बुधवार, 7 जून 2023

श्यामा


*🎂जन्म की तारीख और समय: 7 जून 1935, लाहौर, पाकिस्तान*

*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 14 नवंबर 2017, मुम्बई*

पति: फाली मिस्त्री

बच्चे: शिरीन मिस्त्री, फारूक़ मिस्त्री, रोहिन मिस्त्री
इनाम: फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री (1958)

*🎂श्यामा का जन्म 7 जून 1935*
को ब्रिटिश भारत (अब वर्तमान पाकिस्तान में) के लाहौर में हुआ था। जन्म के समय, उसे उसके माता-पिता द्वारा एक अलग नाम दिया गया था। बाद में, उन्होंने मंच नाम श्यामा को अपनाया। उसने पाँचवीं कक्षा के बाद अपना स्कूल छोड़ दिया, क्योंकि वह अपने अभिनय करियर पर ध्यान देना चाहती थी।

श्यामा के अलावा उन्हें शमा, शमा दुलारी और श्यामा जुत्शी के नाम से भी जाना जाता है। वह फली मिस्त्री की पत्नी हैं, जो भारतीय फिल्म उद्योग में फोटोग्राफी और सिनेमैटोग्राफर के प्रसिद्ध निर्देशक थे। साल 1953 में दोनों ने शादी कर ली।

फली और श्यामा फारूक, रोहिन और शिरीन मिस्त्री के माता-पिता हैं। वह प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना की छात्रा थीं।बद्री प्रसाद. यही कारण है कि वह एक असाधारण कथक नृत्यांगना हैं। उन्होंने अपने 70 साल के करियर में लगभग दो सौ फिल्मों में अभिनय किया है। श्यामा ने बॉलीवुड फिल्मों में साल 1945 में फिल्म ज़ीनत से डेब्यू किया था। यह एक मेलोड्रामैटिक फिल्म थी, जिसका निर्देशन हुसैन रिजवी ने किया था। उसने सहायक भूमिका निभाई। उनके किरदार का नाम खुर्शीद (बेबी) था। श्यामा के पिता ने उनके करियर विकल्प का समर्थन नहीं किया।

जब उन्हें उनकी फिल्म ज़ीनत के बारे में पता चला तो उनके बीच एक बड़ा झगड़ा हुआ। उनकी दूसरी फिल्म शायर नाम की 1949 की रोमांटिक ड्रामा थी। इस फिल्म में उन्होंने फिर से शमा दुलारी की सहायक भूमिका निभाई। 1949 में एचएस रावली द्वारा श्यामा की पांचवीं फिल्म पतंगा को द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में सेट किया गया था। फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत में, उन्हें ज्यादातर सहायक भूमिका निभाते हुए देखा गया था। मुख्य अभिनेता के रूप में अभिनेता की पहली प्रमुख फिल्म वर्ष 1950 में निशाना थी। उन्हें मधुबाला और अशोक कुमार के साथ कास्ट किया गया था।

1951 में, उन्होंने अभिनेत्री मधुबाला के साथ फिर से तराना फिल्म की। फिल्म एक विदेश से लौटे डॉक्टर के बारे में है जो एक गांव में फंस जाता है और गांव की एक लड़की से प्यार करता है। श्यामा ने फिल्म में शीला की भूमिका निभाई थी। वह फिल्म शारदा के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री की श्रेणी के तहत फिल्मफेयर अवार्ड 1958 की प्राप्तकर्ता थीं।

श्यामा को विभिन्न गानों में उनके प्रदर्शन के लिए भी जाना जाता है। उनका सबसे यादगार डांस परफॉर्मेंस फिल्म भाभी का गाना चली चली रे पतंग है। उन्होंने 1954 में रिलीज हुई फिल्म आर पार में जा जा जा जा बेवफा नाम का एक गाना भी किया था। यह गाना बॉलीवुड एक्ट्रेस पर उनकी फिल्म में भी फिल्माया गया है,तनु वेड्स मनु2015 में वापसी। 1970 में, उन्होंने फिल्म सावन भादों में सन सन सन ओ गुलाबी काली गाने पर प्रस्तुति दी, जो रेखा और नवीन निश्चल की पहली फिल्म थी।


प्रमुख फिल्में

वर्ष    फ़िल्म 
1989 हथियार 
1977 खेल खिलाड़ी का 
1975 सेवक 
1975 चैताली 
1974 अजनबी 
1973 प्रभात चम्पा बाई 
1973 हनीमून लक्ष्मी चौधरी 
1973 सूरज और चंदा 
1972 शादी के बाद 
1972 ज़िन्दगी ज़िन्दगी 
1971 कंगन चंपाकली 
1970 मस्ताना 
1967 मिलन 
1967 मेहरबाँ 
1963 घर बसा के देखो 
1960 दुनिया झुकती है 
1960 अपना घर 
1960 बरसात की रात शमा 
1958 पंचायत 
1957 शारदा चंचल 
1957 भाभी तारा 
1957 बंदी 
1956 मक्खी चूस 
1956 भाई भाई संगीता 
1955 मुसाफ़िरख़ाना 
1955 भगवत महिमा 
1954 आर-पार निक्की 
1954 दरवाज़ा 
1952 आसमान 
1951 सज़ा कामिनी 
1951 तराना शीला 
1950 निली 
1950 निशाना 
1950 जान पहचान 
1949 नाच 
1949 शाइर

टिक्कू सलतानिया

हास्य अभिनेता टीकू तलसानिया के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

टीकू का जन्म 7 जून, 1954 को बॉम्बे में हुआ. उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई एक कॉन्वेंट स्कूल से हुई. परिवार में कई डॉक्टर्स थे, इसलिए पापा का सपना था कि उनका बेटा भी बड़ा होकर डॉक्टरी करे. मगर टिकू के प्लैंस कुछ और थे. उन्होंने स्कूल में होने वाले नाटकों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया. तब वो चौथी क्लास में थे. उनकी अभिनय क्षमता की बदौलत उन्हें तमाम इंटर-स्कूल ड्रामा कॉम्पटीशन में हिस्सा लेने का मौका मिला. अब टिकू एक्टिंग को लेकर सीरियस हो रहे थे. मम्मी सपोर्टिव थीं लेकिन पापा इसके सख्त खिलाफ थे. पापा तलसानिया का मानना था कि एक्टिंग दोयम दर्जे का काम है. उन्हें डर इस बात का था कि अगर उनका बेटा फिल्मों और एक्टिंग में चला गया, तो उससे कोई शादी नहीं करेगा.

मगर टिकू धुन के पक्के थे. उन्होंने ठान लिया था कि उन्हें एक्टिंग ही करनी है. जब थोड़े सयाने हुए तो मशहूर थिएटर पर्सनैलिटी प्रवीण जोशी को जॉइन कर लिया. 60 और 70 के दशक में प्रवीण जोशी गुजराती थिएटर के बड़े नाम थे. प्रवीण लंदन के रॉयल अकैडमी ऑफ ड्रमैटिक आर्ट्स से एक्टिंग सीखकर इंडिया आए और INT जॉइन कर लिया. INT यानी इंडियन नेशनल थिएटर. ये थिएटर ग्रुप कई क्षेत्रिय भाषाओं में नाटकों का मंचन करता था, जिसमें सबसे बड़ी संख्या गुजराती नाटकों की होती थी. प्रवीण के साथ रहने की वजह से टिकू को सीखने के साथ-साथ एक्सपोज़र भी मिला.

टिकू प्रवीण जोशी के साथ फुल फ्लेज़्ड तरीके से थिएटर की दुनिया में काम कर रहे थे. उनका नाटक तमाम नामी-गिरामी लोग देखने पहुंचते थे. एक बार अपने ट्रूप के साथ टिकू किशमिश नाम के गुजराती नाटक में हिस्सा ले रहे थे. यहां ऑडियंस में कुंदन शाह नाम का भी एक शख्स बैठा था. ये वही कुंदन शाह हैं, जिन्हें आगे चलकर- जाने भी दो यारों, कभी हां कभी ना और क्या कहना जैसी फिल्में बनानी थीं. कुंदन उन दिनों एक टीवी शो पर काम कर रहे थे. किशमिश में उन्हें टिकू का काम पसंद आया. वो घर आए और टिकू को फोन कर मिलने के लिए बुलाया. यहां हुई बातचीत के बाद 1984 में टिकू को उनके करियर का पहले टीवी शो- ये जो है ज़िंदगी में काम मिल गया. इस शो में पहले ही शफी इनामदार, सतीश शाह और स्वरूप संपत जैसे एक्टर्स काम कर रहे थे. टीवी पर लॉन्च होने के कुछ ही दिनों के भीतर ये बड़ा हिट हो गया. इसके बाद टिकू को ‘ये दुनिया गज़ब की’ नाम का शो ऑफर हुआ. इस सीरियल में भी टिकू का रोल कॉमिक फ्लेवर लिए हुए था.

टीवी वगैरह में काम देखकर टिकू तलसानिया को सिनेमा के ऑफर्स मिलने शुरू हो गए. पहला ऑफर ही बड़ा अजीब आया. 1986 में रिलीज़ होने वाली इस फिल्म का नाम था- ड्यूटी. इसे डायरेक्ट किया था रविकांत नगैच ने. रविकांत मशहूर सिनेमैटोग्राफर थे. 1967 में जीतेंद्र और बबीता के साथ फर्ज़ नाम की स्पाई थ्रिलर फिल्म से उन्होंने अपना डायरेक्शन डेब्यू किया था. ड्यूटी के हीरो गोविंदा था और टिकू के खाते आया फिल्म के मेन विलन का रोल. जो शख्स टीवी पर देश का सबसे पॉपुलर कॉमेडी एक्टर बन चुका था, उसने अपनी पहली ही फिल्म में विलन का रोल किया. फिल्म नहीं चली. इस असफलता पर चुटकी लेते हुए टिकू कहते हैं- ‘ड्यूटी 12 बजे थिएटर्स में लगी और साढ़े 12 बजे उतर गई’.

1986 में टिकू कूी पहली फिल्म रिलीज़ हुई थी. इसमें टिकू ने एक नेता का रोल किया था. आप पोस्टर के लोअर लेफ्ट कॉर्नर पर टिकू की फोटो देख सकते हैं. 
1986 में टिकू कूी पहली फिल्म रिलीज़ हुई थी. इसमें टिकू ने एक नेता का रोल किया था. आप पोस्टर के लोअर लेफ्ट कॉर्नर पर टिकू की फोटो देख सकते हैं.
टिकू के करियर की पहली फिल्म को लेकर बड़ा कंफ्यूज़न का माहौल रहता है. कुछ लोग 1986 में ही आई राजीव मेहरा डायरेक्टेड- प्यार के दो पल को टिकू की पहली फिल्म बताते हैं. ये कंफ्यूज़न इसलिए क्रिएट हुआ क्योंकि दोनों ही फिल्म 1986 में ही रिलीज़ हुई थीं. मगर टिकू अपने इंटरव्यूज़ में ड्यूटी को अपने करियर की पहली फिल्म बताते हैं. शुरुआत भले ही नेगेटिव रोल से हुई हो मगर टिकू ने आगे सिर्फ और सिर्फ पॉज़िटिव रोल्स किए. उन्होंने अपने करियर में अंदाज़ अपना अपना, दिल है कि मानता नहीं, इश्क, जुड़वा, डुप्लीकेट, देवदास और पार्टनर जैसी फिल्मों में काम किया.

आमिर खान ने 25 बार अपनी फिल्म देखी और फिर टिकू का सीन बदलवा दिया
महेश भट्ट आमिर खान के साथ एक फिल्म बना रहे थे. इस फिल्म से वो अपनी बेटी पूजा को लीड रोल में लॉन्च करना चाहते थे. पूजा भट्ट ने 1989 में आई फिल्म डैडी से अपना डेब्यू किया था. मगर उस फिल्म में लीड रोल अनुपम खेर ने किया था. खैर, इस फिल्म का नाम रखा गया दिल है कि मानता नहीं. इसमें टिकू तलसानिया आमिर खान के बॉस और डेली तूफान नाम के अखबार के एडिटर के रोल में दिखलाई पड़े थे. फिल्म के आखिरी हिस्से में आमिर और टीकू का एक सीन था. इसमें आमिर का किरदार टीकू को पैसे वापस करता है. टीकू पैसे लेते हैं और वापस आमिर को दे देते हैं. ये सीन शूट हो गया. टीकू इस सीन में अपने काम से काफी सैटिसफाइड महसूस कर रहे थे. उन्हें भरोसा था कि इसके बाद उन्हें दूसरे फिल्ममेकर्स नोटिस करना शुरू कर देंगे.

दिल है कि मानता नहीं की रिलीज़ से ठीक 15 दिन पहले टिकू को महेश भट्ट ने फोन किया. महेश ने टिकू से कहा कि वो फिल्मसिटी आ जाएं. टिकू ने पूछा- हुआ क्या. इसके जवाब में महेश भट्ट ने झल्लाते हुए कहा-

‘ये आमिर यार! सब बात फोन पर नहीं बता सकता फटाफट फिल्मसिटी आ जा.’

जैसे ही टिकू फिल्मसिटी पहुंचे, तो आमिर गेट पर खड़े थे. टिकू समझ गए कि उनका वो सीन जाने वाला है. आमिर ने टिकू को कुर्सी पर बैठाते हुए कहा-

‘ये वही सीन है, जिसके बारे में आप सोच रहे हैं. हमें ये दोबारा शूट करना पड़ेगा.’

वजह पूछने पर आमिर ने बताया कि उन्होंने पिछले दिनों ये फिल्म 20-25 बार देखी. और इस दौरान एक गलती उनकी पकड़ में आई. आमिर ने कहा-

‘पूरी फिल्म में मेरे कैरेक्टर ने किसी से पैसे नहीं लिए. वो ईनाम के पैसे भी नहीं लेता. अपने पिता के पैसे भी नहीं लेता. अगर वो इस सीन में आपसे पैसे ले लेगा, तो पूरा कैरेक्टर खराब हो जाएगा.’

टिकू को लगा कि बड़ी मामूली सी चीज़ थी, जो शायद दर्शक नोटिस भी नहीं करते. मगर आमिर ने इतनी माइन्यूट चीज़ का भी ख्याल रखा. टिकू बताते हैं कि वो आमिर को हमेशा से अच्छा एक्टर मानते थे मगर इस घटना के बाद उनकी परफेक्शन और कैरेक्टर की समझ के कायल हो गए. आगे आमिर और टिकू ने अंदाज़ अपना अपना और इश्क जैसी फिल्मों में साथ काम किया.

दिल है कि मानता नहीं में टिकू ने एक अखबार के एडिटर का रोल किया था, जहां आमिर का किरदार काम करता है.

जब संजय लीला भंसाली देवदास बनाने जा रहे थे, तो उन्होंने टिकू को फोन किया. भंसाली ने उन्हें ये रोल यह कहकर ऑफर किया कि वो इस रोल के लिए किसी ऐसे एक्टर को चाहते हैं, जिसके पास एक्टिंग की बढ़िया रेंज हो. भंसाली ने इस रोल में टिकू को अपने राइटर प्रकाश कपाड़िया की सलाह पर कास्ट किया था. प्रकाश और टिकू की जान-पहचान पुरानी थी क्योंकि दोनों ने एक गुजराती प्ले में साथ काम किया हुआ था. और प्रकाश इस प्ले में टिकू के काम से काफी इंप्रेस्ड थे. टिकू का मानना है कि हर कॉमेडियन चाहता है कि वो अपने करियर कुछ गंभीर रोल्स करे. मगर उन्हें टाइपकास्ट कर दिया जाता है. मगर टिकू के पास कॉमेडी से इतर कुछ करने का मौका खुद चलकर आया था, जिसे उन्होंने दोनों हाथों से लपका. शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय, माधुरी दीक्षित और जैकी श्रॉफ स्टारर इस फिल्म में टिकू को धरमदास के रोल में लिया गया था. धरमदास, देवदास का केयरटेकर था. फिल्म में माधुरी और ऐश्वर्या के साथ उनके दो सीन्स हैं. इन दोनों ही सीन्स में देवदास के प्रेम में पड़ी ये महिलाएं, धरमदास से उसे शराब से दूर रखने की बात कहती हैं.

फिल्म देवदास में टिकू ने धरमदास नाम के केयरटेकर का रोल किया था.
देवदास के अधिकतर हिस्सों की शूटिंग देर रात और तड़के सुबह हुआ करती थी. टिकू बताते हैं कि रात को 2 बजे शूटिंग के लिए जाते देख, उनकी फैमिली बड़ी हैरान थी. एक दिन सेट पर पहुंचे और उनकी मुलाकात हुई माधुरी दीक्षित से. तब तक दोनों कई फिल्मों में साथ काम कर चुके थे. राजा भी उनमें से एक थी, जिसके गुस्सा दिलाने वाले सीन का ज़िक्र हमने सबसे पहले किया था. माधुरी अपनी शादी और हनीमून से लौटने के बाद पहली फिल्म कर रही थीं. सेट पर माधुरी को देखकर टीकू की आंखें चौंधिया गईं. टीकू ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि माधुरी शादी के बाद और भी ज़्यादा खूबसूरत लग रही थीं. इतनी ज़्यादा खूबसूरत कि माधुरी के चेहरे से उनकी नज़र नहीं हट रही थी. इतने में माधुरी ने ये चीज़ नोटिस कर ली. उन्होंने बिना देर किए टीकू से पूछ लिया कि वो उन्हें इतनी देर से घूर क्यों रहे हैं. टिकू ने उन्हें कहा- यू लुक स्टनिंग मैम. इतना कहने के बाद वो फौरन वहां से रफूचक्कर हो लिए.

सतीश शाह और टीकू तलसानिया इन दोनों ही एक्टर्स ने एक साथ कई प्रोजेक्ट्स पर काम किया है. इसलिए दर्शकों में इनको लेकर एक कंफ्यूज़न बना रहता है. टीकू ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि उनके टीवी शो ‘ये जो है ज़िंदगी’ से उनका डायलॉग ‘ये क्या हो रहा है?’ खूब फेमस हुआ था. इसमें सतीश और टीकू दोनों साथ काम कर रहे थे. टीकू के इस डायलॉग के लिए कई लोगों ने सतीश शाह को बधाई दे दी. 

टिकू के पिता को लगता था कि एक्टिंग की फील्ड में जाने की वजह से टिकू की कभी शादी नहीं हो पाएगी. क्योंकि किसी नाचने-गाने वाले को कोई भी पिता अपनी बेटी नहीं देगा. टिकू ने अपने पिता की इस बात को गलत साबित करते हुए क्लासिकल डांसर और थिएटर आर्टिस्ट दिप्ती से शादी कर ली. दिप्ती और टिकू को दो बच्चे हैं. रोहन और शिखा. शिखा भी एक्टर हैं. 2009 में आई रणबीर कपूर- कोंकणा सेन शर्मा स्टारर फिल्म वेक अप सिड से उन्होंने अपना फिल्म एक्टिंग डेब्यू किया था. आगे वो दिल तो बच्चा है जी, मिडनाइट्स चिल्ड्रेन और वीरे दी वेडिंग जैसी फिल्मों का हिस्सा रह चुकी हैं. शिखा पिछले दिनों वरुण धवन के साथ कुली नं 1 में भी दिखाई दी थीं

टिकू तलसानिया ने छोटे-बड़े रोल्स मिलाकर अपने करियर में कुल 200 से ज़्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं. और आज भी कर रहे हैं. वो आखिरी बार अक्षय कुमार की फिल्म स्पेशल 26 में एक छोटे से किरदार में दिखाई दिए थे. उसके बाद से वो फिल्मों से दूर मगर टीवी पर टीवी पर लगातार काम कर रहे थे. अगले कुछ समय में उनकी दो फिल्में रिलीज़ होने वाली हैं. पहली है ब्रूनी जिसकी शूटिंग निपट चुकी है और फिल्म लंबे समय से रिलीज़ का इंतज़ार कर रही है. और दूसरी फिल्म है प्रियदर्शन डायरेक्टेड हंगामा 2. ये 2003 में आई फिल्म हंगामा का सीक्वल है. इस फिल्म में परेश रावल और शिल्पा शेट्टी के साथ टिकू तलसानिया भी नज़र आने वाले हैं. इस फिल्म पर काम जारी है.

अगर आपको लगता है कि टीकू तलसानिया सिर्फ एक्टर हैं, तो इस गफलत को दूर कर लीजिए. एक्टिंग के अलावा वो बाइकिंग, पैराग्लाइडिंग और फोटोग्रफी भी करते हैं. थिएटर एक्टिंग में भी उनका जुगाड़ कतई इंट्रेस्टिंग है. जब फिल्म और टीवी में काम मिलता है, तो इंडिया में काम करते हैं लेकिन जैसे ही यहां का काम खत्म होता है, तो उनकी फ्रीलांस थिएटर एक्टिंग शुरू हो जाती है. वो अमेरिका और यूरोप के कई नाटकों में हिस्सा लेने लगते हैं. बकौल टीकू इससे उन्हें दो फायदे होते हैं. पहला, रोटी चलती रहती है और दूसरा, फिल्मों से इतर मनपसंद काम करने का मौका भी मिल जाता है. टिकू अपनी फैमिली के साथ मुंबई के मलाड इलाके में रहते हैं.

मंगलवार, 6 जून 2023

अभय सपोरी

अभय रुस्तम सोपोरी 

*🎂जन्म 7 जून 1979*

*एक भारतीय संतूर वादक, संगीतकार और कंडक्टर हैं। वह संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी के पुत्र हैं , जिन्हें उनकी बहुमुखी प्रतिभा, नवाचारों और प्रयोग के लिए जाना जाता है। सोपोरी को संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, और 'भारत शिरोमणि पुरस्कार' और 'उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार' जैसे पुरस्कारों के सबसे कम उम्र के प्राप्तकर्ताओं में से एक हैं। अभय को अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन TEDx में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था ।*

सगे-संबंधी
भजन सोपोरी (पिता)
संगीत कैरियर
मूल
कश्मीरी
शैलियां
फ्यूजन संगीत, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत
साधन
संतूर
उपलब्धता
अभय रुस्तम सोपोरी के नवीनतम संगीत एल्बम देखें, Youtube Music , Spotify और अन्य चैनलों
पर उपलब्ध 

अभय रुस्तम सोपोरी का जन्म 7 जून 1979 को भारत के जम्मू और कश्मीर की कश्मीर घाटी में स्थित श्रीनगर शहर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता संगीतकार भजन सोपोरी और अपर्णा सोपोरी थे, जो अंग्रेजी साहित्य की प्रोफेसर थीं। उन्होंने अपने रहस्यवादी शैव-सूफी परंपरा के पारंपरिक गुरु-शिष्य परम्परा के तहत संतूर को अपने दादा शंभू नाथ सोपोरी से सीखा, जम्मू और कश्मीर में "शास्त्रीय संगीत के पिता" और उनके पिता भजन सोपोरी के रूप में प्रसिद्ध हुए। 

अभय कश्मीर के सूफियाना घराने का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पारंपरिक संतूर वादकों के परिवार से आते हैं, जिनकी नौ पीढ़ियां 300 से अधिक वर्षों में फैली हुई हैं। 

सोपोरी के पास प्राचीन कला केंद्र, चंडीगढ़, भारत से संगीत में स्नातक और मास्टर डिग्री है और दिल्ली विश्वविद्यालय से वाणिज्य में स्नातक और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कंप्यूटर हैं ।

आजीविका

सोपोरी बचपन से ही भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ पश्चिमी और सूफियाना संगीत में भी प्रशिक्षित थे। संतूर के अलावा, उन्होंने गायन, भारतीय शास्त्रीय सितार, सूफियाना सितार और पियानो भी सीखा। उन्होंने अपने पिता द्वारा रचित ऑल इंडिया रेडियो के लिए एक संगीत सुविधा के लिए 3 साल की उम्र में अपना पहला गीत रिकॉर्ड किया और 1985 में श्रीनगर कश्मीर में 8000 से अधिक आवाजों की विशेषता वाले अपने पिता की भव्य कोरल प्रस्तुति का भी हिस्सा थे । 

उन्होंने सोपोरी एकेडमी ऑफ म्यूजिक एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स (सामापा) द्वारा आयोजित कश्मीर में अक्टूबर 2005 में 100 से अधिक गायकों की अपनी पहली कोरल प्रस्तुति प्रस्तुत की। अभय का जम्मू और कश्मीर लोक संगीत पहनावा (सोज़-ओ-साज़) भी कई अन्य त्योहारों और सम्मेलनों में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें नई दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में प्रस्तुत 'जम्मू और कश्मीर महोत्सव' शामिल है। 2009 और 2010 में पुणे में गणेश कला क्रीड़ा रंगमंच, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध और मंत्रमुग्ध कर दिया। अभय के क्लासिकल फ्यूजन को भी शानदार समीक्षाएं मिली हैं। 

2000 में, अभय ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए घाटी भर के युवाओं के लिए प्रदर्शन करते हुए कश्मीर में अपना संगीत कार्य शुरू किया और उन्हें संगीत के माध्यम से युवाओं को एक साथ लाने के लिए जम्मू और कश्मीर के पूरे सांस्कृतिक परिदृश्य को बदलने का श्रेय दिया जाता है। जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों में उनके संगीत कार्यक्रमों में 20,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया है। 

1990 के दशक के मध्य में एक शास्त्रीय संतूर वादक के रूप में अपनी शुरुआत के बाद से, अभय ने संयुक्त राज्य अमेरिका , रूस , ब्राजील , मॉरीशस , जापान , दक्षिण कोरिया , सिंगापुर , जर्मनी , फ्रांस , इटली जैसे देशों में भारत और दुनिया भर के प्रतिष्ठित समारोहों में प्रदर्शन किया है । स्लोवाकिया , चेक गणराज्य , हंगरी , स्वीडन , स्विट्जरलैंड , स्पेन , स्लोवेनिया , यूक्रेन ,थाईलैंड , मलेशिया , वियतनाम , मोरक्को , ईरान , इज़राइल , बहरीन , दुबई , आदि।

सोपोरी ने 2011 में 'सूफी किंशिप शीर्षक से 'सूफी म्यूजिक एनसेंबल' की अवधारणा पेश की, जिसमें 35 संगीतकार शामिल थे और संतूर ने 2014 में एक भारतीय शास्त्रीय संगीत एनसेंबल का नेतृत्व किया जिसमें 25 संगीतकार शामिल थे और पूरे भारत में विभिन्न संगीत कार्यक्रमों में प्रदर्शन किया।

उन्होंने 2013 में जर्मनी के बवेरियन स्टेट ऑर्केस्ट्रा द्वारा प्रदर्शित हफ्तरंग (कश्मीरी में सात रंग) नामक फ्यूजन रचना के लिए संगीत तैयार किया , साथ में उनके कश्मीरी लोक संगीत कलाकारों की टुकड़ी सोज़-ओ-साज़ के साथ, कश्मीरी संगीत को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई। कॉन्सर्ट का 100 से अधिक देशों में सीधा प्रसारण किया गया था। ऑर्केस्ट्रा में लगभग 100 संगीतकार शामिल थे। 

सोपोरी ने ऑस्ट्रियाई विएना बॉयज़ क्वायर , मोरक्कन लुटिस्ट हज यूनुस, ईरानी संतूर खिलाड़ी डेरियस सघाफी, अमेरिकी डुलसीमर खिलाड़ी मैल्कम दलगिश, फ्रांसीसी शहनाई वादक लॉरेंट क्लॉएट और अन्य के साथ प्रस्तुतियों सहित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग भी किया है। 

उन्होंने विभिन्न सांस्कृतिक पदों पर कार्य किया है जैसे:

महासचिव, सामापा (सोपोरी संगीत और प्रदर्शन कला अकादमी) (सामापा), भारत की सबसे प्रमुख और प्रतिष्ठित संगीत अकादमियों और संगठनों में से एक (2005 के बाद) 
केंद्रीय समिति के सदस्य, जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति और भाषा अकादमी, सरकार। जम्मू और कश्मीर (2016 के बाद) 
जनरल काउंसिल के सदस्य, जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति और भाषा अकादमी, सरकार। जम्मू और कश्मीर (2016 के बाद) 
सदस्य, संपादकीय बोर्ड, जेके संगीत पहल, उच्च शिक्षा विभाग, सरकार द्वारा संगीत पत्रिका। जम्मू और कश्मीर (2018 के बाद) 
विजिटिंग फैकल्टी, मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय, एमहर्स्ट यूएसए (2004)

एकता कपूर

*🎂जन्म 7 जून 1975*
एकता कपूर; भारतीय टीवी और फिल्म उद्योग में एक प्रसिद्ध निर्माता का जन्म 7 जून 1975 को भारत में हुआ था। वह मूल रूप से अपनी प्रोडक्शन कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स की रचनात्मक निदेशक और संयुक्त प्रबंध निदेशक हैं। की बेटी हैशोभा कपूरऔर अभिनेता जितेंद्र। तुषार कपूर, उनके भाई भी बॉलीवुड फिल्मों में काम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल माहिम से पूरी की और मीठीबाई कॉलेज गईं।

सुश्री कपूर ने कई शानदार सोप ओपेरा, अविस्मरणीय फिल्में और लंबे समय से याद की जाने वाली टीवी श्रृंखला का निर्माण किया है। कस्तूरी, कभी सौतन कभी सहेली, हम पांच, कसौटी जिंदगी की, कहीं तो होगा, मिया फौज में बीवी मौज में, काव्यांजलि, क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कुसुम, कितनी मोहब्बत है, कुटुंब,तेरे लिए, बंदिनी, किस देश में है मेरा दिल, जिंदगी के सपनों का और क्या हुआ तेरा वादा उनके कुछ पसंदीदा सोप ओपेरा हैं। वर्तमान में, वह बड़े अच्छे लगते हैं, पवित्र बंध, में काम कर रही हैं।पवित्र रिश्तातथा ये है मोहब्बतें।

एकता ने 2001 में निर्माता के रूप में अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत क्यो की मैं झूठ नहीं बोलता और कुछ तो है से की थी। उनकी बहुत प्रसिद्ध फिल्म में से एक हैकृष्णा कुटीरकई रिकॉर्ड तोड़े और अभी भी सबसे पसंदीदा बने हुए हैं। वह अपनी ब्लॉक बस्टर फिल्मों वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई, डर्टी पिक्चर, शूटआउट एट वडाला, वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा, इक विलन, सी कोम्पनी और के लिए भी जानी जाती हैं।एक थी डायन.

नेहा ककड़


*🎂06जून*
*पार्श्वगायिका नेहा कक्कड़ के 🎂जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं🌹*

नेहा कक्कड़ एक भारतीय पार्श्व गायिका है. वह देखने में बहुत सुन्दर है बॉलीवुड में उन्हें सेल्फी क्वीन के नाम से बुलाते है. वर्तमान में वह देश के लोगों में सबसे पसंदीदा गायिका बनी हुई है. 2006 के टीवी रियलिटी शो इंडियन आइडल 2 में उन्होंने भाग लिया था. 2008 में नेहा ने मीत ब्रदर्स द्वारा कंपोज्ड अलबम नेहा द रॉक स्टार से अपने गाने की शुरुआत की. गाने के साथ ही उनका डांस और मॉडलिंग की तरफ भी झुकाव है. उन्होंने बॉलीवुड में बहुत से हिट गाने को गाया है. वह कई तरह के लाइव शो कर चुकी है और साथ ही वो जगराता में भी गा चुकी है. उनके 1000 से भी ज्यादा लाइव शो है जो उन्होंने किया है ऐसा करने के कारण उनके चाहने वाले उन्हें भारतीय शकीरा नाम से बुलाते है. वह यूटूब पर भी काफ़ी मशहूर है.

नेहा कक्कड़ शुरूआती जीवन

नेहा कक्कड़ का जन्म 6 जून 1988 को भारत के उत्तराखंड राज्य के ऋषिकेश में हुआ था. 29 वर्षीय टैलेंटेड गायिका नेहा जब 4 साल की थी तभी से उन्होंने धार्मिक भजन गाना शुरू कर दिया था. उन्होंने बताया था की उनके परिवार को चलाने के लिए उनके पिता कितनी मेहनत करते थे. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि वो गाने को लेकर अपनी बड़ी बहन से प्रेरित हुई थी.

नेहा कक्कड़ शिक्षा 

नेहा की शिक्षा – दीक्षा दिल्ली में ही हुई है. उन्होंने दिल्ली के न्यू होली पब्लिक स्कूल से अपनी शुरूआती पढाई लिखाई की है. जब वो 11 वीं में दिल्ली में थी तब उन्होंने एक रियलिटी शो में भाग लिया था, बाद में गाने की तरफ झुकाव और व्यस्तता की वजह से उनकी पढाई पूरी नहीं हो पाई. क्योकि उनके पास समय का आभाव था जिस वजह से वो कॉलेज नहीं जा पाई. 

नेहा कक्कड़ परिवार 

नेहा के परिवार में उनके माता पिता के अलावा उनकी एक बहन और भाई भी है. उनके पिता का नाम ऋषिकेश कक्कड़ है, जोकि एक गैर सरकारी संस्था में काम करते है और माता जी का नाम नीति कक्कड़ है वह एक गृहिणी है. नेहा कक्कड़ के भाई का नाम टोनी कक्कड़ है जोकि एक म्यूजिक डायरेक्टर है. टोनी ने क्रियेचर 3डी, परागुए और हंजू में म्यूजिक दिया हुआ है, और उनकी बहन का नाम सोनू कक्कड़ है, वो भी एक गायिका है.

नेहा कक्कड़ करियर 

नेहा के करियर की शुरुआत रियलिटी शो के माध्यम से हुई थी. वे अपने दम पर टॉप स्थापित गायकों की सूचि में अपने नाम को दर्ज करा चुकी है. नेहा कॉमेडी सर्कस के तानसेन में काम कर चुकी है. वह स्टार प्लस पे आने वाले शो जो जीता वही सुपरस्टार में भी भाग ले चुकी है. वह कलर्स पर आने वाले मशहुर शो का शीर्षक गीत भी गा चुकी है, जिसके बोल थे ‘ना आना इस देश मेरी लाडो’. पंजाबी में उनके दो गाने सबसे ज्यादा पसंद किये गए जिसके बोल थे ‘जैगुआर ते पयार और वे रंजा वे माहिया

नेहा कक्कड़ के गाने 

उनके द्वारा सबसे पहला गाना 2009 में मेहरबानी में ‘हाय रामा’ गाया गया था जो की प्रदर्शित नहीं हुई.
2009 फिल्म ब्लू का गाना उनके द्वारा गाया गया.
2009 में फ़िल्म जेल आई, जिसमे उन्होंने गाना ‘बरेली के बाजार में’ को रिमिक्स में गाया.
फिर 2011 में ‘वोह एक पल’ गाई.
2012 में फ़िल्म आई ‘कॉकटेल’ जिसमें उन्होंने ‘सेकंड हेंड जवानी’ गाना को गाया यह गीत काफी हिट रहा.
2013 में फिल्म ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ के लिए उन्होंने ‘धतिंग नाच’ गाना गाया.
2013 में ही उनके एक और गीत को लोगों ने खूब पसंद किया, जो फिल्म ‘रमैया वस्ताव्वैया’ का था, वह था ‘जादू की झपी’.
2013 की फिल्म परागुए का गाना ‘बोतल खोल’ भी नेहा ने गाया.
2014 में आई फिल्म ‘यारियां’ के गीत ‘सुन्नी सुन्नी सड़कों पे’ गाना गाया यह बहुत लोकप्रिय हुआ था. इसी वर्ष ‘जॉनी हो दफ़ा’ और ‘लन्दन ठुमुक्दा’ भी काफी हिट रहा.            
2015 में आई फिल्म जिसका नाम था ‘एक पहेली लीला’, उसमे इन्होने ‘एक दो तीन चार’ गाना गाया था.
2015 में फिल्म ‘गब्बर इज बैक’ का गाना ‘आओ राजा’ गाया.
2016 में कपूर एंड संस के ‘गीत कर गयी चूल’, ‘सनम रे’ के गीत ‘हमने पी रखी है’, ‘ओ जानिया’ फिल्म ‘फ़ोर्स’, ‘माहि वे’ गाने को अपनी आवाज दी, फिल्म ‘वन नाईट स्टैंड’ के गीत ‘दो पेग मार’, फ़िल्म ‘वजह तुम हो’ के ‘माहि वे’ गाना, ‘फेवर’ फिल्म का गीत ‘मिले हो तुम हमको’, फिल्म ‘बार बार देखो’ का गाना ‘काला चश्मा’ अभी भी लोगों के जुबान पर चढ़ा हुआ है.
2017 में फिल्म ‘बद्री की दुल्हनिया’ का शीर्षक गीत, फ़िल्म ‘मशीन’ का गीत ‘चीज़ बड़ी है मस्त’ गाया.
ये सारे उनके द्वारा गाये हुए गाने उनके करियर और सफलता के किस्सों को बयाँ करते है वह अपना मुकाम बनाने के लिए अनवरत सफलता की सीढियां चढ़ती ही जा रही है. इसके अलावा उन्होंने 2010 में एक फ़िल्म भी की थी, जिसका नाम ‘इसी लाइफ में’ था. 2014 में उनकी अलबम आया ‘रोमियो जूलियट’.

D रामा नायडू

ईई*●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●
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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*

*🎂जन्म की तारीख और समय: 6 जून 1936, कारम्चेडू*
*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 18 फ़रवरी 2015, हैदराबाद*

*पत्नी: दग्गुबती राजेश्वरी (विवा. 1958–2015)*

*बच्चे: दग्गुबाती सुरेश बाबू, लक्ष्मी, दग्गुबाती वेंकटेश*

*पोते या नाती: राना दग्गुबाटि, नागा चैतन्य, मालविका दग्गुबाती,*

*इस संगठन की स्थापना की: सुरेश प्रोडक्शंस*

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उनकी लोकप्रिय हिदी फिल्मों में प्रेम नगर, दिलदार, बंदिश, अनाड़ी, हम आपके दिल में रहते हैं और प्रेम कैदी है। नायडू के अभिनेता पुत्र विक्टरी वेंकटेश ने बताया कि वह पिछले कुछ महीनों से कैंसर से जूझ रहे थे और दोपहर करीब ढाई बजे उनका निधन हो गया। उन्होंने बताया कि गुरुवार को उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। नायडू कुछ समय के लिए राजनीति में भी सक्रिय रहे। उन्होंने 1999 में तेलुगु देशम टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीता था।नायडू की फिल्म निर्माण कंपनी सुरेश प्रोडक्शन ने तेलुगु, तमिल और हिदी समेत 15 भाषाओं में करीब 150 फिल्मों का निर्माण किया। उनका जन्म 1936 में आंध्र के प्रकाशम जिले में हुआ था। 1963 में उनकी पहली फिल्म अनुरागम आई थी। उन्होंने 1964 में सुपरहिट रामुडू-भीमुडू बनाई। इसमें एनटी रामाराव ने अभिनय किया था। 

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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*

प्रेम नगर
https://youtu.be/C4_Jk1Xkrcc

दिलदार

https://youtu.be/vK5vD1OwLDM

बंदिश
https://youtu.be/0yrTZO1fzYo

अनाड़ी
https://youtu.be/xTSc8_-Q65M

हम आपके दिल में रहते हैं
https://youtu.be/yJGmbnAy2N4

 प्रेम कैदी

https://youtu.be/71o3v4wFLaU
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वेद प्रकाश शर्मा

*🎂06जून 1955*
*⚰️मृत्यु17 फ़रवरी, 2017*
प्रसिद्ध उपन्यासकार फ़िल्म पटकथा लेखक वेद प्रकाश शर्मा के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

वेद प्रकाश शर्मा हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकार एवं फ़िल्म पटकथा लेखक थे। इन्होंने सस्ते और लोकप्रिय उपन्यासों की रचना की है। 'वर्दी वाला गुंडा' वेद प्रकाश शर्मा का सफलतम थ्रिलर उपन्यास है। इस उपन्यास की लगभग 8 करोड़ प्रतियाँ बिक चुकी हैं। भारत में जनसाधारण में लोकप्रिय थ्रिलर उपन्यासों की दुनिया में यह उपन्यास "क्लासिक" का दर्जा रखता है।

वेदप्रकाश शर्मा का जन्म 6 जून 1955 को हुआ था। उन्हें किशोरावस्था से ही पुस्तकें पढ़ने और लिखने का शौक था। युवावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही उन्होंने उपन्यास लेखन शुरू कर दिया था। कुछ ही दिन में वह पाठकों के पसंदीदा लेखक हो गए थे। वेदप्रकाश शर्मा को बचपन से ही उपन्यास पढ़ने का शौक था। उनके इसी शौक ने उन्हें देश भर में पहचान दिलाई। बात 1972 की है। हाईस्कूल की परीक्षा देकर वह गर्मी की छुट्टियों में अपने पैतृक गांव बिहरा (बुलंदशहर) गए थे। उपन्यास के शौकीन वेदप्रकाश अपने साथ दर्जन भर से अधिक किताबें ले गए थे। कुछ ही दिन में उन्होंने सारी किताबें पढ़ डालीं। समय व्यतीत करने के लिए उन्होंने उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। पिता को यह बात पता चली, तो उन्हें काफ़ी डांट पड़ी। बाद में पिता ने पढ़ा तो उनके दिल को बेटे की लेखन शैली छू गई। उन्होेंने 250 से अधिक उपन्यास लिखे। उनके लिखे उपन्यास बेहद प्रेरणादायक और उद्देश्य परक होते थे। वर्ष-1993 में उनके उपन्यास 'वर्दी वाला गुंडा' ने उन्हें देशभर में काफ़ी शोहरत दिलाई थी, जिसकी आठ करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। बॉलीवुड में भी उनके लेखन के जलवे थे। उनके परिवार में पत्नी मधु शर्मा के अलावा बेटा शगुन और तीन बेटियां हैं।

#फ़िल्म_पटकथा_लेखन

फिल्म 'अनाम' (1993) की पटकथा वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी। इसका निर्देशन रमेश मोदी ने किया था। इसके बाद रिलीज हुई फिल्म 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' (1995) उनके उपन्यास 'लल्लू' पर आधारित थी। इसका निर्देशन उमेश मेहरा ने किया था। इसकी अगली सिरीज इंटरनेशनल खिलाड़ी की भी कहानी वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी, जो 1999 को रिलीज हुई थी। इसके अलावा उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'केशव पंडित' पर वर्ष 2010 में टीवी सीरियल भी बना। यह भी दर्शकों में खूब चर्चित हुआ। 'बहू मांगे इंसाफ' पर शशिलाल नायर के निर्देशन में 'बहू की आवाज' फिल्म बनी। एक बार मेरठ आए सुपरस्टार आमिर खान की जब उनसे मुलाकात हुई थी, तो उन्होंने एक फिल्म के लिए स्क्रिप्ट लिखने का आग्रह किया था और वेद प्रकाश उस पर काम कर रहे थे। उनके उपन्यास छोटे पर्दे पर सीरियल के रूप में भी सामने आए।

#प्रसिद्धि

राजनीतिक के अलावा पुलिस और प्रशासनिक अफसरों में उनके नाम की खूब चर्चा होती थी। आम आदमी की भाषा में लिखने वाले वेद प्रकाश शर्मा देश के बड़े लेखक में शुमार हुए। उनसे जुड़े लोगों के मुताबिक़, एक बार वह बेगमपुल पर घूम रहे थे। तभी वर्दी में एक दरोगा पहुंचते हैं। वह कुछ लोगों पर ऐसे डंडे बरसाते हैं, जैसे बदमाशों को पीट रहे हों। वेद प्रकाश शर्मा वर्दी वाले उस दरोगा को देखते हैं। बाद में उनके मन में जो विचार पनपा, उसी ने उन्हें बड़े मुकाम तक पहुंचा दिया। वर्दी वाला गुंडा उपन्यास में उनके द्वारा लिखी गई घटना को पढ़कर आज भी पुलिस अफसर सीख लेते हैं। वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का पाठकों को लंबा इंतजार रहता था। मूवी टिकट की तरह ही शहर के कई बुक स्टॉल पर उनके उपन्यासों की एडवांस बुकिंग होती थी। वर्ष-1993 में प्रकाशित उपन्यास वर्दी वाला गुंडा की पहले ही दिन देशभर में 15 लाख प्रतियां बिक गई थीं। शहर के सभी बुक स्टॉल पर कुछ ही घंटों में उपन्यास की प्रतियां समाप्त हो चुकी थीं। बुकिंग कराने वाले कई लोगों को उपन्यास नहीं मिलने से निराशा हाथ लगी थी।

#चर्चित_उपन्यास

वेद प्रकाश शर्मा ने वर्दी वाला गुंडा, केशव पंडित, बहू मांगे इंसाफ, दहेज में रिवाल्वर, तीन तिलंगे, डायन, भस्मासुर, सुपरस्टार, पैंतरा, सारे जहां से ऊंचा, रैना कहे पुकार के, मदारी, क्योंकि वो बीवियां बदलते हैं, कुबड़ा, चक्रव्यूह, शेर का बच्चा, सबसे बड़ा जासूस, रणभूमि, लाश कहां छुपाऊं, कफ़न तेरे बेटे का, देश न जल जाए, सीआईए का आतंक, हिंद का बेटा, कर्फ्यू, बदसूरत, चकमा, गैंडा, अपराधी विकास, सिंगही और मर्डर लैंड, मंगल सम्राट विकास समेत 250 से अधिक उपन्यास लिखे हैं।

#सम्मान_एवं_पुरस्कार

वेद प्रकाश शर्मा को वर्ष 1992 व 1994 में मेरठ रत्न अवार्ड, वर्ष-1995 में नटराज अवार्ड और वर्ष 2008 में नटराज भूषण अवार्ड नवाजा गया था। इसके अलावा भी उन्हें अपने रचनाकर्म के लिए कई सम्मान मिले।

निधन

वर्दी वाला गुंडा जैसे चर्चित उपन्यासों के जरिये पाठकों के दिलों पर राज करने वाले प्रख्यात उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा का निधन 17 फ़रवरी, 2017 शुक्रवार को रात करीब 11:50 बजे अपने शास्त्रीनगर स्थित आवास पर हो गया।

अमरीकी ट्रंप

ट्रंप चले थे ईरान हराने , खुद अभी बने पप्पू  राहुल बने थे शेर ट्रंप के बल , खुद मुंह के बल गिरे।  दोनों हो रह बेइज्जत दुनिया हुई...