गुरुवार, 11 मई 2023

Shrgun

 

जन्म 06 सितम्बर
चंडीगड़

  • सरगुन मेहता एक भारतीय अभिनेत्री, मॉडल, और टेलीविज़न मेजबान हैं। मेहता ने अपने कोलेज के दौरान थिएटर में अभिनय करना शुरू किया था और २००९ में "जी टीवी" के शो "१२/२४ करोल बाग़" से अपने टेलीविज़न करियर की शुरुआत की। कलर्स टीवी के शो "फुलवा" से उनके करियर को काफी महत्तवपूर्ण बदलाव
  • मशहूर एक्टर रवि दुबे की पत्नी हैं सरगुन

शायद ही कोई होगा जो आज सरगुन मेहता को न जानता हो. टीवी और पंजाबी इंडस्ट्री का सरगुन आज जाना-माना चेहरा हैं. सरगुन मेहता अब न सिर्फ एक्टर हैं बल्कि प्रोड्युसर भी हैं. और हाल ही में, उन्होंने कटपुतली फिल्म के साथ बॉलीवुड में भी अपने कदम रखें हैं. 

♥️सरगुन मेहता का जन्म ६ सितम्बर १९८८ में चंडीगढ़ में हुआ था। उनका एक छोटा भाई भी हैं। उनके बचपन के दिनों में उन्होंने अपने भाई के साथ "बूगी वूगी" शो के लिए ऑडिशन दिया परन्तु उनका चयन नहीं हो पाया। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा "सेक्रेड हार्ट कान्वेंट स्कूल", और "माउंट कारमेल स्कूल" से की थी। फिर वह "बिसनेस मैनेजमेंट" में मास्टर की डिग्री के लिए चली गयी परन्तु अपना अभिनय का करियर बनाने के लिए वह उन्होंने बीच में छोड़ दिया। उसके बाद उन्हें "१२/२४ करोल बाग़" के लिए चुना गया। २०१३ में "बालिका वधु"में काम करने से उन्होंने खुद की पहचान एक मुख्य कलाकार के रूप में बनाई

दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वाली सरगुन ने टीवी सीरियल्स से अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की थी. उन्होंने ज़ी टीवी के 12/24 करोल बाग सीरियल से डेब्यू किया. इस सीरियल में उन्होंने सपोर्टिंग कैरेक्टर प्ले किया था. आज उनके जन्मदिन के मौके पर जानें उनके अब तक के सफर के बारे में. 

रवि दूबे थे पहले को-एक्टर 
सरगुन के पहले सीरियल में उनके अपोजिट रवि दुबे थे. जो आज उनके पति भी हैं. दोनों इस सीरियल के दौरान मिले और उनकी बॉन्डिंग गहरी होती रही. रवि ने सरगुन को एक रिएलिटी शो में प्रपोज किया था और इसके बाद दोनों ने शादी कर ली थी. सरगुन ने गीता का धर्मयुद्ध, फुलवा जैसे सीरियल्स में लीड रोल भी निभाया. 

फुलवा से उनके करियर को एक अलग मोड मिला और उन्होंने बतौर एक्टर खुद को स्थापित कर लिया. उन्होंने क्या हुआ तेरा वादा, बालिका वधू, और रिश्तों का मेला में भी अहम किरदार निभाए. साथ ही, उन्होंने कई रिएलिटी शोज होस्ट भी किए हैं. 

पंजाबी फिल्मों की जान हैं सरगुन 


जिंदुआ फिल्म की कहानी
'जिंदुआ' की कहानी उन सिखों की कठिनाइयों को चित्रित करती है जो डॉलर कमाने के लिए कनाडा जाते थे, लेकिन इसे हासिल करने के लिए उन्हें क्या-क्या करना पड़ता है। यह कर्मा (जिमी शेरगिल) की कहानी है, जो कमाने के लिए कनाडा गया था, लेकिन उसे 2 लड़कियों ईश (नीरू बाजवा) और सघी (सरगुन मेहता) से प्यार हो गया। हालांकि एक दिन दोनों लड़कियों को ये सब पता चल जाता है और वो कर्मा को अकेला छोड़ देती हैं।

लेकिन कर्मा कभी भी इन 2 लड़कियों में से किसी को भी चोट नहीं पहुँचाना चाहता था और उन्हें अपने दिल की गहराई से प्यार करता था। उन्हें जीवन में वापस लाने के लिए वह क्या करता है और पैसे कमाने के अपने सपने को पूरा करता है या नहीं, यह फिल्म 'जिंदुआ' के अंत में पता चलेगा।

जिंदुआ शब्द का अर्थ

'जिंदुआ' एक पंजाबी लोक नृत्य है जिसे युगल एक दूसरे के लिए अपने प्यार का इजहार करने के लिए करते हैं। सरल शब्दों में 'जिंदुआ' का संबंध उस व्यक्ति से है जो जीवन का प्यार है। लेकिन इस फिल्म में यह भांगड़ा के अलावा पंजाब के एक लोक नृत्य से संबंधित है।अभिनीत: जिमी शेरगिल, नीरू बाजवा, सरगुन मेहता, राजीव ठाकुर, अर्की कंडोला, राज बराड़ बलिंदर जौहल और भी बहुत कुछ।

प्रोडक्शन: ओहरी प्रोडक्शंस, इन्फैंट्री पिक्चर्स और यदु प्रोडक्शंस

निर्देशक: नवनीत सिंह



बुधवार, 10 मई 2023

चल यार बाहर

 



पटियाला, पंजाबी कॉमेडी-ड्रामा वेब सीरीज़ “यार जिगरी कसूती डिग्री” को मिली शानदार सफलता के बाद- पंजाब के सबसे लोकप्रिय यूट्यूब चैनलों में से एक ट्रोल पंजाबी- दर्शकों को फिर से अपनी नई कॉमेडी वेब सीरीज़ “यार चले बाहर” के साथ कॉमेडी राइड पर लेकर जाने के लिए तैयार है। 


यारा चले बाहर


नई वेब सीरीज़ के निर्माताओं ने बुधवार को पटियाला के एक होटल में आयोजित एक प्रेस मीट के दौरान इसका टाइटल ट्रैक “यार चले बाहर” लॉन्च किया और इस वेब सीरीज के बारें में जानकारी डायरेक्टर के साथ स्टार कास्ट के सारे सदस्यों ने दी।इस गाने को एक प्रसिद्ध पंजाबी गायक और गीतकार, गुर सिद्धू ने गाया है, जिनका हालिया ट्रैक “बंब आ गया” इस समय सभी चार्ट्स पर टॉप पर चल रहा है। 

इस मौके पर मीडिया से बात करते हुए, “यार चले बाहर” के लेखक और डायरेक्टर रब्बी टिवाणा ने कहा कि “यार चले बाहर” दोस्तों के एक ग्रुप की कहानी है जो अपनी आईईएलटीएस परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। इसका प्रत्येक कैरेक्टर एक अलग बैकग्राउंड से आता है और सभी की गुदगुदाती और अनूठी कहानी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। ये कहानी उनके रोजमर्रा के संघर्षों के इर्द-गिर्द घूमती है और दिखाती है कि उनका जीवन सबसे मुश्किल और अचानक पैदा हुए हालात से कैसे सामने आता है। सीरीज़ के पात्र इनड्राइवर के माध्यम से अपनी सवारी बुक करके इंटरसिटी की यात्रा करते हैं।”




प्रफुल्लित करने वाला ट्रेलर और वेब श्रृंखला शीर्षक “यार चले बाहर” आगामी श्रृंखला के बारे में सब कुछ स्पष्ट करता है।

पार्वती नंदा, इनड्राइवर साउथ एशिया पीआर मैनेजर ने कहा कि हम “यार चले बाहर” का हिस्सा बनकर उत्साहित हैं। इस वेब सीरीज़ के माध्यम से, हम इनड्राइवर के अनूठे मॉडल को पंजाब के यूजर्स के सामने लाने में सक्षम हुए हैं, जो पैसेंजर्स को उनके राइड रिक्वेस्ट पर प्राइस ऑपफर की पेशकश करता है और आस-पास के ड्राइवरों के साथ बातचीत करने की सुविधा देता है। किराए के अलावा, यात्री अपनी रेटिंग, अराइवल के अनुमानित समय और व्हीकल के मॉडल के आधार पर भी अपने ड्राइवर का चयन करने में सक्षम हैं।

ट्रोल पंजाबी इनड्राइवर के सहयोग से आगामी वेब सीरीज़ को इस महीने 25 जून को विशेष रूप से ट्रोल पंजाबी के यूट्यूब चैनल पर रिलीज़ कर रहा है।


🔴"यार चले बहार" 2...रोबी तिवाना ने एक बार फिर एक अच्छा सीरियल बनाकर साबित कर दिया है कि अगर कहानी को सही तरीके से लिखा जाए, अगर नए कलाकारों को काम करने का सही मौका दिया जाए तो अच्छी फिल्में और सीरियल भी बन सकते हैं। वे सफल हो सकते हैं, ऐसी कहानियां पसंद की जाती हैं जो लोगों के जीवन के करीब हों, उनकी दैनिक स्थितियों के बारे में बात करें, रॉबी ने ऐसा किया है, एक अच्छे निर्देशक की पहचान मानवीय रिश्तों की सही तस्वीर पेश करने से ही होती है। कहानी, पटकथा, अभिनेताओं को रहने दें। निर्देशन नैसर्गिक हो, इसलिए कलाकार भी अच्छे लगते हैं, हमें रोबी टिवाना से ज्यादा उम्मीदें हैं कि वह आने वाले समय में पंजाबी समाज की गोद में अच्छी फिल्में और धारावाहिक देंगे, हम सभी अभिनेताओं से, लेखक को बधाई, निर्देशक, निर्माता और सभी सहयोगी...❤️❤️





गर्भ निरोधक गोली की सुरीली धड़कन

 


इतिहास पढ़ते हुए हम ये तो जानते हैं कि 1960 में गर्भनिरोधक गोलियां बाजार में आ गईं , लेकिन लोगों के बारे में नहीं जानते, जिन्होंने इसके लिए लड़ाई लड़ी। मार्गरेट सेंगर बर्थ कंट्रोल एक्टिविस्ट थीं।
हार्वर्ड की रिसर्च स्कॉलर क्लॉडिया गोल्डिन और लॉरेंस काट्ज का वह शोध शिक्षा और अर्थव्यवस्था में औरतों की हिस्सेदारी के बारे में था। लेकिन शोध के दौरान उन्होंने पाया कि 1970 के बाद का आंकड़ा किसी जादुई रफ़्तार से बढ़ता नज़र नजर आ रहा। लॉ और मेडिसिन पढ़नेवाली लड़कियों का अनुपात एकाएक 30 फीसदी तक बढ़ गया। बेहतर वेतनवाली नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी 11 फीसदी की बढ़त दिखी।
इसके कारणों की पड़ताल गोल्डिन को जहां लेकर गई, उसके बाद तो उनके शोध की दिशा ही बदल गई। हार्वर्ड की वेबसाइट पर उनका यह पूरा रिसर्च पेपर उपलब्ध है। इसका नाम है, ‘द पावर ऑफ द पिल।’ एक छोटी-सी सफेद रंग की गोली, जिसने न सिर्फ औरतों, बल्कि मुल्कों और अर्थव्यवस्थाओं की तक़दीर पलटकर रख दी। चलिए थोड़ा पीछे चलते हैं और शुरू से शुरू करते हैं।

साल1970 का। अमेरिका में गर्भनिरोधक गोलियों को आए 10 साल हो चुके थे। यह गोली वैध और अस्पतालों में विवाहित औरतों के लिए उपलब्ध थी। हालांकि अविवाहित स्त्रियों के लिए अब भी इसे लेना और इसके बारे में बात तक करना वर्जित था। गोली अभी तक पूरी दुनिया में नहीं पहुंची थी।
5 अप्रैल, 1971 को एक फ्रेंच पत्रिका में एक घोषणापत्र छपा। नाम था- ‘मेनिफेस्टो ऑफ 343 स्लट्स,’ जिसमें 343 औरतों ने अपने जीवन में कभी-न-कभी गर्भपात कराने की बात स्वीकार की। सिमोन द बोवुआर उस मेनिफेस्टो पर हस्ताक्षर करने वाली औरतों में से एक थीं। पारंपरिक मर्दवादी समाज में इसकी काफी आलोचना हुई। फ्रेंच वीकली ‘चार्ली हेब्दो’ ने अपनी हेडलाइन लगाई, ‘हू गॉट द 343 स्लट्स फ्रॉम द अबॉर्शन मेनिफेस्टो, प्रेग्नेंट?’

उस समय अबॉर्शन ग़ैरक़ानूनी और प्रेग्नेंसी को रोकने का कोई उपाय नहीं था। औरतों से उम्मीद की जाती कि वो शादी होने तक वर्जिन रहेंगी और शादी के बाद बच्चे पैदा करेंगी। इससे उलट कोई भी रास्ता चुनना, ‘स्लट’ होना था।

बात सिर्फ इतनी नहीं थी कि औरतें गर्भ ठहर जाने के डर से मुक्त होकर अपनी मर्ज़ी से शादी के पहले या बाद में सेक्स कर सकें। बात यह भी थी कि कम उम्र में मां बनना उनकी शिक्षा और नौकरी दोनों की राह में बड़ी दीवार था। केम्ब्रिज और हार्वर्ड जैसे शिक्षा संस्थान तो औरतों को लंबे रिसर्च प्रोग्राम में दाख़िला ही नहीं देते थे। उन्हें डर था कि वह प्रेग्नेंट होकर रिसर्च बीच में ही छोड़ देंगी। यही होता भी था।

और जो औरतें अनचाहे गर्भ को गिराने का रास्ता चुनतीं, उस रास्ते के अंधेरे और दुख की तो कोई थाह ही नहीं, क्योंकि दुनिया के 90 फीसदी मुल्कों में गर्भपात तब ग़ैरक़ानूनी था।

1992 में डोरोथी फैडीमैन ने एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बना, ‘व्हेन अबॉर्शन वॉज इललीगलः अनटोल्ड स्टोरीज।’ फ़िल्म को उस साल का ऑस्कर मिला । इस फ़िल्म में जो औरतें अपनी कहानी सुना रही हैं, उनके बाल पक चुके हैं। चेहरे पर झुर्रियां हैं। लेकिन आज भी अपनी कहानी सुनाते हुए उनकी आवाज कांपने लगती है। आंखें भर आती हैं।

बहुत-सी स्त्रियों ने कहा कि जिस सेक्स की वजह से उन्हें इतनी तकलीफ़ उठानी पड़ी, वो भी उनकी मर्ज़ी का नहीं था। वो रेप भी नहीं था। उस पूरे वक़्त उन्हें गर्भ ठहर जाने का डर ही सताता रहा था। लेकिन जब आप किसी रिश्ते में हों, तो अपने पुरुष साथी को इनकार कर पाना आसान नहीं होता। उसकी मर्ज़ी के आगे सिर झुकाना ही पड़ता है। उस फ़िल्म में शायद ही किसी स्त्री ने ये कहा कि वो अपने शरीर को जीना, उसकी ख़ुशी को महसूस करना चाहती थीं।

पोलैंड की गायनेकॉलजिस्ट मिशालिना विस्लोका हालांकि उसी ख़ुशी की बात करना चाहती थीं, जब सबने उनका मुंह बंद करने के लिए जान लगा दी। उन्होंने जब अपने देश में औरतों को गर्भनिरोध के बारे में बताना शुरू किया, तो सरकार उनके पीछे पड़ गई। वो न सिर्फ औरतों को प्रेग्नेंसी से बचने के उपाय बता रही थीं, बल्कि ये भी कह रही थीं कि अपनी देह में छिपे सुख के रहस्यों को पहचानो। इसी विषय पर अपनी किताब छपवाने के लिए उन्हें पोलैंड की सरकार तक से लड़ाई लड़नी पड़ी।

इतिहास गवाह है कि लंबे समय तक मेडिकल साइंस की औरतों के शरीर में कोई दिलचस्पी नहीं थी। मिशालिना का रिसर्च प्रस्ताव वारसा यूनिवर्सिटी ने यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि ‘आप हार्ट या लीवर पर रिसर्च क्यों नहीं करतीं, फंडिंग आसानी से मिल जाएगी।’

इतिहास पढ़ते हुए हम ये तो जानते हैं कि 1960 में गर्भनिरोधक गोलियां बाजार में आ गईं , लेकिन लोगों के बारे में नहीं जानते, जिन्होंने इसके लिए लड़ाई लड़ी। मार्गरेट सेंगर बर्थ कंट्रोल एक्टिविस्ट थीं। उनकी 50 साल लंबी लड़ाई का नतीजा थी यह गोली। उन्होंने अमेरिका में पहला बर्थ कंट्रोल क्लिनिक खोला था, जिसके लिए उन्हें जेल में डाल दिया गया। 1914 में उन्होंने एक किताब लिखी- ‘फैमिली लिमिटेशन’। किताब बैन कर दी गई। उन पर मुक़दमा हो गया और उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा।

एक लंबी लड़ाई के बाद गोली तो आई, लेकिन यह 1970 के बाद जाकर क़ानूनी तौर पर मुमकिन हो पाया कि अविवाहित स्त्रियां भी जेल जाने के डर के बग़ैर आसानी से किसी भी मेडिकल शॉप से यह दवा ख़रीद सकती थीं। उसके बाद ही यह हुआ कि पूरी दुनिया में विश्वविद्यालयों में फैमिली प्लानिंग सेंटर बने और इस बारे में पढ़ाया जाने लगा।

गोल्डिन ने अपनी रिसर्च में पाया कि 1970 के पहले मेडिकल कॉलेजों में 90 फीसदी लड़के होते थे। लॉ और एमबीए में लड़कों का अनुपात 95 फीसदी था। लेकिन 1980 तक आते-आते यह अनुपात बदल चुका था। मेडिकल और लॉ कॉलेजों में दाख़िला लेनेवाली लड़कियों की संख्या दो तिहाई हो चुकी थी।

यह गर्भनिरोधक गोली के चलते मुमकिन हुआ था कि लड़कियां सेक्सुअली एक्टिव होते हुए भी गर्भ ठहरने की संभावनाओं को नियंत्रित कर सकती थीं। कम उम्र में शादी और बच्चे के डर से मुक्त होकर अपना पूर ध्यान कॅरियर पर लगा सकती थीं।

रिसर्च कहती है कि 1970 के बाद पूरी दुनिया में लड़कियों के विवाह की औसत उम्र का ग्राफ आगे खिसकता गया है। उच्च शिक्षा के ज़रिए नौकरियों और अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी बढ़ी। 1970 के बाद एक-एक कर पूरी दुनिया में अबॉर्शन के अधिकार को स्त्रियों के वैधानिक अधिकारों में शुमार किया गया।

आज दुनिया के 97 फीसदी देशों में यह लीगल है। नारीवादी आंदोलनों का उदय हुआ। मर्दों को विशेषाधिकार देने वाले सभी क़ानूनों में बदलाव हुए। औरतों को संपत्ति में बराबर का अधिकार मिला। उन्हें पति या पिता के नाम के बग़ैर अपने नाम से संपत्ति खरीदने, क्रेडिट कार्ड रखने, बैंक अकाउंट खोलने का अधिकार मिला।

अर्थशास्त्री अमेलिया मिलर मातृत्व, श्रम और आय के आंकड़ों को बड़ी समझदारी के साथ रखते हुए कहती हैं कि अगर एक स्त्री का अपनी देह पर इतना अधिकार हो कि वह मातृत्व को एक साल आगे खिसका दे, तो उसके पूरे जीवन की आय में 10 फीसदी का इज़ाफ़ा होता है।

यह देखना सुखद आश्चर्य से भर देता है कि कैसे इन सारी घटनाओं की कड़ियां आपस में जुड़ी हुई हैं। गर्भनिरोधक गोली की इसमें बड़ी भूमिका है कि आज औरतों के पास भी अपनी नौकरी, अपना पैसा और अपना घर है। हालांकि राह अब भी बहुत लंबी है और मंज़िल दूर। लेकिन जितना सफ़र हमने तय किया, उस एक छोटी-सी गोली का एक शुक्रिया तो बनता है।
छोटे और सुखी परिवार के लिए परिवार नियोजन के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है। अब स्वास्थ्य विभाग की छाया परिवार नियोजन को अधिक सुरक्षित एवं सरल बनाने में महिलाओं का सहयोग करेगी। छाया एक कांट्रसेप्टिप पिल्स है, जो आशा कार्यकर्ता से लेकर स्वास्थ्य केंद्रों में नि:शुल्क उपलब्ध होगी।


मंगलवार, 9 मई 2023

पंजाबी फिल्म उद्योग

 


उल्लेखनीय पंजाबी फिल्म वितरण और/या निर्माण कंपनियों में शामिल हैं:

इनसाइड मोशन पिक्चर्स
सिने हाइट्स
गीत Mp3
व्हाइट हिल स्टूडियो
विनम्र मोशन पिक्चर्स
स्टूडियो 7 प्रोडक्शन कनाडा और यूएसए
श्री नरोत्तम जी प्रोडक्शंस
वेहली जनता फिल्म्स
ग्रामीण फिल्म स्टूडियो
शरारती पुरुष प्रोडक्शंस
ड्रीम रियलिटी फिल्म्स
Unisys Infosolutions Pvt Ltd/Saga Music Pvt Ltd


दलजीत कौर

 


दलजीत कौर पटेल (जन्म 15 नवंबर 1982) एक भारतीय टेलीविजन अभिनेत्री हैं , जिन्हें मुख्य रूप से इस प्यार को क्या नाम दूं ? और काला टीका में मंजिरी । उसने भाग लिया और शालिन भनोट के साथ नच बलिए की विजेता बनी । 2019 में, उन्होंने रियलिटी शो बिग बॉस 13 में भाग लिया ।


2004 में, उन्होंने मिस पुणे का खिताब जीता, साथ ही साथ मिस नेवी, मिस मुंबई और मिस महाराष्ट्र क्वीन सहित कई अन्य प्रतियोगिता में फाइनलिस्ट भी रहीं।  उन्होंने ज़ी टीवी के नाटक मंशा में अपना टेलीविज़न डेब्यू किया , और इसके बाद सीआईडी , आहट और रात होने को है में दिखाई दीं । 2005 में, वह कैसा ये प्यार है में एक कैमियो भूमिका में शो में दिखाई दीं । एक नाटक में नायक के रूप में उनकी पहली भूमिका कुलवधु में नियति के रूप में थी, जो जोधपुर के एक शाही परिवार की एक युवा लड़की थी । 


कुलवधु के अचानक समाप्त होने के बाद , दलजीत ने छूना है आसमान में शिखा की भूमिका निभाई ।  वह 2007 से 2009 तक स्टार प्लस के शो संतान में भी दिखाई दीं।


2008 में, उन्होंने चौथे सीज़न में डांस रियलिटी शो नच बलिए में भाग लिया और पूर्व पति शालिन भनोट के साथ विजेता बनीं । [16] 2011 में उन्होंने स्टार प्लस के शो इस प्यार को क्या नाम दूं? .  वह बाद में साथ निभाना साथिया (2012), ससुराल सिमर का और रंगरसिया (2013) जैसे अन्य शो में दिखाई दीं ।


बिग बॉस 16 के कंटेस्टेंट शालीन भनोट शो के सबसे चर्चित प्लेयर में से एक हैं। जिनका नाम टीना दत्ता से जुड़ा। फिर बाद में दोनों जानी दुश्मन बन गए। एक दूसरे से बात तक नहीं करते। पूरे शो में एक नाम का कई बार जिक्र हुआ दलजीत कौर। यह कोई और नहीं बल्कि शालीन भनोट की एक्स वाइफ हैं। आइए बताते हैं कौन हैं दलजीत कौर। क्यों दोनों का तलाक हुआ और इनके बेटे के बारे में सबकुछ।


दलजीत कौर ने ऐसे शुरु किया था करियर

दलजीत कौर ने साल 2014 में मिस पुणे का ताज अपने सिर सजाया था। इसके अलावा वह कई ब्यूटी पीजेंट की फाइनलिस्ट रह चुकी हैं। उन्होंने जीटीवी के सीरियल मंशा से एक्टिंग डेब्यू किया था।

दलजीत कौर के सीरियल

दलजीत कौर ने मंशा के बाद रात होने को है, कैसा ये प्यार है, सीआईडी, मानो ये न मानो, छूना है आसमान, सपना बाबुल का बिदाई, नच बलिए 4, अदालत, कोड रेड, काला टीका, ससुराल गेंदा फूल 2 समेत कई सीरियल में काम किया। इन सीरियल के अलावा वह बॉस सीरीज में भी दिखी थीं।

दलजीत कौर और शालीन भनोट की मुलाकात शो कुलवधू के सेट पर हुई थी। दोनों ने साथ में काम किया। दोनों के बीच दोस्ती हुई फिर दोनों ने एक दूसरे को डेट करना शुरू कर दिया।



कौर ने कलर्स टीवी के स्वरागिनी - जोड़े रिश्तों के सुर के साथ टेलीविजन पर वापसी की, जहां उन्होंने जानकी की भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने लाइफ ओके के सावधान इंडिया में एपिसोडिक भूमिका निभाई । 2015 से 2017 तक, उसने ज़ी टीवी के काला टीका में एक प्रमुख भूमिका निभाई ।


2017 में, उन्होंने माँ शक्ति में आदिशक्ति का किरदार निभाया । 2018 में, उन्होंने स्टार प्लस के शो क़यामत की रात में सहायक लीड में से एक की भूमिका निभाई ।  वह बाद में सिलसिला बदलते रिश्तों का और विक्रम बेताल की रहस्य गाथा में दिखाई दीं


2019 में, उन्होंने ज़ी टीवी पर प्रसारित होने वाले शो गुड्डन तुमसे ना हो पाएगा में प्रतिपक्षी अंतरा रावत की भूमिका निभाई ।  सितंबर 2019 में, कौर रियलिटी टीवी शो बिग ब्रदर , बिग बॉस के भारतीय संस्करण के तेरहवें सीज़न में एक सेलिब्रिटी प्रतियोगी थीं । 


मई 2021 में, कौर आसिम रियाज़ के भाई उमर रियाज़ के साथ संगीत वीडियो 'बेफिकर रहो' में दिखाई दीं, जिसे उन्होंने प्रोड्यूस भी किया था। 


दलजीत और शालीन की शादी और मेहमान


दलजीत कौर और शालीन भनोट ने 9 दिसंबर 2009 को शादी रचाई। दोनों ने शादी के बाद एक ग्रैंड रिसेप्शन दिया था जहां, अर्जुन बिजलानी, मिले जो हम तुम वाले मंयक, दिव्यांका त्रिपाठी, गुरमीत चौधरी, देबीना बनर्जी, अमन वर्मा समेत कई टीवी स्टार्स ने शिरकत ली थी।


बेटे का जन्म


दोनों दलजीत ने गुडन्यूज सुनाई। दोनों के घर बेटे का जन्म हुआ। मगर दलजीत और शालीन के बीच खटपट की खबरें आने लगी। देखते ही देखते दोनों ने तलाक ले लिया।


एक्सट्रा मैरिटल अफेयर और मारपीट का आरोप


दलजीत कौर ने शालीन और उनके परिवार पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दहेज प्रताड़ना, एक्सट्रा मैरिटल अफेयर और मारपीट का आरोप पति पर लगाया था। दलजीत कौर ने तो शालीन पर अटेम्ट टू मर्डर यानी हत्या का प्रयास जैसे गंभीर आरोप भी लगाए थे।


दलजीत के शालीन पर गंभीर आरोप


दलजीत कौर ने आरोप लगाया था कि एक बार तो शालीन ने उन्हें आधे घंटे से भी ज्यादा देर के लिए कमरे में बंद कर दिया था। उनका गला पकड़ के दीवार में मारा था। इसके बाद फर्नीचर पर फेंक दिया था। बहुत मुश्किल से उनकी जान बची थी। उनकी मदद घर की हाउस हेल्पर ने की थी।


हम लोग

 



बात 1984-1985 के दौर की है. इस दौर में भारत का पहली टीवी धारावाहिक रिलीज हुआ और इसके कुल 154 एपिसोड दूरदर्शन पर आए भी. यह सीरियल हम लोग था और इसमें बड़की का किरदार खूब पसंद किया गया था.

टेलीविजन पर प्रसारित होने वाला पहला सोप ओपेरा था, और टेलीकास्ट का तत्काल विकल्प केवल दूरदर्शन था। सीरियल खत्म होने के बाद अभिनेता अशोक कुमार कहानी और चल रहे एपिसोड पर चर्चा करते थे। वह कुछ रोचक चुटकुलों और हास्य का उपयोग करता था। सीरियल 156 एपिसोड तक चला था।

मनोहर श्याम जोशी ने कहानी की कल्पना की, और पी कुमार वासुदेव ने इसे निर्देशित किया। ऐसा माना जाता है कि सीरियल की शूटिंग ज्यादातर गुड़गांव के पास एक स्टूडियो में इनडोर में की गई थी। एक मध्यवर्गीय भारतीय परिवार की सुंदर कहानी मुख्य रूप से उनके संघर्षों और आकांक्षाओं पर बात करती है। इस प्रकरण ने 1980 के दशक के एक मध्यमवर्गीय परिवार को बहुत अच्छी तरह से चित्रित किया। हर किरदार, चाहे वह लाजो या लाजवंती के रूप में सुचित्रा (श्रीवास्तव) चितले हो या फिर दादी की भूमिका निभाने वाली सुषमा सेठ, घर-घर में जाना जाने लगा।

कलाकारों में विनोद नागपाल शामिल थे, जिन्होंने एक शराबी पिता के रूप में बसेसर राम की भूमिका निभाई या यहां तक कि जयश्री अरोड़ा द्वारा निभाई गई उनकी पत्नी, जिन्होंने 'बागवंती' की भूमिका निभाई। परिवार में दो भाई और तीन बहनें थीं जो जीवन में कुछ बनने की ख्वाहिश रखती थीं। उदाहरण के लिए, ललित प्रसाद द्वारा निभाया गया सबसे बड़ा बेटा लल्लू परिवार में एक बेरोजगार है। अभिनव चतुर्वेदी ने सबसे छोटे बेटे (चंदर प्रकाश) की भूमिका निभाई जो एक क्रिकेटर बनना चाहता है।

सीमा भार्गव सबसे बड़ी बेटी (बड़की या गुणवंती) थीं जो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। दिव्या सेठ (दूसरी बेटी) ने रूपवंती या मझली की भूमिका निभाई और एक अभिनेत्री बनना चाहती थी। तीसरी बेटी की भूमिका लवलीन मिश्रा (छुटकी) ने निभाई थी जो डॉक्टर बनना चाहती थी। लाहिड़ी सिंह द्वारा निभाया गया दादा का एक किरदार भी था। एक बार दूसरी बेटी एक लड़के के साथ घर से भाग जाती है। यहीं से परिवार में कलह होता है। बाद में क्या होता है ये तो सीरियल ही कह सकता है।

प्रारंभ में, यह 30 मिनट का धारावाहिक था, लेकिन बाद में जब श्रृंखला समाप्त हो रही थी, तो एपिसोड को एक घंटे की अवधि तक बढ़ा दिया गया था। धारावाहिक ने भारतीय टेलीविजन उद्योग में एक इतिहास रचा। संगीत अनिल बिस्वास द्वारा दिया गया था और इसे 1984 में दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया था।



  • कथावाचक के रूप में अशोक कुमार
  • शराबी पिता बसेसर राम (विनोद नागपाल)
  • भगवंती के रूप में: एक माँ, एक गृहिणी जयश्री अरोड़ा
  • सबसे बड़ा बेटा, बेरोजगार और नौकरी की तलाश में ललित पर्षाद उर्फ लल्लू (राजेश पूरी)
  • छोटा बेटा, एक क्रिकेटर बनने की ख्वाहिश रखता है; चंद्र प्रकाश नन्हे (अभिनव चतुर्वेदी)
  • गुणवंती उर्फ ​​बड़की, एक सामाजिक कार्यकर्ता सीमा पाहवा
  • एक अभिनेत्री बनने की ख्वाहिश रखती हैं रूप वनती उर्फ मझली (दिव्या सेठ
  •  डॉक्टर बनने की ख्वाहिश रखती हैं प्रीति उर्फ छुटकी (लवलिन मिश्रा)
  • सेवानिवृत्त सैनिक और दादा (लाहड़ी सिंह)
  •  इमरती देवी उर्फ ​​​​दादी के रूप में: दादी (सुषमा सेठ)
  • लल्लू की पत्नी उषा रानी के रूप में  (रेणुका इसरानी)
  • कामिया लाल (कामिया मल्होत्रा)
  • राजकुमार अजय सिंह के रूप में (आसिफ शेख)
  • लड़का जो मझली के साथ भाग जाता है टोनी के रूप में मनोज पाहवा
  •  लाजवंती उर्फ ​​के रूप में। लाजो (सुचित्रा श्रीवास्ते चितले)
  • संतो ताई के रूप में (कविता नागपाल)
  • डॉ अश्विनी (अश्वनी कुमार) 
  • इंस्पेक्टर सदानंद समदार के रूप में  (राजेंद्र चुघे) 
  • डॉक्टर अपर्णा के रूप में(अर्पणा कटारा)
  • प्रो. सुधीर के रूप में SM जाहिर
  • संगीत शिक्षक के रूप में (विश्व मोहन बडोला)
  • इसके 17 महीने चलने के दौरान, अशोक कुमार को युवा दर्शकों से 400,000 से अधिक पत्र मिले, जिसमें उनसे अपने माता-पिता को अपनी पसंद की शादी के लिए राजी करने के लिए कहा गया 



सोमवार, 8 मई 2023

फिल्म कन्या दान

 



कन्यादान बेशक आज के दर्शक को कमोबेश ज्यादा अच्छी मूवी न लगे, लेकिन जब यह रिलीज हुई थी तो कॉलेज के युवा वर्ग ने इसे हाथोंहाथ लिया था। कारण था शाशि कपूर के चेहरे की तरोताजगी और आशा पारेख के लटके-झटके। इस मूवी में दोनों की केमिस्ट्री खूब अच्छी बन पड़ी थी। जिन ख्यालों/सपनों को बुनकर किशोर वर्ग युवावस्था में पैर रखता है, निर्देशक मोहन सहगल ने इस कहानी के जरिये वह सब परोसा है, जिसकी उस वर्ग के दर्शक को दरकार थी। अगर आप पचासवें (उत्तरोत्तर) में पैदा हुए हैं तो आप भी इस गाने को गुनगुना के जवां हुए हैं ‘लिखे जो खत तुझे...’ क्योंकि उस जमाने में खत ही लिखे जाते थे और वह भी लुका-छिपाकर। कभी घरवालों से, कभी दोस्तों मित्रों से। यह फिल्म 1968 में रिलीज हुई थी। गाने ज्यादा नहीं थे, जो थे वे धुनों के कारण काफी लोकप्रिय हुए जिन्हें कलमबद्ध किया था हसरत जयपुरी व गोपाल दास नीरज ने। चूंकि संगीत शंकर जयकिशन का था, जाहिर है गाने हिट होने ही थे। गाने मशहूर होने का एक और कारण था उसकी पिक्चराइजेशन और कश्मीर की वादियों की लोकेशन। सिनेमैटोग्राफी भी कमाल की थी। चलते-चलते यह बात भी बता दूं कि यह मोहन सहगल वहीं हैं जिन्होंने रेखा को ब्रेक दिया था। रेखा को लेकर सावन-भादो उन्होंने ही बनायी थी। यह कहानी भी टिपिकल सोशल मुद्दों पर बनी है। भारत को आजाद हुए अभी कुछ ही समय हुआ था। अब तक गरीबी और भुखमरी पर तो काबू पा लिया था, लेकिन सामाजिक समस्याएं जन-जन में थीं। उनसे हम उबर नहीं पा रहे थे। उनमें से एक बाल विवाह की थी। अपनी शान या मजबूरी की खातिर माता-पिता बाल्यावस्था में बच्चों का विवाह करके उनके कोमल दिमाग पर ऐसी जिम्मेवारी को वहन करने का बोझ डाल देते थे, जिसका उनके जीवन से कुछ लेना-देना नहीं होता था। सही भी है बचपन में जो सिंदूर लगा दे, यह जरूरी नहीं कि उस दूल्हे से लड़की को प्यार हो। यही बात लड़के के पक्ष में भी कही जा सकती है। हो सकता है कि तब के हालात में यह फैसला ठीक हो, मगर बदले हालात में जब दूल्हे का कोई अतापता न हो तो लड़की तो न दुल्हन बनी न विधवा हुई। ऐसी कुछ विसंगतियां समाज में विद्यमान थीं जिन्हे दूर करने के लिए तब फिल्मोद्योग सामने आया, संस्थाएं तो काम कर ही रही थीं। कन्यादान की स्टोरी भी तत्कालीनता को लिए हुए थी इसलिए इसे बॉक्स ऑफिस पर खूब कामयाबी हासिल हुई। यह फिल्म 1968 में चौथी बड़ी कमाऊ फिल्म घोषित हुई। उस वक्त में ही इसने 3.2 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था जो आज की तारीख में 133 करोड़ रुपये के बराबर है। इस फिल्म में ‘मेरा गांव मेरा देश’ की साइड हीरोइन लक्ष्मी छाया भी है, जिसने धर्मेंद्र के मुंह पर चाकू रखकर गीत गाया था ‘मार दिया जाये या छोड़ दिया जाये’ या फिर ‘किस किस को सुनाऊं’ गीत पर ठुमकी थी। फिल्म कन्यादान में शशि कपूर अमर कुमार बने हैं और उनके दोस्त का नाम भी अमर है, वह दिलीप राय बने हैं। इससे गलत फहमी में लोग दिलीप को ही शशि समझ लेते हैं। फिल्म की कहानी भी हॉकी मैच से शुरू होती है जहां लड़कियां बुलबुल टीम के बैनर तले लड़कों की टीम हीरोज को ताल ठोकती हैं, लड़कियां लड़कों को 2 गोल के अंतर से हरा देती हैं। लेकिन सौभाग्य से अमर (दिलीप) जो लड़कों की टीम का नेतृत्व कर रहा है, लड़कियों की टीम बुलबुल की कप्तान लता पर मर-मिटता है। यह सब शशि (अमर) की देखरेख में होता है जो उस दिन अपने दोस्त अमर का मैच देखने आया है। दोनों को गठबंधन में बांधने के बाद शशिकपूर कार में वापस घर को लौट रहा था कि रास्ते में उसकी कार खराब हो जाती है। जहां कार खराब होती है, वहां दूर-दूर तक कोई मैकेनिक की दुकान नहीं, ऊपर से पहाड़ी रास्ता। यहीं पर उसकी मुलाकात पहाड़ी लड़की रेखा (आशा पारेख) से होती है जो भदेस छोरी लगती है। रात को ठिकाना वह रेखा के घर ही बनाता है जहां उसकी मां उसके साथ रहती है। आगे भी अमर उस रास्ते से गुजरता है तो रेखा के घर जरूर रुकता है जहां उसे बातों-बातों में रेखा की मां से रेखा के बचपन में ब्याह के बारे में पता चलता है और रेखा की मां अमर से उसका खोया दूल्हा ढूंढ़ने की गुहार करती है क्योंकि शहर में उसका बड़ा रसूख है। लेकिन तब तक अमर और रेखा आकंठ प्यार में डूब चुके होते हैं और कई प्रेम के तराने भी गा चुके होते हैं, जिनमें ‘लिखे जो खत तुझे’ भी शामिल है। जब रेखा को यह बात पता चलती है, वह भी दुखी व हैरान हो जाती है। लेकिन रेखा के पास अनाम दूल्हे की प्रतीक्षा करने के अलावा चारा न था। अमर निराश होकर वहां से चला जाता है। हालांकि वह शादी का प्रस्ताव लेकर आया था, लेकिन जब अगली बार अमर रेखा की मां के पास आता है तो अपने बचपन की फोटो लेकर आता है। फोटो में उसके माता-पिता को रेखा की मां पहचान लेती है और अमर के रूप में रेखा का खोया दूल्हा पाकर धन्य हो जाती है। दोनों की शादी हो जाती है, मगर एक बात बताना नहीं भूलता कि असली अमर की लता नामक लड़की से शादी हो चुकी है। इसलिए उसे ही रेखा दूल्हा समझे। क्योंकि वह उसको बहुत प्यार करता है। हालांकि यह बात रेखा को नागवार गुजरती है और वह स्वयं को खत्म करने के लिए बाहर निकल जाती है जो हीरो भला कहां ऐसा होने देगा? जब वह उस व्यक्ति को विवाहित देखती है जो बच्चे का बाप भी है तो मां आकर रेखा को समझाती है कि जो शादी उनकी मर्जी के बगैर उनके बचपन में कर दी गयी, वह शादी हरगिज शादी नहीं है। कन्यादान वही होता है जो मां-बाप युवा बेटी की मर्जी से उसकी पसंद के लड़के से विवाह तय करके करते हैं। अंत में रेखा मान जाती है। हमें भी पता था कि हसीना मान जायेगी। कहानी खत्म।

निर्देशक : मोहन सहगल


प्रोड्यूसर : राजेंद्र भाटिया


मूल व पटकथा : भाखड़ी


संवाद : एस. सैलानी


गीत : गोपाल दास नीरज, हसरत जयपुरी


संगीत : शंकर जयकिशन


सिनेमैटोग्राफी : केएच कपाड़िया


सितारे : शशि कपूर, आशा पारेख, ओमप्रकाश, दिलीप, अचला सचदेव आदि


गीत


लिखे जो खत तुझे : मोहम्मद रफी


मिल गये आज मेरे सनम : लता मंगेशकर


संडे को प्यार हुआ : आशा भोसले, महेंद्र कपूर


परायी हूं परायी मेरी आरजू न कर : लता मंगेशकर


फूलों की महक लहरों की लचक : महेंद्र कपूर


तुम नहीं भूलते जहां जाऊं : मोहम्मद रफी


मेरी जिंदगी में आते : मोहम्मद रफी

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