मंगलवार, 6 जून 2023

प्रीति सागर


प्रसिद्ध पार्श्वगायिका प्रीति सागर के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
प्रीति सागर एक बॉलीवुड पार्श्व गायिका हैं, जिन्होंने 1978 में मंथन के गीत "मेरो गाम कथा पारे" के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता था और जूली (1975) के हिट गीत "माय हार्ट इस बीटिंग" के लिए नामांकन प्राप्त किया था।
करियर

उन्होंने बॉलीवुड फिल्म जूली में अपने अंग्रेजी गीत, "माय हार्ट इस बीटिंग" के साथ तुरंत प्रसिद्धि प्राप्त की। उन्होंने वर्ष 1975 में उसी के लिए एक फिल्मफेयर पुरस्कार में नामांकन पाया। उन्होंने 1978 में बॉलीवुड फिल्म मंथन के गीत "मेरो गाम कथा पारे" के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। उन्होंने कई गाने गाए हैं, बॉलीवुड फिल्मों में, भारतीय टीवी के लिए और निजी कैसेट्स के लिए। उनका एक पॉप एल्बम, "विद लव", जिसमें 10 गाने थे, को एक साथ 8 भारतीय भाषाओं में रिलीज़ किया गया था।

उन्होंने पॉप गाने, भारतीय शास्त्रीय गीत, भक्ति भजन, लोक गीत, ग़ज़ल आदि गाए हैं। उन्होंने प्रसिद्ध बॉलीवुड फ़िल्म निर्देशकों और संगीत निर्देशकों जैसे राजेश रोशन, श्याम बेनेगल, शशि कपूर, वनीता भाटिया, रवि, बप्पी लहरी, शंकर जयकिशन, जयदेव, अनु मलिक, ताहिर हुसैन, शक्ति सामंत, साई परांजपे, केतन देसाई आदि के लिए काम किया है। वह बेहद लोकप्रिय भारतीय टीवी धारावाहिकों जैसे फूल खिले हैं गुलशन गुलशन, पॉप टाइम्स, फुलवारी बच्चों की, आरोही आदि में दिखाई दी। वह बच्चों के मनोरंजन और शिक्षा उद्योग में उनके योगदान के लिए भी जानी जाती हैं। उन्होंने "सा रे गा मा" (जिसे पहले एचएमवी के रूप में जाना जाता था) के साथ हिन्दी और अंग्रेजी में कई बच्चों की नर्सरी कविता संग्रह के ऑडियो और वीडियो संस्करण बनाने के लिए काम किया था।

निजी जीवन

6 जून को मुंबई में जन्मी और पली-बढ़ी प्रीति ने क्वीन्स मैरी स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके अलावा, उन्होंने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से कला में स्नातक की डिग्री हासिल की। 1977 में उन्होंने सोमी सरन से शादी की। वह अपने पति के साथ मुंबई में रहती हैं। उनकी दो बेटियां हैं, अनीशा और आकांक्षा।

लोकप्रिय गीत

जूली (1975) - माय हार्ट इस बीटिंग
निशांत (1975) - पिया बाज पियाला पिया जाए ना
मंथन (1976) - मेरो गाम कथा पारे
भूमिका (1977) - तुम्हारे बिन जी ना लागे
कलयुग (1981) - व्हाट्स यॉर प्रोब्लम
मंडी (1983) - शमशेर भरे न मांग गज़ब
लॉकेट (1986) - जो भी कहना सच है कहना

सुनील दत्त


*🎂06जून*
*⚰️ 25मई*

महान अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, राजनीतिज्ञ सुनील दत्त के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

सुनील दत्त भारतीय सिनेमा में एक ऐसे अभिनेता थे जिनको पर्दे पर देख एक आम हिन्दुस्तानी अपनी ज़िंदगी की झलक देखता था। सुनील दत्त 2004-05 के दौरान भारत सरकार में युवा मामलों और खेल विभाग में कैबिनेट मंत्री भी रहे।सुनील दत्त का वास्तविक नाम बलराज रघुनाथ दत्त था।

हिन्दी सिनेमा जगत में सुनील दत्त को एक ऐसी शख़्सियत के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने फ़िल्म निर्माण, निर्देशन और अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। उनके किरदार वास्तविक जीवन के बहुत क़रीब होते थे और उनका व्यक्तित्व भी उनके किरदार की तरह उज्ज्वल और प्रभावशाली रहा। सुनील दत्त का जन्म 6 जून, 1929 को पंजाब (पाकिस्तान) के झेलम ज़िले के खुर्दी गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सुनील दत्त बचपन से ही अभिनय के क्षेत्र में जाना चाहते थे। बलराज साहनी फ़िल्म इंडस्ट्री में अभिनेता के रुप में उन दिनों स्थापित हो चुके थे, इसे देखते हुए उन्होंने अपना नाम बलराज दत्त से बदलकर सुनील दत्त रख लिया। उनका बचपन यमुना नदी के किनारे मंदाली गाँव में बीता जो हरियाणा प्रदेश में है। सुनील दत्त इसके बाद लखनऊ चले गये और जहाँ पर वह अख्तर नाम से अमीनाबाद गली में एक मुसलमान औरत के घर पर रहे। कुछ समय बाद अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह मुंबई चले गए।

मुम्बई आकर सुनील दत्त ने मुंबई परिवहन सेवा के बस डिपो में चेकिंग क्लर्क के रुप में कार्य किया, जहाँ उनको 120 रुपए महीने के मिलते थे। फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए 1955 से 1957 तक सुनील दत्त संघर्ष करते रहे। हिन्दी सिनेमा जगत में अपने पैर जमाने के लिए वह ज़मीन की तलाश में एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो भटकते रहे थे। उसके बाद सुनील दत्त ने 'जय हिंद कॉलेज' में पढ़कर स्नातक किया। सुनील दत्त ने रेडियो सिलोन की हिन्दी सेवा के उद्घोषक के तौर पर अपना कैरियर शुरू किया था। जहाँ वह फ़िल्मी कलाकारों का इंटरव्यू लिया करते थे। एक इंटरव्यू के लिए उन्हें 25 रुपये मिलते थे। यह दक्षिण एशिया की पचास के दशक मे सबसे लोकप्रिय रेडियो सेवा थी

सुनील दत्त ने 'मदर इंडिया' फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक आग की दुर्घटना में नर्गिस को अपनी जान की परवाह किये बिना बचाया। इस हादसे में सुनील दत्त काफ़ी जल गए थे तथा नर्गिस पर भी आग की लपटों का असर पड़ा था। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया और उनके स्वस्थ होकर बाहर निकलने के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया। नर्गिस 11 मार्च, 1958 में सुनील दत्त की जीवन संगिनी बन गई।

सुनील दत्त की पहली फ़िल्म 'रेलवे प्लेटफॉर्म' 1955 में प्रदर्शित हुई, जिसमें उन्होंने अभिनेता के रूप में कार्य किया। अपनी पहली फ़िल्म से उन्हें कुछ ख़ास पहचान नहीं मिली। उन्होंने इस फ़िल्म के बाद 'कुंदन', 'राजधानी', 'किस्मत का खेल' और 'पायल' जैसी कई छोटी फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन इनमें से उनकी कोई भी फ़िल्म सफल नहीं हुई।

1957 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'मदर इंडिया' से सुनील दत्त को अभिनेता के रूप में ख़ास पहचान और लोकप्रियता मिली। उन्होंने इस फ़िल्म में एक ऐसे युवक 'बिरजू' की भूमिका निभाई जो गाँव में सामाजिक व्यवस्था से काफ़ी नाराज़ है और इसी की वजह से विद्रोह कर डाकू बन जाता है। साहूकार से बदला लेने के लिए वह उसकी पुत्री का अपहरण कर लेता है लेकिन इस कोशिश में अंत में वह अपनी माँ के हाथों मारा जाता है। इस फ़िल्म में नकारात्मक हीरो का किरदार निभाकर वह दर्शकों के दिल में जगह बनाने में सफल रहे।

सुनील दत्त की सुपरहिट फ़िल्म 'वक़्त' 1965 में प्रदर्शित हुई। उनके सामने इस फ़िल्म में बलराज साहनी, राजकुमार, शशि कपूर और रहमान जैसे नामी सितारे थे, इसके बावज़ूद सुनील अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। सुनील दत्त के सिने करियर का 1967 सबसे महत्त्वपूर्ण साल साबित हुआ। उस साल उनकी 'मिलन', 'मेहरबान' और 'हमराज़' जैसी सुपरहिट फ़िल्में प्रदर्शित हुई, जिनमें उनके अभिनय के नए रूप देखने को मिले। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद वह अभिनेता के रुप में शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे।

सुनील दत्त भारतीय सिनेमा के उन अभिनेताओं में से एक है जिनकी फ़िल्मों ने पचास और साठ के दशक में दर्शकों पर अमित छाप छोड़ी। 'मदर इंडिया' की सफलता के बाद उन्हें 'साधना' (1958), 'सुजाता' (1959), 'मुझे जीने दो' (1963), 'ख़ानदान' (1965 ), 'पड़ोसन' (1967 ) जैसी सफल फ़िल्मों से भारतीय दर्शको के बीच एक सफल अभिनेता के रूप में पहचान मिली। सुनील दत्त को निर्देशक बी. आर. चोपड़ा के साथ 'गुमराह' (1963), 'वक़्त' (1965 ) और 'हमराज़' (1967) जैसी फ़िल्मों में निभाई गई यादगार भूमिकाओं ने भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय किया।

सुनील दत्त के सिने करियर पर नज़र डालने पर पता लगता है कि वह मल्टी स्टारर फ़िल्मों का अहम हिस्सा रहे है। फ़िल्म निर्माताओं को ऐसी फ़िल्मों में जब कभी अभिनेता की ज़रूरत होती थी वह उन्हें नज़र अंदाज़ नहीं कर पाते थे। सुनील दत्त की मल्टीस्टारर सुपरहिट फ़िल्मों में 'नागिन', 'जानी दुश्मन', 'शान', 'बदले की आग', 'राज तिलक', 'काला धंधा गोरे लोग', 'वतन के रखवाले', 'परंपरा', 'क्षत्रिय' आदि प्रमुख हैं।

1993 में प्रदर्शित फ़िल्म 'क्षत्रिय' के बाद सुनील दत्त लगभग 10 वर्ष तक फ़िल्म अभिनय से दूर रहे। विधु विनोद चोपड़ा के ज़ोर देने पर उन्होंने 2007 में प्रदर्शित फ़िल्म 'मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस' में अभिनय किया। फ़िल्म में उन्होंने अभिनेता संजय दत्त के पिता की भूमिका निभाई। पिता-पुत्र की इस जोड़ी को दर्शकों ने काफ़ी पसंद किया। इस फ़िल्म के माध्यम से पहली बार पिता पुत्र (सुनील दत्त और संजय दत्त) एक साथ पर्दे पर नजर आए थे। हालांकि फ़िल्म 'क्षत्रिय' और 'रॉकी' में भी सीनियर और जूनियर दत्त ने साथ काम किया मगर एक भी दृश्य में वे साथ में नहीं थे।

फ़िल्म 'यादें' (1964) के साथ सुनील दत्त ने फ़िल्म निर्देशन में भी क़दम रखा। इस पूरी फ़िल्म में सिर्फ एक युवक की भूमिका थी जो अपने संस्मरण को याद करता रहता है। इस किरदार को सुनील दत्त ने निभाया था। उनकी यह फ़िल्म बहुत सफल नहीं रही, लेकिन भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा गई।

सुनील दत्त ने 1963 में प्रदर्शित फ़िल्म 'यह रास्ते है प्यार के' के ज़रिए फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी क़दम रख दिया। यह फ़िल्म टिकट खिड़की पर ज़्यादा सफल नहीं रही। इस फ़िल्म के बाद सुनील दत्त ने फ़िल्म 'मुझे जीने दो' का निर्माण किया। यह फ़िल्म डाकुओं के जीवन पर आधारित थी। यह फ़िल्म सुपरहिट साबित हुई। इसके बाद उन्होंने अपने भाई सोम दत्त को बतौर मुख्य अभिनेता फ़िल्म 'मन का मीत' में लांच किया। सोम दत्त का फ़िल्मी सफर बहुत सफल नहीं रहा। सुनील दत्त ने 1971 में अपनी महत्वकांक्षी फ़िल्म 'रेशमा और शेरा' का निर्माण और निर्देशन किया। इस फ़िल्म में उन्होंने भूमिका भी निभाई। यह एक पीरियड और बड़े बजट की फ़िल्म थी जिसे दर्शकों ने नकार दिया। निर्माता और निर्देशक बनने के बाद भी सुनील दत्त अभिनय से कभी ज़्यादा समय के लिए दूर नहीं रहे।[1] सुनील दत्त की सत्तर और अस्सी के दशक में बनी फ़िल्में 'प्राण जाए पर वचन ना जाए' (1974), 'नागिन' (1976), 'जानी दुश्मन' (1979) और 'शान' (1980) में उनकी भूमिकाएँ पसंद की गयी। इस समय में सुनील दत्त धार्मिक पंजाबी फ़िल्मों से भी जुड़े रहे। जिनमें 'मन जीते जग जीते' (1973), 'दुख भंजन तेरा नाम' (1974 ), 'सत श्री अकाल' (1977) प्रमुख हैं।

सुनील दत्त ने फ़िल्मों में कई भूमिकाएँ निभाने के बाद समाज सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस के सहयोग से लोकसभा के सदस्य बने। साल 1968 में वह पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सुनील दत्त को 1982 में मुंबई का शेरिफ नियुक्त किया गया। हिन्दी फ़िल्मों के अलावा सुनील दत्त ने कई पंजाबी फ़िल्मों में भी अपने अभिनय का जलवा दिखाया। इनमें 'मन जीते जग जीते' 1973, 'दुख भंजन तेरा नाम' 1974 और 'सत श्री अकाल' 1977 जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल है।

1980 में सुनील दत्त ने अपने बेटे संजय दत्त को फ़िल्म 'रॉकी' में लांच किया। यह एक सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई लेकिन फ़िल्म के प्रदर्शित होने के थोड़े समय के बाद ही उनकी पत्नी नर्गिस का कैंसर की बीमारी की वजह से देहांत हो गया। नर्गिस की कैंसर से हुई मृत्यु के कारण उन्हें इस बीमारी के प्रति सामाजिक जागरूकता के प्रति बढ़ने की प्रेरणा मिली। सुनील दत्त ने पत्नी की याद में 'नर्गिस दत्त फाउंडेशन' की स्थापना की। यह वो समय था जब सुनील दत्त सामाजिक कार्यक्रमों में ज़्यादा दिलचस्पी लेने लगे।

सम्मान_और_पुरस्कार

1963 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार (मुझे जीने दो)
1965 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार (ख़ानदान)
1968 - पद्मश्री
1995 - फ़िल्मफ़ेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
1997 - स्टार स्क्रीन लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
2001 - ज़ी सिने लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
2005 - फाल्के रत्न पुरस्कार

मृत्यु

हिन्दी फ़िल्मों के पहले एंग्री यंग मैन और राजनीतिक तौर पर एक आदर्श नेता सुनील दत्त का 25 मई, 2005 को हृदय गति रुकने के कारण बांद्रा स्थित उनके निवास स्थान पर देहांत हो गया। सुनील दत्त 'मदर इंडिया' के 'बिरजू' के रूप में या एक आदर्श नेता के तौर पर आज भी हमारे बीच मौज़ूद हैं।

राजिंद्र कृष्ण

*🎂जन्म की तारीख और समय: 6 जून 1919,पाकिस्तान जलालपुर जटा*
*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 23 सितंबर 1987, मुंबई*

महान गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

फिल्मी दुनिया में राजेन्द्र कृष्ण वे गीतकार हैं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों की कहानी, स्क्रिप्ट और संवाद भी लिखे। सभी फील्ड में वे कामयाब रहे। लेकिन राजेन्द्र कृष्ण के चाहने वालों में उनकी पहचान गीतकार की ही है। चार दशक तक उनका फिल्मों में सिक्का चला। इस दरमियान उन्होंने ऐसे नायाब गीत लिखे, जो आज भी उसी तरह से पसंद किए जाते हैं। उनके लिखे गीतों का कोई ज़वाब नहीं। वे सचमुच लाज़वाब हैं। 6 जून, 1919 को अविभाजित भारत के जलालपुर जाटां में जन्मे राजेंद्र कृष्ण का पूरा नाम राजेंद्र कृष्ण दुग्गल था। राजेन्द्र कृष्ण को बचपन से ही शेर-ओ-शायरी का जु़नूनी शौक था। अपना शौक पूरा करने के लिए वे स्कूल की किताबों में अदबी रिसालों को छिपाकर पढ़ते। यह शौक कुछ यूं परवान चढ़ा कि आगे चलकर खुद लिखने भी लगे। पन्द्रह साल की उम्र तक आते-आते उन्होंने मुशायरों में शिरकत करना शुरू कर दिया। जहां उनकी शायरी खूब पसंद भी की गई। शायरी का शौक अपनी जगह और ग़म-ए-रोजग़ार का मसला अलग।

लिहाजा साल 1942 में शिमला की म्युनिसिपल कार्पोरेशन में क्लर्क की छोटी सी नौकरी कर ली। लेकिन उनका दिल इस नौकरी में बिल्कुल भी नहीं रमता था। नौकरी के साथ-साथ उनका लिखना-पढ़ना और मुशायरों में शिरकत करना जारी रहा। यह वह दौर था, जब सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर मुशायरों-कवि सम्मेलनों की बड़ी धूम थी। इन मुशायरों की मकबूलियत का आलम यह था कि हजारों लोग इनमें अपने मनपसंद शायरों को सुनने के लिए दूर-दूर से आते थे। शिमला में भी उस वक्त हर साल एक अजीमुश्शान ऑल इंडिया मुशायरा होता था, जिसमें मुल्क भर के नामचीन शायर अपना कलाम पढ़ने आया करते थे। साल 1945 का वाकया है, मुशायरे में दीगर शोअरा हजरात के साथ नौजवान राजेंद्र कृष्ण भी शामिल थे। जब उनके पढ़ने की बारी आई, तो उन्होंने अपनी ग़ज़ल का मतला पढ़ा, ‘‘कुछ इस तरह वो मेरे पास आए बैठे हैं/जैसे आग से दामन बचाए बैठे हैं’’। ग़ज़ल के इस शे’र को खूब वाह-वाही मिली। दाद देने वालों में जनता के साथ-साथ जिगर मुरादाबादी की भी आवाज़ मिली। शायर-ए-आज़म जिगर मुरादाबादी की तारीफ़ से राजेन्द्र कृष्ण को अपनी शायरी पर एतमाद पैदा हुआ और उन्होंने शायरी और लेखन को ही अपना पेशा बनाने का फैसला कर लिया। एक बुलंद इरादे के साथ वे शिमला छोड़, मायानगरी मुंबई में अपनी किस्मत आजमाने जा पहुंचे। 

फिल्मी दुनिया में काम पाने के लिए राजेन्द्र कृष्ण को ज्यादा जद्दोजहद नहीं करनी पड़ी। उन्हें सबसे पहले फिल्म ‘जनता’ की पटकथा लिखने को मिली। यह फिल्म साल 1947 में रिलीज हुई। उसी साल उनकी एक और फिल्म ‘जंज़ीर’ आई, जिसमें उन्होंने दो गीत लिखे। लेकिन उन्हें असल पहचान मिली फ़िल्म ‘प्यार की जीत’ से। साल 1948 में आई इस फ़िल्म में संगीतकार हुस्नलाल भगतराम का संगीत निर्देशन में उन्होंने चार गीत लिखे। फिल्म के सारे गाने ही सुपर हिट हुए। खास तौर पर अदाकारा सुरैया की सुरीली आवाज से राजेन्द्र कृष्ण के गाने ‘तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया परदेसिया’ में जादू जगा दिया। गाना पूरे देश में खूब मकबूल हुआ। साल 1948 में ही राजेन्द्र कृष्ण ने एक और गीत ऐसा लिखा, जिससे वे फिल्मी दुनिया में हमेशा के लिए अमर हो गए। 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई। बापू की इस हत्या से पूरा देश ग़मगीन हो गया। राजेन्द्र कृष्ण भी उनमें से एक थे। बापू के जानिब अपने जज्बात को उन्होंने एक जज़्बाती गीत ‘सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी’ में ढाला। तकरीबन तेरह मिनट के इस लंबे गीत में महात्मा गांधी का पूरा जिंदगीनामा है। मोहम्मद रफी की दर्द भरी आवाज ने इस गाने को नई ऊंचाइयां पहुंचा दी। आज भी ये गीत जब कहीं बजता है, तो देशवासियों की आंखें नम हो जाती हैं। 

 हिंदी फिल्मों में राजेन्द्र कृष्ण के गीतों की कामयाबी का सिलसिला एक बार शुरू हुआ, तो उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक उनकी ऐसी कई फिल्में आईं, जिनके गीतों ने ऑल इंडिया में धूम मचा दी। साल 1949 में फिल्म ‘बड़ी बहन’ में उन्हें एक बार फिर संगीतकार हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में गीत लिखने का मौका मिला। इस फिल्म के भी सभी गाने हिट हुए। खास तौर पर ‘चुप-चुप खड़े हो जरूर कोई बात है, पहली मुलाकात है ये पहली मुलाकात है’ और ‘चले जाना नहीं..’ इन गानों ने नौजवानों को अपना दीवाना बना लिया। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज ने इन गीतों में वह कशिश पैदा कर दी, जो आज भी दिल पर असर करती है। ‘चुप-चुप खड़े हो जरूर कोई बात है’ की तरह फ़िल्म ‘बहार’ (साल-1951) में शमशाद बेगम का गाया गीत ‘सैंया दिल में आना रे, ओ आके फिर न जाना रे’ भी खूब मकबूल हुआ। इन गानों ने राजेन्द्र कृष्ण को फिल्मों में गीतकार के तौर पर स्थापित कर दिया।

साल 1953 में फिल्म ‘अनारकली’ और साल 1954 में आई ‘नागिन’ में उनके लिखे सभी गाने सुपर हिट साबित हुए। इन गानों की कामयाबी ने राजेन्द्र कृष्ण के नाम को देश के घर-घर तक पहुंचा दिया। फिल्म ‘अनारकली’ में यूं तो उनके अलावा तीन और गीतकारों जांनिसार अख्तर, हसरत जयपुरी शैलेन्द्र ने गीत लिखे थे, लेकिन राजेन्द्र कृष्ण के लिखे सभी गीत खूब पसंद किए गए। ‘जिंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है..’, ‘जाग दर्दे-ए इश्क जाग’, ‘ये जिंदगी उसी की है’ और ‘मोहब्बत में ऐसे कदम डगमगाए’ उनके लिखे गीतों को हेमंत कुमार और लता मंगेशकर की जादुई आवाज़ ने नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया। इसी फिल्म से उनकी जोड़ी संगीतकार सी. रामचंद्रा के साथ बनी। इस जोड़ी ने आगे चलकर कई सुपर हिट फिल्में ‘पतंगा’, ‘अलबेला’, ‘पहली झलक’, ‘आजा़द’ आदि दीं। इन फिल्मों में लता मंगेशकर द्वारा गाये गए गीत खूब लोकप्रिय हुए। 

फिल्म ‘नागिन’ की कामयाबी के पीछे भी राजेन्द्र कृष्ण के गीतों का बड़ा योगदान था। इस फिल्म में उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत ‘मन डोले, तन डोले, मेरे दिल का गया क़रार रे’, ‘मेरा दिल ये पुकारे आजा’, ‘जादूगर सैयां छोड़ मोरी बैयां’, ‘तेरे द्वार खड़ा इक जोगी’, ‘ओ ज़िन्दगी के देने वाले, ज़िन्दगी के लेने वाले’ लिखे। संगीतकार हेमंत कुमार के शानदार संगीत और गायिका लता मंगेशकर की आवाज ने इन गीतों को जो जिंदगी दी, वह आज भी इसके चाहने वालों के दिलों में धड़कन की तरह धड़कते हैं। सरल, सहज ज़बान में लिखे राजेन्द्र कृष्ण के गीत लोगों के दिलों में बहुत जल्द ही अंदर तक उतर जाते थे। जहां उन्हें मौका मिलता, उम्दा शायरी भी करते। संगीतकार मदन मोहन के लिए उन्होंने जो गाने लिखे, वह अलग ही नज़र आते हैं।

मिसाल के तौर पर फिल्म ‘अदालत’ में राजेन्द्र कृष्ण ने एक से बढ़कर एक बेमिसाल ग़ज़लें ‘उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते’, ‘जाना था हमसे दूर बहाने बना लिये’ और ‘यूं हसरतों के दाग़ मुहब्बत में धो लिये’ लिखीं। अपनी मखमली आवाज से पहचाने जाने वाले सिंगर तलत महमूद के जो सुपर हिट गीत हैं, उनमें से ज्यादातर राजेन्द्र कृष्ण के लिखे हुए हैं। यकीं न हो तो खुद ही देखिए ‘ये हवा ये रात ये चान्दनी तेरी इक अदा पे निसार है’ (फिल्म-संगदिल), ‘बेरहम आसमाँ मेरी मंज़िल बता है कहां’ (फिल्म-बहाना), ‘हमसे आया न गया, तुमसे बुलाया न गया’ (फिल्म-देख कबीरा रोया), ‘इतना न मुझ से तू प्यार बढ़ा’, ‘आंसू समझ के क्यूं मुझे आँख से तुमने गिरा दिया’ (फिल्म-छाया), ‘फिर वही शाम वही ग़म वही तनहाई है’, ‘मैं तेरी नज़र का सुरूर हूं, तुझे याद हो के न याद हो’ (फिल्मत-जहाँआरा)। 

संगीतकार हेमंत कुमार के साथ भी राजेन्द्र कृष्ण की जोड़ी अच्छी जमी। फिल्म ‘नागिन’ के अलावा ‘मिस मैरी’, ‘लगन’, ‘पायल’, ‘दुर्गेश-नन्दिनी’ वगैरह फिल्मों में इस जोड़ी ने अनेक नायाब नग्में दिए। फिल्म की हर सिचुएशन पर राजेन्द्र कृष्ण को गीत लिखने की महारत हासिल थी। जिंदगी के हर रंग और हर भाव पर उन्होंने गीत लिखे। ये सभी गीत सुपर हिट हुए। उनके सुपर हिट गीतों की एक लंबी फेहरिस्त है, जो कभी भुलाए नहीं जाएंगे। ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिए’ ‘चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना’ (फ़िल्म-भाभी), ‘तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो, तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो’ (फ़िल्म-मैं चुप रहूंगी), ‘जहां डाल डाल पर सोने की चिड़ियां करती हैं बसेरा’ (फ़िल्म- सिकन्दर-ए-आज़म)। राजेन्द्र कृष्ण ने फिल्मों में कई कॉमेडी और अनूठे गीत भी रचे। जो अपनी ज़बान और अलबेले अंदाज की वजह से अलग ही पहचाने जाते हैं। मिसाल के तौर पर उनके लिखे गए इन गीतों पर एक नज़र डालिए ‘शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो’ (फिल्म-अलबेला), ‘मेरे पिया गये रंगून, वहां से किया है टेलिफ़ून’ (फिल्म-पतंगा), ‘ओ मेरी प्यारी बिन्दु’, ‘इक चतुर नार करके सिंगार’ (फिल्म-पड़ोसन), ‘ईना मीना डीका’ (फिल्म-आशा)।

गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने तकरीबन 300 फ़िल्मों के लिए एक हज़ार से ज्यादा गीत लिखे। सौ से ज्यादा फिल्मों की कहानी, संवाद और पटकथा लिखीं। जिसमें उनके द्वारा लिखी कुछ प्रमुख फ़िल्में ‘पड़ोसन’, ‘छाया’, ‘प्यार का सपना’, ‘मनमौजी’, ‘धर्माधिकारी’, ‘मां-बाप’, ‘साधु और शैतान’ हैं। एक वक्त ऐसा भी था, जब राजेन्द्र कृष्ण उन्हीं फिल्मों में गीत लिखते थे, जिसमें उनके संवाद और पटकथा होती थी। अपने फ़िल्मी लेखन के बारे में राजेन्द्र कृष्ण की एक इंटरव्यू में कैफियत थी, ‘‘आम तौर पर एक फ़िल्म में छः या सात गीत होते हैं। जिसमें रोमांटिक सिचुएशन ज़्यादा होती है। उसमें तो कोई पैग़ाम नहीं दिया जा सकता। मगर क्योंकि मैं स्क्रिप्ट राइटर भी हूं, संवाद भी लिखता हूं तो इसलिये कोई न कोई सिचुएशन ऐसी निकाल लेता हूं जिसमें देशभक्ति, भजन, या समाजवाद की बात हो या ग़ज़ल हो जाए।’’

बहरहाल, राजेन्द्र कृष्ण को जब भी मौका मिला, उन्होंने अपने गीतों और संवादों से देशवासियों को सरल शब्दों में एक संदेश दिया। सीधे-सच्चे लफ्जों और सादा अंदाज में वे ऐसे गीत लिखते थे, जो दिलों में गहरे तक उतर जाते थे। अपने शानदार गीतों  के लिए राजेन्द्र कृष्ण कई पुरस्कारों और सम्मान से भी नवाजे गए। साल 1965 में उन्हें ‘तुम्ही मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा’ (फिल्म-खानदान) गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला। उन्होंने चार दशक तक अपने गानों से फिल्मी दुनिया में राज किया। एक शानदार जिंदगी बिताई। 23 सितम्बर, 1988 को गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया और उस अनजानी दुनिया के सफर पर निकल गए, जहां से कोई वापस लौटकर नहीं आता।

केसियस खान


कैसियस खान
 🎂जन्म 7 जून 1974

,🇨🇦एक कनाडाई भारतीय शास्त्रीय संगीतकार हैं, जिन्हें गाते समय तबला बजाने के लिए जाना जाता है।

↔️खान का जन्म 1974 में लोटोका , फिजी में हुआ था।

वैंकूवर , कनाडा में एक युवा किशोर के रूप में , खान मुश्तरी बेगम, एक ग़ज़ल गायिका, शेख मोहयुदीन, एक हारमोनियम और कव्वाली गायक, और उस्ताद रुखसार अली, एक तबला वादक से मिले। उन्होंने ग़ज़ल गाना और तबला बजाना एक साथ सीखा। खान के प्रदर्शनों की सूची में तबला बजाते हुए तरन्नुम अंग गायकी भी शामिल है, और यह उनकी ट्रेडमार्क शैली बन गई। प्रदर्शन की इस दुर्लभ शैली में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में, उन्हें 2016 में ब्रिटिश कोलंबिया के न्यू वेस्टमिंस्टर में भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य के 5 वें वार्षिक मुश्तरी बेगम महोत्सव के दौरान पंडित सलिल भट्ट द्वारा "उस्ताद" या उस्ताद का नाम दिया गया था ।

खान के शुरुआती करियर को उनके पहले एल्बम, कैसियस खान-द यंग तबला/ग़ज़ल विज़ार्ड की रिकॉर्डिंग और अंतर्राष्ट्रीय दौरे के बाद सीमित सफलता मिली । कॉलेज और विश्वविद्यालय में अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने अपने संगीत करियर की शुरुआत की, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण प्रशांत, यूरोप और दक्षिण अमेरिका में लोक उत्सव के दृश्य का दौरा करके, एकल प्रदर्शन और अन्य कलाकारों के साथ मिलकर तबला वादक और गायक दोनों के रूप में शुरुआत की। .

☑️2001 में, विभिन्न बैंडों में एक सिपाहियों के रूप में प्रदर्शन करने के बाद, खान ने संगीतकार जान रान्डेल के मार्गदर्शन में एथलेटिक्स में IAAF विश्व चैंपियनशिप के लिए "एशिया संगीत" की रचना की । उसी वर्ष, उन्हें बीबीसी रेडियो 2 की "शीर्ष 25 विश्व कलाकारों को देखने के लिए" की सूची में शामिल किया गया था।

2005 में, खान ने अल्बर्टा सीन फेस्टिवल के हिस्से के रूप में ओटावा में नेशनल आर्ट्स सेंटर में ग़ज़ल और एक तबला एकल गायन किया , और 2006 में सैल्मन आर्म रूट्स एंड ब्लूज़ फेस्टिवल में एक कनाडाई लोक उत्सव में अपना पहला शास्त्रीय ग़ज़ल और तबला गायन प्रस्तुत किया। 2008 में ऑस्टिन , टेक्सास में साउथवेस्ट द्वारा दक्षिण पश्चिम में ग़ज़ल/तबला का प्रदर्शन करने के लिए 8,000 आवेदकों में से उनका चयन किया गया था। उसी वर्ष एलेन मैकलवाइन और खान को कैलगरी में जूनो अवार्ड्स में जूनो फेस्ट के लिए प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया गया था। अगले वर्ष खान कनाडाई संगीत सप्ताह के लिए एक विशेष रुप से प्रदर्शित कलाकार थे. खान की रिकॉर्डिंग को 2009 में जापान ट्रेड मिशन के लिए भी चुना गया था। खान 23 नवंबर 2013 को नई दिल्ली में सा मा पा संगीत समारोह में प्रदर्शन करने वाले पहले कनाडाई भी थे।

खान को 2008 में यारलो कलाकार समूह द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था। उन्होंने 2009 में अपने प्रबंधन को निकाल दिया और चार महीने बाद उनकी सेवा समाप्त करने से पहले 2016 में रीबूट प्रबंधन को काम पर रखा।

खान की ग़ज़ल एल्बम मुश्तरी, एक लाइव संगीत कार्यक्रम , 2011 में रिलीज़ हुई, जिसे वेस्टर्न कैनेडियन म्यूज़िक अवार्ड्स (WCMA) द्वारा "वर्ल्ड एल्बम ऑफ़ द ईयर" के लिए नामांकित किया गया था और शास्त्रीय संगीत के चयन के साथ खान के गुरु और शिक्षक मुश्तरी बेगम को श्रद्धांजलि थी। ग़ज़ल और एक तबला एकल गायन। यह एक कलाकार द्वारा एक साथ ग़ज़ल और तबला के साथ रिकॉर्ड किया गया पहला एल्बम था। उन्होंने 2011 में एक तबला सोलो सिंगल, "स्पार्क्स ऑफ एनर्जी" भी जारी किया। इन दोनों एल्बमों में खान की पत्नी अमिका कुशवाहा को हारमोनियम एकल कलाकार के रूप में दिखाया गया है।

खान के अन्य सहयोगों में शामिल हैं: महाविष्णु ऑर्केस्ट्रा के जैज़ पियानोवादक स्टु गोल्डबर्ग के साथ डार्क क्लाउड्स (2006) ; मिस्टिक ब्रिज नामक स्लाइड गिटारवादक एलेन मैकलवाइन के साथ एक सहयोग , एक ब्लूज़ / भारतीय संगीत एल्बम जिसे 2008 में रूट्स एंड ट्रेडिशनल एल्बम ऑफ़ द ईयर के लिए जूनो अवार्ड के लिए चुना गया था; आई फील लव अगेन (2002) भूमध्य गिटारवादक पावलो के साथ ; हेवी मेटल/श्रेड गिटारवादक डैन मनी के साथ मनी लिक्स (2002); ए डेमन्स ड्रीम (2002) और द अल्केमिस्ट्स (2002) ध्वनिक/विद्युत गिटारवादक डेव मार्टोन के साथ; और एंजेल ऑफ सेविला (1990) स्पेनिश गिटारवादक डी'आर्सी ग्रीव्स के साथ ।

खान ने मोहन वीणा के आविष्कारक , कलाकार पंडित विश्व मोहन भट्ट , सात्विक वीणा वादक पंडित सलिल भट्ट, कथक कलाकार/हारमोनियम एकल वादक और भारतीय शास्त्रीय संगीत और ग़ज़ल गायकों की कई अन्य हस्तियों के साथ भी सहयोग किया है। 

🇨🇦खान को भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान के लिए 2005 में सिटी ऑफ़ एडमॉन्टन द्वारा "सेल्यूट टू एक्सीलेंस अवार्ड" और 2019 में सिटी ऑफ़ न्यू वेस्टमिंस्टर चैंबर ऑफ़ कॉमर्स द्वारा "बर्नी लेग आर्टिस्ट ऑफ़ द ईयर" से सम्मानित किया गया। (एलेन मैकलवाइन के साथ) 2008 में उनके एल्बम मिस्टिक ब्रिज के लिए जूनो अवार्ड के लिए , और उनके एल्बम मुश्तरी-एक लाइव कॉन्सर्ट के लिए WCMA अवार्ड के लिए नामांकन । उन्होंने संयुक्त राष्ट्र , विश्व बौद्धिक संपदा संगठन और नमस्ते जिनेवा के लिए भारत के स्थायी मिशन के लिए जिनेवा , स्विट्जरलैंड में भी प्रदर्शन किया है, संयुक्त राष्ट्र में भारतीय राजदूत राजीव चंदर द्वारा बनाई गई एक पहल, 2017/2018 में।

अपनी पत्नी, अमिका कुशवाहा के साथ, खान ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य के मुश्तरी बेगम महोत्सव की स्थापना की, जो पहली बार 25 अगस्त 2012 को ब्रिटिश कोलंबिया के न्यू वेस्टमिंस्टर में मैसी थिएटर में हुआ। वह न्यू वेस्टमिंस्टर शहर के मानद सांस्कृतिक राजदूत हैं।

खान तबला निर्माता उस्ताद कासिम खान नियाज़ी एंड संस के लक्ष्मीनगर, नई दिल्ली, भारत के आधिकारिक प्रवक्ता भी हैं , और सिडनी , ऑस्ट्रेलिया में स्थित अमन कल्याण के लेहरा स्टूडियो ऐप द्वारा इसका समर्थन किया जाता है। वह न्यू वेस्टमिंस्टर में मैसी थिएटर में मैसी अनलिमिटेड ग्लोबल टी सीरीज़ के क्यूरेटर भी हैं ,  और उसी शहर में एनविल सेंटर में 2021 के कलाकार निवासी थे। खान अंतरराष्ट्रीय निजी मुलग्रेव स्कूल में अतिथि संगीत प्रशिक्षक भी हैं , जहां वे युवा छात्रों को भारतीय शास्त्रीय संगीत सिखाते हैं।

खान न्यू वेस्टमिंस्टर, ब्रिटिश कोलंबिया में रहते हैं । उन्होंने 2006 में कथक नृत्यांगना अमिका कुशवाहा से शादी की , और वे उनके एकल कथक नृत्य संगीत और उनके ग़ज़ल और तबला संगीत कार्यक्रमों में एक दूसरे के प्रमुख सहयोगी हैं।

फ़िलिस्तीनियों के इलाज के विरोध में खान ने 2009 में इज़राइल में प्रदर्शन करने से इनकार कर दिया। वह विश्व संगीत शब्द और कनाडाई संगीत परिदृश्य में गैर-पश्चिमी विषयों के प्रतिनिधित्व की कमी के आलोचक रहे हैं ।

"कैसियस खान कनाडाई विश्व संगीत में हमारे समय का एक चमकता सितारा है।"

सोमवार, 5 जून 2023

गुफी पेंटल


*जन्म की तारीख और समय: 🎂04 अक्तूबर 1944, तरनतारन*

*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 5 जून 2023*

*भाई: पेंटल*

*भांजा या भतीजा: हितेन पेंटल*

*बच्चे: हैरी पेंटल*

*गुफी पेंटल*
*🎂4 अक्टूबर 1944*
*⚰️5 जून 2023),*

*जिन्हें सरबजीत सिंह पेंटल के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय अभिनेता और कास्टिंग निर्देशक थे। शुरू में एक इंजीनियर के रूप में प्रशिक्षित, वह अपने छोटे भाई (जो भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान में प्रशिक्षित थे ) के बाद अभिनय में आगे बढ़े। 1969 में बंबई आकर , गुफी ने मॉडलिंग शुरू की, फिल्मों के लिए सहायक निर्देशक के रूप में काम किया और विभिन्न फिल्मों और धारावाहिकों में अभिनय किया। उन्होंने अपने भाई को भी निर्देशित किया। उनकी सबसे प्रसिद्ध भूमिका बीआर चोपड़ा और उनके बेटे रवि चोपड़ा द्वारा महाभारत के रूपांतरण में मामा (मामा) शकुनि की है,*

*महाभारत सीरियल में शकुनी मामा का किरदार निभाकर घर-घर में पहचान बनाने वाले अभिनेता गुफी पेंटल का निधन हो गया है. एक्टर बीते कई दिनों से अस्पताल में भर्ती थे. तबीयत काफी बिगड़ने के बाद गुफी पेंटल को आईसीयू में भी रखा गया था. लेकिन आज यानी 5 जून 2023 को अभिनेता के निधन की दुखद खबर सामने आई है*
*आज सुबह 9 बजे उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। ' अपने हंसमुख स्वभाव और ऐतिहासिक किरदारों के जरिए लोगों के दिलों में एक खास जगह बनाने वाले एक्टर गुफी पेंटल ने महाभारत में 'शकुनि' का किरदार निभाकर इस चरित्र को अमर कर दिया।*
*दुर्योधन का प्रिय मामा 'शकुनि' लंगड़ा नहीं था*

*आपको बता दूं कि इतिहास में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि दुर्योधन का प्रिय मामा 'शकुनि' लंगड़ा था लेकिन गुफी पेंटल ने महाभारत में उसे लंगड़े, धूर्त और चालाक के रूप में ऐसा पेश किया कि इसके बाद जितने भी महाभारत शो बने उसमें 'शकुनि'को लंगड़ा ही दिखाया गया । हालांकि गुफी ने 'शकुनि' की चाल अपनी एक बीमारी की वजह से बदली थी लेकिन तब शायद उन्हें ये नहीं पता था कि वो अपनी इस टेढ़ी चाल से किसी करेक्टर को हमेशा के लिए अमर करने जा रहे हैं।*

*वो महाभारत के कास्टिंग डायरेक्टर भी थे*

*दरअसल गुफी पेंटल ने केवल महाभारत में 'शकुनि' का रोल ही प्ले नहीं किया था बल्कि वो इस शो के कास्टिंग डायरेक्टर भी थे। बहुत सारे लोगों का स्क्रीन टेस्ट 'शकुनि'के लिए हुआ लेकिन किसी का नाम फाइनल नहीं हो पा रहा था। काफी निराशा हाथ लगने के बाद शो के क्रू मेंबर्स ने निर्णय लिया कि पर्दे पर 'शकुनि' का रोल गुफी को ही निभाना चाहिए क्योंकि इससे पहले गुफी पेंटल 'बहादुर शाह जफर' जैसा ऐतिहासिक रोल कर चुके थे।*

*कूल्हे की हड्डी के कारण बदली थी गुफी की चाल*

*लेकिन उस वक्त गुफी अपने कूल्हे की हड्डी के दर्द से गुजर रहे थे. जिसके लिए उन्हें डॉक्टर ने एक सर्जरी कराने को बोला था। जिसके कारण उन्हें दाहिने पैर से चलने में दिक्कत होती थी और वो इसी वजह से लंगड़ाकर चलते थे। उन्होंने शो के क्रू मेंबर्स को ये बात बताई और कहा कि 'अगर मैं सर्जरी कराऊंगा तो रोल प्ले नहीं कर पाऊंगा और अगर रोल करूंगा तो मुझे लंगड़ा कर चलना होगा।' इस पर क्रू मेंबर्स ने कहा कि हमें कोई आपत्ति नहीं और इस तरह से गुफी ने शकुनि' मामा को लंगड़ा बना दिया जो कि उसकी बुराई का ही एक हिस्सा बन गया।*

*गुफी ने 'शकुनि' का किरदार ऐसे चरितार्थ किया जो कि 'काले रंग का वस्त्र पहनता था, धूर्त सोच रखता था और जुआं खेलने में पारंगत था और अपने भांजे दुर्योधन के दिमाग में पांडवों के खिलाफ जहर घोलता था और मस्त शैली में भांजे बोला करता था। अब वाकई में 'शकुनि'ऐसा था या नहीं ये तो पता नहीं लेकिन बीआर चोपड़ा के ऐतिहासिक महाभारत के बाद हर महाभारत में 'शकुनि' जरूर गूफी वाले किरदार का ही दिखता था।*

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फिल्में

वर्ष      फिल्में      भूमिकाएँ
1975 रफू चक्कर सलीम
1978 दिल्लगी गणेश
1978 देस परदेस
1994 सुहाग अक्षय कुमार के मामा
1995 मैदान-ए-जंग मामाजी
1997 दावा मंगल सिंह, वन पीस काठियावाड़ी घोडो
2000 द रिवेंज: गीता मेरा नाम
2006 घूम (फिल्म) विजय दीक्षित के बॉस
2013 महाभारत और बर्बरीक शकुनी
2014 सम्राट एंड कंपनी दिनेश दास उर्फ ​​डीडी परिवार वकील

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टेलीविजन

वर्ष     धारावाहिक     भूमिका         चैनल
1986 बहादुर शाह जफर डी डी नेशनल
1988-1990 महाभारत शकुनी एक अभिनेता के रूप में और कास्टिंग निर्देशक भी डी डी नेशनल
1988-1990 कानून न्यायमूर्ति रघुनाथ डीडी मेट्रो
1992 सौदा डी डी नेशनल
1997-2001 ओम नम शिवाय शकुनी डी डी नेशनल
1998-1999 अकबर बीरबल मुल्ला दो प्याजा डी डी नेशनल
2001 सीआईडी ​​(भारतीय टीवी श्रृंखला) चंदर एपिसोड 195, 196
2002 शशह्ह...कोई है डॉ जारकोस स्टार प्लस
2003 द मैजिक मेक-अप बॉक्स ब्रिथारी जी टीवी
2011–2012 द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्ण शकुनी इमेजिन टीवी
2012–2013 श्रीमती कौशिक की पांच बहुएं बृजभूषण भल्ला जी टीवी
2013 भारत का वीर पुत्र - महाराणा प्रताप हुमायूं सोनी टी वी
2016–2018 कर्मफल दाता शनि विश्वकर्मा कलर्स टीवी
2018 कर्ण संगिनी कृपाचार्य स्टार प्लस
2019–2023 राधाकृष्ण विश्वकर्मा स्टार भारत
2021–2022 जय कनिया लाल की विश्वकर्मा स्टार भारत

विजय राज

विजय राज
    🎂जन्म 05 जून 1963
दिल्ली, भारत
राष्ट्रीयता भारतीय
व्यवसाय
अभिनेता कार्यकाल
1998–अब तक
ऊंचाई 5फिट 10 इंच
प्रसिद्धि कारण रन
जीवनसाथी कृष्णा राज

☑️प्रमुख फिल्में

वर्ष       फ़िल्म
2018 सूरमा कोच
2012 आई एम 24
2007 बेनाम
2007 अनवर
2007 फूल एन फाइनल अब्दुल डिकी
2007 माइग्रेशन
2007 ब्रेकिंग न्यूज़
2007 वैलकम
2007 धमाल
2005 दीवाने हुए पागल बबलू
2005 मुम्बई एक्सप्रेस
2005 शबनम मौसी
2004 रन
2004 लव इन नेपाल टोनी चाँग
2004 युवा
2004 आन
2003 मुम्बई मैटिनी
2003 चुरा लिया है तुमने
2003 करिश्मा
2002 लाल सलाम घीसू
2002 रोड
2002 शक्ति
2002 कंपनी
2001 मानसून वैडिंग पीके दुबे
2001 अक्स येडा याकूब
2000 जंगल
1999 भोपाल एक्सप्रेस बदरू

मुकेश भट्ट

फ़िल्म निर्माता मुकेश भट्ट के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

मुकेश भट्ट (जन्म 5 जून 1952 मुंबई में), एक भारतीय फिल्म निर्माता हैं, जिन्होंने कई बॉलीवुड फिल्मों का निर्माण किया है।  वह महेश भट्ट के छोटे भाई हैं, और 1986 में स्थापित प्रोडक्शन कंपनी विशेष फिल्म्स के सह-मालिक भी हैं। वह पूजा भट्ट, राहुल भट्ट, शाहीन भट्ट, इमरान हाशमी और आलिया भट्ट के चाचा हैं।

मुकेश भट्ट एक हिंदी फिल्म निर्देशक और निर्माता नानाभाई भट्ट (1915-1999) के पुत्र हैं।  उनके पिता एक गुजराती ब्राह्मण थे और माता एक गुजराती मुस्लिम थीं।  नानाभाई के भाई, बलवंत भट्ट (1909-1965) भी एक हिंदी फिल्म निर्देशक थे।  उन्होंने नीलिमा भट्ट से शादी की है।  भट्ट की एक बेटी साक्षी और एक बेटा विशेष है विशेष फिल्म्स का नाम उनके नाम पर रखा गया है

निर्माता के रूप में मुकेश भट्ट की पहली फिल्म विनोद खन्ना के साथ जुर्म (1990) थी, हालांकि, यह फिल्म बहुत सफल नहीं रही। फिर उन्होंने गुलशन कुमार के साथ मिलकर प्रेम कहानी, आशिकी (1990) का निर्माण किया, जिसमें नवोदित अभिनेता राहुल रॉय और अनु अग्रवाल ने अभिनय किया।  फिल्म का निर्देशन उनके भाई महेश भट्ट ने किया था।  आशिकी के बाद की सभी फिल्में बड़ी हिट रहीं।  इनमें विशेष फिल्म्स के बैनर तले रिलीज़ हुई दिल है की मानता नहीं (1991) और सड़क (1991) शामिल हैं।  इन सभी फिल्मों में पूजा भट्ट के साथ आमिर खान, संजय दत्त और राहुल रॉय जैसे प्रमुख कलाकार थे। 

मुकेश भट्ट ने बाद के वर्षों में और फिल्मों का निर्माण किया, जैसे, सर (1993) में नसीरुद्दीन शाह अभिनीत, नाजायज़ (1995), क्रिमिनल (1995), और फरेब (1996) शामिल हैं।  1998 की फिल्म गुलाम, निर्माता के लिए एक और सफलता थी 1999 में, प्रीति जिंटा और अक्षय कुमार अभिनीत संघर्ष निर्माता के लिए सफल उद्यम था, जबकि हॉरर फ़िल्में राज़ (2002), और इसके सीक्वल राज़ - द मिस्ट्री कंटीन्यूज़ (2009), दोनों को सकारात्मक रूप से प्राप्त किया गया था।  2004 में, उन्होंने अपने भतीजे इमरान हाशमी को बड़े पर्दे पर फिल्म फुटपाथ से पेश किया, जिसमें बिपाशा बसु भी थीं।  निर्माता के रूप में उनकी कुछ और फिल्में है ज़हर (2005), कलयुग (2005), गैंगस्टर (2006), वो लम्हे (2006), जन्नत (2008), तुम मिले (2009) और बदमाश (2010)

उन्होंने अपने भाई महेश भट्ट के साथ फ़िल्म हमारी अधूरी कहानी (2015) का निर्माण किया जिसमे इमरान हाशमी और विद्या बालन मुख्य भूमिकाओं में थे  यह मुकेश भट्ट के माता-पिता, नानाभाई भट्ट, शिरीन मोहम्मद अली और उनकी सौतेली माँ की प्रेम कहानी पर आधारित है

1992: नामांकित, सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार - दिल है की मानता नहीं

1999: नामांकित, सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार - गुलाम 

2003: नामांकित, सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - राज़

2005: नामांकित, ज़ी सिने पुरस्कार - वर्ष के सर्वश्रेष्ठ निर्माता के लिए लोकप्रिय पुरस्कार - मर्डर

 2015: ग्लोबल फिल्म अवार्ड- 8वां ग्लोबल फिल्म फेस्टिवल नोएडा-एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...