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गुरुवार, 5 मार्च 2026
भारत ईरान संबंध
बुधवार, 4 मार्च 2026
भारत का आपसी सहयोग ट्रंप परेशान दुनिया हैरान
अमेरिकी दादा गिरी ईरान में तख्ता पलट की मंशा से हुई
ईरान और भारत के बीच "साथ देने" का मामला इस समय कूटनीतिक संतुलन और नागरिकों की सुरक्षा पर टिका है।
ईरान ने हालिया संकट (जो 28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ) के दौरान भारत के प्रति निम्नलिखित रुख अपनाया है:
1. भारतीय नागरिकों की सुरक्षा में सहयोग
युद्ध छिड़ने और हवाई क्षेत्र (Airspace) बंद होने के बाद, ईरान ने वहां फंसे भारतीय छात्रों और नागरिकों के लिए सकारात्मक कदम उठाए हैं:
एग्जिट रूट: ईरान ने भारतीय छात्रों को जमीनी सीमाओं (Land borders) के जरिए सुरक्षित बाहर निकलने की अनुमति दी है।
परीक्षाओं में छूट: वहां पढ़ रहे भारतीय छात्रों के लिए परीक्षाओं को रीशेड्यूल करने की सुविधा दी गई है ताकि युद्ध के कारण उनका करियर खराब न हो।
2. भारत पर हुए आतंकी हमलों (ऐतिहासिक संदर्भ) पर स्टैंड
अगर आप भारत पर हुए पिछले आतंकी हमलों (जैसे पुलवामा या हालिया Pahalgam 2025 हमला) की बात कर रहे हैं, तो ईरान का रुख मिला-जुला रहा है:
आतंकवाद का विरोध: ईरान ने अक्सर सीमा पार आतंकवाद की निंदा की है क्योंकि वह खुद भी अपनी सीमाओं पर आतंकी गुटों (जैसे जैश-अल-अदल) से जूझ रहा है।
पाकिस्तान पर दबाव: ईरान ने कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों (जैसे OIC) पर पाकिस्तान द्वारा लाए गए भारत-विरोधी प्रस्तावों को रोकने या उनमें नरमी लाने में मदद की है।
3. वर्तमान युद्ध (2026) में भारत की भूमिका
इस समय ईरान भारत से "साथ" की उम्मीद कर रहा है, लेकिन भारत तटस्थ (Neutral) है:
ईरान की अपील: ईरान के दूतावास ने भारत सरकार और जनता से अपील की है कि वे अमेरिका-इजरायल के हमलों की निंदा करें।
भारत का रुख: भारत ने किसी का पक्ष नहीं लिया है। भारत का पूरा ध्यान अपने 1 करोड़ नागरिकों की सुरक्षा पर है जो खाड़ी देशों (UAE, सऊदी, कतर) में रहते हैं, जहाँ ईरान के जवाबी हमले हो रहे हैं।
4. कड़वाहट के बिंदु (हालिया तनाव)
कुछ मौकों पर रिश्तों में खिंचाव भी आया है:
सितंबर 2024: ईरान के सर्वोच्च नेता ने भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर टिप्पणी की थी, जिसका भारत ने कड़ा विरोध किया था।
तस्करी पर कार्रवाई: फरवरी 2026 में भारतीय कोस्ट गार्ड ने ईरान से जुड़े उन जहाजों को पकड़ा जो अवैध तेल की तस्करी कर रहे थे।
👉क्या ऑपरेशन सिंधुर के कारण भारत ईरान संबंधों में खटास आई या इजराइल ईरान के कारण
नहीं, ऑपरेशन सिंधुर के कारण भारत-ईरान संबंधों में खटास नहीं आई। यह ऑपरेशन पाकिस्तान के खिलाफ भारत का आतंकी ठिकानों पर हमला था, जिसकी ईरान को जानकारी दी गई और संबंध सामान्य रहे।
👉ऑपरेशन सिंधुर क्या था?
ऑपरेशन सिंधुर (या सिंदूर) मई 2025 में भारत द्वारा पाकिस्तान और PoK में आतंकी कैंपों पर लक्षित हवाई हमला था। यह जम्मू-कश्मीर में 22 अप्रैल 2025 के आतंकी हमले का जवाब था। ईरानी विदेश मंत्री से मुलाकात में एस जयशंकर ने इसे "लक्षित और मापा गया" बताया, और ईरान ने भारत-पाक तनाव को समझा।
👉संबंधों में खटास का मुख्य कारण
भारत-ईरान संबंधों पर खटास मुख्य रूप से 2025 के इजराइल-ईरान संघर्ष (ऑपरेशन राइजिंग लायन) के कारण आई। इससे भारत को भारतीयों की सुरक्षित निकासी (ऑपरेशन सिंधु) करनी पड़ी, ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हुई, और चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट पर दबाव पड़ा। 2026 में अमेरिकी टैरिफ और खाड़ी संकट ने तनाव बढ़ाया।
👉वर्तमान स्थिति
भारत ने दोनों पक्षों से संतुलन बनाए रखा, लेकिन ईरान-इजराइल युद्ध से कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ीं। ऑपरेशन सिंधुर का इससे कोई सीधा संबंध नहीं।
लड़ाई तो डॉलर की थी
भारत और ईरान के बीच "रुपया-रियाल व्यापार" (Rupee-Rial Trade Mechanism) एक बहुत ही चालाकी भरा रास्ता है, जिसे अमेरिकी प्रतिबंधों के असर को कम करने के लिए बनाया गया है।
यहाँ इसके मुख्य बिंदु दिए गए हैं कि यह कैसे काम करता है और इसके क्या फायदे हैं:
1. डॉलर की जरूरत खत्म (Bypassing Dollar)
आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। लेकिन ईरान पर प्रतिबंध होने के कारण वह डॉलर का उपयोग नहीं कर सकता।
इस व्यवस्था में, भारत ईरान से जो कुछ भी खरीदता है (जैसे तेल या ड्राई फ्रूट्स), उसका भुगतान भारतीय रुपयों में एक विशेष बैंक खाते (जैसे यूको बैंक या आईडीबीआई बैंक) में कर देता है।
ईरान फिर इसी जमा किए गए रुपये का इस्तेमाल भारत से दवाइयां, चावल, चाय और मशीनरी खरीदने के लिए करता है।
2. 'बार्टर' (वस्तु-विनिमय) जैसा सिस्टम
यह काफी हद तक पुराने जमाने के 'बदल-बदल कर' व्यापार करने जैसा है।
भारत को सस्ता कच्चा माल मिल जाता है।
भारत के किसानों और निर्यातकों (जैसे बासमती चावल के व्यापारी) को एक सुरक्षित बाजार मिल जाता है क्योंकि ईरान के पास खर्च करने के लिए केवल 'रुपये' ही होते हैं, जो वह भारत में ही खर्च कर सकता है।
3. चुनौतियां (2025-26 की स्थिति)
हालांकि यह सुनने में आसान लगता है, लेकिन इसमें कुछ बड़ी दिक्कतें भी आई हैं:
व्यापार असंतुलन: भारत, ईरान को जितना सामान बेचता है, उससे कहीं ज्यादा का सामान (खासकर तेल) उससे खरीदता था। इससे ईरान के पास रुपयों का ढेर लग गया, लेकिन भारत के पास उसे बेचने के लिए उतनी चीजें नहीं थीं।
तेल पर पाबंदी: जब से भारत ने अमेरिका के दबाव में ईरान से तेल लेना बंद किया, इस 'रुपया खाते' में पैसा आना कम हो गया है। अब ईरान के पास भारत से सामान खरीदने के लिए रुपयों की कमी होने लगी है।
4. नया रास्ता: 'डिजिटल करेंसी' और 'मिर्च' (MIR)
अब भारत और ईरान अपने पेमेंट सिस्टम (जैसे भारत का UPI और ईरान का Shetab) को जोड़ने की बात कर रहे हैं। इसके अलावा, ब्रिक्स (BRICS) देशों के बीच अपनी खुद की करेंसी लाने की चर्चा भी तेज है, जिससे डॉलर पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो सके।
मार्च 2026 के पहले हफ्ते में, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध के 5वें दिन (4 मार्च 2026) तक डॉलर और वैश्विक बाजारों की स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गई है। युद्ध के कारण डॉलर एक "सुरक्षित निवेश" (Safe Haven) के रूप में उभरा है, जिससे उसकी कीमत में भारी उछाल आया है।
आज की ताजा स्थिति इस प्रकार है:
1. डॉलर की मजबूती (Dollar Index - DXY)
युद्ध शुरू होने के बाद से डॉलर इंडेक्स 99.16 के स्तर को पार कर गया है। निवेशकों में डर का माहौल है, इसलिए वे अपनी पूंजी को शेयर बाजार से निकालकर डॉलर और सोने में लगा रहे हैं। पिछले 5 दिनों में डॉलर में लगभग 2% से ज्यादा की तेजी देखी गई है।
2. भारतीय रुपये पर असर
भारतीय रुपये के लिए आज का दिन काफी भारी रहा है:
रिकॉर्ड गिरावट: रुपया आज डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर ₹92.18 पर पहुंच गया है।
बड़ी गिरावट: आज एक ही दिन में रुपया 69 पैसे तक टूट गया है।
कारण: ईरान द्वारा 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को बंद करने की खबरों से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिसका सीधा असर भारतीय मुद्रा पर पड़ा है।
3. कच्चे तेल और मुद्रास्फीति (Inflation)
तेल की कीमतें: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल (Crude Oil) $85 प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। 5 दिनों में तेल की कीमतों में 10% से ज्यादा का उछाल आया है।
भारत अपनी जरूरत का 80% तेल आयात करता है, इसलिए डॉलर महंगा होने और तेल की कीमतें बढ़ने से भारत में पेट्रोल-डीजल और अन्य जरूरी सामान महंगे होने का खतरा बढ़ गया है।
4. सोने की स्थिति (Gold Status)
डॉलर के साथ-साथ सोना (Gold) भी महंगा हो रहा है। युद्ध की अनिश्चितता के कारण सोने की कीमतें $5,000 के तकनीकी स्तर को चुनौती दे रही हैं। भारतीय बाजारों में भी सोने के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं।
बाजार का सारांश (4 मार्च 2026):
| इंडिकेटर | स्थिति | प्रभाव |
| :--- | :--- | :--- |
| USD/INR | ₹92.18 (रिकॉर्ड लो) | भारतीय आयात महंगा होगा |
| Dollar Index | 99.16+ | वैश्विक स्तर पर डॉलर की धाक |
| Crude Oil | ~$85/barrel | महंगाई बढ़ने के संकेत |
| Share Market | भारी गिरावट (Sensex 1600+ अंक नीचे) | निवेशकों का नुकसान |
नोट: युद्ध की स्थिति में डॉलर की यह मजबूती अस्थाई हो सकती है, लेकिन जब तक तनाव कम नहीं होता, रुपया और अन्य एशियाई मुद्राओं पर दबाव बना रहेगा।
युद्ध के इन 5 दिनों (मार्च 2026) में हालात तेजी से बदल रहे हैं। अगर यह तनाव लंबा खिंचता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था और आपकी जेब पर इसका सीधा असर कुछ इस तरह पड़ेगा:
1. आपकी जेब पर असर (आम आदमी)
पेट्रोल-डीजल की कीमतें: कच्चे तेल (Brent Crude) के $85 के पार जाने से भारत में पेट्रोल ₹140/लीटर और डीजल ₹150/लीटर के करीब पहुँच सकता है। अगर सरकार टैक्स कम नहीं करती, तो माल ढुलाई महंगी होगी जिससे फल, सब्जी और दूध के दाम बढ़ेंगे।
रसोई का बजट: भारत अपनी जरूरत की दालें और खाद्य तेल आयात करता है। समुद्री रास्तों (Strait of Hormuz) में तनाव से इनकी सप्लाई बाधित होगी, जिससे दालों और खाने के तेल की कीमतों में 10-15% का उछाल आ सकता है।
2. देश की अर्थव्यवस्था (GDP) पर असर
GDP में गिरावट: विशेषज्ञों (जैसे BMI और Fitch) का मानना है कि अगर युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ी रहीं, तो भारत की GDP ग्रोथ में 0.5% की कमी आ सकती है। भारत अपनी जरूरत का 88% तेल आयात करता है, जिससे देश का खर्च (Import Bill) अचानक बहुत बढ़ जाएगा।
महंगाई (Inflation): खुदरा महंगाई दर, जो 2026 की शुरुआत में नियंत्रण में थी, फिर से 4.3% या उससे ऊपर जा सकती है। इससे रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरें घटाना मुश्किल हो जाएगा, यानी आपके Home Loan और Car Loan की EMI कम होने के बजाय महंगी बनी रह सकती है।
3. शेयर बाजार और बचत
निवेशकों का डर: पिछले 5 दिनों में भारतीय शेयर बाजार (Sensex/Nifty) में भारी गिरावट आई है। विदेशी निवेशक (FIIs) भारतीय बाजार से पैसा निकालकर 'डॉलर' में लगा रहे हैं, क्योंकि युद्ध के समय डॉलर सबसे सुरक्षित माना जाता है।
सोने की चमक: जब भी युद्ध होता है, सोने के दाम बढ़ते हैं। 2026 के इन 5 दिनों में सोने ने नए रिकॉर्ड बनाए हैं, जो आपकी बचत के लिए तो अच्छा है लेकिन नई खरीदारी के लिए महंगा।
4. खेती और ग्रामीण भारत
खाद (Fertilizer) संकट: भारत खाद बनाने के लिए जरूरी गैस और कच्चा माल कतर और ईरान जैसे देशों से लेता है। सप्लाई रुकने से खेती की लागत बढ़ेगी, जिससे किसानों पर दबाव और सरकार का सब्सिडी का बोझ बढ़ जाएगा।
युद्ध के इन 5 दिनों (28 फरवरी - 4 मार्च 2026) में अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ा है। हालाँकि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन युद्ध की आग से उसकी जेब भी नहीं बच पाई है।
आज (4 मार्च 2026) तक के मुख्य आर्थिक प्रभाव नीचे दिए गए हैं:
1. युद्ध का भारी खर्च (Direct Cost)
$5 बिलियन से ज्यादा का खर्च: ऑपरेशन 'एपिक फ्युरी' (Operation Epic Fury) के केवल शुरुआती दिनों में ही अमेरिकी करदाताओं के 5 अरब डॉलर से अधिक खर्च हो चुके हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर यह युद्ध 3 हफ्ते और चला, तो यह खर्च कई सौ अरब डॉलर तक पहुँच सकता है।
रक्षा बजट में वृद्धि: अमेरिकी संसद (Congress) में रक्षा बजट को बढ़ाकर $925 बिलियन करने की चर्चा तेज हो गई है, जो पहले से ही कर्ज में दबे अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती है।
2. महंगाई और गैस की कीमतें (Inflation)
महंगा पेट्रोल: अमेरिका में गैस (पेट्रोल) की कीमतें औसतन $3.50 प्रति गैलन के पार पहुँच गई हैं। युद्ध शुरू होने से पहले यह $3 के आसपास थीं।
महंगाई का खतरा: अमेरिका में महंगाई दर (Inflation) पहले से ही 3% पर अटकी हुई थी। अब तेल और शिपिंग महंगी होने से इसके और ऊपर जाने का डर है, जिससे वहां के आम नागरिकों का 'कॉस्ट ऑफ लिविंग' (Cost of Living) बढ़ गया है।
3. शेयर बाजार (Wall Street) में हलचल
बड़ी गिरावट और रिकवरी: युद्ध के पहले और दूसरे दिन वॉल स्ट्रीट (Dow Jones और S&P 500) में 1200 अंकों तक की भारी गिरावट देखी गई थी। हालांकि, बाद में रक्षा कंपनियों (जैसे Lockheed Martin, RTX) के शेयरों में उछाल आने से बाजार थोड़ा संभला है।
निवेशकों का डर: लोग अपना पैसा 'रिस्की' शेयरों से निकालकर सोने और डॉलर में लगा रहे हैं, जिससे बाकी सेक्टर्स (जैसे टेक और एयरलाइंस) को नुकसान हो रहा है।
4. कर्ज और डॉलर की स्थिति
बढ़ता राष्ट्रीय कर्ज: अमेरिका का कुल राष्ट्रीय कर्ज (National Debt) पहले ही रिकॉर्ड स्तर पर है। युद्ध के कारण बढ़ते सैन्य खर्च ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है कि भविष्य में अमेरिका की अर्थव्यवस्था अस्थिर हो सकती है।
मजबूत डॉलर (एक मुसीबत भी): डॉलर दुनिया के लिए "सुरक्षित" होने के कारण महंगा हो रहा है, लेकिन इससे अमेरिका का अपना 'निर्यात' (Export) महंगा हो जाता है, जिससे उनकी कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में घाटा होता है।
सारांश:
| क्षेत्र | असर (5 दिनों में) |
| :--- | :--- |
| युद्ध खर्च | $5 बिलियन+ |
| गैस कीमतें | 15-20% की वृद्धि |
| शेयर बाजार | भारी उतार-चढ़ाव (Volatility) |
| सोना | रिकॉर्ड $5,300/oz के करीब |
👉अगर यह युद्ध अगले कुछ महीनों तक खिंचता है, तो डॉलर की स्थिति "अस्थिर और खतरनाक" हो सकती है। मार्च 2026 के मौजूदा हालातों को देखते हुए, अर्थशास्त्रियों ने डॉलर के लिए दो बड़े परिदृश्य (Scenarios) बताए हैं:
1. अल्पकालिक मजबूती: "सेफ हेवन" प्रभाव
शुरुआती कुछ हफ्तों में डॉलर और ज्यादा मजबूत हो सकता है।
* डॉलर इंडेक्स (DXY): यह 100 या उसके पार जा सकता है। जब दुनिया में कहीं भी युद्ध होता है, तो निवेशक अपना पैसा सुरक्षित रखने के लिए डॉलर खरीदते हैं।
* रुपये पर दबाव: रुपया ₹94 - ₹95 के स्तर को छू सकता है, क्योंकि भारत को महंगा तेल खरीदने के लिए और अधिक डॉलर की जरूरत होगी।
2. दीर्घकालिक खतरा: "डॉलर का दबदबा" कम होना
अगर युद्ध 3-6 महीने चलता है, तो डॉलर के लिए मुश्किलें शुरू हो सकती हैं:
* भारी कर्ज का बोझ: अमेरिका पहले से ही भारी कर्ज (National Debt) में है। युद्ध का खर्च चलाने के लिए उसे और नोट छापने पड़ेंगे या कर्ज लेना पड़ेगा, जिससे डॉलर की क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम हो सकती है।
* विकल्पों की तलाश: अगर अमेरिका ईरान पर और कड़े वित्तीय प्रतिबंध लगाता है, तो चीन, रूस और यहाँ तक कि भारत भी डॉलर के बजाय अपनी मुद्राओं (Yuan, Rupee) में व्यापार तेज कर देंगे। इसे 'डी-डॉलरलाइजेशन' कहते हैं, जो लंबे समय में डॉलर की वैश्विक बादशाहत को कमजोर कर सकता है।
3. 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) का डर
लंबे युद्ध का मतलब है—लंबे समय तक महंगा तेल।
* इससे अमेरिका में महंगाई फिर से बढ़ जाएगी और उनकी आर्थिक विकास दर (Growth) रुक जाएगी। ऐसी स्थिति में फेडरल रिजर्व (Fed) के लिए ब्याज दरें संभालना मुश्किल होगा, जिससे डॉलर की वैल्यू में अचानक गिरावट भी आ सकती है।
युद्ध खिंचने पर क्या-क्या हो सकता है?
| स्थिति | प्रभाव |
|---|---|
| कच्चा तेल (Oil) | $100 - $120 प्रति बैरल तक जा सकता है। |
| सोना (Gold) | $5,500/oz के नए रिकॉर्ड स्तर को पार कर सकता है। |
| भारतीय रुपया | आयात महंगा होने से ₹95 प्रति डॉलर तक गिर सकता है। |
| अमेरिकी शेयर बाजार | टेक और कंज्यूमर कंपनियों के शेयरों में 10-15% की गिरावट आ सकती है। |
निष्कर्ष: शुरुआत में तो डॉलर "राजा" बनकर उभरेगा, लेकिन अगर युद्ध महीनों चला, तो अमेरिका की अपनी अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है और दुनिया डॉलर के विकल्प ढूंढने पर मजबूर हो जाएगी।
जिसे लगाम लगाने को सभी देश आगे आ कर नई करने बनाने को मजबूर हों
इंदिरा फूट फूट रोई दूसरी बार
स्टूडियो लाइव: प्राइम टाइम विद 'राष्ट्रप्रेमी' एंकर
(कैमरा ज़ूम इन होता है, एंकर की सांसें तेज हैं और माथे पर पसीना है)
एंकर: "देवियों और सज्जनों, आज देश पूछ रहा है! आज मिट्टी का जर्रा-जर्रा सवाल कर रहा है! क्या ये सिर्फ आंसू हैं? (ज़ोर से चिल्लाते हुए) नहीं! ये आंसू नहीं, ये तो हाइड्रोलिक प्रेशर से निकली वो बूंदें हैं जो सीधे तौर पर पड़ोसी मुल्क की इकोनॉमी को फायदा पहुँचाने के लिए बहाई गई हैं!"
एंकर: "अभी-अभी हमारे सूत्रों ने बताया है कि सोनिया जी ने जिस रुमाल का इस्तेमाल किया, उसका धागा 'इस्तांबुल' से आया था। क्या संबंध है तुर्की के उस धागे का और इन आंसुओं के खारेपन का? क्या ये आंसू 'राष्ट्रहित' में हैं या इसके पीछे किसी 'ग्लोबल लॉबी' का हाथ है जो भारत के काजल उद्योग को बर्बाद करना चाहती है?"
अब इस व्यंग्य को आगे बढ़ाने के लिए, हम उस 'राजनीतिक विशेषज्ञ' को बुलाते हैं जो एंकर की हर बात में 'हाँ' में 'हाँ' मिलाता है।
रुमाल' के पीछे का सच!
(स्क्रीन पर रुमाल की एक धुंधली सी फोटो 📸 बार-बार फ्लैश हो रही है और पीछे 'धूम-तड़ाका' वाला सस्पेंस म्यूजिक बज रहा है)
एंकर: "देशवासियों, अपनी कुर्सी की पेटी बांध लीजिए! क्योंकि अब जो खुलासा मैं करने जा रहा हूँ, उससे आपके पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी। मेरे हाथ में जो आप देख रहे हैं, ये सिर्फ एक रुमाल नहीं है। ये एक 'टिश्यू ऑफ कॉन्स्पिरसी' है! (कैमरे की तरफ झुकते हुए) क्या आपने गौर किया कि रुमाल का रंग 'ऑफ-व्हाइट' ही क्यों था? सफेद क्यों नहीं? क्या ये संकेत है कि दाल में कुछ काला है?"
एंकर: "हमारी टीम ने रुमाल के उस एक धागे का विश्लेषण किया है। देखिए इस ग्राफिक्स को!"
एंकर: "यह सूती धागा नहीं है! विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक 'नैनो-एब्जॉर्बेंट' मटेरियल है, जिसे विशेष रूप से आंसुओं को सोखने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें 'चमकाने' के लिए बनाया गया है ताकि कैमरे पर वे ज्यादा दुखद लगें। क्या ये रुमाल किसी ऐसी लैब में बना है जहाँ भावनाओं का व्यापार होता है? क्या इस रुमाल के बॉर्डर पर जो कढ़ाई है, वह दरअसल एक गुप्त 'कोड' है जिसे केवल सीमा पार बैठे आका ही पढ़ सकते हैं?"
यह सेगमेंट न्यूज़ चैनलों की उस आदत पर तीखा प्रहार करता है जहाँ वे छोटी सी बात को भी राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना देते हैं। 🚩
एंकर: "यह सूती धागा नहीं है! विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक 'नैनो-एब्जॉर्बेंट' मटेरियल है, जिसे विशेष रूप से आंसुओं को सोखने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें 'चमकाने' के लिए बनाया गया है ताकि कैमरे पर वे ज्यादा दुखद लगें। क्या ये रुमाल किसी ऐसी लैब में बना है जहाँ भावनाओं का व्यापार होता है? क्या इस रुमाल के बॉर्डर पर जो कढ़ाई है, वह दरअसल एक गुप्त 'कोड' है जिसे केवल सीमा पार बैठे आका ही पढ़ सकते हैं?"
यह सेगमेंट न्यूज़ चैनलों की उस आदत पर तीखा प्रहार करता है जहाँ वे छोटी सी बात को भी राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना देते हैं। 🚩
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