शनिवार, 10 जून 2023

पार्श्व एवं ग़ज़ल गायक रूप कुमार राठौड़

*🎂10जुलाई*
पार्श्व एवं ग़ज़ल गायक रूप कुमार राठौड़ के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
रूप कुमार राठौड़ एक भारतीय संगीत निर्देशक और गायक हैं।  
रूप कुमार राठोड़ दिवंगत पंडित चतुर्भुज राठोड़ के बेटे हैं, जो कि की अपने समय के बेहतरीन गायक थे।  पूरे बॉलीवुड में एक उत्कृष्ट पार्श्व गायक और संगीत निर्देशक के रूप में प्रसिद्ध है, जिसने अनुप जलोटा के साथ एक पर्क्यूसिस्टिस्ट के रूप में भी बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया है। रूपकुमार के दो भाई, संगीतकार श्रवण राठौड़ (नदीम-श्रवण जोड़ी का हिस्सा) और गायक विनोद राठौड़ हैं। 
उनकी शादी सोनाली राठौड़ से हुई है। उनकी एक बेटी सुरर्ष या रीवा है जो खुद गायिका है।

गिरीश कर्नाड

*🎂जन्म की तारीख और समय: 19 मई 1938,*
*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 10 जून 2019,*
*महान अभिनेता,कवि,लेखक,रंगकर्मी, नाटककार एवं फ़िल्म निर्देशक गिरीश कर्नाड की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि*

गिरीश कर्नाड  एक जाने माने कवि, रंगमंच कर्मी, कहानी लेखक, नाटककार, फ़िल्म निर्देशक और फ़िल्म अभिनेता हैं। गिरीश कर्नाड को 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार के अलावा पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने हिन्दी में उत्सव, मंथन, इक़बाल, डोर जैसी फ़िल्मों में काम किया।

जीवन_परिचय

गिरीश कर्नाड का जन्म 19 मई, 1938 को माथेरान, महाराष्ट्र में हुआ था। बचपन से उनकी रुचि नाटकों की तरफ थी। महाराष्ट्र में जन्में गिरीश ने स्कूल के समय से ही थियेटर से जुड़कर काम करना शुरू कर दिया था। कर्नाटक आर्ट कॉलेज से स्नातक करने के बाद वह इंग्लैण्ड चले गए। जहाँ उन्होंने आगे की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद गिरीश कर्नाड भारत लौट आए और चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में सात साल तक काम करने के बाद इस्तीफा दे दिया। इस दौरान वह चेन्नई के कई आर्ट और थियेटर क्लबों से जुड़े रहे। इसके बाद वह शिकागो चले गए जहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी और शिकागो में बतौर प्रोफ़ेसर काम किया। तत्पश्चात् गिरीश भारत दुबारा वापस लौट आए और अपने साहित्य के अपार ज्ञान से क्षेत्रीय भाषाओं में कई फ़िल्में भी बनाईं और साथ ही कई फ़िल्मों की पटकथा भी लिखी।

कार्यक्षेत्र

गिरीश कर्नाड केवल नाटककार ही नहीं, अभिनेता, फ़िल्म निर्माता, कहानी लेखक और समाज की आधुनिक समस्याओं को उजागर करने वाले महान् साहित्यकार हैं।

साहित्य

उनका विचार था कि वे कवि बनेंगे, परन्तु जब छात्रवृत्ति लेकर आक्सफ़ोर्ड गए, तो उन्होंने नाटकों की ओर रुझान दर्शाया। उन्होंने पहला नाटक कन्नड़ में लिखा और उसके बाद उसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया। उनके नाटकों में 'ययाति', 'तुग़लक', 'हयवदन', 'अंजु मल्लिगे', 'अग्निमतु माले', 'नागमंडल', 'अग्नि और बरखा' आदि बहुत प्रसिद्ध हैं। गिरीश ने कन्नड़ भाषा में अपनी रचनाएं लिखीं। जिस समय उन्होंने कन्नड़ में लिखना शुरू किया, उस समय कन्नड़ लेखकों पर पश्चिमी साहित्यिक पुनर्जागरण का गहरा प्रभाव था। लेखकों के बीच किसी ऐसी चीज़ के बारे में लिखने की होड़ थी जो स्थानीय लोगों के लिए बिल्कुल नयी थी। इसी समय कर्नाड ने ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों से तत्कालीन व्यवस्था को दर्शाने का तरीका अपनाया तथा काफ़ी लोकप्रिय हुए। गिरीश कर्नाड के नाटक ययाति (1961, प्रथम नाटक) तथा तुग़लक़ (1964) ऐसे ही नाटकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। तुगलक से कर्नाड को बहुत प्रसिद्धि मिली और इसका कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। इनकी कृतियों में जहाँ भारत का पुरातन झाँकता है, वहाँ आधुनिकता का भी सम्मिश्रण है। इस प्रकार साहित्य से सम्बन्धित अनेक क्षेत्रों में काम करने के कारण गिरीश कर्नाड ने कन्नड़ साहित्य को ही समृद्ध नहीं किया, हिन्दी साहित्य भी उनकी देन से अछूता नहीं है।

सिनेमा

गिरीश कर्नाड एक सफल पटकथा लेखक होने के साथ एक बेहतरीन फ़िल्म निर्देशक भी हैं। गिरीश कर्नाड ने वर्ष 1970 में कन्नड़ फ़िल्म 'संस्कार' से अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की जिसकी पटकथा उन्होंने ही लिखी थी। इस फ़िल्म को कई पुरस्कार मिले जिसके बाद गिरीश ने कई फ़िल्में की। उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों में भी काम किया, जिसमें निशांत, मंथन, पुकार आदि प्रमुख हैं। गिरीश कर्नाड ने छोटे परदे पर भी अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम और 'सुराजनामा' आदि सीरियल पेश किए हैं। उनके कुछ नाटक जिनमें 'तुग़लक' आदि आते हैं, सामान्य नाटकों से कुछ भिन्न हैं। गिरीश कर्नाड संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

सम्मान_और_पुरस्कार

1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
1974 में पद्मश्री
1992 में पद्मभूषण
1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार
1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार
1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार
1998 में कालिदास सम्मान
इसके अतिरिक्त गिरीश कर्नाड को कन्नड़ फ़िल्म ‘संस्कार’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।

निधन

मशहूर एक्टर गिरीश कर्नाड का 10 जून 2019, सोमवार को 81 साल की उम्र में निधन हो गया। वह पिछले कई दिनों से बीमार थे।

जीवन

*🎂जन्म 24अक्तूबर*
*⚰️10जून*

लगभग 60 फिल्मों में नारद की भूमिका निभाने वाले महान खल अभिनेता जीवन की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

जीवन हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता थे। उनका पूरा नाम 'ओंकार नाथ धर' था। उन्होंने फ़िल्मी पर्दे पर अपनी भूमिकाओं को बड़ी ही संजीदगी से निभाया। वैसे तो अभिनेता जीवन ने अधिकांश फ़िल्मों में खलनायक की भूमिका निभाई थी, लेकिन फिर भी एक भूमिका ऐसी थी जिसमें दर्शकों ने उन्हें देखना हमेशा पसंद किया। देवर्षि नारद के रूप में उनके द्वारा निभाई गई भूमिका को दर्शक कभी नहीं भूल पायेंगे। नारद मुनि के पौराणिक पात्र को अभिनेता जीवन ने 60 से भी अधिक फ़िल्मों में पर्दे पर जीवंत किया।

अभिनेता जीवन का जन्म 24 अक्टूबर, 1915 को श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर में हुआ था। उनका वास्तविक नाम ओंकार नाथ धर था। जीवन को बचपन से ही अभिनेता बनने का मन था। उनके पुत्र और खुद भी एक जाने माने अभिनेता किरण कुमार ने एक पुराने साक्षात्कार में बताया था कि जीवन के पिता जी पाकिस्तान में स्थित गिलगिट के गवर्नर थे। जीवन की माताजी का देहांत सन 1915 में जीवन साहब के जन्म के समय ही हो गया था। उनकी उम्र तीन साल की होते-होते जीवन के पिताजी भी चल बसे थे। किन्तु गवर्नर साहब के खानदान के पुत्र को सिनेमा में अभिनय जैसे उस समय के निम्न व्यवसाय से नाता जोड़ने की इजाजत परिवार वाले कैसे देते? लिहाजा 18 साल की उम्र में जेब में मात्र 26 रुपये लेकर ओंकार नाथ धर बम्बई (वर्तमान मुम्बई) जाने के लिए घर से भाग गए।

जीवन का घर का नाम ‘जीवन किरण’ था और लोग समझते थे कि उन्होंने अपने साथ बेटे का भी नाम जोड़ा था, परंतु हकीकत ये थी कि उनकी पत्नी का नाम ‘किरण’ था। वे लाहौर की थीं। पर्दे पर अधिकतर खलनायक की भूमिका करने वाले जीवन साहब निजी ज़िन्दगी में इतने भले थे कि पैसों के मामले में कोई अगर उन्हें दगा दे जाये तो वे कहते थे- "उस व्यक्ति को ज्यादा जरुरत होगी"।

मुंबई में फ़िल्मी दुनिया में प्रवेश के लिए स्टुडियो में जो भी काम मिला, वह स्वीकार कर लिया। जीवन साहब और बाद में ‘शोले’ जैसी अनेक फ़िल्मों के अदभूत कैमेरा मेन द्वारका दिवेचा दोनों दोस्त मिलकर, शूटिंग के दौरान स्टार्स के चेहरे चमकाने के लिए उन पर प्रकाश फेंकने वाले यानि रिफ्लैकटर्स को संभालने वाले मज़दूर बन गए। एक दिन स्टुडियो में निर्माता मोहन सिन्हा यानि ‘रजनी गंधा’ की हीरोइन अभिनेत्री विद्या सिन्हा के दादाजी अपनी नई फ़िल्म के लिए नये कलाकारों के स्क्रीन टेस्ट कर रहे थे। सिन्हा जी ने कम्पाउन्ड में उन दोनों दोस्तों को देखा और अच्छी कद-काठी के नौजवान ओंकार नाथ धर को पूछा- "क्या तुम अभिनय करना चाहते हो?" ना कहने का सवाल ही कहाँ था? उनका स्क्रीन टेस्ट हुआ और स्वाभाविक था कि परिणाम अच्छा था। सिन्हा जी ने पूछा- "क्या करते हो?" और युवा ने बताया कि वह उनके स्टुडियो में रिफ्लैक्टर संभालता है।

दूसरा सवाल आया- "क्या कुछ गा सकते हो?" जवाब में ओंकार जी ने पंजाब की अमर प्रेम कथा ‘हीर रांझा’ की कुछ पंक्तियां सुनाई और एक मज़दूरी करने वाले व्यक्ति की अभिनय की यात्रा का आरंभ ‘फैशनेबल इन्डिया’ फ़िल्म से हुआ। जब ओंकार नाथ धर यानि ने विजय भट्ट की फ़िल्म में काम करना शुरू किया, तब उन्होंने नया नाम ‘जीवन’ दिया, जो जीवन भर उनका नाम रहा। उनके अभिनय की एक खासियत ये थी कि खलनायकी में वे कॉमेडी भी डाल देते थे। उन्हें दिलीप कुमार के ख़िलाफ़ खलनायक के रूप में फ़िल्म ‘कोहिनूर’ में देखें या ‘नया दौर’ में, अभिनेता जीवन की टक्कर एक अलग ही माहौल खड़ा करती थी। उनका काम ‘अमर अकबर एथॉनी’ में भी काफ़ी सराहा गया था। सन 1964 की फ़िल्म ‘महाभारत’ में उनकी भूमिका ‘शकुनि मामा’ की थी।

नारद मुनि की भूमिका

अभिनेता जीवन को दर्शकों ने नारद मुनि की भूमिका में काफ़ी पसंद किया। "नारायण.... नारायण..." बोलते जीवन ने देवर्षि नारद के उस पौराणिक पात्र को 60 से अधिक फ़िल्मों में पर्दे पर जीवंत किया था, जो शायद अपने आप में एक विक्रम और एक कलाकार के लिए बड़ी उपलब्धि थी। उनको मुख्य भूमिका में लेकर ‘नारद लीला’ फ़िल्म भी आई थी। फ़िल्म 'जॉनी मेरा नाम' के एक दृश्य में 80 लाख के हीरे छुपाने वाले स्मगलर ‘हीरा’ (जीवन) से जब पुलिस पुछताछ करती है तो वे सिगरेट का धुंआ निकालते हुए कहते हैं- "कमिश्नर साहब, आपको जो चार्ज लगाना हो लगाकर छुट्टी कीजिए.... फालतु अफवाहों पे बहस करने से क्या फायदा?" ऐसे तो जाने कितने ही दृश्य याद आ जाते हैं, जब भी जीवन साहब की स्मृति ताजा होती है। लेकिन दर्शकों ने जीवन को सबसे ज़्यादा नारद मुनि के रूप में ही अपनी यादों में बनाये रखा।

प्रमुख फ़िल्में

जीवन साहब की फ़िल्मों में प्रमुख हैं- ‘दिल ने फिर याद किया’, ‘आबरु’, ‘हमराज़’, ‘बंधन’, ‘भाई हो तो ऐसा’, ‘तलाश’, ‘धरम वीर’, ‘चाचा भतीजा’, ‘सुहाग’, ‘नसीब’, ‘टक्कर’, ‘मेरे हमसफ़र’, ‘डार्लिंग डार्लिंग’, ‘फूल और पत्थर’, ‘इन्तकाम’, ‘हीर रांझा’, ‘रोटी’, ‘शरीफ़ बदमाश’, ‘सबसे बड़ा रुपैया’, ‘गेम्बलर’, ‘याराना’, ‘प्रोफेसर प्यारेलाल’, ‘बुलंदी’, ‘सनम तेरी कसम’, ‘देशप्रेमी’, ‘सुरक्षा’ और ‘लावारिस’ इत्यादि।

जीवन एक ऐसे खलनायक थे, जो हीरो से मार खाने में कभी भी कंजूसी नहीं करते थे। उनका मानना था कि एक फ़िल्म तभी हिट होती है, जब हीरो खलनायक को पीटता है। वह अपने पुत्र किरण कुमार को भी सलाह देते थे कि कोई पात्र तभी हीरो कहलाता है, जब वह खलनायक को बराबर मारता है। इसलिए अपने से कद में छोटे हीरो से भी मार खाने में कसर मत छोड़ो। जीवन से कभी भी निर्माताओं को कोई शिकायत नहीं होती थी, क्योंकि उनके परिवार के किसी सदस्य को सेट पर आना तो दूर की बात थी, फोन भी लंच के समय के अलावा नहीं कर सकते थे। वे अपने अभिनय के प्रति पूरी तरह से समर्पित रहते थे। इसलिए बी. आर. चोपड़ा और मनमोहन देसाई जैसे बड़े निर्माताओं की फ़िल्मों में जीवन साहब नियमित रूप से लिये जाते थे। अभिनेता जीवन के पुत्र किरण कुमार ने एक साक्षात्कार में बताया था कि जीवन साहब धार्मिक स्थानों पर गरीबों को खाना खिलाने में और योग्य विद्यार्थीओं को पढ़ाने में आर्थिक सहायता करते रहते थे। वक्त के पाबंद जीवन साहब कभी भी सेट पर देर से नहीं पहुंचे। जब भी वे शूटींग के लिए हाजिर होते थे, सबसे पहले स्टेज को छू कर नमन करने के बाद ही अपना दिन प्रारंभ करते थे।

अपने काम को पूजा-इबादत जैसा मानने वाले अभिनेता जीवन का 72 साल की उम्र में 10 जून, 1987 को निधन हुआ। नारद मुनि की अपनी अनेक भूमिकाओं और कितनी सारी फ़िल्मों के एक से एक यादगार पात्रों से जीवन साहब हिन्दी सिनेमा के दर्शकों के जीवन में अपना अलग स्थान रखते हुए आज भी ज़िन्दा ही हैं।

मेरा हिंदी गीतों का संग्रह

 



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अश्लीलता स्वीकार नही

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एक दौर ऐसा भी था जब लोगों को गाने सुनने के लिए ऑडियो कैसेट या फिर रेडियो का सहारा लेना पड़ता था। उस वक्त स्मार्टफोन, लैपटॉप या आइपैड नहीं हुआ करते थे। उसी वक्त में एक ऐसा गाना रिलीज हुआ था, जिसने पूरी दुनिया में धूम मचा दी थी। इस गाने को ना सिर्फ देश में बल्कि विदेश में भी सुना गया। हम जिस गाने की बात कर रहे हैं उसके बोल है*तुम तो ठहरे परदेसी*। इस गाने को आपने भी कही ना कही जरूर सुना होगा।


90 के दशक में रिलीज हुए इस गाने की 70 लाख कैसेट रातों-रात बिक गई थीं। ये गाना 1997 में रिलीज हुआ था और इसको लेकर लोगों में दीवानगी इस कदर थी कि मार्केट में इसकी कैसेट आते ही बिक जाया करती थी।

आलम ये था कि कैसेट खत्म हो जाती थी तो लोग कैसेट को खरीदने के लिए दूसरे शहर में पहुंच जाया करते थे।


इस गाने की रातों-रात लाखों ऑडियो कैसेट बिकने के साथ इसे साल का सबसे पॉपुलर गाना भी माना गया था। सबसे ज्यादा ऑडियो कैसेट बिकने की वजह से ये गाना हिंदी एलबम का ऐसा गाना बन गया था, जिसका नाम ‘गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में दर्ज किया गया।

आदि पुरुष

फिल्म ‘आदिपुरुष’ के निर्देशक ओम राउत ने उस समय एक विवाद खड़ा कर दिया जब उन्होंने तिरुपति बालाजी मंदिर में कृति सेनन को किस किया। कुछ लोग इसकी निंदा कर रहे हैं। हाल ही में, इंटरनेट पर एक वीडियो सामने आया, जिसमें ‘आदिपुरुष’ निर्देशक को तिरुपति में भगवान वेंकटेश्वर मंदिर में अपनी फिल्म में सीता की भूमिका निभाने वाली कृति को चूमते हुए दिखाया गया है। मंदिर के मुख्य पुजारी ने इसे ‘निंदनीय कृत्य’ करार दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने उल्लेख किया कि एक पति और पत्नी भी साथ में मंदिर नहीं जाते हैं। निर्देशक और अभिनेत्री एक होटल के कमरे में जा कर ऐसा कर सकते हैं।

आंध्र प्रदेश में भाजपा के राज्य सचिव रमेश नायडू नागोथू ने भी अब हटाए जा चुके ट्वीट में इसकी आलोचना की है। उन्होंने ट्वीट किया था, क्या एक पवित्र स्थान पर इस तरह की हरकत जरूरी है? सार्वजनिक रूप से प्यार जताना, जैसे कि तिरुमाला में भगवान वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर के सामने किस करना और गले लगाना अपमानजनक और अस्वीकार्य है। इस बीच, ‘आदिपुरुष’, जो ज्यादातर गलत वजहों से चर्चा में है, 16 जून को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है।

मीका सिंह

मीका सिंह 
*🎂जन्म 10 जून 1977*

मीका सिंह एक भारतीय पार्श्व गायक और लाइव कलाकार हैं।
गीतों की एक विस्तृत सूची में, प्रमुख हैं "बस एक राजा" (सिंह इज किंग), "मौजा ही मौजा" (जब वी मेट), "इब्न-ए-बतूता" (इश्किया), और "धन्नो" (हाउसफुल) ). मीका ने कम उम्र में अपना करियर शुरू किया और कई एकल एल्बम जारी किए।
उन्होंने विभिन्न रियलिटी शो में भी काम किया और देश में एक मामूली स्टार बन गए।
मीका सिंह पंजाबी सिंगर दलेर मेहंदी के छोटे भाई हैं।
उनके गाने सावन में लग गई आग को यूएस बेस्ड सिंगर पिंकी पारस ने रीमिक्स किया था।

सिंह का जन्म 10 जून 1977 को अमरीक सिंह के रूप में दुर्गापुर , पश्चिम बंगाल में हुआ था।  वह छह भाइयों में सबसे छोटा है। सिंह और उनके बड़े भाई दलेर मेहंदी उनके पिता अजमेर सिंह से प्रेरित थे, जो एक प्रशिक्षित शास्त्रीय संगीतकार थे, जो बचपन से ही पटना साहिब गुरुद्वारे में कीर्तन गाते थे। 

2014 में, सिंह ने अर्जुन कपूर , सोनाक्षी सिन्हा , जैकलिन फर्नांडीज , शाहिद कपूर , अली जफर के साथ O2 एरिना में बॉलीवुड शोस्टॉपर्स में लाइव प्रदर्शन किया और बॉलीवुड डांस ग्रुप बॉली फ्लेक्स द्वारा समर्थित, जो Sky1 के डांस प्रतियोगिता शो में दिखाई दिया, डांस करना है । 

सिंह ने 2016 में डैनी सिंह के सैंडवेल और बर्मिंघम मेला में अपने सबसे बड़े आउटडोर संगीत कार्यक्रम में भी प्रदर्शन किया, जिसमें मेले की कुल अवधि 80,000 थी।

राखी सावंत ने 11 जून 2006 को मीका के खिलाफ जबरन किस करने का मामला दर्ज कराया। 

2018 में सिंह को यूएई में तब गिरफ्तार किया गया था जब उनके खिलाफ ब्राजील की एक किशोर मॉडल द्वारा कथित रूप से यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया और बाद में भारतीय दूतावास के हस्तक्षेप के बाद रिहा कर दिया गया। 

ऑल इंडिया सिने वर्कर्स एसोसिएशन (AICWA) ने 14 अगस्त 2019 को गायक मीका सिंह को कराची, पाकिस्तान में एक कार्यक्रम में प्रदर्शन करने के लिए भारतीय फिल्म उद्योग से प्रतिबंधित कर दिया। पाकिस्तान में यह कार्यक्रम पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के करीबी रिश्तेदार द्वारा आयोजित किया गया था। फिल्म निकाय ने आगे गायक पर बिना शर्त प्रतिबंध लगा दिया और मनोरंजन कंपनियों के साथ सभी फिल्मों और संगीत अनुबंधों से उनका बहिष्कार कर दिया। एसोसिएशन ने मामले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के हस्तक्षेप की भी मांग की।

शुक्रवार, 9 जून 2023

मक़बूल फ़िदा हुसैन


मक़बूल फ़िदा हुसैन

 *🎂जन्म सितम्बर 17, 1915, पंढरपुर*

*⚰️मृत्यु जून 09, 2011, लंदन*

*एम एफ़ हुसैन के नाम से जाने जाने वाले भारतीय चित्रकार थे।*
प्रसिद्ध चित्रकार फ़िल्म गजगामिनी के लेखक एवं निर्देशक माधुरी दीक्षित के जबरदस्त प्रशंसक मक़बूल फिदा हुसैन की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

मक़बूल फ़िदा हुसैन महाराष्ट्र के प्रसिद्ध चित्रकार जिनका पूरा जीवन चित्रकला को समर्पित था और जिन्हें प्रगतिशाली चित्रकार माना जाता है। मक़बूल फ़िदा हुसैन को कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1991 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

↔️जीवन_परिचय

मक़बूल फ़िदा हुसैन का जन्म 17 सितम्बर, 1915 को हुआ था। माँ के देहांत के बाद मक़बूल फ़िदा हुसैन का परिवार इंदौर चला गया। मक़बूल फ़िदा हुसैन ने आरंम्भिक शिक्षा इंदौर से ही की थी। 20 साल की उम्र में वे मुंबई पहुंचे, जहाँ जे. जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में उन्होंने पेंटिंग की शिक्षा ली। लंबे समय तक उन्होंने फ़िल्मों के पोस्टर बना कर अपना जीवन गुजारा।

↔️आरम्भिक_जीवन

मक़बूल फ़िदा हुसैन को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान 1940 के दशक के आख़िर में मिली। वर्ष 1947 में वे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप में शामिल हुए। युवा पेंटर के रूप में मक़बूल फ़िदा हुसैन बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की राष्ट्रवादी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करना चाहते थे। 1952 में ज्युरिख में उनकी पहली एकल प्रदर्शनी लगी। उनकी फ़िल्म 'थ्रू द आइज़ ऑफ़ अ पेंटर' 1966 में फ्रांस के फ़िल्म समारोह में पुरस्कृत हो चुकी है। उन्होंने रामायण, गीता, महाभारत आदि ग्रंथों में उल्लिखित सूक्ष्म पहलुओं को अपने चित्रों के माध्यम से जीवंत बनाया है। 1998 में उन्होंने हैदराबाद में 'सिनेमाघर' नामक संग्रहालय की स्थापना की।

↔️भारत_के_सबसे_महंगे_चित्रकार

क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमरीकी डॉलर में बिकी. इसके साथ ही वे भारत के सबसे महंगे चित्रकार बन गए। उनकी एक कलाकृति क्रिस्टीज की नीलामी में 20 लाख डॉलर में और 'बैटल ऑफ गंगा एंड यमुना- महाभारत 12' वर्ष 2008 में एक नीलामी में 16 लाख डॉलर में बिकी। यह साउथ एशियन मॉडर्न एंड कंटेम्परेरी आर्ट की बिक्री में एक नया रिकॉर्ड था। हालाँकि एमएफ़ हुसैन अपनी चित्रकारी के लिए जाने जाते रहे किन्तु चित्रकार होने के साथ-साथ वे फ़िल्मकार भी रहे। मीनाक्षी, गजगामिनी जैसी फ़िल्में बनाईं। उनका माधुरी दीक्षित प्रेम भी ख़ासा चर्चा में रहा। शोहरत के साथ साथ विवादों ने भी उनका साथ कभी नहीं छोड़ा।

↔️विवादों_से_नाता

जहाँ फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें "भारत का पिकासो" घोषित किया, वहीं वर्ष 1996 में हिंदू देवी-देवताओं की उनकी चित्रकारी को लेकर काफ़ी विवाद हुआ, फलस्वरूप कई कट्टरपंथी संगठनों ने तोड़.फोड़ कर अपनी नाराजगी ज़ाहिर की। जब किसी ने उनसे पूछा कि आपकी चित्रकारी को लेकर हमेशा विवाद होता रहा है, ऐसा क्यों ? उनका जवाब था 'ये मॉर्डन आर्ट है। इसे सबको समझने में देर लगती है। फिर लोकतंत्र है। सबको हक़ है। ये तो कहीं भी होता है। हर ज़माने के अंदर हुआ है। जब भी नई चीज़ होती है। उसे समझने वाले कम होते हैं।' हुसैन साहब का ये अंदाज़े-बयां जताता है कि आलोचनाओं से वे कभी नहीं डरे। अपनी बात भी धड़ल्ले से कही। बहुत कम लोगों को पता है कि जब मुग़ल-ए-आज़म बन रही थी तो निर्देशक के. आसिफ़ साहब ने युद्ध के दृश्य फ़िल्माने से पहले युद्ध और उसके कोस्ट्यूम वगैरह के स्केच हुसैन साहब से ही बनाये थे। जब आसिफ साहब ने 'लव एंड गॉड' बनाई तो आसिफ़ साहब ने 'स्वर्ग' के स्केच भी उन्हीं से बनवाए। एक और विवाद तब उठ खड़ा हुआ जब जनवरी 2010 में उन्हें क़तर ने नागरिकता देने की पेशकश की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था। हैरानी की बात यह है कि हुसैन साहब ने कला का कहीं से भी विधिवत प्रशिक्षण नहीं लिया था। अपने कला जीवन की शुरूआत उन्होंने मुंबई में फ़िल्मों के होर्डिंग पेंट करके की जिसमे उन्हें प्रति वर्ग फुट के चार या छह आना मिलते थे। फ़रवरी 2006 में हुसैन पर हिंदू देवी-देवताओं की नग्न तस्वीरों को लेकर लोगों की भावनाएं भड़काने का आरोप भी लगा और हुसैन के ख़िलाफ़ इस संबंध में कई मामले चले। इस फक्कड़ी चित्रकार ने इसकी परवाह न करते हुए अपने काम से काम रखा। उन्हें जान से मारने की धमकियाँ भी मिलीं। मशहूर अभिनेत्री माधुरी दीक्षित के बड़े प्रशंसक एमएफ़ हुसैन ने उन्हें लेकर 'गज गामिनी' नाम की फ़िल्म भी बनाई। इसके अलावा उन्होंने तब्बू के साथ एक फ़िल्म 'मीनाक्षी- अ टेल ऑफ़ थ्री सिटीज़ बनाई। हुसैन ने अभिनेत्री अमृता राव की भी कई तस्वीरें बनाईं। विवाद हमेशा हुसैन के साथ रहे। कुछ समय पहले जब केरल सरकार की ओर से प्रतिष्ठित राजा रवि वर्मा पुरस्कार उन्हें दिया गया तो मामला कोर्ट कचहरी तक जा पहुंचा।

↔️भारत_के_पिकासो

गायन की विशेषता, उल्लास या अवसाद को चित्र में व्यक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन हुसैन ने यह भी कर दिखाया। एक कार्यक्रम में पंडित भीमसेन जोशी जब अपने गायन का हुनर दिखा रहे थे तो सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में हुसैन ने उनके गायन के साथ कैनवस पर रंगों और रेखाओं से जुगलबंदी करके सबको हैरत में डाल दिया। मुंबई में अपनी कार पर चित्र बनाकर उसका प्रदर्शन करना, शादी के कार्ड, विज़िटिंग कार्ड और बुक कवर डिज़ाइन कर देना, फ़र्नीचर और खिलौने डिज़ाइन करना, अपनी पेंटिंग को साड़ियों पर चित्रित कर देना, सिगरेट की डिब्बी पर तत्काल चित्र बनाकर किसी परिचित को भेंट कर देना, होटल, रेस्टोरेंट या पान के खोखे पर पेंटिंग बना देना, भव्य बिल्डिंगों पर म्यूरल बना देना और युवा कलाकारों की पेंटिंग ख़रीद लेना, ये वे सारे काम थे, जो हुसैन करते रहते थे और उनकी ओर प्रशंसा के फूलों के साथ-साथ आलोचना के पत्थर भी उछलते रहते थे। हुसैन कला सिर्फ कला के लिए वाली अवधारणा को नहीं मानते थे। उनका कहना था, ज़रूरी नहीं कि कलाकार किसी मुद्दे पर आंदोलन करने के लिए सड़कों पर उतरे, लेकिन समाज के प्रति उसकी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही तो होती ही है। साथ ही वह कला के लिए ख़ास माहौल जैसी चीज़ अवधारणा को भी नहीं स्वीकर करते थे। उनके मुताबिक़़, अगर किसी भी तरह की सुविधा नहीं है तो कोयले से दीवार या ज़मीन पर भी चित्र बनाया जा सकता है। बीसवीं शताब्दी में दुनिया में पिकासो के बाद सबसे चर्चित कलाकार हुसैन ही रहे।

↔️बहुआयामी_कलाकार

अपने छह बच्चों में से उन्होंने किसी को भी कलाकार बनने के लिए प्रेरित नहीं किया। उनके बड़े बेटे शमशाद ने जब कला में रुचि दिखाई तो उन्होंने कहा कि पूरे देश में घूमों और हर माध्यम से चित्र बनाने का अभ्यास करो। अगर काम में दम हुआ तो लोगों में तुम्हारी पहचान ज़रूर बनेगी इसी तरह छोटे बेटे उवैस के चित्रकार बनने पर न तो उन्होंने आपत्ति की और न अपनी ओर से उवैस को कला जगत् में स्थापित करने की कोशिश की। चित्रकारी ने हुसैन की पहचान बनाई, लेकिन हुसैन को चित्रकारी से भी ज़्यादा दिलचस्पी फ़िल्मों में रही। 1967 में उनकी बनाई एक प्रयोगात्मक फ़िल्म 'थ्रू द आइज़ ऑफ़ अ पेंटर' ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय शोहरत दिलवाई। इसके बाद हुसैन ने कुछ डाक्यूमेंट्री फ़िल्में भी बनाईं। फिर हुसैन ने माधुरी दीक्षित को लेकर गजगामिनी बनाई। तब्बू और कुणाल कपूर स्टारर मीनाक्षी उनकी अंतिम फ़िल्म थी। चित्रकारी और सिनेमा के अलावा हुसैन की दिलचस्पी कविता में भी थी। उन्होंने अंग्रेज़ी और उर्दू में कविताएं तो लिखी हीं, उर्दू शायरों के हज़ारों शेर हुसैन को याद थे। ग़ालिब, जोश मलीहाबादी और मोहम्मद इक़बाल के कई शेर हुसैन की पेंटिंग का हिस्सा भी बने।

↔️ख़ुशमिजाज़_व्यक्तित्त्व

मशहूर भारतीय चित्रकार अपर्णा कौर कहती हैं कि वो देश के बाहर रहने के लिए मजबूर होते हुए भी हमेशा मुस्कराते रहते। अपर्णा कौर के अनुसार, देश के बाहर रहने के बावजूद वो हमेशा प्रसन्नचित रहते हैं। मैं जानती हूं कि वो इस देश से, इसकी संस्कृति से बेहद प्यार करते हैं और इसलिए इस देश और संस्कृति से दूर रहना उन्हें दुखी कर रहा होगा लेकिन वो ये दु:ख कभी अपने चेहरे पर नहीं आने देते। अपर्णा कौर का कहना था कि हुसैन ज़िंदगी को आख़िर तक जोश के साथ जीना चाहते थे। वो कहतीं हैं कि उनके साथ कुछ सांप्रदायिक सोच वाले लोगों का व्यवहार वाकई ग़ैरज़रुरी है। अपर्णा ने बचपन से ही हुसैन और एक अन्य प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल के काम से प्रेरणा ली है। के. बिक्रमजीत सिंह प्रसिद्ध भारतीय डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मकार और आलोचक हैं जिन्होंने एमएफ़ हुसैन पर एक पुस्तक भी लिखी है। अपनी किताब मक़बूल फ़िदा हुसैन के बारे में बिक्रमजीत सिंह का कहना है, "ये किताब 1947 से 2007 तक हुसैन साहब के काम पर नज़र डालती है। इसमें विस्तार से उनका कला के प्रति नज़रिया है, जैसे उनकी रामायण में रुचि वगैरह। लेकिन मेरी रुचि उनके व्यक्तित्व के बजाय उनकी कला और उसके विकास में ज़्यादा है।" भारतीय चित्रकार वीर मुंशी कहते हैं कि उन्हें पेंट करते देखना अपने आप में एक अनुभव है। वीर मुंशी कहते हैं कि हुसैन एक किवदंती हैं और उनकी कला का आयाम और विविधता बेजोड़ है। वीर मुंशी के अनुसार, "हुसैन की कला यात्रा काफ़ी लंबी रही है और उसमें सभी कुछ है जिसकी आप कल्पना कर सकते हैं। 94 साल की उम्र में उनमें जो ऊर्जा थी वो देखते ही बनती है।"

↔️सम्मान_और_पुरस्कार

मक़बूल फ़िदा हुसैन को सन 1966 में भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। 1973 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया और वर्ष 1986 में उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया। भारत सरकार ने वर्ष 1991 में पद्म विभूषण से सम्मानित गया। हुसैन को अम्मान स्थित रॉयल इस्लामिक स्ट्रैटेजिक स्टडीज सेंटर ने दुनिया के सबसे प्रभावशाली 500 मुस्लिमों की सूची में भी शामिल किया। उन्हें बर्लिन फ़िल्म समारोह में उनकी फ़िल्म 'थ्रू दि आईज ऑफ ए पेंटर' के लिए गोल्डन बीयर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गय। वह 1971 में साओ पाओलो आर्ट बाईनियल में पिकासो के साथ विशेष आमंत्रित अतिथि थे।

⚰️निधन

मक़बूल फ़िदा हुसैन का निधन 9 जून 2011 को लंदन (इंग्लैंड) में हुआ था।

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