शुक्रवार, 28 मार्च 2025

रथी

*प्राचीन काल के योद्धाओं का युद्ध कौशल के आधार पर उनके स्तर का वर्गीकरण*



*हम सभी ने प्राचीन काल एवम् इतिहास और उनकी युद्ध गाथाओं में योद्धाओं के कौशल स्तर के विषय में अवश्य पढ़ा होगा और सबसे आम शब्द जो इन धर्म ग्रंथों, पुस्तकों में देखने की मिलता है वह है "महारथी"*



*महारथी शब्द का प्रयोग हम जितनी सरलता से करते हैं वास्तविकता में उसकी श्रेणी उससे कई सौ गुना बड़ी होती थी और कुछ चुनिंदा योद्धा हीं महारथी के स्तर प्राप्त किया करते थे*




*आइये आज यहाँ हम जानते हैं की योद्धाओं कि इन “अति उच्च श्रेणियों” को पाने के लिए किन योग्यताओं का होना आवश्यक था।*



*प्राचीन काल के प्रमुख योद्धाओं को मुख्यतः 6 श्रेणियों में बांटा गया है,*



*1_अर्धरथी अर्धरथी एक प्रशिक्षित योद्धा होता था जो अस्त्र-शस्त्रों के सञ्चालन में निपुण होता था। एक अर्धरथी अकेले 2500 सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता था।*



*रामायण और महाभारत के विषय में कहें तो इन युद्धों में असंख्य अर्धरथियों ने हिस्सा लिया था।*



*2_रथी एक ऐसा योद्धा जो सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र के सञ्चालन में निपुण हो तथा 2 अर्धरथियों, अर्थात 5000 सशस्त्र योद्धाओं का सामना एक साथ कर सके।*



 *रामायण रामायण में कई रथियों ने हिस्सा लिया जिनका बहुत विस्तृत वर्णण नहीं मिलता है। राक्षसों में खर,दूषण,तड़का, मारीच, सुबाहु*

*वातापि आदि रथी थे। वानरों में गंधमादन, मैन्द एवं द्विविन्द, हनुमान के पुत्र मकरध्वज, को रथी माना जाता था।*



*महाभारत सभी कौरव, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, शकुनि, उसका पुत्र उलूक, उपपांडव (प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक एवं श्रुतसेन), विराट, उत्तर, शिशुपाल पुत्र धृष्टकेतु*

*जयद्रथ, शिखंडी, सुदक्षिण, शंख, श्वेत, इरावान, कर्ण के सभी पुत्र, सुशर्मा, उत्तमौजा, युधामन्यु, जरासंध पुत्र सहदेव, बाह्लीक पुत्र सोमदत्त, कंस, अलम्बुष, अलायुध, बृहदबल आदि की गिनती रथी के रूप में होती थी। दुर्योधन को 8 रथियों के बराबर माना गया है।*



*3-अतिरथी एक ऐसा योद्धा जो सामान्य अस्त्रों के साथ अनेक दिव्यास्त्रों का भी ज्ञाता हो तथा युद्ध में 12 रथियों, अर्थात 60000 सशस्त्र योद्धाओं का सामना एक साथ कर सकता हो।* 



 *रामायण लव, कुश, अकम्पन्न, विभीषण, देवान्तक, नरान्तक, महिरावण, पुष्कल, काल में अंगद, नल, नील, प्रहस्त,अकम्पन, भरत पुत्र पुष्कल, विभीषण, त्रिशिरा, अक्षयकुमार, हनुमान के पिता केसरी अदि अतिरथी थे।*



*महाभारत भीम, जरासंध, धृष्टधुम्न, कृतवर्मा, शल्य, भूरिश्रवा, द्रुपद, घटोत्कच, सात्यिकी, कीचक, बाह्लीक, साम्ब, प्रद्युम्न, कृपाचार्य, शिशुपाल, रुक्मी, सात्यिकी, बाह्लीक, नरकासुर,प्रद्युम्न, कीचक आदि अतिरथी थे।*



*4- महारथी ये संभवतः सबसे प्रसिद्ध पदवी थी और जो भी योद्धा इस पदवी को प्राप्त करते थे वे पूरे जगत में सम्मानित और प्रसिद्ध होते थे। महारथी एक ऐसा योद्धा होता था जो सभी ज्ञात अस्त्र शस्त्रों और कई दिव्यास्त्रों को चलने में समर्थ होता था।युद्ध में महारथी 12 अतिरथियों अथवा 720000 सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता था। इसके अतिरिक्त जिस भी योद्धा के पास ब्रह्मास्त्र का ज्ञान होता था (जो गिने चुने ही थे) वो सीधे महारथी की श्रेणी में आ जाते थे।* 



*रामायण भरत, शत्रुघ्न, अंगद, सुग्रीव, अतिकाय, कुम्भकर्ण, प्रहस्त, जामवंत आदि महारथी की श्रेणी में आते हैं। रावण, बाली एवं कर्त्यवीर्य अर्जुन को एक से अधिक महारथियों के बराबर माना गया है।*



*महाभारत अभिमन्यु, बभ्रुवाहन, अश्वत्थामा, भगदत्त, बर्बरीक आदि महारथी थे। भीष्म, द्रोण, कर्ण, अर्जुन एवं बलराम को एक से अधिक महारथियों के बराबर माना गया है।कहीं-कहीं अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के कारण “अतिमहारथी” भी कहा जाता है*



*5-अतिमहारथी इस श्रेणी के योद्धा दुर्लभ होते थे।अतिमहारथी उसे कहा जाता था जो 12 महारथी श्रेणी के योद्धाओं अर्थात 8640000 सशस्त्र योद्धाओं का सामना अकेले कर सकता हो साथ ही सभी प्रकार के दैवीय शक्तियों का ज्ञाता हो।* 



*महाभारत महाभारत काल में केवल भगवान श्रीकृष्ण को अतिमहारथी माना जाता है*



*रामायण रामायण में भगवान श्रीराम अतिमहारथी थे।उनके अतिरिक्त मेघनाद को अतिमहारथी माना जाता है क्यूंकि केवल वही था जिसके पास तीनों महास्त्र - ब्रम्हास्त्र, नारायणास्त्र एवं पाशुपतास्त्र थे। पाशुपतास्त्र को छोड़ कर लक्ष्मण को भी समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान था अतः कुछ जगह उन्हें भी इस श्रेणी में रखा जाता है।*



*इसके अतिरिक्त भगवान परशुराम और महावीर हनुमान का भी वर्णन कई स्थान पर अतिमहारथी के रूप में किया गया है।*



*भगवान विष्णु के अवतार विशेष कर वाराह एवं नृसिंह को भी अतिमहारथी की श्रेणी में रखा जाता है। कुछ देवताओं जैसे कार्तिकेय, गणेश तथा वैदिक युग के ग्रंथों में इंद्र, सूर्य एवं वरुण देव को भी अतिमहारथी माना जाता है।आदिशक्ति की दस महाविद्याओं, नवदुर्गा एवं रुद्रावतार, विशेषकर वीरभद्र और भैरव को भी अतिमहारथी माना जाता है।*



*6 महामहारथी ये किसी भी प्रकार के योद्धा का उच्चतम स्तर माना जाता है। महामहारथी उसे कहा जाता है जो 24 अतिमहारथियों अर्थात 207360000 सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता हो। इसके साथ ही समस्त प्रकार की दैवीय एवं महाशक्तियाँ उसके अधीन हो*

*इन्हे आसानी से परास्त नहीं किया जा सकता।*



*आज तक पृथ्वी पर कोई भी "योद्धा" इस स्तर पर नहीं पहुँचा है। इसका एक कारण ये भी है कि अभी तक 24 अतिमहारथी एक काल में तो क्या पूरे कल्प में भी नहीं हुए हैं। केवल त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र) एवं आदिशक्ति को ही इतना शक्तिशाली माना जाता है*



*जय शिव शंभू 🙏🏻🔱*

गुरुवार, 20 मार्च 2025

सती प्रथा या वामपंथी विवाद


सती प्रथा पर विशेष.......... AI और अन्य विद्वानों के सहयोग से
सती प्रथा एक प्राचीन भारतीय प्रथा थी जिसमें एक विधवा अपने पति की चिता पर स्वयं को जलाकर आत्मदाह कर लेती थी। इस प्रथा को 1829 में ब्रिटिश भारत में गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था।
सती प्रथा के बारे में कुछ मुख्य बातें:
 प्रारंभ:
    सती प्रथा का पहला अभिलेखीय साक्ष्य 510 ईस्वी के मध्य प्रदेश के एरण स्तंभ लेख से मिलता है।
    कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह प्रथा गुप्त काल में शुरू हुई थी।
    धर्मसूत्रों तथा प्रारम्भिक स्मृतियों से भी सती प्रथा के प्रचलित होने का संकेत नहीं मिलता है । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि चतुर्थ ईसा पूर्व तक सती प्रथा का प्रचलन भारतीय समाज में नहीं था |
  भारतीय समाज में सती प्रथा का प्रचलन चतुर्थ शती ईसा पूर्व के बाद किसी समय हुआ होगा ।
हिंदू धर्म में स्थान:
    कुछ लोगों का मानना है कि सती प्रथा हिंदू धर्म का एक अभिन्न अंग थी, जबकि अन्य लोग इसे एक सामाजिक बुराई मानते हैं।
    सती प्रथा को हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में कहीं भी अनिवार्य नहीं बताया गया है।
 अंत:
    1829 में, राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों के प्रयासों के कारण, ब्रिटिश सरकार ने सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया।
   * बंगाल सती विनियमन, 1829: राममोहन राय के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप बंगाल सती विनियमन, 1829 पारित हुआ, जिसमें सती प्रथा को अपराध घोषित किया गया।
 * आडंबर:
   * यह कहना उचित होगा कि सती प्रथा एक सामाजिक आडंबर थी, जो समय के साथ विकसित हुई और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव और हिंसा का प्रतीक बन गई।
सती प्रथा के कुछ कारण:
  सामाजिक दबाव
 आर्थिक असुरक्षा
 धार्मिक मान्यताएँ तो नहीं कही जा सकतीं पर कुछ आक्रमण कार्यों की कुदृष्टि से परिवार कुल को बचाने का प्रभाव शाली उपाय जरूर कह सकते हैं। यह सच है कि सती प्रथा को सिर्फ धार्मिक मान्यता कहना पूरी तरह से सही नहीं होगा। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहाँ आक्रमणकारियों के भय से परिवारों और कुल की महिलाओं ने सती प्रथा का सहारा लिया।
आक्रमण का भय:
 प्राचीन और मध्यकाल में, जब युद्ध और आक्रमण आम बात थी, महिलाओं को अक्सर दुश्मनों द्वारा बंदी बना लिया जाता था और उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता था।
  ऐसे में, कुछ परिवारों ने अपनी महिलाओं की रक्षा के लिए उन्हें सती होने के लिए प्रोत्साहित किया।
  यह एक दर्दनाक लेकिन उस समय के हिसाब से परिवार की प्रतिष्ठा और महिलाओं के सम्मान को बचाने का एक तरीका माना जाता था।
विशेष रूप से राजपूत काल में, जब आक्रमणों की संख्या अधिक थी, सती प्रथा का प्रचलन भी बढ़ गया।
  कुल की रक्षा के लिए, महिला का आत्म बलिदान एक उत्तम उपाय था।
सामाजिक परिस्थितियाँ:
  इसके अलावा, विधवा महिलाओं को समाज में कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता था।
 आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक बहिष्कार के कारण, कुछ महिलाओं ने सती होना बेहतर समझा।
  कुछ मामलों में, परिवार के लोग भी विधवा महिलाओं को बोझ समझते थे खाना भी उचित नहीं परिवार उन्हें परिस्थिति वश सती होने के लिए मजबूर करते रहे होंगे।
इसलिए, यह कहना सही होगा कि सती प्रथा केवल धार्मिक मान्यता नहीं थी, बल्कि यह उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का भी परिणाम थी। आक्रमणकारियों का भय और सामाजिक असुरक्षा ने इस प्रथा को बढ़ावा दिया।वैसे सती प्रथा एक दुखद और जटिल विषय है। इसके बारे में कई अलग-अलग दृष्टिकोण हैं।

पति की मृत्यु के बाद ही उसकी विधवा को एक कटोरा भांग और धतूरा पिलाकर नशे में मदहोश कर दिया जाता था। जब वह श्मशान की ओर जाती थी, कभी हँसती थी, कभी रोती थी और तो कभी रास्ते में जमीन पर लेटकर ही सोना चाहती थी और यही उसका सहमरण (सती) के लिए जाना था। इसके बाद उसे चिता पर बैठा कर कच्चे बांस की मचिया
बनाकर दबाकर रखा जाता था क्योंकि डर रहता था कि शायद दाह होने वाली नारी दाह की यंत्रणा न सह सके। चिता पर बहुत अधिक राल और घी डालकर इतना अधिक धुआँ कर दिया जाता था कि उस यंत्रणा को देखकर कोई डर न जाए और दुनिया भर के ढोल, करताल और शंख बजाए जाते थे कि कोई उसका चिल्लाना,रोना-धोना,अनुनय-विनय न सुनने पाए। बस यही तो था सहमरण……” सतीप्रथा । सतीप्रथा से छुटकारा दिलाने वाले लोर्ड विलियम बेन्टीक और राजा राममोहन राय को सलाम करते आ रहे हो।
पर कभी जो महिलाएं सती नहीं हुई उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति पर कोई ध्यान ही किसी ने नहीं दिया।जब कि आज के सभ्य कहलाने वाले समाज के परिवार , कुल उनको तानी मार मार जिंदा जला कर दिन में कितनी ही बार सती कर देते हैं।इस के बाद अब तक वो सती होती आरही है।कभी विचार होता ही नहीं है सती प्रथा को केवल एक ऐतिहासिक घटना के रूप में देखना और महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की अनदेखी करना एक बड़ी भूल है। आज भी, कई रूपों में, महिलाओं को सती प्रथा के समान पीड़ा से गुजरना पड़ता है।
आधुनिक समाज में सती प्रथा के रूप:
 
 सामाजिक बहिष्कार:
   
आज भी, विधवा महिलाओं को समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
  उन्हें अशुभ माना जाता है और कई सामाजिक और धार्मिक आयोजनों से दूर रखा जाता है।
  आर्थिक असुरक्षा:
    कई महिलाएं अपने पति की मृत्यु के बाद आर्थिक रूप से असहाय हो जाती हैं।
    उन्हें परिवार और समाज से पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता है, जिससे उनकी स्थिति और भी खराब हो जाती है।
  मानसिक उत्पीड़न:
    विधवा महिलाओं को अक्सर ताने और अपमान का सामना करना पड़ता है।
 उन्हें उनके जीवन के हर पहलू में दोषी ठहराया जाता है, जिससे उनकी मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
 
 दहेज प्रथा:
   
आज भी दहेज प्रथा महिलाओं के लिए बहुत बड़ी समस्या है। ससुराल में दहेज के लिए प्रताड़ित करना और मार देना भी एक प्रकार से सती प्रथा ही है।
 
घरेलू हिंसा:
   
घरेलू हिंसा के रूप में आज भी महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है, जो शारीरिक और मानसिक रूप से सती प्रथा के समान ही है।
विचार करने योग्य बातें:
 हमें यह समझना होगा कि सती प्रथा केवल एक शारीरिक कृत्य नहीं था, बल्कि यह महिलाओं के खिलाफ सामाजिक और आर्थिक हिंसा का प्रतीक था।
आज भी, महिलाओं को उसी तरह की हिंसा का सामना करना पड़ता है, चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक।
 हमें महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
 * शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से, हम समाज में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण को बदल सकते हैं।
यह सच है कि आज भी महिलाओं को विभिन्न रूपों में सती प्रथा के समान पीड़ा से गुजरना पड़ता है। हमें इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा और महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए काम करना होगा।
तो अब आइए सत्य भी देखे
सनातन में कुप्रथाएं "एक सफेद झूठ" क्यों लगता है?
क्या सती प्रथा का वास्तविक रूप वही है जैसा आज तक हमने पढ़ा या फिर कुछ और? अगर वास्तविक रूप कुछ और है तो फिर हमें गलत क्यों पढ़ाया गया और हमारी किताबों में गलत लिखा किसने?
सती प्रथा को जानने से पहले हमें यह जानना पड़ेगा कि वामपंथी इतिहासकारोंऔर लेखकों द्वारा इस प्रथा के पीछे क्या तर्क दिया जाता था और क्या-क्या कारण बताए जाते थे, यह जानना ज्यादा जरूरी है।
पहला तर्क: सती प्रथा के पीछे जो तर्क दिया जाता है उसमें पहला तर्क है माता सती का, जिन्होंने स्वयं को यज्ञ की अग्नि में भस्म कर लिया था। इस प्रथा का नाम जिनके नाम पर रखा गया वह थीं माता सती।
महादेव और माता सती:
माता सती भगवान शिव की अर्धांगिनी थीऔर प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। अपने पिताद्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने परमाता सती अत्यंत क्रोधित हो गईं औरक्रोधावश यज्ञ की अग्नि में स्वयं को भस्मकर लिया।
परंतु यहाँ एक बात सोचने की है, कि मातासती के पति यानी भगवान शिव तो जीवितहैं, हालांकि वे भगवान हैं, शंभू (अर्थात स्वयंउत्पन्न होने वाला) हैं, उनका कोई अंत नहींहै, उनकी कोई शुरुआत नहीं है। अब इनवामपंथी इतिहासकारों द्वारा दिया गया तर्कतो तर्कहीन हो गया।
दूसरा, माता सती के साथ किसी नेजबरदस्ती नहीं की थी। उन्होंने पति केअपमान को स्वयं का अपमान मानकरअपनी इच्छा से स्वयं को भस्म किया था।जिस प्रथा के नाम का आधार वामपंथी इतिहासकारों ने माता सती को बनाया था वह आधार ही आधारहीन हो गया।
जब इनका पहला तर्क काम में नहीं आयातो इन्होंने दिया दूसरा तर्क, वह क्या था?
दूसरा तर्क: अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा जो दूसरा तर्क दिया जाता था वह तर्क था जौहर का। पहले के राजघरानों में जब युद्ध करतेवक्त पति की मृत्यु हो जाती थी, तो पत्नी अपने मान सम्मान को दरिंदे आक्रमणकारियों से बचाने के लिए हवनकुंड में कूदकर स्वयं को भस्म कर लेती थी।और यह आक्रमणकारी और कोई नहीं बल्कि अंग्रेज और मुगल ही थे।
रानियों द्वारा किया जाने वाला जौहर राजघराने की स्त्रियों को देखकर समाज की अन्य स्त्रियों ने भी अपने पति की मृत्यु के बाद, अपनी मान मर्यादा को आक्रमणकारियों से बचाने के लिए स्वयं को अग्नि में भस्म करना शुरू कर दिया, वह भी बिना किसी दबाव में अपनी स्वयं की इच्छानुसार।
लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने इस बातका बतंगड़ बना कर, गलत ढंग से पेश कर भारतीयों के दिमाग में डाला कि भारत में स्त्री को जबरदस्ती आग में झोंका जाता है और उसको अपने पति की चिता के साथ जिंदा जलाया जाता है।
परंतु अब इन अंग्रेजी इतिहासकारों से हमें पूछना चाहिए कि जब स्त्रियों की इतनी ही चिंता थी तो अंग्रेजों द्वारा आक्रमण किया ही क्यों जाता था?
युद्ध में उनके पतियों को मारा ही क्यों जाता था?
अब इस तथ्य के भी आधारहीन हो जाने के कारण अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा जो अन्य तर्क दिया जाता था वह देखते हैं क्या था।
तीसरा तर्क: एक अन्य तर्क जो अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा दिया जाता है वह है महाराज पांडु और उनकी पत्नी श्रीमती माद्रीजी का।
जब महाराज पांडु की मृत्यु हुई तो उनकीपत्नी माद्री जी ने उनकी मृत्यु का कारण स्वयं को समझा जिसके पश्चाताप में उन्होंने अपने पति की चिता के साथ स्वयं को भस्मकर लिया।
महाराज पांडु को किंदम ऋषि का श्राप थाकि यदि वह कामांध होकर किसी भी स्त्रीका स्पर्श करेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी।
महाभारत के आदि पर्व के ‘सम्भव पर्व’ केअंतर्गत, अध्याय 124 में पाण्डु की मृत्यु और माद्री की चितारोहण की कथा का वर्णन है।
महाराज पांडु अपनी प्रिय पत्नी माद्री केसाथ वन में घूम रहे थे। पलाश, तिलक,आम, चम्‍पा, पारिभद्रक तथा और भी बहुतसे वृक्ष - फूलों की समृद्धि से भरे हुए थे। जो उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे।
नाना प्रकार के जलाशयों तथा कमलों से सुशोभित उस वन की मनोहर छटा देखकर राजा पाण्‍डु के मन में काम का संचार हो गया। जैसे ही उन्होंने कामांध होकर अपनी पत्नी माद्री को स्पर्श किया, वैसे ही उनकी मृत्यु हो गई।
उनकी पत्नी माद्री भी उनसे काफी प्रेम करतीथीं, इसी कारणवश वह विलाप करने लगीं।जब इस बात की खबर कुंती को लगी तो वहभी रोने लगी।
तब माद्री और कुंती, दोनों ने ही अपने पतिके प्रेम के कारण स्वयं को उनकी चिता केसाथ जलाने का निर्णय लिया। हमें दोनों केबीच हुए संवाद को देखना चाहिए!
महं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम।
अवश्यम्भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय॥23॥
अन्विष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम्।
उत्तिष्ठत्वं विसृज्यैनमिमान् पालय दारकान्॥24॥
अवाप्य पुत्राँलग्धात्मा वीरपत्नीत्वमर्थये।
कुन्ती ने कहा, “माद्री! मैं इनकी ज्येष्ठ धर्मपत्नी हूँ, अतः धर्म के ज्येष्ठ फल पर भी मेराही अधिकार है। जो भविष्यम्भावी बात है,उससे मुझे मत रोको। मैं मृत्यु के वश में पड़े हुए अपने स्वामी का अनुगमन करूँगी। अब तुम इन्हें छोड़कर उठो और इन बच्चों का पालन करो। पुत्र को पाकर मेरा लौकिक मनोरथ पूर्ण हो चुका है, अब मैं पति के साथदग्ध होकर वीर पत्नी का पद पाना चाहती हूँ।
अहमेवानुयास्यामि भर्तारमपलायिनम्।
न हि तृप्तास्मि कामानां ज्येष्ठामामनुमन्यताम्॥25॥
माद्री बोली- रणभूमि से कभी पीठ न दिखानेवाले अपने पति देव के साथ मैं ही जाऊँगी; क्योंकि उनके साथ होने वाले काम भोग से मैंतृप्त नहीं हो सकी हूँ आप बड़ी बहिन हैं, इसलिये मुझे आपको आज्ञा प्रदान करनीचाहिये।
मां चाभिगम्य क्षीणोऽयं कामाद्भरतसत्तमः।
तमुच्छिन्द्यामस्य कामं कथं नु यमसादने॥26॥
ये भरत श्रेष्ठ मेरे प्रति आसक्त हो मुझसे समागम करके मृत्यु को प्राप्त हुए हैं; अतःमुझे किसी प्रकार परलोक में पहुँचकर उनकी उस काम वासना की निवृत्ति करनी चाहिये।
न चाप्यहं घर्तयन्ती निर्विशेषं सुतेषु ते।
वृत्तिमार्ये चरिष्यामि स्पृशेदेनस्तथा च माम्॥27॥
आर्ये! मैं आपके पुत्रों के साथ अपने सगे पुत्रकी भांति बर्ताव नहीं कर सकूँगी उस दशा में मुझे पाप लगेगा।
तस्मान्मे सुतयोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रयत्।
मां च कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः॥28॥
(महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 124)
अतः आप ही जीवित रहकर मेरे पुत्रों का भीअपने पुत्रों के समान ही पालन कीजियेगा।इसके सिवा ये महाराज मेरी ही कामना रखकर मृत्यु के अधीन हुए हैं।
इसके बाद ऋषि गणों ने उन्हें समझाते हुएकहा कि :-
ऋषयस्तान् समाश्वास्य पाण्डवान्सत्यविक्रमान्।
ऊचुः कुन्तीं च माद्रीं च समाश्वास्यतपस्विनः॥
सुभगे वालपुत्रे तु न मर्तव्यं कथंचन।
पाण्डवांश्चापि नेष्यामः कुरुराष्ट्रंपंग्तपान्॥
अधर्मेष्वर्थजातेषु धृतराष्ट्रश्च लोभवान्।
स कदाचिन्न वर्तेत पाण्डवेषु यथाविधि॥
(महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 124)
वैशम्पायन जी कहते हैं, तदनन्तर तपस्वी ऋषियों ने सत्य पराक्रमी पाण्डवों को धीरज बँधाकर कुन्ती और माद्री को आश्वासन देते हुए कहा, “सुभगे ! तुम दोनों के पुत्र अभी बालक हैं, अतः तुम्हें किसी प्रकार देह-त्याग नहीं करना चाहिये। हम लोग शत्रुदमन पाण्डवों को कौरव राष्ट्र की राजधानी में पहुँचा देंगे। राजा धृतराष्ट्र अधर्ममय धन के लिये लोभ रखता है, अतः वह कभी पाण्डवों के साथ यथायोग्य बर्ताव नहीं कर सकता।इसीलिए आपको जीवित रहकर अपने बच्चों की देखभाल करनी चाहिए।
परंतु ऋषि-मुनियों के समझाने के बादमहारानी कुंती तो समझ गईं, लेकिन माद्री नहीं समझी और उन्होंने प्रेम वश महाराज पाण्‍डु की चिता के साथ स्वयं को भस्म कर लिया।
परंतु यहां भी देखा जाए तो उनको किसी नेविवश नहीं किया था और ऋषि-मुनियों केद्वारा समझाने के बाद भी उन्होंने ऐसा कियाक् योंकि वह उनसे प्रेम करती थीं।
परंतु धर्म के ठेकेदारों ने इस बात को गलतढंग से प्रस्तुत किया और सनातन धर्म को बदनाम करने की कोशिश की।
वहीं जब बात रोमियो-जूलियट की आती है, जब बात लैला-मजनू की आती है, जब बातसलीम-अनारकली की आती है, तो प्रेम अंधाहो जाता है क्योंकि इन लोगों ने भी एक दूसरेके लिए प्रेम होने के कारण अपनी जान दीथी। परंतु जब बात सनातन धर्म की आती हैतो प्रेम में भी अंधविश्वास नजर आता है।बड़े तर्कहीन तर्क दे देते थे अंग्रेज, और हमउन्हें बिना सबूतों के आधार पर, बिना पढ़ेमान भी लेते थे, क्योंकि गुलामी की आदततो हम में ही थी ना।
ऊपर दिए गए तर्कों में क्या कहीं भी ऐसालगा की स्त्री को जबरदस्ती उसके पति कीचिता के साथ जलाया जाता था, अपितु वहस्वयं की इच्छा से यह कार्य करती थीं।
परंतु इन वामपंथी इतिहासकारों औरलेखकों द्वारा हमारे वेदों में जो लिखा हैहमारे ग्रंथों में लिखा है वह सब उलट-पुलट करके हमें बताया गया जबकि लिखा कुछ और ही था।
हमने भी यह जानने की कभी कोशिश हीनहीं करी कि आखिर ऐसा क्यों होता था।इसके पीछे का कारण क्या था। हमारेसनातन धर्म में तो ऐसा कहीं पर भी नहींलिखा अपितु यहां तो नारियों का सम्मानकरना ही सिखाया गया है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाःक्रियाः॥
(मनुस्मृति 3/56)
अर्थात: जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँदेवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों कीपूजा नहीं होती है, उनका सम्मान नहीं होता हैवहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल होजाते हैं।
अब देखते हैं कि ऋग्वेद में विधवा नारी केबारे में क्या लिखा है:
उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेषएहि।
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभिसम्बभूथ॥8॥
(ऋग्वेद, 10 वा मंडल, सूक्त 18)
अर्थात: (पति की मृत्यु के बाद उसकीविधवा पत्नी से) उठ! तुझे संसार वापसबुला रहा है, तू किसका पक्ष ले रही है जोमृत शरीर है। जिसने इस संसार में तेरा हाथपकड़ा था और आकर्षित करता था वहमुक्त होकर चला गया।
सनातन धर्म के किसी भी ग्रंथ में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता है कि स्त्री को उसकेपति की मृत्यु के बाद उसकी चिता के साथजला देना चाहिए। ना ही भारत के पुरानेइतिहास में ऐसी घटनाएं हुई हैं। आपइतिहास के पन्नों को टटोल कर देख सकतेहैं बशर्ते वह वामपंथी इतिहास ना हो। यहतो अंग्रेजों द्वारा बोला गया एक सफेद झूठथा जिसे भारत के कुछ ठेकेदारों ने बिनासोचे समझे सनातन धर्म को बदनाम करनेके लक्ष्य के साथ अपना लिया।
सनातन धर्म सदैव नारियों का सम्मान करना सिखाता है कोई भी शुभ कार्य बिना स्त्रियों के संपूर्ण नहीं होता और यही बात उन अंग्रेजों को हजम नहीं हुई।
इसीलिए उन्होंने हमारी परंपराओं के साथविक्षेप कर भारत के लोगों को बताया औरउनके मन में सनातन धर्म के प्रति हीन भावनाउत्पन्न की।
जिन अंग्रेजों के यहां Witch Craft Act, 1542 जैसे कानून रहे हैं, जिसके तहत किसीभी नारी को बिना सोचे समझे, चुड़ैल घोषितकरके जिंदा जला दिया जाता था। जिन अंग्रेजों के यहां नारियों को कुर्सी मेज कीतरह वस्तु समझा जाता था।
प्लेटो जैसे महान दार्शनिकों का कहना था कि नारियों में आत्मा नहीं होती इसीलिएअंग्रेजों के यहां नारियों को मताधिकार नहीं था, न्यायालय में उनकी गवाही नहीं सुनीजाती थी।
उस देश के नागरिक भारत को यह ज्ञान देतेहैं कि भारत की नारियां शोषित हैं।
जिस समय अंग्रेजों के यहां यह कानून थे, उस समय भारत में रानी अहिल्याबाई, रानीचेन्नम्मा, रानी दुर्गावती जैसी महान रानियाँरही हैं, जिन्होंने अपने-अपने राज्यों में शासनतक किया है, उस भारत की नारियां कभीपतित नहीं हो सकतीं।
रामायण, महाभारत, गीता, मनुस्मृति कहीं भीइस प्रथा का उल्लेख नहीं मिला, ना तोदशरथ महाराज के पश्चात माँ कौशल्या, सुमित्रा, कैकई ने सती का अवलम्ब किया,ना ही महाभारत में सत्यवती और कुंती नेइसको अपनाया। अपितु वे राजमाता बनकर गौरव से जीवित रही।
इतना सब जानने के बाद यह कहना अनुचितहोगा कि सनातन धर्म में स्त्रियों का शोषणहोता है।
पर मन में एक कौतूहल उठता है किआखिर सती प्रथा का वास्तविक रूप क्या था?
सती शब्द संस्कृत के "सत" शब्द से पैदाहुआ है। जिसका अर्थ है पवित्र। सती प्रथाका नाम माता सती के द्वारा योगाग्नि में स्वयंको भस्म कर पार्वती के रूप में प्राकट्य की घटना से जुड़ा हुआ है। सबसे पहली बात येकी सती ने योगाग्नि में आत्माहुति किसी केदबाव में नहीं दिया था। अपितु स्वेच्छा सेदिया था।
सती शब्द भी सत्यीकरण यानि पवित्रीकरणसे ही निकला है, और पवित्र करने कीप्रक्रिया अग्नि की है। इस शब्द विशेष का किसी विधवा के पति के शव के साथ दाह से कोई संबंध नहीं था।
नवरात्रि के समय जब माता अम्बे जी की आरती होती है तो उस पर ध्यान दीजियेगा। उस आरती की कुछ पंक्तियाँ आपकोदिखाता हूँ :-
सब की बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचानेवाली,
सतिओं के सत को संवारती, ओ मैया हमरें तेरी आरती।
यहाँ “सतिओं के सत को संवारती” पंक्तिका अर्थ है कि जब किसी की पत्नी अपनेपति के मृत्यु के बाद सती होती थी तो माताअम्बे उसकी रक्षा करती थीं। माता अम्बे उनकी सात्विकता को बचाए रखती थीं तथा उनकी रक्षा करती थीं। अब अगर स्त्री को जिंदा जला दिया जाता था तो उसकी रक्षाका सवाल ही नहीं उठता। उसकी सात्विकता को कोई कैसे बचाएगा जब वह जिंदा ही नहीं रहती थी। यहाँ विरोधाभास उत्पन्न होता है।
माता अम्बे जी की यह आरती बहुत सालों से बोली जा रही है, अर्थात उस समय महिलाओं को सती के रूप में जलाया नहीं जाता था। वह मंदिर में रहा करतीं थीं जहाँउनकी पूजा की जाती थी। और माता अम्बेस्वयं उनकी रक्षा करती थीं।
गुप्तकाल में 510 ई. के दौरान सती प्रथा का पहला अभिलेखीय साक्ष्य देखा गयाहै। इस अभिलेख में महाराजा भानुगुप्त कावर्णन किया गया है जिनके साथ युद्ध मेंगोपराज भी मौजूद थे। गोपराज वीर गतिको प्राप्त हुए जिसके बाद उनकी पत्नी ने सती होकर अपने प्राण त्याग दिए थे। परन्तुयह किसी दबाव में नहीं अपितु स्वेच्छा का विषय था।
सनातन धर्म किसी को बाधित नहीं करता, अपितु सनातन में सदैव स्त्रियों को ऊपर कादर्जा दिया गया है। और जो आचरण स्त्रियोंके लिए बताया गया है, वही आचरण पुरुषोंको करने के लिए भी कहा है। तुलसीदासजी कहते हैं कि :-
एक नारिब्रतरत सब झारी।
ते मन बच क्रम पतिहितकारी॥
(उत्तर कांड, रामचरितमानस)
अर्थात: यहाँ तुलसीदास जी रामराज्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि राम राज्य में सभी पुरुष और स्त्री सामान थे, अर्थात पुरुष भी एक नारी व्रत का पालन करते थे। यहाँ पुरुष के विशेषाधिकारों को न मानकर दोनोंको समान रूप से एक ही व्रत पालने का आदेश दिया है।
तो क्या अब भी वामपंथी सनातन धर्म पर सवाल उठाएंगे?
जैसा आपने विभिन्न तस्वीरों में देखा होगा, वो गलत रूप है, जो हमें आज तक बतायागया, जिसके कारण अनेकों स्त्रियों की जान गई। भारत के कई आदिवासी इलाकों में (जैसे गोंड समुदाय के लोग, भील समुदायके लोग) सती प्रथा है किंतु इसका प्रकार देखें।
वहाँ विधवा स्त्री संस्कृत में मंत्र पढ़ती हुईपति की चिता के चक्कर काटती है और हरचक्कर में एक प्रश्न अपने हर संबंधी सेकरती है जैसे पुत्र, पुत्री, भाई, समाज, पुरोहित आदि और प्रश्न यह होता है कि क्या आप मेरा भरण पोषण करेंगे, अब मैं विधवा हूँ।
अब यहां कुछ लोग कहेंगे कि आज स्त्रीआत्मनिर्भर है उसे अपने भरण पोषण केलिए किसी पर निर्भर रहने की क्या आवश्यकता?
पर हमें एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि आत्मनिर्भरता आध्यात्मिक रूप से सम्भव है परंतु भौतिक रूप से हमें अपने परिजनों परनिर्भर रहना ही पड़ता है। आत्मनिर्भरता काअर्थ यह नहीं कि हम अपने समाज को छोड़कर अपने अंदर निवास करें, हमें समाजमें तो रहना ही पड़ेगा। यदि कोई हाँ कहता हैतो वह प्रदक्षिणा रोक देती है, किंतु जबकोई सहमत नहीं होता तब वह 7 प्रदक्षिणा कर के गाँव के मंदिर जाती है और वहीं ईश्वर चरण में जीवन यापन करती है और इस स्त्री को सती कहते हैं।
यही नहीं जब सारा समाज मन्दिर आता है तब उस स्त्री की भी चरण वंदना करता है और उसे देवी मानकर सम्मान भी दिया जाता है।
यह है वास्तविक सती प्रथा का सत्य।

रविवार, 16 मार्च 2025

वर्ण जन्म से होता है

वर्ण जन्म से होता है.....।
आजकल कुछ लोग ब्राह्मणों को उपदेश देते है और कर्मणा कर्मणा चिल्लाते है ये पोस्ट उन्हीं के लिए है जिन्हें न तो शास्त्र का ज्ञान है न ही प्रमाण मालूम है समस्त प्रमाण इसीलिए यहां पर डाल दिये गए है जो ब्राह्मण द्रोही और वर्णसंकरता का समर्थक होगा वही शास्त्र प्रमाण कदापि नही मानेगा ।

वर्ण और जाति अलग अलग नहीं हैं। जैसे आपका शरीर समाज का हिस्सा है, और आपके आंख, कान आदि शरीर के अंग। उसमें भी कोशिका, पुतली, रोम आदि अंगों के भी उपांग हैं। वैसे ही सनातन समाज का हिस्सा वर्ण है और फिर उन वर्णों के अंग तदनुरूप जातियां हैं और जातियों में भी उपजातियां हैं।

जैसे घर में अलग अलग कमरे, और कमरों में भी अलग अलग अलमारियों की व्यवस्था है और उनमें भी अलग अलह सांचे बने हैं, वैसे ही समाज रूपी घर में वर्णरूपी कमरे और जातिरूपी अलमारियों की सांचे रूपी उपजातियां हैं। वर्ण समष्टि है और जाति व्यष्टि। कुछ लोग जाति शब्द को संस्कृत का न मानकर यवनों के ‘अल-जात’ शब्द से उसका सम्बन्ध जोड़ देते हैं, उनके भ्रम का निराकरण भी यहीं हो जाएगा।

ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह ।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)
जन्म से ही ब्राह्मण सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है।

जन्मनैव महाभागो ब्राह्मणो नाम जायते ।
नमस्य: सर्वभूतानामतिथि: प्रसृताग्रभुक्॥
(महाभारत)
ब्राह्मण जन्म से ही महान् है और सभी प्राणियों के द्वारा पूजनीय है।

बालयोरनयोर्नॄणां जन्मना ब्राह्मणो गुरुः।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)
ब्राह्मण जन्म से ही सभी मनुष्यों का गुरु है।

जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्द्विज उच्यते ॥
(स्कन्दपुराण)

यहाँ जन्म से शूद्र इसीलिए कहा क्योंकि असंस्कृत व्यक्ति की शूद्रवत् संज्ञा है। जैसे शूद्र को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं, वैसे ही अनुपवीती ब्राह्मण को भी नहीं।

इसीलिए उसी स्कन्दपुराण में फिर कहा :-
ब्राह्मणो हि महद्भूतं जन्मना सह जायते ॥
ब्राह्मण जन्म से ही महान् है।

ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण है, यह बात सत्य है लेकिन उससे पहले ब्राह्मण माता पिता और गुरु की भी आवश्यकता है। तब वह ब्रह्म को जान पाता है। यहां कॉलेज का सिलेबस खत्म कर नहीं पाते, चले हैं ब्रह्मज्ञान भांजने।

अपि च,

स्त्रीशूद्रबीजबंधूनां न वेदश्रवणं स्मृतम्।
तेषामेवहितार्थाय पुराणानि कृतानि वै।
(औशनस उपपुराण)

स्त्री और शूद्र हेतु वेदश्रवण का निषेध ऊपर के वाक्य से और नीचे के भी प्रमाणों से मिलता है। इसीलिए उनके कल्याण के लिए पुराणों का प्रणयन किया गया।

प्रणवं वैदिकं चैव शूद्रे नोपदिशेच्छिवे।
(परमानन्द तंत्र, त्रयोदश उल्लास)

शूद्राणां वेदमंत्रेषु नाधिकार: कदाचन।
स्थाने वैदिकमंत्रस्य मूलमंत्रं विनिर्दिशेत्॥
(योगिनी तंत्र)

इसीलिए पुनः कहा :-

जन्मना लब्धजातिस्तु
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराण)
जाति की प्राप्ति जन्म से ही है।

जन्मना चोत्तमोऽयं च सर्वार्चा ब्राह्मणोऽर्हति॥
(भविष्य पुराण)
ब्राह्मण जन्म से ही उत्तम है, और सबों के द्वारा सम्माननीय है।

जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रियलक्षणम्॥
(पद्मपुराण, अत्रि संहिता)

जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः
(पराशर उपपुराण, वैखानस कल्पसूत्र)
जन्म से ब्राह्मण, संस्कार से द्विज, विद्या से विप्र और तीनों से श्रोत्रिय होता है।

क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा कल्पकोटिशतेन च ॥
तपसा ब्राह्मणत्वं च न प्राप्नोति श्रुतौ श्रुतम् ।
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण)
क्षत्रिय और वैश्य भी करोड़ों कल्पों तक तपस्या करके भी केवल तपस्या के दम पर ब्राह्मण नहीं बन सकते।

जो लोग विश्वामित्र का उदाहरण देते हैं, वो भी स्मरण रखें कि उन्होंने भी एक जन्म में ब्रह्मत्व प्राप्त नहीं किया। कई बार उनका शरीर बदला, पूरा शरीर नष्ट हो जाता तब केवल तेजरूप में बचते थे, ब्रह्मा जी नया शरीर देते थे। बीच में पक्षी की योनि भी मिली थी उन्हें। तब जाकर ब्राह्मण बने। उसमें भी उन्हें अनेक जन्मों में भी सफलता इसीलिए मिली क्योंकि उनका जन्म जिस चरु के कारण हुआ था वह ब्रह्मवक्तव्य से प्रेरित था।

शुक्लयजुर्वेद की काण्व शाखा के शतपथब्राह्मण में है बृहदारण्यकोपनिषद् , उसका वचन है :-

ब्रह्म वा इदमग्रआसीदेकमेव सृजत क्षत्रं यान्येतानि स नैव व्यभवत् स विशमसृजति स नैव व्यभवत्स शौद्रंवर्णमसृजत्।

अर्थात् सबसे पहले ब्राह्मण वर्ण ही था । उसने क्षत्रिय वर्णका सृजन किया । वह ब्राह्मण क्षत्रिय का सृजन करने के बाद भी अपनी वृद्धिमें सक्षम नही हुआ, तब उसने वैश्य वर्ण का सृजन किया ।

इसके अनन्तर (अर्थात् क्षत्रिय और वैश्यकी रचनाके बाद )भी वह ब्रह्म प्रवृद्ध न हो सका ,तब उसने शूद्र वर्णकी रचना की।

ये तो सिद्ध ही है सभी वर्ण भगवान् से उत्पन्न हुए अब इन वर्णों का विभाग सुनिए ! इन वर्णोंमें जन्म कैसे होता है इस विषय में भगवान् गीता में कहते हैं –
गुणकर्मविभागशः।

अर्थात्, जन्मांतर में किये गए कर्मों और सञ्चित गुणोंके द्वारा विभाग करके ही भगवान् चारों वर्णोंमें जन्म देते हैं !

वर्णाश्रमाश्चस्वकर्मनिष्ठा: प्रेत्य कर्मफलमनुभूय तत: शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलधर्मायु: श्रुतिवृत्तवित्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते।
(स्मृतिसन्दर्भ)

अर्थात् अपने कर्मोंमें तत्पर हुए वर्णाश्रमावलम्बी मरकर, परलोकमें कर्मोंका फल भोगकर, बचे हुए कर्मफलके अनुसार श्रेष्ठ देश, काल, जाति, कुल, धर्म, आयु, विद्या, आचार, धन, सुख और मेधा आदिसे युक्त, जन्म ग्रहण करते हैं।

कारणं गुणसंगोस्य सदद्योनिजन्मसु ।
(श्रीमद्भगवद्गीता)

गुणोंमें जो आसक्ति है वही इस भोक्ता पुरुष के अच्छी -बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है ।

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात्‌ भवेत् द्विजः।
वेद पाठात्‌ भवेत्‌ विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।
अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है।
संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण होता है।
इसके आधार पर कहते हैं वर्ण कर्म के द्वारा कोई भी बदल सकता है । किन्तु इस श्लोक का ये अर्थ बिल्कुल भी नहीं है । जन्मना जायते शूद्र: से ये नहीं हो जाता कि जन्म से सभी शूद्र हैं; इसका अर्थ है जन्म से सभी शूद्रवत् हैं ,अर्थात् वेद के अनधिकारी हैं किन्तु संस्कार होने से द्विज वेद का अधिकारी होता है ।

ब्राह्मण: सम्भवेनैव देवानामपि दैवतम् ।
प्रमाणं चैव लोकस्य ब्रह्मात्रेव हि कारणम् ॥
(मनुस्मृति)

अर्थात्, जन्मसे ही ब्राह्मण देवताओंका भी देवता होता है और लोक में उसका प्रमाण माना जाता है इसमें वेद ही कारण हैं ।

तपः श्रुतं च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मणककारणम् ।
(महाभाष्य)

जो ब्राह्मण से ब्राह्मणी में उत्पन्न और उपनयनपूर्वक वेदाध्ययन ,तप, विद्यादिसे युक्त होता है ,वही मुख्य ब्राह्मण होता है !

मेरु तन्त्र और पराशर पुराण भी ब्रह्मक्षेत्रं ब्रह्मबीजं आदि श्लोकों से जन्मना महत्व का प्रतिपादन करते हैं।

तप: श्रुताभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:
(महाभाष्य)

जो तप और विद्यासे हीन है वह केवल जाति से ब्राह्मण होता है ।

विदुरजी व्यासजीके पुत्र थे जो ब्राह्मण हैं और सर्वज्ञ वैष्णवावतार हैं, फिर भी शूद्र योनि में जन्म होने से शूद्र ही रहे । महाभारत में विदुर स्वयं को ब्रह्मविद्याका अनधिकारी बताते हैं जिसके कारण उन्होंने सनत्सुजात जी को ब्रह्मविद्या के लिए बुलाया था ।

विदुर जी कहते हैं
शूद्रयोनावहं जातो नातोऽन्यद् वक्तुमुत्सहे ।
कुमारस्य तु या बुद्धिर्वेद तां शाश्वतीमहम् ॥
(महाभारत)

अर्थात्, मेरा जन्म शूद्रयोनि में हुआ है अतः मैं (ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं होने से ) इसके अतिरिक्त और कोई उपदेश देने का मैं साहस नहीं कर सकता, किन्तु कुमार सनत्सुजात की बुद्धि सनातन है, मैं उन्हें जानता हूँ ।

महर्षि आपस्तम्ब ने धर्मसूत्रों में यह बात कही :-

धर्मचर्य्या जघन्यो वर्णः पूर्वंपूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ ।
अधर्मचर्य्यया पूर्वोवर्णो जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ॥

धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने वर्ण से उत्तम वर्ण में जन्म लेता है। अधर्माचरण से पूर्व वर्ण अर्थात् उत्तम वर्ण भी निम्न वर्ण में जन्म लेता है ।

तद्य इह रमणीयचरणाभ्यासो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणाभ्यासो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरनश्वयोनिं वा शूकर योनिं वा चाण्डालयोनिं वा।
(छान्दोग्योपनिषत्)

अर्थात्, उन में जो अच्छे आचरणवाले होते हैं वे शीघ्र ही उत्तमयोनि को प्राप्त होते हैं । वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि प्राप्त करते हैं तथा अशुभ आचरण वाले होते हैं वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं। वे कुत्ते की योनि, सूकर की योनि अथवा चाण्डालयोनि प्राप्त करते हैं।

उपरोक्त मन्त्र में स्पष्ट उल्लेख है कर्म के द्वारा ही अलग अलग योनियों में अथवा वर्ण में जन्म होता है।

यहां कोई अधिकार के हनन की बात नहीं है। जैसे कि अपनी पत्नी को वस्त्रहीन अवस्था में देख सकते हैं, लेकिन माता को नहीं। यहाँ पुत्र यदि कहे कि यह हमारे अधिकार का हनन है, तो मार खायेगा। वह उसका काम ही नहीं है। और यह ब्राह्मण जन्म ऐसे ही आरक्षण में नहीं मिल गया। ब्राह्मण का काम शूद्र करेगा तो उसे दोष लगेगा, वैसे ही शूद्र का काम ब्राह्मण के लिए वर्जित है।

तिर्यग्योनिगतः सर्वो मानुष्यं यदि गच्छति।
स जायते पुल्कसो वा चाण्डालो वाऽप्यसंशयः॥

पशुयोनि का जीव जब पहली बार मनुष्य बनता है तो म्लेच्छ या चांडाल बनता है।

पुल्कसः पापयोनिर्वा यः कश्चिदिह लक्ष्यते।
स तस्यामेव सुचिरं मतङ्ग परिवर्तते॥

हे मतङ्ग !! फिर वह उसी म्लेच्छ योनि में बहुत जन्मों तक बना रहता है।

ततो दशशते काले लभते शूद्रतामपि।
शूद्रयोनावपि ततो बहुशः परिवर्तते॥

फिर हज़ार जन्मों के काल के बराबर समय बिताकर उसे शूद्रयोनि मिलती हैं जहां फिर वह बहुत से जन्म लेता है।

ततस्त्रिंशद्गुणे काले लभते वैश्यतामपि।
वैश्यतायां चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते॥

वहां तीस जन्म बिताकर (यदि वह अपने वर्णगत धर्म का पालन करता रहा, तो) वैश्य वर्ण में जन्म लेता है और पुनः कई जन्मों तक वैश्य ही रहता है।

ततः षष्टिगुणे काले राजन्यो नाम जायते।
ततः षष्टिगुणे काले लभते ब्रह्मबन्धुताम्॥

वहां साठ जन्म बिताकर वह क्षत्रिय कुल में जन्म लेता है और फिर साठ जन्मों तक क्षत्रिय रहकर ब्राह्मण कुल में जन्म लेता है। यहां केवल वह ब्रह्मबन्धुत्व की स्थिति में रहता है, यानि जन्म मिला है, कर्म ब्राह्मण के नहीं हैं।

ब्रह्मबन्धुश्चिरं कालं ततस्तु परिवर्तते।
ततस्तु द्विशते काले लभते काण्डपृष्ठताम्॥

ब्रह्मबन्धुत्व की स्थिति में जब दो सौ जन्म बीतते हैं तब उसका जन्म वेदज्ञानी ब्राह्मण कुल में होता है।

काण्डपृष्ठश्चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते।
ततस्तु त्रिशते काले लभते जपतामपि॥

ऐसे कुल में तीन सौ जन्म लेने के बाद वह ब्राह्मण के आचरण और गायत्री आदि के संस्कार से भी युक्त हो जाता है।

तं च प्राप्य चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते।
ततश्चतुःशते काले श्रोत्रियो नाम जायते॥
(महाभारत)

इस प्रकार से जन्मना ब्राह्मण होकर कर्मणा भी जब वह ब्राह्मण बनता है, तो ऐसे स्तर के चार सौ जन्मों के बाद इसे ब्रह्मबोध होता है।

यानि जन्मना ब्राह्मण बनने के नौ सौ जन्मों के बाद वह कर्मणा भी ब्राह्मण बन पाता है। ऐसे घूमते फिरते नहीं, कि जब मन किया इसी शरीर से बन गए।

वर्ण देहाश्रित है। देह जन्माश्रित है। वर्ण कर्माश्रित नहीं है क्योंकि कर्म देह की अपेक्षा चिरस्थाई नहीं। वर्ण भौतिक अस्तित्व का परिचायक है और कर्म का आधार। इसीलिए कर्म वर्णाश्रित है, न कि वर्ण कर्माश्रित। कर्म बदलने से यदि वर्ण बदलेगा तो पूजा कराने वाला ब्राह्मण यदि धर्मरक्षा के लिए शस्त्र उठाये तो उसकी क्षत्रिय संज्ञा हो जाती, तो उसे अपनी पत्नी से ही ब्राह्मणीगमन का पाप लग जाता। कर्म वर्ण के ऊपर आश्रित है इसीलिए द्रोणाचार्य और युधिष्ठिर का कर्म उनके वर्ण पर प्रभाव न डाल सका।

यदि इच्छानुसार कर्म बदलने से वर्ण बदलने की स्वतंत्रता होती तो भगवान गीता में क्यों कहते ?
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
अपने अपने कर्म में लगे रहकर ही मनुष्य का कल्याण सम्भव है। इसीलिए महाभारत में जाबालि, बृहद्धर्म उपपुराण और पद्मपुराण आदि में कौशिक और नरोत्तम ब्राह्मण आदि को धर्मव्याध नामक कसाई, तुलाधार वैश्य और शुभा नामक स्त्री आदि धर्म का बोध कराते हैं। उनका कल्याण भी अपने अपने कर्म में रहकर ही हुआ।

पहले वर्ण मिलता है, तब उसके अनुरूप कर्म करने का अधिकार।
कोई भी कर्म करके उसके अनुरूप वर्ण चयन करने का अधिकार नहीं है।

उदाहरण :- पहले व्यक्ति आरबीआई का गवर्नर बनेगा फिर नोट छापेगा। पहले पद तब अधिकार। कोई भी व्यक्ति नोट छाप कर ये नहीं कह सकता है कि चूंकि मैं आरबीआई के गवर्नर का काम कर रहा हूँ तो मुझे वही पद दे दो। इसी प्रकार पूर्वजन्म की योग्यता के आधार पर इस जन्म का वर्ण मिलता है, फिर उसके अनुरूप कर्म करने का अधिकार। कर्म चुनने की स्वतंत्रता किसी को भी नहीं है। यदि ऐसा होता तो भिक्षाटन करने (ब्रह्मवृत्ति) के लिए उत्सुक अर्जुन को भगवान नहीं रोकते।

इज्याध्ययनदानानि विहितानि द्विजन्मनाम्।
जन्मकर्मावदातानां क्रियाश्चाश्रमचोदिताः॥
( श्रीमद्भागवत 7-11-13)

कुछ लोग सूत जी का उदाहरण देते हैं। सूत जी अयोनिज हैं। पृथु जी के यज्ञ में बृहस्पति और इंद्र जी का भाग मिल जाने से यज्ञ कुण्ड से सूत जी की उत्पत्ति हुई।
सूत जी ब्राह्मण ही हैं, सूत उनकी संज्ञा है, न कि सूत जाति। पद्मपुराण और वायुपुराण में उनके प्रादुर्भाव की कथा है।अग्निकुण्डसमुद्भूत: सूतो विमलमानसः। लेकिन उनका पालन पोषण सन्तानहीन सूत परिवार ने किया अतः वे भी उसी से पुकारे गए। जैसे राजा उपरिचर तथा अद्रिका अप्सरा की कन्या सत्यवती तथा ब्राह्मण शक्तिपुत्र पराशर के सहयोग से उत्पन्न व्यास जी ब्राह्मण थे। कैवर्त के द्वारा लालन पालन होने से सत्यवती दाशकन्या नहीं बन गयी। ऋषि कण्व के द्वारा पालन पोषण करने मात्र से शकुंतला ब्राह्मणी नहीं बन गयी।

जैसे सूत रथी के रथ का कुशलता से संचालन करके उसके मार्ग को प्रशस्त करता है, जैसे गुरु शिष्य को मार्गदर्शन देकर उसका मार्ग प्रशस्त करता है, वैसे ही सूत जी ने मार्गदर्शन के माध्यम से ऋषियों का कल्याण किया, इसीलिए उन्हें सूत कहा गया।

वैसे कर्म देखें तो द्रोणाचार्य ने जीवन भर शस्त्र की ही कमाई खाई। लेकिन उन्हें कभी भी कहीं भी क्षत्रिय नहीं कहा गया। विदुर जी ने जीवन भर शास्त्रोपदेश ही किया लेकिन उन्हें किसी ने कभी भी ब्राह्मण नहीं कहा। कृष्ण जी ने अनेकों बार अर्जुन का रथ संचालन किया लेकिन उन्हें कभी किसी ने सूत नहीं कहा।

महर्षि रोमहर्षण जी को ऋषियों ने अपना सूत यानि मार्ग दर्शक स्वीकार किया और बाद में इन्हीं को सूत जी महाराज कहा गया, अल्पज्ञानी लोग सूत जी को सूत जाति से सम्बन्धित कर देते हैं, परन्तु सूत जी का जन्म अग्निकुण्ड से ऋषियों द्वारा यज्ञ के दौरान हुआ, जिनके दर्शन से ऋषियों के रोंगटे खड़े हो गये क्योंकि इनके ललाट पर इतना तेज था। इनका प्रथम नाम रोमहर्षण हुआ । महर्षि श्री सूत जी साक्षात् ज्ञान स्वरूप थे तभी तो शौनकादि ऋषियों ने इन्हें अज्ञानान्धकार का नाश करने वाला सूर्य कहा।
अज्ञानध्वान्तविध्वंसकोटिसूर्यसमप्रभ।
सूताख्याहि कथासारं मम कर्ण रसायनम् ।।

कबीर दास ने कहा :- गुरु कुम्हार सिस कुम्भ है …
तो इसका अर्थ यह नहीं कि सभी गुरु कुम्हार हैं, या सभी कुम्हार गुरु हैं।अपितु यह है कि जैसे अपरिपक्व मिट्टी से कुम्हार अपने मार्गदर्शन से, कभी मार कर, कभी सहलाकर परिपक्व घड़ा बनाता है, वैसे ही अपरिपक्व शिष्य को अपने मार्गदर्शन से गुरु परिपक्व बनाता है। इसीलिए गुरु का कुम्हार के समान होना बताया गया है। जैसे रोमहर्षण जी का सूत के समान वर्णन मिलता है।

कर्म से जाति का निर्धारण होता है, यह निःसंदेह सत्य है | पर क्या आप ६ वर्ष के बालक को देख कर कैसे कह सकते हैं कि वह ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र में क्या बनेगा ? क्योंकि अभी तो उसने तदनुरूप कर्म किया ही नहीं !!

जहां कर्म से जाति का निर्धारण होने की बात है, तो वहाँ पिछले जन्म के कर्मों का संकेत है। पिछले जन्म के कर्म इस जन्म की जाति निर्धारित करते हैं, और इस जन्म के कर्म अगले जन्म की योनि या जाति का निर्धारण करते हैं | यदि ऐसा न होता, तो ब्राह्मणों के समान जीवन जीने वाली माता शबरी को ब्राहमण क्यों नहीं माना गया, और क्षत्रिय के जैसे कर्म करने वाले परशुराम को ब्राह्मण क्यों कहा गया ?

यह बहुत बड़ा भ्रमजाल है | यदि कर्म के आधार पर जाति होती तो फिर संसार में कर्मों का सम्मिश्रण नहीं होता। जैसे पानी पीने के कर्म को करने वाले एक श्रेणी में आते, और खाना खाने वाले दूसरी में। खाने वाले लोग पीते नहीं, और पीने वाले खाते नहीं। ये नियम शाश्वत होता .. लेकिन यह तो विरोधाभास है, क्योंकि यहाँ तो कर्म सम्मिश्रित है …भगवान श्रीकृष्ण जब गाय चराते थे, तो उन्हें क्षत्रिय क्यों कहा गया, वैश्य क्यों नहीं? और भला विदुर जैसे महाज्ञानी तपस्वी को और संजय जैसे साधक को ब्राह्मण क्यों नहीं कहा गया ?

इस जन्म की जाति का निर्धारण पिछले कर्मों से होता है.. इस जन्म में यदि शूद्र धर्माचरण की मर्यादा में रहे, तो उसे अगली योनि में वर्ण में उन्नति मिलेगी, वह वैश्य बनेगा, अन्यथा नीचे गिर कर म्लेच्छ बन जायेगा | इसी प्रकार यदि क्षत्रिय मर्यादानुसार धर्माचरण करे, तो अगले जन्म में इस जन्म के कर्म फल के तौर पर ब्राह्मण बनेगा, और यदि ऐसा नहीं किया, तो अगली योनि में विषय या शूद्र या म्लेच्छ और यहां तक कि पशु भी बन सकता है।

विराट पुरुष के अंगों से जहां वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है, वहां भी अजायत शब्द है, यानि जन्म लिया। ये नहीं कहा कि सभी मनुष्यों को उत्पन्न किया और उसमें जिसने अमुक कर्म को अपनाया उसे ये कहा गया।

और कर्म तो शाश्वत नहीं हैं। मैं यदि साधना कर रहा हूँ, तो मैं अभी ब्राह्मण हूँ। किसी म्लेच्छ का संहार करने समय मैं तो क्षत्रिय बन जाऊँगा, और कृषि करते समय वैश्य और समाज सेवा करते समय शूद्र बन जाऊँगा.. एक ही दिन में मैं कई बार सभी जातियों में घूम जाऊँगा . तो बताईये कि मेरी जाति क्या है ? मैं किस वर्ण की कन्या से विवाह करूंगा ? मैं क्या कहलाऊंगा ?

मनुष्य और कुत्ता दोनों रोटी खाएं तो क्या कुत्ते को मनुष्य और मनुष्य को कुत्ता कहा जा सकता है ? यदि मछली और बतख दोनों जल में तैरें, तो मछली को बतख और बतख को मछली कहा जा सकता है ? पिछले जन्म के कर्म इस जीवन की जाति तय करते हैं…. इस जीवन के कर्म जाति तय नहीं करते। वे अगले जन्म की जाति या योनि तय करते हैं | अतएव जन्मना जाति वर्ण ही वास्तविक है।
जय महादेव जय श्री राम

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...