ़िल्मों में अदाकारी की है जो आजतक सबसे सफल चलचित्रों में गिनी जातीं हैं जैसे मुग़ल-ए-आज़म (१९६०), गंगा जमना (१९६१), इत्यादि। उन्होंने अपने करियर के दूसरे पड़ाव में भी कई अत्यंत कामयाब फिल्में दीं जब वह वृद्ध किरदार की भूमिका में भी प्रमुख किरदार निभा रहे थे। ऐसा वाक्या भी उनके अतिरिक्त किसी अदाकार के साथ नहीं हुआ है।उन्होंने फिल्मों में अदाकारी को रंगमंच से अलग किया और उसे नई परिभाषा दी जिसका प्रभाव उनके बाद के कलाकारों पर रहा। १९९८ में आई किला उनके करियर की आखिरी फ़िल्म थी। उन्हें वर्ष १९९४ में भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अपने अभिनय और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार लाने के लिए उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार निशान-ए-इम्तियाज़ दिया गया जिसे प्राप्त करने वाले वे इकलौते भारतीय हैं।

↔️तराना की शूटिंग के दौरान कुमार को मधुबाला से प्यार हो गया था। वे सात साल तक रिश्ते में रहे लेकिन नया दौर अदालत के मामले में कुमार ने मधुबाला और उसके पिता के खिलाफ गवाही दी, जिससे उनका रिश्ता खत्म हो गया। मुगल-ए-आजम (1960) के बाद उन्होंने फिर कभी साथ काम नहीं किया। 1950 के दशक के उत्तरार्ध में, वैजयंतीमाला को पत्रिकाओं द्वारा कुमार से जोड़ा गया, जिन्होंने उनके साथ किसी भी अन्य अभिनेत्री की तुलना में सबसे अधिक अभिनय किया, जिसके परिणामस्वरूप उनके बीच शानदार ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री हुई। अपने होम प्रोडक्शन गंगा जमना (1961) के लिए काम करते हुए, कुमार ने कथित तौर पर साड़ी के उस शेड को चुना जिसे वैजयंतीमाला हर दृश्य में पहनती थी।
❤️दिलीप कुमार ने अभिनेत्री सायरा बानो से 1966 में विवाह किया। सायरा बचपन से ही अपने पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार से विवाह करना चाहती थीं। विवाह के समय दिलीप कुमार 44 वर्ष और सायरा बानो 22 वर्ष की थीं। 1981 में कुछ समय के लिए असमा रहमान से दूसरी शादी भी की थी। असमा हैदराबाद की रहने वाली थीं। दिलीप कुमार की मुलाकात उनसे एक क्रिकेट मैच के दौरान उनकी बहनों ने कराई थी। वर्ष 2000 से 2006 तक वे राज्य सभा के सदस्य रहे। 1980 में उन्हें सम्मानित करने के लिए मुंबई का शेरिफ घोषित किया गया। 1991 में भारत सरकार ने उन्हें तीसरे सर्वाेच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण और 2015 में दूूसरे सर्वाेच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। 1995 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1998 में उन्हे पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ भी प्रदान किया गया।
⚰️दिलीप कुमार का 7 जुलाई 2021 को 98 वर्ष की आयु में सुबह 7:30 बजे हिंदुजा अस्पताल, मुंबई में निधन हो गया। लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। वह टेस्टिकुलर कैंसर और फुफ्फुस बहाव के अलावा कई उम्र से संबंधित बिमारियों से पीड़ित थे। महाराष्ट्र सरकार ने उसी दिन जुहू मुस्लिम कब्रिस्तान में राजकीय सम्मान के साथ उनके अंतिम संस्कार को मंजूरी दी।

*अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट में कहा कि कुमार को एक सिनेमाई किंवदंती के रूप में याद किया जाएगा,* 

*जबकि राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा कि "उन्हें उपमहाद्वीप में प्यार किया गया था"।* 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया और शौकत खानम मेमोरियल कैंसर अस्पताल के लिए एक ट्वीट में धन जुटाने के उनके प्रयासों को याद किया। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी कुमार और उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।

गुरुवार, 6 जुलाई 2023

रणबीर

रणवीर सिंह भवनानी 
🎂जन्म 6 जुलाई 1985
 एक भारतीय अभिनेता हैं जो हिंदी फिल्मों में दिखाई देते हैं।
तीन फिल्मफेयर पुरस्कारों सहित कई पुरस्कारों के प्राप्तकर्ता, सिंह देश में सबसे अधिक भुगतान पाने वाले अभिनेताओं में से एक हैं और 2012 से फोर्ब्स इंडिया की सेलिब्रिटी 100 सूची में शामिल हैं। इंडियाना यूनिवर्सिटी ब्लूमिंगटन से स्नातक की डिग्री पूरी करने के बाद, सिंह आगे बढ़ने के लिए भारत लौट आए। फिल्म में करियर.
उन्होंने थोड़े समय के लिए विज्ञापन में काम किया और 2010 में यशराज फिल्म्स की रोमांटिक कॉमेडी बैंड बाजा बारात में एक प्रमुख भूमिका के साथ अपने अभिनय करियर की शुरुआत की।
यह फिल्म आलोचनात्मक और व्यावसायिक रूप से सफल रही, जिससे उन्हें सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
उन्होंने नाटक लुटेरा (2013) में एक उदास चोर की भूमिका निभाई, और संजय लीला भंसाली के साथ रोमांस गोलियों की रासलीला राम-लीला (2013) से शुरुआत करके खुद को हिंदी सिनेमा में स्थापित किया। सिंह को भंसाली के पीरियड ड्रामा बाजीराव मस्तानी (2015) और पद्मावत (2018) में क्रमशः बाजीराव प्रथम और अलाउद्दीन खिलजी को चित्रित करने के लिए आलोचनात्मक प्रशंसा मिली।
उन्होंने पहली फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार और बाद की फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड जीता।
ये एक्शन फिल्म सिम्बा (2018) के साथ, जिसमें उन्होंने शीर्षक चरित्र निभाया, अब तक की सबसे अधिक कमाई करने वाली भारतीय फिल्मों में शुमार है।
उन्हें जोया अख्तर की म्यूजिकल ड्रामा गली बॉय (2019) में रैपर की भूमिका निभाने के लिए भी प्रशंसा मिली।
सिंह ने भंसाली फिल्मों में अपनी सह-कलाकार दीपिका पादुकोण से शादी की है।
↔️रणवीर सिंह भवनानी का जन्म 6 जुलाई 1985 को बॉम्बे , महाराष्ट्र , भारत (अब मुंबई) में एक सिंधी हिंदू परिवार में अंजू और जगजीत सिंह भवनानी के घर हुआ था। उनके दादा-दादी भारत के विभाजन के दौरान कराची , सिंध (वर्तमान पाकिस्तान में) से बॉम्बे चले गए । उनकी एक बड़ी बहन रितिका भावनानी हैं। सिंह चरित्र-अभिनेत्री चांद बर्क के पोते हैं और अभिनेता अनिल कपूर से संबंधित हैं।उनकी पत्नी सुनीता कपूर (नी भवनानी) के माध्यम से उनका परिवार। सिंह बताते हैं कि उन्होंने अपना उपनाम भवनानी हटा दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि नाम "बहुत लंबा, बहुत अधिक शब्दांश" होगा, इस प्रकार उनके ब्रांड को "बिक्री योग्य वस्तु" के रूप में कम महत्व दिया गया।

सिंह हमेशा एक अभिनेता बनने की इच्छा रखते थे, उन्होंने कई स्कूल नाटकों और बहसों में भाग लिया।हालांकि, मुंबई में एचआर कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स में शामिल होने के बाद , सिंह को एहसास हुआ कि फिल्म उद्योग में ब्रेक पाना आसान नहीं था। यह महसूस करते हुए कि अभिनय का विचार "बहुत दूर की कौड़ी" था, सिंह ने रचनात्मक लेखन पर ध्यान केंद्रित किया। वह संयुक्त राज्य अमेरिका गए जहां उन्होंने 2008 में इंडियाना यूनिवर्सिटी ब्लूमिंगटन से दूरसंचार में कला स्नातक की डिग्री प्राप्त की । विश्वविद्यालय में, उन्होंने अभिनय की कक्षाएं लेने का फैसला किया और थिएटर को अपने छोटे छात्र के रूप में चुना ।

अपनी पढ़ाई पूरी करने और 2007 में मुंबई लौटने के बाद, सिंह ने कुछ वर्षों तक ओ एंड एम और जे. वाल्टर थॉम्पसन जैसी एजेंसियों के साथ कॉपीराइटर के रूप में विज्ञापन में काम किया ।उन्होंने सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया, लेकिन अभिनय के लिए इसे छोड़ दिया। फिर उन्होंने अपना पोर्टफोलियो निदेशकों को भेजने का फैसला किया।वह सभी प्रकार के ऑडिशन के लिए जाते थे, लेकिन उन्हें कोई अच्छा अवसर नहीं मिलता था, जबकि केवल छोटी भूमिकाओं के लिए कॉल आते थे: "सब कुछ बहुत निराशाजनक था। यह बहुत निराशाजनक था। कई बार मैं सोचता था कि क्या मैं यह कर रहा हूं सही बात है या नहीं।”

मानी कोल

मणि कौल कश्मीरी पंडित एवं भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे। वे समानान्तर सिनेमा के प्रभावी निर्देशक थे। उन्होंने भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान से स्नातक की शिक्षा पूर्ण की जहाँ वे ऋत्विक घटक के विद्यार्थी थे और बाद में वहाँ शिक्षक भी बने।
जन्म की तारीख और समय: 25 दिसंबर 1944, जोधपुर
मृत्यु की जगह और तारीख: 6 जुलाई 2011, गुरुग्राम
लीक से हटकर फ़िल्में बनाने वाले प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक मणि कौल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

मणि कौल एक प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक थे। उसकी रोटी,आषाढ़ का एक दिन और सतह से उठता आदमी जैसी यथार्थ की पृष्ठभूमि से जुड़ी लीक से हटकर फ़िल्में बनाने वाले प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक मणि कौल को नए भारतीय सिनेमा के पुरोधाओं में से एक माना जाता है। जल्दी ही दुनिया में उन्होंने बड़े फ़िल्मकारों के रूप में अपनी छवि बना ली। संसार के सभी श्रेष्ठ फ़िल्मकारों की फ़िल्में वे देखते थे और उन पर घंटों बात कर सकते थे। उन्होंने बर्कले विश्वविद्यालय में सिनेमा के छात्रों को पढ़ाया भी था।

मणि कौल का जन्म 25 दिसम्बर 1944 को राजस्थान राज्य के जोधपुर शहर में हुआ था। मणि कौल पुणे के फ़िल्म संस्थान में ऋत्विक घटक के छात्र थे। उन्होंने पहले अभिनय और फिर निर्देशन का कोर्स किया और निर्देशन को ही अपना रचनात्मक जुनून बनाया। मुंबइया फ़िल्मों से जुड़े लोग प्रायः उनके काम को उसी तरह कभी सराह नहीं पाए। ऋत्विक घटक के साथ-साथ रूसी फ़िल्मकार
तारकोव्स्की की फ़िल्मों से भी मणि कौल प्रभावित रहे। उन्होंने सिनेमा का नया व्याकरण गढ़ा, जबकि उनके यहाँ तकनीक और नैरेटिव (आख्यान) का इस्तेमाल भी नए तरीके से होता है। उनके सिनेमा में डॉक्यूमेंटरी (वृत्तचित्र) और फीचर फ़िल्म के बीच की रेखा धुँधली हो जाती है, मगर यह उनकी फ़िल्म की ताकत है, कमज़ोरी नहीं।

जिस तरह अच्छा साहित्य आपको नए यथार्थबोध और सौंदर्यबोध से संपन्न करता है, उसी तरह मणि कौल का सिनेमा भी यही काम करता है, मगर इसका मतलब यह नहीं कि उनकी फ़िल्में साहित्य के उस बोध को रूपांतरित
भर करती हैं। सिनेमा का अपना स्वायत्त संसार है, इसलिए यहाँ आकर साहित्य का यथार्थबोध और सौंदर्यबोध एक बिल्कुल नई दीप्ति से जगमगा उठता है। यह दीप्ति ही आभासी संसार का अतिक्रमण करती है। लेकिन मणि कौल कला-फ़िल्मों के फ़िल्मकार ही नहीं हैं, उनका सिनेमा भारतीय सिनेमा की नई धारा का सिनेमा है, जिसे समांतर सिनेमा या न्यू वेव सिनेमा के रूप में भी जाना जाता है। भूत दांपत्य जीवन के आधार पर बनाई 'दुविधा' नामक फ़िल्म जिसमें भूत व्यापारी के पिता को रोजाना सोने की एक मोहर देता है। लेकिन फ़िल्म नहीं
चली। मगर भारत में गंभीर सिनेमा के प्रेमियों और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में इस फ़िल्म को काफ़ी सराहा गया। मणि कौल की लगभग सभी फ़िल्मों के साथ आमतौर पर ऐसा ही हुआ है, चाहे वह "उसकी रोटी" हो , "आषाढ़ का एक दिन" हो, "सतह से उठता आदमी" हो, "इडियट" हो या "नौकर की कमीज" हो। यह बात सिर्फ उन पर ही लागू नहीं होती।
सत्यजीत राय , ऋत्विक घटक और " मृणाल सेन" जैसे महान भारतीय फ़िल्मकारों पर भी लागू होती है जिनको
अंतरराष्ट्रीय ख्याति तो खूब मिली,मगर गुरुदत्त या राजकपूर की फ़िल्मों की तरह वे भारत में ज्यादा चल
नहीं पाईं

मणि कौल उत्कृष्ट साहित्य को अपनी फ़िल्मों के लिए चुनते हैं, चाहे वह "नौकर की कमीज" (विनोद कुमार शुक्ल), "सतह से उठता आदमी" ( मुक्तिबोध ), "आषाढ़ का एक दिन" ( मोहन राकेश ) हो या फिर "इडियट" (फ्योदोर दोस्तोव्स्की)। यहाँ आकर साहित्य के परिचित पात्र नया रूप, नया अर्थ और नई दीप्ति पाते हैं,
मगर उसी सीमा तक जिसमें मणि कौल का सौंदर्य बोध क़ायम रहे। मणि कौल संगीत प्रेमी भी थे। ध्रुपद पर उन्होंने एक वृत्तचित्र भी बनाया था। उनकी फ़िल्म "सिद्धेश्वरी" को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। "उसकी रोटी" एकदम नई तरह की फ़िल्म थी, जिसके जरिए उन्होंने पहली बार फ़िल्म के प्रचलित फॉर्म या रूप को तोड़ा था। इस फ़िल्म को फ़िल्मफेयर क्रिटिक अवॉर्ड मिला था।

प्रमुख_फ़िल्में

उसकी रोटी (1969)
*Uski Roti - A Mani Kaul Film(480P).mp4*एक झलक
आषाढ़ का एक दिन (1971)
दुविधा (1973)
घाशीराम कोतवाल (1979)
सतह से उठता आदमी (1980)
ध्रुपद (1982)
मति मानस (1984)
सिद्धेश्वरी (1989)
इडियट (1992)
द क्लाउड डोर (1995)
नौकर की कमीज़ (1999)
बोझ (2000)

1974- सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (फ़िल्म- दुविधा)
1989- सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र (फ़िल्म- :
सिद्धेश्वरी)
फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए)
1971- उसकी रोटी (1970)
1972: आषाढ़ का एक दिन (1971)
1974: दुविधा (1973)
1993: इडियट (1992)

मणि कौल का 6 जुलाई 2011 को गुड़गाँव , हरियाणा में निधन हो गया। कई साल तक वे नीदरलैंड्स में भी रहे, जहाँ उन्होंने कुछ फ़िल्में और वृत्तचित्र भी बनाए। उनके निधन से सचमुच एक बड़ा फ़िल्मकार हमारे बीच से चला गया है। मगर भारतीय फ़िल्म विधा के विकास में उनका बिलकुल अलग तरह का योगदान है जिसे गंभीर सिनेमा के प्रेमी हमेशा याद रखेंगे।

चेतन आनंद

चेतन आनंद

जन्म की तारीख और समय: 3 जनवरी 1921, लाहौर, पाकिस्तान
मृत्यु की जगह और तारीख: 6 जुलाई 1997, मुम्बई
पत्नी: उमा आनंद (विवा. 1943–1997)
बच्चे: केतन आनंदविवेक आनंद
माता-पिता: पिशोरी लाल आनंद
भाई: विजय आनंददेव आनन्दमनमोहन आनंदशीला कांता कपुर
आज चेतन आनंद की पुण्यतिथि है, इस खास मौके पर हम आपको उनसे जुड़ी कुछ खास बातें बताने जा रहे हैं-
चेतन आनंद का जन्म 3 जनवरी 1915 को हुआ था, वह प्रसिद्ध हिंदी फ़िल्म निर्माता-निर्देशक और पटकथा लेखक थे। बॉलीवुड फ़िल्मों को इस स्तर पर पहली बार पहचान दिलाने का श्रेय चेतन आनंद को जाता है। चेतन आनंद सदाबहार अभिनेता देव आनंद के बड़े भाई थे। देव आनंद चेतन आनंद की बदौलत ही फ़िल्म इंडस्ट्री में आ सके। चेतन आनंद पंजाब के गुरदासपुर में जन्मे और लाहौर से स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद राजनीति में कदम रखा और वह वर्ष 1930 के दशक में कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने दून स्कूल में शिक्षक के रूप में भी कार्य किया, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। प्रिया राजवंश चेतन आनंद की सहयात्री थीं। दोनों ज़िंदगी भर साथ-साथ रहे। शादी नहीं की और उसकी जरूरत भी नहीं समझी। बाहरी दुनिया के लोग उन्हें पति-पत्नी मानते रहे।
इतिहास के शिक्षक रहे चेतन ने वर्ष 1940 के दशक के शुरू में सम्राट अशोक पर एक फ़िल्म की पटकथा लिखी थी। उनका फ़िल्मी सफर वर्ष 1944 में आई फणी मजूमदार की फ़िल्म 'राजकुमार' से शुरू हुआ। उस फ़िल्म में वह मुख्य भूमिका में थे। चेतन ने अभिनय छोड़कर निर्देशन के क्षेत्र में किस्मत आजमाई और जल्द ही उन्होंने इतिहास रच दिया। वर्ष 1946 में बतौर निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म 'नीचा नगर' ने कान फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार हासिल किया। अपने जमाने के सुपरस्टार देवानंद और निर्माता-निर्देशक विजय आनंद के बड़े भाई चेतन की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म 'नीचा नगर' ने वर्ष 1946 में पहले कान फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का अवार्ड जीता था। वह फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली पहली फ़िल्म थी। ख़्वाजा अहमद अब्बास द्वारा लिखित और उमा आनंद, कामिनी कौशल तथा रफ़ीक अहमद के अभिनय से सजी यह फ़िल्म समाज के अमीर और ग़रीब वर्ग के बीच की खाई में झांकती और मानवीय संवेदनाओं को टटोलती है। फ़िल्म समीक्षक ज्योति वेंकटेश ने बताया कि बेहतरीन निर्देशन कौशल की वजह से 'नीचा नगर' का शुमार भारतीय सिनेमा की बेहतरीन फ़िल्मों में किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस फ़िल्म ने भारतीय सिनेमा में सामाजिक यथार्थवाद के चित्रण की परम्परा शुरू की और समानांतर सिनेमा की फ़िल्मों के अन्य निर्देशकों के लिए सृजन का एक नया रास्ता खोला।1950 के दशक के शुरू में उन्होंने अपने छोटे भाई और उस जमाने के मशहूर अभिनेता देवानंद के साथ नवकेतन प्रोडक्शंस के नाम से एक फ़िल्म कम्पनी की स्थापना की। इस बैनर ने बॉलीवुड को अफसर, टैक्सी ड्राइवर और आंधियां जैसी फ़िल्में दीं। बाद में, चेतन ने हिमालय फ़िल्म्स नाम से अपनी अलग कम्पनी शुरू की। इस बैनर ने हिन्दी सिनेमा को हक़ीक़त, हीर रांझा, हंसते जख्म और हिन्दुस्तान की कसम जैसी अच्छी फ़िल्में दीं। इसके अलावा कालाबाज़ार, किनारे-किनारे, आखिरी खत, कुदरत हाथों की लकीरें फ़िल्मों में चेतन ने विभिन्न भूमिकाओं को अंजाम दिया। उन्होंने वर्ष 1988 में 'परमवीर चक्र' नाम से एक धारावाहिक भी बनाया था। उनकी प्रमुख फिल्में बतौर निर्देशक नीचा नगर (1946), आँधियाँ (1952), टॅक्सी ड्राइवर (1954), फ़ंटूश (1956), किनारे किनारे (1963), हक़ीक़त (1964), आखिरी खत (1966), हीर रांझा (1970), हंसते ज़ख्म (1973), हिंदुस्तान की कसम (1973), जानेमन (1976 ), साहब बहादुर (1977), कुदरत (1981), हाथों की लकीरें (1986) आदि. उन्होंने काला बाज़ार (1960) में बतौर अभिनेता के रूप में काम किया था। चेतन आनंद की फ़िल्म हीर रांझा के संवाद कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे। शबाना आज़मी कहती हैं, 'मुझे बड़ी हैरत होती थी कि अब्बा इतना कम बोलते हैं आखिर संवाद लिखते समय उनके और चेतन साहब के बीच बातें क्या होती हैं। चेतन आनंद रोज़ाना सुबह 10 बजे हमारे घर आ जाते थे। वो कमरे के एक कोने में बैठ जाते थे और अब्बा दूसरी तरफ बैठे रहते थे। दोनों के बीच कोई बात नहीं होती थी। और फिर चेतन साहब घर लौट जाते।' लेकिन हीर रांझा के शायराना तरीके से लिखे संवाद बेहद लोकप्रिय साबित हुए।बहुत कम लोगों को शायद यह पता होगा कि चेतन आनंद की पहली फ़िल्म “नीचा नगर” को पाम दी’ओरे (सर्वोत्तम फ़िल्म) पुरस्कार सबसे पहले कान फ़िल्म फेस्टिवल में 1946 में मिला था। चेतन आनंद पहले निर्देशक थे, जिन्होंने राजेश खन्ना को अपनी फ़िल्म ‘आखरी खत’ के लिए चुना था। उसके बाद राजेश खन्ना कामयाबी के शिखर तक पहुंचे। अपनी पत्नी मोना (कल्पना कार्तिक) से देव आनंद की मुलाकात 'बाजी' (1951) के सेट पर हुई थी। चेतन आनंद उन्हें शिमला के सेंट पीटर्स कॉलेज से हीरोइन बनाने के लिए लाए थे। वास्तव में वे चेतन की पहली पत्नी उमा बैनर्जी की छोटी बहन थीं। उमा से चेतन ने लाहौर में कॉलेज की पढ़ाई के समय ही शादी कर ली थी। चेतन आनंद से राज कुमार की गहरी दोस्ती थी और इसी वजह से चेतन के
साथ उन्होंने कई फ़िल्मों 'हिंदुस्तान की कसम', 'कुदरत', 'हीर रांझा' आदि में काम भी किया। राजकुमार को स्टार बनाने में चेतन आनंद का महत्त्वपूर्ण योगदान था। उन्हें 1946 में पाम दी’ओरे (सर्वोत्तम फ़िल्म), कान फ़िल्म फेस्टिवल (नीचा नगर), 1965 में राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ दूसरी फ़ीचर फ़िल्म (हक़ीक़त), 1982 फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ कहानी (कुदरत)बहुत कम लोगों को शायद यह पता होगा कि चेतन आनंद की पहली फ़िल्म “नीचा नगर” को पाम दी’ओरे (सर्वोत्तम फ़िल्म) पुरस्कार सबसे पहले कान फ़िल्म फेस्टिवल में 1946 में मिला था। चेतन आनंद पहले निर्देशक थे, जिन्होंने राजेश खन्ना को अपनी फ़िल्म ‘आखरी खत’ के लिए चुना था। उसके बाद राजेश खन्ना कामयाबी के शिखर तक पहुंचे। अपनी पत्नी मोना (कल्पना कार्तिक) से देव आनंद की मुलाकात 'बाजी' (1951) के सेट पर हुई थी। चेतन आनंद उन्हें शिमला के सेंट पीटर्स कॉलेज से हीरोइन बनाने के लिए लाए थे। वास्तव में वे चेतन की पहली पत्नी उमा बैनर्जी की छोटी बहन थीं। उमा से चेतन ने लाहौर में कॉलेज की पढ़ाई के समय ही शादी कर ली थी। चेतन आनंद से राज कुमार की गहरी दोस्ती थी और इसी वजह से चेतन के साथ उन्होंने कई फ़िल्मों 'हिंदुस्तान की कसम', 'कुदरत', 'हीर रांझा' आदि में काम भी किया। राजकुमार को स्टार बनाने में चेतन आनंद का महत्त्वपूर्ण योगदान था। उन्हें 1946 में पाम दी’ओरे (सर्वोत्तम फ़िल्म), कान फ़िल्म फेस्टिवल (नीचा नगर), 1965 में राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ दूसरी फ़ीचर फ़िल्म (हक़ीक़त), 1982 फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ कहानी (कुदरत)कुदरत)हिन्दी फ़िल्म जगत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की शुरुआत करने वाले इस कलाकार ने 6 जुलाई 1997 आज ही के दिन को 82 वर्ष की उम्र में इस दुनिया से विदा ले ली। लेकिन आज भी उन्हें और उनकी फिल्मों को याद और पसंद किया जाता है।

सार्दुल सिंह क्वात्रा,

संगीत निर्देशक सार्दुल सिंह क्वात्रा की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

सार्दुल सिंह क्वात्रा, जिन्होंने अपने गीतों में शास्त्रीय रागों को सरल बनाया, उन संगीत निर्देशकों में से एक थे, जिन्हें संगीत निर्देशक के रूप में उनकी प्रतिभा की तुलना में बहुत कम फिल्में मिलीं।  उन्होंने आधा दर्जन से अधिक हिंदी और लगभग 25 पंजाबी फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया

सार्दुल का जन्म 1928 में ब्रिटिश पंजाब के लाहौर में एक सिख परिवार में हुआ था।  उन्हें बचपन से ही संगीत का बहुत शौक था।  सार्दुल ने शास्त्रीय संगीत का प्रारंभिक प्रशिक्षण लाहौर के अवतार सिंह से प्राप्त किया।  इसके बाद, उन्होंने उस्ताद हंस राज बहल के सहायक के रूप में अपने कौशल का सम्मान किया।  अमृतसर में एक संक्षिप्त कार्यकाल के बाद, क्वात्रा परिवार बॉम्बे चला गया।

वह एक मुस्लिम लड़की से प्यार करते थे और उसने उसके स्त्रीत्व और आकर्षण के वशीभूत होकर हुए कुछ धुनें बनाईं।  उन्होंने 1947 में लाहौर छोड़ दिया, लेकिन उनकी प्रेमिका की मंत्रमुग्धता उनके विचारों में बनी रही और एक बार उन्होंने स्वीकार किया कि वे प्यार में पड़े बिना अच्छा संगीत नहीं बना सकते। 

सार्दुल ने क्वात्रा परिवार द्वारा निर्मित पंजाबी फिल्म 'पोस्टी' से संगीत निर्देशक के रूप में अपने कैरियर शुरुआत की।  पोस्टी 1950 में रिलीज़ हुई थी और इसने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया था।  सार्दुल के संगीत को भी आलोचनात्मक प्रशंसा मिली।  इसके गीत "दो गुट्टान कर मरियां, काजले दी पानियां" और "जा भैरहा पोस्टी" बहुत लोकप्रिय हुए।  इस फिल्म में सार्दुल ने पंजाब की लोक धुनों में बदलाव किया था।  फिल्म पोस्टी में, सार्दुल क्वात्रा ने आशा भोंसले और जगजीत कौर दोनों को पंजाबी फिल्मों के लिए पार्श्व गायक के रूप में पेश किया।  एक पुरुष पार्श्व गायक के रूप में मोहम्मद रफ़ी उनकी स्पष्ट पसंद थे।  एक अन्य महिला गायिका राजकुमारी, जिन्हें 1941 में लाहौर में जन्मे एक अन्य संगीत निर्देशक खुर्शीद अनवर द्वारा कुरहमई में पंजाबी फिल्मों से परिचित कराया गया था और सार्दुल ने पोस्टी में आठ साल बाद फिर से उनकी आवाज का इस्तेमाल किया।

सार्दुल ने बाद के वर्षों में कुछ हिंदी फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया।  उनके सबसे लोकप्रिय गाने गूंज, मिर्जा साहिबान और पिपली साहिब जैसी फिल्मों के थे।

सार्दुल लाहौर में जन्मी अभिनेत्री-गायक सुरैया के बहुत बड़े प्रशंसक थे। सार्दुल के लंबे समझाने के बाद सुरैया गूंज में अभिनय करने और गाने के लिए तैयार हो गई।  सार्दुल ने इस फिल्म के लिए कुछ यादगार धुनें बनाईं।

1953 में क्वात्रा परिवार ने मिर्जा साहिबान को हिंदी में बनाया।  एक बार फिर नायिका सार्दुल की पहली पसंद श्यामा थीं।  इसे बॉक्स ऑफिस पर सीमित सफलता मिली, लेकिन लता मंगेशकर द्वारा गाए गए और सार्दुल क्वात्रा द्वारा संगीतबद्ध इसके गाने बहुत लोकप्रिय हुए।

1950 में पोस्टी की सफलता पंजाबी में अन्य क्वात्रा फिल्मों के लिए कदम का पत्थर बन गई।  1953 में, एक और क्वात्रा प्रोडक्शन, कौडे शाह एक ब्लॉकबस्टर बन गई।  श्यामा इस फिल्म की नायिका थीं।  इस फिल्म के लोकगीत बहुत लोकप्रिय हुए।  इस समय तक, शमशाद बेगम ने पंजाबी फिल्मों के लिए पार्श्व गायन की पहली महिला के रूप में खुद को स्थापित कर लिया था।  उनकी तीन प्रस्तुतियाँ "मेरे सजन दी दची बादामी रंग दी", "अज्ज सोने कपडे ते चुन्नी वि नंगे ऐ" और "छड़ दे तून मेरा दुपट्टा" लोकप्रिय हुईं।  1954 में बनी एक और पंजाबी फिल्म वंजारा के लिए, लता मंगेशकर ने 1948, 1949 और 1950 के महान वर्षों के बाद पंजाबी फिल्मों में अपने दूसरे कार्यकाल के लिए कुछ एकल और कुछ युगल गीत गाए। यह फिल्म बहुत अच्छा नहीं चली, लेकिन इसका संगीत हिट हो गया।  1950 के दशक के अंत में सार्दुल ने एक और पंजाबी फिल्म बिल्लो के लिए संगीत तैयार किया।  अपने संगीत में, क्वात्रा ने सूक्ष्म रूमानियत की बारीकियों को चित्रित करने के लिए शास्त्रीय रागों को सरल बनाया।

1970 के दशक के मध्य में, सार्दुल क्वात्रा बॉम्बे से चंडीगढ़ चले गए।  थोड़े समय के लिए उन्होंने चंडीगढ़ फिल्म संस्थान की स्थापना की।  इस अवधि के दौरान, उन्होंने पंजाबी फिल्म शहीद उधम सिंह (एक और नाम सरफरोश) के लिए संगीत तैयार किया।  फिल्म और उसके संगीत ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया।  सार्दुल क्वात्रा ने आधा दर्जन हिंदी फिल्मों और लगभग 25 पंजाबी फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया।  हंस राज बहल के बाद, सार्दुल पंजाबी फिल्मों के सबसे विपुल संगीत निर्देशक थे।  उनका आखिरी काम एक पंजाबी फिल्म अंखीली मुटियार (1979) थी।

1970 के दशक में वह मुंबई से चंडीगढ़ और बाद में अमेरिका चले गए, जहां 6 जुलाई 2005 में 77 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

*अब आ यहां देखे सुने या डाउनलोड करे उनकी कुछ रचनाए*

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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
*संगीत निर्देशक सार्दुल सिंह क्वात्रा की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि *
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बुधवार, 5 जुलाई 2023

मुमताज

🎂05 जुलाई
यह मुमताज एक भारतीय पूर्व अभिनेत्री हैं जो मुख्य रूप से तमिल सिनेमा में अपने काम के लिए जानी जाती हैं । तमिल फिल्मों के अलावा, वह हिंदी, कन्नड़, मलयालम और तेलुगु फिल्मों में भी दिखाई दी हैं। उन्होंने टी. राजेंदर की तमिल फिल्म मोनिशा एन मोनालिसा (1999) के माध्यम से फिल्म उद्योग में प्रवेश किया और बाद में कुशी (2000), लूटी (2001) और चॉकलेट (2001) सहित फिल्मों में ग्लैमरस भूमिकाओं में अभिनय करके लोकप्रियता हासिल की। . 2018 में बिग बॉस तमिल 2 में अपनी उपस्थिति के बाद , उन्होंने उद्योग में 19 साल बिताने के बाद हमेशा के लिए फिल्म उद्योग से सेवानिवृत्ति की घोषणा की।
मुमताज ने अपनी स्कूली शिक्षा माउंट में पूरी की। मैरी कॉन्वेंट स्कूल, मुंबई में बांद्रा। एक किशोर उत्साही फिल्म प्रशंसक के रूप में, उन्होंने खुलासा किया कि उनका कमरा श्रीदेवी की विशेषता वाले पोस्टरों से भरा हुआ था , और जब स्कूल बस फिल्मिस्तान स्टूडियो को पार करती थी, तो वह कलाकारों की एक झलक पाने के लिए अपनी गर्दन बाहर कर लेती थी
मुमताज का अभिनय करियर तब शुरू हुआ जब उन्हें फिल्म निर्माता सुधाकर बोकाडे ने मुंबई के माउंट मैरी स्कूल में एक नृत्य कार्यक्रम में देखा , जब उन्होंने 1996 के दौरान दिलीप कुमार के साथ कलिंगा नामक एक चल रही परियोजना को पूरा करने के बाद उनके साथ एक फिल्म करने की पेशकश की। कलिंगा को देरी का सामना करना पड़ा, बोकाडे अंततः मुमताज के साथ फिल्म शुरू नहीं कर सके, भले ही उन्होंने अभिनय कक्षाएं शुरू कर दी थीं।  अभिनय पाठ्यक्रम के दौरान, उन्हें अनुभवी फिल्म निर्माता चेतन आनंद ने भरत शाह द्वारा निर्मित अपनी फिल्म में काम करने के लिए भर्ती किया था, जिसमें शाहरुख खान मुख्य भूमिका में थे। मुमताज ने डेढ़ साल तक शूटिंग शुरू होने का इंतजार किया, लेकिन आनंद की मौत के बाद प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया।बाद में 1997 में, तमिल निर्देशक टी. राजेंदर ने अपनी रोमांटिक ड्रामा फिल्म, मोनिशा एन मोनालिसा (1999)में एक पॉप गायक की मुख्य भूमिका निभाने के लिए मुमताज को साइन किया। अप्रैल 1999 में आलोचकों से नकारात्मक समीक्षा मिलने से पहले, उत्पादन संबंधी समस्याओं और राजेंद्र की राजनीतिक गतिविधि के कारण फिल्म को बनाने में दो साल लग गए।
इसके बाद मुमताज ने एसजे सूर्या की कुशी (2000) में एक विस्तारित अतिथि भूमिका निभाई , जहां उन्होंने विजय और ज्योतिका के साथ एक ग्लैमरस कॉलेज छात्रा की भूमिका निभाई । "कट्टीपुड़ी कट्टीपुदीदा" गीत में उनके प्रदर्शन ने उनकी सराहना की और आगे की फिल्मों के प्रस्ताव प्राप्त किए, और परिणामस्वरूप, मुमताज़ अपनी उपस्थिति शुल्क में काफी वृद्धि करने में सक्षम रहीं।उनकी निम्नलिखित परियोजनाओं में, उनके अभिनय कौशल के बजाय, गीत अनुक्रमों में उनके प्रदर्शन ने उनकी सराहना हासिल की और उन्होंने नियमित रूप से आइटम नंबरों में अभिनय करना स्वीकार किया । 2000 के दशक की शुरुआत में, उन पर फिल्माए गए कुछ अधिक उल्लेखनीय संगीत वीडियो में स्टार (2001) का "रसिगा रसिगा", "मलाई मलाई" शामिल थे।चॉकलेट (2001), लूटी से "मिस्सी मिस्सी पापा"और रोजा कूटम (2002) से "सुब्बम्मा सुब्बम्मा"।

अपने गीतों की सफलता के बावजूद, मुमताज प्रदर्शन-उन्मुख भूमिकाओं का चयन करके फिल्म उद्योग में अपने करियर को लंबा करने की इच्छुक थीं और बाद में उन्होंने एक-गीत प्रस्तुतियों को कम करने के अपने इरादे की घोषणा की।2003 में, वह निर्माता बन गईं और फिल्म थाथी थवधु मनसु को वित्तपोषित किया , जिसमें उनके साथ नौसिखिया अभिनेत्रियां सोना, उर्वसी पटेल और सिंधुरी प्रमुख भूमिकाओं में थीं। यह फिल्म दो वास्तविक जीवन की घटनाओं पर आधारित थी - दिन के उजाले में एक वकील की हत्या और वह दुर्घटना जिसमें 40 लोग मारे गए थे।हालाँकि फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर खराब प्रदर्शन किया, एक आलोचक ने लिखा "फिल्म का दृष्टिकोण दो पूरी तरह से विपरीत दिशाओं के बीच संघर्ष करता है - एक सस्ती, शोषणकारी फिल्म और एक आंसू बहाने वाली फिल्म" और ऐसा लगता है कि "निर्माता ने फिल्म को लाने के लिए उसके ग्लैमर पर भरोसा किया है।" चूंकि फिल्म का शीर्षक और प्रोमो इसी पर ध्यान केंद्रित करते हैं" और "यह दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि मुख्य कहानी वास्तव में काफी अच्छी तरह से ली गई है"।
2000 के दशक के मध्य में, उन्होंने अभिनय भूमिकाओं में वापसी की योजना की घोषणा की, और विशेष रूप से जेरी (2006) और टी. राजेंदर की लंबे समय से विलंबित वीरासामी में दिखाई दीं ।हालांकि, इस अवधि के दौरान उनकी कई अन्य फिल्में अटक गईं और अंततः रिलीज़ नहीं हुईं, जिनमें रविराजा की वेरी गुड , एसए चंद्रशेखर की नेनजंकुटिल नी निक्किराई , इगोर की थिक थिक थिक और मल्टी-स्टारर वेदाकोझी जैसी परियोजनाएं शामिल थीं । उसके बाद से उन्हें शायद ही कभी फिल्मों में देखा गया है, राजाधि राजा में प्रतिपक्षी की भूमिका निभाने के लिए उन्होंने एक संक्षिप्त भूमिका निभाई।(2009), तेलुगु फिल्मों, अथरिंटिकी दारेदी (2013) और आगाडु (2014) में ग्लैमरस सहायक भूमिकाओं में आने से पहले।
↔️बूंद में नीलम
↔️ये तेरा घर ये मेरा घर मेंअनुपम वर्मा के रूप में काम किया

अमरीकी ट्रंप

ट्रंप चले थे ईरान हराने , खुद अभी बने पप्पू  राहुल बने थे शेर ट्रंप के बल , खुद मुंह के बल गिरे।  दोनों हो रह बेइज्जत दुनिया हुई...